भाग 2 · भारत का इतिहास
स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, रंगमंच, साहित्य, दर्शन, संत परंपरा एवं विश्व धरोहर — हड़प्पा से आधुनिक काल तक
2025 के मूल प्रश्नपत्र में सुमेलन (21), कालक्रम (21) तथा अभिकथन–कारण (20) मिलकर 41% थे। कला एवं संस्कृति पूरे प्रश्नपत्र का सबसे सघन सुमेलन-क्षेत्र है — मंदिर↔शैली↔निर्माता, नृत्य↔राज्य↔कलाकार, चित्रशैली↔संरक्षक, वाद्ययंत्र↔वर्ग, घराना↔स्थान, मेला↔स्थान, दर्शन↔प्रवर्तक। इस अध्याय की हर तालिका सीधे इसी रूप में प्रश्न बनती है; इन्हें पढ़ें नहीं, याद करें।
भारतीय स्थापत्य की पहली कड़ी कोई मंदिर या महल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नगर है। हड़प्पा सभ्यता (लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व) की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी नागरिक अभियांत्रिकी थी — मूर्ति या स्मारक नहीं, बल्कि नालियाँ, स्नानागार, अन्नागार और सड़कें।
आलमगीरपुर (जिला मेरठ/हापुड़ सीमा, हिंडन नदी के तट पर) हड़प्पा सभ्यता का पूर्वतम स्थल है — यहीं सभ्यता की पूर्वी सीमा समाप्त होती है। सनौली (बागपत) से ताम्रयुगीन रथ, ताबूत-शवाधान तथा ताँबे के अस्त्र मिले हैं, जो उत्तर-हड़प्पा/ताम्र-निधि संस्कृति से जोड़े जाते हैं। हुलास (सहारनपुर) तथा माँडी (मुजफ्फरनगर) भी UP के हड़प्पाई स्थल हैं। UPPSC इन्हें "UP के सिंधु घाटी स्थल" के रूप में बार-बार पूछता है।
मौर्य कला को दो भागों में बाँटा जाता है — दरबारी कला (Court Art) तथा लोकप्रिय कला (Popular Art)। दरबारी कला में पाटलिपुत्र का 80-स्तंभीय सभा-भवन (कुम्रहार) तथा अशोक के एकाश्म स्तंभ आते हैं; लोकप्रिय कला में यक्ष-यक्षी प्रतिमाएँ तथा लोक-देवताओं की मूर्तियाँ।
सारनाथ (वाराणसी) का सिंह शीर्ष मौर्य कला की चरम कृति है — चार सिंह पीठ जोड़े खड़े, नीचे गोल फलक पर चार पशु (सिंह, हाथी, अश्व, वृषभ) तथा उनके बीच चार धर्मचक्र, और आधार में उल्टा कमल। इसे 26 जनवरी 1950 को भारत का राजकीय प्रतीक (State Emblem) अपनाया गया — उसमें केवल तीन सिंह दिखते हैं, चौथा पीछे छिप जाता है। नीचे लिखा "सत्यमेव जयते" मुण्डकोपनिषद से लिया गया है और वह मूल शीर्ष का भाग नहीं है। मूल शीर्ष सारनाथ संग्रहालय में है; स्तंभ के शिलालेख में अशोक की संघभेद-निषेध (फूट डालने वालों के निष्कासन) की घोषणा है।
| स्तंभ / स्थल | वर्तमान राज्य | शीर्ष पशु / विशेषता |
|---|---|---|
| सारनाथ | उत्तर प्रदेश | चार सिंह — भारत का राजकीय प्रतीक |
| रामपुरवा | बिहार (पश्चिमी चंपारण) | वृषभ (बैल) तथा सिंह — दो स्तंभ |
| लौरिया नंदनगढ़ | बिहार | एकल सिंह — सर्वाधिक सुरक्षित स्तंभ |
| संकिसा (संकाश्य) | उत्तर प्रदेश (फर्रुखाबाद) | हाथी — बुद्ध के स्वर्ग से अवतरण से जुड़ा |
| वैशाली (कोल्हुआ) | बिहार | एकल सिंह |
| टोपरा तथा मेरठ | मूल स्थान हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश | फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाए गए |
| प्रयाग (कौशांबी से स्थानांतरित) | उत्तर प्रदेश | अशोक + समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति + जहाँगीर का लेख — तीन कालों का अभिलेख |
(1) बराबर गुफाएँ (गया, बिहार) भारत की प्राचीनतम शैलकृत गुफाएँ हैं — इन्हें अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ ने आजीवक सम्प्रदाय को दान किया था, बौद्धों को नहीं। लोमश ऋषि गुफा का चैत्य-गवाक्ष द्वार तथा सुदामा गुफा प्रसिद्ध हैं।
(2) अशोक के सभी स्तंभों पर अभिलेख नहीं हैं — सारनाथ, सांची, रामपुरवा पर हैं; कुछ स्तंभ निरक्षर (uninscribed) हैं।
(3) नंदनगढ़ बनाम नंदगढ़, संकिसा बनाम संकिसा-बसंतपुर — नामों की निकटता distractor बनती है।
बौद्ध स्थापत्य के तीन मूल रूप हैं, और तीनों का कार्य अलग है — यही अंतर परीक्षा में पूछा जाता है।
| रूप | कार्य | आकार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| स्तूप (Stupa) | अवशेष/धातु पर बना स्मारक — पूजा का केंद्र | अर्धगोलाकार टीला | सांची, भरहुत, अमरावती, धमेख |
| चैत्य (Chaitya) | प्रार्थना गृह — भीतर स्तूप स्थापित | अश्वनाल/अपसिडल (apsidal) योजना, स्तंभ-पंक्ति, चैत्य-गवाक्ष | कार्ले (सबसे बड़ा), भाजा, अजंता की गुफा 9, 10, 19, 26 |
| विहार (Vihara) | भिक्षुओं का आवास/मठ | वर्गाकार आँगन के चारों ओर कक्ष | नालंदा, अजंता की अधिकांश गुफाएँ, उदयगिरि |
| स्तूप | राज्य | पहचान-बिंदु |
|---|---|---|
| सांची (महास्तूप संख्या 1) | मध्य प्रदेश (रायसेन) | मूल निर्माण अशोक; शुंगों ने पत्थर से आवृत किया; तोरण सातवाहन काल के। UNESCO 1989 |
| भरहुत | मध्य प्रदेश (सतना) | शुंग काल; वेदिका पर जातक-कथाएँ; कनिंघम द्वारा खोजा; अवशेष कोलकाता संग्रहालय में |
| अमरावती | आंध्र प्रदेश (कृष्णा नदी) | सातवाहन–इक्ष्वाकु; सफेद चूना-पत्थर; आयक-स्तंभ |
| धमेख स्तूप | उत्तर प्रदेश — सारनाथ | गुप्तकालीन (लगभग 500 ई.); बुद्ध के प्रथम उपदेश का स्थल |
| धर्मराजिका स्तूप | उत्तर प्रदेश — सारनाथ | अशोककालीन मूल; अब केवल आधार शेष |
| चौखंडी स्तूप | उत्तर प्रदेश — सारनाथ | गुप्तकालीन; ऊपर गोविंदास ने अष्टकोणीय मुगल बुर्ज जोड़ा (हुमायूँ की स्मृति में) |
| केसरिया | बिहार (चंपारण) | भारत का सर्वाधिक ऊँचा/विशालतम स्तूप-टीला |
| भट्टिप्रोलु | आंध्र प्रदेश | बुद्ध की अस्थि-मंजूषा तथा प्राचीन ब्राह्मी अभिलेख |
| रामभार स्तूप | उत्तर प्रदेश — कुशीनगर | बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद दाह-संस्कार स्थल |
"सांची का स्तूप किसने बनवाया?" का सुरक्षित उत्तर अशोक है, पर "सांची के तोरण किस काल के हैं?" का उत्तर सातवाहन है — यही दो-कथन प्रश्न का ट्रैप है। इसी प्रकार धमेख गुप्तकालीन है, अशोककालीन धर्मराजिका है — दोनों सारनाथ में हैं।
भारतीय गुफा स्थापत्य की विशेषता यह है कि यह "बनाई" नहीं, "काटकर निकाली" जाती है — चट्टान को ऊपर से नीचे तराशा जाता है, इसलिए मचान (scaffolding) की आवश्यकता नहीं होती और भूल-सुधार संभव नहीं होता।
| गुफा | राज्य / नदी | धर्म | संरक्षक / विशेषता |
|---|---|---|---|
| अजंता | महाराष्ट्र (औरंगाबाद), वाघोरा नदी | केवल बौद्ध | सातवाहन (प्रारंभिक) तथा वाकाटक हरिषेण (उत्तर चरण); लगभग 30 गुफाएँ; 1819 में जॉन स्मिथ द्वारा पुनर्खोज; UNESCO 1983 |
| एलोरा | महाराष्ट्र (औरंगाबाद) | तीनों — बौद्ध, हिंदू, जैन | 34 गुफाएँ: 1–12 बौद्ध, 13–29 हिंदू, 30–34 जैन; राष्ट्रकूट एवं कलचुरि; UNESCO 1983 |
| एलिफेंटा (घारापुरी) | महाराष्ट्र, मुंबई के निकट द्वीप | मुख्यतः शैव | त्रिमूर्ति/महेशमूर्ति (सदाशिव); कलचुरि/कोंकण-मौर्य; UNESCO 1987 |
| बाघ | मध्य प्रदेश (धार), बाघिनी नदी | बौद्ध | भित्ति चित्रों के लिए — "अजंता की बहन"; 9 गुफाएँ, प्रसिद्ध "रंगमहल" |
| उदयगिरि | मध्य प्रदेश (विदिशा) | हिंदू (कुछ जैन) | गुप्तकालीन — चंद्रगुप्त द्वितीय; विश्वप्रसिद्ध वराह पैनल |
| उदयगिरि–खंडगिरि | ओडिशा (भुवनेश्वर) | जैन | कलिंगराज खारवेल; हाथीगुम्फा अभिलेख; रानीगुम्फा सबसे बड़ी |
| कार्ले (कार्ला) | महाराष्ट्र | बौद्ध | भारत का सबसे बड़ा चैत्य गृह; काष्ठ-अनुकृति छत |
| भाजा, बेडसा, कान्हेरी, नासिक (पांडवलेणी), जुन्नर | महाराष्ट्र | बौद्ध (हीनयान) | जुन्नर में सर्वाधिक संख्या में गुफाएँ; कान्हेरी मुंबई में |
| बादामी | कर्नाटक | हिंदू + जैन | चालुक्य (मंगलेश); 4 गुफाएँ — गुफा 3 विष्णु को समर्पित, सर्वोत्तम |
| सित्तनवासल | तमिलनाडु (पुदुक्कोट्टै) | जैन | पांड्य; भित्ति चित्र — समवसरण तथा कमल-सरोवर |
| बराबर | बिहार (गया) | आजीवक | अशोक एवं दशरथ; भारत की प्राचीनतम शैलकृत गुफाएँ; लोमश ऋषि, सुदामा |
उदयगिरि (विदिशा, मध्य प्रदेश) = गुप्तकालीन, हिंदू, वराह प्रतिमा, चंद्रगुप्त द्वितीय।
उदयगिरि–खंडगिरि (भुवनेश्वर, ओडिशा) = जैन, खारवेल, हाथीगुम्फा अभिलेख।
UPPSC इन्हें एक-दूसरे की जगह रखकर "सही सुमेलित नहीं है" प्रश्न बनाता है। इसी तरह बाघ (मध्य प्रदेश) गुफाएँ हैं, जबकि बाघ नाम की कोई नदी नहीं — वहाँ बाघिनी नदी बहती है।
अजंता = केवल बौद्ध, चित्रकला के लिए प्रसिद्ध, नदी के घोड़े-नाल मोड़ पर, कोई मोनोलिथिक मंदिर नहीं।
एलोरा = तीन धर्म, मूर्तिकला एवं कैलाश मंदिर (एकाश्म) के लिए प्रसिद्ध, पहाड़ी ढाल पर।
दोनों महाराष्ट्र (औरंगाबाद/छत्रपति संभाजीनगर) में हैं और दोनों 1983 में UNESCO सूची में आए।
प्र.1 स्तूप-स्थापत्य के अंगों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'अंड' स्तूप का अर्धगोलाकार गुंबदाकार भाग होता है।
2. 'हर्मिका' अंड के शीर्ष पर बनी वेदिकानुमा चौकोर रचना है।
3. 'मेधि' वह उठा हुआ चबूतरा है जिस पर प्रदक्षिणा-पथ बना होता है।
4. 'तोरण' स्तूप के भीतर रखी अस्थि-मंजूषा को कहा जाता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 शैलकृत (rock-cut) स्थापत्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अजंता की गुफाएँ बौद्ध धर्म से संबंधित हैं तथा उनमें भित्तिचित्रण एवं उत्कीर्णन दोनों के उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं।
2. एलोरा की गुफाओं में केवल बौद्ध धर्म से संबंधित शैलकृत स्थापत्य ही मिलता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 सूची-I (गुफा/शैलाश्रय) को सूची-II (राज्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. भीमबेटका B. एलिफेंटा C. उदयगिरि-खंडगिरि D. बादामी
सूची-II: 1. ओडिशा 2. कर्नाटक 3. मध्य प्रदेश 4. महाराष्ट्र
कूट:
संरचनात्मक (structural) मंदिर की शुरुआत गुप्त काल से मानी जाती है। उससे पहले पूजा-स्थल या तो शैलकृत थे या काष्ठ-निर्मित। हर मंदिर में — शैली चाहे कोई हो — ये अंग मिलते हैं:
CC BY-SA 4.0 · Dey.sandip
CC BY-SA 4.0 · Original: Rainer Halama Derivative work: UnpetitproleX
CC BY-SA 4.0 · Rohit Sharma
| आधार | नागर (Nagara) | द्रविड़ (Dravida) | वेसर (Vesara) |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | हिमालय से विंध्य तक — उत्तर भारत | कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक — तमिलनाडु/दक्षिण | विंध्य एवं कृष्णा के बीच — दक्कन/कर्नाटक |
| ऊर्ध्व संरचना | शिखर — वक्ररेखीय (curvilinear), शीर्ष पर आमलक + कलश | विमान — सीढ़ीदार पिरामिडाकार, शीर्ष पर शिखर (गुंबदाकार) + स्तूपिका | दोनों का मिश्रण — द्रविड़ योजना पर नागर विवरण |
| चारदीवारी | प्रायः नहीं | प्राकार (ऊँची चारदीवारी) होती है | प्रायः होती है |
| प्रवेश-द्वार | विशाल गोपुरम नहीं | गोपुरम — विशाल अलंकृत द्वार, बाद में विमान से भी ऊँचा | सीमित |
| जलाशय | प्रायः नहीं | मंदिर-तालाब (पुष्करिणी) अनिवार्यतः | कभी-कभी |
| द्वारपाल / देवता | गंगा-यमुना द्वार पर | द्वारपाल, दिक्पाल, नंदी; परिसर में अनेक उप-मंदिर | मिश्रित |
| प्रमुख उदाहरण | खजुराहो, कोणार्क, लिंगराज, दिलवाड़ा, देवगढ़ | बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, मीनाक्षी, कैलासनाथ (कांचीपुरम) | होयसलेश्वर (हलेबिड), चेन्नकेशव (बेलूर), पापनाथ (पट्टदकल) |
"शिखर" शब्द दोनों में आता है पर अर्थ भिन्न है! नागर में शिखर = गर्भगृह के ऊपर की पूरी वक्ररेखीय संरचना। द्रविड़ में विमान = पूरी पिरामिडाकार संरचना और शिखर = उसके शीर्ष पर बैठा गुंबदाकार तत्व। इसी प्रकार आमलक और कलश नागर के हैं, स्तूपिका द्रविड़ की है। "गोपुरम नागर शैली का अंग है" — यह कथन गलत है, और UPPSC इसे बार-बार कथन-प्रश्न में रखता है।
नागर शिखर तीन प्रकार का होता है, और इसी आधार पर क्षेत्रीय उप-शैलियाँ बनीं:
| उप-शैली | क्षेत्र / वंश | पहचान | प्रमुख मंदिर |
|---|---|---|---|
| ओडिशा / कलिंग | ओडिशा — सोमवंशी एवं पूर्वी गंग | मंदिर = देउल (गर्भगृह) + जगमोहन (सभा-मंडप) + नटमंदिर + भोगमंडप; शिखर लगभग सीधा उठकर ऊपर मुड़ता है; बाहरी दीवार पर सघन उत्कीर्णन, भीतर सादगी | लिंगराज, जगन्नाथ (पुरी), कोणार्क, मुक्तेश्वर, राजारानी, परशुरामेश्वर |
| खजुराहो / चंदेल (मध्य भारत) | बुंदेलखंड — चंदेल | ऊँची जगती पर पूरा मंदिर; पंचायतन योजना; शेखरी शिखर; मंडप की छतें ऊपर उठती शृंखला; कामकला-मूर्तियाँ; प्रायः प्रदक्षिणापथ भीतर | कंदरिया महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ, चौंसठ योगिनी, पार्श्वनाथ (जैन) |
| सोलंकी / मारू-गुर्जर | गुजरात–राजस्थान — चौलुक्य (सोलंकी) | श्वेत संगमरमर का उत्कृष्ट उत्कीर्णन; अलंकृत छतें एवं तोरण; प्रायः शिखर नहीं या सादा; वाव (बावड़ी) एवं कुंड परंपरा | दिलवाड़ा (माउंट आबू), मोढेरा सूर्य मंदिर, रानी की वाव, सूर्य मंदिर, रणकपुर |
| गुप्त (आदि नागर) | मध्य भारत एवं उत्तर प्रदेश | सपाट छत से शिखर की ओर क्रमिक विकास; चतुष्कोणीय गर्भगृह; स्तंभयुक्त बरामदा | सांची मंदिर संख्या 17, तिगवा (कंकाली देवी), भितरगाँव, देवगढ़ |
भारतीय संरचनात्मक मंदिर के विकास की दो निर्णायक कड़ियाँ उत्तर प्रदेश में हैं:
साथ ही सारनाथ का मूलगंध कुटी विहार क्षेत्र तथा कौशांबी (प्रयागराज) के अवशेष, और अहिच्छत्र (बरेली) की गुप्तकालीन टेराकोटा गंगा-यमुना प्रतिमाएँ इस कड़ी को पूरा करती हैं।
दक्षिण भारत में मंदिर स्थापत्य एक सीधी विकास-रेखा में चला — और UPPSC इसी क्रम पर कालक्रम प्रश्न बनाता है।
| क्रम | चरण / वंश | काल | विशेषता एवं उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | पल्लव — महेंद्र शैली | 7वीं शताब्दी (महेंद्रवर्मन प्रथम) | शैलकृत मंडप; मंडगपट्टु अभिलेख — "ईंट, लकड़ी, धातु या गारे के बिना" निर्मित |
| 2 | पल्लव — मामल्ल शैली | नरसिंहवर्मन प्रथम "मामल्ल" | महाबलीपुरम के एकाश्म रथ (पंच पांडव रथ — धर्मराज, भीम, अर्जुन, द्रौपदी, नकुल-सहदेव); गंगावतरण/अर्जुन की तपस्या शिलाचित्र |
| 3 | पल्लव — राजसिंह शैली | नरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह" | संरचनात्मक मंदिर प्रारंभ — तट मंदिर (Shore Temple), महाबलीपुरम तथा कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम |
| 4 | पल्लव — नंदिवर्मन शैली | 8वीं–9वीं शताब्दी | छोटे मंदिर — वैकुंठ पेरुमाल, कांचीपुरम |
| 5 | चोल | 10वीं–12वीं शताब्दी | विशाल विमान ही सर्वोच्च; गोपुरम अभी गौण — बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, ऐरावतेश्वर |
| 6 | पांड्य | 13वीं शताब्दी | गोपुरम विमान से ऊँचा हो गया; विशाल प्राकार एवं मंदिर-नगर |
| 7 | विजयनगर | 14वीं–16वीं शताब्दी | कल्याण मंडप, अम्मन मंदिर, 1000-स्तंभ मंडप, विशाल अलंकृत स्तंभ (यालि/अश्वारोही), राय गोपुरम — विट्ठल, हजार राम, विरूपाक्ष (हम्पी) |
| 8 | नायक | 16वीं–18वीं शताब्दी | विशाल प्राकार एवं गोपुरम, प्रकारम तथा गलियारे — मीनाक्षी मंदिर, मदुरै; रंगनाथस्वामी, श्रीरंगम (विश्व का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर परिसर) |
| मंदिर | स्थान / राज्य | निर्माता एवं वंश | शैली / विशेष |
|---|---|---|---|
