भाग 2 · भारत का इतिहास
यूरोपीय आगमन से 1857 के विद्रोह तक — ब्रिटिश सत्ता की स्थापना, नीतियाँ, सुधार आंदोलन एवं प्रतिरोध
2025 के मूल प्रश्नपत्र में आधुनिक भारत एवं स्वतंत्रता संग्राम से लगभग 9 प्रश्न आए। इनमें से अधिकांश सुमेलन (अधिनियम↔वर्ष, संस्था↔संस्थापक, विद्रोह↔नेता), कालक्रम तथा अभिकथन–कारण प्रारूप में थे। इसलिए इस अध्याय में हर खंड के साथ एक सुमेलन-तालिका तथा एक तिथि-सूची दी गई है — प्रश्न ठीक उसी रूप में बनता है।
1453 में उस्मानी तुर्कों द्वारा कुस्तुनतुनिया (Constantinople) पर अधिकार कर लेने से यूरोप और एशिया के बीच का परंपरागत स्थल-मार्ग महँगा और असुरक्षित हो गया। मसालों, सूती वस्त्र, नील और रेशम की माँग बनी हुई थी, अतः पुर्तगाल और स्पेन ने समुद्री मार्ग खोजने में पूँजी लगाई। इसी खोज का परिणाम था कि वास्को द गामा (Vasco da Gama) मई 1498 (सामान्यतः 20 मई) में अफ्रीका की परिक्रमा करते हुए कालीकट के निकट कप्पड़ पहुँचा और वहाँ के शासक जमोरिन (Zamorin) से मिला। भारत आने का सीधा समुद्री मार्ग खुलते ही यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों की एक के बाद एक आमद शुरू हुई।
पुर्तगालियों की देन — तंबाकू, आलू, मिर्च, टमाटर, अनानास, काजू, पपीता जैसी फसलें; भारत का प्रथम मुद्रणालय (गोवा, 1556); तथा गोथिक-बरोक चर्च स्थापत्य।
1602 में नीदरलैंड की स्टेट्स-जनरल ने विभिन्न कंपनियों को मिलाकर डच ईस्ट इंडिया कंपनी (Vereenigde Oost-Indische Compagnie — VOC) बनाई। डचों की मुख्य रुचि मसाला-द्वीपों (इंडोनेशिया) में थी, भारत उनके लिए वस्त्र और नील का पूरक बाज़ार था।
| शक्ति | कंपनी की स्थापना | भारत में प्रथम कारखाना | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | राज्य द्वारा संचालित (कंपनी नहीं) | कोचीन (1503 में दुर्ग) | गोवा, दमन, दीव, बसई, हुगली |
| अंग्रेज | 1600 (एलिज़ाबेथ प्रथम का चार्टर) | सूरत (1613) | मद्रास, बंबई, कलकत्ता |
| डच | 1602 (स्टेट्स-जनरल) | मसुलीपट्टनम (1605) | पुलिकट, नागपट्टनम, चिनसुरा, कोचीन |
| डेनिश | 1616 (क्रिश्चियन चतुर्थ) | ट्रांकोबार (1620) | ट्रांकोबार, सेरामपुर |
| फ्रांसीसी | 1664 (कॉलबर्ट) | सूरत (1668) | पांडिचेरी, चंद्रनगर, माहे, कारिकल |
दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन युद्ध हुए। इनका तात्कालिक कारण भारतीय उत्तराधिकार-विवादों में हस्तक्षेप था, पर मूल कारण यूरोप का आंग्ल-फ्रांसीसी वैमनस्य तथा दक्षिण के व्यापार पर एकाधिकार की होड़ थी। डूप्ले (Dupleix) ने ही सबसे पहले यह समझा कि भारतीय राजाओं के झगड़ों में सैन्य सहायता देकर राजनीतिक प्रभाव अर्जित किया जा सकता है — यही तकनीक आगे चलकर अंग्रेजों ने कहीं अधिक कुशलता से प्रयोग की।
| युद्ध | काल | यूरोपीय पृष्ठभूमि | प्रमुख घटना | अंत |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–48 | ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध | फ्रांसीसियों द्वारा मद्रास पर अधिकार; सेंट थोमे का युद्ध (अड्यार नदी) में छोटी फ्रांसीसी सेना ने अनवरुद्दीन की विशाल सेना को हराया | एक्स-ला-शापेल की संधि (1748) — मद्रास अंग्रेजों को वापस |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1749–54 | यूरोप में शांति; भारत में उत्तराधिकार-विवाद | अंबूर का युद्ध (1749) में अनवरुद्दीन मारा गया; क्लाइव का अर्काट पर अधिकार (1751); डूप्ले की वापसी (1754) | पांडिचेरी की संधि (1754) |
