यह वही अध्याय है जिसे गद्य से नहीं, आँख से याद किया जाता है। यहाँ हर चित्र किसी
दृश्य पहचान को पढ़ा रहा है, सजावट के लिए एक भी नहीं; कैप्शन में वही शब्द मोटे हैं जो विकल्प बनकर आते हैं।
पूरी सूचियों एवं तालिकाओं के लिए अध्याय देखें — यह पृष्ठ केवल दोहराने के लिए है।
मंदिर शैली का भौगोलिक बँटवारा — नागर हिमालय से विंध्य तक, द्रविड़ कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक, वेसर दोनों के बीच दक्कन में। ध्यान दें कि वेसर के केंद्र कर्नाटक में हैं (पट्टदकल, हलेबिड, सोमनाथपुर; बेलूर हलेबिड से सटा है), और रामप्पा (तेलंगाना) काकतीय है। एलोरा का कैलास एवं हम्पी शैलकृत/विजयनगर परंपरा के हैं। कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर रेखा से बाहर उत्तर में पड़ता है।
नागर — कंदरिया महादेव, खजुराहो
वक्ररेखीय शिखर, शीर्ष पर आमलक + कलश
चिपके लघु उरः-शृंग = शेखरी; ऊँची जगती
न गोपुरम, न प्राकार, न तालाब
विद्याधर (चंदेल), ~1030 ई.
CC BY-SA 4.0 · Dey.sandip
द्रविड़ — बृहदेश्वर, तंजावुर
पिरामिडाकार विमान, उसके ऊपर गुंबदाकार शिखर + स्तूपिका
प्राकार, गोपुरम, पुष्करिणी, नंदी
राजराज प्रथम (चोल), ~1010 ई. · UNESCO 1987
CC BY-SA 4.0 · Original: Rainer Halama
Derivative work: UnpetitproleX
स्मृति-सूत्र — तीन शैलियाँ, तीन क्षेत्र“ऊपर नागर, नीचे द्रविड़, बीच में वेसर”
नागर हिमालय–विंध्य · द्रविड़ कृष्णा–कन्याकुमारी · वेसर दोनों के बीच (दक्कन)।
पहचान — “आमलक-कलश नागर का, स्तूपिका द्रविड़ की; गोपुरम-प्राकार-तालाब केवल द्रविड़ में।”
शब्द-जाल: नागर में शिखर = पूरी वक्र संरचना, द्रविड़ में विमान = पूरी संरचना और शिखर = उसके ऊपर का गुंबद।
मीनाक्षी–सुंदरेश्वर, मदुरै — पहचानने की चीज़ गोपुरम है। चोल काल में विमान सर्वोच्च था; पांड्य काल (13वीं सदी) से गोपुरम विमान से ऊँचा हो गया — नागर से सबसे बड़ा दृश्य भेद यही। वर्तमान स्वरूप नायक काल का — 14 गोपुरम, स्वर्ण कमल तालाब। · CC BY-SA 3.0 · Bernard Gagnon
पल्लवमहेंद्र (शैलकृत मंडप) → मामल्ल (महाबलीपुरम के एकाश्म रथ) → राजसिंह (तट मंदिर, कांचीपुरम कैलासनाथ)
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चोलविशाल विमान सर्वोच्च — बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, ऐरावतेश्वर
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पांड्यगोपुरम विमान से ऊँचा; विशाल प्राकार
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विजयनगरकल्याण मंडप, अम्मन मंदिर, यालि-स्तंभ
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नायकविशाल प्रकारम — मीनाक्षी, श्रीरंगम
स्मृति-सूत्र — द्रविड़ के चरण“पल्लव चोल पांड्य, विजय नायक”
सोलंकी / मारू-गुर्जरदिलवाड़ा (विमल शाह 1031; वस्तुपाल-तेजपाल 1230), मोढेरा, रानी की वाव
गुप्त (आदि नागर)मध्य भारत एवं उ.प्र. · सांची मंदिर 17, भितरगाँव, देवगढ़