| कैलाश मंदिर (एलोरा गुफा 16) | एलोरा, महाराष्ट्र | कृष्ण प्रथम — राष्ट्रकूट (8वीं शताब्दी) | विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म (monolithic) शैलकृत मंदिर; ऊपर से नीचे तराशा गया; द्रविड़ योजना |
| बृहदेश्वर / राजराजेश्वर मंदिर | तंजावुर, तमिलनाडु | राजराज प्रथम — चोल (लगभग 1010 ई.) | द्रविड़; "महान जीवंत चोल मंदिर" के अंतर्गत UNESCO 1987 |
| गंगैकोंडचोलपुरम मंदिर | तमिलनाडु | राजेंद्र प्रथम — चोल | गंगा-विजय की स्मृति में नई राजधानी; विमान बृहदेश्वर से कुछ नीचा पर अधिक वक्र |
| ऐरावतेश्वर मंदिर | दारासुरम, तमिलनाडु | राजराज द्वितीय — चोल | रथाकार मंडप, संगीत-सोपान; UNESCO (चोल समूह) |
| तट मंदिर (Shore Temple) | महाबलीपुरम, तमिलनाडु | नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) — पल्लव | प्रथम पल्लव संरचनात्मक मंदिर; UNESCO 1984 |
| कैलासनाथ मंदिर | कांचीपुरम, तमिलनाडु | नरसिंहवर्मन द्वितीय — पल्लव | कांचीपुरम का सबसे बड़ा पल्लव मंदिर |
| विरूपाक्ष मंदिर | पट्टदकल, कर्नाटक | रानी लोकमहादेवी — विक्रमादित्य द्वितीय (चालुक्य) | कांचीपुरम के कैलासनाथ पर आधारित; UNESCO 1987 |
| पापनाथ मंदिर | पट्टदकल, कर्नाटक | चालुक्य | वेसर शैली का श्रेष्ठ उदाहरण — नागर + द्रविड़ |
| लिंगराज मंदिर | भुवनेश्वर, ओडिशा | सोमवंशी (ययाति केसरी द्वारा प्रारंभ, ललाटेंदु केसरी द्वारा पूर्ण; 11वीं शताब्दी) | कलिंग/ओडिशा शैली का शिखर-बिंदु; देउल + जगमोहन + नटमंदिर + भोगमंडप |
| जगन्नाथ मंदिर | पुरी, ओडिशा | अनंतवर्मन चोडगंग — पूर्वी गंग (12वीं शताब्दी) | चार धाम में से एक; रथयात्रा |
| कोणार्क सूर्य मंदिर | कोणार्क, ओडिशा | नरसिंहदेव प्रथम — पूर्वी गंग (लगभग 1250 ई.) | रथाकार — 12 जोड़ी पहिए, 7 अश्व; "ब्लैक पैगोडा"; UNESCO 1984 |
| कंदरिया महादेव | खजुराहो, मध्य प्रदेश | विद्याधर — चंदेल (लगभग 1030 ई.) | खजुराहो का सबसे बड़ा एवं ऊँचा मंदिर; शेखरी शिखर |
| लक्ष्मण मंदिर | खजुराहो | यशोवर्मन (लक्ष्मणवर्मन) — चंदेल (लगभग 954 ई.) | पूर्ण पंचायतन वैष्णव मंदिर |
| चौंसठ योगिनी मंदिर | खजुराहो | चंदेल (9वीं शताब्दी) | खजुराहो का प्राचीनतम मंदिर; एकमात्र ग्रेनाइट से बना; तंत्र-आधारित |
| मोढेरा सूर्य मंदिर | मोढेरा, गुजरात | भीम प्रथम — सोलंकी/चौलुक्य (1026 ई.) | सूर्यकुंड, सभामंडप, गूढ़मंडप — कोई शिखर शेष नहीं |
| रानी की वाव | पाटन, गुजरात | रानी उदयमती (भीम प्रथम की स्मृति में) — सोलंकी | सात-मंजिला बावड़ी; UNESCO 2014; ₹100 के नोट पर अंकित |
| दिलवाड़ा — विमल वसही | माउंट आबू, राजस्थान | विमल शाह (भीम प्रथम का मंत्री), 1031 ई. | जैन (आदिनाथ); श्वेत संगमरमर की छत-नक्काशी |
| दिलवाड़ा — लूण वसही | माउंट आबू | वस्तुपाल एवं तेजपाल (वाघेला मंत्री), 1230 ई. | जैन (नेमिनाथ); रंगमंडप का झूमर-गुंबद |
| चेन्नकेशव मंदिर | बेलूर, कर्नाटक | विष्णुवर्धन — होयसल (1117 ई.) | तलकाड में चोलों पर विजय की स्मृति; UNESCO 2023 |
| होयसलेश्वर मंदिर | हलेबिड, कर्नाटक | विष्णुवर्धन — होयसल | द्विकूट (दो गर्भगृह); UNESCO 2023 |
| केशव मंदिर | सोमनाथपुर, कर्नाटक | सोमनाथ दंडनायक, नरसिंह तृतीय के शासन में (1268 ई.) | त्रिकूट (तीन गर्भगृह); UNESCO 2023 |
| विट्ठल (विठ्ठलस्वामी) मंदिर | हम्पी, कर्नाटक | विजयनगर — कृष्णदेवराय काल में विस्तार | प्रस्तर रथ तथा संगीत-स्तंभ (musical pillars); ₹50 के नोट पर रथ |
| हजार राम मंदिर | हम्पी | देवराय प्रथम — विजयनगर | राजपरिवार का निजी मंदिर; रामायण के भित्ति-पैनल |
| मीनाक्षी–सुंदरेश्वर मंदिर | मदुरै, तमिलनाडु | नायक शासक (विश्वनाथ नायक एवं उत्तराधिकारी) | 14 गोपुरम, स्वर्ण कमल तालाब, सहस्र-स्तंभ मंडप |
| रामप्पा / रुद्रेश्वर मंदिर | पालमपेट, तेलंगाना | रेचर्ल रुद्र, गणपतिदेव (काकतीय) के शासन में, 1213 ई. | तैरती ईंटों का शिखर; शिल्पी के नाम पर मंदिर; UNESCO 2021 |
| दशावतार मंदिर | देवगढ़ (ललितपुर), उत्तर प्रदेश | गुप्त | प्रारंभिक पंचायतन; शेषशायी विष्णु पैनल |
| भितरगाँव मंदिर | कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश | गुप्त | प्राचीनतम जीवित ईंट मंदिर; टेराकोटा पैनल |
| सूर्य मंदिर | मार्तंड, जम्मू-कश्मीर | ललितादित्य मुक्तापीड़ — कार्कोट (8वीं शताब्दी) | कश्मीरी शैली — पिरामिडाकार छत, ग्रीक-रोमन प्रभाव के स्तंभ |
प्र.1 सूची-I (मंदिर स्थापत्य की क्षेत्रीय शैली) को सूची-II (प्रतिनिधि उदाहरण) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. होयसल शैली B. कलिंग (ओडिशा) शैली C. मारू-गुर्जर (सोलंकी) शैली D. चंदेल शैली
सूची-II: 1. कंदरिया महादेव मंदिर, खजुराहो 2. दिलवाड़ा जैन मंदिर, माउंट आबू 3. चेन्नकेशव मंदिर, बेलूर 4. लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर
कूट:
प्र.2 भारतीय मंदिर स्थापत्य की शैलियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नागर शैली के मंदिरों की विशेषता परिसर के चारों ओर ऊँची चहारदीवारी तथा प्रवेश पर भव्य गोपुरम् है।
2. द्रविड़ शैली में गर्भगृह के ऊपर बना पिरामिडाकार मुख्य शिखर 'विमान' कहलाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 विजयनगर स्थापत्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इस काल में मंदिर-परिसरों में 'अम्मान मंदिर' (देवी मंदिर) तथा 'कल्याण मंडप' जैसे नवीन अंग जोड़े गए।
2. हम्पी का विट्ठल मंदिर अपने संगीतमय स्तंभों तथा पाषाण-रथ के लिए प्रसिद्ध है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
13वीं शताब्दी में जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया, वह सजावट का नहीं, भार-वहन की तकनीक का था।
| पक्ष | भारतीय (ट्रैबिएट / Trabeate) | इस्लामी (आर्क्यूएट / Arcuate) |
|---|---|---|
| भार-वहन | स्तंभ + शहतीर (lintel) — सीधी रेखा | मेहराब (arch) एवं गुंबद (dome) |
| जोड़ाई | पत्थरों को बिना गारे के जमाया जाता था | चूना-गारा (lime mortar) का व्यापक प्रयोग — नई तकनीक |
| अलंकरण | मानव एवं पशु आकृतियाँ | अरबेस्क (ज्यामितीय-वानस्पतिक), सुलेख (calligraphy), जालीदार पर्दे — जीवित प्राणियों का निषेध |
| संक्रमण-तत्व | — | स्क्विंच तथा पेंडेंटिव — वर्गाकार कक्ष पर गोल गुंबद बैठाने की युक्ति |
| वंश | शैली-विशेषता | प्रमुख निर्माण |
|---|---|---|
| गुलाम/मामलूक (1206–90) | तोड़े गए मंदिरों की सामग्री का पुनः प्रयोग; कोरबेल मेहराब; लाल बलुआ पत्थर | कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद (ऐबक, दिल्ली का प्रथम मस्जिद), अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (अजमेर), कुतुब मीनार (ऐबक ने आरंभ, इल्तुतमिश ने पूर्ण, फिरोजशाह ने मरम्मत), सुल्तान गढ़ी (भारत का प्रथम इस्लामी मकबरा), बलबन का मकबरा |
| खिलजी (1290–1320) | सेल्जुक प्रभाव; सच्ची मेहराब एवं गुंबद; लाल बलुआ पत्थर + संगमरमर; कमल-कली किनारी | अलाई दरवाजा (1311), अलाई मीनार (अधूरी), सीरी का किला, हौज खास, जमात खाना मस्जिद |
| तुगलक (1320–1414) | सादगी एवं दुर्ग-सदृश भारीपन; ढलवाँ दीवारें (batter); मेहराब + शहतीर का मिश्रण; सस्ता ग्रे क्वार्ट्जाइट; "संकट की स्थापत्य" | तुगलकाबाद (गयासुद्दीन), जहाँपनाह एवं आदिलाबाद (मुहम्मद बिन तुगलक), फिरोजशाह कोटला, हौज खास मदरसा, फिरोजाबाद, कालीगढ़ी |
| सैयद एवं लोदी (1414–1526) | अष्टकोणीय एवं वर्गाकार मकबरे; दोहरा गुंबद; उद्यान-मकबरा परंपरा का बीज | मुबारक शाह एवं मुहम्मद शाह के मकबरे, सिकंदर लोदी का मकबरा, बड़ा गुम्बद एवं शीश गुम्बद, मोठ की मस्जिद |
जौनपुर सल्तनत (शर्की वंश, 1394–1479) ने एक पूर्णतः विशिष्ट प्रांतीय शैली दी, जिसे शर्की शैली कहते हैं। इसकी अचूक पहचान:
| प्रांत | विशेषता | प्रमुख स्मारक |
|---|---|---|
| जौनपुर (शर्की) — UP | विशाल पाइलॉन, मीनार-रहित | अटाला मस्जिद, जामा मस्जिद, लाल दरवाजा |
| बंगाल | ईंट एवं टेराकोटा; वक्र (do-chala/chau-chala) छत जो बाद में "बंगाल छत" के रूप में मुगल स्थापत्य में गई; काला पत्थर | अदीना मस्जिद (पांडुआ — भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में), एकलाखी मकबरा, दाखिल दरवाजा एवं कदम रसूल (गौड़), छोटा एवं बड़ा सोना मस्जिद |
| गुजरात | जैन एवं हिंदू शिल्प का सबसे गहरा समावेश; उत्कृष्ट जाली | अहमदाबाद की जामा मस्जिद, सीदी सैयद की जाली (वृक्ष-जाली — अहमदाबाद का प्रतीक), रानी सिपरी मस्जिद, तीन दरवाजा, चांपानेर (UNESCO 2004) |
| मालवा (मांडू) | भव्य सीढ़ियाँ एवं मेहराब; रंगीन टाइल; मीनारों का अभाव; जल-स्थापत्य | जहाज महल, हिंडोला महल, होशंगशाह का मकबरा (भारत का प्रथम संगमरमर स्मारक), अशरफी महल, रानी रूपमती का मंडप |
| बीजापुर (आदिलशाही) | विशाल गुंबद, कमल-दल आधार, बल्ब-नुमा गुंबद | गोल गुम्बज (मुहम्मद आदिलशाह का मकबरा, 1656) — विश्व के विशालतम एकल गुंबदों में; फुसफुसाहट दीर्घा (Whispering Gallery); इब्राहीम रौजा, जामा मस्जिद, गगन महल |
| बीदर एवं गोलकुंडा | फारसी-तुर्की प्रभाव; बीदरी धातु-कला | महमूद गवाँ का मदरसा (बीदर), चारमीनार (मुहम्मद कुली कुतुबशाह, 1591, हैदराबाद), कुतुबशाही मकबरे |
| कश्मीर | काष्ठ (देवदार) स्थापत्य, पिरामिडाकार छत, शिखर-नुमा गुंबद | शाह हमदान की खानकाह, जामा मस्जिद श्रीनगर, मदनी मस्जिद |
मुगल स्थापत्य एक सीधी प्रगति में चलता है — लाल बलुआ पत्थर से श्वेत संगमरमर की ओर, और ठोस द्रव्यमान से नाजुक अलंकरण की ओर। कालक्रम-प्रश्न इसी रेखा पर बनते हैं।
| शासक | चरण-विशेषता | प्रमुख निर्माण |
|---|---|---|
| बाबर (1526–30) | अल्प निर्माण; चारबाग उद्यान-परंपरा भारत में लाया | पानीपत की काबुली बाग मस्जिद, संभल की जामा मस्जिद (UP), आगरा का राम बाग (आराम बाग) — भारत का प्रथम मुगल चारबाग |
| शेरशाह सूरी (1540–45) — अंतराल | संक्रमणकालीन; सल्तनत से मुगल की ओर सेतु | शेरशाह का मकबरा, सासाराम (झील के बीच अष्टकोणीय), किला-ए-कुहना मस्जिद (पुराना किला, दिल्ली), रोहतासगढ़ |
| हुमायूँ / अकबर का आरंभ | फारसी योजना का आगमन | हुमायूँ का मकबरा (1565–72; विधवा हमीदा बानो बेगम द्वारा, वास्तुकार मीरक मिर्जा गियास) — भारत का प्रथम उद्यान-मकबरा (garden tomb), प्रथम पूर्ण चारबाग, प्रथम दोहरा गुंबद युक्त विशाल मकबरा; ताजमहल का पूर्वज; UNESCO 1993 |
| अकबर (1556–1605) | लाल बलुआ पत्थर; भारतीय (गुजराती–राजस्थानी) तत्वों का खुला समावेश; ट्रैबिएट + आर्क्यूएट का मिश्रण | आगरा का किला, फतेहपुर सीकरी (जोधाबाई महल, पंच महल, दीवान-ए-खास, बीरबल का घर), बुलंद दरवाजा (गुजरात-विजय की स्मृति; भारत का सर्वोच्च प्रवेश-द्वार — लगभग 54 मीटर), शेख सलीम चिश्ती का मकबरा (श्वेत संगमरमर + उत्कृष्ट जाली), लाहौर का किला, इलाहाबाद का किला |
| जहाँगीर (1605–27) | निर्माण कम, उद्यान अधिक; संगमरमर एवं पित्रादूरा का आरंभ | अकबर का मकबरा, सिकंदरा (आगरा; जहाँगीर द्वारा पूर्ण — पंचमंजिला, गुंबद-रहित), एतमाद-उद-दौला का मकबरा (आगरा, 1622–28; नूरजहाँ द्वारा पिता मिर्जा गियास बेग हेतु) — प्रथम पूर्णतः संगमरमर मुगल स्मारक तथा पित्रादूरा का प्रथम व्यापक प्रयोग, इसीलिए "बेबी ताज"; शालीमार बाग एवं निशात बाग (कश्मीर) |
| शाहजहाँ (1628–58) | स्वर्णयुग — श्वेत संगमरमर, पित्रादूरा, बंगाल-छत, बल्बनुमा गुंबद, फोलिएटेड (बहु-पंखुड़ी) मेहराब | ताजमहल (1632–1653; मुमताज महल हेतु; प्रधान वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी; UNESCO 1983), लाल किला एवं जामा मस्जिद (दिल्ली), शाहजहानाबाद, आगरा किले की मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम/खास, तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) |
| औरंगजेब (1658–1707) | ह्रास — सादगी, संगमरमर के स्थान पर प्लास्टर | बीबी का मकबरा (औरंगाबाद; पुत्र आजम शाह द्वारा, माता दिलरस बानो हेतु — "दक्खन का ताज"), लाल किले की मोती मस्जिद, बादशाही मस्जिद (लाहौर) |
मुगल स्थापत्य का लगभग पूरा शिखर उत्तर प्रदेश में खड़ा है। UP के तीनों पुराने UNESCO स्थल मुगलकालीन हैं — ताजमहल (1983), आगरा का किला (1983) तथा फतेहपुर सीकरी (1986); 2026 में इनमें सारनाथ जुड़ गया।
18वीं शताब्दी में मुगल पतन के बाद अवध में एक स्वतंत्र शैली उभरी, जिसे अवध/लखनवी शैली कहते हैं — संगमरमर के स्थान पर ईंट, चूना एवं प्लास्टर (stucco), भव्य पैमाना, यूरोपीय तत्वों का समावेश, और मछली का नवाबी प्रतीक।
| शैली | पहचान | स्मारक (वास्तुकार / वर्ष) |
|---|---|---|
| नव-शास्त्रीय (Neo-Classical) | ग्रीक-रोमन स्तंभ, त्रिकोणीय पेडिमेंट, भव्य गुंबद | सेंट जॉर्ज किला (चेन्नई), टाउन हॉल, मुंबई, राजभवन/गवर्नमेंट हाउस, कोलकाता |
| नव-गॉथिक (Neo-Gothic / Victorian Gothic) | ऊँची नुकीली मेहराब, शिखर (spire), रंगीन काँच | छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (F. W. स्टीवंस, 1888; UNESCO 2004), मुंबई विश्वविद्यालय एवं राजाबाई क्लॉक टावर (गिल्बर्ट स्कॉट), बॉम्बे हाईकोर्ट |
| इंडो-सारसेनिक (Indo-Saracenic) | भारतीय गुंबद, छतरी, जाली, मीनार + यूरोपीय योजना एवं इस्पात/लोहा | चेपॉक पैलेस, चेन्नई (प्रथम इंडो-सारसेनिक भवन), विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता (विलियम एमर्सन; 1921 में जनता हेतु खुला), गेटवे ऑफ इंडिया (जॉर्ज विटेट, 1924), मद्रास उच्च न्यायालय, मैसूर पैलेस (हेनरी इरविन), लक्ष्मी विलास पैलेस (वडोदरा), मुइर सेंट्रल कॉलेज (प्रयागराज) |
| नई दिल्ली — लुटियंस शैली | शास्त्रीय योजना + भारतीय छतरी/जाली/चज्जा; 1911 में राजधानी स्थानांतरण के बाद | राष्ट्रपति भवन (तत्कालीन वायसराय हाउस — एडविन लुटियंस), सचिवालय एवं संसद भवन (हर्बर्ट बेकर), इंडिया गेट (लुटियंस, 1931 में उद्घाटित) |
(1) बुलंद दरवाजा — मानक उत्तर गुजरात विजय (1573) की स्मृति है, और यही परीक्षा में अपेक्षित है। किंतु ध्यान रखें कि इसके पूर्वी मेहराब के फारसी अभिलेख में 1601 की दक्कन विजय का उल्लेख है — इसीलिए कुछ स्रोत निर्माण-वर्ष 1576 तो कुछ 1601 बताते हैं। विकल्पों में यदि "गुजरात" हो तो वही चुनें।
(2) एतमाद-उद-दौला का मकबरा नूरजहाँ ने अपने पिता के लिए बनवाया; हुमायूँ का मकबरा उसकी विधवा हमीदा बानो बेगम ने। दोनों "स्त्री द्वारा निर्मित मकबरे" हैं — पर संबंध अलग।
(3) बीबी का मकबरा औरंगजेब ने नहीं, उसके पुत्र आजम शाह ने बनवाया।
(4) मोती मस्जिद दो हैं — आगरा किले की (शाहजहाँ) तथा दिल्ली लाल किले की (औरंगजेब)।
(5) कुतुब मीनार ऐबक ने आरंभ की, इल्तुतमिश ने पूर्ण की — "ऐबक ने बनवाई" आधा-सत्य है और अभिकथन–कारण में फँसाता है।
प्र.1 सूची-I (स्मारक) को सूची-II (निर्माण करवाने वाला) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. एतमादुद्दौला का मकबरा, आगरा B. हुमायूँ का मकबरा, दिल्ली C. बीबी का मकबरा, औरंगाबाद D. मोती मस्जिद, लाल किला (दिल्ली)
सूची-II: 1. बेगा बेगम (हाजी बेगम) 2. नूरजहाँ 3. औरंगजेब 4. आजम शाह
कूट:
प्र.2 निम्नलिखित मुगलकालीन इमारतों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनके निर्माण के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. ताजमहल का निर्माण-आरंभ
