भाग 2 · भारत का इतिहास

2.5 भारतीय कला एवं संस्कृति

स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, रंगमंच, साहित्य, दर्शन, संत परंपरा एवं विश्व धरोहर — हड़प्पा से आधुनिक काल तक

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यह अध्याय क्यों निर्णायक है

2025 के मूल प्रश्नपत्र में सुमेलन (21), कालक्रम (21) तथा अभिकथन–कारण (20) मिलकर 41% थे। कला एवं संस्कृति पूरे प्रश्नपत्र का सबसे सघन सुमेलन-क्षेत्र है — मंदिर↔शैली↔निर्माता, नृत्य↔राज्य↔कलाकार, चित्रशैली↔संरक्षक, वाद्ययंत्र↔वर्ग, घराना↔स्थान, मेला↔स्थान, दर्शन↔प्रवर्तक। इस अध्याय की हर तालिका सीधे इसी रूप में प्रश्न बनती है; इन्हें पढ़ें नहीं, याद करें।

विषय-सूची

  1. स्थापत्य की आरंभिक परंपरा — हड़प्पा, मौर्य, बौद्ध एवं गुफा स्थापत्य
  2. मंदिर स्थापत्य — नागर, द्रविड़, वेसर एवं क्षेत्रीय उप-शैलियाँ
  3. इंडो-इस्लामिक एवं औपनिवेशिक स्थापत्य
  4. मूर्तिकला — मौर्य से चोल कांस्य तक
  5. चित्रकला — भित्ति चित्र, लघुचित्र, आधुनिक एवं लोक शैलियाँ
  6. संगीत — हिंदुस्तानी, कर्नाटक, घराने एवं वाद्ययंत्र
  7. नृत्य — आठ शास्त्रीय नृत्य एवं लोकनृत्य
  8. रंगमंच एवं कठपुतली
  9. साहित्य — वैदिक से आधुनिक हिंदी तक
  10. भारतीय दर्शन — षड्दर्शन एवं नास्तिक दर्शन
  11. धार्मिक सम्प्रदाय एवं संत परंपरा
  12. मेले, त्योहार एवं लोक परंपराएँ
  13. भारत की विश्व धरोहर — UNESCO, अमूर्त विरासत एवं GI
  14. कालक्रम एवं द्रुत पुनरावृत्ति

1. स्थापत्य की आरंभिक परंपरा — हड़प्पा, मौर्य, बौद्ध एवं गुफा स्थापत्य

1.1 हड़प्पा नगर-नियोजन (Harappan Town Planning)

भारतीय स्थापत्य की पहली कड़ी कोई मंदिर या महल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नगर है। हड़प्पा सभ्यता (लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व) की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी नागरिक अभियांत्रिकी थी — मूर्ति या स्मारक नहीं, बल्कि नालियाँ, स्नानागार, अन्नागार और सड़कें।

अशोक की सिंह शीर्ष — सारनाथ
सारनाथ का सिंह शीर्ष — फलक पर चार पशु (सिंह, हाथी, अश्व, वृषभ) एवं बीच में चार धर्मचक्र; आधार में उल्टा कमल। एकाश्म एवं आधार-रहित (ईरानी स्तंभों के विपरीत), दर्पण-सी मौर्य पॉलिश, पत्थर चुनार (मिर्जापुर) का। 26 जनवरी 1950 को राजकीय प्रतीक — उसमें केवल तीन सिंह दिखते हैं; “सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से, मूल शीर्ष का भाग नहीं· CC0 · Apurv013
उत्तर प्रदेश संदर्भ

आलमगीरपुर (जिला मेरठ/हापुड़ सीमा, हिंडन नदी के तट पर) हड़प्पा सभ्यता का पूर्वतम स्थल है — यहीं सभ्यता की पूर्वी सीमा समाप्त होती है। सनौली (बागपत) से ताम्रयुगीन रथ, ताबूत-शवाधान तथा ताँबे के अस्त्र मिले हैं, जो उत्तर-हड़प्पा/ताम्र-निधि संस्कृति से जोड़े जाते हैं। हुलास (सहारनपुर) तथा माँडी (मुजफ्फरनगर) भी UP के हड़प्पाई स्थल हैं। UPPSC इन्हें "UP के सिंधु घाटी स्थल" के रूप में बार-बार पूछता है।

1.2 मौर्य स्थापत्य — स्तंभ, प्रस्तर-पॉलिश एवं गुफाएँ

मौर्य कला को दो भागों में बाँटा जाता है — दरबारी कला (Court Art) तथा लोकप्रिय कला (Popular Art)। दरबारी कला में पाटलिपुत्र का 80-स्तंभीय सभा-भवन (कुम्रहार) तथा अशोक के एकाश्म स्तंभ आते हैं; लोकप्रिय कला में यक्ष-यक्षी प्रतिमाएँ तथा लोक-देवताओं की मूर्तियाँ।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — सारनाथ सिंह शीर्ष

सारनाथ (वाराणसी) का सिंह शीर्ष मौर्य कला की चरम कृति है — चार सिंह पीठ जोड़े खड़े, नीचे गोल फलक पर चार पशु (सिंह, हाथी, अश्व, वृषभ) तथा उनके बीच चार धर्मचक्र, और आधार में उल्टा कमल। इसे 26 जनवरी 1950 को भारत का राजकीय प्रतीक (State Emblem) अपनाया गया — उसमें केवल तीन सिंह दिखते हैं, चौथा पीछे छिप जाता है। नीचे लिखा "सत्यमेव जयते" मुण्डकोपनिषद से लिया गया है और वह मूल शीर्ष का भाग नहीं है। मूल शीर्ष सारनाथ संग्रहालय में है; स्तंभ के शिलालेख में अशोक की संघभेद-निषेध (फूट डालने वालों के निष्कासन) की घोषणा है।

तालिका 1.1 — अशोक स्तंभ एवं उनके शीर्ष पशु (सुमेलन-योग्य)
स्तंभ / स्थलवर्तमान राज्यशीर्ष पशु / विशेषता
सारनाथउत्तर प्रदेशचार सिंह — भारत का राजकीय प्रतीक
रामपुरवाबिहार (पश्चिमी चंपारण)वृषभ (बैल) तथा सिंह — दो स्तंभ
लौरिया नंदनगढ़बिहारएकल सिंह — सर्वाधिक सुरक्षित स्तंभ
संकिसा (संकाश्य)उत्तर प्रदेश (फर्रुखाबाद)हाथी — बुद्ध के स्वर्ग से अवतरण से जुड़ा
वैशाली (कोल्हुआ)बिहारएकल सिंह
टोपरा तथा मेरठमूल स्थान हरियाणा तथा उत्तर प्रदेशफिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाए गए
प्रयाग (कौशांबी से स्थानांतरित)उत्तर प्रदेशअशोक + समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति + जहाँगीर का लेख — तीन कालों का अभिलेख
सावधानी

(1) बराबर गुफाएँ (गया, बिहार) भारत की प्राचीनतम शैलकृत गुफाएँ हैं — इन्हें अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ ने आजीवक सम्प्रदाय को दान किया था, बौद्धों को नहीं। लोमश ऋषि गुफा का चैत्य-गवाक्ष द्वार तथा सुदामा गुफा प्रसिद्ध हैं।
(2) अशोक के सभी स्तंभों पर अभिलेख नहीं हैं — सारनाथ, सांची, रामपुरवा पर हैं; कुछ स्तंभ निरक्षर (uninscribed) हैं।
(3) नंदनगढ़ बनाम नंदगढ़, संकिसा बनाम संकिसा-बसंतपुर — नामों की निकटता distractor बनती है।

1.3 बौद्ध स्थापत्य — स्तूप, चैत्य एवं विहार

बौद्ध स्थापत्य के तीन मूल रूप हैं, और तीनों का कार्य अलग है — यही अंतर परीक्षा में पूछा जाता है।

रूपकार्यआकारउदाहरण
स्तूप (Stupa)अवशेष/धातु पर बना स्मारक — पूजा का केंद्रअर्धगोलाकार टीलासांची, भरहुत, अमरावती, धमेख
चैत्य (Chaitya)प्रार्थना गृह — भीतर स्तूप स्थापितअश्वनाल/अपसिडल (apsidal) योजना, स्तंभ-पंक्ति, चैत्य-गवाक्षकार्ले (सबसे बड़ा), भाजा, अजंता की गुफा 9, 10, 19, 26
विहार (Vihara)भिक्षुओं का आवास/मठवर्गाकार आँगन के चारों ओर कक्षनालंदा, अजंता की अधिकांश गुफाएँ, उदयगिरि
स्तूप के अंग — क्रम सहित
तालिका 1.2 — प्रमुख स्तूप (स्थल ↔ राज्य ↔ विशेषता)
स्तूपराज्यपहचान-बिंदु
सांची (महास्तूप संख्या 1)मध्य प्रदेश (रायसेन)मूल निर्माण अशोक; शुंगों ने पत्थर से आवृत किया; तोरण सातवाहन काल के। UNESCO 1989
भरहुतमध्य प्रदेश (सतना)शुंग काल; वेदिका पर जातक-कथाएँ; कनिंघम द्वारा खोजा; अवशेष कोलकाता संग्रहालय में
अमरावतीआंध्र प्रदेश (कृष्णा नदी)सातवाहन–इक्ष्वाकु; सफेद चूना-पत्थर; आयक-स्तंभ
धमेख स्तूपउत्तर प्रदेश — सारनाथगुप्तकालीन (लगभग 500 ई.); बुद्ध के प्रथम उपदेश का स्थल
धर्मराजिका स्तूपउत्तर प्रदेश — सारनाथअशोककालीन मूल; अब केवल आधार शेष
चौखंडी स्तूपउत्तर प्रदेश — सारनाथगुप्तकालीन; ऊपर गोविंदास ने अष्टकोणीय मुगल बुर्ज जोड़ा (हुमायूँ की स्मृति में)
केसरियाबिहार (चंपारण)भारत का सर्वाधिक ऊँचा/विशालतम स्तूप-टीला
भट्टिप्रोलुआंध्र प्रदेशबुद्ध की अस्थि-मंजूषा तथा प्राचीन ब्राह्मी अभिलेख
रामभार स्तूपउत्तर प्रदेश — कुशीनगरबुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद दाह-संस्कार स्थल
परीक्षा-दृष्टि

"सांची का स्तूप किसने बनवाया?" का सुरक्षित उत्तर अशोक है, पर "सांची के तोरण किस काल के हैं?" का उत्तर सातवाहन है — यही दो-कथन प्रश्न का ट्रैप है। इसी प्रकार धमेख गुप्तकालीन है, अशोककालीन धर्मराजिका है — दोनों सारनाथ में हैं।

1.4 गुफा स्थापत्य (Rock-cut Architecture)

भारतीय गुफा स्थापत्य की विशेषता यह है कि यह "बनाई" नहीं, "काटकर निकाली" जाती है — चट्टान को ऊपर से नीचे तराशा जाता है, इसलिए मचान (scaffolding) की आवश्यकता नहीं होती और भूल-सुधार संभव नहीं होता।

तालिका 1.3 — प्रमुख गुफा-समूह (सुमेलन-योग्य)
गुफाराज्य / नदीधर्मसंरक्षक / विशेषता
अजंतामहाराष्ट्र (औरंगाबाद), वाघोरा नदीकेवल बौद्धसातवाहन (प्रारंभिक) तथा वाकाटक हरिषेण (उत्तर चरण); लगभग 30 गुफाएँ; 1819 में जॉन स्मिथ द्वारा पुनर्खोज; UNESCO 1983
एलोरामहाराष्ट्र (औरंगाबाद)तीनों — बौद्ध, हिंदू, जैन34 गुफाएँ: 1–12 बौद्ध, 13–29 हिंदू, 30–34 जैन; राष्ट्रकूट एवं कलचुरि; UNESCO 1983
एलिफेंटा (घारापुरी)महाराष्ट्र, मुंबई के निकट द्वीपमुख्यतः शैवत्रिमूर्ति/महेशमूर्ति (सदाशिव); कलचुरि/कोंकण-मौर्य; UNESCO 1987
बाघमध्य प्रदेश (धार), बाघिनी नदीबौद्धभित्ति चित्रों के लिए — "अजंता की बहन"; 9 गुफाएँ, प्रसिद्ध "रंगमहल"
उदयगिरिमध्य प्रदेश (विदिशा)हिंदू (कुछ जैन)गुप्तकालीन — चंद्रगुप्त द्वितीय; विश्वप्रसिद्ध वराह पैनल
उदयगिरि–खंडगिरिओडिशा (भुवनेश्वर)जैनकलिंगराज खारवेल; हाथीगुम्फा अभिलेख; रानीगुम्फा सबसे बड़ी
कार्ले (कार्ला)महाराष्ट्रबौद्धभारत का सबसे बड़ा चैत्य गृह; काष्ठ-अनुकृति छत
भाजा, बेडसा, कान्हेरी, नासिक (पांडवलेणी), जुन्नरमहाराष्ट्रबौद्ध (हीनयान)जुन्नर में सर्वाधिक संख्या में गुफाएँ; कान्हेरी मुंबई में
बादामीकर्नाटकहिंदू + जैनचालुक्य (मंगलेश); 4 गुफाएँ — गुफा 3 विष्णु को समर्पित, सर्वोत्तम
सित्तनवासलतमिलनाडु (पुदुक्कोट्टै)जैनपांड्य; भित्ति चित्र — समवसरण तथा कमल-सरोवर
बराबरबिहार (गया)आजीवकअशोक एवं दशरथ; भारत की प्राचीनतम शैलकृत गुफाएँ; लोमश ऋषि, सुदामा
क्लासिक भ्रम — दो "उदयगिरि"

उदयगिरि (विदिशा, मध्य प्रदेश) = गुप्तकालीन, हिंदू, वराह प्रतिमा, चंद्रगुप्त द्वितीय
उदयगिरि–खंडगिरि (भुवनेश्वर, ओडिशा) = जैन, खारवेल, हाथीगुम्फा अभिलेख
UPPSC इन्हें एक-दूसरे की जगह रखकर "सही सुमेलित नहीं है" प्रश्न बनाता है। इसी तरह बाघ (मध्य प्रदेश) गुफाएँ हैं, जबकि बाघ नाम की कोई नदी नहीं — वहाँ बाघिनी नदी बहती है।

अजंता बनाम एलोरा — एक पंक्ति में भेद

अजंता = केवल बौद्ध, चित्रकला के लिए प्रसिद्ध, नदी के घोड़े-नाल मोड़ पर, कोई मोनोलिथिक मंदिर नहीं।
एलोरा = तीन धर्म, मूर्तिकला एवं कैलाश मंदिर (एकाश्म) के लिए प्रसिद्ध, पहाड़ी ढाल पर।
दोनों महाराष्ट्र (औरंगाबाद/छत्रपति संभाजीनगर) में हैं और दोनों 1983 में UNESCO सूची में आए।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 स्तूप-स्थापत्य के अंगों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'अंड' स्तूप का अर्धगोलाकार गुंबदाकार भाग होता है।
2. 'हर्मिका' अंड के शीर्ष पर बनी वेदिकानुमा चौकोर रचना है।
3. 'मेधि' वह उठा हुआ चबूतरा है जिस पर प्रदक्षिणा-पथ बना होता है।
4. 'तोरण' स्तूप के भीतर रखी अस्थि-मंजूषा को कहा जाता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)स्तूप का अर्धगोलाकार गुंबद 'अंड', उसके शीर्ष की चौकोर वेदिकानुमा रचना 'हर्मिका' तथा प्रदक्षिणा-पथ वाला उठा हुआ चबूतरा 'मेधि' कहलाता है; हर्मिका से ऊपर 'यष्टि' एवं 'छत्रावली' होती है और स्तूप के चारों ओर 'वेदिका' होती है। अतः कथन 1, 2 तथा 3 सही हैं। 'तोरण' स्तूप की वेदिका के अलंकृत प्रवेश-द्वार हैं (साँची में चार), अस्थि-मंजूषा नहीं; अतः कथन 4 गलत है।

प्र.2 शैलकृत (rock-cut) स्थापत्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अजंता की गुफाएँ बौद्ध धर्म से संबंधित हैं तथा उनमें भित्तिचित्रण एवं उत्कीर्णन दोनों के उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं।
2. एलोरा की गुफाओं में केवल बौद्ध धर्म से संबंधित शैलकृत स्थापत्य ही मिलता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अजंता की गुफाएँ पूर्णतः बौद्ध हैं, जिनमें चैत्य-विहार के साथ जातक कथाओं पर आधारित विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्र हैं — अतः कथन 1 सही है। एलोरा में बौद्ध, हिंदू (कैलास मंदिर सहित) तथा जैन — तीनों धर्मों की गुफाएँ हैं, इसीलिए उसे धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक कहा जाता है। अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 सूची-I (गुफा/शैलाश्रय) को सूची-II (राज्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. भीमबेटका  B. एलिफेंटा  C. उदयगिरि-खंडगिरि  D. बादामी
सूची-II: 1. ओडिशा  2. कर्नाटक  3. मध्य प्रदेश  4. महाराष्ट्र
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-1, D-2CA-4, B-3, C-2, D-1DA-3, B-4, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)भीमबेटका के शैलाश्रय मध्य प्रदेश में, एलिफेंटा गुफाएँ महाराष्ट्र में, जैन धर्म से संबद्ध उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ ओडिशा में (जहाँ खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख है) तथा चालुक्यकालीन बादामी गुफाएँ कर्नाटक में हैं। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।

2. मंदिर स्थापत्य — नागर, द्रविड़, वेसर एवं क्षेत्रीय उप-शैलियाँ

2.1 मंदिर के मूल अंग

संरचनात्मक (structural) मंदिर की शुरुआत गुप्त काल से मानी जाती है। उससे पहले पूजा-स्थल या तो शैलकृत थे या काष्ठ-निर्मित। हर मंदिर में — शैली चाहे कोई हो — ये अंग मिलते हैं:

नागर — कंदरिया महादेव, खजुराहो

कंदारिया महादेव, खजुराहो — नागर शैली
  • वक्ररेखीय शिखर, शीर्ष पर आमलक + कलश
  • चिपके लघु उरः-शृंग = शेखरी; ऊँची जगती
  • न गोपुरम, न प्राकार, न तालाब
  • विद्याधर (चंदेल), ~1030 ई.

CC BY-SA 4.0 · Dey.sandip

द्रविड़ — बृहदेश्वर, तंजावुर

बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर — द्रविड़ शैली
  • पिरामिडाकार विमान, उसके ऊपर गुंबदाकार शिखर + स्तूपिका
  • प्राकार, गोपुरम, पुष्करिणी, नंदी
  • राजराज प्रथम (चोल), ~1010 ई. · UNESCO 1987

CC BY-SA 4.0 · Original: Rainer Halama Derivative work: UnpetitproleX

वेसर — होयसलेश्वर, हलेबिड

होयसलेश्वर मंदिर, हलेबिड
  • द्रविड़ योजना + नागर विवरण; तारकाकार तल-योजना
  • मुलायम सोपस्टोन — सूक्ष्मतम नक्काशी, शिल्पी-हस्ताक्षर
  • द्विकूट; विष्णुवर्धन · UNESCO 2023
  • शुद्ध वेसर — पापनाथ, पट्टदकल

CC BY-SA 4.0 · Rohit Sharma

मीनाक्षी मंदिर का गोपुरम, मदुरै
मीनाक्षी–सुंदरेश्वर, मदुरै — पहचानने की चीज़ गोपुरम है। चोल काल में विमान सर्वोच्च था; पांड्य काल (13वीं सदी) से गोपुरम विमान से ऊँचा हो गया — नागर से सबसे बड़ा दृश्य भेद यही। वर्तमान स्वरूप नायक काल का — 14 गोपुरम, स्वर्ण कमल तालाब। · CC BY-SA 3.0 · Bernard Gagnon
कोणार्क सूर्य मंदिर का चक्र
कोणार्क का रथ-चक्र — पूरा मंदिर सूर्य के रथ के रूप में: 12 जोड़ी पहिए एवं 7 अश्वनरसिंहदेव प्रथम, पूर्वी गंग, ~1250 ई.; “ब्लैक पैगोडा”; UNESCO 1984। · CC BY-SA 4.0 · Joydeep
कैलास मंदिर, एलोरा — एकाश्म
कैलास मंदिर, एलोरा (गुफा 16) — यह बनाया नहीं, चट्टान से ऊपर से नीचे काटकर निकाला गया: विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म मंदिर। राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम, 8वीं सदी; योजना द्रविड़। एलोरा की 34 गुफाएँ — 1–12 बौद्ध, 13–29 हिंदू, 30–34 जैन; UNESCO 1983। · CC BY-SA 4.0 · Rohit Sharma
भितरगाँव का गुप्तकालीन ईंट मंदिर
भितरगाँव, कानपुर देहात (उ.प्र.) — देखने की चीज़ सामग्री है: मंदिर पकी ईंट का है, पत्थर का नहीं। यही इसे भारत का प्राचीनतम जीवित ईंट मंदिर बनाता है जिसका शिखर विद्यमान है; दीवारों पर टेराकोटा पैनल, प्रवेश मेहराबदार। गुप्तकालीन, ~5वीं सदी। दूसरी UP-कड़ी — देवगढ़ का दशावतार मंदिर (~6वीं सदी), पंचायतन का प्रारंभिक उदाहरण; पैनल — शेषशायी विष्णु, गजेंद्र मोक्ष। · CC BY-SA 4.0 · Ankitshilu

2.2 तीन प्रमुख शैलियाँ — तुलनात्मक तालिका

तालिका 2.1 — नागर बनाम द्रविड़ बनाम वेसर (सर्वाधिक पूछा जाने वाला भेद)
आधारनागर (Nagara)द्रविड़ (Dravida)वेसर (Vesara)
क्षेत्रहिमालय से विंध्य तक — उत्तर भारतकृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक — तमिलनाडु/दक्षिणविंध्य एवं कृष्णा के बीच — दक्कन/कर्नाटक
ऊर्ध्व संरचनाशिखर — वक्ररेखीय (curvilinear), शीर्ष पर आमलक + कलशविमान — सीढ़ीदार पिरामिडाकार, शीर्ष पर शिखर (गुंबदाकार) + स्तूपिकादोनों का मिश्रण — द्रविड़ योजना पर नागर विवरण
चारदीवारीप्रायः नहींप्राकार (ऊँची चारदीवारी) होती हैप्रायः होती है
प्रवेश-द्वारविशाल गोपुरम नहींगोपुरम — विशाल अलंकृत द्वार, बाद में विमान से भी ऊँचासीमित
जलाशयप्रायः नहींमंदिर-तालाब (पुष्करिणी) अनिवार्यतःकभी-कभी
द्वारपाल / देवतागंगा-यमुना द्वार परद्वारपाल, दिक्पाल, नंदी; परिसर में अनेक उप-मंदिरमिश्रित
प्रमुख उदाहरणखजुराहो, कोणार्क, लिंगराज, दिलवाड़ा, देवगढ़बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, मीनाक्षी, कैलासनाथ (कांचीपुरम)होयसलेश्वर (हलेबिड), चेन्नकेशव (बेलूर), पापनाथ (पट्टदकल)
नागर बनाम द्रविड़ — शब्दों का उलटफेर

"शिखर" शब्द दोनों में आता है पर अर्थ भिन्न है! नागर में शिखर = गर्भगृह के ऊपर की पूरी वक्ररेखीय संरचना। द्रविड़ में विमान = पूरी पिरामिडाकार संरचना और शिखर = उसके शीर्ष पर बैठा गुंबदाकार तत्व। इसी प्रकार आमलक और कलश नागर के हैं, स्तूपिका द्रविड़ की है। "गोपुरम नागर शैली का अंग है" — यह कथन गलत है, और UPPSC इसे बार-बार कथन-प्रश्न में रखता है।

2.3 नागर शैली की उप-शैलियाँ

नागर शिखर तीन प्रकार का होता है, और इसी आधार पर क्षेत्रीय उप-शैलियाँ बनीं:

तालिका 2.2 — नागर की क्षेत्रीय उप-शैलियाँ
उप-शैलीक्षेत्र / वंशपहचानप्रमुख मंदिर
ओडिशा / कलिंगओडिशा — सोमवंशी एवं पूर्वी गंगमंदिर = देउल (गर्भगृह) + जगमोहन (सभा-मंडप) + नटमंदिर + भोगमंडप; शिखर लगभग सीधा उठकर ऊपर मुड़ता है; बाहरी दीवार पर सघन उत्कीर्णन, भीतर सादगीलिंगराज, जगन्नाथ (पुरी), कोणार्क, मुक्तेश्वर, राजारानी, परशुरामेश्वर
खजुराहो / चंदेल (मध्य भारत)बुंदेलखंड — चंदेलऊँची जगती पर पूरा मंदिर; पंचायतन योजना; शेखरी शिखर; मंडप की छतें ऊपर उठती शृंखला; कामकला-मूर्तियाँ; प्रायः प्रदक्षिणापथ भीतरकंदरिया महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ, चौंसठ योगिनी, पार्श्वनाथ (जैन)
सोलंकी / मारू-गुर्जरगुजरात–राजस्थान — चौलुक्य (सोलंकी)श्वेत संगमरमर का उत्कृष्ट उत्कीर्णन; अलंकृत छतें एवं तोरण; प्रायः शिखर नहीं या सादा; वाव (बावड़ी) एवं कुंड परंपरादिलवाड़ा (माउंट आबू), मोढेरा सूर्य मंदिर, रानी की वाव, सूर्य मंदिर, रणकपुर
गुप्त (आदि नागर)मध्य भारत एवं उत्तर प्रदेशसपाट छत से शिखर की ओर क्रमिक विकास; चतुष्कोणीय गर्भगृह; स्तंभयुक्त बरामदासांची मंदिर संख्या 17, तिगवा (कंकाली देवी), भितरगाँव, देवगढ़
उत्तर प्रदेश संदर्भ — गुप्तकालीन मंदिरों की जन्मभूमि

भारतीय संरचनात्मक मंदिर के विकास की दो निर्णायक कड़ियाँ उत्तर प्रदेश में हैं:

साथ ही सारनाथ का मूलगंध कुटी विहार क्षेत्र तथा कौशांबी (प्रयागराज) के अवशेष, और अहिच्छत्र (बरेली) की गुप्तकालीन टेराकोटा गंगा-यमुना प्रतिमाएँ इस कड़ी को पूरा करती हैं।

2.4 द्रविड़ शैली का विकास — पल्लव से नायक तक

दक्षिण भारत में मंदिर स्थापत्य एक सीधी विकास-रेखा में चला — और UPPSC इसी क्रम पर कालक्रम प्रश्न बनाता है।

तालिका 2.3 — द्रविड़ शैली के चरण (कालक्रम-योग्य)
क्रमचरण / वंशकालविशेषता एवं उदाहरण
1पल्लव — महेंद्र शैली7वीं शताब्दी (महेंद्रवर्मन प्रथम)शैलकृत मंडप; मंडगपट्टु अभिलेख — "ईंट, लकड़ी, धातु या गारे के बिना" निर्मित
2पल्लव — मामल्ल शैलीनरसिंहवर्मन प्रथम "मामल्ल"महाबलीपुरम के एकाश्म रथ (पंच पांडव रथ — धर्मराज, भीम, अर्जुन, द्रौपदी, नकुल-सहदेव); गंगावतरण/अर्जुन की तपस्या शिलाचित्र
3पल्लव — राजसिंह शैलीनरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह"संरचनात्मक मंदिर प्रारंभ — तट मंदिर (Shore Temple), महाबलीपुरम तथा कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम
4पल्लव — नंदिवर्मन शैली8वीं–9वीं शताब्दीछोटे मंदिर — वैकुंठ पेरुमाल, कांचीपुरम
5चोल10वीं–12वीं शताब्दीविशाल विमान ही सर्वोच्च; गोपुरम अभी गौण — बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, ऐरावतेश्वर
6पांड्य13वीं शताब्दीगोपुरम विमान से ऊँचा हो गया; विशाल प्राकार एवं मंदिर-नगर
7विजयनगर14वीं–16वीं शताब्दीकल्याण मंडप, अम्मन मंदिर, 1000-स्तंभ मंडप, विशाल अलंकृत स्तंभ (यालि/अश्वारोही), राय गोपुरम — विट्ठल, हजार राम, विरूपाक्ष (हम्पी)
8नायक16वीं–18वीं शताब्दीविशाल प्राकार एवं गोपुरम, प्रकारम तथा गलियारे — मीनाक्षी मंदिर, मदुरै; रंगनाथस्वामी, श्रीरंगम (विश्व का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर परिसर)

2.5 प्रमुख मंदिर ↔ शैली ↔ निर्माता — केंद्रीय सुमेलन तालिका

तालिका 2.4 — मंदिर ↔ स्थान ↔ निर्माता/वंश (इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण तालिका)
मंदिरस्थान / राज्यनिर्माता एवं वंशशैली / विशेष
कैलाश मंदिर (एलोरा गुफा 16)एलोरा, महाराष्ट्रकृष्ण प्रथम — राष्ट्रकूट (8वीं शताब्दी)विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म (monolithic) शैलकृत मंदिर; ऊपर से नीचे तराशा गया; द्रविड़ योजना
बृहदेश्वर / राजराजेश्वर मंदिरतंजावुर, तमिलनाडुराजराज प्रथम — चोल (लगभग 1010 ई.)द्रविड़; "महान जीवंत चोल मंदिर" के अंतर्गत UNESCO 1987
गंगैकोंडचोलपुरम मंदिरतमिलनाडुराजेंद्र प्रथम — चोलगंगा-विजय की स्मृति में नई राजधानी; विमान बृहदेश्वर से कुछ नीचा पर अधिक वक्र
ऐरावतेश्वर मंदिरदारासुरम, तमिलनाडुराजराज द्वितीय — चोलरथाकार मंडप, संगीत-सोपान; UNESCO (चोल समूह)
तट मंदिर (Shore Temple)महाबलीपुरम, तमिलनाडुनरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) — पल्लवप्रथम पल्लव संरचनात्मक मंदिर; UNESCO 1984
कैलासनाथ मंदिरकांचीपुरम, तमिलनाडुनरसिंहवर्मन द्वितीय — पल्लवकांचीपुरम का सबसे बड़ा पल्लव मंदिर
विरूपाक्ष मंदिरपट्टदकल, कर्नाटकरानी लोकमहादेवी — विक्रमादित्य द्वितीय (चालुक्य)कांचीपुरम के कैलासनाथ पर आधारित; UNESCO 1987
पापनाथ मंदिरपट्टदकल, कर्नाटकचालुक्यवेसर शैली का श्रेष्ठ उदाहरण — नागर + द्रविड़
लिंगराज मंदिरभुवनेश्वर, ओडिशासोमवंशी (ययाति केसरी द्वारा प्रारंभ, ललाटेंदु केसरी द्वारा पूर्ण; 11वीं शताब्दी)कलिंग/ओडिशा शैली का शिखर-बिंदु; देउल + जगमोहन + नटमंदिर + भोगमंडप
जगन्नाथ मंदिरपुरी, ओडिशाअनंतवर्मन चोडगंग — पूर्वी गंग (12वीं शताब्दी)चार धाम में से एक; रथयात्रा
कोणार्क सूर्य मंदिरकोणार्क, ओडिशानरसिंहदेव प्रथम — पूर्वी गंग (लगभग 1250 ई.)रथाकार — 12 जोड़ी पहिए, 7 अश्व; "ब्लैक पैगोडा"; UNESCO 1984
कंदरिया महादेवखजुराहो, मध्य प्रदेशविद्याधर — चंदेल (लगभग 1030 ई.)खजुराहो का सबसे बड़ा एवं ऊँचा मंदिर; शेखरी शिखर
लक्ष्मण मंदिरखजुराहोयशोवर्मन (लक्ष्मणवर्मन) — चंदेल (लगभग 954 ई.)पूर्ण पंचायतन वैष्णव मंदिर
चौंसठ योगिनी मंदिरखजुराहोचंदेल (9वीं शताब्दी)खजुराहो का प्राचीनतम मंदिर; एकमात्र ग्रेनाइट से बना; तंत्र-आधारित
मोढेरा सूर्य मंदिरमोढेरा, गुजरातभीम प्रथम — सोलंकी/चौलुक्य (1026 ई.)सूर्यकुंड, सभामंडप, गूढ़मंडप — कोई शिखर शेष नहीं
रानी की वावपाटन, गुजरातरानी उदयमती (भीम प्रथम की स्मृति में) — सोलंकीसात-मंजिला बावड़ी; UNESCO 2014; ₹100 के नोट पर अंकित
दिलवाड़ा — विमल वसहीमाउंट आबू, राजस्थानविमल शाह (भीम प्रथम का मंत्री), 1031 ई.जैन (आदिनाथ); श्वेत संगमरमर की छत-नक्काशी
दिलवाड़ा — लूण वसहीमाउंट आबूवस्तुपाल एवं तेजपाल (वाघेला मंत्री), 1230 ई.जैन (नेमिनाथ); रंगमंडप का झूमर-गुंबद
चेन्नकेशव मंदिरबेलूर, कर्नाटकविष्णुवर्धन — होयसल (1117 ई.)तलकाड में चोलों पर विजय की स्मृति; UNESCO 2023
होयसलेश्वर मंदिरहलेबिड, कर्नाटकविष्णुवर्धन — होयसलद्विकूट (दो गर्भगृह); UNESCO 2023
केशव मंदिरसोमनाथपुर, कर्नाटकसोमनाथ दंडनायक, नरसिंह तृतीय के शासन में (1268 ई.)त्रिकूट (तीन गर्भगृह); UNESCO 2023
विट्ठल (विठ्ठलस्वामी) मंदिरहम्पी, कर्नाटकविजयनगर — कृष्णदेवराय काल में विस्तारप्रस्तर रथ तथा संगीत-स्तंभ (musical pillars); ₹50 के नोट पर रथ
हजार राम मंदिरहम्पीदेवराय प्रथम — विजयनगरराजपरिवार का निजी मंदिर; रामायण के भित्ति-पैनल
मीनाक्षी–सुंदरेश्वर मंदिरमदुरै, तमिलनाडुनायक शासक (विश्वनाथ नायक एवं उत्तराधिकारी)14 गोपुरम, स्वर्ण कमल तालाब, सहस्र-स्तंभ मंडप
रामप्पा / रुद्रेश्वर मंदिरपालमपेट, तेलंगानारेचर्ल रुद्र, गणपतिदेव (काकतीय) के शासन में, 1213 ई.तैरती ईंटों का शिखर; शिल्पी के नाम पर मंदिर; UNESCO 2021
दशावतार मंदिरदेवगढ़ (ललितपुर), उत्तर प्रदेशगुप्तप्रारंभिक पंचायतन; शेषशायी विष्णु पैनल
भितरगाँव मंदिरकानपुर देहात, उत्तर प्रदेशगुप्तप्राचीनतम जीवित ईंट मंदिर; टेराकोटा पैनल
सूर्य मंदिरमार्तंड, जम्मू-कश्मीरललितादित्य मुक्तापीड़ — कार्कोट (8वीं शताब्दी)कश्मीरी शैली — पिरामिडाकार छत, ग्रीक-रोमन प्रभाव के स्तंभ
समान नामों का जाल — यह हर वर्ष का प्रश्न है
होयसल शैली की पहचान (सुमेलन में काम आती है)
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (मंदिर स्थापत्य की क्षेत्रीय शैली) को सूची-II (प्रतिनिधि उदाहरण) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. होयसल शैली  B. कलिंग (ओडिशा) शैली  C. मारू-गुर्जर (सोलंकी) शैली  D. चंदेल शैली
सूची-II: 1. कंदरिया महादेव मंदिर, खजुराहो  2. दिलवाड़ा जैन मंदिर, माउंट आबू  3. चेन्नकेशव मंदिर, बेलूर  4. लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर
कूट:

AA-4, B-3, C-2, D-1BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-1, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)बेलूर का चेन्नकेशव मंदिर (1117 ई., विष्णुवर्धन) होयसल शैली का, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर कलिंग अथवा ओडिशा शैली (देउल-जगमोहन योजना) का, माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर मारू-गुर्जर या सोलंकी शैली के श्वेत संगमरमर उत्कीर्णन का तथा खजुराहो का कंदरिया महादेव मंदिर चंदेल शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।

प्र.2 भारतीय मंदिर स्थापत्य की शैलियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नागर शैली के मंदिरों की विशेषता परिसर के चारों ओर ऊँची चहारदीवारी तथा प्रवेश पर भव्य गोपुरम् है।
2. द्रविड़ शैली में गर्भगृह के ऊपर बना पिरामिडाकार मुख्य शिखर 'विमान' कहलाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)ऊँची प्राचीर तथा विशाल गोपुरम् द्रविड़ शैली के लक्षण हैं; नागर शैली के मंदिर प्रायः जगती (चबूतरे) पर बने होते हैं और उनमें चहारदीवारी या गोपुरम् नहीं होते — अतः कथन 1 गलत है। द्रविड़ शैली में गर्भगृह के ऊपर का सोपानाकार शिखर 'विमान' कहलाता है, अतः कथन 2 सही है।

प्र.3 विजयनगर स्थापत्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इस काल में मंदिर-परिसरों में 'अम्मान मंदिर' (देवी मंदिर) तथा 'कल्याण मंडप' जैसे नवीन अंग जोड़े गए।
2. हम्पी का विट्ठल मंदिर अपने संगीतमय स्तंभों तथा पाषाण-रथ के लिए प्रसिद्ध है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)विजयनगर काल में द्रविड़ परंपरा में विशाल गोपुरम्, अलंकृत स्तंभ, अम्मान (देवी) मंदिर तथा विवाह-उत्सवों हेतु कल्याण मंडप जैसे नवीन अंग जुड़े। हम्पी का विट्ठल मंदिर अपने 'संगीतमय स्तंभों' तथा एकाश्म पाषाण-रथ के लिए विश्वप्रसिद्ध है और हम्पी का स्मारक-समूह यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। अतः दोनों कथन सही हैं।

3. इंडो-इस्लामिक एवं औपनिवेशिक स्थापत्य

3.1 मूल तकनीकी अंतर — ट्रैबिएट बनाम आर्क्यूएट

13वीं शताब्दी में जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया, वह सजावट का नहीं, भार-वहन की तकनीक का था।

अटाला मस्जिद, जौनपुर — शर्की शैली
अटाला मस्जिद, जौनपुर — शर्की शैली पहचानने का पूरा नियम इसी चित्र में है: (1) ऊँचा, ढलवाँ किनारों वाला आयताकार प्रवेश-पाइलॉन जो भीतर की मेहराब को पूरी तरह ढक लेता है; (2) मीनार एक भी नहीं — यही इसे दिल्ली एवं मुगल मस्जिदों से अलग करता है; (3) अलंकरण अल्प। इब्राहीम शाह शर्की द्वारा पूर्ण; जौनपुर = “शीराज-ए-हिंद”· CC BY-SA 4.0 · Rangan Datta Wiki
पक्षभारतीय (ट्रैबिएट / Trabeate)इस्लामी (आर्क्यूएट / Arcuate)
भार-वहनस्तंभ + शहतीर (lintel) — सीधी रेखामेहराब (arch) एवं गुंबद (dome)
जोड़ाईपत्थरों को बिना गारे के जमाया जाता थाचूना-गारा (lime mortar) का व्यापक प्रयोग — नई तकनीक
अलंकरणमानव एवं पशु आकृतियाँअरबेस्क (ज्यामितीय-वानस्पतिक), सुलेख (calligraphy), जालीदार पर्दे — जीवित प्राणियों का निषेध
संक्रमण-तत्वस्क्विंच तथा पेंडेंटिव — वर्गाकार कक्ष पर गोल गुंबद बैठाने की युक्ति

3.2 दिल्ली सल्तनत की शैलियाँ

तालिका 3.1 — सल्तनत वंश ↔ स्थापत्य विशेषता ↔ स्मारक
वंशशैली-विशेषताप्रमुख निर्माण
गुलाम/मामलूक (1206–90)तोड़े गए मंदिरों की सामग्री का पुनः प्रयोग; कोरबेल मेहराब; लाल बलुआ पत्थरकुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद (ऐबक, दिल्ली का प्रथम मस्जिद), अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (अजमेर), कुतुब मीनार (ऐबक ने आरंभ, इल्तुतमिश ने पूर्ण, फिरोजशाह ने मरम्मत), सुल्तान गढ़ी (भारत का प्रथम इस्लामी मकबरा), बलबन का मकबरा
खिलजी (1290–1320)सेल्जुक प्रभाव; सच्ची मेहराब एवं गुंबद; लाल बलुआ पत्थर + संगमरमर; कमल-कली किनारीअलाई दरवाजा (1311), अलाई मीनार (अधूरी), सीरी का किला, हौज खास, जमात खाना मस्जिद
तुगलक (1320–1414)सादगी एवं दुर्ग-सदृश भारीपन; ढलवाँ दीवारें (batter); मेहराब + शहतीर का मिश्रण; सस्ता ग्रे क्वार्ट्जाइट; "संकट की स्थापत्य"तुगलकाबाद (गयासुद्दीन), जहाँपनाह एवं आदिलाबाद (मुहम्मद बिन तुगलक), फिरोजशाह कोटला, हौज खास मदरसा, फिरोजाबाद, कालीगढ़ी
सैयद एवं लोदी (1414–1526)अष्टकोणीय एवं वर्गाकार मकबरे; दोहरा गुंबद; उद्यान-मकबरा परंपरा का बीजमुबारक शाह एवं मुहम्मद शाह के मकबरे, सिकंदर लोदी का मकबरा, बड़ा गुम्बद एवं शीश गुम्बद, मोठ की मस्जिद
उत्तर प्रदेश संदर्भ — जौनपुर की शर्की शैली

जौनपुर सल्तनत (शर्की वंश, 1394–1479) ने एक पूर्णतः विशिष्ट प्रांतीय शैली दी, जिसे शर्की शैली कहते हैं। इसकी अचूक पहचान:

3.3 प्रांतीय शैलियाँ

तालिका 3.2 — प्रांतीय स्थापत्य ↔ पहचान ↔ स्मारक
प्रांतविशेषताप्रमुख स्मारक
जौनपुर (शर्की) — UPविशाल पाइलॉन, मीनार-रहितअटाला मस्जिद, जामा मस्जिद, लाल दरवाजा
बंगालईंट एवं टेराकोटा; वक्र (do-chala/chau-chala) छत जो बाद में "बंगाल छत" के रूप में मुगल स्थापत्य में गई; काला पत्थरअदीना मस्जिद (पांडुआ — भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में), एकलाखी मकबरा, दाखिल दरवाजा एवं कदम रसूल (गौड़), छोटा एवं बड़ा सोना मस्जिद
गुजरातजैन एवं हिंदू शिल्प का सबसे गहरा समावेश; उत्कृष्ट जालीअहमदाबाद की जामा मस्जिद, सीदी सैयद की जाली (वृक्ष-जाली — अहमदाबाद का प्रतीक), रानी सिपरी मस्जिद, तीन दरवाजा, चांपानेर (UNESCO 2004)
मालवा (मांडू)भव्य सीढ़ियाँ एवं मेहराब; रंगीन टाइल; मीनारों का अभाव; जल-स्थापत्यजहाज महल, हिंडोला महल, होशंगशाह का मकबरा (भारत का प्रथम संगमरमर स्मारक), अशरफी महल, रानी रूपमती का मंडप
बीजापुर (आदिलशाही)विशाल गुंबद, कमल-दल आधार, बल्ब-नुमा गुंबदगोल गुम्बज (मुहम्मद आदिलशाह का मकबरा, 1656) — विश्व के विशालतम एकल गुंबदों में; फुसफुसाहट दीर्घा (Whispering Gallery); इब्राहीम रौजा, जामा मस्जिद, गगन महल
बीदर एवं गोलकुंडाफारसी-तुर्की प्रभाव; बीदरी धातु-कलामहमूद गवाँ का मदरसा (बीदर), चारमीनार (मुहम्मद कुली कुतुबशाह, 1591, हैदराबाद), कुतुबशाही मकबरे
कश्मीरकाष्ठ (देवदार) स्थापत्य, पिरामिडाकार छत, शिखर-नुमा गुंबदशाह हमदान की खानकाह, जामा मस्जिद श्रीनगर, मदनी मस्जिद

3.4 मुगल स्थापत्य का विकास

मुगल स्थापत्य एक सीधी प्रगति में चलता है — लाल बलुआ पत्थर से श्वेत संगमरमर की ओर, और ठोस द्रव्यमान से नाजुक अलंकरण की ओर। कालक्रम-प्रश्न इसी रेखा पर बनते हैं।

तालिका 3.3 — मुगल स्थापत्य के चरण (कालक्रम-योग्य)
शासकचरण-विशेषताप्रमुख निर्माण
बाबर (1526–30)अल्प निर्माण; चारबाग उद्यान-परंपरा भारत में लायापानीपत की काबुली बाग मस्जिद, संभल की जामा मस्जिद (UP), आगरा का राम बाग (आराम बाग) — भारत का प्रथम मुगल चारबाग
शेरशाह सूरी (1540–45) — अंतरालसंक्रमणकालीन; सल्तनत से मुगल की ओर सेतुशेरशाह का मकबरा, सासाराम (झील के बीच अष्टकोणीय), किला-ए-कुहना मस्जिद (पुराना किला, दिल्ली), रोहतासगढ़
हुमायूँ / अकबर का आरंभफारसी योजना का आगमनहुमायूँ का मकबरा (1565–72; विधवा हमीदा बानो बेगम द्वारा, वास्तुकार मीरक मिर्जा गियास) — भारत का प्रथम उद्यान-मकबरा (garden tomb), प्रथम पूर्ण चारबाग, प्रथम दोहरा गुंबद युक्त विशाल मकबरा; ताजमहल का पूर्वज; UNESCO 1993
अकबर (1556–1605)लाल बलुआ पत्थर; भारतीय (गुजराती–राजस्थानी) तत्वों का खुला समावेश; ट्रैबिएट + आर्क्यूएट का मिश्रणआगरा का किला, फतेहपुर सीकरी (जोधाबाई महल, पंच महल, दीवान-ए-खास, बीरबल का घर), बुलंद दरवाजा (गुजरात-विजय की स्मृति; भारत का सर्वोच्च प्रवेश-द्वार — लगभग 54 मीटर), शेख सलीम चिश्ती का मकबरा (श्वेत संगमरमर + उत्कृष्ट जाली), लाहौर का किला, इलाहाबाद का किला
जहाँगीर (1605–27)निर्माण कम, उद्यान अधिक; संगमरमर एवं पित्रादूरा का आरंभअकबर का मकबरा, सिकंदरा (आगरा; जहाँगीर द्वारा पूर्ण — पंचमंजिला, गुंबद-रहित), एतमाद-उद-दौला का मकबरा (आगरा, 1622–28; नूरजहाँ द्वारा पिता मिर्जा गियास बेग हेतु) — प्रथम पूर्णतः संगमरमर मुगल स्मारक तथा पित्रादूरा का प्रथम व्यापक प्रयोग, इसीलिए "बेबी ताज"; शालीमार बाग एवं निशात बाग (कश्मीर)
शाहजहाँ (1628–58)स्वर्णयुग — श्वेत संगमरमर, पित्रादूरा, बंगाल-छत, बल्बनुमा गुंबद, फोलिएटेड (बहु-पंखुड़ी) मेहराबताजमहल (1632–1653; मुमताज महल हेतु; प्रधान वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी; UNESCO 1983), लाल किला एवं जामा मस्जिद (दिल्ली), शाहजहानाबाद, आगरा किले की मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम/खास, तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन)
औरंगजेब (1658–1707)ह्रास — सादगी, संगमरमर के स्थान पर प्लास्टरबीबी का मकबरा (औरंगाबाद; पुत्र आजम शाह द्वारा, माता दिलरस बानो हेतु — "दक्खन का ताज"), लाल किले की मोती मस्जिद, बादशाही मस्जिद (लाहौर)
उत्तर प्रदेश संदर्भ — आगरा एवं फतेहपुर सीकरी

मुगल स्थापत्य का लगभग पूरा शिखर उत्तर प्रदेश में खड़ा है। UP के तीनों पुराने UNESCO स्थल मुगलकालीन हैं — ताजमहल (1983), आगरा का किला (1983) तथा फतेहपुर सीकरी (1986); 2026 में इनमें सारनाथ जुड़ गया।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — अवध/लखनऊ की इमामबाड़ा शैली

18वीं शताब्दी में मुगल पतन के बाद अवध में एक स्वतंत्र शैली उभरी, जिसे अवध/लखनवी शैली कहते हैं — संगमरमर के स्थान पर ईंट, चूना एवं प्लास्टर (stucco), भव्य पैमाना, यूरोपीय तत्वों का समावेश, और मछली का नवाबी प्रतीक।