| तृतीय कर्नाटक युद्ध | 1756–63 | सप्तवर्षीय युद्ध (Seven Years' War) | वांडीवाश का युद्ध, 22 जनवरी 1760 — सर आयर कूट ने काउंट लाली को हराया | पेरिस की संधि (1763) — पांडिचेरी लौटाया गया पर किलेबंदी वर्जित |
(1) फ्रांसीसी कंपनी राज्य-नियंत्रित थी, अतः पेरिस की राजनीति और युद्धों पर निर्भर; अंग्रेजी कंपनी व्यापारियों की थी और आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र। (2) अंग्रेजों के पास बंगाल जैसा समृद्ध संसाधन-आधार प्लासी के बाद उपलब्ध हो गया। (3) नौसैनिक श्रेष्ठता अंग्रेजों के पास थी। (4) फ्रांसीसी अधिकारियों में आपसी मतभेद (डूप्ले–लाबूर्दोने, लाली–बुसी) रहे। (5) अंग्रेजों के तीन सुदृढ़ केंद्र थे, फ्रांसीसियों का व्यावहारिक रूप से एक — पांडिचेरी।
सर टॉमस रो को मिली अनुमति के बाद कंपनी ने आगरा में कारखाना खोला — नील (indigo) और सूती वस्त्र के कारण आगरा उत्तर भारत में कंपनी की आरंभिक व्यापारिक चौकी बना। यमुना-गंगा मार्ग से माल आगरा–इलाहाबाद होते हुए हुगली पहुँचता था। यही व्यापारिक मार्ग आगे चलकर कंपनी के राजनीतिक विस्तार का भी मार्ग बना — 1765 में इलाहाबाद, 1775 में बनारस और 1856 में समूचा अवध कंपनी के नियंत्रण में आया।
UPPSC में बहु-पूछित: वांडीवाश का विजेता (सर आयर कूट, क्लाइव नहीं); प्रथम कर्नाटक युद्ध का अंत करने वाली संधि (एक्स-ला-शापेल); डूप्ले का प्रतिद्वंद्वी (क्लाइव/लॉरेंस); डचों की निर्णायक पराजय का युद्ध (बेदरा, 1759); भारत में प्रथम यूरोपीय मुद्रणालय (गोवा, 1556)।
प्र.1 सूची-I (क्षेत्र/घटना) को सूची-II (वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. फ्रांसीसी बस्तियों का भारत को वास्तविक (de facto) हस्तांतरण B. गोवा की मुक्ति (ऑपरेशन विजय) C. फ्रांसीसी बस्तियों का विधिक (de jure) हस्तांतरण D. सिक्किम का भारत संघ में विलय
सूची-II: 1. 1961 2. 1954 3. 1975 4. 1962
कूट:
प्र.2 प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों की भागीदारी के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. युद्ध के दौरान लगभग 13 लाख भारतीय ब्रिटिश भारतीय सेना की ओर से सेवारत रहे।
2. विक्टोरिया क्रॉस प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय सैनिक सिपाही खुदादाद खान थे, जिन्हें अक्टूबर 1914 में बेल्जियम में दिखाए गए शौर्य के लिए यह सम्मान मिला।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 जहाँगीर के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. जहाँगीर ने प्रसिद्ध 'जंजीर-ए-अदल' (न्याय की जंजीर) लाहौर के किले में लगवाई थी।