2. हुमायूँ के मकबरे की पूर्णता
3. एतमादुद्दौला के मकबरे की पूर्णता
4. बुलंद दरवाजा का निर्माण
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(स्मारक) (स्थान)
1. आदिना मस्जिद — पांडुआ
2. होशंगशाह का मकबरा — माण्डू
3. अढ़ाई दिन का झोंपड़ा — जौनपुर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
मौर्य काल में दो समानांतर धाराएँ चलीं। दरबारी कला — चमकदार पॉलिश, विशाल पैमाना, राजकीय संरक्षण (स्तंभ-शीर्ष)। लोकप्रिय कला — स्थानीय शिल्पियों द्वारा बनी विशाल यक्ष-यक्षी प्रतिमाएँ, जो लोक-पूजा से जुड़ी थीं।
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कुषाण–सातवाहन युग (पहली–तीसरी शताब्दी) में बुद्ध की प्रथम मानव प्रतिमाएँ बनीं। इस युग की तीन शैलियों का तुलनात्मक अंतर UPPSC में सर्वाधिक पूछे जाने वाले सुमेलन/अभिकथन विषयों में है।
| आधार | मथुरा शैली | गांधार शैली | अमरावती शैली |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | मथुरा एवं आसपास — उत्तर प्रदेश | पेशावर–तक्षशिला–स्वात घाटी (आज का उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान/अफगानिस्तान) | कृष्णा–गोदावरी डेल्टा — आंध्र प्रदेश |
| संरक्षक | कुषाण (कनिष्क) | कुषाण (कनिष्क) — साथ ही शक-पह्लव | सातवाहन तथा बाद में इक्ष्वाकु |
| सामग्री | चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर (सीकरी) | धूसर/नीली शिस्ट (slate), कहीं-कहीं स्टको | श्वेत चूना-पत्थर (सफेद संगमरमरी) |
| बाह्य प्रभाव | पूर्णतः देशज — यक्ष परंपरा से विकसित | यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) | देशज, किंतु रोमन संपर्क का हल्का प्रभाव |
| बुद्ध का स्वरूप | मुंडित/शंख-सदृश केश, चेहरा गोल एवं प्रसन्न-ऊर्जावान, आँखें खुली, शरीर स्थूल एवं मांसल | लहरदार केश (wavy hair), तीक्ष्ण नासिका, ध्यानमग्न/अध्यात्मिक भाव, आँखें अधखुली | पतले, लंबे, तिर्यक (त्रिभंग) आकृति; अत्यंत गतिशील |
| वस्त्र | पारदर्शी, दायाँ कंधा खुला; सिलवटें कम | मोटी, यथार्थवादी सिलवटें (रोमन टोगा-सदृश), दोनों कंधे ढके | हल्के, शरीर से चिपके |
| प्रभामंडल (Halo) | अलंकृत, ज्यामितीय नक्काशी युक्त | सादा, अलंकरण-रहित | प्रायः नहीं; कथात्मक पैनल प्रमुख |
| विषय-वस्तु | बौद्ध + जैन तीर्थंकर + ब्राह्मण देवता (शिव, विष्णु, सूर्य) + कुषाण राजप्रतिमाएँ | केवल बौद्ध | बौद्ध — जातक एवं बुद्ध-जीवन के कथात्मक पैनल |
| प्रमुख स्थल/कृतियाँ | कंकाली टीला (जैन), गोविंदनगर, कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा (माट, मथुरा) | तक्षशिला, हड्डा, बामियान, जौलियाँ, स्वात | अमरावती, नागार्जुनकोंडा, जग्गयपेट, गोली |
मथुरा भारतीय मूर्तिकला का एकमात्र ऐसा केंद्र है जहाँ तीनों प्रमुख धर्मों — बौद्ध, जैन एवं ब्राह्मण — की प्रतिमाएँ एक ही कार्यशाला-परंपरा में बनीं। कंकाली टीला से विशाल जैन आयागपट्ट एवं तीर्थंकर प्रतिमाएँ मिली हैं। माट (मथुरा) का देवकुल कुषाण राजप्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है — यहीं से कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा मिली, जिस पर "महाराज राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क" उत्कीर्ण है। मथुरा की चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमाएँ सारनाथ, श्रावस्ती एवं कौशांबी तक निर्यात हुईं। राजकीय संग्रहालय, मथुरा इस कला का सबसे बड़ा भंडार है।
याद रखने की कुंजी: गांधार = विदेशी रूप, आध्यात्मिक भाव, सादा प्रभामंडल, केवल बौद्ध। मथुरा = देशज रूप, सांसारिक ऊर्जा, अलंकृत प्रभामंडल, तीनों धर्म।
अक्सर पूछा जाने वाला विवादित बिंदु: "बुद्ध की प्रथम मूर्ति किसने बनाई?" — विद्वानों में मतभेद है। एक वर्ग गांधार को प्राथमिकता देता है, दूसरा मथुरा को; अधिकांश आधुनिक विद्वान मानते हैं कि दोनों में लगभग समकालीन एवं स्वतंत्र रूप से बुद्ध का मानव-रूपण हुआ। परीक्षा में यदि "गांधार एवं मथुरा दोनों" विकल्प हो तो वही सुरक्षित है।
एक और भेद: गांधार में जैन या हिंदू प्रतिमाएँ नहीं मिलतीं — यह कथन सही है।
गुप्त काल में मथुरा की स्थूलता और गांधार का विदेशीपन दोनों संतुलित होकर एक संयत, आध्यात्मिक एवं परिष्कृत शैली बनी। इसे भारतीय मूर्तिकला का "शास्त्रीय चरण" कहा जाता है।
| परंपरा | काल/क्षेत्र | पहचान |
|---|---|---|
| पाल | 8वीं–12वीं शताब्दी, बंगाल–बिहार | काला बेसाल्ट/क्लोराइट पत्थर, अत्यंत चमकदार; बौद्ध तांत्रिक देवता (तारा, मारीचि); नालंदा एवं कुर्किहार कांस्य; शिल्पी धीमान एवं वीतपाल |
| चोल कांस्य | 9वीं–13वीं शताब्दी, तमिलनाडु | नीचे विस्तार से |
| होयसल | 12वीं–13वीं शताब्दी, कर्नाटक | सोपस्टोन; आभूषणों का सूक्ष्मतम उत्कीर्णन; मदनिकाएँ/शिलाबालिकाएँ; शिल्पी-हस्ताक्षर |
| विजयनगर | 14वीं–16वीं शताब्दी | विशाल स्तंभों पर यालि (पौराणिक सिंह) एवं अश्वारोही; उग्र नरसिंह (हम्पी); लेपाक्षी का नंदी |
| गुर्जर-प्रतिहार एवं चंदेल | 8वीं–12वीं शताब्दी, मध्य भारत | खजुराहो की सुरसुंदरी, अप्सरा एवं मिथुन प्रतिमाएँ; लयात्मक देह-भंगिमा |
चोल कांस्य भारतीय धातु-मूर्तिकला का शिखर हैं। ये मंदिर में स्थिर प्रतिमा नहीं, बल्कि उत्सव-मूर्तियाँ (उत्सव बेर) थीं, जिन्हें जुलूस में निकाला जाता था — इसीलिए ये हल्की, संतुलित और सुडौल हैं।
प्र.1 प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की शैलियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. गांधार शैली की बुद्ध-प्रतिमाओं पर यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
2. मथुरा शैली में मुख्यतः चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): गांधार शैली में बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाओं का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ।
कारण (R): गांधार शैली की अधिकांश प्रतिमाएँ नीले-धूसर स्लेटी पत्थर (schist) में गढ़ी गईं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): चोलकालीन कांस्य प्रतिमाओं का निर्माण 'मधूच्छिष्ट विधान' (lost-wax process) से किया जाता था।
कारण (R): इस विधि में पहले मोम का प्रतिरूप बनाकर उस पर मिट्टी का आवरण चढ़ाया जाता है और तपाने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है, जिससे बना खोखला साँचा धातु से भर दिया जाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
भारतीय चित्रकला की सबसे पुरानी कड़ी भीमबेटका (रायसेन, मध्य प्रदेश) के शैलाश्रय हैं — लगभग 750 शैलाश्रयों में मध्यपाषाण काल से मध्यकाल तक के चित्र; प्रमुख रंग गेरू (लाल) एवं सफेद; विषय — शिकार, नृत्य, पशु। UNESCO सूची में 2003 में शामिल। (उत्तर प्रदेश में भी मिर्जापुर–सोनभद्र क्षेत्र के लिखुनिया, कोहबर एवं विजयगढ़ के शैलचित्र इसी परंपरा के हैं।)
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| स्थल | राज्य | धर्म / संरक्षक | प्रसिद्ध चित्र एवं विशेषता |
|---|---|---|---|
| अजंता | महाराष्ट्र | बौद्ध; सातवाहन एवं वाकाटक (हरिषेण) | तकनीक — टेम्पेरा / फ्रेस्को-सेक्को (सूखे प्लास्टर पर); चित्र मुख्यतः गुफा 1, 2, 16, 17 में। प्रसिद्ध — पद्मपाणि एवं वज्रपाणि बोधिसत्व (गुफा 1), मरणासन्न राजकुमारी (Dying Princess) तथा महाजनक जातक (गुफा 16), सिंहल अवदान एवं "माता-शिशु के समक्ष बुद्ध" (गुफा 17)। रेखा एवं भाव-प्रधान; छाया-प्रकाश का प्रयोग। |
| बाघ | मध्य प्रदेश (धार) | बौद्ध; गुप्तोत्तर | अजंता से अधिक लौकिक/सांसारिक विषय; गुफा 4 "रंगमहल" का नृत्य-दृश्य प्रसिद्ध; चित्र अब ग्वालियर संग्रहालय में स्थानांतरित |
| सित्तनवासल | तमिलनाडु (पुदुक्कोट्टै) | जैन; पांड्य (7वीं शताब्दी) | समवसरण तथा कमल-सरोवर का दृश्य — कमल तोड़ते व्यक्ति, हंस, भैंसे, हाथी; "जैन अजंता" |
| बादामी | कर्नाटक | हिंदू; चालुक्य (मंगलेश) | गुफा 3 में भित्ति चित्र के अवशेष — अजंता परंपरा का दक्षिणी विस्तार |
| अर्मामलै एवं तिरुमलैपुरम | तमिलनाडु | जैन/हिंदू; पांड्य | पांड्यकालीन भित्ति-चित्र |
| पनमलै एवं कांचीपुरम (कैलासनाथ) | तमिलनाडु | पल्लव | पल्लवकालीन भित्ति-चित्र के अवशेष |
| बृहदेश्वर, तंजावुर | तमिलनाडु | चोल | प्रदक्षिणापथ की दीवारों पर चोल भित्ति-चित्र, जिन पर बाद में नायक चित्र चढ़ा दिए गए |
| लेपाक्षी (वीरभद्र मंदिर) | आंध्र प्रदेश | विजयनगर | छत पर भारत का सबसे बड़ा भित्ति-चित्र-फलक; रेखा-प्रधान, चटख रंग, कोई छाया नहीं |
| मट्टनचेरी पैलेस | केरल (कोच्चि) | केरल शैली | रामायण-आधारित भित्ति चित्र; गाढ़े लाल-हरे रंग |
| परंपरा | काल/क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| पाल शैली | 11वीं–12वीं शताब्दी; बंगाल–बिहार | भारत की प्राचीनतम लघुचित्र परंपरा; ताड़-पत्र पर; बौद्ध ग्रंथों के सचित्र पन्ने — अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता; लयात्मक रेखा, हल्के रंग; नालंदा-विक्रमशिला से जुड़ी; 13वीं शताब्दी में विनाश के बाद नेपाल-तिब्बत में जीवित रही |
| जैन / अपभ्रंश / पश्चिम भारतीय शैली | 12वीं–16वीं शताब्दी; गुजरात, राजस्थान, मालवा | पहले ताड़-पत्र, फिर कागज पर; ग्रंथ — कल्पसूत्र तथा कालकाचार्य कथा; अचूक पहचान — चेहरा अर्ध-पार्श्व में पर दूर वाली आँख बाहर निकली हुई (protruding farther eye), कोणीय आकृतियाँ, स्वर्ण एवं अल्ट्रामरीन का प्रचुर प्रयोग |
मुगल चित्रकला फारसी सफावी परंपरा और भारतीय शैली के संगम से बनी। इसकी मूल प्रकृति दरबारी, धर्मनिरपेक्ष एवं यथार्थवादी है — देवी-देवता नहीं, बल्कि राजा, युद्ध, शिकार, दरबार, व्यक्तिचित्र और प्रकृति।
| शासक | विशेषता | प्रमुख ग्रंथ एवं चित्रकार |
|---|---|---|
| हुमायूँ | बीजारोपण — फारस से दो चित्रकार लाया | मीर सैयद अली तथा ख्वाजा अब्दुस समद; दास्तान-ए-अमीर हम्जा (हम्जानामा) का आरंभ |
| अकबर (1556–1605) | संस्थागत रूप — तस्वीरखाना की स्थापना; भारतीय चित्रकारों की प्रधानता; परिप्रेक्ष्य (perspective) एवं आकृति-मॉडलिंग का आरंभ; संस्कृत ग्रंथों का सचित्र अनुवाद | हम्जानामा (1400 चित्र, कपड़े पर), तूतीनामा, रज्मनामा (महाभारत का फारसी अनुवाद), रामायण, अकबरनामा। चित्रकार — दसवंत (अबुल फजल के अनुसार सर्वश्रेष्ठ), बसावन, केसू दास, मिस्किन, लाल, दौलत |
| जहाँगीर (1605–27) | स्वर्णयुग — ग्रंथ-चित्रण घटा, एकल चित्र एवं मुरक्का (एल्बम) बढ़े; प्रकृति-अध्ययन (पशु-पक्षी-पुष्प) का चरम; प्रभामंडल (halo) युक्त सम्राट-चित्र; अलंकृत हाशिया (हाशिया-कारी) | उस्ताद मंसूर — उपाधि "नादिर-उल-अस्र"; साइबेरियन सारस एवं डोडो पक्षी के चित्र। अबुल हसन — उपाधि "नादिर-उज-जमाँ"। बिशनदास — व्यक्तिचित्र (portrait) में अद्वितीय, शाह अब्बास का चित्र बनाने ईरान भेजा गया। साथ ही मनोहर, गोवर्धन, फारुख बेग |
| शाहजहाँ (1628–58) | तकनीकी उत्कृष्टता किंतु भाव-शैथिल्य; स्वर्ण का अत्यधिक प्रयोग, ठंडे-चमकीले रंग, औपचारिक दरबारी दृश्य; सियाही-कलम (pen drawing) लोकप्रिय | पादशाहनामा; चित्रकार — मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर, अनूपचित्तर, चित्रमणि, बिचित्र |
| औरंगजेब (1658–1707) | पतन — राजकीय संरक्षण समाप्त; चित्रकार प्रांतीय एवं राजपूत दरबारों में बिखरे — इसी से राजस्थानी, पहाड़ी एवं अवध शैलियाँ समृद्ध हुईं | — |
| मुहम्मद शाह "रंगीला" (1719–48) | अल्पकालिक पुनरुत्थान | चित्रकार — निधामल एवं चित्रमन |
उस्ताद मंसूर = "नादिर-उल-अस्र" (युग का अद्वितीय) — पशु-पक्षी चित्रण।
अबुल हसन = "नादिर-उज-जमाँ" (समय का अद्वितीय) — जहाँगीरनामा का आवरण-चित्र।
दोनों जहाँगीर के दरबार में थे और दोनों उपाधियाँ इतनी मिलती-जुलती हैं कि UPPSC इन्हें आपस में बदलकर "सही सुमेलित नहीं है" प्रश्न बनाता है। साथ में याद रखें — बिशनदास = व्यक्तिचित्र, दसवंत = अकबर का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार।
मुगल शैली के विपरीत राजस्थानी चित्रकला धार्मिक एवं काव्यात्मक है — कृष्ण-लीला, रागमाला, बारहमासा, नायिका-भेद, ऋतु-वर्णन। रंग चटख एवं सपाट, परिप्रेक्ष्य नहीं।
| शैली | प्रमुख संरक्षक | प्रमुख चित्रकार | पहचान / विषय |
|---|---|---|---|
| मेवाड़ (उदयपुर) | महाराणा अमर सिंह प्रथम, जगत सिंह | साहिबदीन, मनोहर | चावंड में 1605 की रागमाला शृंखला; रामायण, भागवत, रसिकप्रिया; चटख लाल-पीला, गोल चेहरे बड़ी आँखें |
| बूँदी | भाव सिंह/भोज सिंह (हाड़ा), राव छत्रसाल | — | चुनार रागमाला (1591) — मुगल-प्रशिक्षित चित्रकारों द्वारा चुनार (उत्तर प्रदेश) में बनी, जिसने बूँदी शैली को जन्म दिया; सघन वनस्पति एवं जल-दृश्य, आम-केला-ताड़ के वृक्ष, गहरा नीला-हरा आकाश |
| कोटा | महाराव राम सिंह, उम्मेद सिंह | — | शिकार-दृश्य (shikar) का चरम — हाथी, बाघ, घने वन |
| किशनगढ़ | राजा सावंत सिंह (नागरीदास), 18वीं शताब्दी | निहालचंद | बणी-ठणी — "भारतीय मोनालिसा"; लंबा तीखा नाक-नक्श, धनुषाकार भौंहें, कमलनयन, लंबी उँगलियाँ; राधा-कृष्ण के रूप में सावंत सिंह एवं बणी-ठणी |
| मारवाड़/जोधपुर | मालदेव, जसवंत सिंह | — | ढोला-मारू; लोक-तत्व प्रबल; अश्व-प्रेम |
| बीकानेर | राजा अनूप सिंह, करण सिंह | अली रजा, रुकनुद्दीन | मुगल एवं दक्कनी प्रभाव सर्वाधिक; कोमल रंग |
| आमेर–जयपुर | सवाई प्रताप सिंह, जयसिंह | साहिबराम | विशाल आकार के व्यक्तिचित्र; कृष्ण-रास; मुगल प्रभाव |
राजस्थानी चित्रकला की सबसे पुरानी प्रामाणिक कड़ी उत्तर प्रदेश में बनी! 1591 में बूँदी के हाड़ा शासक भोज सिंह, जो उस समय अकबर की सेवा में चुनार (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) में तैनात थे, ने मुगल कार्यशाला में प्रशिक्षित चित्रकारों से एक रागमाला शृंखला बनवाई। यही "चुनार रागमाला" आगे चलकर बूँदी एवं कोटा शैलियों का आदि-प्रतिमान बनी। इसी तरह अवध/लखनऊ शैली (नवाबों के संरक्षण में; मीर कलाँ खाँ, फैजुल्लाह) तथा फर्रुखाबाद एवं मुर्शिदाबाद मुगलोत्तर प्रांतीय शैलियाँ हैं।
| शैली | स्थान | संरक्षक / चित्रकार | पहचान |
|---|---|---|---|
| बसोहली | जम्मू क्षेत्र | राजा कृपाल पाल; चित्रकार देवीदास | पहाड़ी शैली की प्राचीनतम कड़ी (17वीं शताब्दी उत्तरार्ध); चमकीला लाल-पीला, बड़ी कमल-नयन आँखें, भृंग-पंख (beetle wing) की जड़ाई से आभूषण; रसमंजरी तथा गीतगोविंद |
| गुलेर | हिमाचल प्रदेश | राजा गोवर्धन चंद; चित्रकार-परिवार पंडित सेऊ, नैनसुख एवं मानकू | बसोहली की उग्रता से कांगड़ा की कोमलता तक का सेतु; मुगल-प्रभावित प्राकृतिक रंग, संयत रेखा |
| कांगड़ा | हिमाचल प्रदेश | राजा संसार चंद (18वीं–19वीं शताब्दी) | पहाड़ी शैली का चरमोत्कर्ष; कोमल गीतात्मकता, हरे-नीले प्राकृतिक परिदृश्य; गीतगोविंद, बिहारी सतसई, नल-दमयंती, बारहमासा |
| गढ़वाल | उत्तराखंड | चित्रकार मोलाराम | औरंगजेब से भागकर आए मुगल चित्रकार श्यामदास–हरदास वंश से आरंभ; मोलाराम कवि भी थे |
| चंबा, मंडी, कुल्लू, नूरपुर, बिलासपुर | हिमाचल प्रदेश | — | चंबा — लोक + मुगल मिश्रण; मंडी — शैव विषय, भारी आकृतियाँ; कुल्लू — लोक-शैली प्रधान |