कोणार्क का रथ-चक्र — पूरा मंदिर सूर्य के रथ के रूप में: 12 जोड़ी पहिए एवं 7 अश्व। नरसिंहदेव प्रथम, पूर्वी गंग, ~1250 ई.; “ब्लैक पैगोडा”; UNESCO 1984। · CC BY-SA 4.0 · Joydeepकैलास मंदिर, एलोरा (गुफा 16) — यह बनाया नहीं, चट्टान से ऊपर से नीचे काटकर निकाला गया: विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म मंदिर। राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम, 8वीं सदी; योजना द्रविड़। एलोरा की 34 गुफाएँ — 1–12 बौद्ध, 13–29 हिंदू, 30–34 जैन; UNESCO 1983। · CC BY-SA 4.0 · Rohit Sharmaभितरगाँव, कानपुर देहात (उ.प्र.) — देखने की चीज़ सामग्री है: मंदिर पकी ईंट का है, पत्थर का नहीं। यही इसे भारत का प्राचीनतम जीवित ईंट मंदिर बनाता है जिसका शिखर विद्यमान है; दीवारों पर टेराकोटा पैनल, प्रवेश मेहराबदार। गुप्तकालीन, ~5वीं सदी। दूसरी UP-कड़ी — देवगढ़ का दशावतार मंदिर (~6वीं सदी), पंचायतन का प्रारंभिक उदाहरण; पैनल — शेषशायी विष्णु, गजेंद्र मोक्ष। · CC BY-SA 4.0 · Ankitshilu
3. मूर्तिकला — मथुरा बनाम गांधार
दोनों कुषाण युग की, दोनों का संरक्षक कनिष्क — पर पत्थर, मुख, वस्त्र और प्रभामंडल चारों अलग।
बौद्ध + जैन + ब्राह्मण — तीनों; प्रभाव देशज (यक्ष परंपरा)
कंकाली टीला; माट — कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा
CC BY-SA 3.0 · Unknown authorUnknown author
गांधार — पेशावर–तक्षशिला–स्वात
धूसर/नीली शिस्ट, कहीं स्टको
मुख ध्यानमग्न; आँखें अधखुली; लहरदार केश
मोटी यथार्थवादी सिलवटें (रोमन टोगा), दोनों कंधे ढके; प्रभामंडल सादा
केवल बौद्ध — जैन/हिंदू नहीं; प्रभाव यूनानी-रोमन
तक्षशिला, हड्डा, बामियान, जौलियाँ
CC0 · anonymous
यहीं सबसे ज्यादा गलती होती है
कुंजी — गांधार = विदेशी रूप, सादा प्रभामंडल, केवल बौद्ध। मथुरा = देशज रूप, अलंकृत प्रभामंडल, तीनों धर्म।
तीसरी शैली अमरावती — कृष्णा–गोदावरी डेल्टा, सातवाहन-इक्ष्वाकु, श्वेत चूना-पत्थर, कथात्मक पैनल; नागार्जुनकोंडा।
“बुद्ध की प्रथम मूर्ति?” — अधिकांश आधुनिक मत: दोनों में समकालीन एवं स्वतंत्र रूप से; विकल्प में “दोनों” हो तो वही सुरक्षित।
चोल नटराज — प्रतिमा स्वयं प्रश्न है; प्रतीक पढ़िए: डमरू (सृष्टि), अग्नि (संहार), अभय (रक्षण), पैरों तले बौना अपस्मार (अज्ञान), वलय तिरुवासी (ब्रह्मांड), उठा पैर (मोक्ष)। तकनीक मधूच्छिष्ट विधान (lost-wax), धातु पंचलोहा — साँचा तोड़कर निकाली जाती है, इसलिए हर प्रतिमा अनन्य; ये जुलूस की उत्सव-मूर्तियाँ थीं। · Public domain · सारनाथ का सिंह शीर्ष — फलक पर चार पशु (सिंह, हाथी, अश्व, वृषभ) एवं बीच में चार धर्मचक्र; आधार में उल्टा कमल। एकाश्म एवं आधार-रहित (ईरानी स्तंभों के विपरीत), दर्पण-सी मौर्य पॉलिश, पत्थर चुनार (मिर्जापुर) का। 26 जनवरी 1950 को राजकीय प्रतीक — उसमें केवल तीन सिंह दिखते हैं; “सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से, मूल शीर्ष का भाग नहीं। · CC0 · Apurv013
4. चित्रकला — शैली ही पहचान है