2. 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' फारसी भाषा में रचित जहाँगीर की आत्मकथा है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) के बाद बंगाल व्यवहारतः स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खाँ (1717–27) ने राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की और राजस्व-व्यवस्था कसी। उसके बाद शुजाउद्दीन और सरफ़राज़ खाँ आए। 1740 में गिरिया के युद्ध में सरफ़राज़ को हराकर अलीवर्दी खाँ (1740–56) नवाब बना, जिसका अधिकांश शासनकाल मराठा 'बरगीर' आक्रमणों से लड़ने में बीता। उसके बाद उसका नाती सिराजुद्दौला (1756) गद्दी पर बैठा।
जून 1756 में सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर अधिकार कर लिया और उसका नाम 'अलीनगर' रखा। इसी समय की तथाकथित 'ब्लैक होल' (अंधकूप) घटना का विवरण जे. ज़ेड. हॉलवेल ने दिया — जिसकी संख्याओं को अधिकांश आधुनिक इतिहासकार अतिरंजित मानते हैं। फरवरी 1757 में अलीनगर की संधि से अस्थायी समझौता हुआ, पर दोनों पक्ष उसे टालू मानते रहे।
यह वस्तुतः युद्ध कम और षड्यंत्र अधिक था। सेनापति मीर जाफ़र, राय दुर्लभ, यार लतीफ़ तथा धनकुबेर जगत सेठ व व्यापारी अमीचंद पहले ही क्लाइव से मिल चुके थे। नवाब की ओर से केवल मीर मदन और मोहनलाल ने वास्तविक युद्ध लड़ा; मीर मदन के मारे जाते ही सेना बिखर गई। सिराजुद्दौला भागते हुए पकड़ा गया और मीर जाफ़र के पुत्र मीरन के आदेश पर मार डाला गया।
महत्व: प्लासी ने कंपनी को बंगाल में निर्णायक राजनीतिक प्रभाव दिया — नवाब अब कंपनी का मनोनीत व्यक्ति था। बंगाल के धन से ही कंपनी ने दक्षिण में फ्रांसीसियों को परास्त किया। किंतु प्लासी ने कंपनी की सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध नहीं की — वह काम बक्सर ने किया।
मीर जाफ़र की माँगें पूरी न कर पाने पर 1760 में उसका दामाद मीर कासिम नवाब बनाया गया। मीर कासिम अपेक्षाकृत योग्य शासक था — उसने राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर बनाई, सेना का आधुनिकीकरण किया और 1763 में आंतरिक व्यापार पर सभी शुल्क ही समाप्त कर दिए, ताकि भारतीय व्यापारी भी कंपनी-कर्मियों के बराबर आ जाएँ। अंग्रेजों को यह असह्य था — इसी से युद्ध छिड़ा (कटवा, गिरिया, उधवानाला)। पराजित मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय से संधि की।
22 अक्टूबर 1764 को बक्सर (बिहार) में मेजर हेक्टर मुनरो ने इस त्रिगुट को निर्णायक रूप से हरा दिया। बक्सर का महत्व यह है कि इसने सिद्ध कर दिया कि उत्तर भारत की तीनों सबसे बड़ी शक्तियाँ मिलकर भी कंपनी की अनुशासित सेना का सामना नहीं कर सकतीं।
प्लासी (1757) — विश्वासघात से मिली विजय; लाभ केवल बंगाल तक; कंपनी अभी भी 'व्यापारी'। बक्सर (1764) — वास्तविक युद्ध; तीन शक्तियों पर विजय; परिणामस्वरूप दीवानी मिली और कंपनी 'शासक' बनी। इसीलिए कहा जाता है — "प्लासी ने द्वार खोला, बक्सर ने साम्राज्य दिया।"
रॉबर्ट क्लाइव ने दूसरी बार गवर्नर बनकर (1765–67) दो पृथक संधियाँ कीं —
| किससे | कंपनी को क्या मिला | दूसरे पक्ष को क्या मिला |
|---|---|---|
| शुजाउद्दौला (अवध का नवाब) | 50 लाख रुपये युद्ध-हर्जाना; अवध में शुल्क-मुक्त व्यापार; कंपनी की सेना रखने का व्यय नवाब पर | अवध वापस मिला (कड़ा तथा इलाहाबाद छोड़कर); मराठों के विरुद्ध रक्षा का आश्वासन |
| शाह आलम द्वितीय (मुग़ल बादशाह) | बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) | 26 लाख रुपये वार्षिक; निर्वाह हेतु कड़ा तथा इलाहाबाद के ज़िले; कंपनी के संरक्षण में इलाहाबाद में निवास |