| कलाकार / आंदोलन | काल | योगदान |
|---|---|---|
| राजा रवि वर्मा | 1848–1906, त्रावणकोर | यूरोपीय तैल-चित्र एवं यथार्थवाद से पौराणिक विषय; ओलियोग्राफ प्रेस से देवी-देवताओं के चित्र घर-घर पहुँचाए; "शकुंतला", "हंस-दमयंती", "उर्वशी-पुरुरवा" |
| बंगाल स्कूल (नव-भारतीय शैली) | 1900 के दशक से | पाश्चात्य अकादमिक यथार्थवाद के विरुद्ध स्वदेशी प्रतिक्रिया; प्रेरणा — अजंता, मुगल-राजपूत लघुचित्र एवं जापानी वॉश तकनीक। प्रेरक — ई. बी. हैवेल (कलकत्ता कला विद्यालय के प्राचार्य) |
| अवनींद्रनाथ टैगोर | 1871–1951 | बंगाल स्कूल के जनक; "भारत माता" (1905, बंग-भंग के दौर में) — चार भुजाओं में वेद, धान की बालियाँ, श्वेत वस्त्र एवं जपमाला; "शाहजहाँ का अंतिम समय" |
| नंदलाल बोस | 1882–1966 | अवनींद्रनाथ के शिष्य; शांतिनिकेतन (कला भवन) के प्रधान; भारतीय संविधान की मूल प्रति के अलंकरण तथा हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के पोस्टर |
| अमृता शेरगिल | 1913–1941 | भारतीय आधुनिक कला की अग्रदूत; पेरिस-प्रशिक्षित, पर अजंता एवं लघुचित्रों से प्रेरित होकर ग्रामीण भारत की ओर मुड़ीं — "तीन कन्याएँ (Three Girls)", "ब्रह्मचारी", "दक्षिण भारतीय ग्रामीण त्रयी" |
| जामिनी रॉय | 1887–1972 | कालीघाट पट एवं बंगाल की लोककला से प्रेरित; सपाट रंग, मोटी काली रेखा, बड़ी बादाम-आँखें; सचेत रूप से "लोक की ओर वापसी" |
| रवींद्रनाथ ठाकुर | 1861–1941 | 60 वर्ष की आयु के बाद चित्रकला आरंभ; आदिम, अवचेतन, अभिव्यंजनावादी (expressionist) शैली |
| प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप | 1947, बंबई | बंगाल स्कूल के पुनरुत्थानवाद से विच्छेद; आधुनिक अंतरराष्ट्रीय भाषा। संस्थापक — एफ. एन. सूजा, एस. एच. रजा, एम. एफ. हुसैन, के. एच. आरा, एस. के. बाकरे, एच. ए. गाडे |
| शैली | राज्य | पहचान |
|---|---|---|
| मधुबनी / मिथिला | बिहार | घर की दीवारों एवं आँगन पर; प्रायः स्त्रियों द्वारा; रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जाता; प्राकृतिक रंग; विषय — विवाह (कोहबर), देवी-देवता। कलाकार — सीता देवी, गंगा देवी, महासुंदरी देवी, बउआ देवी |
| वारली | महाराष्ट्र (ठाणे–पालघर) | वारली जनजाति; केवल सफेद (चावल का लेप) रंग गेरुई पृष्ठभूमि पर; आकृतियाँ त्रिकोण + वृत्त + रेखा से; केंद्र में तारपा नृत्य का वृत्ताकार घेरा; विवाह-चित्र चौक। कलाकार — जिव्या सोमा मशे |
| पट्टचित्र | ओडिशा (एवं पश्चिम बंगाल) | कपड़े/ताड़-पत्र पर; जगन्नाथ एवं वैष्णव विषय; गहरी काली रूपरेखा, अलंकृत बॉर्डर; रघुराजपुर (ओडिशा) शिल्प-ग्राम |
| कालीघाट | पश्चिम बंगाल (कोलकाता) | 19वीं शताब्दी में कालीघाट मंदिर के पास पटुआ चित्रकारों द्वारा; तेज प्रवाही रेखा, न्यूनतम विवरण; देवी-देवताओं के साथ सामाजिक व्यंग्य (बाबू-संस्कृति का उपहास) |
| फड़ (Phad) | राजस्थान (भीलवाड़ा) | लंबे कपड़े के पट पर लोकदेवता पाबूजी एवं देवनारायण की गाथा; भोपा रात्रि में रावणहत्था बजाकर पट खोलकर गाते हैं — चलती-फिरती मंदिर-गाथा; जोशी परिवार पारंपरिक चित्रकार |
| गोंड | मध्य प्रदेश (एवं छत्तीसगढ़) | गोंड जनजाति; बिंदुओं एवं महीन रेखाओं (डॉट-डैश) से भरी आकृतियाँ; वृक्ष, पशु, प्रकृति-देवता। कलाकार — जनगढ़ सिंह श्याम, भज्जू श्याम |
| कलमकारी | आंध्र प्रदेश | कलम एवं प्राकृतिक रंगों से कपड़े पर; दो शैलियाँ — श्रीकालहस्ती (हस्त-चित्रित, मंदिर-आख्यान) एवं मछलीपट्टनम/पेडाना (ब्लॉक-छपाई, फारसी अभिप्राय) |
| चेरियल स्क्रॉल | तेलंगाना | नक्काशी दार लंबे स्क्रॉल; कथावाचक समुदाय के लिए; चटख लाल पृष्ठभूमि; GI प्राप्त |
| मंजूषा | बिहार (भागलपुर) | बिहुला–विषहरी गाथा; गुलाबी, हरा, पीला — केवल तीन रंग; "साँप की चित्रकला" |
| पिछवाई | राजस्थान (नाथद्वारा) | श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे टाँगा जाने वाला कपड़ा; कृष्ण-लीला एवं ऋतु-चित्रण |
| पिथोरा | गुजरात एवं मध्य प्रदेश (राठवा, भील) | अनुष्ठानिक भित्ति चित्र; घोड़ों की पंक्तियाँ |
| सौरा | ओडिशा | सौरा जनजाति; इदितल भित्ति चित्र; वारली-सदृश पर बाहर से भीतर की ओर बनाए जाते हैं |
| थंका | लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल | बौद्ध कपड़ा-चित्र (स्क्रॉल); मंडल एवं बुद्ध-बोधिसत्व |
| ऐपण | उत्तराखंड | गेरू पृष्ठभूमि पर चावल-लेप से अनुष्ठानिक अल्पना |
| संझी | उत्तर प्रदेश — मथुरा/वृंदावन | कागज को कैंची से काटकर बने स्टेंसिल, जिनसे रंगीन चूर्ण की रंगोली बनाई जाती है; कृष्ण-लीला विषय; ब्रज की मंदिर-परंपरा |
| कोहबर | पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार | विवाह-कक्ष की भित्ति-चित्रकारी; कमल, बाँस, मछली — प्रजनन एवं मंगल के प्रतीक |
| चित्रकथी | महाराष्ट्र (पिंगुली) | चित्र-पोथी दिखाकर कथा-गायन; ठाकर समुदाय |
प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(चित्रशैली) (प्रसिद्ध चित्र/चित्र-शृंखला)
1. किशनगढ़ शैली — बणी-ठणी
2. बसोहली शैली — रसमंजरी
3. बूंदी शैली — हमजानामा
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 मुगलकालीन चित्रकला के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. उस्ताद मंसूर को जहाँगीर ने 'नादिर-उल-अस्र' की उपाधि प्रदान की।
2. अबुल हसन को 'नादिर-उज-जमाँ' की उपाधि प्राप्त थी।
3. बिशनदास को जहाँगीर ने व्यक्ति-चित्रण में अद्वितीय बताया।
4. दसवंत तथा बसावन जहाँगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): मुगल चित्रकला अकबर के काल में एक विशिष्ट भारतीय-ईरानी शैली के रूप में विकसित हुई।
कारण (R): हुमायूँ ईरान से मीर सैयद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद नामक चित्रकारों को अपने साथ भारत लाया था, जिन्होंने आगे चलकर अकबर के 'तस्वीरखाना' का मार्गदर्शन किया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
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| ताल | मात्रा | विभाग | प्रायः प्रयोग |
|---|---|---|---|
| तीनताल (त्रिताल) | 16 | 4+4+4+4 | खयाल, सितार — सर्वाधिक प्रचलित |
| दादरा | 6 | 3+3 | ठुमरी, दादरा |
| रूपक | 7 | 3+2+2 (सम पर खाली) | खयाल, भजन |
| कहरवा | 8 | 4+4 | लोकसंगीत, फिल्मी, भजन |
| झपताल | 10 | 2+3+2+3 | खयाल, वाद्य |
| एकताल एवं चौताल | 12 | एकताल 2×6; चौताल 4+4+2+2 | एकताल — विलंबित खयाल; चौताल — ध्रुपद (पखावज के साथ) |
| धमार | 14 | 5+2+3+4 | धमार गायन — होरी |
| आधार | हिंदुस्तानी | कर्नाटक |
|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर, पूर्व एवं पश्चिम भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश | तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल |
| बाह्य प्रभाव | फारसी-अरबी-मुगल प्रभाव स्पष्ट | लगभग अप्रभावित — अधिक शुद्ध वैदिक-देशी परंपरा |
| प्रधानता | राग एवं आलाप — स्वर-विस्तार प्रधान | रचना (कृति) एवं साहित्य — गीत-प्रधान |
| ढाँचा | 10 थाट (भातखंडे) | 72 मेलकर्ता (वेंकटमखिन) |
| ताल-व्यवस्था | अनेक स्वतंत्र ताल (तीनताल, झपताल…) | सुलादि सप्त ताल — 7 मूल ताल, जिनसे 35 (आगे 175) ताल बनते हैं; आदि ताल सर्वाधिक प्रचलित |
| प्रमुख गायन-शैलियाँ | ध्रुपद, धमार, खयाल, ठुमरी, टप्पा, तराना, ग़ज़ल, कव्वाली | वर्णम्, कृति/कीर्तनम्, रागम्-तानम्-पल्लवी, तिल्लाना, पदम्, जावली |
| मुख्य संगत वाद्य | तबला (लय), तानपूरा/हारमोनियम, सारंगी | मृदंगम् (लय), वायलिन, घटम्, कंजीरा, तंबूरा |
| घराना-व्यवस्था | है — गायकी का पारिवारिक संप्रदाय | घराना-व्यवस्था नहीं; बानी/संप्रदाय परंपरा |
| प्रस्तुति | एकल कलाकार प्रधान; सुधार (improvisation) की अधिक स्वतंत्रता | रचनाकार की रचना केंद्र में; सुधार रचना के भीतर |
| ग्रंथ | लेखक | महत्व |
|---|---|---|
| नाट्यशास्त्र | भरत मुनि | संगीत, नृत्य एवं नाट्य का आदि-ग्रंथ; 36 अध्याय; रस-सिद्धांत; UNESCO Memory of the World Register, 2025 |
| दत्तिलम् | दत्तिल | नाट्यशास्त्र के समकालीन संगीत-ग्रंथ |
| बृहद्देशी | मतंग | "राग" शब्द की प्रथम विस्तृत परिभाषा |
| संगीत रत्नाकर | शारंगदेव (13वीं शताब्दी, यादव दरबार, देवगिरि) | "सप्ताध्यायी"; हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक दोनों पद्धतियों का साझा आधार-ग्रंथ — विभाजन से ठीक पहले |
| चतुर्दंडी प्रकाशिका | वेंकटमखिन | 72 मेलकर्ता पद्धति |
| मान कुतूहल | राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर) | ध्रुपद के विकास एवं लोक-राग के शास्त्रीकरण का ग्रंथ |
| रागदर्पण | फकीरुल्लाह (औरंगजेब काल) | मान कुतूहल का फारसी रूपांतरण |
| किताब-ए-नौरस | इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय (बीजापुर) | सरस्वती एवं गणेश की वंदना युक्त गीत-संग्रह — समन्वय का उदाहरण |
| हिंदुस्तानी संगीत पद्धति / क्रमिक पुस्तक मालिका | विष्णु नारायण भातखंडे | 10 थाट पद्धति; आधुनिक स्वरलिपि; लखनऊ के मैरिस कॉलेज (अब भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय) की स्थापना |
| संगीत विशारद / संगीत-प्रसार | विष्णु दिगंबर पलुस्कर | गांधर्व महाविद्यालय (1901, लाहौर) की स्थापना; "रघुपति राघव राजाराम" धुन; संगीत को सार्वजनिक मंच पर लाना |
घराना गुरु-शिष्य परंपरा से बनी वह शैली-पहचान है जिसका नाम प्रायः उस स्थान पर पड़ा जहाँ वह जन्मी। यह केवल हिंदुस्तानी संगीत की विशेषता है।
| घराना | स्थान / राज्य | प्रवर्तक | प्रमुख कलाकार / विशेषता |
|---|---|---|---|
| क. खयाल गायन | |||
| ग्वालियर | मध्य प्रदेश | नत्थन पीर बख्श / हद्दू-हस्सू खाँ | खयाल का प्राचीनतम घराना — सभी घरानों की जननी; सरल-संतुलित गायकी; विष्णु दिगंबर पलुस्कर, ओंकारनाथ ठाकुर |
| आगरा | उत्तर प्रदेश | हाजी सुजान खाँ | ध्रुपद-अंग की दमदार आवाज; फैयाज खाँ, विलायत हुसैन खाँ |
| किराना | कैराना (शामली), उत्तर प्रदेश | बंदे अली खाँ / अब्दुल करीम खाँ | स्वर-लगाव एवं विलंबित आलाप की मधुरता; सवाई गंधर्व, भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, हीराबाई बड़ोदेकर, प्रभा अत्रे |
| जयपुर–अतरौली | अतरौली (अलीगढ़), उत्तर प्रदेश — परिवार जयपुर जा बसा | अल्लादिया खाँ | जटिल-अप्रचलित राग, लंबी घुमावदार तानें; केसरबाई केरकर, मोगूबाई कुर्डीकर, किशोरी अमोनकर, मल्लिकार्जुन मंसूर |
| रामपुर–सहसवान | रामपुर एवं सहसवान (बदायूँ), उत्तर प्रदेश | इनायत हुसैन खाँ | ग्वालियर एवं रामपुर-सेनिया का मेल; निसार हुसैन खाँ, गुलाम मुस्तफा खाँ, राशिद खाँ |
| पटियाला | पंजाब | फतेह अली खाँ एवं अली बख्श खाँ | ठुमरी एवं गजल-अंग; बड़े गुलाम अली खाँ, अजय चक्रवर्ती |
| भेंडी बाजार | मुंबई, महाराष्ट्र | छज्जू, नज्जू, खादिम हुसैन खाँ | एक साँस में लंबी तानें; अंजनीबाई मालपेकर |
| मेवाती | राजस्थान/हरियाणा (मेवात) | घग्गे नजीर खाँ | पं. जसराज |
| दिल्ली | दिल्ली | मामन खाँ | कव्वाल-बच्चों की परंपरा; तानरस खाँ |
| ख. तबला — छह में से चार उत्तर प्रदेश में | |||
| दिल्ली | दिल्ली | सिद्धार खाँ ढाढ़ी | तबले का आदि-घराना; "दो उँगली का बाज" — किनार पर सूक्ष्म वादन |
| अजराड़ा | अजराड़ा (मेरठ), उत्तर प्रदेश | मीरू खाँ एवं कल्लू खाँ | दिल्ली से निकला; बायें की गमक एवं लयकारी |
| लखनऊ | लखनऊ, उत्तर प्रदेश | मोदू खाँ एवं बख्शू खाँ | कथक-संगत के लिए विकसित; खुला-गूँजता बाज |
| फर्रुखाबाद | फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश | हाजी विलायत अली खाँ | गत-परंपरा एवं विस्तृत रचनाएँ |
| बनारस | वाराणसी, उत्तर प्रदेश | पं. राम सहाय | पखावज-अंग का ओजस्वी एकल वादन; किशन महाराज, समता प्रसाद (गुदई महाराज) |
| पंजाब | लाहौर/पंजाब | कादिर बख्श | पखावज परंपरा से रूपांतरित; अल्ला रक्खा एवं जाकिर हुसैन |
| ग. वाद्य एवं कथक घराने | |||
| मैहर (वाद्य) | मध्य प्रदेश | उस्ताद अलाउद्दीन खाँ | रविशंकर (सितार), अली अकबर खाँ (सरोद), अन्नपूर्णा देवी (सुरबहार), निखिल बनर्जी |
| इमदादखानी / एटावा (सितार-सुरबहार) | इटावा, उत्तर प्रदेश | इमदाद खाँ | गायकी अंग; विलायत खाँ, इमरत खाँ, शाहिद परवेज |
| लखनऊ (कथक) | लखनऊ, उत्तर प्रदेश | ईश्वरी प्रसाद / ठाकुर प्रसाद-वंश | भाव एवं अभिनय प्रधान; बिंदादीन महाराज, अच्छन–लच्छू–शंभू महाराज, बिरजू महाराज |
| जयपुर (कथक) | राजस्थान | भानूजी | तत्कार, चक्कर एवं लयकारी प्रधान; सुंदर प्रसाद, दुर्गालाल |
| बनारस (कथक) | वाराणसी, उत्तर प्रदेश | जानकीप्रसाद | "नटवरी" नृत्य; सम पर विशेष बल; सितारा देवी, गोपीकृष्ण |
| रायगढ़ (कथक) | छत्तीसगढ़ | राजा चक्रधर सिंह | सबसे नया कथक घराना; नर्तन सर्वस्व ग्रंथ |
हिंदुस्तानी संगीत का भौगोलिक केंद्र उत्तर प्रदेश है। तबले के छह प्रमुख घरानों में से चार — अजराड़ा (मेरठ), लखनऊ, फर्रुखाबाद एवं बनारस — उत्तर प्रदेश में जन्मे। खयाल के किराना (कैराना, शामली), आगरा, रामपुर–सहसवान तथा जयपुर–अतरौली (अतरौली, अलीगढ़) घराने भी यहीं के हैं। बनारस ठुमरी एवं शहनाई (उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ — भारत रत्न) का घर है; लखनऊ कथक के लखनऊ घराने और भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय का। ब्रज (वृंदावन) के स्वामी हरिदास तानसेन के गुरु माने जाते हैं, और अष्टछाप कवि-संगीतकारों की हवेली-संगीत परंपरा यहीं विकसित हुई।
भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में दिया गया चार-भागीय वर्गीकरण आज भी मानक है — और यह UPPSC का पक्का सुमेलन-विषय है।
| वर्ग | सिद्धांत | पाश्चात्य नाम | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| तत / ततः (तंतु वाद्य) | तार के कंपन से ध्वनि | Chordophone | वीणा, सितार, सरोद, सारंगी, तानपूरा, संतूर, रुद्र वीणा, सरस्वती वीणा, विचित्र वीणा, एकतारा, दिलरुबा, इसराज, रबाब, वायलिन, सुरबहार, रावणहत्था |
| सुषिर | वायु के कंपन से ध्वनि (फूँक वाद्य) | Aerophone | बाँसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, पुंगी/बीन, अलगोजा, मशक, हारमोनियम (रीड के कारण), शंख, तुरही |
| अवनद्ध / आनद्ध | खींची हुई चमड़े की झिल्ली पर आघात | Membranophone | तबला, मृदंगम्, पखावज, ढोलक, ढोल, नगाड़ा, दमरू, खोल, डफ, कंजीरा, चेंडा, तवील, डमामा |
| घन | ठोस वस्तु स्वयं कंपित — कोई झिल्ली या तार नहीं; सुर मिलाने की आवश्यकता नहीं | Idiophone | मंजीरा, झाँझ, घटम्, जलतरंग, चिमटा, खड़ताल, मोरसिंग (जेव्स हार्प), घुँघरू, घंटा, करताल, थाली |
प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(वाद्ययंत्र) (वर्ग)
1. सितार — तत् (तंतु) वाद्य
2. शहनाई — घन वाद्य
3. मंजीरा — अवनद्ध वाद्य
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(संगीत ग्रंथ) (रचनाकार)
1. संगीत रत्नाकर — अमीर खुसरो
2. मानकुतूहल — राजा मानसिंह तोमर
3. रागदर्पण — फकीरुल्लाह
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 कर्नाटक संगीत की 'त्रिमूर्ति' (Trinity) में निम्नलिखित में से कौन सम्मिलित हैं?