3.5 चारबाग एवं मकबरा-स्थापत्य

3.6 औपनिवेशिक स्थापत्य

तालिका 3.4 — औपनिवेशिक शैलियाँ ↔ स्मारक ↔ वास्तुकार
शैलीपहचानस्मारक (वास्तुकार / वर्ष)
नव-शास्त्रीय (Neo-Classical)ग्रीक-रोमन स्तंभ, त्रिकोणीय पेडिमेंट, भव्य गुंबदसेंट जॉर्ज किला (चेन्नई), टाउन हॉल, मुंबई, राजभवन/गवर्नमेंट हाउस, कोलकाता
नव-गॉथिक (Neo-Gothic / Victorian Gothic)ऊँची नुकीली मेहराब, शिखर (spire), रंगीन काँचछत्रपति शिवाजी टर्मिनस (F. W. स्टीवंस, 1888; UNESCO 2004), मुंबई विश्वविद्यालय एवं राजाबाई क्लॉक टावर (गिल्बर्ट स्कॉट), बॉम्बे हाईकोर्ट
इंडो-सारसेनिक (Indo-Saracenic)भारतीय गुंबद, छतरी, जाली, मीनार + यूरोपीय योजना एवं इस्पात/लोहाचेपॉक पैलेस, चेन्नई (प्रथम इंडो-सारसेनिक भवन), विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता (विलियम एमर्सन; 1921 में जनता हेतु खुला), गेटवे ऑफ इंडिया (जॉर्ज विटेट, 1924), मद्रास उच्च न्यायालय, मैसूर पैलेस (हेनरी इरविन), लक्ष्मी विलास पैलेस (वडोदरा), मुइर सेंट्रल कॉलेज (प्रयागराज)
नई दिल्ली — लुटियंस शैलीशास्त्रीय योजना + भारतीय छतरी/जाली/चज्जा; 1911 में राजधानी स्थानांतरण के बादराष्ट्रपति भवन (तत्कालीन वायसराय हाउस — एडविन लुटियंस), सचिवालय एवं संसद भवन (हर्बर्ट बेकर), इंडिया गेट (लुटियंस, 1931 में उद्घाटित)
सावधानी

(1) बुलंद दरवाजा — मानक उत्तर गुजरात विजय (1573) की स्मृति है, और यही परीक्षा में अपेक्षित है। किंतु ध्यान रखें कि इसके पूर्वी मेहराब के फारसी अभिलेख में 1601 की दक्कन विजय का उल्लेख है — इसीलिए कुछ स्रोत निर्माण-वर्ष 1576 तो कुछ 1601 बताते हैं। विकल्पों में यदि "गुजरात" हो तो वही चुनें।
(2) एतमाद-उद-दौला का मकबरा नूरजहाँ ने अपने पिता के लिए बनवाया; हुमायूँ का मकबरा उसकी विधवा हमीदा बानो बेगम ने। दोनों "स्त्री द्वारा निर्मित मकबरे" हैं — पर संबंध अलग।
(3) बीबी का मकबरा औरंगजेब ने नहीं, उसके पुत्र आजम शाह ने बनवाया।
(4) मोती मस्जिद दो हैं — आगरा किले की (शाहजहाँ) तथा दिल्ली लाल किले की (औरंगजेब)।
(5) कुतुब मीनार ऐबक ने आरंभ की, इल्तुतमिश ने पूर्ण की — "ऐबक ने बनवाई" आधा-सत्य है और अभिकथन–कारण में फँसाता है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (स्मारक) को सूची-II (निर्माण करवाने वाला) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. एतमादुद्दौला का मकबरा, आगरा  B. हुमायूँ का मकबरा, दिल्ली  C. बीबी का मकबरा, औरंगाबाद  D. मोती मस्जिद, लाल किला (दिल्ली)
सूची-II: 1. बेगा बेगम (हाजी बेगम)  2. नूरजहाँ  3. औरंगजेब  4. आजम शाह
कूट:

AA-1, B-2, C-3, D-4BA-1, B-2, C-4, D-3CA-2, B-1, C-3, D-4DA-2, B-1, C-4, D-3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्जा गियास बेग की स्मृति में आगरा में एतमादुद्दौला का मकबरा (1622-28) बनवाया, जो पूर्णतः श्वेत संगमरमर की प्रथम मुगल इमारत है। हुमायूँ का मकबरा उसकी बेगम बेगा बेगम (हाजी बेगम) ने बनवाया; 'दक्खन का ताज' कहलाने वाला बीबी का मकबरा शहजादे आजम शाह ने अपनी माँ दिलरस बानो बेगम की स्मृति में बनवाया तथा लाल किले की मोती मस्जिद औरंगजेब ने। अतः A-2, B-1, C-4, D-3 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित मुगलकालीन इमारतों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनके निर्माण के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. ताजमहल का निर्माण-आरंभ
2. हुमायूँ के मकबरे की पूर्णता
3. एतमादुद्दौला के मकबरे की पूर्णता
4. बुलंद दरवाजा का निर्माण
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 2, 1, 3B2, 4, 1, 3C4, 2, 3, 1D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)हुमायूँ का मकबरा — भारत का प्रथम उद्यान-मकबरा — 1571 ई. के आसपास पूर्ण हुआ; फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा लगभग 1601 ई. में बना। एतमादुद्दौला का मकबरा 1622-1628 ई. के बीच बना और ताजमहल का निर्माण 1632 ई. में आरंभ हुआ। अतः सही क्रम 2, 4, 3, 1 है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (स्मारक)    (स्थान)
1. आदिना मस्जिद — पांडुआ
2. होशंगशाह का मकबरा — माण्डू
3. अढ़ाई दिन का झोंपड़ा — जौनपुर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)बंगाल सल्तनत के सुल्तान सिकंदर शाह द्वारा 1373-75 ई. में बनवाई गई आदिना मस्जिद मालदा (पश्चिम बंगाल) के पांडुआ में है, और संगमरमर से निर्मित होशंगशाह का मकबरा माण्डू (मध्य प्रदेश) में है — अतः युग्म 1 तथा 2 सही हैं। 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' अजमेर (राजस्थान) में है, जौनपुर में नहीं; अतः केवल युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है।

4. मूर्तिकला — मौर्य से चोल कांस्य तक

4.1 मौर्य एवं शुंग मूर्तिकला

मौर्य काल में दो समानांतर धाराएँ चलीं। दरबारी कला — चमकदार पॉलिश, विशाल पैमाना, राजकीय संरक्षण (स्तंभ-शीर्ष)। लोकप्रिय कला — स्थानीय शिल्पियों द्वारा बनी विशाल यक्ष-यक्षी प्रतिमाएँ, जो लोक-पूजा से जुड़ी थीं।

मथुरा — उत्तर प्रदेश

मथुरा शैली की बुद्ध प्रतिमा
  • चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर (सीकरी)
  • मुख गोल, प्रसन्न, ऊर्जावान; आँखें खुलीं
  • वस्त्र पारदर्शी, दायाँ कंधा खुला; प्रभामंडल अलंकृत
  • बौद्ध + जैन + ब्राह्मण — तीनों; प्रभाव देशज (यक्ष परंपरा)
  • कंकाली टीला; माट — कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा

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गांधार — पेशावर–तक्षशिला–स्वात

गांधार शैली की बुद्ध प्रतिमा
  • धूसर/नीली शिस्ट, कहीं स्टको
  • मुख ध्यानमग्न; आँखें अधखुली; लहरदार केश
  • मोटी यथार्थवादी सिलवटें (रोमन टोगा), दोनों कंधे ढके; प्रभामंडल सादा
  • केवल बौद्ध — जैन/हिंदू नहीं; प्रभाव यूनानी-रोमन
  • तक्षशिला, हड्डा, बामियान, जौलियाँ

CC0 · anonymous

चोल कांस्य नटराज
चोल नटराज — प्रतिमा स्वयं प्रश्न है; प्रतीक पढ़िए: डमरू (सृष्टि), अग्नि (संहार), अभय (रक्षण), पैरों तले बौना अपस्मार (अज्ञान), वलय तिरुवासी (ब्रह्मांड), उठा पैर (मोक्ष)। तकनीक मधूच्छिष्ट विधान (lost-wax), धातु पंचलोहा — साँचा तोड़कर निकाली जाती है, इसलिए हर प्रतिमा अनन्य; ये जुलूस की उत्सव-मूर्तियाँ थीं। · Public domain ·

4.2 तीन प्रमुख मूर्तिकला संप्रदाय — मथुरा, गांधार एवं अमरावती

कुषाण–सातवाहन युग (पहली–तीसरी शताब्दी) में बुद्ध की प्रथम मानव प्रतिमाएँ बनीं। इस युग की तीन शैलियों का तुलनात्मक अंतर UPPSC में सर्वाधिक पूछे जाने वाले सुमेलन/अभिकथन विषयों में है।

तालिका 4.1 — मथुरा बनाम गांधार बनाम अमरावती (अति-महत्वपूर्ण)
आधारमथुरा शैलीगांधार शैलीअमरावती शैली
क्षेत्रमथुरा एवं आसपास — उत्तर प्रदेशपेशावर–तक्षशिला–स्वात घाटी (आज का उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान/अफगानिस्तान)कृष्णा–गोदावरी डेल्टा — आंध्र प्रदेश
संरक्षककुषाण (कनिष्क)कुषाण (कनिष्क) — साथ ही शक-पह्लवसातवाहन तथा बाद में इक्ष्वाकु
सामग्रीचित्तीदार लाल बलुआ पत्थर (सीकरी)धूसर/नीली शिस्ट (slate), कहीं-कहीं स्टकोश्वेत चूना-पत्थर (सफेद संगमरमरी)
बाह्य प्रभावपूर्णतः देशज — यक्ष परंपरा से विकसितयूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक)देशज, किंतु रोमन संपर्क का हल्का प्रभाव
बुद्ध का स्वरूपमुंडित/शंख-सदृश केश, चेहरा गोल एवं प्रसन्न-ऊर्जावान, आँखें खुली, शरीर स्थूल एवं मांसललहरदार केश (wavy hair), तीक्ष्ण नासिका, ध्यानमग्न/अध्यात्मिक भाव, आँखें अधखुलीपतले, लंबे, तिर्यक (त्रिभंग) आकृति; अत्यंत गतिशील
वस्त्रपारदर्शी, दायाँ कंधा खुला; सिलवटें कममोटी, यथार्थवादी सिलवटें (रोमन टोगा-सदृश), दोनों कंधे ढकेहल्के, शरीर से चिपके
प्रभामंडल (Halo)अलंकृत, ज्यामितीय नक्काशी युक्तसादा, अलंकरण-रहितप्रायः नहीं; कथात्मक पैनल प्रमुख
विषय-वस्तुबौद्ध + जैन तीर्थंकर + ब्राह्मण देवता (शिव, विष्णु, सूर्य) + कुषाण राजप्रतिमाएँकेवल बौद्धबौद्ध — जातक एवं बुद्ध-जीवन के कथात्मक पैनल
प्रमुख स्थल/कृतियाँकंकाली टीला (जैन), गोविंदनगर, कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा (माट, मथुरा)तक्षशिला, हड्डा, बामियान, जौलियाँ, स्वातअमरावती, नागार्जुनकोंडा, जग्गयपेट, गोली
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मथुरा कला

मथुरा भारतीय मूर्तिकला का एकमात्र ऐसा केंद्र है जहाँ तीनों प्रमुख धर्मों — बौद्ध, जैन एवं ब्राह्मण — की प्रतिमाएँ एक ही कार्यशाला-परंपरा में बनीं। कंकाली टीला से विशाल जैन आयागपट्ट एवं तीर्थंकर प्रतिमाएँ मिली हैं। माट (मथुरा) का देवकुल कुषाण राजप्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है — यहीं से कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा मिली, जिस पर "महाराज राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क" उत्कीर्ण है। मथुरा की चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर की प्रतिमाएँ सारनाथ, श्रावस्ती एवं कौशांबी तक निर्यात हुईं। राजकीय संग्रहालय, मथुरा इस कला का सबसे बड़ा भंडार है।

मथुरा बनाम गांधार — यहीं सबसे ज्यादा गलती होती है

याद रखने की कुंजी: गांधार = विदेशी रूप, आध्यात्मिक भाव, सादा प्रभामंडल, केवल बौद्ध। मथुरा = देशज रूप, सांसारिक ऊर्जा, अलंकृत प्रभामंडल, तीनों धर्म।
अक्सर पूछा जाने वाला विवादित बिंदु: "बुद्ध की प्रथम मूर्ति किसने बनाई?" — विद्वानों में मतभेद है। एक वर्ग गांधार को प्राथमिकता देता है, दूसरा मथुरा को; अधिकांश आधुनिक विद्वान मानते हैं कि दोनों में लगभग समकालीन एवं स्वतंत्र रूप से बुद्ध का मानव-रूपण हुआ। परीक्षा में यदि "गांधार एवं मथुरा दोनों" विकल्प हो तो वही सुरक्षित है।
एक और भेद: गांधार में जैन या हिंदू प्रतिमाएँ नहीं मिलतीं — यह कथन सही है।

4.3 गुप्त मूर्तिकला — शास्त्रीय चरम

गुप्त काल में मथुरा की स्थूलता और गांधार का विदेशीपन दोनों संतुलित होकर एक संयत, आध्यात्मिक एवं परिष्कृत शैली बनी। इसे भारतीय मूर्तिकला का "शास्त्रीय चरण" कहा जाता है।

4.4 मध्यकालीन एवं दक्षिण भारतीय मूर्तिकला

परंपराकाल/क्षेत्रपहचान
पाल8वीं–12वीं शताब्दी, बंगाल–बिहारकाला बेसाल्ट/क्लोराइट पत्थर, अत्यंत चमकदार; बौद्ध तांत्रिक देवता (तारा, मारीचि); नालंदा एवं कुर्किहार कांस्य; शिल्पी धीमान एवं वीतपाल
चोल कांस्य9वीं–13वीं शताब्दी, तमिलनाडुनीचे विस्तार से
होयसल12वीं–13वीं शताब्दी, कर्नाटकसोपस्टोन; आभूषणों का सूक्ष्मतम उत्कीर्णन; मदनिकाएँ/शिलाबालिकाएँ; शिल्पी-हस्ताक्षर
विजयनगर14वीं–16वीं शताब्दीविशाल स्तंभों पर यालि (पौराणिक सिंह) एवं अश्वारोही; उग्र नरसिंह (हम्पी); लेपाक्षी का नंदी
गुर्जर-प्रतिहार एवं चंदेल8वीं–12वीं शताब्दी, मध्य भारतखजुराहो की सुरसुंदरी, अप्सरा एवं मिथुन प्रतिमाएँ; लयात्मक देह-भंगिमा

4.5 चोल कांस्य — मधूच्छिष्ट विधान

चोल कांस्य भारतीय धातु-मूर्तिकला का शिखर हैं। ये मंदिर में स्थिर प्रतिमा नहीं, बल्कि उत्सव-मूर्तियाँ (उत्सव बेर) थीं, जिन्हें जुलूस में निकाला जाता था — इसीलिए ये हल्की, संतुलित और सुडौल हैं।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की शैलियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. गांधार शैली की बुद्ध-प्रतिमाओं पर यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
2. मथुरा शैली में मुख्यतः चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)गांधार शैली में बुद्ध की प्रतिमाएँ यूनानी-रोमन अनुपात, लहरदार केश तथा वस्त्रों की सिलवटों के साथ गढ़ी गईं और इनमें प्रायः नीले-धूसर स्लेटी पत्थर का प्रयोग हुआ। मथुरा शैली पूर्णतः स्वदेशी परंपरा से विकसित हुई और उसमें सीकरी की खानों का चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर प्रयुक्त हुआ। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): गांधार शैली में बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाओं का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ।
कारण (R): गांधार शैली की अधिकांश प्रतिमाएँ नीले-धूसर स्लेटी पत्थर (schist) में गढ़ी गईं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)गांधार शैली महायान के उदय तथा यूनानी-रोमन प्रभाव के कारण बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाओं के लिए विख्यात है, अतः (A) सही है। नीले-धूसर स्लेटी पत्थर का प्रयोग भी इस शैली का लक्षण है, अतः (R) भी सही है। किन्तु पत्थर का चयन प्रतिमा-निर्माण की परंपरा का कारण नहीं है — यह केवल माध्यम है। अतः (R), (A) की व्याख्या नहीं करता।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): चोलकालीन कांस्य प्रतिमाओं का निर्माण 'मधूच्छिष्ट विधान' (lost-wax process) से किया जाता था।
कारण (R): इस विधि में पहले मोम का प्रतिरूप बनाकर उस पर मिट्टी का आवरण चढ़ाया जाता है और तपाने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है, जिससे बना खोखला साँचा धातु से भर दिया जाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)चोलकालीन नटराज आदि कांस्य प्रतिमाएँ 'मधूच्छिष्ट विधान' अर्थात् लुप्त-मोम (cire perdue) पद्धति से ढाली जाती थीं। इसमें मोम की आकृति पर मिट्टी चढ़ाकर तपाया जाता है, मोम पिघलकर निकल जाता है और रिक्त साँचे में पंचलोह भरकर प्रतिमा बनाई जाती है; साँचा तोड़ना पड़ता है इसलिए प्रत्येक प्रतिमा अद्वितीय होती है। अतः (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

5. चित्रकला — भित्ति चित्र, लघुचित्र, आधुनिक एवं लोक शैलियाँ

5.1 प्रागैतिहासिक एवं भित्ति चित्र (Murals)

भारतीय चित्रकला की सबसे पुरानी कड़ी भीमबेटका (रायसेन, मध्य प्रदेश) के शैलाश्रय हैं — लगभग 750 शैलाश्रयों में मध्यपाषाण काल से मध्यकाल तक के चित्र; प्रमुख रंग गेरू (लाल) एवं सफेद; विषय — शिकार, नृत्य, पशु। UNESCO सूची में 2003 में शामिल। (उत्तर प्रदेश में भी मिर्जापुर–सोनभद्र क्षेत्र के लिखुनिया, कोहबर एवं विजयगढ़ के शैलचित्र इसी परंपरा के हैं।)

पद्मपाणि — अजंता गुफा 1

पद्मपाणि बोधिसत्व, अजंता
  • टेम्पेरा / फ्रेस्को-सेक्को — सूखे प्लास्टर पर
  • रेखा एवं भाव प्रधान, छाया-प्रकाश; वाकाटक हरिषेण
  • चित्र गुफा 1, 2, 16, 17 में; “मरणासन्न राजकुमारी” गुफा 16

Public domain · Unknown authorUnknown author

मुगल लघुचित्र

मुगल लघुचित्र
  • दरबारी, धर्मनिरपेक्ष, यथार्थवादी — देवता नहीं
  • अकबर — तस्वीरखाना, दसवंत, बसावन
  • जहाँगीर — मंसूर “नादिर-उल-अस्र”, अबुल हसन “नादिर-उज-जमाँ”

Public domain · Unknown authorUnknown author

कांगड़ा — पहाड़ी का चरमोत्कर्ष

कांगड़ा शैली का चित्र
  • कोमल गीतात्मकता, हरे-नीले परिदृश्य
  • राजा संसार चंद; गीतगोविंद, बिहारी सतसई
  • क्रम — बसोहली (भृंग-पंख जड़ाई) → गुलेर (नैनसुख) → कांगड़ा

Public domain · Attributed to either Bassia, the brother of Purkhu, or Bassia's son Shiba

मधुबनी / मिथिला — बिहार

मधुबनी चित्रकला
  • रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जाता — अचूक पहचान
  • दीवार-आँगन पर, प्रायः स्त्रियों द्वारा; कोहबर
  • सीता देवी, गंगा देवी, बउआ देवी

CC BY-SA 3.0 · Rohini

वारली — महाराष्ट्र

वारली चित्रकला
  • गेरुई पृष्ठभूमि पर केवल सफेद (चावल का लेप)
  • आकृतियाँ त्रिकोण + वृत्त + रेखा से
  • केंद्र में तारपा नृत्य का घेरा; जिव्या सोमा मशे

CC BY-SA 4.0 · Omrmankar

तालिका 5.1 — प्रमुख भित्ति-चित्र स्थल (सुमेलन-योग्य)
स्थलराज्यधर्म / संरक्षकप्रसिद्ध चित्र एवं विशेषता
अजंतामहाराष्ट्रबौद्ध; सातवाहन एवं वाकाटक (हरिषेण)तकनीक — टेम्पेरा / फ्रेस्को-सेक्को (सूखे प्लास्टर पर); चित्र मुख्यतः गुफा 1, 2, 16, 17 में। प्रसिद्ध — पद्मपाणि एवं वज्रपाणि बोधिसत्व (गुफा 1), मरणासन्न राजकुमारी (Dying Princess) तथा महाजनक जातक (गुफा 16), सिंहल अवदान एवं "माता-शिशु के समक्ष बुद्ध" (गुफा 17)। रेखा एवं भाव-प्रधान; छाया-प्रकाश का प्रयोग।
बाघमध्य प्रदेश (धार)बौद्ध; गुप्तोत्तरअजंता से अधिक लौकिक/सांसारिक विषय; गुफा 4 "रंगमहल" का नृत्य-दृश्य प्रसिद्ध; चित्र अब ग्वालियर संग्रहालय में स्थानांतरित
सित्तनवासलतमिलनाडु (पुदुक्कोट्टै)जैन; पांड्य (7वीं शताब्दी)समवसरण तथा कमल-सरोवर का दृश्य — कमल तोड़ते व्यक्ति, हंस, भैंसे, हाथी; "जैन अजंता"
बादामीकर्नाटकहिंदू; चालुक्य (मंगलेश)गुफा 3 में भित्ति चित्र के अवशेष — अजंता परंपरा का दक्षिणी विस्तार
अर्मामलै एवं तिरुमलैपुरमतमिलनाडुजैन/हिंदू; पांड्यपांड्यकालीन भित्ति-चित्र
पनमलै एवं कांचीपुरम (कैलासनाथ)तमिलनाडुपल्लवपल्लवकालीन भित्ति-चित्र के अवशेष
बृहदेश्वर, तंजावुरतमिलनाडुचोलप्रदक्षिणापथ की दीवारों पर चोल भित्ति-चित्र, जिन पर बाद में नायक चित्र चढ़ा दिए गए
लेपाक्षी (वीरभद्र मंदिर)आंध्र प्रदेशविजयनगरछत पर भारत का सबसे बड़ा भित्ति-चित्र-फलक; रेखा-प्रधान, चटख रंग, कोई छाया नहीं
मट्टनचेरी पैलेसकेरल (कोच्चि)केरल शैलीरामायण-आधारित भित्ति चित्र; गाढ़े लाल-हरे रंग

5.2 लघुचित्र (Miniature) परंपराओं का आरंभ

परंपराकाल/क्षेत्रविशेषता
पाल शैली11वीं–12वीं शताब्दी; बंगाल–बिहारभारत की प्राचीनतम लघुचित्र परंपरा; ताड़-पत्र पर; बौद्ध ग्रंथों के सचित्र पन्ने — अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता; लयात्मक रेखा, हल्के रंग; नालंदा-विक्रमशिला से जुड़ी; 13वीं शताब्दी में विनाश के बाद नेपाल-तिब्बत में जीवित रही
जैन / अपभ्रंश / पश्चिम भारतीय शैली12वीं–16वीं शताब्दी; गुजरात, राजस्थान, मालवापहले ताड़-पत्र, फिर कागज पर; ग्रंथ — कल्पसूत्र तथा कालकाचार्य कथा; अचूक पहचान — चेहरा अर्ध-पार्श्व में पर दूर वाली आँख बाहर निकली हुई (protruding farther eye), कोणीय आकृतियाँ, स्वर्ण एवं अल्ट्रामरीन का प्रचुर प्रयोग

5.3 मुगल चित्रकला के चरण

मुगल चित्रकला फारसी सफावी परंपरा और भारतीय शैली के संगम से बनी। इसकी मूल प्रकृति दरबारी, धर्मनिरपेक्ष एवं यथार्थवादी है — देवी-देवता नहीं, बल्कि राजा, युद्ध, शिकार, दरबार, व्यक्तिचित्र और प्रकृति।