भीमबेटकाशैलचित्र; UNESCO 2003
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अजंता एवं बाघटेम्पेरा; वाकाटक हरिषेण
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पाल11वीं सदी; ताड़-पत्र पर प्राचीनतम लघुचित्र
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जैन/अपभ्रंशकल्पसूत्र; बाहर निकली दूर वाली आँख
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मुगलतस्वीरखाना; दरबारी एवं यथार्थवादी
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राजस्थानी एवं पहाड़ीबसोहली → गुलेर → कांगड़ा
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कंपनी → बंगाल स्कूल → PAG 1947पटना कलम; अवनींद्रनाथ; सूजा-रजा-हुसैन
Public domain · Attributed to either Bassia, the brother of Purkhu, or Bassia's son Shiba
मधुबनी / मिथिला — बिहार
रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जाता — अचूक पहचान
दीवार-आँगन पर, प्रायः स्त्रियों द्वारा; कोहबर
सीता देवी, गंगा देवी, बउआ देवी
CC BY-SA 3.0 · Rohini
वारली — महाराष्ट्र
गेरुई पृष्ठभूमि पर केवल सफेद (चावल का लेप)
आकृतियाँ त्रिकोण + वृत्त + रेखा से
केंद्र में तारपा नृत्य का घेरा; जिव्या सोमा मशे
CC BY-SA 4.0 · Omrmankar
उत्तर प्रदेश संदर्भ — चित्रकला की UP-कड़ियाँ
चुनार रागमाला (1591) — बूँदी के भोज सिंह ने चुनार (मिर्जापुर) में मुगल-प्रशिक्षित चित्रकारों से बनवाई;
यही बूँदी एवं कोटा शैलियों का आदि-प्रतिमान। साथ में अवध/लखनऊ एवं फर्रुखाबाद शैलियाँ, कंपनी शैली के केंद्र
वाराणसी एवं लखनऊ, तथा लोक में संझी (मथुरा) एवं कोहबर (पूर्वी UP)।
घटम् एवं जलतरंग पात्र हैं पर झिल्ली नहीं — इसलिए घन।
कंजीरा पर खाल चढ़ी है — इसलिए अवनद्ध (झाँझ लगे होने पर भी)।
हारमोनियम धौंकनी से रीड कंपित करता है — इसलिए सुषिर, तत नहीं; मोरसिंग मुँह से बजने पर भी घन।
स्मृति-सूत्र — तबले के छह घराने“दिल्ली अजरा, लखन फर्रु, बना पंजाब”
दिल्ली (सिद्धार खाँ ढाढ़ी — आदि-घराना, “दो उँगली का बाज”) · अजराड़ा (मेरठ) · लखनऊ ·
फर्रुखाबाद · बनारस (पं. राम सहाय) · पंजाब (अल्ला रक्खा, जाकिर हुसैन)। बीच के चार उत्तर प्रदेश के — यही पूछा जाता है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — घरानों की धरती
खयाल के किराना (कैराना, शामली), आगरा, रामपुर–सहसवान एवं जयपुर–अतरौली (अतरौली, अलीगढ़);
सितार का इमदादखानी/एटावा (इटावा); कथक के लखनऊ (भाव) एवं बनारस (नटवरी) घराने। ठुमरी का उत्कर्ष
वाजिद अली शाह के लखनऊ दरबार में; खयाल के विकास में हुसैन शाह शर्की (जौनपुर); तानसेन के गुरु
स्वामी हरिदास वृंदावन के; भातखंडे (10 थाट) ने लखनऊ का मैरिस कॉलेज खोला।
6. आठ शास्त्रीय नृत्य — वेशभूषा एवं मुद्रा से पहचानिए
दक्षिण भारतउत्तर भारतपूर्व एवं पूर्वोत्तर
आठों शास्त्रीय नृत्य मानचित्र पर — केरल अकेला दो नृत्य देता है (कथकली एवं मोहिनीअट्टम्), और कथक एकमात्र उत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य है। कुचिपुड़ी कृष्णा जिले के उसी नाम के गाँव से, सत्रिया असम के सत्रों से।