1. पुरंदरदास
2. मुत्तुस्वामी दीक्षितर
3. श्यामा शास्त्री
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook
CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi
CC BY-SA 4.0 · Vis M
CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook
CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook
CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi
CC BY-SA 4.0 · Shagil Kannur
CC BY-SA 4.0 · Joydeep Chakraborty
| नृत्य | राज्य | उद्गम एवं विशेषता | प्रमुख कलाकार |
|---|---|---|---|
| भरतनाट्यम् | तमिलनाडु | मंदिर की सदिर/दासीअट्टम परंपरा से; एकाहार्य एकल नृत्य; अरमंडी (अर्ध-बैठक) मुद्रा; रेखागणितीय, स्थिर धड़; "अग्नि का नृत्य"। क्रम — अलारिप्पु → जतिस्वरम् → शब्दम् → वर्णम् → पदम् → तिल्लाना। तंजौर चौकड़ी (चिन्नैया, पोन्नैया, शिवानंदम, वडिवेलु) ने इसे वर्तमान क्रम दिया। संगीत — कर्नाटक; संचालक नट्टुवनार। | रुक्मिणी देवी अरुंडेल (कलाक्षेत्र की संस्थापिका; पुनरुद्धारक), बालसरस्वती, यामिनी कृष्णमूर्ति, पद्मा सुब्रह्मण्यम्, मृणालिनी एवं मल्लिका साराभाई, अलार्मेल वल्ली |
| कथक | उत्तर प्रदेश एवं उत्तर भारत | "कथा कहने वाले कथिक" से; मंदिर से दरबार तक गया — एकमात्र शास्त्रीय नृत्य जिस पर फारसी-मुगल प्रभाव है; सीधा धड़, खड़े पैर (कोई अर्ध-बैठक नहीं); तत्कार (पद-संचालन), चक्कर (घुमाव), आमद–तोड़ा–तिहाई; संगीत — हिंदुस्तानी; घुँघरू की संख्या सर्वाधिक। घराने — लखनऊ (भाव), जयपुर (लय), बनारस, रायगढ़। | बिंदादीन महाराज, अच्छन महाराज, शंभू महाराज, लच्छू महाराज, बिरजू महाराज, सितारा देवी, गोपीकृष्ण, दमयंती जोशी, कुमुदिनी लाखिया, शोवना नारायण |
| कथकली | केरल | "कथा + कली (खेल)" — नृत्य-नाटिका; रामनाट्टम एवं कृष्णनाट्टम से विकसित; परंपरागत रूप से केवल पुरुष; विस्तृत चुट्टी (मुखौटा-सदृश मुख-सज्जा) एवं भारी वेशभूषा; पात्र-वर्ग — पच्चा (हरा — नायक), कत्ति (खल), ताड़ी, करी, मिनुक्कु; नेत्र-अभिनय प्रधान; गायन — सोपान/मणिप्रवालम्; वाद्य — चेंडा, मद्दलम्। | वल्लत्तोल नारायण मेनन (1930 में केरल कलामंडलम् की स्थापना), कलामंडलम् कृष्णन नायर, कलामंडलम् गोपी, कोट्टक्कल शिवरामन |
| कुचिपुड़ी | आंध्र प्रदेश | कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी ग्राम से; सिद्धेंद्र योगी द्वारा वर्तमान रूप; मूलतः भागवतुलु (ब्राह्मण पुरुष) द्वारा नृत्य-नाटिका; प्रवेश में दारुवु एवं पात्र स्वयं परिचय देता है; प्रसिद्ध — तरंगम् (पीतल की थाली के किनारों पर नृत्य, सिर पर जल-कलश) एवं भामाकलापम् (सत्यभामा)। नृत्य + संवाद + गायन तीनों। | सिद्धेंद्र योगी (प्रवर्तक), वेम्पति चिन्ना सत्यम्, राजा एवं राधा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति, शोभा नायडू, स्वप्नसुंदरी |
| ओडिसी | ओडिशा | उदयगिरि की रानीगुम्फा एवं मंदिर-मूर्तियों से निरंतरता; दो परंपराएँ — महरी (देवदासी) एवं गोटीपुआ (स्त्री-वेश में बालक); दो मूल भंगिमाएँ — त्रिभंग (शरीर तीन जगह से मुड़ा — ओडिसी की अचूक पहचान) एवं चौक; अत्यंत मूर्तिवत् (sculpturesque); मुख्य विषय जयदेव का गीतगोविंद; ग्रंथ — अभिनय चंद्रिका। | केलुचरण महापात्र, पंकज चरण दास, संजुक्ता पाणिग्रही, सोनल मानसिंह, माधवी मुद्गल, प्रोतिमा बेदी |
| मणिपुरी | मणिपुर | अत्यंत कोमल, तरल एवं गोलाकार गति; पैरों का प्रहार नहीं तथा घुँघरू नहीं — भूमि पर सबसे हल्का नृत्य; चेहरे के भाव संयत; रास लीला (कृष्ण) प्रधान; स्त्री-वेश कुम्मिल/पोतलोई (बेलनाकार घाघरा); पुरुष-अंग पुंग चोलोम एवं ढोल चोलोम; प्राक्-वैष्णव रूप लाई हराओबा; संकीर्तन UNESCO अमूर्त विरासत (2013)। | गुरु बिपिन सिंह, झावेरी बहनें (नयना, रंजना, सुवर्णा, दर्शना), गुरु अमूबी सिंह। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे शांतिनिकेतन में सिखाना आरंभ कराया। |
| मोहिनीअट्टम् | केरल | "मोहिनी का नृत्य"; लास्य-प्रधान, एकल, स्त्री-नृत्य; श्वेत-स्वर्ण कसावु साड़ी एवं बायीं ओर जूड़ा; लहरदार अंदोलिका गति; संगीत — सोपान शैली, भाषा मणिप्रवालम्; स्वाति तिरुनाल एवं वडिवेलु के संरक्षण में विकास, बाद में वल्लत्तोल द्वारा पुनरुद्धार। | कल्याणिकुट्टी अम्मा ("मोहिनीअट्टम् की माता"), भारती शिवाजी, कनक रेले, सुनंदा नायर |
| सत्रिया | असम | महापुरुष शंकरदेव (15वीं–16वीं शताब्दी) द्वारा एकशरण नामधर्म के प्रचार हेतु सृजित; सत्र (वैष्णव मठ) में भोकोत (भिक्षुओं) द्वारा; नाट्य-रूप अंकीया नाट एवं प्रस्तुति भाओना; वाद्य — खोल एवं ताल; 2000 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा आठवें शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता — सबसे नवीनतम। | गुरु जतिन गोस्वामी, घनकांत बोरा, इंदिरा पी. पी. बोरा, मणिक बरबायन |
दोनों दक्षिण भारतीय, दोनों में कर्नाटक संगीत, दोनों में समान हस्त-मुद्राएँ — फिर भेद क्या?
कथक एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है जिसका उद्गम उत्तर भारत, विशेषतः ब्रज एवं अवध क्षेत्र में है। मंदिर के कथावाचक से यह रासलीला में ढला और फिर अवध के नवाबी दरबार में दरबारी नृत्य बना। नवाब वाजिद अली शाह स्वयं नर्तक एवं रचनाकार थे ("रहस" नृत्य-नाटिकाएँ) और बिंदादीन महाराज तथा कालका प्रसाद उनके दरबार में थे — इसी वंश से अच्छन, शंभू, लच्छू एवं बिरजू महाराज आए। लखनऊ घराना भाव-अभिनय के लिए, बनारस घराना "नटवरी" के लिए प्रसिद्ध है। कथक के आधुनिक मंच-विकास में लखनऊ का भारतेंदु नाट्य अकादमी एवं कथक केंद्र भी योगदान करते हैं।
| राज्य | प्रमुख लोकनृत्य |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | चरकुला (ब्रज — सिर पर दीप-जड़ित रथचक्र संतुलित कर), रासलीला (ब्रज), नौटंकी, राई एवं पाई डंडा (बुंदेलखंड), धोबिया, धुरिया, जोगिनी, कर्मा, छपेली, ख्याल, शैरा, दीवारी/दीपावली नृत्य (अहीर, बुंदेलखंड), कजरी |
| उत्तराखंड | छोलिया (तलवार-नृत्य), झोड़ा, चाँचरी, बरादा नाटी, लांगवीर |
| पंजाब | भांगड़ा (पुरुष), गिद्धा (स्त्री), झूमर, मलवई गिद्धा, सम्मी, किक्कली |
| हरियाणा | घूमर, खोड़िया, धमाल, लूर, फाग |
| हिमाचल प्रदेश | नाटी (गिनीज में विश्व का सबसे बड़ा लोकनृत्य), किन्नौरी, छरबा, डांगी, लाहौली |
| जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख | रऊफ, दुम्हाल (वट्टल पुरुष), हाफिजा, भांड पाथर, कुद एवं धमाली (जम्मू), जबरो एवं शोंडोल (लद्दाख) |
| राजस्थान | घूमर (राजकीय), कालबेलिया (UNESCO 2010), भवाई, तेरहताली, चरी, गैर, कच्छी घोड़ी, गींदड़ |
| गुजरात | गरबा (UNESCO 2023), डांडिया रास, टिप्पणी, पढार, भवई |
| महाराष्ट्र | लावणी, तमाशा, पोवाड़ा (वीरगाथा), कोली, धनगरी गजा, लेजिम, दिंडी-काला |
| मध्य प्रदेश | कर्मा, गणगौर, मटकी, बधाई, राई, चरकुला, तेरहताली, ग्रिडा |
| छत्तीसगढ़ | पंथी (सतनामी), राउत नाचा, सुआ, करमा, सैला |
| बिहार | जट-जटिन, झिझिया, डोमकच, बिदेसिया, पैका, जदुर, करमा |
| झारखंड | छऊ (सरायकेला शैली), पाइका, झूमर, डोमकच, फगुआ, करमा |
| पश्चिम बंगाल | छऊ (पुरुलिया शैली — मुखौटा युक्त), बाउल, गंभीरा, कीर्तन, ब्रिता, धाली, गौड़ीय नृत्य |
| ओडिशा | छऊ (मयूरभंज शैली — बिना मुखौटे), घूमरा, दलखाई, गोटीपुआ, रणप्पा, बाघ नाच |
| असम | बिहू, बागुरुम्बा (बोडो), झुमुर, अंकीया नाट/भाओना, ओजापाली |
| मणिपुर | लाई हराओबा, रास लीला, थांग-ता (मार्शल), पुंग चोलोम, खंबा-थोइबी, डोल चोलोम |
| मेघालय | नोंगक्रेम (खासी), वांगला/100 ढोल (गारो), शाद सुक म्यनसीम, लाहो (जयंतिया) |
| मिजोरम | चेरॉ (बाँस नृत्य), खुआल्लम, चैलम, सोलाकिया |
| नागालैंड | चांग लो (सुआ लुआ), जेलियांग, रेंगमा, नुरालिम |
| त्रिपुरा | होजागिरी (रियांग — घड़े पर संतुलन), लेबांग बूमानी, गरिया |
| अरुणाचल प्रदेश | बर्दो छम, पोनुंग, वांचो, आजी लामू, रिखमपाड़ा |
| सिक्किम | सिंघी छम (हिम-सिंह), याक छम, माउरा, तमांग सेलो |
| कर्नाटक | यक्षगान, डोल्लू कुनिता, वीरगासे, कंसाले, हुत्तरी, भूत कोला |
| आंध्र प्रदेश | धीमसा, वीरनाट्यम्, बुर्रा कथा, बुट्टा बोम्मलु, लंबाड़ी |
| तेलंगाना | पेरिनी शिवतांडवम् (काकतीय योद्धा-नृत्य), बतुकम्मा, गुसाड़ी, लंबाड़ी |
| तमिलनाडु | करगाट्टम, कोलाट्टम, कुम्मी, मयिलाट्टम (मयूर), ओयिलाट्टम, देवराट्टम, पोइक्काल कुदिरै |
| केरल | थेय्यम, कैकोट्टिकली/तिरुवातिरकली, ओट्टनथुल्लल, पडयनी, कलरिपयट्टु (मार्शल), चाक्यार कूत्तु, मुडियेट्टु (UNESCO 2010) |
| गोवा | फुगड़ी, देखनी, घोड़े मोडनी, मांडो, तालगड़ी |
लोकनृत्य में सर्वाधिक फँसाने वाले युग्म — छऊ (तीन शैलियाँ: पुरुलिया=पश्चिम बंगाल मुखौटा-सहित, सरायकेला=झारखंड मुखौटा-सहित, मयूरभंज=ओडिशा मुखौटा-रहित); घूमर (राजस्थान) बनाम घूमरा (ओडिशा) बनाम घुमुरा; राई (बुंदेलखंड — UP एवं MP दोनों); भवाई — राजस्थान में नृत्य (सिर पर मटके) और गुजरात में लोकनाट्य। ये सब "सुमेलित नहीं है" प्रश्न के पसंदीदा विषय हैं।
प्र.1 सूची-I (शास्त्रीय नृत्य) को सूची-II (संबद्ध राज्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. सत्रीया B. मोहिनीअट्टम C. कुचिपुड़ी D. ओडिसी
सूची-II: 1. केरल 2. असम 3. ओडिशा 4. आंध्र प्रदेश
कूट:
प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(शास्त्रीय नृत्य) (प्रसिद्ध प्रतिपादक)
1. भरतनाट्यम — रुक्मिणी देवी अरुंडेल
2. ओडिसी — केलुचरण महापात्र
3. कथकली — बिरजू महाराज
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 भारतीय नाट्य, नृत्य एवं संगीत का प्राचीनतम विस्तृत ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' किसकी रचना मानी जाती है?