तालिका 5.2 — मुगल चित्रकला: शासक ↔ विशेषता ↔ चित्रकार (कालक्रम-योग्य)
शासकविशेषताप्रमुख ग्रंथ एवं चित्रकार
हुमायूँबीजारोपण — फारस से दो चित्रकार लायामीर सैयद अली तथा ख्वाजा अब्दुस समद; दास्तान-ए-अमीर हम्जा (हम्जानामा) का आरंभ
अकबर (1556–1605)संस्थागत रूप — तस्वीरखाना की स्थापना; भारतीय चित्रकारों की प्रधानता; परिप्रेक्ष्य (perspective) एवं आकृति-मॉडलिंग का आरंभ; संस्कृत ग्रंथों का सचित्र अनुवादहम्जानामा (1400 चित्र, कपड़े पर), तूतीनामा, रज्मनामा (महाभारत का फारसी अनुवाद), रामायण, अकबरनामा। चित्रकार — दसवंत (अबुल फजल के अनुसार सर्वश्रेष्ठ), बसावन, केसू दास, मिस्किन, लाल, दौलत
जहाँगीर (1605–27)स्वर्णयुग — ग्रंथ-चित्रण घटा, एकल चित्र एवं मुरक्का (एल्बम) बढ़े; प्रकृति-अध्ययन (पशु-पक्षी-पुष्प) का चरम; प्रभामंडल (halo) युक्त सम्राट-चित्र; अलंकृत हाशिया (हाशिया-कारी)उस्ताद मंसूर — उपाधि "नादिर-उल-अस्र"; साइबेरियन सारस एवं डोडो पक्षी के चित्र। अबुल हसन — उपाधि "नादिर-उज-जमाँ"बिशनदास — व्यक्तिचित्र (portrait) में अद्वितीय, शाह अब्बास का चित्र बनाने ईरान भेजा गया। साथ ही मनोहर, गोवर्धन, फारुख बेग
शाहजहाँ (1628–58)तकनीकी उत्कृष्टता किंतु भाव-शैथिल्य; स्वर्ण का अत्यधिक प्रयोग, ठंडे-चमकीले रंग, औपचारिक दरबारी दृश्य; सियाही-कलम (pen drawing) लोकप्रियपादशाहनामा; चित्रकार — मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर, अनूपचित्तर, चित्रमणि, बिचित्र
औरंगजेब (1658–1707)पतन — राजकीय संरक्षण समाप्त; चित्रकार प्रांतीय एवं राजपूत दरबारों में बिखरे — इसी से राजस्थानी, पहाड़ी एवं अवध शैलियाँ समृद्ध हुईं
मुहम्मद शाह "रंगीला" (1719–48)अल्पकालिक पुनरुत्थानचित्रकार — निधामल एवं चित्रमन
उपाधियों का ट्रैप

उस्ताद मंसूर = "नादिर-उल-अस्र" (युग का अद्वितीय) — पशु-पक्षी चित्रण।
अबुल हसन = "नादिर-उज-जमाँ" (समय का अद्वितीय) — जहाँगीरनामा का आवरण-चित्र।
दोनों जहाँगीर के दरबार में थे और दोनों उपाधियाँ इतनी मिलती-जुलती हैं कि UPPSC इन्हें आपस में बदलकर "सही सुमेलित नहीं है" प्रश्न बनाता है। साथ में याद रखें — बिशनदास = व्यक्तिचित्र, दसवंत = अकबर का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार

5.4 राजस्थानी (राजपूत) चित्रशैलियाँ

मुगल शैली के विपरीत राजस्थानी चित्रकला धार्मिक एवं काव्यात्मक है — कृष्ण-लीला, रागमाला, बारहमासा, नायिका-भेद, ऋतु-वर्णन। रंग चटख एवं सपाट, परिप्रेक्ष्य नहीं।

तालिका 5.3 — राजस्थानी शैली ↔ संरक्षक ↔ पहचान
शैलीप्रमुख संरक्षकप्रमुख चित्रकारपहचान / विषय
मेवाड़ (उदयपुर)महाराणा अमर सिंह प्रथम, जगत सिंहसाहिबदीन, मनोहरचावंड में 1605 की रागमाला शृंखला; रामायण, भागवत, रसिकप्रिया; चटख लाल-पीला, गोल चेहरे बड़ी आँखें
बूँदीभाव सिंह/भोज सिंह (हाड़ा), राव छत्रसालचुनार रागमाला (1591) — मुगल-प्रशिक्षित चित्रकारों द्वारा चुनार (उत्तर प्रदेश) में बनी, जिसने बूँदी शैली को जन्म दिया; सघन वनस्पति एवं जल-दृश्य, आम-केला-ताड़ के वृक्ष, गहरा नीला-हरा आकाश
कोटामहाराव राम सिंह, उम्मेद सिंहशिकार-दृश्य (shikar) का चरम — हाथी, बाघ, घने वन
किशनगढ़राजा सावंत सिंह (नागरीदास), 18वीं शताब्दीनिहालचंदबणी-ठणी — "भारतीय मोनालिसा"; लंबा तीखा नाक-नक्श, धनुषाकार भौंहें, कमलनयन, लंबी उँगलियाँ; राधा-कृष्ण के रूप में सावंत सिंह एवं बणी-ठणी
मारवाड़/जोधपुरमालदेव, जसवंत सिंहढोला-मारू; लोक-तत्व प्रबल; अश्व-प्रेम
बीकानेरराजा अनूप सिंह, करण सिंहअली रजा, रुकनुद्दीनमुगल एवं दक्कनी प्रभाव सर्वाधिक; कोमल रंग
आमेर–जयपुरसवाई प्रताप सिंह, जयसिंहसाहिबरामविशाल आकार के व्यक्तिचित्र; कृष्ण-रास; मुगल प्रभाव
उत्तर प्रदेश संदर्भ — चुनार रागमाला

राजस्थानी चित्रकला की सबसे पुरानी प्रामाणिक कड़ी उत्तर प्रदेश में बनी! 1591 में बूँदी के हाड़ा शासक भोज सिंह, जो उस समय अकबर की सेवा में चुनार (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) में तैनात थे, ने मुगल कार्यशाला में प्रशिक्षित चित्रकारों से एक रागमाला शृंखला बनवाई। यही "चुनार रागमाला" आगे चलकर बूँदी एवं कोटा शैलियों का आदि-प्रतिमान बनी। इसी तरह अवध/लखनऊ शैली (नवाबों के संरक्षण में; मीर कलाँ खाँ, फैजुल्लाह) तथा फर्रुखाबाद एवं मुर्शिदाबाद मुगलोत्तर प्रांतीय शैलियाँ हैं।

5.5 पहाड़ी चित्रशैलियाँ

तालिका 5.4 — पहाड़ी उप-शैलियाँ ↔ राज्य ↔ संरक्षक/चित्रकार
शैलीस्थानसंरक्षक / चित्रकारपहचान
बसोहलीजम्मू क्षेत्रराजा कृपाल पाल; चित्रकार देवीदासपहाड़ी शैली की प्राचीनतम कड़ी (17वीं शताब्दी उत्तरार्ध); चमकीला लाल-पीला, बड़ी कमल-नयन आँखें, भृंग-पंख (beetle wing) की जड़ाई से आभूषण; रसमंजरी तथा गीतगोविंद
गुलेरहिमाचल प्रदेशराजा गोवर्धन चंद; चित्रकार-परिवार पंडित सेऊ, नैनसुख एवं मानकूबसोहली की उग्रता से कांगड़ा की कोमलता तक का सेतु; मुगल-प्रभावित प्राकृतिक रंग, संयत रेखा
कांगड़ाहिमाचल प्रदेशराजा संसार चंद (18वीं–19वीं शताब्दी)पहाड़ी शैली का चरमोत्कर्ष; कोमल गीतात्मकता, हरे-नीले प्राकृतिक परिदृश्य; गीतगोविंद, बिहारी सतसई, नल-दमयंती, बारहमासा
गढ़वालउत्तराखंडचित्रकार मोलारामऔरंगजेब से भागकर आए मुगल चित्रकार श्यामदास–हरदास वंश से आरंभ; मोलाराम कवि भी थे
चंबा, मंडी, कुल्लू, नूरपुर, बिलासपुरहिमाचल प्रदेशचंबा — लोक + मुगल मिश्रण; मंडी — शैव विषय, भारी आकृतियाँ; कुल्लू — लोक-शैली प्रधान

5.6 दक्कनी, कंपनी एवं आधुनिक चित्रकला

दक्कनी चित्रकला (Deccani School)
कंपनी शैली (Company School), 18वीं–19वीं शताब्दी
तालिका 5.5 — आधुनिक भारतीय चित्रकला (कलाकार ↔ योगदान)
कलाकार / आंदोलनकालयोगदान
राजा रवि वर्मा1848–1906, त्रावणकोरयूरोपीय तैल-चित्र एवं यथार्थवाद से पौराणिक विषय; ओलियोग्राफ प्रेस से देवी-देवताओं के चित्र घर-घर पहुँचाए; "शकुंतला", "हंस-दमयंती", "उर्वशी-पुरुरवा"
बंगाल स्कूल (नव-भारतीय शैली)1900 के दशक सेपाश्चात्य अकादमिक यथार्थवाद के विरुद्ध स्वदेशी प्रतिक्रिया; प्रेरणा — अजंता, मुगल-राजपूत लघुचित्र एवं जापानी वॉश तकनीक। प्रेरक — ई. बी. हैवेल (कलकत्ता कला विद्यालय के प्राचार्य)
अवनींद्रनाथ टैगोर1871–1951बंगाल स्कूल के जनक; "भारत माता" (1905, बंग-भंग के दौर में) — चार भुजाओं में वेद, धान की बालियाँ, श्वेत वस्त्र एवं जपमाला; "शाहजहाँ का अंतिम समय"
नंदलाल बोस1882–1966अवनींद्रनाथ के शिष्य; शांतिनिकेतन (कला भवन) के प्रधान; भारतीय संविधान की मूल प्रति के अलंकरण तथा हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के पोस्टर
अमृता शेरगिल1913–1941भारतीय आधुनिक कला की अग्रदूत; पेरिस-प्रशिक्षित, पर अजंता एवं लघुचित्रों से प्रेरित होकर ग्रामीण भारत की ओर मुड़ीं — "तीन कन्याएँ (Three Girls)", "ब्रह्मचारी", "दक्षिण भारतीय ग्रामीण त्रयी"
जामिनी रॉय1887–1972कालीघाट पट एवं बंगाल की लोककला से प्रेरित; सपाट रंग, मोटी काली रेखा, बड़ी बादाम-आँखें; सचेत रूप से "लोक की ओर वापसी"
रवींद्रनाथ ठाकुर1861–194160 वर्ष की आयु के बाद चित्रकला आरंभ; आदिम, अवचेतन, अभिव्यंजनावादी (expressionist) शैली
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप1947, बंबईबंगाल स्कूल के पुनरुत्थानवाद से विच्छेद; आधुनिक अंतरराष्ट्रीय भाषा। संस्थापक — एफ. एन. सूजा, एस. एच. रजा, एम. एफ. हुसैन, के. एच. आरा, एस. के. बाकरे, एच. ए. गाडे

5.7 लोक चित्रकला (Folk Painting)

तालिका 5.6 — लोक चित्रशैली ↔ राज्य ↔ पहचान (सर्वाधिक सुमेलन-योग्य)
शैलीराज्यपहचान
मधुबनी / मिथिलाबिहारघर की दीवारों एवं आँगन पर; प्रायः स्त्रियों द्वारा; रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जाता; प्राकृतिक रंग; विषय — विवाह (कोहबर), देवी-देवता। कलाकार — सीता देवी, गंगा देवी, महासुंदरी देवी, बउआ देवी
वारलीमहाराष्ट्र (ठाणे–पालघर)वारली जनजाति; केवल सफेद (चावल का लेप) रंग गेरुई पृष्ठभूमि पर; आकृतियाँ त्रिकोण + वृत्त + रेखा से; केंद्र में तारपा नृत्य का वृत्ताकार घेरा; विवाह-चित्र चौक। कलाकार — जिव्या सोमा मशे
पट्टचित्रओडिशा (एवं पश्चिम बंगाल)कपड़े/ताड़-पत्र पर; जगन्नाथ एवं वैष्णव विषय; गहरी काली रूपरेखा, अलंकृत बॉर्डर; रघुराजपुर (ओडिशा) शिल्प-ग्राम
कालीघाटपश्चिम बंगाल (कोलकाता)19वीं शताब्दी में कालीघाट मंदिर के पास पटुआ चित्रकारों द्वारा; तेज प्रवाही रेखा, न्यूनतम विवरण; देवी-देवताओं के साथ सामाजिक व्यंग्य (बाबू-संस्कृति का उपहास)
फड़ (Phad)राजस्थान (भीलवाड़ा)लंबे कपड़े के पट पर लोकदेवता पाबूजी एवं देवनारायण की गाथा; भोपा रात्रि में रावणहत्था बजाकर पट खोलकर गाते हैं — चलती-फिरती मंदिर-गाथा; जोशी परिवार पारंपरिक चित्रकार
गोंडमध्य प्रदेश (एवं छत्तीसगढ़)गोंड जनजाति; बिंदुओं एवं महीन रेखाओं (डॉट-डैश) से भरी आकृतियाँ; वृक्ष, पशु, प्रकृति-देवता। कलाकार — जनगढ़ सिंह श्याम, भज्जू श्याम
कलमकारीआंध्र प्रदेशकलम एवं प्राकृतिक रंगों से कपड़े पर; दो शैलियाँ — श्रीकालहस्ती (हस्त-चित्रित, मंदिर-आख्यान) एवं मछलीपट्टनम/पेडाना (ब्लॉक-छपाई, फारसी अभिप्राय)
चेरियल स्क्रॉलतेलंगानानक्काशी दार लंबे स्क्रॉल; कथावाचक समुदाय के लिए; चटख लाल पृष्ठभूमि; GI प्राप्त
मंजूषाबिहार (भागलपुर)बिहुला–विषहरी गाथा; गुलाबी, हरा, पीला — केवल तीन रंग; "साँप की चित्रकला"
पिछवाईराजस्थान (नाथद्वारा)श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे टाँगा जाने वाला कपड़ा; कृष्ण-लीला एवं ऋतु-चित्रण
पिथोरागुजरात एवं मध्य प्रदेश (राठवा, भील)अनुष्ठानिक भित्ति चित्र; घोड़ों की पंक्तियाँ
सौराओडिशासौरा जनजाति; इदितल भित्ति चित्र; वारली-सदृश पर बाहर से भीतर की ओर बनाए जाते हैं
थंकालद्दाख, सिक्किम, अरुणाचलबौद्ध कपड़ा-चित्र (स्क्रॉल); मंडल एवं बुद्ध-बोधिसत्व
ऐपणउत्तराखंडगेरू पृष्ठभूमि पर चावल-लेप से अनुष्ठानिक अल्पना
संझीउत्तर प्रदेश — मथुरा/वृंदावनकागज को कैंची से काटकर बने स्टेंसिल, जिनसे रंगीन चूर्ण की रंगोली बनाई जाती है; कृष्ण-लीला विषय; ब्रज की मंदिर-परंपरा
कोहबरपूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहारविवाह-कक्ष की भित्ति-चित्रकारी; कमल, बाँस, मछली — प्रजनन एवं मंगल के प्रतीक
चित्रकथीमहाराष्ट्र (पिंगुली)चित्र-पोथी दिखाकर कथा-गायन; ठाकर समुदाय
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (चित्रशैली)    (प्रसिद्ध चित्र/चित्र-शृंखला)
1. किशनगढ़ शैली — बणी-ठणी
2. बसोहली शैली — रसमंजरी
3. बूंदी शैली — हमजानामा
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)किशनगढ़ शैली का सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्र 'बणी-ठणी' है, जिसे निहालचंद से जोड़ा जाता है; पहाड़ी चित्रकला की बसोहली शैली अपनी चटख रंगों वाली 'रसमंजरी' चित्र-शृंखला के लिए विख्यात है। 'हमजानामा' अकबर की शाही चित्रशाला में तैयार हुई विशाल चित्र-शृंखला है, बूंदी शैली की नहीं — अतः युग्म 3 गलत है।

प्र.2 मुगलकालीन चित्रकला के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. उस्ताद मंसूर को जहाँगीर ने 'नादिर-उल-अस्र' की उपाधि प्रदान की।
2. अबुल हसन को 'नादिर-उज-जमाँ' की उपाधि प्राप्त थी।
3. बिशनदास को जहाँगीर ने व्यक्ति-चित्रण में अद्वितीय बताया।
4. दसवंत तथा बसावन जहाँगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 1, 2 और 3Cकेवल 2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)जहाँगीर के चित्रशाला में उस्ताद मंसूर (पशु-पक्षी चित्रण) को 'नादिर-उल-अस्र' तथा अबुल हसन को 'नादिर-उज-जमाँ' की उपाधि मिली; बिशनदास की प्रशंसा जहाँगीर ने व्यक्ति-चित्रण में अद्वितीय कहकर की। दसवंत तथा बसावन अकबर के दरबारी चित्रकार थे, जिनका उल्लेख 'आइन-ए-अकबरी' में है — अतः कथन 4 गलत है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): मुगल चित्रकला अकबर के काल में एक विशिष्ट भारतीय-ईरानी शैली के रूप में विकसित हुई।
कारण (R): हुमायूँ ईरान से मीर सैयद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद नामक चित्रकारों को अपने साथ भारत लाया था, जिन्होंने आगे चलकर अकबर के 'तस्वीरखाना' का मार्गदर्शन किया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)हुमायूँ ईरान से मीर सैयद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद को लाया; इन्हीं के निर्देशन में अकबर के तस्वीरखाने में भारतीय और ईरानी परंपराओं के मेल से मुगल चित्रकला की स्वतंत्र शैली विकसित हुई, जिसका पहला बड़ा उदाहरण 'हम्जानामा' है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

6. संगीत — हिंदुस्तानी, कर्नाटक, घराने एवं वाद्ययंत्र

तत (तंतु) — वीणा

वीणा — तत वाद्य
  • ध्वनि तार के कंपन से · Chordophone
  • सितार, सरोद, सारंगी, तानपूरा, संतूर, सुरबहार, रबाब, वायलिन

CC BY-SA 4.0 · Original: unknownPhotograph: Katharina Common

अवनद्ध — तबला

तबला — अवनद्ध वाद्य
  • ध्वनि चमड़े की झिल्ली पर आघात से · Membranophone
  • मृदंगम्, पखावज, ढोलक, नगाड़ा, खोल, डफ, कंजीरा, चेंडा

CC BY-SA 4.0 · http://muzyczny.pl

6.1 मूल अवधारणाएँ — राग, ताल, स्वर

तालिका 6.1 — प्रमुख हिंदुस्तानी ताल ↔ मात्राएँ
तालमात्राविभागप्रायः प्रयोग
तीनताल (त्रिताल)164+4+4+4खयाल, सितार — सर्वाधिक प्रचलित
दादरा63+3ठुमरी, दादरा
रूपक73+2+2 (सम पर खाली)खयाल, भजन
कहरवा84+4लोकसंगीत, फिल्मी, भजन
झपताल102+3+2+3खयाल, वाद्य
एकताल एवं चौताल12एकताल 2×6; चौताल 4+4+2+2एकताल — विलंबित खयाल; चौताल — ध्रुपद (पखावज के साथ)
धमार145+2+3+4धमार गायन — होरी

6.2 हिंदुस्तानी बनाम कर्नाटक पद्धति

तालिका 6.2 — दोनों पद्धतियों का अंतर (अत्यधिक पूछा जाता है)
आधारहिंदुस्तानीकर्नाटक
क्षेत्रउत्तर, पूर्व एवं पश्चिम भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेशतमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल
बाह्य प्रभावफारसी-अरबी-मुगल प्रभाव स्पष्टलगभग अप्रभावित — अधिक शुद्ध वैदिक-देशी परंपरा
प्रधानताराग एवं आलाप — स्वर-विस्तार प्रधानरचना (कृति) एवं साहित्य — गीत-प्रधान
ढाँचा10 थाट (भातखंडे)72 मेलकर्ता (वेंकटमखिन)
ताल-व्यवस्थाअनेक स्वतंत्र ताल (तीनताल, झपताल…)सुलादि सप्त ताल — 7 मूल ताल, जिनसे 35 (आगे 175) ताल बनते हैं; आदि ताल सर्वाधिक प्रचलित
प्रमुख गायन-शैलियाँध्रुपद, धमार, खयाल, ठुमरी, टप्पा, तराना, ग़ज़ल, कव्वालीवर्णम्, कृति/कीर्तनम्, रागम्-तानम्-पल्लवी, तिल्लाना, पदम्, जावली
मुख्य संगत वाद्यतबला (लय), तानपूरा/हारमोनियम, सारंगीमृदंगम् (लय), वायलिन, घटम्, कंजीरा, तंबूरा
घराना-व्यवस्थाहै — गायकी का पारिवारिक संप्रदायघराना-व्यवस्था नहीं; बानी/संप्रदाय परंपरा
प्रस्तुतिएकल कलाकार प्रधान; सुधार (improvisation) की अधिक स्वतंत्रतारचनाकार की रचना केंद्र में; सुधार रचना के भीतर

6.3 संगीत के प्रमुख ग्रंथ एवं व्यक्ति

तालिका 6.3 — ग्रंथ ↔ लेखक (सुमेलन-योग्य)
ग्रंथलेखकमहत्व
नाट्यशास्त्रभरत मुनिसंगीत, नृत्य एवं नाट्य का आदि-ग्रंथ; 36 अध्याय; रस-सिद्धांत; UNESCO Memory of the World Register, 2025
दत्तिलम्दत्तिलनाट्यशास्त्र के समकालीन संगीत-ग्रंथ
बृहद्देशीमतंग"राग" शब्द की प्रथम विस्तृत परिभाषा
संगीत रत्नाकरशारंगदेव (13वीं शताब्दी, यादव दरबार, देवगिरि)"सप्ताध्यायी"; हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक दोनों पद्धतियों का साझा आधार-ग्रंथ — विभाजन से ठीक पहले
चतुर्दंडी प्रकाशिकावेंकटमखिन72 मेलकर्ता पद्धति
मान कुतूहलराजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर)ध्रुपद के विकास एवं लोक-राग के शास्त्रीकरण का ग्रंथ
रागदर्पणफकीरुल्लाह (औरंगजेब काल)मान कुतूहल का फारसी रूपांतरण
किताब-ए-नौरसइब्राहीम आदिलशाह द्वितीय (बीजापुर)सरस्वती एवं गणेश की वंदना युक्त गीत-संग्रह — समन्वय का उदाहरण
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति / क्रमिक पुस्तक मालिकाविष्णु नारायण भातखंडे10 थाट पद्धति; आधुनिक स्वरलिपि; लखनऊ के मैरिस कॉलेज (अब भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय) की स्थापना
संगीत विशारद / संगीत-प्रसारविष्णु दिगंबर पलुस्करगांधर्व महाविद्यालय (1901, लाहौर) की स्थापना; "रघुपति राघव राजाराम" धुन; संगीत को सार्वजनिक मंच पर लाना
कर्नाटक संगीत की प्रमुख विभूतियाँ
हिंदुस्तानी संगीत की प्रमुख विभूतियाँ एवं शैलियाँ

6.4 घराने — संगीत की वंश-परंपरा

घराना गुरु-शिष्य परंपरा से बनी वह शैली-पहचान है जिसका नाम प्रायः उस स्थान पर पड़ा जहाँ वह जन्मी। यह केवल हिंदुस्तानी संगीत की विशेषता है।

तालिका 6.4 — घराना ↔ स्थान ↔ प्रवर्तक/प्रमुख कलाकार (सुमेलन का सर्वोत्तम विषय)
घरानास्थान / राज्यप्रवर्तकप्रमुख कलाकार / विशेषता
क. खयाल गायन
ग्वालियरमध्य प्रदेशनत्थन पीर बख्श / हद्दू-हस्सू खाँखयाल का प्राचीनतम घराना — सभी घरानों की जननी; सरल-संतुलित गायकी; विष्णु दिगंबर पलुस्कर, ओंकारनाथ ठाकुर
आगराउत्तर प्रदेशहाजी सुजान खाँध्रुपद-अंग की दमदार आवाज; फैयाज खाँ, विलायत हुसैन खाँ
किरानाकैराना (शामली), उत्तर प्रदेशबंदे अली खाँ / अब्दुल करीम खाँस्वर-लगाव एवं विलंबित आलाप की मधुरता; सवाई गंधर्व, भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, हीराबाई बड़ोदेकर, प्रभा अत्रे
जयपुर–अतरौलीअतरौली (अलीगढ़), उत्तर प्रदेश — परिवार जयपुर जा बसाअल्लादिया खाँजटिल-अप्रचलित राग, लंबी घुमावदार तानें; केसरबाई केरकर, मोगूबाई कुर्डीकर, किशोरी अमोनकर, मल्लिकार्जुन मंसूर
रामपुर–सहसवानरामपुर एवं सहसवान (बदायूँ), उत्तर प्रदेशइनायत हुसैन खाँग्वालियर एवं रामपुर-सेनिया का मेल; निसार हुसैन खाँ, गुलाम मुस्तफा खाँ, राशिद खाँ
पटियालापंजाबफतेह अली खाँ एवं अली बख्श खाँठुमरी एवं गजल-अंग; बड़े गुलाम अली खाँ, अजय चक्रवर्ती
भेंडी बाजारमुंबई, महाराष्ट्रछज्जू, नज्जू, खादिम हुसैन खाँएक साँस में लंबी तानें; अंजनीबाई मालपेकर
मेवातीराजस्थान/हरियाणा (मेवात)घग्गे नजीर खाँपं. जसराज
दिल्लीदिल्लीमामन खाँकव्वाल-बच्चों की परंपरा; तानरस खाँ
ख. तबला — छह में से चार उत्तर प्रदेश में
दिल्लीदिल्लीसिद्धार खाँ ढाढ़ीतबले का आदि-घराना; "दो उँगली का बाज" — किनार पर सूक्ष्म वादन
अजराड़ाअजराड़ा (मेरठ), उत्तर प्रदेशमीरू खाँ एवं कल्लू खाँदिल्ली से निकला; बायें की गमक एवं लयकारी
लखनऊलखनऊ, उत्तर प्रदेशमोदू खाँ एवं बख्शू खाँकथक-संगत के लिए विकसित; खुला-गूँजता बाज
फर्रुखाबादफर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेशहाजी विलायत अली खाँगत-परंपरा एवं विस्तृत रचनाएँ
बनारसवाराणसी, उत्तर प्रदेशपं. राम सहायपखावज-अंग का ओजस्वी एकल वादन; किशन महाराज, समता प्रसाद (गुदई महाराज)
पंजाबलाहौर/पंजाबकादिर बख्शपखावज परंपरा से रूपांतरित; अल्ला रक्खा एवं जाकिर हुसैन
ग. वाद्य एवं कथक घराने
मैहर (वाद्य)मध्य प्रदेशउस्ताद अलाउद्दीन खाँरविशंकर (सितार), अली अकबर खाँ (सरोद), अन्नपूर्णा देवी (सुरबहार), निखिल बनर्जी
इमदादखानी / एटावा (सितार-सुरबहार)इटावा, उत्तर प्रदेशइमदाद खाँगायकी अंग; विलायत खाँ, इमरत खाँ, शाहिद परवेज
लखनऊ (कथक)लखनऊ, उत्तर प्रदेशईश्वरी प्रसाद / ठाकुर प्रसाद-वंशभाव एवं अभिनय प्रधान; बिंदादीन महाराज, अच्छन–लच्छू–शंभू महाराज, बिरजू महाराज
जयपुर (कथक)राजस्थानभानूजीतत्कार, चक्कर एवं लयकारी प्रधान; सुंदर प्रसाद, दुर्गालाल
बनारस (कथक)वाराणसी, उत्तर प्रदेशजानकीप्रसाद"नटवरी" नृत्य; सम पर विशेष बल; सितारा देवी, गोपीकृष्ण
रायगढ़ (कथक)छत्तीसगढ़राजा चक्रधर सिंहसबसे नया कथक घराना; नर्तन सर्वस्व ग्रंथ
उत्तर प्रदेश संदर्भ — घरानों की धरती