भरतनाट्यम् — तमिलनाडु
मुद्रा अरमंडी, स्थिर धड़, रेखागणितीय; एकाहार्य
मूल सदिर/दासीअट्टम; क्रम अलारिप्पु→वर्णम्→तिल्लाना
ग्रंथ अभिनय दर्पण; तंजौर चौकड़ी; रुक्मिणी देवी अरुंडेल
CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook
कथक — उत्तर प्रदेश
सीधा धड़, खड़े पैर; तत्कार एवं चक्कर; घुँघरू सर्वाधिक
एकमात्र नृत्य जिस पर फारसी-मुगल प्रभाव; संगीत हिंदुस्तानी
घराने — लखनऊ, जयपुर, बनारस, रायगढ़; बिरजू महाराज
CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi
कथकली — केरल
विशाल चुट्टी मुख-सज्जा; पच्चा (हरा, नायक), कत्ति, ताड़ी, करी, मिनुक्कु
नृत्य-नाटिका; परंपरागत रूप से केवल पुरुष; नेत्र-अभिनय
विषय गीतगोविंद; ग्रंथ अभिनय चंद्रिका; केलुचरण महापात्र
CC BY-SA 3.0 · Augustus Binu/ facebook
मणिपुरी — मणिपुर
घुँघरू नहीं, पैर का प्रहार नहीं; गति गोलाकार
स्त्री-वेश पोतलोई (बेलनाकार घाघरा); रास लीला
पुंग चोलोम; लाई हराओबा; संकीर्तन UNESCO 2013
CC BY-SA 4.0 · Suyash Dwivedi
मोहिनीअट्टम् — केरल
श्वेत-स्वर्ण कसावु साड़ी, बायीं ओर जूड़ा; अंदोलिका गति
लास्य-प्रधान, एकल, स्त्री-नृत्य; संगीत सोपान
स्वाति तिरुनाल; कल्याणिकुट्टी अम्मा
CC BY-SA 4.0 · Shagil Kannur
सत्रिया — असम
शंकरदेव द्वारा; सत्र में भोकोत द्वारा
अंकीया नाट एवं भाओना; वाद्य खोल
2000 में मान्यता — सबसे नवीनतम
CC BY-SA 4.0 · Joydeep Chakraborty
स्मृति-सूत्र — आठ शास्त्रीय नृत्य“भरत कथा कहे — कुचि, ओडिसी, मणि, मोहे, सत्र”
भरतनाट्यम् (तमिलनाडु) · कथा=कथक (उ.प्र.) · कहे=कथकली (केरल) · कुचिपुड़ी (आंध्र) ·
ओडिसी (ओडिशा) · मणिपुरी (मणिपुर) · मोहे=मोहिनीअट्टम् (केरल) · सत्रिया (असम)।
दो पक्के तथ्य — केरल अकेला दो नृत्य देता है, कथक अकेला उत्तर भारतीय है। मान्यता संगीत नाटक अकादमी (1953) देती है;
संस्कृति मंत्रालय कुछ संदर्भों में छऊ जोड़कर नौ बताता है।
कुचिपुड़ी बनाम भरतनाट्यम् — सबसे आम भ्रम
दोनों दक्षिण भारतीय, दोनों में कर्नाटक संगीत एवं समान हस्त-मुद्राएँ — भेद चार:
(1) भरतनाट्यम् एकाहार्य, कलाकार संवाद नहीं बोलता; कुचिपुड़ी नृत्य-नाटिका, कलाकार बोलता-गाता है।
(2) धड़ स्थिर बनाम तरल एवं छलाँग-युक्त। (3) तरंगम् केवल कुचिपुड़ी में।
(4) मूल — देवदासी/सदिर (स्त्री) बनाम भागवतुलु (पुरुष ब्राह्मण)।
और — कथकली (पुरुष, विशाल वेश) बनाम मोहिनीअट्टम् (स्त्री, लास्य), दोनों केरल के;
ओडिसी = त्रिभंग, भरतनाट्यम् = अरमंडी, कथक = सीधी खड़ी मुद्रा।
7. षड्दर्शन — प्रवर्तक कभी न भूलें
स्मृति-सूत्र — छह दर्शन, तीन जोड़े“कपि-पत · गौ-कण · जै-बाद”
सांख्य–योग (सिद्धांत + साधना) = कपिल · पतंजलि · न्याय–वैशेषिक (तर्क + तत्व-वर्गीकरण)
= गौतम · कणाद · पूर्व मीमांसा–वेदांत (कर्म + ज्ञान) = जैमिनि · बादरायण।
“गौतम = वैशेषिक” या “कणाद = न्याय” का उलटफेर सबसे आम distractor है।