संस्कृत नाटक का शास्त्र नाट्यशास्त्र ने गढ़ा। इसकी कुछ बँधी हुई रूढ़ियाँ थीं — सुखांत अनिवार्य (मंच पर मृत्यु या युद्ध नहीं दिखाया जाता), नांदी (मंगलाचरण) से आरंभ, सूत्रधार द्वारा संचालन, भरतवाक्य से समापन; उच्च पात्र संस्कृत बोलते हैं और स्त्री एवं निम्न पात्र प्राकृत। नाटक के दस रूप (दशरूपक) बताए गए, जिनमें नाटक एवं प्रकरण प्रमुख हैं।
| नाटककार | काल (सामान्यतः माना जाने वाला) | प्रमुख नाटक |
|---|---|---|
| भास | प्राचीनतम ज्ञात; कालिदास से पूर्व | स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगंधरायण, चारुदत्त, ऊरुभंगम्, मध्यमव्यायोग, पंचरात्र — 13 नाटक (1909 में केरल से त्रिवेंद्रम पांडुलिपियाँ मिलीं) |
| कालिदास | गुप्त काल (सामान्यतः चंद्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना जाता है; कुछ विद्वान भिन्न तिथि देते हैं) | अभिज्ञानशाकुंतलम् (विलियम जोन्स द्वारा 1789 में अनूदित), विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम्; काव्य — मेघदूतम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, ऋतुसंहार |
| शूद्रक | — | मृच्छकटिकम् ("मिट्टी की गाड़ी") — नायक ब्राह्मण चारुदत्त एवं नगरवधू वसंतसेना; अपने युग का सर्वाधिक यथार्थवादी सामाजिक नाटक |
| विशाखदत्त | गुप्तोत्तर | मुद्राराक्षस (चाणक्य एवं राक्षस की कूटनीति — राजनीतिक नाटक), देवीचंद्रगुप्तम् |
| भवभूति | 8वीं शताब्दी; कन्नौज के यशोवर्मन का आश्रित | उत्तररामचरितम्, मालतीमाधव, महावीरचरितम् — करुण रस के सर्वश्रेष्ठ कवि |
| हर्षवर्धन | 7वीं शताब्दी — स्वयं सम्राट | रत्नावली, प्रियदर्शिका, नागानंद |
| भट्टनारायण | — | वेणीसंहार — महाभारत आधारित |
| राजशेखर | 9वीं–10वीं शताब्दी; प्रतिहार दरबार (कन्नौज) | कर्पूरमंजरी (पूर्णतः प्राकृत में), बालरामायण, काव्यमीमांसा |
| रूप | राज्य | विशेषता |
|---|---|---|
| नौटंकी | उत्तर प्रदेश (एवं आसपास) | उत्तर भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय संगीत-नाट्य; नक्कारा (नगाड़ा) प्रधान वाद्य; छंद — दोहा, चौबोला, बहर-ए-तबील; दो शैलियाँ — हाथरस (संगीत-प्रधान) एवं कानपुर (संवाद-प्रधान); लोकप्रिय कथाएँ — अमर सिंह राठौर, लैला-मजनूँ, सुल्ताना डाकू, सत्य हरिश्चंद्र |
| रामलीला | उत्तर प्रदेश एवं समूचा उत्तर भारत | तुलसीदास के रामचरितमानस पर आधारित दस-दिवसीय/एक-मासीय मंचन; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक विरासत — 2008। विश्वप्रसिद्ध रामनगर (वाराणसी) की रामलीला 31 दिनों तक चलती है और पूरा नगर ही मंच बन जाता है |
| रासलीला | उत्तर प्रदेश — ब्रज (मथुरा-वृंदावन) | कृष्ण-लीला का नृत्य-नाट्य; स्वामी घमंडदेव से जुड़ी परंपरा; बालक ही राधा-कृष्ण बनते हैं |
| भांड पाथर | जम्मू-कश्मीर | व्यंग्य-प्रधान; सुरनाई एवं नगाड़ा |
| स्वांग | हरियाणा (एवं पश्चिमी UP) | गायन-प्रधान; किशनलाल भाट एवं बंसीलाल परंपरा |
| ख्याल | राजस्थान | कुचामनी, शेखावटी, जयपुरी आदि उप-शैलियाँ |
| माच | मध्य प्रदेश (मालवा) | "मंच" का अपभ्रंश; गीत को वनग एवं संवाद को बोल कहते हैं |
| भवाई | गुजरात (एवं राजस्थान) | तीखा सामाजिक व्यंग्य; भूँगल वाद्य; प्रवर्तक असैत ठाकर |
| तमाशा | महाराष्ट्र | लावणी एवं ढोलकी प्रधान; स्त्री-कलाकार (मुरकी) केंद्र में; संस्कृत प्रहसन एवं गोंधल-कीर्तन से विकसित |
| जात्रा | पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार | चैतन्य के भक्ति-आंदोलन से जन्मी यात्रा-नाट्य परंपरा; खुले मंच पर, ऊँचे संवाद एवं गीत; विवेक नामक पात्र अंतरात्मा की भूमिका निभाता है |
| यक्षगान | कर्नाटक (तटीय) | विशाल शिरोभूषण, चटख मुख-रंग; भागवत (सूत्रधार) कथा गाता है; चेंडे एवं मद्दले वाद्य; रातभर चलने वाला प्रदर्शन |
| थेरुकूत्तु | तमिलनाडु | "सड़क का नाटक"; द्रौपदी-अम्मन उत्सव से जुड़ा |
| दशावतार | गोवा एवं कोंकण (महाराष्ट्र) | विष्णु के दस अवतार; काष्ठ-मुखौटे |
| भाओना / अंकीया नाट | असम | शंकरदेव रचित; ब्रजावली भाषा; सत्रों में मंचित |
| पांडवानी | छत्तीसगढ़ | महाभारत की एकल गाथा-गायन शैली; तीजन बाई; दो शैलियाँ — वेदमती एवं कापालिक |
| बुर्रा कथा | आंध्र प्रदेश | तंबूरा के साथ एकल कथा-गायन |
| कृष्णाट्टम एवं मुडियेट्टु | केरल | कृष्णाट्टम — गुरुवायूर मंदिर की परंपरा; मुडियेट्टु — काली-दारिका आख्यान, UNESCO 2010 |
| आल्हा | उत्तर प्रदेश — बुंदेलखंड | आल्हा-ऊदल की वीरगाथा का ओजस्वी गायन; वर्षा ऋतु में विशेष |
| प्रकार | नाम | राज्य | विशेषता |
|---|---|---|---|
| धागा/डोर (String / Marionette) | कठपुतली | राजस्थान | लकड़ी की, बिना पैरों के, लंबा घाघरा; ढोलक एवं "बोली" (सीटी-ध्वनि); अमर सिंह राठौर की कथा |
| कुंधेई | ओडिशा | हल्की लकड़ी, बिना पैर की; ओडिसी-सदृश गति; त्रिकोणीय लकड़ी के आधार से संचालित | |
| गोम्बेयट्टा | कर्नाटक | यक्षगान पात्रों के अनुरूप वेशभूषा; एक पुतली को अनेक सूत्रधार मिलकर चलाते हैं | |
| बोम्मलट्टम | तमिलनाडु | भारत की सबसे बड़ी एवं भारी कठपुतलियाँ (कुछ 4.5 फुट तक); डोर एवं दंड दोनों का प्रयोग — सूत्रधार सिर पर बँधे छल्ले से भी संचालित करता है | |
| छाया (Shadow) | तोलु बोम्मलाटा | आंध्र प्रदेश | भारत की सबसे बड़ी छाया-कठपुतलियाँ; चमड़े की, रंगीन एवं पारदर्शी — पर्दे पर रंगीन छाया |
| तोगलु गोम्बेयट्टा | कर्नाटक | आकार पात्र की सामाजिक स्थिति के अनुसार बदलता है | |
| रावणछाया | ओडिशा | हिरण की खाल; रंग-रहित एवं जोड़-रहित (अपारदर्शी); इसीलिए छाया कोमल एवं कंपनशील — सर्वाधिक नाटकीय मानी जाती है | |
| दस्ताना/हस्त (Glove) | पावाकूत्तु | केरल | कथकली-सदृश मुख-सज्जा एवं वेश; चेंडा-चेंगिला की संगत; 18वीं शताब्दी से |
| गुलाबो-सिताबो | उत्तर प्रदेश | हास्य-व्यंग्य प्रधान दस्ताना-कठपुतली; दो सौतों की नोंक-झोंक; उत्तर प्रदेश, ओडिशा एवं बंगाल में प्रचलित | |
| दंड (Rod) | पुतुल नाच (डांगेर पुतुल) | पश्चिम बंगाल | 3–4 फुट ऊँची; संचालक बाँस के दंड से कमर के सहारे बाँधकर चलाता है; जात्रा-सदृश प्रस्तुति |
| यमपुरी | बिहार | एक ही लकड़ी से बनी — कोई जोड़ नहीं; इसीलिए संचालन में सर्वाधिक कौशल आवश्यक |
(1) बोम्मलट्टम (तमिलनाडु) = डोर-कठपुतली, जबकि तोलु बोम्मलाटा (आंध्र) = छाया-कठपुतली — नाम लगभग एक जैसे, प्रकार अलग।
(2) रावणछाया रंगहीन है और तोलु बोम्मलाटा रंगीन — यही दोनों का निर्णायक भेद।
(3) यमपुरी (बिहार) दंड-कठपुतली है, पुतुल नाच (बंगाल) भी दंड-कठपुतली — पर यमपुरी जोड़-रहित है।
UPPSC की दृष्टि से ये दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोक-रूप हैं:
प्र.1 सूची-I (संस्कृत नाटक) को सूची-II (रचनाकार) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. मृच्छकटिकम् B. मुद्राराक्षस C. रत्नावली D. मालतीमाधव
सूची-II: 1. भवभूति 2. शूद्रक 3. विशाखदत्त 4. हर्षवर्धन
कूट:
प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): 'नील दर्पण' के अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशन के कारण पादरी जेम्स लॉन्ग पर मुकदमा चलाकर उन्हें कारावास तथा जुर्माने का दंड दिया गया।
कारण (R): 'नील दर्पण' नाटक की रचना बांग्ला में दीनबंधु मित्र ने की थी तथा इसका अंग्रेजी अनुवाद माइकल मधुसूदन दत्त ने किया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 कालिदास की रचनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'मेघदूतम्' एक खंडकाव्य है, जिसमें निर्वासित यक्ष द्वारा मेघ के माध्यम से भेजा गया विरह-संदेश वर्णित है।
2. 'मालविकाग्निमित्रम्' का नायक शुंग शासक अग्निमित्र है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| वर्ग | विवरण |
|---|---|
| चार वेद (संहिता) | ऋग्वेद — 10 मंडल, 1028 सूक्त; प्राचीनतम; मंडल 2–7 "वंश मंडल" सर्वाधिक प्राचीन; गायत्री मंत्र (3rd मंडल, विश्वामित्र) एवं पुरुष सूक्त (10वाँ मंडल — वर्ण-व्यवस्था का प्रथम उल्लेख)। सामवेद — गायन; भारतीय संगीत का मूल। यजुर्वेद — यज्ञ-विधि; एकमात्र वेद जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों; शुक्ल एवं कृष्ण दो शाखाएँ। अथर्ववेद — जादू-टोना, औषधि, लोक-विश्वास; भैषज्य एवं आयुष्य सूक्त |
| ब्राह्मण ग्रंथ | यज्ञ-कर्मकांड की गद्य व्याख्या — ऐतरेय एवं कौषीतकि (ऋग्), तांड्य/पंचविंश एवं जैमिनीय (साम), शतपथ (यजुर् — सबसे विस्तृत; विदेह-माधव की पूर्व-प्रसार कथा), गोपथ (अथर्व) |
| आरण्यक | "वन में पढ़े जाने वाले"; कर्मकांड से दर्शन की ओर संक्रमण |
| उपनिषद् | "वेदांत"; कुल 108 (मुक्तिका सूची), प्रमुख 13; बृहदारण्यक (सबसे बड़ा एवं प्राचीनतम) तथा छांदोग्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण। "सत्यमेव जयते" मुण्डकोपनिषद से; "तत्त्वमसि" छांदोग्य से; "अहं ब्रह्मास्मि" बृहदारण्यक से। कठोपनिषद — नचिकेता-यम संवाद |
| छह वेदांग | शिक्षा (उच्चारण), कल्प (कर्मकांड — श्रौत, गृह्य, धर्म, शुल्ब सूत्र), व्याकरण (पाणिनि की अष्टाध्यायी), निरुक्त (यास्क — शब्द-व्युत्पत्ति; प्राचीनतम कोश), छंद (पिंगल), ज्योतिष (लगध का वेदांग ज्योतिष) |
| चार उपवेद | आयुर्वेद (ऋग्वेद से), धनुर्वेद (यजुर्वेद), गंधर्ववेद — संगीत (सामवेद), शिल्पवेद/अर्थशास्त्र (अथर्ववेद) |
| पुराण | 18 महापुराण; पाँच लक्षण — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर, वंशानुचरित। मत्स्य पुराण प्राचीनतम माना जाता है; विष्णु एवं भागवत ऐतिहासिक वंशावली एवं कृष्ण-भक्ति के लिए महत्वपूर्ण |
| महाकाव्य | रामायण (वाल्मीकि; 7 कांड, 24,000 श्लोक — "आदि काव्य") एवं महाभारत (वेदव्यास; 18 पर्व, लगभग 1,00,000 श्लोक — विश्व का सबसे लंबा महाकाव्य; पूर्व नाम जय संहिता एवं भारत; भगवद्गीता भीष्म पर्व में) |
| भाषा | प्रमुख रचनाकार | कृति / योगदान |
|---|---|---|
| तमिल | तिरुवल्लुवर; आलवार एवं नायनार; कंबन | तिरुक्कुरल; नालायिर दिव्य प्रबंधम्; तेवारम्; कंब रामायणम् |
| कन्नड़ | पंप, पोन्न, रन्न ("रत्नत्रय"); बसवेश्वर; अक्क महादेवी | कविराजमार्ग (नृपतुंग/अमोघवर्ष — कन्नड़ का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ); वचन साहित्य (लिंगायत) |
| तेलुगु | नन्नय, तिक्कन्ना, येर्रप्रगड ("कवित्रय"); कृष्णदेवराय; अन्नमाचार्य | आंध्र महाभारतम्; आमुक्तमाल्यद (कृष्णदेवराय रचित तेलुगु काव्य) |
| मलयालम | एषुत्तच्छन (मलयालम का जनक); चेरुशेरी; कुंचन नंबियार | अध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु; ओट्टनथुल्लल |
| मराठी | ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, समर्थ रामदास | ज्ञानेश्वरी (गीता की मराठी टीका); अभंग; दासबोध; वारकरी परंपरा |
| बांग्ला | चंडीदास, चैतन्य एवं वैष्णव पदावली; कृत्तिवास; मुकुंदराम | चर्यापद (प्राचीनतम बांग्ला); कृत्तिवासी रामायण; चंडीमंगल |
| ओडिया | सरलादास; "पंचसखा" — बलरामदास, जगन्नाथदास आदि | ओडिया महाभारत; भागवत |
| असमिया | शंकरदेव, माधवदेव | कीर्तन घोषा, बरगीत, अंकीया नाट; बुरंजी (अहोम इतिहास-वृत्तांत) |
| पंजाबी | गुरु नानक एवं गुरु परंपरा; बुल्ले शाह; वारिस शाह | गुरु ग्रंथ साहिब (गुरु अर्जन द्वारा 1604 में संकलित; गुरु गोविंद सिंह द्वारा अंतिम रूप) — इसमें कबीर, रविदास, नामदेव, फरीद आदि की वाणी भी सम्मिलित; हीर-राँझा |
| गुजराती | नरसी मेहता; प्रेमानंद; दयाराम | "वैष्णव जन तो…" |
| कश्मीरी | लल्लेश्वरी (लाल देद); नुंद ऋषि (शेख नूरुद्दीन) | वाख; श्रुख — ऋषि परंपरा |
| मैथिली | विद्यापति | पदावली — राधा-कृष्ण शृंगार; "मैथिल कोकिल" |
| उर्दू | वली दक्कनी, मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नजीर अकबराबादी, दाग देहलवी | दक्कन में जन्म; दिल्ली एवं लखनऊ दो प्रमुख दबिस्तान (शैली-केंद्र) |
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य का इतिहास में चार काल-विभाजन दिया (वर्ष विक्रम संवत में हैं):
| काल | अवधि (वि.सं.) | स्वरूप | प्रमुख कवि एवं रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| आदिकाल (वीरगाथा काल) | 1050–1375 | वीर रस, आश्रयदाता-प्रशस्ति, रासो काव्य; साथ ही सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य | चंदबरदाई — पृथ्वीराज रासो (हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है); जगनिक — आल्हा खंड (बुंदेलखंड); नरपति नाल्ह — बीसलदेव रासो; अमीर खुसरो — पहेलियाँ, मुकरियाँ, खालिकबारी; विद्यापति — कीर्तिलता |
| भक्तिकाल | 1375–1700 | हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग; चार धाराएँ |
निर्गुण – ज्ञानाश्रयी: कबीर (बीजक — साखी, सबद, रमैनी), रैदास, दादू, नानक। निर्गुण – प्रेमाश्रयी (सूफी): मलिक मुहम्मद जायसी (पद्मावत — अवधी), कुतुबन (मृगावती), मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली)। सगुण – रामभक्ति: तुलसीदास (रामचरितमानस — 1574 में अयोध्या में आरंभ; विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमान चालिसा), अग्रदास, नाभादास (भक्तमाल)। सगुण – कृष्णभक्ति: सूरदास (सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी), नंददास, कुंभनदास, परमानंददास — अष्टछाप (वल्लभाचार्य एवं विट्ठलनाथ की परंपरा); मीराबाई, रसखान (प्रेमवाटिका)। |
| रीतिकाल | 1700–1900 | शृंगार, अलंकार-शास्त्र एवं नायिका-भेद; दरबारी काव्य | रीतिबद्ध: केशवदास (रसिकप्रिया, कविप्रिया), मतिराम, देव, चिंतामणि। रीतिसिद्ध: बिहारी (बिहारी सतसई — "देखन में छोटे लगै, घाव करै गंभीर")। रीतिमुक्त: घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर। वीर काव्य: भूषण (शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक), लाल कवि (छत्रप्रकाश)। |
| आधुनिक काल (गद्यकाल) | 1900 वि.सं. से | गद्य का उदय, खड़ी बोली की प्रतिष्ठा, सामाजिक चेतना |
भारतेंदु युग (1868–1900 ई.): भारतेंदु हरिश्चंद्र — "आधुनिक हिंदी एवं हिंदी नाटक के जनक"; अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा। द्विवेदी युग (1900–1918): महावीर प्रसाद द्विवेदी (सरस्वती पत्रिका) — खड़ी बोली को काव्य-भाषा बनाया; मैथिलीशरण गुप्त (भारत भारती, साकेत, यशोधरा) — "राष्ट्रकवि"; अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (प्रियप्रवास)। छायावाद (1918–1936): जयशंकर प्रसाद (कामायनी, आँसू, स्कंदगुप्त), सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, परिमल), सुमित्रानंदन पंत (पल्लव, चिदंबरा), महादेवी वर्मा (यामा, नीहार, दीपशिखा — "आधुनिक मीरा")। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद एवं नई कविता: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (तार सप्तक, 1943), गजानन माधव मुक्तिबोध (अँधेरे में), धर्मवीर भारती, दुष्यंत कुमार। गद्य: प्रेमचंद (गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला; "उपन्यास सम्राट"), जैनेंद्र, यशपाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, फणीश्वरनाथ 'रेणु' (मैला आँचल — आँचलिक उपन्यास)। |
हिंदी साहित्य का लगभग समूचा केंद्र उत्तर प्रदेश है — UPPSC इसे प्रत्यक्ष प्रश्नों में उठाता है:
प्र.1 जैन साहित्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. श्वेतांबर जैन आगम-ग्रंथों की मूल भाषा मुख्यतः अर्धमागधी प्राकृत है।