हिंदुस्तानी संगीत का भौगोलिक केंद्र उत्तर प्रदेश है। तबले के छह प्रमुख घरानों में से चार — अजराड़ा (मेरठ), लखनऊ, फर्रुखाबाद एवं बनारस — उत्तर प्रदेश में जन्मे। खयाल के किराना (कैराना, शामली), आगरा, रामपुर–सहसवान तथा जयपुर–अतरौली (अतरौली, अलीगढ़) घराने भी यहीं के हैं। बनारस ठुमरी एवं शहनाई (उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ — भारत रत्न) का घर है; लखनऊ कथक के लखनऊ घराने और भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय का। ब्रज (वृंदावन) के स्वामी हरिदास तानसेन के गुरु माने जाते हैं, और अष्टछाप कवि-संगीतकारों की हवेली-संगीत परंपरा यहीं विकसित हुई।

6.5 वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण

भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में दिया गया चार-भागीय वर्गीकरण आज भी मानक है — और यह UPPSC का पक्का सुमेलन-विषय है।

तालिका 6.5 — वाद्ययंत्र ↔ वर्ग (चार वर्ग)
वर्गसिद्धांतपाश्चात्य नामउदाहरण
तत / ततः (तंतु वाद्य)तार के कंपन से ध्वनिChordophoneवीणा, सितार, सरोद, सारंगी, तानपूरा, संतूर, रुद्र वीणा, सरस्वती वीणा, विचित्र वीणा, एकतारा, दिलरुबा, इसराज, रबाब, वायलिन, सुरबहार, रावणहत्था
सुषिरवायु के कंपन से ध्वनि (फूँक वाद्य)Aerophoneबाँसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, पुंगी/बीन, अलगोजा, मशक, हारमोनियम (रीड के कारण), शंख, तुरही
अवनद्ध / आनद्धखींची हुई चमड़े की झिल्ली पर आघातMembranophoneतबला, मृदंगम्, पखावज, ढोलक, ढोल, नगाड़ा, दमरू, खोल, डफ, कंजीरा, चेंडा, तवील, डमामा
घनठोस वस्तु स्वयं कंपित — कोई झिल्ली या तार नहीं; सुर मिलाने की आवश्यकता नहींIdiophoneमंजीरा, झाँझ, घटम्, जलतरंग, चिमटा, खड़ताल, मोरसिंग (जेव्स हार्प), घुँघरू, घंटा, करताल, थाली
वाद्य-वर्गीकरण के तीन क्लासिक जाल
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (वाद्ययंत्र)    (वर्ग)
1. सितार — तत् (तंतु) वाद्य
2. शहनाई — घन वाद्य
3. मंजीरा — अवनद्ध वाद्य
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)भारतीय परंपरा में वाद्य चार वर्गों में बाँटे जाते हैं — तत् (तंतु), सुषिर (फूँक वाले), अवनद्ध (चर्म-मढ़े) तथा घन (ठोस, आघात से बजने वाले)। सितार तत् वाद्य है, अतः युग्म 1 सही है। शहनाई सुषिर वाद्य है और मंजीरा घन वाद्य, अवनद्ध नहीं। अतः केवल युग्म 1 सही सुमेलित है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (संगीत ग्रंथ)    (रचनाकार)
1. संगीत रत्नाकर — अमीर खुसरो
2. मानकुतूहल — राजा मानसिंह तोमर
3. रागदर्पण — फकीरुल्लाह
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 3Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)'संगीत रत्नाकर' शारंगदेव की रचना है, जो देवगिरि के यादव दरबार से संबद्ध थे — अमीर खुसरो की नहीं; अतः युग्म 1 सुमेलित नहीं है। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर से 'मानकुतूहल' तथा फकीरुल्लाह से इसका फारसी रूपांतर 'रागदर्पण' जुड़ा है, अतः युग्म 2 एवं 3 सही हैं।

प्र.3 कर्नाटक संगीत की 'त्रिमूर्ति' (Trinity) में निम्नलिखित में से कौन सम्मिलित हैं?
1. पुरंदरदास
2. मुत्तुस्वामी दीक्षितर
3. श्यामा शास्त्री
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति में त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर तथा श्यामा शास्त्री सम्मिलित हैं, जो 18वीं-19वीं शताब्दी में हुए। पुरंदरदास को कर्नाटक संगीत का 'पितामह' कहा जाता है क्योंकि उन्होंने इसकी शिक्षण-पद्धति व अभ्यास-क्रम को व्यवस्थित किया, किन्तु वे त्रिमूर्ति में नहीं गिने जाते। अतः केवल 2 तथा 3 सही हैं।

7. नृत्य — आठ शास्त्रीय नृत्य एवं लोकनृत्य

भरतनाट्यम् — तमिलनाडु

भरतनाट्यम्
  • मुद्रा अरमंडी, स्थिर धड़, रेखागणितीय; एकाहार्य
  • मूल सदिर/दासीअट्टम; क्रम अलारिप्पु→वर्णम्→तिल्लाना
  • ग्रंथ अभिनय दर्पण; तंजौर चौकड़ी; रुक्मिणी देवी अरुंडेल

CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook

कथक — उत्तर प्रदेश

कथक
  • सीधा धड़, खड़े पैर; तत्कार एवं चक्कर; घुँघरू सर्वाधिक
  • एकमात्र नृत्य जिस पर फारसी-मुगल प्रभाव; संगीत हिंदुस्तानी
  • घराने — लखनऊ, जयपुर, बनारस, रायगढ़; बिरजू महाराज

CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi

कथकली — केरल

कथकली
  • विशाल चुट्टी मुख-सज्जा; पच्चा (हरा, नायक), कत्ति, ताड़ी, करी, मिनुक्कु
  • नृत्य-नाटिका; परंपरागत रूप से केवल पुरुष; नेत्र-अभिनय
  • वाद्य चेंडा-मद्दलम्; वल्लत्तोल — केरल कलामंडलम् (1930)

CC BY-SA 4.0 · Vis M

कुचिपुड़ी — आंध्र प्रदेश

कुचिपुड़ी
  • तरंगम् — थाली के किनारों पर नृत्य, सिर पर जल-कलश
  • सिद्धेंद्र योगी; मूलतः पुरुष भागवतुलु परंपरा
  • कलाकार बोलता एवं गाता भी है; भामाकलापम्

CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook

ओडिसी — ओडिशा

ओडिसी
  • त्रिभंग एवं चौक — अचूक पहचान; अत्यंत मूर्तिवत्
  • महरी (देवदासी) एवं गोटीपुआ परंपराएँ
  • विषय गीतगोविंद; ग्रंथ अभिनय चंद्रिका; केलुचरण महापात्र

CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook

मणिपुरी — मणिपुर

मणिपुरी
  • घुँघरू नहीं, पैर का प्रहार नहीं; गति गोलाकार
  • स्त्री-वेश पोतलोई (बेलनाकार घाघरा); रास लीला
  • पुंग चोलोम; लाई हराओबा; संकीर्तन UNESCO 2013

CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi

मोहिनीअट्टम् — केरल

मोहिनीअट्टम
  • श्वेत-स्वर्ण कसावु साड़ी, बायीं ओर जूड़ा; अंदोलिका गति
  • लास्य-प्रधान, एकल, स्त्री-नृत्य; संगीत सोपान
  • स्वाति तिरुनाल; कल्याणिकुट्टी अम्मा

CC BY-SA 4.0 · Shagil Kannur

सत्रिया — असम

सत्रीया
  • शंकरदेव द्वारा; सत्र में भोकोत द्वारा
  • अंकीया नाट एवं भाओना; वाद्य खोल
  • 2000 में मान्यता — सबसे नवीनतम

CC BY-SA 4.0 · Joydeep Chakraborty

कथक — उ.प्र. सत्रिया — असम मणिपुरी — मणिपुर ओडिसी — ओडिशा कुचिपुड़ी — आं.प्र. भरतनाट्यम् — त.नाडु कथकली — केरल मोहिनीअट्टम् — केरल
दक्षिण भारतउत्तर भारतपूर्व एवं पूर्वोत्तर
आठों शास्त्रीय नृत्य मानचित्र पर — केरल अकेला दो नृत्य देता है (कथकली एवं मोहिनीअट्टम्), और कथक एकमात्र उत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य है। कुचिपुड़ी कृष्णा जिले के उसी नाम के गाँव से, सत्रिया असम के सत्रों से।

7.1 नाट्यशास्त्र एवं नृत्य के सिद्धांत

7.2 आठ शास्त्रीय नृत्य — केंद्रीय सुमेलन तालिका

तालिका 7.1 — शास्त्रीय नृत्य ↔ राज्य ↔ विशेषता ↔ प्रमुख कलाकार
नृत्यराज्यउद्गम एवं विशेषताप्रमुख कलाकार
भरतनाट्यम्तमिलनाडुमंदिर की सदिर/दासीअट्टम परंपरा से; एकाहार्य एकल नृत्य; अरमंडी (अर्ध-बैठक) मुद्रा; रेखागणितीय, स्थिर धड़; "अग्नि का नृत्य"। क्रम — अलारिप्पु → जतिस्वरम् → शब्दम् → वर्णम् → पदम् → तिल्लाना। तंजौर चौकड़ी (चिन्नैया, पोन्नैया, शिवानंदम, वडिवेलु) ने इसे वर्तमान क्रम दिया। संगीत — कर्नाटक; संचालक नट्टुवनाररुक्मिणी देवी अरुंडेल (कलाक्षेत्र की संस्थापिका; पुनरुद्धारक), बालसरस्वती, यामिनी कृष्णमूर्ति, पद्मा सुब्रह्मण्यम्, मृणालिनी एवं मल्लिका साराभाई, अलार्मेल वल्ली
कथकउत्तर प्रदेश एवं उत्तर भारत"कथा कहने वाले कथिक" से; मंदिर से दरबार तक गया — एकमात्र शास्त्रीय नृत्य जिस पर फारसी-मुगल प्रभाव है; सीधा धड़, खड़े पैर (कोई अर्ध-बैठक नहीं); तत्कार (पद-संचालन), चक्कर (घुमाव), आमद–तोड़ा–तिहाई; संगीत — हिंदुस्तानी; घुँघरू की संख्या सर्वाधिक। घराने — लखनऊ (भाव), जयपुर (लय), बनारस, रायगढ़बिंदादीन महाराज, अच्छन महाराज, शंभू महाराज, लच्छू महाराज, बिरजू महाराज, सितारा देवी, गोपीकृष्ण, दमयंती जोशी, कुमुदिनी लाखिया, शोवना नारायण
कथकलीकेरल"कथा + कली (खेल)" — नृत्य-नाटिका; रामनाट्टम एवं कृष्णनाट्टम से विकसित; परंपरागत रूप से केवल पुरुष; विस्तृत चुट्टी (मुखौटा-सदृश मुख-सज्जा) एवं भारी वेशभूषा; पात्र-वर्ग — पच्चा (हरा — नायक), कत्ति (खल), ताड़ी, करी, मिनुक्कु; नेत्र-अभिनय प्रधान; गायन — सोपान/मणिप्रवालम्; वाद्य — चेंडा, मद्दलम्।वल्लत्तोल नारायण मेनन (1930 में केरल कलामंडलम् की स्थापना), कलामंडलम् कृष्णन नायर, कलामंडलम् गोपी, कोट्टक्कल शिवरामन
कुचिपुड़ीआंध्र प्रदेशकृष्णा जिले के कुचिपुड़ी ग्राम से; सिद्धेंद्र योगी द्वारा वर्तमान रूप; मूलतः भागवतुलु (ब्राह्मण पुरुष) द्वारा नृत्य-नाटिका; प्रवेश में दारुवु एवं पात्र स्वयं परिचय देता है; प्रसिद्ध — तरंगम् (पीतल की थाली के किनारों पर नृत्य, सिर पर जल-कलश) एवं भामाकलापम् (सत्यभामा)। नृत्य + संवाद + गायन तीनों।सिद्धेंद्र योगी (प्रवर्तक), वेम्पति चिन्ना सत्यम्, राजा एवं राधा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति, शोभा नायडू, स्वप्नसुंदरी
ओडिसीओडिशाउदयगिरि की रानीगुम्फा एवं मंदिर-मूर्तियों से निरंतरता; दो परंपराएँ — महरी (देवदासी) एवं गोटीपुआ (स्त्री-वेश में बालक); दो मूल भंगिमाएँ — त्रिभंग (शरीर तीन जगह से मुड़ा — ओडिसी की अचूक पहचान) एवं चौक; अत्यंत मूर्तिवत् (sculpturesque); मुख्य विषय जयदेव का गीतगोविंद; ग्रंथ — अभिनय चंद्रिकाकेलुचरण महापात्र, पंकज चरण दास, संजुक्ता पाणिग्रही, सोनल मानसिंह, माधवी मुद्गल, प्रोतिमा बेदी
मणिपुरीमणिपुरअत्यंत कोमल, तरल एवं गोलाकार गति; पैरों का प्रहार नहीं तथा घुँघरू नहीं — भूमि पर सबसे हल्का नृत्य; चेहरे के भाव संयत; रास लीला (कृष्ण) प्रधान; स्त्री-वेश कुम्मिल/पोतलोई (बेलनाकार घाघरा); पुरुष-अंग पुंग चोलोम एवं ढोल चोलोम; प्राक्-वैष्णव रूप लाई हराओबा; संकीर्तन UNESCO अमूर्त विरासत (2013)।गुरु बिपिन सिंह, झावेरी बहनें (नयना, रंजना, सुवर्णा, दर्शना), गुरु अमूबी सिंह। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे शांतिनिकेतन में सिखाना आरंभ कराया।
मोहिनीअट्टम्केरल"मोहिनी का नृत्य"; लास्य-प्रधान, एकल, स्त्री-नृत्य; श्वेत-स्वर्ण कसावु साड़ी एवं बायीं ओर जूड़ा; लहरदार अंदोलिका गति; संगीत — सोपान शैली, भाषा मणिप्रवालम्; स्वाति तिरुनाल एवं वडिवेलु के संरक्षण में विकास, बाद में वल्लत्तोल द्वारा पुनरुद्धार।कल्याणिकुट्टी अम्मा ("मोहिनीअट्टम् की माता"), भारती शिवाजी, कनक रेले, सुनंदा नायर
सत्रियाअसममहापुरुष शंकरदेव (15वीं–16वीं शताब्दी) द्वारा एकशरण नामधर्म के प्रचार हेतु सृजित; सत्र (वैष्णव मठ) में भोकोत (भिक्षुओं) द्वारा; नाट्य-रूप अंकीया नाट एवं प्रस्तुति भाओना; वाद्य — खोल एवं ताल; 2000 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा आठवें शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता — सबसे नवीनतमगुरु जतिन गोस्वामी, घनकांत बोरा, इंदिरा पी. पी. बोरा, मणिक बरबायन
कुचिपुड़ी बनाम भरतनाट्यम् — सबसे आम भ्रम

दोनों दक्षिण भारतीय, दोनों में कर्नाटक संगीत, दोनों में समान हस्त-मुद्राएँ — फिर भेद क्या?

और तीन जोड़ियाँ जिनमें उलझन होती है
उत्तर प्रदेश संदर्भ — कथक की जन्मभूमि

कथक एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है जिसका उद्गम उत्तर भारत, विशेषतः ब्रज एवं अवध क्षेत्र में है। मंदिर के कथावाचक से यह रासलीला में ढला और फिर अवध के नवाबी दरबार में दरबारी नृत्य बना। नवाब वाजिद अली शाह स्वयं नर्तक एवं रचनाकार थे ("रहस" नृत्य-नाटिकाएँ) और बिंदादीन महाराज तथा कालका प्रसाद उनके दरबार में थे — इसी वंश से अच्छन, शंभू, लच्छू एवं बिरजू महाराज आए। लखनऊ घराना भाव-अभिनय के लिए, बनारस घराना "नटवरी" के लिए प्रसिद्ध है। कथक के आधुनिक मंच-विकास में लखनऊ का भारतेंदु नाट्य अकादमी एवं कथक केंद्र भी योगदान करते हैं।

7.3 प्रमुख लोकनृत्य — राज्यवार

तालिका 7.2 — लोकनृत्य ↔ राज्य (सुमेलन-योग्य)
राज्यप्रमुख लोकनृत्य
उत्तर प्रदेशचरकुला (ब्रज — सिर पर दीप-जड़ित रथचक्र संतुलित कर), रासलीला (ब्रज), नौटंकी, राई एवं पाई डंडा (बुंदेलखंड), धोबिया, धुरिया, जोगिनी, कर्मा, छपेली, ख्याल, शैरा, दीवारी/दीपावली नृत्य (अहीर, बुंदेलखंड), कजरी
उत्तराखंडछोलिया (तलवार-नृत्य), झोड़ा, चाँचरी, बरादा नाटी, लांगवीर
पंजाबभांगड़ा (पुरुष), गिद्धा (स्त्री), झूमर, मलवई गिद्धा, सम्मी, किक्कली
हरियाणाघूमर, खोड़िया, धमाल, लूर, फाग
हिमाचल प्रदेशनाटी (गिनीज में विश्व का सबसे बड़ा लोकनृत्य), किन्नौरी, छरबा, डांगी, लाहौली
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाखरऊफ, दुम्हाल (वट्टल पुरुष), हाफिजा, भांड पाथर, कुद एवं धमाली (जम्मू), जबरो एवं शोंडोल (लद्दाख)
राजस्थानघूमर (राजकीय), कालबेलिया (UNESCO 2010), भवाई, तेरहताली, चरी, गैर, कच्छी घोड़ी, गींदड़
गुजरातगरबा (UNESCO 2023), डांडिया रास, टिप्पणी, पढार, भवई
महाराष्ट्रलावणी, तमाशा, पोवाड़ा (वीरगाथा), कोली, धनगरी गजा, लेजिम, दिंडी-काला
मध्य प्रदेशकर्मा, गणगौर, मटकी, बधाई, राई, चरकुला, तेरहताली, ग्रिडा
छत्तीसगढ़पंथी (सतनामी), राउत नाचा, सुआ, करमा, सैला
बिहारजट-जटिन, झिझिया, डोमकच, बिदेसिया, पैका, जदुर, करमा
झारखंडछऊ (सरायकेला शैली), पाइका, झूमर, डोमकच, फगुआ, करमा
पश्चिम बंगालछऊ (पुरुलिया शैली — मुखौटा युक्त), बाउल, गंभीरा, कीर्तन, ब्रिता, धाली, गौड़ीय नृत्य
ओडिशाछऊ (मयूरभंज शैली — बिना मुखौटे), घूमरा, दलखाई, गोटीपुआ, रणप्पा, बाघ नाच
असमबिहू, बागुरुम्बा (बोडो), झुमुर, अंकीया नाट/भाओना, ओजापाली
मणिपुरलाई हराओबा, रास लीला, थांग-ता (मार्शल), पुंग चोलोम, खंबा-थोइबी, डोल चोलोम
मेघालयनोंगक्रेम (खासी), वांगला/100 ढोल (गारो), शाद सुक म्यनसीम, लाहो (जयंतिया)
मिजोरमचेरॉ (बाँस नृत्य), खुआल्लम, चैलम, सोलाकिया
नागालैंडचांग लो (सुआ लुआ), जेलियांग, रेंगमा, नुरालिम
त्रिपुराहोजागिरी (रियांग — घड़े पर संतुलन), लेबांग बूमानी, गरिया
अरुणाचल प्रदेशबर्दो छम, पोनुंग, वांचो, आजी लामू, रिखमपाड़ा
सिक्किमसिंघी छम (हिम-सिंह), याक छम, माउरा, तमांग सेलो
कर्नाटकयक्षगान, डोल्लू कुनिता, वीरगासे, कंसाले, हुत्तरी, भूत कोला
आंध्र प्रदेशधीमसा, वीरनाट्यम्, बुर्रा कथा, बुट्टा बोम्मलु, लंबाड़ी
तेलंगानापेरिनी शिवतांडवम् (काकतीय योद्धा-नृत्य), बतुकम्मा, गुसाड़ी, लंबाड़ी
तमिलनाडुकरगाट्टम, कोलाट्टम, कुम्मी, मयिलाट्टम (मयूर), ओयिलाट्टम, देवराट्टम, पोइक्काल कुदिरै
केरलथेय्यम, कैकोट्टिकली/तिरुवातिरकली, ओट्टनथुल्लल, पडयनी, कलरिपयट्टु (मार्शल), चाक्यार कूत्तु, मुडियेट्टु (UNESCO 2010)
गोवाफुगड़ी, देखनी, घोड़े मोडनी, मांडो, तालगड़ी
परीक्षा-दृष्टि

लोकनृत्य में सर्वाधिक फँसाने वाले युग्म — छऊ (तीन शैलियाँ: पुरुलिया=पश्चिम बंगाल मुखौटा-सहित, सरायकेला=झारखंड मुखौटा-सहित, मयूरभंज=ओडिशा मुखौटा-रहित); घूमर (राजस्थान) बनाम घूमरा (ओडिशा) बनाम घुमुरा; राई (बुंदेलखंड — UP एवं MP दोनों); भवाई — राजस्थान में नृत्य (सिर पर मटके) और गुजरात में लोकनाट्य। ये सब "सुमेलित नहीं है" प्रश्न के पसंदीदा विषय हैं।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (शास्त्रीय नृत्य) को सूची-II (संबद्ध राज्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. सत्रीया  B. मोहिनीअट्टम  C. कुचिपुड़ी  D. ओडिसी
सूची-II: 1. केरल  2. असम  3. ओडिशा  4. आंध्र प्रदेश
कूट:

AA-1, B-2, C-3, D-4BA-2, B-1, C-4, D-3CA-1, B-2, C-4, D-3DA-2, B-1, C-3, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)सत्रीया नृत्य असम के वैष्णव सत्रों की परंपरा से निकला और शंकरदेव से जुड़ा है; मोहिनीअट्टम केरल का, कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश का तथा ओडिसी ओडिशा का शास्त्रीय नृत्य है। संगीत नाटक अकादमी ने सत्रीया को वर्ष 2000 में शास्त्रीय नृत्य का दर्जा दिया। अतः सही सुमेलन A-2, B-1, C-4, D-3 है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (शास्त्रीय नृत्य)    (प्रसिद्ध प्रतिपादक)
1. भरतनाट्यम — रुक्मिणी देवी अरुंडेल
2. ओडिसी — केलुचरण महापात्र
3. कथकली — बिरजू महाराज
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने कलाक्षेत्र की स्थापना कर भरतनाट्यम को पुनर्प्रतिष्ठा दिलाई तथा केलुचरण महापात्र ओडिसी के शिखर-पुरुष माने जाते हैं — ये दोनों युग्म सही हैं। बिरजू महाराज कथक (लखनऊ के कालका-बिंदादीन घराने) के नर्तक थे, कथकली के नहीं। अतः केवल युग्म 1 तथा 2 सही सुमेलित हैं।

प्र.3 भारतीय नाट्य, नृत्य एवं संगीत का प्राचीनतम विस्तृत ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' किसकी रचना मानी जाती है?