न्याय (गौतम) — तर्कशास्त्र; 16 पदार्थ; पंचावयव अनुमान
वैशेषिक (कणाद) — परमाणुवाद; 7 पदार्थ
पूर्व मीमांसा (जैमिनि) — कर्मकांड; वेद अपौरुषेय; अपूर्व
वेदांत (बादरायण) — ब्रह्मसूत्र; प्रस्थानत्रयी
नास्तिक — वेद को प्रमाण न मानने वाले
चार्वाक/लोकायत — भौतिकवाद; केवल प्रत्यक्ष प्रमाण; चार भूत (आकाश नहीं)
बौद्ध — अनात्मवाद, क्षणिकवाद; योगाचार (असंग-वसुबंधु), शून्यवाद (नागार्जुन)
जैन — अनेकांतवाद, स्याद्वाद, सप्तभंगी नय
आजीवक (मक्खलि गोसाल) — नियतिवाद; बराबर गुफाएँ इन्हीं को दान
सूक्ष्म भेद — अभिकथन–कारण का पसंदीदा
“नास्तिक” का अर्थ ईश्वर को न मानना नहीं, वेद को प्रमाण न मानना है — इसीलिए
सांख्य निरीश्वरवादी होकर भी आस्तिक है। प्रमाणों की संख्या: चार्वाक 1 · वैशेषिक 2 · सांख्य-योग 3 · न्याय 4 · मीमांसा 6।
8. कालक्रम — अनुक्रम प्रश्नों के लिए
2600–1900 ई.पू.हड़प्पा नगर-नियोजन; ईंटों का अनुपात 4:2:1
तीसरी सदी ई.पू.सारनाथ का सिंह शीर्ष; बराबर गुफाएँ (आजीवकों को दान); धर्मराजिका स्तूप
दूसरी–प्रथम सदी ई.पू.भरहुत एवं सांची की वेदिका; सांची के तोरण सातवाहन काल के; कार्ले का चैत्य; हाथीगुम्फा (खारवेल)
प्रथम–तीसरी सदीकुषाण — मथुरा एवं गांधार में बुद्ध की प्रथम मानव प्रतिमाएँ; अमरावती
5वीं–6वीं सदीगुप्त — भितरगाँव एवं देवगढ़; सारनाथ की उपदेशरत बुद्ध प्रतिमा; अजंता के वाकाटक चित्र; धमेख स्तूप
8वीं सदीएलोरा का कैलास (राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम); पट्टदकल का विरूपाक्ष (लोकमहादेवी); मार्तंड (ललितादित्य)
1287 · 1311प्रथम सच्ची मेहराब — बलबन का मकबरा; प्रथम सच्चा गुंबद — अलाई दरवाजा; प्रथम दोहरा गुंबद — सिकंदर लोदी का मकबरा
1394–1479जौनपुर की शर्की शैली — अटाला एवं जामा मस्जिद; “शीराज-ए-हिंद”
1591 · 1632–53चुनार रागमाला (मिर्जापुर) — बूँदी-कोटा का आदि-प्रतिमान → ताजमहल (उस्ताद अहमद लाहौरी); बीच में एतमाद-उद-दौला (1622–28) — प्रथम पूर्ण संगमरमर + पित्रादूरा
1930 · 1936 · 1953 · 2000केरल कलामंडलम् (वल्लत्तोल) → कलाक्षेत्र (रुक्मिणी देवी) → संगीत नाटक अकादमी → सत्रिया को आठवें शास्त्रीय नृत्य की मान्यता
2025नाट्यशास्त्र एवं भगवद्गीता “Memory of the World” में (अप्रैल); दीपावली अमूर्त विरासत में (दिसंबर, नई दिल्ली सत्र) — 16वीं प्रविष्टि
25 जुलाई 2026सारनाथ — भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल; 48वाँ सत्र, बुसान (द. कोरिया); 1998 से अनंतिम सूची में था
9. उत्तर प्रदेश — पूरा अध्याय एक मानचित्र में
प्राचीन / बौद्ध-गुप्तमध्यकालीन स्थापत्यसंगीत घरानेGI समूह