2. 'कल्पसूत्र' की रचना आचार्य भद्रबाहु द्वारा मानी जाती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 मध्यकालीन भक्ति-संतों तथा उनकी भाषा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. विद्यापति ने मैथिली में 'पदावली' की रचना की।
2. संत ज्ञानेश्वर ने मराठी में 'ज्ञानेश्वरी' लिखी।
3. नरसी मेहता बांग्ला भाषा के वैष्णव संत-कवि थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(ग्रंथ) (स्वरूप/विषय)
1. अमरकोश — संस्कृत का कोश (शब्दकोश) ग्रंथ
2. कादम्बरी — बाणभट्ट की संस्कृत गद्य-कथा
3. दशकुमारचरित — प्राचीन गणित ग्रंथ
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
भारतीय दर्शन-परंपरा का मूल विभाजन वेद की प्रामाणिकता पर आधारित है — जो वेद को प्रमाण मानते हैं वे आस्तिक, जो नहीं मानते वे नास्तिक। ध्यान रहे: यहाँ "नास्तिक" का अर्थ ईश्वर को न मानना नहीं है — सांख्य ईश्वर को नहीं मानता फिर भी आस्तिक है, क्योंकि वह वेद को प्रमाण मानता है। यह सूक्ष्म भेद अभिकथन–कारण प्रश्नों का पसंदीदा विषय है।
| दर्शन | प्रवर्तक | मूल ग्रंथ | केंद्रीय विचार | प्रमाण |
|---|---|---|---|---|
| सांख्य | कपिल | सांख्यकारिका (ईश्वरकृष्ण); मूल सांख्य सूत्र | द्वैतवादी एवं निरीश्वरवादी — पुरुष (चेतन, निष्क्रिय) तथा प्रकृति (जड़, क्रियाशील) दो स्वतंत्र तत्व; 25 तत्व; तीन गुण — सत्त्व, रजस्, तमस्; सत्कार्यवाद (कार्य कारण में पहले से विद्यमान); भारत का प्राचीनतम दर्शन | 3 — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द |
| योग | पतंजलि | योगसूत्र; टीका — व्यास भाष्य | "सेश्वर सांख्य" — सांख्य का तत्व-ज्ञान + ईश्वर; चित्तवृत्ति निरोध; अष्टांग योग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि | 3 |
| न्याय | गौतम (अक्षपाद) | न्याय सूत्र | तर्कशास्त्र एवं ज्ञान-मीमांसा; 16 पदार्थ; पंचावयव अनुमान (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन); मोक्ष = मिथ्या-ज्ञान का नाश | 4 — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द |
| वैशेषिक | कणाद (उलूक) | वैशेषिक सूत्र | परमाणुवाद — सृष्टि अविभाज्य परमाणुओं से; 7 पदार्थ — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव; भारत का "भौतिकी-दर्शन"; असत्कार्यवाद/आरंभवाद | 2 — प्रत्यक्ष, अनुमान |
| पूर्व मीमांसा | जैमिनि | पूर्व मीमांसा सूत्र; भाष्य — शबर; व्याख्याता — कुमारिल भट्ट एवं प्रभाकर | कर्मकांड की प्रधानता; वेद अपौरुषेय एवं नित्य; यज्ञ ही धर्म; अपूर्व की संकल्पना | कुमारिल के अनुसार 6 (अर्थापत्ति एवं अनुपलब्धि सहित) |
| उत्तर मीमांसा (वेदांत) | बादरायण | ब्रह्मसूत्र (वेदांत सूत्र) | ज्ञानकांड — ब्रह्म ही परम सत्य; प्रस्थानत्रयी = उपनिषद् + ब्रह्मसूत्र + भगवद्गीता | 6 |
षड्दर्शन परस्पर तीन जोड़ों में बँटे हैं — सांख्य–योग (सिद्धांत + साधना), न्याय–वैशेषिक (तर्क + तत्व-वर्गीकरण), मीमांसा–वेदांत (कर्म + ज्ञान)।
सबसे बड़ा ट्रैप: कपिल = सांख्य, कणाद = वैशेषिक, गौतम = न्याय, जैमिनि = पूर्व मीमांसा, बादरायण = उत्तर मीमांसा, पतंजलि = योग। "गौतम = वैशेषिक" या "कणाद = न्याय" का उलटफेर सबसे आम distractor है। साथ ही — न्याय के 4 प्रमाण, वैशेषिक के 2, सांख्य-योग के 3।
| शाखा | आचार्य | काल एवं स्थान | सार |
|---|---|---|---|
| अद्वैत | शंकराचार्य | लगभग 788–820 ई.; कालडी, केरल | "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः" — ब्रह्म एवं जीव अभिन्न; जगत् माया; ग्रंथ — ब्रह्मसूत्र भाष्य, उपदेशसाहस्री, विवेकचूड़ामणि; चार मठ — शृंगेरी (कर्नाटक), द्वारका (गुजरात), पुरी (ओडिशा), ज्योतिर्मठ/बद्रिकाश्रम (उत्तराखंड) |
| विशिष्टाद्वैत | रामानुजाचार्य | 1017–1137 ई.; श्रीपेरंबदूर, तमिलनाडु | ब्रह्म सगुण एवं सविशेष; जीव एवं जगत् ब्रह्म के शरीर हैं — अभिन्न पर स्वतंत्र नहीं; श्री वैष्णव सम्प्रदाय; प्रपत्ति (शरणागति); ग्रंथ — श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह |
| द्वैत | मध्वाचार्य (आनंदतीर्थ) | 1238–1317 ई.; उडुपी, कर्नाटक | ब्रह्म एवं जीव सर्वथा भिन्न; पंचभेद; ब्रह्मैव विष्णु; हरिदास आंदोलन का दार्शनिक आधार |
| द्वैताद्वैत (भेदाभेद) | निंबार्काचार्य | 13वीं शताब्दी; कर्मभूमि ब्रज (मथुरा) | जीव-ब्रह्म में भेद एवं अभेद दोनों समान रूप से सत्य; राधा-कृष्ण की युगल उपासना; वेदांत पारिजात सौरभ |
| शुद्धाद्वैत | वल्लभाचार्य | 1479–1531 ई.; जन्म चंपारण (अभी छत्तीसगढ़/MP क्षेत्र), कर्मभूमि ब्रज | माया के बिना अद्वैत — जगत् ब्रह्म का ही वास्तविक रूप; पुष्टिमार्ग (अनुग्रह का मार्ग); अष्टछाप कवि-मंडल; ग्रंथ — अणुभाष्य, सुबोधिनी |
| अचिंत्य भेदाभेद | चैतन्य महाप्रभु (दार्शनिक रूप — जीव गोस्वामी) | 1486–1533 ई.; नवद्वीप, बंगाल | भेद एवं अभेद दोनों अचिंत्य रूप से सत्य; गौड़ीय वैष्णव; संकीर्तन एवं नाम-महिमा |
| दर्शन | प्रवर्तक | सार |
|---|---|---|
| चार्वाक / लोकायत | बृहस्पति; परंपरा में चार्वाक | भारत का भौतिकवादी (materialist) दर्शन; बार्हस्पत्य सूत्र। केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण — अनुमान एवं शब्द अस्वीकार; आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मोक्ष एवं ईश्वर का निषेध; चार भूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु) — आकाश नहीं, क्योंकि वह प्रत्यक्ष नहीं; "ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्"। इसे देहात्मवाद भी कहते हैं |
| बौद्ध दर्शन | गौतम बुद्ध | अनीश्वरवाद, अनात्मवाद, क्षणिकवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद (कारण-निर्भरता), चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग। चार दार्शनिक सम्प्रदाय: • वैभाषिक (सर्वास्तिवाद) — बाह्य जगत् का प्रत्यक्ष यथार्थवाद • सौत्रांतिक — बाह्य जगत् का अनुमेय यथार्थवाद • योगाचार / विज्ञानवाद — असंग एवं वसुबंधु; केवल चित्त सत्य (आत्मनिष्ठ आदर्शवाद) • माध्यमिक / शून्यवाद — नागार्जुन (मूलमध्यमककारिका); सब कुछ स्वभाव-रहित (शून्य) |
| जैन दर्शन | महावीर एवं तीर्थंकर-परंपरा | अनेकांतवाद (सत्य अनेक-आयामी), स्याद्वाद एवं सप्तभंगी नय ("स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति…"), नयवाद; जीव–अजीव; नौ तत्व; त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र; पंच महाव्रत; स्याद्वाद की प्रसिद्ध उपमा — हाथी एवं छह अंधे |
| आजीवक | मक्खलि गोसाल | नियतिवाद (Determinism) — सब कुछ पूर्व-निर्धारित, कर्म से कुछ नहीं बदलता; अशोक एवं दशरथ ने बराबर गुफाएँ इन्हीं को दान कीं |
सर्वाधिक पूछे जाने वाले बिंदु: सांख्य निरीश्वरवादी होते हुए भी आस्तिक है (अभिकथन–कारण का पसंदीदा); चार्वाक के लिए केवल एक प्रमाण — प्रत्यक्ष; न्याय के चार प्रमाण; वैशेषिक = परमाणुवाद; नागार्जुन = शून्यवाद/माध्यमिक तथा वसुबंधु-असंग = योगाचार/विज्ञानवाद; अनेकांतवाद एवं स्याद्वाद = जैन; नियतिवाद = आजीवक।
प्र.1 सूची-I (दर्शन) को सूची-II (प्रवर्तक) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. सांख्य B. न्याय C. वैशेषिक D. मीमांसा
सूची-II: 1. गौतम 2. जैमिनि 3. कणाद 4. कपिल
कूट:
प्र.2 सूची-I (आचार्य) को सूची-II (दर्शन) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. शंकराचार्य B. रामानुजाचार्य C. मध्वाचार्य D. वल्लभाचार्य
सूची-II: 1. विशिष्टाद्वैत 2. शुद्धाद्वैत 3. अद्वैत 4. द्वैत
कूट:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(आचार्य) (दार्शनिक मत)
1. रामानंद — द्वैतवाद
2. वल्लभाचार्य — विशिष्टाद्वैत
3. निम्बार्काचार्य — द्वैताद्वैत
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| सम्प्रदाय | प्रवर्तक / प्रमुख ग्रंथ | क्षेत्र एवं विशेषता |
|---|---|---|
| क. शैव धारा | ||
| पाशुपत | लकुलीश; पाशुपत सूत्र | प्राचीनतम संगठित शैव सम्प्रदाय; गुजरात-राजस्थान से विस्तार; पशु–पति–पाश की त्रयी |
| कापालिक एवं कालामुख | — | चरम तांत्रिक शैव धाराएँ; भैरव-उपासना |
| कश्मीर शैव (त्रिक / प्रत्यभिज्ञा) | वसुगुप्त (शिव सूत्र); सोमानंद, उत्पलदेव, अभिनवगुप्त (तंत्रालोक) | कश्मीर; अद्वैत शैव — शिव ही एकमात्र सत्ता, जगत् उसका स्पंद; लल्लेश्वरी इसी धारा से |
| शैव सिद्धांत | तमिल नायनार परंपरा; मेयकंडार का शिवज्ञानबोधम् | तमिलनाडु; शिव, जीव एवं पाश — तीन नित्य तत्व |
| लिंगायत / वीरशैव | बसवेश्वर (बसव), 12वीं शताब्दी; वचन साहित्य | कर्नाटक; कल्याणी चालुक्य राजदरबार; जाति, कर्मकांड एवं मूर्तिपूजा का विरोध; इष्टलिंग धारण; अनुभव मंटप (सामाजिक-आध्यात्मिक संसद); अक्क महादेवी, अल्लम प्रभु |
| नाथ सम्प्रदाय | मत्स्येंद्रनाथ एवं गोरखनाथ | हठयोग परंपरा; गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) का गोरखनाथ मठ प्रमुख केंद्र; कबीर पर गहरा प्रभाव |
| ख. वैष्णव धारा | ||
| भागवत / पांचरात्र | — | प्राचीनतम वैष्णव धारा; हेलियोडोरस का बेसनगर गरुड़ स्तंभ (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी) इसका प्रारंभिक प्रमाण; व्यूह-सिद्धांत; दस अवतार |
| श्री वैष्णव | रामानुज (नाथमुनि एवं यमुनाचार्य की परंपरा) | तमिलनाडु; आलवार भक्ति + वेदांत का समन्वय |
| रामानंदी | रामानंद, 14वीं–15वीं शताब्दी; प्रयाग/काशी (उत्तर प्रदेश) | दक्षिण की भक्ति को उत्तर भारत तक लाने वाली कड़ी; सबके लिए भक्ति का द्वार खोला; शिष्य — कबीर, रैदास, धन्ना, पीपा, सेना, सुरसुरानंद |
| पुष्टिमार्ग (वल्लभ) एवं गौड़ीय (चैतन्य) | वल्लभाचार्य; चैतन्य महाप्रभु | ब्रज एवं बंगाल-ओडिशा; कृष्ण-भक्ति; हवेली संगीत एवं संकीर्तन |
| ग. शाक्त धारा | ||
| शाक्त / तंत्र | देवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण), तंत्र-ग्रंथ | देवी को परम शक्ति मानना; दस महाविद्या; 51 शक्तिपीठ (संख्या परंपरा-भेद से 51/52/108 बताई जाती है); वाम एवं दक्षिण मार्ग; असम का कामाख्या, बंगाल का कालीघाट, हिमाचल के ज्वालामुखी एवं चिंतपूर्णी, उत्तर प्रदेश का विंध्यवासिनी (मिर्जापुर) एवं शाकंभरी (सहारनपुर) |
| स्मार्त / पंचायतन | शंकराचार्य | पाँच देवताओं (शिव, विष्णु, देवी, सूर्य, गणेश) की समान उपासना — सम्प्रदाय-समन्वय का प्रयास |
| आधार | आलवार | नयनार |
|---|---|---|
| उपास्य | विष्णु | शिव |
| संख्या | 12 | 63 |
| काल एवं क्षेत्र | 6वीं–9वीं शताब्दी; तमिलनाडु; पल्लव एवं पांड्य काल | |
| संकलित ग्रंथ | नालायिर दिव्य प्रबंधम् — 4000 पद; संकलनकर्ता नाथमुनि; इसे "तमिल वेद"/"द्रविड़ वेद" कहते हैं | तेवारम् (अप्पर, संबंदर, सुंदरर) एवं तिरुवाचकम् (माणिक्कवाचकर); संकलनकर्ता नंबि आंडार नंबि; समूचा संग्रह तिरुमुरै |
| प्रमुख संत | नम्मालवार (सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं), आंडाल (एकमात्र स्त्री; तिरुप्पावै), पेरियालवार, तिरुमंगै आलवार, तोंडरडिप्पोडि | अप्पर (तिरुनावुक्करसर), संबंदर, सुंदरर, माणिक्कवाचकर; कारैक्काल अम्मैयार (प्रमुख स्त्री नयनार) |
| जीवनी-ग्रंथ | गुरुपरंपरा | पेरिय पुराणम् — शेक्किलार रचित |
| संत | काल | क्षेत्र | धारा एवं रचना |
|---|---|---|---|
| रामानंद | 14वीं–15वीं शताब्दी | उत्तर प्रदेश (प्रयाग–काशी) | सगुण-निर्गुण सेतु; उत्तर भारत में भक्ति के जनक |
| कबीर | लगभग 1440–1518 | वाराणसी; मगहर (संत कबीर नगर) में देहावसान | निर्गुण; बीजक (साखी, सबद, रमैनी); जाति एवं कर्मकांड का तीव्र विरोध; कबीरपंथ |
| रविदास (रैदास) | 15वीं शताब्दी | वाराणसी, उत्तर प्रदेश | निर्गुण; "मन चंगा तो कठौती में गंगा"; मीरा के गुरु माने जाते हैं; रविदासिया परंपरा |
| गुरु नानक | 1469–1539 | तलवंडी (ननकाना साहिब), पंजाब | निर्गुण; जपुजी; इक ओंकार; लंगर एवं संगत; सिख धर्म की स्थापना |
| सूरदास | 16वीं शताब्दी | ब्रज, उत्तर प्रदेश | सगुण-कृष्णभक्ति; अष्टछाप के शिरोमणि; सूरसागर; वात्सल्य रस के सम्राट |
| तुलसीदास | 1532–1623 (सामान्य मान्यता) | उत्तर प्रदेश — राजापुर/चित्रकूट, अयोध्या, वाराणसी | सगुण-रामभक्ति; रामचरितमानस (1574 में आरंभ), विनयपत्रिका, कवितावली, हनुमान चालिसा |
| मीराबाई | 16वीं शताब्दी | मेड़ता–चित्तौड़, राजस्थान | सगुण-कृष्णभक्ति; पद एवं भजन; "मेरे तो गिरधर गोपाल" |
| चैतन्य महाप्रभु | 1486–1533 | नवद्वीप (बंगाल); पुरी | गौड़ीय वैष्णव; संकीर्तन आंदोलन; शिक्षाष्टक |
| शंकरदेव | 1449–1568 | असम | एकशरण नामधर्म; कीर्तन घोषा, बरगीत; सत्र एवं नामघर संस्थाएँ; सत्रिया नृत्य |
| ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम | 13वीं–17वीं शताब्दी | महाराष्ट्र (पंढरपुर) | वारकरी सम्प्रदाय; विट्ठल-भक्ति; ज्ञानेश्वरी एवं अभंग; समर्थ रामदास (दासबोध) — शिवाजी से संबद्ध |
| बसवेश्वर | 12वीं शताब्दी | कर्नाटक | लिंगायत/वीरशैव; वचन साहित्य; अनुभव मंटप |
| नरसी मेहता | 15वीं शताब्दी | गुजरात | "वैष्णव जन तो तेने कहिये" |
| दादू दयाल | 1544–1603 | राजस्थान (नरैना) | निर्गुण; दादूपंथ; ब्रह्म संप्रदाय |
| मलिक मुहम्मद जायसी | 16वीं शताब्दी | जायस (अमेठी), उत्तर प्रदेश | सूफी प्रेमाख्यान; पद्मावत — अवधी में; रत्नसेन-पद्मावती का रूपक |
| लल्लेश्वरी (लाल देद) | 14वीं शताब्दी | कश्मीर | शैव-सूफी समन्वय; वाख |
| सिलसिला | भारत में प्रवर्तक | प्रमुख संत एवं दरगाह | विशेषता |
|---|---|---|---|
| चिश्ती | ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) | कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली), बाबा फरीद (अजोधन/पाकपट्टन), निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली; उपाधि "महबूब-ए-इलाही"), नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी, शेख सलीम चिश्ती (फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश) | सर्वाधिक लोकप्रिय; राज्य से दूरी; सिमा (कव्वाली/संगीत) की स्वीकृति; स्थानीय भाषा एवं जनसाधारण से जुड़ाव |
| सुहरावर्दी | बहाउद्दीन जकरिया (मुल्तान) | शेख रुक्नुद्दीन; सादी की परंपरा | चिश्तियों के विपरीत राज्य एवं संपत्ति स्वीकार; संगीत का विरोध |
| फिरदौसी | शरफुद्दीन याह्या मनेरी | बिहार (बिहार शरीफ) | मक्तूबात (पत्र-साहित्य) के लिए प्रसिद्ध |
| कादिरी | शाह नियामतुल्लाह एवं मखदूम मुहम्मद जिलानी | मियाँ मीर (लाहौर) — दारा शिकोह के गुरु | वहदत-उल-वुजूद पर बल; उदार समन्वयवाद |
| नक्शबंदी | ख्वाजा बाकी बिल्लाह | शेख अहमद सरहिंदी — "मुजद्दिद अल्फ-ए-सानी" | रूढ़िवादी; वहदत-उल-शुहूद का सिद्धांत; समन्वयवादी प्रवृत्तियों का विरोध |
| शत्तारी | शाह अब्दुल्ला शत्तारी | शेख मुहम्मद गौस (ग्वालियर) — तानसेन के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं | योग-पद्धति का समावेश |
| कुब्रविया | मीर सैयद अली हमदानी | कश्मीर | कश्मीर में इस्लाम के प्रसार में भूमिका |
प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(सिलसिला) (भारत में प्रवर्तक)
1. चिश्ती सिलसिला — ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
2. सुहरावर्दी सिलसिला — शेख बहाउद्दीन जकारिया
3. नक्शबंदी सिलसिला — शेख शरफुद्दीन याह्या मनेरी
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 निम्नलिखित सूफी संतों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. शेख निजामुद्दीन औलिया
2. शेख अहमद सरहिंदी
3. ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
4. शेख सलीम चिश्ती
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(सूफी संत) (प्रमुख केंद्र/दरगाह)
1. ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती — अजमेर
2. शेख बहाउद्दीन जकारिया — मुल्तान
3. शेख सलीम चिश्ती — अजमेर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| मेला | स्थान / राज्य | विशेषता |
|---|---|---|
| कुंभ मेला | प्रयागराज (उ.प्र.), हरिद्वार (उत्तराखंड), उज्जैन (म.प्र.), नासिक-त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र) | विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक विरासत — 2017; प्रत्येक स्थान पर 12 वर्ष में एक बार; बीच में अर्धकुंभ। नदियाँ — प्रयागराज: गंगा-यमुना-अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम; हरिद्वार: गंगा; उज्जैन: क्षिप्रा; नासिक: गोदावरी |
| महाकुंभ 2025 | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | 13 जनवरी – 26 फरवरी 2025 (45 दिन); शाही/अमृत स्नान — मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी। इसे प्रचारित रूप से "144 वर्ष बाद" कहा गया; यह गणना पारंपरिक ज्योतिषीय है और विद्वानों में इस पर मतभेद है — परीक्षा में दिनांक एवं स्थान ही निश्चित तथ्य हैं |
| माघ मेला | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | प्रतिवर्ष माघ मास में संगम पर; कल्पवास की परंपरा |
| पुष्कर मेला | पुष्कर, राजस्थान | विश्व का सबसे बड़ा ऊँट मेला; कार्तिक पूर्णिमा; ब्रह्मा मंदिर |
| सोनपुर मेला (हरिहर क्षेत्र) | सोनपुर, बिहार | एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला; गंगा-गंडक संगम |
| हेमिस उत्सव | हेमिस मठ, लद्दाख | पद्मसंभव (गुरु रिंपोछे) के जन्मोत्सव पर छम मुखौटा-नृत्य |
| सूरजकुंड शिल्प मेला | फरीदाबाद, हरियाणा | अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला; प्रतिवर्ष एक "थीम राज्य" एवं "साझेदार देश" |
| गंगासागर मेला | सागरद्वीप, पश्चिम बंगाल | मकर संक्रांति पर गंगा-सागर संगम स्नान; कुंभ के बाद सबसे बड़ा समागम |
| बनेश्वर मेला | डूँगरपुर, राजस्थान | "आदिवासियों का कुंभ"; सोम-माही-जाखम संगम |
| तरणेतर मेला | सुरेंद्रनगर, गुजरात | जीवनसाथी चयन का लोक-मेला; प्रसिद्ध तरणेतर छत्री |
| जोनबील मेला | मोरीगाँव, असम | भारत का एकमात्र वस्तु-विनिमय (barter) मेला; तिवा समुदाय |
| अंबुबाची मेला | कामाख्या, गुवाहाटी, असम | शाक्त तंत्र का महापर्व |
| शेखावाटी एवं कोलायत मेला | राजस्थान | कोलायत (बीकानेर) — कपिल मुनि से संबद्ध |
| मेला | जिला | विशेषता |
|---|---|---|
| कुंभ / माघ मेला | प्रयागराज | त्रिवेणी संगम; UNESCO अमूर्त विरासत |
| नौचंदी मेला | मेरठ | नवचंडी देवी मंदिर एवं बाले मियाँ की दरगाह साथ-साथ — सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक; होली के बाद |
| बटेश्वर पशु मेला | आगरा | यमुना तट; 101 शिव मंदिर; उत्तर भारत का बड़ा पशु मेला |
| देवा शरीफ मेला | बाराबंकी | हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर; हिंदू-मुस्लिम दोनों की भागीदारी |
| देवीपाटन मेला | तुलसीपुर, बलरामपुर | शक्तिपीठ पाटेश्वरी देवी; चैत्र नवरात्र |
| लट्ठमार होली | बरसाना–नंदगाँव, मथुरा | ब्रज की विश्वप्रसिद्ध होली |
| झूला मेला एवं रामनवमी मेला | अयोध्या | सरयू तट; चौदह कोसी एवं पंचकोसी परिक्रमा |
| गढ़मुक्तेश्वर (गंगा स्नान मेला) | हापुड़ | कार्तिक पूर्णिमा |
| शाकंभरी देवी मेला | सहारनपुर | शक्तिपीठ; नवरात्र |
| कंपिल मेला | फर्रुखाबाद | द्रुपद की राजधानी कांपिल्य; जैन तीर्थंकर विमलनाथ की जन्मभूमि |
| सूरजकुंड / कैलाश मेला | आगरा | सावन में शिव-मेला |
| बहराइच का गाजी मियाँ मेला | बहराइच | सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर ज्येष्ठ मास में |
| त्योहार | राज्य | संदर्भ |
|---|---|---|
| ओणम | केरल | राजा महाबलि के लौटने का पर्व; वल्लमकली (नौका दौड़), पुक्कलम, ओणसद्या |
| पोंगल | तमिलनाडु | चार दिवसीय फसल पर्व — भोगी, थाई पोंगल, मट्टु पोंगल, कानुम पोंगल; जल्लीकट्टू |
| बिहू | असम | तीन — बोहाग/रोंगाली (नववर्ष, अप्रैल), काति/कोंगाली, माघ/भोगाली |
| बैसाखी | पंजाब | फसल पर्व; 1699 में खालसा पंथ की स्थापना |
| हॉर्नबिल महोत्सव | नागालैंड | 1–10 दिसंबर, किसामा; "त्योहारों का त्योहार" — 16 जनजातियों का संगम |
| वांगला एवं नोंगक्रेम | मेघालय | वांगला — गारो का "100 ढोल" फसल पर्व; नोंगक्रेम — खासी |
| चापचार कूट | मिजोरम | झूम कृषि से जुड़ा वसंत पर्व; चेरॉ नृत्य |
| संगाई महोत्सव | मणिपुर | राज्य पशु संगई हिरण के नाम पर; नवंबर |
| लोसर | लद्दाख, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल | तिब्बती-बौद्ध नववर्ष |
| बतुकम्मा | तेलंगाना | पुष्प-स्तूप बनाकर गौरी-पूजा; राजकीय पर्व |
| नुआखाई | ओडिशा (पश्चिमी) | नई फसल का पर्व |
| गुड़ी पड़वा / उगादि / चेटी चंड / विषु / पुथांडु / पोइला बैसाख | महाराष्ट्र / आंध्र-तेलंगाना-कर्नाटक / सिंधी / केरल / तमिलनाडु / बंगाल | क्षेत्रीय नववर्ष |
| छठ | बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश | सूर्य एवं छठी मैया की उपासना; एकमात्र प्रमुख पर्व जिसमें अस्ताचलगामी सूर्य को भी अर्घ्य |
| त्रिशूर पूरम | केरल | हाथियों एवं पंचवाद्यम् का भव्य मंदिर-उत्सव |
| रथयात्रा | पुरी, ओडिशा | जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा के तीन रथ — नंदीघोष, तालध्वज, दर्पदलन |
| बस्तर दशहरा एवं मैसूर दसरा | छत्तीसगढ़ / कर्नाटक | बस्तर दशहरा 75 दिनों तक — विश्व का सबसे लंबा; मैसूर दसरा — जंबू सवारी |
| दीपावली | अखिल भारतीय | दिसंबर 2025 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल — भारत की 16वीं प्रविष्टि |
प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(पद/शब्द) (संबद्ध संदर्भ)
1. 'शाही जिरगा' द्वारा भविष्य का निर्णय — बलूचिस्तान
2. 'प्रत्यक्ष कार्रवाई' का आह्वान — अखिल भारतीय मुस्लिम लीग
3. 'बाल्कन योजना' — क्रिप्स मिशन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 सूची-I (ऐतिहासिक स्थल) को सूची-II (नदी) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. हम्पी B. मदुरै C. पट्टदकल D. नासिक
सूची-II: 1. गोदावरी 2. तुंगभद्रा 3. मलप्रभा 4. वैगै
कूट:
प्र.3 युद्धोत्तर जन-उभार (1945-46) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नवंबर 1945 में लाल किले में शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल तथा गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर संयुक्त रूप से मुकदमा चलाया गया।
2. फरवरी 1946 का शाही भारतीय नौसेना विद्रोह कराची स्थित 'एच.एम.आई.एस. हिंदुस्तान' के नौसैनिकों से आरंभ हुआ था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| वर्ष | स्थल | राज्य | वर्ग |
|---|---|---|---|
| 2026 | सारनाथ का प्राचीन बौद्ध स्थल | उत्तर प्रदेश | सांस्कृतिक (45वाँ) |
| 2025 | भारत के मराठा सैन्य भूदृश्य | महाराष्ट्र + तमिलनाडु | सांस्कृतिक (44वाँ) |
| 2024 | मोइदम (चराइदेव) | असम | सांस्कृतिक (43वाँ) |
| 2023 | शांतिनिकेतन | पश्चिम बंगाल | सांस्कृतिक |
| होयसल के पवित्र समूह (बेलूर, हलेबिड, सोमनाथपुर) | कर्नाटक | सांस्कृतिक | |
| 2021 | काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर | तेलंगाना | सांस्कृतिक |
| धोलावीरा — एक हड़प्पाकालीन नगर | गुजरात | सांस्कृतिक | |
| 2019 | जयपुर नगर | राजस्थान | सांस्कृतिक |
| 2018 | मुंबई की विक्टोरियन गॉथिक एवं आर्ट डेको इमारतें | महाराष्ट्र | सांस्कृतिक |
| 2017 | अहमदाबाद — भारत का प्रथम विश्व धरोहर नगर | गुजरात | सांस्कृतिक |
| 2016 | नालंदा महाविहार; कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान; ले कोर्बूजिए का स्थापत्य (चंडीगढ़ कैपिटल कॉम्प्लेक्स) | बिहार / सिक्किम / चंडीगढ़ | सांस्कृतिक / मिश्रित / सांस्कृतिक |
2026 में सारनाथ के जुड़ने के साथ उत्तर प्रदेश के विश्व धरोहर स्थल चार हो गए:
ध्यान दें — पहले तीनों मुगल स्थापत्य के हैं, जबकि चौथा बौद्ध स्थल है; और यह उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा स्थल है जो मुगलकालीन नहीं। UP की अनंतिम सूची में मथुरा-वृंदावन की गोविंद देव मंदिर शृंखला, काशी के घाट तथा श्रावस्ती-कुशीनगर-कौशांबी के बौद्ध स्थल जैसे नाम भी रहे हैं।
| वर्ष | प्रविष्टि | राज्य/क्षेत्र |
|---|---|---|
| 2008 | कूटियाट्टम — संस्कृत रंगमंच | केरल |
| वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा | अखिल भारतीय | |
| रामलीला — रामायण का पारंपरिक मंचन | उत्तर प्रदेश एवं उत्तर भारत | |
| 2009 | रम्माण — गढ़वाल हिमालय का धार्मिक उत्सव एवं अनुष्ठान नाट्य | उत्तराखंड |
| 2010 | छऊ नृत्य | ओडिशा, झारखंड, प. बंगाल |
| कालबेलिया लोकगीत एवं नृत्य | राजस्थान | |
| मुडियेट्टु — अनुष्ठान नाट्य एवं नृत्य-नाटिका | केरल | |
| 2012 | लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चार | लद्दाख |
| 2013 | संकीर्तन — अनुष्ठानिक गायन, वादन एवं नृत्य | मणिपुर |
| 2014 | जंडियाला गुरु के ठठेरों का पारंपरिक पीतल एवं ताम्र बर्तन शिल्प | पंजाब |
| 2016 | योग | अखिल भारतीय |
| नवरोज़ (बहुराष्ट्रीय — 12 अन्य देशों के साथ साझा) | भारत सहित | |
| 2017 | कुंभ मेला | प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक |
| 2021 | कोलकाता की दुर्गा पूजा | पश्चिम बंगाल |
| 2023 | गुजरात का गरबा | गुजरात |
| 2025 | दीपावली — भारत की 16वीं एवं नवीनतम प्रविष्टि | अखिल भारतीय |
8–13 दिसंबर 2025 को भारत ने पहली बार UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण हेतु अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की मेजबानी की — स्थान लाल किला, नई दिल्ली। इसी सत्र में दीपावली को प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया। यह सत्र भारत द्वारा 2003 के अभिसमय के अनुसमर्थन (2005) के 20 वर्ष पूरे होने के साथ पड़ा।
इसी क्रम में — अप्रैल 2025 में UNESCO के "Memory of the World" रजिस्टर में भगवद्गीता तथा भरतमुनि का नाट्यशास्त्र जोड़े गए; इसके साथ भारत की प्रविष्टियाँ 14 हो गईं।
| उत्पाद | जिला/क्षेत्र | टिप्पणी |
|---|---|---|
| बनारसी साड़ी (ब्रोकेड एवं साड़ी) | वाराणसी एवं आसपास | जरी-ब्रोकेड बुनाई; UP का सर्वाधिक प्रसिद्ध GI |
| लखनऊ चिकनकारी | लखनऊ | महीन हस्त-कढ़ाई; मुगल दरबार से जुड़ी परंपरा |
| कन्नौज इत्र (Perfume) | कन्नौज | "भारत का इत्र-नगर"; देग-भपका पारंपरिक आसवन विधि; मिट्टी अत्तर प्रसिद्ध |
| कालानमक चावल | सिद्धार्थनगर एवं तराई क्षेत्र | सुगंधित काला-भूसी वाला धान; बुद्ध से जुड़ी लोक-परंपरा; ODOP उत्पाद |
| भदोही कालीन | भदोही–मिर्जापुर | हाथ से बुने गलीचे; "कालीन नगरी" |
| फिरोजाबाद काँच शिल्प | फिरोजाबाद | चूड़ी एवं काँच उद्योग |
| मुरादाबाद धातु शिल्प | मुरादाबाद | "पीतल नगरी" |
| निजामाबाद की काली मिट्टी के बर्तन | आजमगढ़ | चमकदार काली पॉटरी पर चाँदी-सदृश नक्काशी |
| आगरा का पेठा; मथुरा का पेड़ा | आगरा; मथुरा | पारंपरिक मिठाइयाँ |
| बनारस गुलाबी मीनाकारी, जरदोजी, धातु-रिपूसे एवं लकड़ी के खिलौने | वाराणसी | काशी के हस्तशिल्प समूह |
| मलिहाबादी दशहरी आम; इलाहाबादी सुरखा अमरूद; बनारसी लंगड़ा आम; रामनगर भंटा | लखनऊ; प्रयागराज; वाराणसी; वाराणसी | कृषि-GI |
| सहारनपुर का काष्ठ शिल्प; बुलंदशहर पॉटरी; संभल का हॉर्न-क्राफ्ट; मेरठ का खेल उत्पाद | — | अन्य प्रमुख GI/ODOP उत्पाद |
UP सरकार की ODOP (एक जिला एक उत्पाद) योजना (2018) ने इन्हीं परंपरागत उत्पादों को GI पंजीकरण एवं निर्यात से जोड़ा — UPPSC इसे अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति दोनों अनुभागों में पूछता है।
प्र.1 निम्नलिखित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सूची में अंकित किए जाने के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. धोलावीरा : एक हड़प्पाकालीन नगर
2. पट्टदकल का स्मारक-समूह
3. चराइदेव के मोइदाम
4. रानी की वाव, पाटन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित 'भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य' (Maratha Military Landscapes of India) में निम्नलिखित में से कौन-सा दुर्ग सम्मिलित नहीं है?
प्र.3 संविधान सभा की समितियों/उप-समितियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी थे।
2. अल्पसंख्यक उप-समिति के अध्यक्ष एच.सी. मुखर्जी थे।
3. उत्तर-पूर्व सीमांत जनजातीय क्षेत्र एवं असम बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति के अध्यक्ष गोपीनाथ बरदोलोई थे।
4. संघ शक्ति समिति (Union Powers Committee) के अध्यक्ष के.एम. मुंशी थे।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| काल | कला/स्थापत्य की घटना |
|---|---|
| लगभग 2600–1900 ई.पू. | हड़प्पा नगर-नियोजन; विशाल स्नानागार; धौलावीरा के जलाशय |
| तीसरी शताब्दी ई.पू. | अशोक स्तंभ (सारनाथ सिंह शीर्ष); बराबर गुफाएँ; सांची एवं धर्मराजिका स्तूप का मूल |
| दूसरी–प्रथम शताब्दी ई.पू. | भरहुत एवं सांची की वेदिका; सातवाहनकालीन तोरण; कार्ले चैत्य; उदयगिरि-खंडगिरि (खारवेल) |
| प्रथम–तीसरी शताब्दी | कुषाण — मथुरा एवं गांधार में बुद्ध की प्रथम मानव प्रतिमाएँ; अमरावती (सातवाहन) |
| चौथी–छठी शताब्दी | गुप्त — सारनाथ बुद्ध; भितरगाँव (ईंट) एवं देवगढ़ मंदिर; उदयगिरि (विदिशा) का वराह; अजंता के परवर्ती चित्र (वाकाटक) |
| 7वीं–9वीं शताब्दी | पल्लव — महाबलीपुरम के रथ, तट मंदिर, कांचीपुरम; चालुक्य — बादामी, ऐहोल, पट्टदकल; राष्ट्रकूट — एलोरा का कैलाश मंदिर; कश्मीर — मार्तंड सूर्य मंदिर |
| 10वीं–13वीं शताब्दी | चोल — बृहदेश्वर (1010), गंगैकोंडचोलपुरम, चोल कांस्य; चंदेल — खजुराहो; सोमवंशी/गंग — लिंगराज, जगन्नाथ, कोणार्क (1250); सोलंकी — मोढेरा, रानी की वाव, दिलवाड़ा; होयसल — बेलूर (1117), हलेबिड, सोमनाथपुर (1268); काकतीय — रामप्पा (1213) |
| 1192–1526 | दिल्ली सल्तनत — कुव्वत-उल-इस्लाम, कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा (1311), तुगलकाबाद, लोदी मकबरे; प्रांतीय — जौनपुर शर्की, बंगाल, गुजरात, मालवा, बीजापुर |
| 1526–1707 | मुगल — हुमायूँ का मकबरा (1565–72) → फतेहपुर सीकरी (1571–85) एवं बुलंद दरवाजा → एतमाद-उद-दौला (1622–28) → ताजमहल (1632–53) → लाल किला एवं जामा मस्जिद → बीबी का मकबरा |
| 1784–1838 | अवध — बड़ा इमामबाड़ा एवं रूमी दरवाजा (आसफ-उद-दौला) → छोटा इमामबाड़ा (मुहम्मद अली शाह) |
| 19वीं–20वीं शताब्दी | औपनिवेशिक — छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (1888) → विक्टोरिया मेमोरियल (1921) → गेटवे ऑफ इंडिया (1924) → लुटियंस की नई दिल्ली एवं इंडिया गेट (1931) |
प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अलाई दरवाजा भारत में वास्तविक मेहराब (true arch) तथा वास्तविक गुंबद (true dome) के प्रयोग का प्रारंभिक उदाहरण है।
कारण (R): इसका निर्माण 1311 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिणी प्रवेश-द्वार के रूप में करवाया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 विश्व के विशालतम गुंबदों में गिना जाने वाला 'गोल गुंबद' (बीजापुर) किस शासक का मकबरा है?
प्र.3 दक्षिण भारत में नागर तथा द्रविड़ दोनों के तत्त्वों के समन्वय से बनी 'वेसर' शैली का विकास मुख्यतः किस राजवंश के संरक्षण में हुआ?