Aनंदिकेश्वरBमतंग मुनिCशारंगदेवDभरत मुनि
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)'नाट्यशास्त्र' की रचना भरत मुनि ने की, जिसमें नाट्य, अभिनय, रस तथा संगीत का विस्तृत विवेचन है और जिसे 'पंचम वेद' भी कहा जाता है। नंदिकेश्वर ने 'अभिनय दर्पण', मतंग मुनि ने 'बृहद्देशी' तथा शारंगदेव ने 'संगीत रत्नाकर' की रचना की थी।

8. रंगमंच एवं कठपुतली

8.1 संस्कृत नाट्य परंपरा

संस्कृत नाटक का शास्त्र नाट्यशास्त्र ने गढ़ा। इसकी कुछ बँधी हुई रूढ़ियाँ थीं — सुखांत अनिवार्य (मंच पर मृत्यु या युद्ध नहीं दिखाया जाता), नांदी (मंगलाचरण) से आरंभ, सूत्रधार द्वारा संचालन, भरतवाक्य से समापन; उच्च पात्र संस्कृत बोलते हैं और स्त्री एवं निम्न पात्र प्राकृत। नाटक के दस रूप (दशरूपक) बताए गए, जिनमें नाटक एवं प्रकरण प्रमुख हैं।

तालिका 8.1 — संस्कृत नाटक ↔ नाटककार (सुमेलन-योग्य)
नाटककारकाल (सामान्यतः माना जाने वाला)प्रमुख नाटक
भासप्राचीनतम ज्ञात; कालिदास से पूर्वस्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगंधरायण, चारुदत्त, ऊरुभंगम्, मध्यमव्यायोग, पंचरात्र — 13 नाटक (1909 में केरल से त्रिवेंद्रम पांडुलिपियाँ मिलीं)
कालिदासगुप्त काल (सामान्यतः चंद्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना जाता है; कुछ विद्वान भिन्न तिथि देते हैं)अभिज्ञानशाकुंतलम् (विलियम जोन्स द्वारा 1789 में अनूदित), विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम्; काव्य — मेघदूतम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, ऋतुसंहार
शूद्रकमृच्छकटिकम् ("मिट्टी की गाड़ी") — नायक ब्राह्मण चारुदत्त एवं नगरवधू वसंतसेना; अपने युग का सर्वाधिक यथार्थवादी सामाजिक नाटक
विशाखदत्तगुप्तोत्तरमुद्राराक्षस (चाणक्य एवं राक्षस की कूटनीति — राजनीतिक नाटक), देवीचंद्रगुप्तम्
भवभूति8वीं शताब्दी; कन्नौज के यशोवर्मन का आश्रितउत्तररामचरितम्, मालतीमाधव, महावीरचरितम् — करुण रस के सर्वश्रेष्ठ कवि
हर्षवर्धन7वीं शताब्दी — स्वयं सम्राटरत्नावली, प्रियदर्शिका, नागानंद
भट्टनारायणवेणीसंहार — महाभारत आधारित
राजशेखर9वीं–10वीं शताब्दी; प्रतिहार दरबार (कन्नौज)कर्पूरमंजरी (पूर्णतः प्राकृत में), बालरामायण, काव्यमीमांसा

8.2 लोक रंगमंच

तालिका 8.2 — लोक रंगमंच ↔ राज्य ↔ विशेषता
रूपराज्यविशेषता
नौटंकीउत्तर प्रदेश (एवं आसपास)उत्तर भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय संगीत-नाट्य; नक्कारा (नगाड़ा) प्रधान वाद्य; छंद — दोहा, चौबोला, बहर-ए-तबील; दो शैलियाँ — हाथरस (संगीत-प्रधान) एवं कानपुर (संवाद-प्रधान); लोकप्रिय कथाएँ — अमर सिंह राठौर, लैला-मजनूँ, सुल्ताना डाकू, सत्य हरिश्चंद्र
रामलीलाउत्तर प्रदेश एवं समूचा उत्तर भारततुलसीदास के रामचरितमानस पर आधारित दस-दिवसीय/एक-मासीय मंचन; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक विरासत — 2008। विश्वप्रसिद्ध रामनगर (वाराणसी) की रामलीला 31 दिनों तक चलती है और पूरा नगर ही मंच बन जाता है
रासलीलाउत्तर प्रदेश — ब्रज (मथुरा-वृंदावन)कृष्ण-लीला का नृत्य-नाट्य; स्वामी घमंडदेव से जुड़ी परंपरा; बालक ही राधा-कृष्ण बनते हैं
भांड पाथरजम्मू-कश्मीरव्यंग्य-प्रधान; सुरनाई एवं नगाड़ा
स्वांगहरियाणा (एवं पश्चिमी UP)गायन-प्रधान; किशनलाल भाट एवं बंसीलाल परंपरा
ख्यालराजस्थानकुचामनी, शेखावटी, जयपुरी आदि उप-शैलियाँ
माचमध्य प्रदेश (मालवा)"मंच" का अपभ्रंश; गीत को वनग एवं संवाद को बोल कहते हैं
भवाईगुजरात (एवं राजस्थान)तीखा सामाजिक व्यंग्य; भूँगल वाद्य; प्रवर्तक असैत ठाकर
तमाशामहाराष्ट्रलावणी एवं ढोलकी प्रधान; स्त्री-कलाकार (मुरकी) केंद्र में; संस्कृत प्रहसन एवं गोंधल-कीर्तन से विकसित
जात्रापश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहारचैतन्य के भक्ति-आंदोलन से जन्मी यात्रा-नाट्य परंपरा; खुले मंच पर, ऊँचे संवाद एवं गीत; विवेक नामक पात्र अंतरात्मा की भूमिका निभाता है
यक्षगानकर्नाटक (तटीय)विशाल शिरोभूषण, चटख मुख-रंग; भागवत (सूत्रधार) कथा गाता है; चेंडे एवं मद्दले वाद्य; रातभर चलने वाला प्रदर्शन
थेरुकूत्तुतमिलनाडु"सड़क का नाटक"; द्रौपदी-अम्मन उत्सव से जुड़ा
दशावतारगोवा एवं कोंकण (महाराष्ट्र)विष्णु के दस अवतार; काष्ठ-मुखौटे
भाओना / अंकीया नाटअसमशंकरदेव रचित; ब्रजावली भाषा; सत्रों में मंचित
पांडवानीछत्तीसगढ़महाभारत की एकल गाथा-गायन शैली; तीजन बाई; दो शैलियाँ — वेदमती एवं कापालिक
बुर्रा कथाआंध्र प्रदेशतंबूरा के साथ एकल कथा-गायन
कृष्णाट्टम एवं मुडियेट्टुकेरलकृष्णाट्टम — गुरुवायूर मंदिर की परंपरा; मुडियेट्टु — काली-दारिका आख्यान, UNESCO 2010
आल्हाउत्तर प्रदेश — बुंदेलखंडआल्हा-ऊदल की वीरगाथा का ओजस्वी गायन; वर्षा ऋतु में विशेष

8.3 कठपुतली (Puppetry)

तालिका 8.3 — कठपुतली के चार प्रकार ↔ राज्य (पक्का सुमेलन-विषय)
प्रकारनामराज्यविशेषता
धागा/डोर
(String / Marionette)
कठपुतलीराजस्थानलकड़ी की, बिना पैरों के, लंबा घाघरा; ढोलक एवं "बोली" (सीटी-ध्वनि); अमर सिंह राठौर की कथा
कुंधेईओडिशाहल्की लकड़ी, बिना पैर की; ओडिसी-सदृश गति; त्रिकोणीय लकड़ी के आधार से संचालित
गोम्बेयट्टाकर्नाटकयक्षगान पात्रों के अनुरूप वेशभूषा; एक पुतली को अनेक सूत्रधार मिलकर चलाते हैं
बोम्मलट्टमतमिलनाडुभारत की सबसे बड़ी एवं भारी कठपुतलियाँ (कुछ 4.5 फुट तक); डोर एवं दंड दोनों का प्रयोग — सूत्रधार सिर पर बँधे छल्ले से भी संचालित करता है
छाया
(Shadow)
तोलु बोम्मलाटाआंध्र प्रदेशभारत की सबसे बड़ी छाया-कठपुतलियाँ; चमड़े की, रंगीन एवं पारदर्शी — पर्दे पर रंगीन छाया
तोगलु गोम्बेयट्टाकर्नाटकआकार पात्र की सामाजिक स्थिति के अनुसार बदलता है
रावणछायाओडिशाहिरण की खाल; रंग-रहित एवं जोड़-रहित (अपारदर्शी); इसीलिए छाया कोमल एवं कंपनशील — सर्वाधिक नाटकीय मानी जाती है
दस्ताना/हस्त
(Glove)
पावाकूत्तुकेरलकथकली-सदृश मुख-सज्जा एवं वेश; चेंडा-चेंगिला की संगत; 18वीं शताब्दी से
गुलाबो-सिताबोउत्तर प्रदेशहास्य-व्यंग्य प्रधान दस्ताना-कठपुतली; दो सौतों की नोंक-झोंक; उत्तर प्रदेश, ओडिशा एवं बंगाल में प्रचलित
दंड
(Rod)
पुतुल नाच (डांगेर पुतुल)पश्चिम बंगाल3–4 फुट ऊँची; संचालक बाँस के दंड से कमर के सहारे बाँधकर चलाता है; जात्रा-सदृश प्रस्तुति
यमपुरीबिहारएक ही लकड़ी से बनी — कोई जोड़ नहीं; इसीलिए संचालन में सर्वाधिक कौशल आवश्यक
कठपुतली के तीन ट्रैप

(1) बोम्मलट्टम (तमिलनाडु) = डोर-कठपुतली, जबकि तोलु बोम्मलाटा (आंध्र) = छाया-कठपुतली — नाम लगभग एक जैसे, प्रकार अलग।
(2) रावणछाया रंगहीन है और तोलु बोम्मलाटा रंगीन — यही दोनों का निर्णायक भेद।
(3) यमपुरी (बिहार) दंड-कठपुतली है, पुतुल नाच (बंगाल) भी दंड-कठपुतली — पर यमपुरी जोड़-रहित है।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — नौटंकी एवं रामलीला

UPPSC की दृष्टि से ये दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोक-रूप हैं:

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (संस्कृत नाटक) को सूची-II (रचनाकार) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. मृच्छकटिकम्  B. मुद्राराक्षस  C. रत्नावली  D. मालतीमाधव
सूची-II: 1. भवभूति  2. शूद्रक  3. विशाखदत्त  4. हर्षवर्धन
कूट:

AA-3, B-2, C-4, D-1BA-2, B-3, C-4, D-1CA-3, B-2, C-1, D-4DA-2, B-3, C-1, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)'मृच्छकटिकम्' शूद्रक की रचना है, जिसका कथानक उज्जयिनी की पृष्ठभूमि में चारुदत्त और वसंतसेना से जुड़ा है। 'मुद्राराक्षस' विशाखदत्त का राजनीतिक नाटक है, जिसमें चाणक्य द्वारा राक्षस को अपने पक्ष में करने की कथा है। 'रत्नावली' हर्षवर्धन की तथा 'मालतीमाधव' भवभूति की रचना है। अतः A-2, B-3, C-4, D-1 सही सुमेलन है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): 'नील दर्पण' के अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशन के कारण पादरी जेम्स लॉन्ग पर मुकदमा चलाकर उन्हें कारावास तथा जुर्माने का दंड दिया गया।
कारण (R): 'नील दर्पण' नाटक की रचना बांग्ला में दीनबंधु मित्र ने की थी तथा इसका अंग्रेजी अनुवाद माइकल मधुसूदन दत्त ने किया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)जेम्स लॉन्ग ने 'नील दर्पण' का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कराया, जिस पर नील बागान मालिकों के मानहानि-वाद में उन्हें कारावास तथा एक हजार रुपये के जुर्माने का दंड मिला — अतः (A) सही है। (R) भी तथ्यतः सही है कि नाटक दीनबंधु मित्र ने लिखा और अनुवाद माइकल मधुसूदन दत्त ने किया, किंतु लेखक व अनुवादक कौन थे, यह लॉन्ग के दंडित होने का कारण नहीं है; दंड का कारण प्रकाशन का उत्तरदायित्व उन पर आना था।

प्र.3 कालिदास की रचनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'मेघदूतम्' एक खंडकाव्य है, जिसमें निर्वासित यक्ष द्वारा मेघ के माध्यम से भेजा गया विरह-संदेश वर्णित है।
2. 'मालविकाग्निमित्रम्' का नायक शुंग शासक अग्निमित्र है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)'मेघदूतम्' कालिदास का प्रसिद्ध खंडकाव्य है, जिसमें यक्ष मेघ को दूत बनाकर अलका में अपनी प्रिया को संदेश भेजता है। 'मालविकाग्निमित्रम्' कालिदास का नाटक है, जिसका नायक शुंग शासक पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र तथा नायिका मालविका है। अतः दोनों कथन सही हैं।

9. साहित्य — वैदिक से आधुनिक हिंदी तक

9.1 वैदिक साहित्य

तालिका 9.1 — वैदिक साहित्य का ढाँचा
वर्गविवरण
चार वेद (संहिता)ऋग्वेद — 10 मंडल, 1028 सूक्त; प्राचीनतम; मंडल 2–7 "वंश मंडल" सर्वाधिक प्राचीन; गायत्री मंत्र (3rd मंडल, विश्वामित्र) एवं पुरुष सूक्त (10वाँ मंडल — वर्ण-व्यवस्था का प्रथम उल्लेख)। सामवेद — गायन; भारतीय संगीत का मूलयजुर्वेद — यज्ञ-विधि; एकमात्र वेद जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों; शुक्ल एवं कृष्ण दो शाखाएँ। अथर्ववेद — जादू-टोना, औषधि, लोक-विश्वास; भैषज्य एवं आयुष्य सूक्त
ब्राह्मण ग्रंथयज्ञ-कर्मकांड की गद्य व्याख्या — ऐतरेय एवं कौषीतकि (ऋग्), तांड्य/पंचविंश एवं जैमिनीय (साम), शतपथ (यजुर् — सबसे विस्तृत; विदेह-माधव की पूर्व-प्रसार कथा), गोपथ (अथर्व)
आरण्यक"वन में पढ़े जाने वाले"; कर्मकांड से दर्शन की ओर संक्रमण
उपनिषद्"वेदांत"; कुल 108 (मुक्तिका सूची), प्रमुख 13; बृहदारण्यक (सबसे बड़ा एवं प्राचीनतम) तथा छांदोग्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण। "सत्यमेव जयते" मुण्डकोपनिषद से; "तत्त्वमसि" छांदोग्य से; "अहं ब्रह्मास्मि" बृहदारण्यक से। कठोपनिषद — नचिकेता-यम संवाद
छह वेदांगशिक्षा (उच्चारण), कल्प (कर्मकांड — श्रौत, गृह्य, धर्म, शुल्ब सूत्र), व्याकरण (पाणिनि की अष्टाध्यायी), निरुक्त (यास्क — शब्द-व्युत्पत्ति; प्राचीनतम कोश), छंद (पिंगल), ज्योतिष (लगध का वेदांग ज्योतिष)
चार उपवेदआयुर्वेद (ऋग्वेद से), धनुर्वेद (यजुर्वेद), गंधर्ववेद — संगीत (सामवेद), शिल्पवेद/अर्थशास्त्र (अथर्ववेद)
पुराण18 महापुराण; पाँच लक्षण — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर, वंशानुचरित। मत्स्य पुराण प्राचीनतम माना जाता है; विष्णु एवं भागवत ऐतिहासिक वंशावली एवं कृष्ण-भक्ति के लिए महत्वपूर्ण
महाकाव्यरामायण (वाल्मीकि; 7 कांड, 24,000 श्लोक — "आदि काव्य") एवं महाभारत (वेदव्यास; 18 पर्व, लगभग 1,00,000 श्लोक — विश्व का सबसे लंबा महाकाव्य; पूर्व नाम जय संहिता एवं भारत; भगवद्गीता भीष्म पर्व में)

9.2 पाली, प्राकृत एवं संस्कृत की अन्य धाराएँ

9.3 संगम साहित्य

9.4 भक्तिकालीन एवं क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य

तालिका 9.2 — भाषा ↔ आदि/प्रमुख रचनाकार ↔ कृति
भाषाप्रमुख रचनाकारकृति / योगदान
तमिलतिरुवल्लुवर; आलवार एवं नायनार; कंबनतिरुक्कुरल; नालायिर दिव्य प्रबंधम्; तेवारम्; कंब रामायणम्
कन्नड़पंप, पोन्न, रन्न ("रत्नत्रय"); बसवेश्वर; अक्क महादेवीकविराजमार्ग (नृपतुंग/अमोघवर्ष — कन्नड़ का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ); वचन साहित्य (लिंगायत)
तेलुगुनन्नय, तिक्कन्ना, येर्रप्रगड ("कवित्रय"); कृष्णदेवराय; अन्नमाचार्यआंध्र महाभारतम्; आमुक्तमाल्यद (कृष्णदेवराय रचित तेलुगु काव्य)
मलयालमएषुत्तच्छन (मलयालम का जनक); चेरुशेरी; कुंचन नंबियारअध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु; ओट्टनथुल्लल
मराठीज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, समर्थ रामदासज्ञानेश्वरी (गीता की मराठी टीका); अभंग; दासबोध; वारकरी परंपरा
बांग्लाचंडीदास, चैतन्य एवं वैष्णव पदावली; कृत्तिवास; मुकुंदरामचर्यापद (प्राचीनतम बांग्ला); कृत्तिवासी रामायण; चंडीमंगल
ओडियासरलादास; "पंचसखा" — बलरामदास, जगन्नाथदास आदिओडिया महाभारत; भागवत
असमियाशंकरदेव, माधवदेवकीर्तन घोषा, बरगीत, अंकीया नाट; बुरंजी (अहोम इतिहास-वृत्तांत)
पंजाबीगुरु नानक एवं गुरु परंपरा; बुल्ले शाह; वारिस शाहगुरु ग्रंथ साहिब (गुरु अर्जन द्वारा 1604 में संकलित; गुरु गोविंद सिंह द्वारा अंतिम रूप) — इसमें कबीर, रविदास, नामदेव, फरीद आदि की वाणी भी सम्मिलित; हीर-राँझा
गुजरातीनरसी मेहता; प्रेमानंद; दयाराम"वैष्णव जन तो…"
कश्मीरीलल्लेश्वरी (लाल देद); नुंद ऋषि (शेख नूरुद्दीन)वाख; श्रुख — ऋषि परंपरा
मैथिलीविद्यापतिपदावली — राधा-कृष्ण शृंगार; "मैथिल कोकिल"
उर्दूवली दक्कनी, मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नजीर अकबराबादी, दाग देहलवीदक्कन में जन्म; दिल्ली एवं लखनऊ दो प्रमुख दबिस्तान (शैली-केंद्र)

9.5 हिंदी साहित्य के काल एवं प्रमुख कवि

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य का इतिहास में चार काल-विभाजन दिया (वर्ष विक्रम संवत में हैं):

तालिका 9.3 — हिंदी साहित्य के काल (कालक्रम-योग्य)
कालअवधि (वि.सं.)स्वरूपप्रमुख कवि एवं रचनाएँ
आदिकाल (वीरगाथा काल)1050–1375वीर रस, आश्रयदाता-प्रशस्ति, रासो काव्य; साथ ही सिद्ध-नाथ-जैन साहित्यचंदबरदाईपृथ्वीराज रासो (हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है); जगनिक — आल्हा खंड (बुंदेलखंड); नरपति नाल्ह — बीसलदेव रासो; अमीर खुसरो — पहेलियाँ, मुकरियाँ, खालिकबारी; विद्यापति — कीर्तिलता
भक्तिकाल1375–1700हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग; चार धाराएँ निर्गुण – ज्ञानाश्रयी: कबीर (बीजक — साखी, सबद, रमैनी), रैदास, दादू, नानक।
निर्गुण – प्रेमाश्रयी (सूफी): मलिक मुहम्मद जायसी (पद्मावत — अवधी), कुतुबन (मृगावती), मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली)।
सगुण – रामभक्ति: तुलसीदास (रामचरितमानस — 1574 में अयोध्या में आरंभ; विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमान चालिसा), अग्रदास, नाभादास (भक्तमाल)।
सगुण – कृष्णभक्ति: सूरदास (सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी), नंददास, कुंभनदास, परमानंददास — अष्टछाप (वल्लभाचार्य एवं विट्ठलनाथ की परंपरा); मीराबाई, रसखान (प्रेमवाटिका)।
रीतिकाल1700–1900शृंगार, अलंकार-शास्त्र एवं नायिका-भेद; दरबारी काव्यरीतिबद्ध: केशवदास (रसिकप्रिया, कविप्रिया), मतिराम, देव, चिंतामणि।
रीतिसिद्ध: बिहारी (बिहारी सतसई — "देखन में छोटे लगै, घाव करै गंभीर")।
रीतिमुक्त: घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर।
वीर काव्य: भूषण (शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक), लाल कवि (छत्रप्रकाश)।
आधुनिक काल (गद्यकाल)1900 वि.सं. सेगद्य का उदय, खड़ी बोली की प्रतिष्ठा, सामाजिक चेतना भारतेंदु युग (1868–1900 ई.): भारतेंदु हरिश्चंद्र — "आधुनिक हिंदी एवं हिंदी नाटक के जनक"; अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा
द्विवेदी युग (1900–1918): महावीर प्रसाद द्विवेदी (सरस्वती पत्रिका) — खड़ी बोली को काव्य-भाषा बनाया; मैथिलीशरण गुप्त (भारत भारती, साकेत, यशोधरा) — "राष्ट्रकवि"; अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (प्रियप्रवास)।
छायावाद (1918–1936): जयशंकर प्रसाद (कामायनी, आँसू, स्कंदगुप्त), सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, परिमल), सुमित्रानंदन पंत (पल्लव, चिदंबरा), महादेवी वर्मा (यामा, नीहार, दीपशिखा — "आधुनिक मीरा")।
प्रगतिवाद, प्रयोगवाद एवं नई कविता: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (तार सप्तक, 1943), गजानन माधव मुक्तिबोध (अँधेरे में), धर्मवीर भारती, दुष्यंत कुमार।
गद्य: प्रेमचंद (गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला; "उपन्यास सम्राट"), जैनेंद्र, यशपाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, फणीश्वरनाथ 'रेणु' (मैला आँचल — आँचलिक उपन्यास)।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — हिंदी साहित्य की धुरी

हिंदी साहित्य का लगभग समूचा केंद्र उत्तर प्रदेश है — UPPSC इसे प्रत्यक्ष प्रश्नों में उठाता है:

साहित्यिक सम्मान — अद्यतन स्थिति
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 जैन साहित्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. श्वेतांबर जैन आगम-ग्रंथों की मूल भाषा मुख्यतः अर्धमागधी प्राकृत है।
2. 'कल्पसूत्र' की रचना आचार्य भद्रबाहु द्वारा मानी जाती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)श्वेतांबर परंपरा के आगम-ग्रंथ (अंग, उपांग आदि) मुख्यतः अर्धमागधी प्राकृत में हैं, जिसे महावीर के उपदेशों की भाषा माना जाता है; अतः कथन 1 सही है। प्राकृत ग्रंथ 'कल्पसूत्र', जिसमें महावीर सहित तीर्थंकरों के जीवन-वृत्त तथा श्रमण-परंपरा का विवरण है, आचार्य भद्रबाहु की रचना मानी जाती है; अतः कथन 2 भी सही है।

प्र.2 मध्यकालीन भक्ति-संतों तथा उनकी भाषा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. विद्यापति ने मैथिली में 'पदावली' की रचना की।
2. संत ज्ञानेश्वर ने मराठी में 'ज्ञानेश्वरी' लिखी।
3. नरसी मेहता बांग्ला भाषा के वैष्णव संत-कवि थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)विद्यापति मैथिली के प्रसिद्ध कवि थे, जिनकी 'पदावली' राधा-कृष्ण प्रेम पर आधारित है; ज्ञानेश्वर ने मराठी में गीता की टीका 'ज्ञानेश्वरी' (भावार्थदीपिका) लिखी। नरसी मेहता गुजराती भाषा के वैष्णव संत-कवि थे, बांग्ला के नहीं। अतः कथन 1 तथा 2 सही हैं।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (ग्रंथ)    (स्वरूप/विषय)
1. अमरकोश — संस्कृत का कोश (शब्दकोश) ग्रंथ
2. कादम्बरी — बाणभट्ट की संस्कृत गद्य-कथा
3. दशकुमारचरित — प्राचीन गणित ग्रंथ
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अमरसिंह रचित 'अमरकोश' संस्कृत का प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश-ग्रंथ है तथा 'कादम्बरी' बाणभट्ट की संस्कृत गद्य-कथा (कथा-काव्य) है; अतः युग्म 1 एवं 2 सही सुमेलित हैं। 'दशकुमारचरित' दंडी की गद्य रचना है, कोई गणित ग्रंथ नहीं; अतः युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है।