उत्तर प्रदेश — अध्याय का पूरा UP-अंश एक मानचित्र में। वाराणसी–सारनाथ: सारनाथ 2026 में भारत का 45वाँ UNESCO स्थल; वाराणसी बनारस घराना (तबला एवं कथक), ठुमरी, शहनाई तथा बनारसी साड़ी (GI) का केंद्र। देवगढ़ (ललितपुर) तथा कैराना (शामली) राज्य के दक्षिणी एवं उत्तर-पश्चिमी सिरों पर हैं, इसलिए सरलीकृत रूपरेखा के बाहर दिखते हैं।अटाला मस्जिद, जौनपुर — शर्की शैली पहचानने का पूरा नियम इसी चित्र में है: (1) ऊँचा, ढलवाँ किनारों वाला आयताकार प्रवेश-पाइलॉन जो भीतर की मेहराब को पूरी तरह ढक लेता है; (2) मीनार एक भी नहीं — यही इसे दिल्ली एवं मुगल मस्जिदों से अलग करता है; (3) अलंकरण अल्प। इब्राहीम शाह शर्की द्वारा पूर्ण; जौनपुर = “शीराज-ए-हिंद”। · CC BY-SA 4.0 · Rangan Datta Wiki
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मानचित्र को शब्दों में
UNESCO (4) — ताजमहल 1983, आगरा का किला 1983, फतेहपुर सीकरी 1986, सारनाथ 2026; पहले तीन मुगल, चौथा बौद्ध।
सारनाथ — 25 जुलाई 2026, 48वाँ सत्र, बुसान; नामांकन में चौखंडी स्तूप एवं अवशेष (मृगदाव); 1998 से अनंतिम सूची में।
यहाँ धर्मराजिका अशोककालीन, धमेख गुप्तकालीन।
अमूर्त विरासत — रामलीला (2008; रामनगर की 31 दिन) एवं कुंभ मेला (2017, प्रयागराज); महाकुंभ 2025 — 13 जनवरी–26 फरवरी।
स्थापत्य — गुप्त (भितरगाँव, देवगढ़) · शर्की (जौनपुर) · मुगल (बुलंद दरवाजा = गुजरात विजय 1573 की स्मृति, ~54 मी.) ·
अवध शैली — बड़ा इमामबाड़ा (आसफ-उद-दौला, 1784; वास्तुकार हाफिज किफायतुल्लाह; अकाल-राहत परियोजना; बिना-स्तंभ वॉल्टेड हॉल; भूलभुलैया = भार घटाने की युक्ति), रूमी दरवाजा।
कला — मथुरा मूर्तिकला (कंकाली टीला, माट) · चुनार रागमाला 1591 · संझी एवं कोहबर।
संगीत-नृत्य-लोक — कथक की जन्मभूमि; तबले के 4 घराने; ठुमरी; बनारस की शहनाई (बिस्मिल्लाह खाँ);
नौटंकी (हाथरस = संगीत-प्रधान, कानपुर = संवाद-प्रधान), चरकुला एवं रासलीला (ब्रज), आल्हा (बुंदेलखंड), गुलाबो-सिताबो कठपुतली।
GI — संख्या में UP देश में प्रथम (70+), तमिलनाडु द्वितीय: बनारसी साड़ी, लखनऊ चिकनकारी, कन्नौज इत्र (देग-भपका),
कालानमक चावल (सिद्धार्थनगर), भदोही कालीन, मुरादाबाद धातु शिल्प। GI अधिनियम 1999 (लागू 2003), रजिस्ट्री चेन्नई;
प्रथम GI दार्जिलिंग चाय; राज्य की ODOP योजना 2018।
दो कैलास — कैलास (एलोरा, गुफा 16) = राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम, एकाश्म।
कैलासनाथ (कांचीपुरम) = पल्लव राजसिंह, संरचनात्मक।
दो विरूपाक्ष — पट्टदकल (चालुक्य; रानी लोकमहादेवी, 8वीं सदी; कांचीपुरम के कैलासनाथ पर आधारित; UNESCO 1987)
एवं हम्पी (विजयनगर)। वंश पूछा जाए तो स्थान देखिए।
तीन सूर्य मंदिर — कोणार्क (नरसिंहदेव प्रथम, पूर्वी गंग, ~1250) · मोढेरा (भीम प्रथम, सोलंकी, 1026; शिखर शेष नहीं)
· मार्तंड (ललितादित्य मुक्तापीड़, कार्कोट, कश्मीर, 8वीं सदी)।
कुचिपुड़ी बनाम भरतनाट्यम् — भरतनाट्यम् एकाहार्य, संवाद नहीं, स्थिर धड़, देवदासी मूल;
कुचिपुड़ी नृत्य-नाटिका, कलाकार बोलता-गाता है, भागवतुलु मूल, तरंगम् केवल इसी में। सत्रिया की मान्यता 2000 (1958 नहीं)।
होयसल त्रयी — तीनों UNESCO 2023, पर बेलूर = चेन्नकेशव (विष्णु), हलेबिड = होयसलेश्वर (शिव, द्विकूट),
सोमनाथपुर = केशव (त्रिकूट)।