10. भारतीय दर्शन — षड्दर्शन एवं नास्तिक दर्शन

भारतीय दर्शन-परंपरा का मूल विभाजन वेद की प्रामाणिकता पर आधारित है — जो वेद को प्रमाण मानते हैं वे आस्तिक, जो नहीं मानते वे नास्तिक। ध्यान रहे: यहाँ "नास्तिक" का अर्थ ईश्वर को न मानना नहीं है — सांख्य ईश्वर को नहीं मानता फिर भी आस्तिक है, क्योंकि वह वेद को प्रमाण मानता है। यह सूक्ष्म भेद अभिकथन–कारण प्रश्नों का पसंदीदा विषय है।

10.1 षड्दर्शन — छह आस्तिक दर्शन

तालिका 10.1 — दर्शन ↔ प्रवर्तक ↔ मूल ग्रंथ ↔ केंद्रीय विचार (अनिवार्य सुमेलन)
दर्शनप्रवर्तकमूल ग्रंथकेंद्रीय विचारप्रमाण
सांख्यकपिलसांख्यकारिका (ईश्वरकृष्ण); मूल सांख्य सूत्रद्वैतवादी एवं निरीश्वरवादीपुरुष (चेतन, निष्क्रिय) तथा प्रकृति (जड़, क्रियाशील) दो स्वतंत्र तत्व; 25 तत्व; तीन गुण — सत्त्व, रजस्, तमस्; सत्कार्यवाद (कार्य कारण में पहले से विद्यमान); भारत का प्राचीनतम दर्शन3 — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द
योगपतंजलियोगसूत्र; टीका — व्यास भाष्य"सेश्वर सांख्य" — सांख्य का तत्व-ज्ञान + ईश्वर; चित्तवृत्ति निरोध; अष्टांग योग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि3
न्यायगौतम (अक्षपाद)न्याय सूत्रतर्कशास्त्र एवं ज्ञान-मीमांसा; 16 पदार्थ; पंचावयव अनुमान (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन); मोक्ष = मिथ्या-ज्ञान का नाश4 — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द
वैशेषिककणाद (उलूक)वैशेषिक सूत्रपरमाणुवाद — सृष्टि अविभाज्य परमाणुओं से; 7 पदार्थ — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव; भारत का "भौतिकी-दर्शन"; असत्कार्यवाद/आरंभवाद2 — प्रत्यक्ष, अनुमान
पूर्व मीमांसाजैमिनिपूर्व मीमांसा सूत्र; भाष्य — शबर; व्याख्याता — कुमारिल भट्ट एवं प्रभाकरकर्मकांड की प्रधानता; वेद अपौरुषेय एवं नित्य; यज्ञ ही धर्म; अपूर्व की संकल्पनाकुमारिल के अनुसार 6 (अर्थापत्ति एवं अनुपलब्धि सहित)
उत्तर मीमांसा (वेदांत)बादरायणब्रह्मसूत्र (वेदांत सूत्र)ज्ञानकांड — ब्रह्म ही परम सत्य; प्रस्थानत्रयी = उपनिषद् + ब्रह्मसूत्र + भगवद्गीता6
तीन युग्म याद रखें

षड्दर्शन परस्पर तीन जोड़ों में बँटे हैं — सांख्य–योग (सिद्धांत + साधना), न्याय–वैशेषिक (तर्क + तत्व-वर्गीकरण), मीमांसा–वेदांत (कर्म + ज्ञान)।
सबसे बड़ा ट्रैप: कपिल = सांख्य, कणाद = वैशेषिक, गौतम = न्याय, जैमिनि = पूर्व मीमांसा, बादरायण = उत्तर मीमांसा, पतंजलि = योग। "गौतम = वैशेषिक" या "कणाद = न्याय" का उलटफेर सबसे आम distractor है। साथ ही — न्याय के 4 प्रमाण, वैशेषिक के 2, सांख्य-योग के 3

10.2 वेदांत की शाखाएँ एवं आचार्य

तालिका 10.2 — वेदांत की शाखा ↔ आचार्य ↔ जन्मस्थान ↔ सिद्धांत
शाखाआचार्यकाल एवं स्थानसार
अद्वैतशंकराचार्यलगभग 788–820 ई.; कालडी, केरल"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः" — ब्रह्म एवं जीव अभिन्न; जगत् माया; ग्रंथ — ब्रह्मसूत्र भाष्य, उपदेशसाहस्री, विवेकचूड़ामणि; चार मठ — शृंगेरी (कर्नाटक), द्वारका (गुजरात), पुरी (ओडिशा), ज्योतिर्मठ/बद्रिकाश्रम (उत्तराखंड)
विशिष्टाद्वैतरामानुजाचार्य1017–1137 ई.; श्रीपेरंबदूर, तमिलनाडुब्रह्म सगुण एवं सविशेष; जीव एवं जगत् ब्रह्म के शरीर हैं — अभिन्न पर स्वतंत्र नहीं; श्री वैष्णव सम्प्रदाय; प्रपत्ति (शरणागति); ग्रंथ — श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह
द्वैतमध्वाचार्य (आनंदतीर्थ)1238–1317 ई.; उडुपी, कर्नाटकब्रह्म एवं जीव सर्वथा भिन्न; पंचभेद; ब्रह्मैव विष्णु; हरिदास आंदोलन का दार्शनिक आधार
द्वैताद्वैत (भेदाभेद)निंबार्काचार्य13वीं शताब्दी; कर्मभूमि ब्रज (मथुरा)जीव-ब्रह्म में भेद एवं अभेद दोनों समान रूप से सत्य; राधा-कृष्ण की युगल उपासना; वेदांत पारिजात सौरभ
शुद्धाद्वैतवल्लभाचार्य1479–1531 ई.; जन्म चंपारण (अभी छत्तीसगढ़/MP क्षेत्र), कर्मभूमि ब्रजमाया के बिना अद्वैत — जगत् ब्रह्म का ही वास्तविक रूप; पुष्टिमार्ग (अनुग्रह का मार्ग); अष्टछाप कवि-मंडल; ग्रंथ — अणुभाष्य, सुबोधिनी
अचिंत्य भेदाभेदचैतन्य महाप्रभु (दार्शनिक रूप — जीव गोस्वामी)1486–1533 ई.; नवद्वीप, बंगालभेद एवं अभेद दोनों अचिंत्य रूप से सत्य; गौड़ीय वैष्णव; संकीर्तन एवं नाम-महिमा

10.3 नास्तिक दर्शन

तालिका 10.3 — नास्तिक दर्शन एवं उनकी शाखाएँ
दर्शनप्रवर्तकसार
चार्वाक / लोकायतबृहस्पति; परंपरा में चार्वाकभारत का भौतिकवादी (materialist) दर्शन; बार्हस्पत्य सूत्रकेवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण — अनुमान एवं शब्द अस्वीकार; आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मोक्ष एवं ईश्वर का निषेध; चार भूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु) — आकाश नहीं, क्योंकि वह प्रत्यक्ष नहीं; "ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्"। इसे देहात्मवाद भी कहते हैं
बौद्ध दर्शनगौतम बुद्धअनीश्वरवाद, अनात्मवाद, क्षणिकवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद (कारण-निर्भरता), चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग। चार दार्शनिक सम्प्रदाय:
वैभाषिक (सर्वास्तिवाद) — बाह्य जगत् का प्रत्यक्ष यथार्थवाद
सौत्रांतिक — बाह्य जगत् का अनुमेय यथार्थवाद
योगाचार / विज्ञानवादअसंग एवं वसुबंधु; केवल चित्त सत्य (आत्मनिष्ठ आदर्शवाद)
माध्यमिक / शून्यवादनागार्जुन (मूलमध्यमककारिका); सब कुछ स्वभाव-रहित (शून्य)
जैन दर्शनमहावीर एवं तीर्थंकर-परंपराअनेकांतवाद (सत्य अनेक-आयामी), स्याद्वाद एवं सप्तभंगी नय ("स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति…"), नयवाद; जीव–अजीव; नौ तत्व; त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र; पंच महाव्रत; स्याद्वाद की प्रसिद्ध उपमा — हाथी एवं छह अंधे
आजीवकमक्खलि गोसालनियतिवाद (Determinism) — सब कुछ पूर्व-निर्धारित, कर्म से कुछ नहीं बदलता; अशोक एवं दशरथ ने बराबर गुफाएँ इन्हीं को दान कीं
परीक्षा-दृष्टि

सर्वाधिक पूछे जाने वाले बिंदु: सांख्य निरीश्वरवादी होते हुए भी आस्तिक है (अभिकथन–कारण का पसंदीदा); चार्वाक के लिए केवल एक प्रमाण — प्रत्यक्ष; न्याय के चार प्रमाण; वैशेषिक = परमाणुवाद; नागार्जुन = शून्यवाद/माध्यमिक तथा वसुबंधु-असंग = योगाचार/विज्ञानवाद; अनेकांतवाद एवं स्याद्वाद = जैन; नियतिवाद = आजीवक

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (दर्शन) को सूची-II (प्रवर्तक) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. सांख्य  B. न्याय  C. वैशेषिक  D. मीमांसा
सूची-II: 1. गौतम  2. जैमिनि  3. कणाद  4. कपिल
कूट:

AA-1, B-4, C-2, D-3BA-1, B-4, C-3, D-2CA-4, B-1, C-3, D-2DA-4, B-1, C-2, D-3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)षड्दर्शनों में सांख्य के प्रवर्तक कपिल, न्याय के गौतम (अक्षपाद), वैशेषिक के कणाद (उलूक) तथा पूर्व मीमांसा के जैमिनि माने जाते हैं। कणाद का परमाणुवाद (atomism) वैशेषिक दर्शन का केंद्रीय सिद्धांत है। अतः सही सुमेलन A-4, B-1, C-3, D-2 है।

प्र.2 सूची-I (आचार्य) को सूची-II (दर्शन) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. शंकराचार्य  B. रामानुजाचार्य  C. मध्वाचार्य  D. वल्लभाचार्य
सूची-II: 1. विशिष्टाद्वैत  2. शुद्धाद्वैत  3. अद्वैत  4. द्वैत
कूट:

AA-1, B-3, C-2, D-4BA-3, B-1, C-4, D-2CA-1, B-3, C-4, D-2DA-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)शंकराचार्य ने अद्वैत, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत, मध्वाचार्य ने द्वैत तथा वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत (पुष्टिमार्ग) का प्रतिपादन किया। निम्बार्काचार्य का दर्शन द्वैताद्वैत कहलाता है। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (आचार्य)    (दार्शनिक मत)
1. रामानंद — द्वैतवाद
2. वल्लभाचार्य — विशिष्टाद्वैत
3. निम्बार्काचार्य — द्वैताद्वैत
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)द्वैतवाद के प्रवर्तक मध्वाचार्य थे; रामानंद रामानुज की विशिष्टाद्वैत परंपरा से जुड़े रामावत संप्रदाय के प्रवर्तक थे, अतः युग्म 1 गलत है। वल्लभाचार्य का दर्शन 'शुद्धाद्वैत' (पुष्टिमार्ग) है, विशिष्टाद्वैत नहीं, अतः युग्म 2 भी गलत है। निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत (भेदाभेद) युग्म सही है।

11. धार्मिक सम्प्रदाय एवं संत परंपरा

11.1 शैव, वैष्णव एवं शाक्त सम्प्रदाय

तालिका 11.1 — प्रमुख सम्प्रदाय ↔ प्रवर्तक ↔ क्षेत्र
सम्प्रदायप्रवर्तक / प्रमुख ग्रंथक्षेत्र एवं विशेषता
क. शैव धारा
पाशुपतलकुलीश; पाशुपत सूत्रप्राचीनतम संगठित शैव सम्प्रदाय; गुजरात-राजस्थान से विस्तार; पशु–पति–पाश की त्रयी
कापालिक एवं कालामुखचरम तांत्रिक शैव धाराएँ; भैरव-उपासना
कश्मीर शैव (त्रिक / प्रत्यभिज्ञा)वसुगुप्त (शिव सूत्र); सोमानंद, उत्पलदेव, अभिनवगुप्त (तंत्रालोक)कश्मीर; अद्वैत शैव — शिव ही एकमात्र सत्ता, जगत् उसका स्पंद; लल्लेश्वरी इसी धारा से
शैव सिद्धांततमिल नायनार परंपरा; मेयकंडार का शिवज्ञानबोधम्तमिलनाडु; शिव, जीव एवं पाश — तीन नित्य तत्व
लिंगायत / वीरशैवबसवेश्वर (बसव), 12वीं शताब्दी; वचन साहित्यकर्नाटक; कल्याणी चालुक्य राजदरबार; जाति, कर्मकांड एवं मूर्तिपूजा का विरोध; इष्टलिंग धारण; अनुभव मंटप (सामाजिक-आध्यात्मिक संसद); अक्क महादेवी, अल्लम प्रभु
नाथ सम्प्रदायमत्स्येंद्रनाथ एवं गोरखनाथहठयोग परंपरा; गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) का गोरखनाथ मठ प्रमुख केंद्र; कबीर पर गहरा प्रभाव
ख. वैष्णव धारा
भागवत / पांचरात्रप्राचीनतम वैष्णव धारा; हेलियोडोरस का बेसनगर गरुड़ स्तंभ (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी) इसका प्रारंभिक प्रमाण; व्यूह-सिद्धांत; दस अवतार
श्री वैष्णवरामानुज (नाथमुनि एवं यमुनाचार्य की परंपरा)तमिलनाडु; आलवार भक्ति + वेदांत का समन्वय
रामानंदीरामानंद, 14वीं–15वीं शताब्दी; प्रयाग/काशी (उत्तर प्रदेश)दक्षिण की भक्ति को उत्तर भारत तक लाने वाली कड़ी; सबके लिए भक्ति का द्वार खोला; शिष्य — कबीर, रैदास, धन्ना, पीपा, सेना, सुरसुरानंद
पुष्टिमार्ग (वल्लभ) एवं गौड़ीय (चैतन्य)वल्लभाचार्य; चैतन्य महाप्रभुब्रज एवं बंगाल-ओडिशा; कृष्ण-भक्ति; हवेली संगीत एवं संकीर्तन
ग. शाक्त धारा
शाक्त / तंत्रदेवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण), तंत्र-ग्रंथदेवी को परम शक्ति मानना; दस महाविद्या; 51 शक्तिपीठ (संख्या परंपरा-भेद से 51/52/108 बताई जाती है); वाम एवं दक्षिण मार्ग; असम का कामाख्या, बंगाल का कालीघाट, हिमाचल के ज्वालामुखी एवं चिंतपूर्णी, उत्तर प्रदेश का विंध्यवासिनी (मिर्जापुर) एवं शाकंभरी (सहारनपुर)
स्मार्त / पंचायतनशंकराचार्यपाँच देवताओं (शिव, विष्णु, देवी, सूर्य, गणेश) की समान उपासना — सम्प्रदाय-समन्वय का प्रयास

11.2 आलवार एवं नयनार — दक्षिण की भक्ति-लहर

आधारआलवारनयनार
उपास्यविष्णुशिव
संख्या1263
काल एवं क्षेत्र6वीं–9वीं शताब्दी; तमिलनाडु; पल्लव एवं पांड्य काल
संकलित ग्रंथनालायिर दिव्य प्रबंधम् — 4000 पद; संकलनकर्ता नाथमुनि; इसे "तमिल वेद"/"द्रविड़ वेद" कहते हैंतेवारम् (अप्पर, संबंदर, सुंदरर) एवं तिरुवाचकम् (माणिक्कवाचकर); संकलनकर्ता नंबि आंडार नंबि; समूचा संग्रह तिरुमुरै
प्रमुख संतनम्मालवार (सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं), आंडाल (एकमात्र स्त्री; तिरुप्पावै), पेरियालवार, तिरुमंगै आलवार, तोंडरडिप्पोडिअप्पर (तिरुनावुक्करसर), संबंदर, सुंदरर, माणिक्कवाचकर; कारैक्काल अम्मैयार (प्रमुख स्त्री नयनार)
जीवनी-ग्रंथगुरुपरंपरापेरिय पुराणम्शेक्किलार रचित

11.3 भक्ति एवं सूफी संत — क्षेत्रवार तालिका

तालिका 11.2 — भक्ति संत ↔ क्षेत्र ↔ धारा ↔ रचना
संतकालक्षेत्रधारा एवं रचना
रामानंद14वीं–15वीं शताब्दीउत्तर प्रदेश (प्रयाग–काशी)सगुण-निर्गुण सेतु; उत्तर भारत में भक्ति के जनक
कबीरलगभग 1440–1518वाराणसी; मगहर (संत कबीर नगर) में देहावसाननिर्गुण; बीजक (साखी, सबद, रमैनी); जाति एवं कर्मकांड का तीव्र विरोध; कबीरपंथ
रविदास (रैदास)15वीं शताब्दीवाराणसी, उत्तर प्रदेशनिर्गुण; "मन चंगा तो कठौती में गंगा"; मीरा के गुरु माने जाते हैं; रविदासिया परंपरा
गुरु नानक1469–1539तलवंडी (ननकाना साहिब), पंजाबनिर्गुण; जपुजी; इक ओंकार; लंगर एवं संगत; सिख धर्म की स्थापना
सूरदास16वीं शताब्दीब्रज, उत्तर प्रदेशसगुण-कृष्णभक्ति; अष्टछाप के शिरोमणि; सूरसागर; वात्सल्य रस के सम्राट
तुलसीदास1532–1623 (सामान्य मान्यता)उत्तर प्रदेश — राजापुर/चित्रकूट, अयोध्या, वाराणसीसगुण-रामभक्ति; रामचरितमानस (1574 में आरंभ), विनयपत्रिका, कवितावली, हनुमान चालिसा
मीराबाई16वीं शताब्दीमेड़ता–चित्तौड़, राजस्थानसगुण-कृष्णभक्ति; पद एवं भजन; "मेरे तो गिरधर गोपाल"
चैतन्य महाप्रभु1486–1533नवद्वीप (बंगाल); पुरीगौड़ीय वैष्णव; संकीर्तन आंदोलन; शिक्षाष्टक
शंकरदेव1449–1568असमएकशरण नामधर्म; कीर्तन घोषा, बरगीत; सत्र एवं नामघर संस्थाएँ; सत्रिया नृत्य
ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम13वीं–17वीं शताब्दीमहाराष्ट्र (पंढरपुर)वारकरी सम्प्रदाय; विट्ठल-भक्ति; ज्ञानेश्वरी एवं अभंग; समर्थ रामदास (दासबोध) — शिवाजी से संबद्ध
बसवेश्वर12वीं शताब्दीकर्नाटकलिंगायत/वीरशैव; वचन साहित्य; अनुभव मंटप
नरसी मेहता15वीं शताब्दीगुजरात"वैष्णव जन तो तेने कहिये"
दादू दयाल1544–1603राजस्थान (नरैना)निर्गुण; दादूपंथ; ब्रह्म संप्रदाय
मलिक मुहम्मद जायसी16वीं शताब्दीजायस (अमेठी), उत्तर प्रदेशसूफी प्रेमाख्यान; पद्मावत — अवधी में; रत्नसेन-पद्मावती का रूपक
लल्लेश्वरी (लाल देद)14वीं शताब्दीकश्मीरशैव-सूफी समन्वय; वाख
तालिका 11.3 — सूफी सिलसिले ↔ संस्थापक ↔ प्रमुख संत ↔ केंद्र
सिलसिलाभारत में प्रवर्तकप्रमुख संत एवं दरगाहविशेषता
चिश्तीख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर)कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली), बाबा फरीद (अजोधन/पाकपट्टन), निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली; उपाधि "महबूब-ए-इलाही"), नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी, शेख सलीम चिश्ती (फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश)सर्वाधिक लोकप्रिय; राज्य से दूरी; सिमा (कव्वाली/संगीत) की स्वीकृति; स्थानीय भाषा एवं जनसाधारण से जुड़ाव
सुहरावर्दीबहाउद्दीन जकरिया (मुल्तान)शेख रुक्नुद्दीन; सादी की परंपराचिश्तियों के विपरीत राज्य एवं संपत्ति स्वीकार; संगीत का विरोध
फिरदौसीशरफुद्दीन याह्या मनेरीबिहार (बिहार शरीफ)मक्तूबात (पत्र-साहित्य) के लिए प्रसिद्ध
कादिरीशाह नियामतुल्लाह एवं मखदूम मुहम्मद जिलानीमियाँ मीर (लाहौर) — दारा शिकोह के गुरुवहदत-उल-वुजूद पर बल; उदार समन्वयवाद
नक्शबंदीख्वाजा बाकी बिल्लाहशेख अहमद सरहिंदी — "मुजद्दिद अल्फ-ए-सानी"रूढ़िवादी; वहदत-उल-शुहूद का सिद्धांत; समन्वयवादी प्रवृत्तियों का विरोध
शत्तारीशाह अब्दुल्ला शत्तारीशेख मुहम्मद गौस (ग्वालियर) — तानसेन के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैंयोग-पद्धति का समावेश
कुब्रवियामीर सैयद अली हमदानीकश्मीरकश्मीर में इस्लाम के प्रसार में भूमिका
उत्तर प्रदेश संदर्भ — संत एवं सूफी केंद्र
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (सिलसिला)    (भारत में प्रवर्तक)
1. चिश्ती सिलसिला — ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
2. सुहरावर्दी सिलसिला — शेख बहाउद्दीन जकारिया
3. नक्शबंदी सिलसिला — शेख शरफुद्दीन याह्या मनेरी
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)चिश्ती सिलसिले को भारत में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में तथा सुहरावर्दी सिलसिले को शेख बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान में प्रतिष्ठित किया — ये दोनों युग्म सही हैं। नक्शबंदी सिलसिला भारत में ख्वाजा बाकी बिल्लाह लाए थे; शेख शरफुद्दीन याह्या मनेरी तो बिहार-शरीफ केंद्रित फिरदौसी सिलसिले के प्रमुख संत थे। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

प्र.2 निम्नलिखित सूफी संतों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. शेख निजामुद्दीन औलिया
2. शेख अहमद सरहिंदी
3. ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
4. शेख सलीम चिश्ती
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 3, 4, 2B3, 1, 4, 2C3, 1, 2, 4D1, 3, 2, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (लगभग 1143-1236 ई.) भारत में चिश्ती सिलसिले के प्रवर्तक थे; शेख निजामुद्दीन औलिया (1238-1325 ई.) दिल्ली के प्रसिद्ध चिश्ती संत थे; शेख सलीम चिश्ती (1478-1572 ई.) अकबर के समकालीन थे तथा शेख अहमद सरहिंदी (1564-1624 ई.) अकबर एवं जहाँगीर के काल में सक्रिय नक्शबंदी संत थे। अतः सही कालक्रम 3, 1, 4, 2 है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (सूफी संत)    (प्रमुख केंद्र/दरगाह)
1. ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती — अजमेर
2. शेख बहाउद्दीन जकारिया — मुल्तान
3. शेख सलीम चिश्ती — अजमेर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 3B2 और 3C1 और 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में तथा सुहरावर्दी संत शेख बहाउद्दीन जकारिया का केंद्र मुल्तान में था — ये दोनों युग्म सही हैं। शेख सलीम चिश्ती की दरगाह फतेहपुर सीकरी में है, अजमेर में नहीं; इसीलिए युग्म 3 गलत है।

12. मेले, त्योहार एवं लोक परंपराएँ

12.1 प्रमुख मेले

तालिका 12.1 — मेला ↔ स्थान ↔ विशेषता (सुमेलन-योग्य)
मेलास्थान / राज्यविशेषता
कुंभ मेलाप्रयागराज (उ.प्र.), हरिद्वार (उत्तराखंड), उज्जैन (म.प्र.), नासिक-त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक विरासत — 2017; प्रत्येक स्थान पर 12 वर्ष में एक बार; बीच में अर्धकुंभ। नदियाँ — प्रयागराज: गंगा-यमुना-अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम; हरिद्वार: गंगा; उज्जैन: क्षिप्रा; नासिक: गोदावरी
महाकुंभ 2025प्रयागराज, उत्तर प्रदेश13 जनवरी – 26 फरवरी 2025 (45 दिन); शाही/अमृत स्नान — मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी। इसे प्रचारित रूप से "144 वर्ष बाद" कहा गया; यह गणना पारंपरिक ज्योतिषीय है और विद्वानों में इस पर मतभेद है — परीक्षा में दिनांक एवं स्थान ही निश्चित तथ्य हैं
माघ मेलाप्रयागराज, उत्तर प्रदेशप्रतिवर्ष माघ मास में संगम पर; कल्पवास की परंपरा
पुष्कर मेलापुष्कर, राजस्थानविश्व का सबसे बड़ा ऊँट मेला; कार्तिक पूर्णिमा; ब्रह्मा मंदिर
सोनपुर मेला (हरिहर क्षेत्र)सोनपुर, बिहारएशिया का सबसे बड़ा पशु मेला; गंगा-गंडक संगम
हेमिस उत्सवहेमिस मठ, लद्दाखपद्मसंभव (गुरु रिंपोछे) के जन्मोत्सव पर छम मुखौटा-नृत्य
सूरजकुंड शिल्प मेलाफरीदाबाद, हरियाणाअंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला; प्रतिवर्ष एक "थीम राज्य" एवं "साझेदार देश"
गंगासागर मेलासागरद्वीप, पश्चिम बंगालमकर संक्रांति पर गंगा-सागर संगम स्नान; कुंभ के बाद सबसे बड़ा समागम
बनेश्वर मेलाडूँगरपुर, राजस्थान"आदिवासियों का कुंभ"; सोम-माही-जाखम संगम
तरणेतर मेलासुरेंद्रनगर, गुजरातजीवनसाथी चयन का लोक-मेला; प्रसिद्ध तरणेतर छत्री
जोनबील मेलामोरीगाँव, असमभारत का एकमात्र वस्तु-विनिमय (barter) मेला; तिवा समुदाय
अंबुबाची मेलाकामाख्या, गुवाहाटी, असमशाक्त तंत्र का महापर्व
शेखावाटी एवं कोलायत मेलाराजस्थानकोलायत (बीकानेर) — कपिल मुनि से संबद्ध
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP के प्रमुख मेले
मेलाजिलाविशेषता
कुंभ / माघ मेलाप्रयागराजत्रिवेणी संगम; UNESCO अमूर्त विरासत
नौचंदी मेलामेरठनवचंडी देवी मंदिर एवं बाले मियाँ की दरगाह साथ-साथ — सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक; होली के बाद
बटेश्वर पशु मेलाआगरायमुना तट; 101 शिव मंदिर; उत्तर भारत का बड़ा पशु मेला
देवा शरीफ मेलाबाराबंकीहाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर; हिंदू-मुस्लिम दोनों की भागीदारी
देवीपाटन मेलातुलसीपुर, बलरामपुरशक्तिपीठ पाटेश्वरी देवी; चैत्र नवरात्र
लट्ठमार होलीबरसाना–नंदगाँव, मथुराब्रज की विश्वप्रसिद्ध होली
झूला मेला एवं रामनवमी मेलाअयोध्यासरयू तट; चौदह कोसी एवं पंचकोसी परिक्रमा
गढ़मुक्तेश्वर (गंगा स्नान मेला)हापुड़कार्तिक पूर्णिमा
शाकंभरी देवी मेलासहारनपुरशक्तिपीठ; नवरात्र
कंपिल मेलाफर्रुखाबादद्रुपद की राजधानी कांपिल्य; जैन तीर्थंकर विमलनाथ की जन्मभूमि
सूरजकुंड / कैलाश मेलाआगरासावन में शिव-मेला
बहराइच का गाजी मियाँ मेलाबहराइचसैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर ज्येष्ठ मास में

12.2 क्षेत्रीय त्योहार

तालिका 12.2 — त्योहार ↔ राज्य (सुमेलन-योग्य)
त्योहारराज्यसंदर्भ
ओणमकेरलराजा महाबलि के लौटने का पर्व; वल्लमकली (नौका दौड़), पुक्कलम, ओणसद्या
पोंगलतमिलनाडुचार दिवसीय फसल पर्व — भोगी, थाई पोंगल, मट्टु पोंगल, कानुम पोंगल; जल्लीकट्टू
बिहूअसमतीन — बोहाग/रोंगाली (नववर्ष, अप्रैल), काति/कोंगाली, माघ/भोगाली
बैसाखीपंजाबफसल पर्व; 1699 में खालसा पंथ की स्थापना
हॉर्नबिल महोत्सवनागालैंड1–10 दिसंबर, किसामा; "त्योहारों का त्योहार" — 16 जनजातियों का संगम
वांगला एवं नोंगक्रेममेघालयवांगला — गारो का "100 ढोल" फसल पर्व; नोंगक्रेम — खासी
चापचार कूटमिजोरमझूम कृषि से जुड़ा वसंत पर्व; चेरॉ नृत्य
संगाई महोत्सवमणिपुरराज्य पशु संगई हिरण के नाम पर; नवंबर
लोसरलद्दाख, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचलतिब्बती-बौद्ध नववर्ष
बतुकम्मातेलंगानापुष्प-स्तूप बनाकर गौरी-पूजा; राजकीय पर्व
नुआखाईओडिशा (पश्चिमी)नई फसल का पर्व
गुड़ी पड़वा / उगादि / चेटी चंड / विषु / पुथांडु / पोइला बैसाखमहाराष्ट्र / आंध्र-तेलंगाना-कर्नाटक / सिंधी / केरल / तमिलनाडु / बंगालक्षेत्रीय नववर्ष
छठबिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेशसूर्य एवं छठी मैया की उपासना; एकमात्र प्रमुख पर्व जिसमें अस्ताचलगामी सूर्य को भी अर्घ्य
त्रिशूर पूरमकेरलहाथियों एवं पंचवाद्यम् का भव्य मंदिर-उत्सव
रथयात्रापुरी, ओडिशाजगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा के तीन रथ — नंदीघोष, तालध्वज, दर्पदलन
बस्तर दशहरा एवं मैसूर दसराछत्तीसगढ़ / कर्नाटकबस्तर दशहरा 75 दिनों तक — विश्व का सबसे लंबा; मैसूर दसरा — जंबू सवारी
दीपावलीअखिल भारतीयदिसंबर 2025 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल — भारत की 16वीं प्रविष्टि
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
   (पद/शब्द)    (संबद्ध संदर्भ)
1. 'शाही जिरगा' द्वारा भविष्य का निर्णय — बलूचिस्तान
2. 'प्रत्यक्ष कार्रवाई' का आह्वान — अखिल भारतीय मुस्लिम लीग
3. 'बाल्कन योजना' — क्रिप्स मिशन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)बलूचिस्तान का भविष्य जनमत-संग्रह से नहीं, बल्कि शाही जिरगा तथा क्वेटा नगरपालिका के निर्णय से तय हुआ; तथा 'प्रत्यक्ष कार्रवाई' का आह्वान अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने 1946 में किया — अतः युग्म 1 व 2 सही हैं। 'बाल्कन योजना' माउंटबेटन की उस आरंभिक योजना को कहा गया जिसमें प्रांतों को अलग-अलग सत्ता सौंपने की बात थी; क्रिप्स मिशन से इसका संबंध नहीं है, अतः युग्म 3 गलत है।

प्र.2 सूची-I (ऐतिहासिक स्थल) को सूची-II (नदी) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. हम्पी  B. मदुरै  C. पट्टदकल  D. नासिक
सूची-II: 1. गोदावरी  2. तुंगभद्रा  3. मलप्रभा  4. वैगै
कूट:

AA-4, B-2, C-3, D-1BA-4, B-2, C-1, D-3CA-2, B-4, C-3, D-1DA-2, B-4, C-1, D-3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)विजयनगर की राजधानी हम्पी तुंगभद्रा के तट पर, पांड्य राजधानी मदुरै वैगै नदी पर, चालुक्यकालीन मंदिर-नगर पट्टदकल मलप्रभा के पश्चिमी तट पर तथा नासिक (पांडवलेनी गुफाओं के लिए प्रसिद्ध) गोदावरी के तट पर स्थित है। अतः सही सुमेलन A-2, B-4, C-3, D-1 है।

प्र.3 युद्धोत्तर जन-उभार (1945-46) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नवंबर 1945 में लाल किले में शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल तथा गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर संयुक्त रूप से मुकदमा चलाया गया।
2. फरवरी 1946 का शाही भारतीय नौसेना विद्रोह कराची स्थित 'एच.एम.आई.एस. हिंदुस्तान' के नौसैनिकों से आरंभ हुआ था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियों — शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल तथा गुरबख्श सिंह ढिल्लों — पर नवंबर 1945 में लाल किले में संयुक्त मुकदमा चला, जिसे तीनों प्रमुख समुदायों के प्रतीक के रूप में देखा गया; अतः कथन 1 सही है। शाही भारतीय नौसेना विद्रोह 18 फरवरी 1946 को बंबई के 'एच.एम.आई.एस. तलवार' से आरंभ हुआ, कराची से नहीं; अतः कथन 2 गलत है।

13. भारत की विश्व धरोहर — UNESCO, अमूर्त विरासत एवं GI

वाराणसी–सारनाथ मथुरा भितरगाँव देवगढ़ आगरा फतेहपुर सीकरी जौनपुर लखनऊ कैराना अजराड़ा-मेरठ अतरौली रामपुर फर्रुखाबाद कन्नौज भदोही सिद्धार्थनगर
प्राचीन / बौद्ध-गुप्तमध्यकालीन स्थापत्यसंगीत घरानेGI समूह
उत्तर प्रदेश — अध्याय का पूरा UP-अंश एक मानचित्र में। वाराणसी–सारनाथ: सारनाथ 2026 में भारत का 45वाँ UNESCO स्थल; वाराणसी बनारस घराना (तबला एवं कथक), ठुमरी, शहनाई तथा बनारसी साड़ी (GI) का केंद्र। देवगढ़ (ललितपुर) तथा कैराना (शामली) राज्य के दक्षिणी एवं उत्तर-पश्चिमी सिरों पर हैं, इसलिए सरलीकृत रूपरेखा के बाहर दिखते हैं।

13.1 विश्व धरोहर स्थल — वर्तमान स्थिति (2026)

तालिका 13.1 — हाल के अंकन (कालक्रम-योग्य)
वर्षस्थलराज्यवर्ग
2026सारनाथ का प्राचीन बौद्ध स्थलउत्तर प्रदेशसांस्कृतिक (45वाँ)
2025भारत के मराठा सैन्य भूदृश्यमहाराष्ट्र + तमिलनाडुसांस्कृतिक (44वाँ)
2024मोइदम (चराइदेव)असमसांस्कृतिक (43वाँ)
2023शांतिनिकेतनपश्चिम बंगालसांस्कृतिक
होयसल के पवित्र समूह (बेलूर, हलेबिड, सोमनाथपुर)कर्नाटकसांस्कृतिक
2021काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिरतेलंगानासांस्कृतिक
धोलावीरा — एक हड़प्पाकालीन नगरगुजरातसांस्कृतिक
2019जयपुर नगरराजस्थानसांस्कृतिक
2018मुंबई की विक्टोरियन गॉथिक एवं आर्ट डेको इमारतेंमहाराष्ट्रसांस्कृतिक
2017अहमदाबाद — भारत का प्रथम विश्व धरोहर नगरगुजरातसांस्कृतिक
2016नालंदा महाविहार; कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान; ले कोर्बूजिए का स्थापत्य (चंडीगढ़ कैपिटल कॉम्प्लेक्स)बिहार / सिक्किम / चंडीगढ़सांस्कृतिक / मिश्रित / सांस्कृतिक
भारत के 7 प्राकृतिक तथा 1 मिश्रित स्थल — याद रखने योग्य
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP के चार विश्व धरोहर स्थल

2026 में सारनाथ के जुड़ने के साथ उत्तर प्रदेश के विश्व धरोहर स्थल चार हो गए:

  1. ताजमहल, आगरा — 1983
  2. आगरा का किला — 1983
  3. फतेहपुर सीकरी — 1986
  4. सारनाथ का प्राचीन बौद्ध स्थल, वाराणसी — 2026

ध्यान दें — पहले तीनों मुगल स्थापत्य के हैं, जबकि चौथा बौद्ध स्थल है; और यह उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा स्थल है जो मुगलकालीन नहीं। UP की अनंतिम सूची में मथुरा-वृंदावन की गोविंद देव मंदिर शृंखला, काशी के घाट तथा श्रावस्ती-कुशीनगर-कौशांबी के बौद्ध स्थल जैसे नाम भी रहे हैं।

13.2 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage)

तालिका 13.2 — भारत की 16 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत प्रविष्टियाँ (वर्ष-क्रम में)
वर्षप्रविष्टिराज्य/क्षेत्र
2008कूटियाट्टम — संस्कृत रंगमंचकेरल
वैदिक मंत्रोच्चार की परंपराअखिल भारतीय
रामलीला — रामायण का पारंपरिक मंचनउत्तर प्रदेश एवं उत्तर भारत
2009रम्माण — गढ़वाल हिमालय का धार्मिक उत्सव एवं अनुष्ठान नाट्यउत्तराखंड
2010छऊ नृत्यओडिशा, झारखंड, प. बंगाल
कालबेलिया लोकगीत एवं नृत्यराजस्थान
मुडियेट्टु — अनुष्ठान नाट्य एवं नृत्य-नाटिकाकेरल
2012लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चारलद्दाख
2013संकीर्तन — अनुष्ठानिक गायन, वादन एवं नृत्यमणिपुर
2014जंडियाला गुरु के ठठेरों का पारंपरिक पीतल एवं ताम्र बर्तन शिल्पपंजाब
2016योगअखिल भारतीय
नवरोज़ (बहुराष्ट्रीय — 12 अन्य देशों के साथ साझा)भारत सहित
2017कुंभ मेलाप्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक
2021कोलकाता की दुर्गा पूजापश्चिम बंगाल
2023गुजरात का गरबागुजरात
2025दीपावली — भारत की 16वीं एवं नवीनतम प्रविष्टिअखिल भारतीय
परीक्षा-दृष्टि — 2025-26 का सर्वाधिक संभावित करेंट-कल्चर प्रश्न

8–13 दिसंबर 2025 को भारत ने पहली बार UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण हेतु अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की मेजबानी की — स्थान लाल किला, नई दिल्ली। इसी सत्र में दीपावली को प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया। यह सत्र भारत द्वारा 2003 के अभिसमय के अनुसमर्थन (2005) के 20 वर्ष पूरे होने के साथ पड़ा।
इसी क्रम में — अप्रैल 2025 में UNESCO के "Memory of the World" रजिस्टर में भगवद्गीता तथा भरतमुनि का नाट्यशास्त्र जोड़े गए; इसके साथ भारत की प्रविष्टियाँ 14 हो गईं।

13.3 भौगोलिक संकेतक (GI Tag)

उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP के प्रमुख GI उत्पाद
उत्पादजिला/क्षेत्रटिप्पणी
बनारसी साड़ी (ब्रोकेड एवं साड़ी)वाराणसी एवं आसपासजरी-ब्रोकेड बुनाई; UP का सर्वाधिक प्रसिद्ध GI
लखनऊ चिकनकारीलखनऊमहीन हस्त-कढ़ाई; मुगल दरबार से जुड़ी परंपरा
कन्नौज इत्र (Perfume)कन्नौज"भारत का इत्र-नगर"; देग-भपका पारंपरिक आसवन विधि; मिट्टी अत्तर प्रसिद्ध
कालानमक चावलसिद्धार्थनगर एवं तराई क्षेत्रसुगंधित काला-भूसी वाला धान; बुद्ध से जुड़ी लोक-परंपरा; ODOP उत्पाद
भदोही कालीनभदोही–मिर्जापुरहाथ से बुने गलीचे; "कालीन नगरी"
फिरोजाबाद काँच शिल्पफिरोजाबादचूड़ी एवं काँच उद्योग
मुरादाबाद धातु शिल्पमुरादाबाद"पीतल नगरी"
निजामाबाद की काली मिट्टी के बर्तनआजमगढ़चमकदार काली पॉटरी पर चाँदी-सदृश नक्काशी
आगरा का पेठा; मथुरा का पेड़ाआगरा; मथुरापारंपरिक मिठाइयाँ
बनारस गुलाबी मीनाकारी, जरदोजी, धातु-रिपूसे एवं लकड़ी के खिलौनेवाराणसीकाशी के हस्तशिल्प समूह
मलिहाबादी दशहरी आम; इलाहाबादी सुरखा अमरूद; बनारसी लंगड़ा आम; रामनगर भंटालखनऊ; प्रयागराज; वाराणसी; वाराणसीकृषि-GI
सहारनपुर का काष्ठ शिल्प; बुलंदशहर पॉटरी; संभल का हॉर्न-क्राफ्ट; मेरठ का खेल उत्पादअन्य प्रमुख GI/ODOP उत्पाद

UP सरकार की ODOP (एक जिला एक उत्पाद) योजना (2018) ने इन्हीं परंपरागत उत्पादों को GI पंजीकरण एवं निर्यात से जोड़ा — UPPSC इसे अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति दोनों अनुभागों में पूछता है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सूची में अंकित किए जाने के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. धोलावीरा : एक हड़प्पाकालीन नगर
2. पट्टदकल का स्मारक-समूह
3. चराइदेव के मोइदाम
4. रानी की वाव, पाटन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 2, 1, 3B2, 4, 3, 1C4, 2, 3, 1D2, 4, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पट्टदकल का स्मारक-समूह (कर्नाटक) 1987 में, रानी की वाव (पाटन, गुजरात) 2014 में, धोलावीरा (गुजरात) 2021 में तथा असम के चराइदेव के अहोम मोइदाम 2024 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में अंकित हुए। अतः सही कालक्रम 2, 4, 1, 3 है।

प्र.2 यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित 'भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य' (Maratha Military Landscapes of India) में निम्नलिखित में से कौन-सा दुर्ग सम्मिलित नहीं है?

AशिवनेरीBरायगढ़Cचित्तौड़गढ़Dजिंजी (सेंजी)
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)'भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य' में सम्मिलित बारह दुर्गों में ग्यारह महाराष्ट्र में (सालहेर, शिवनेरी, लोहगढ़, खांदेरी, रायगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़, सुवर्णदुर्ग, पन्हाला, विजयदुर्ग, सिंधुदुर्ग) तथा एक तमिलनाडु में (जिंजी) है। चित्तौड़गढ़ राजस्थान के 'पहाड़ी दुर्ग' समूह का भाग है, मराठा सैन्य परिदृश्य का नहीं।

प्र.3 संविधान सभा की समितियों/उप-समितियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी थे।
2. अल्पसंख्यक उप-समिति के अध्यक्ष एच.सी. मुखर्जी थे।
3. उत्तर-पूर्व सीमांत जनजातीय क्षेत्र एवं असम बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति के अध्यक्ष गोपीनाथ बरदोलोई थे।
4. संघ शक्ति समिति (Union Powers Committee) के अध्यक्ष के.एम. मुंशी थे।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)परामर्शदात्री समिति (Advisory Committee) के अध्यक्ष सरदार पटेल थे और उसकी उप-समितियों में मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी, अल्पसंख्यक उप-समिति के अध्यक्ष एच.सी. मुखर्जी तथा उत्तर-पूर्व सीमांत जनजातीय क्षेत्र उप-समिति के अध्यक्ष गोपीनाथ बरदोलोई थे; अतः कथन 1, 2 तथा 3 सही हैं। संघ शक्ति समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे, के.एम. मुंशी नहीं — मुंशी प्रारूप समिति के सदस्य थे; अतः कथन 4 गलत है।

14. कालक्रम एवं द्रुत पुनरावृत्ति

14.1 कला-स्थापत्य का कालक्रम

तालिका 14.1 — कालक्रम (अनुक्रम-प्रश्नों के लिए)
कालकला/स्थापत्य की घटना
लगभग 2600–1900 ई.पू.हड़प्पा नगर-नियोजन; विशाल स्नानागार; धौलावीरा के जलाशय
तीसरी शताब्दी ई.पू.अशोक स्तंभ (सारनाथ सिंह शीर्ष); बराबर गुफाएँ; सांची एवं धर्मराजिका स्तूप का मूल
दूसरी–प्रथम शताब्दी ई.पू.भरहुत एवं सांची की वेदिका; सातवाहनकालीन तोरण; कार्ले चैत्य; उदयगिरि-खंडगिरि (खारवेल)
प्रथम–तीसरी शताब्दीकुषाण — मथुरा एवं गांधार में बुद्ध की प्रथम मानव प्रतिमाएँ; अमरावती (सातवाहन)
चौथी–छठी शताब्दीगुप्त — सारनाथ बुद्ध; भितरगाँव (ईंट) एवं देवगढ़ मंदिर; उदयगिरि (विदिशा) का वराह; अजंता के परवर्ती चित्र (वाकाटक)
7वीं–9वीं शताब्दीपल्लव — महाबलीपुरम के रथ, तट मंदिर, कांचीपुरम; चालुक्य — बादामी, ऐहोल, पट्टदकल; राष्ट्रकूट — एलोरा का कैलाश मंदिर; कश्मीर — मार्तंड सूर्य मंदिर
10वीं–13वीं शताब्दीचोल — बृहदेश्वर (1010), गंगैकोंडचोलपुरम, चोल कांस्य; चंदेल — खजुराहो; सोमवंशी/गंग — लिंगराज, जगन्नाथ, कोणार्क (1250); सोलंकी — मोढेरा, रानी की वाव, दिलवाड़ा; होयसल — बेलूर (1117), हलेबिड, सोमनाथपुर (1268); काकतीय — रामप्पा (1213)
1192–1526दिल्ली सल्तनत — कुव्वत-उल-इस्लाम, कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा (1311), तुगलकाबाद, लोदी मकबरे; प्रांतीय — जौनपुर शर्की, बंगाल, गुजरात, मालवा, बीजापुर
1526–1707मुगल — हुमायूँ का मकबरा (1565–72) → फतेहपुर सीकरी (1571–85) एवं बुलंद दरवाजा → एतमाद-उद-दौला (1622–28) → ताजमहल (1632–53) → लाल किला एवं जामा मस्जिद → बीबी का मकबरा
1784–1838अवध — बड़ा इमामबाड़ा एवं रूमी दरवाजा (आसफ-उद-दौला) → छोटा इमामबाड़ा (मुहम्मद अली शाह)
19वीं–20वीं शताब्दीऔपनिवेशिक — छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (1888) → विक्टोरिया मेमोरियल (1921) → गेटवे ऑफ इंडिया (1924) → लुटियंस की नई दिल्ली एवं इंडिया गेट (1931)

14.2 चित्रकला एवं संगीत-नृत्य का कालक्रम

14.3 अंतिम-क्षण पुनरावृत्ति — 30 निर्णायक तथ्य

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अलाई दरवाजा भारत में वास्तविक मेहराब (true arch) तथा वास्तविक गुंबद (true dome) के प्रयोग का प्रारंभिक उदाहरण है।
कारण (R): इसका निर्माण 1311 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिणी प्रवेश-द्वार के रूप में करवाया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अलाई दरवाजा 1311 ई. में अलाउद्दीन खलजी द्वारा कुतुब परिसर में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिणी द्वार के रूप में बनवाया गया और इसमें भारत का प्रारंभिक सफल वास्तविक गुंबद तथा नालाकार मेहराबें हैं। दोनों कथन सही हैं, किन्तु (R) केवल निर्माता एवं तिथि बताता है, तकनीकी विशिष्टता की व्याख्या नहीं करता।

प्र.2 विश्व के विशालतम गुंबदों में गिना जाने वाला 'गोल गुंबद' (बीजापुर) किस शासक का मकबरा है?

Aइब्राहीम आदिल शाह द्वितीयBमुहम्मद आदिल शाहCयूसुफ आदिल खाँDसुल्तान कुली कुतुब शाह
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)गोल गुंबद बीजापुर के आदिलशाही सुल्तान मुहम्मद आदिल शाह का मकबरा है, जिसकी 'व्हिस्परिंग गैलरी' (फुसफुसाती दीर्घा) प्रसिद्ध है। इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय से 'इब्राहीम रौजा' जुड़ा है, यूसुफ आदिल खाँ आदिलशाही वंश का संस्थापक था तथा सुल्तान कुली कुतुब शाह गोलकुंडा की कुतुबशाही का संस्थापक था।

प्र.3 दक्षिण भारत में नागर तथा द्रविड़ दोनों के तत्त्वों के समन्वय से बनी 'वेसर' शैली का विकास मुख्यतः किस राजवंश के संरक्षण में हुआ?

Aचालुक्यBपल्लवCपांड्यDचेर
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)बादामी के चालुक्यों तथा बाद में कल्याणी के चालुक्यों के संरक्षण में ऐहोल, बादामी एवं पट्टदकल में नागर और द्रविड़ तत्त्वों के मेल से 'वेसर' शैली विकसित हुई; होयसल स्थापत्य इसी परंपरा का चरम माना जाता है। पल्लवों ने द्रविड़ शैली को विकसित किया।