दीवानी मिलने का अर्थ था — कंपनी अब कानूनी रूप से बंगाल की राजस्व-स्वामी थी, जबकि क़ानून-व्यवस्था एवं फौजदारी न्याय (निज़ामत) का दायित्व नवाब पर ही रहा। यही द्वैध शासन (Dual Government) है।
कालक्रम-प्रश्न का पसंदीदा समुच्चय: अलीनगर की संधि → प्लासी → बक्सर → इलाहाबाद की संधि → द्वैध शासन की समाप्ति (1757 फरवरी → 1757 जून → 1764 → 1765 → 1772)। अभिकथन–कारण में प्रायः पूछा जाता है — "बक्सर प्लासी से अधिक निर्णायक था" (अभिकथन सत्य) "क्योंकि उसमें कंपनी ने तीन संयुक्त शक्तियों को हराया" (कारण सत्य एवं सही व्याख्या)।
प्र.1 निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट का पारित होना
2. बक्सर का युद्ध
3. प्लासी का युद्ध
4. इलाहाबाद की संधि
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 देशी रियासतों के एकीकरण के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. जूनागढ़ में फरवरी 1948 में जनमत-संग्रह कराया गया, जिसमें भारी बहुमत भारत में विलय के पक्ष में रहा।
2. हैदराबाद के विरुद्ध सितंबर 1948 में 'ऑपरेशन पोलो' नामक पुलिस कार्रवाई की गई।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): 1858 के भारत शासन अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया।
कारण (R): 1857 के विद्रोह ने कंपनी-शासन की प्रशासनिक विफलताओं को उजागर कर दिया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
1765 से 1856 के बीच कंपनी ने तीन औज़ारों से भारत जीता — प्रत्यक्ष युद्ध, सहायक संधि (अप्रत्यक्ष अधीनता) और व्यपगत सिद्धांत (कानूनी बहाने से विलय)। तीनों के साथ एक चौथा औज़ार भी चलता रहा — 'कुशासन' के आरोप पर विलय।
मैसूर में 1761 तक हैदर अली वास्तविक शासक बन चुका था। उसने फ्रांसीसी सहायता से आधुनिक सेना तथा डिंडीगुल में शस्त्रागार बनाया। उसका पुत्र टीपू सुल्तान ('मैसूर का शेर') अपने समय का सर्वाधिक दूरदर्शी भारतीय शासक था — उसने विदेश-नीति, नौसेना, व्यापारिक कंपनी और राजस्व-सुधार सबमें प्रयोग किए, श्रीरंगपट्टनम में 'स्वतंत्रता का वृक्ष' लगाया और जैकोबिन क्लब का सदस्य बना।
| युद्ध | काल | भारतीय पक्ष | अंग्रेज गवर्नर-जनरल | परिणाम / संधि |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1767–69 | हैदर अली | — | मद्रास की संधि (1769) — यथास्थिति एवं पारस्परिक सहायता; हैदर की स्थिति सुदृढ़ |
| द्वितीय | 1780–84 | हैदर अली → (1782 में मृत्यु) टीपू | वारेन हेस्टिंग्स | मंगलौर की संधि (11 मार्च 1784) — यथास्थिति; प्रायः इसे वह अंतिम अवसर कहा जाता है जब किसी भारतीय शासक ने अंग्रेजों को शर्तें मानने पर विवश किया |
| तृतीय | 1790–92 | टीपू बनाम अंग्रेज + निज़ाम + मराठा | कॉर्नवालिस | श्रीरंगपट्टनम की संधि (18 मार्च 1792) — लगभग आधा राज्य छिना, 3 करोड़ हर्जाना, दो पुत्र बंधक |
| चतुर्थ | 1799 | टीपू सुल्तान | वेलेज़ली | 4 मई 1799 को टीपू लड़ते हुए मारा गया; मैसूर की गद्दी वोडेयार वंश को सहायक संधि के अधीन लौटाई गई |
| युद्ध | काल | प्रमुख संधियाँ | परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1775–82 | सूरत की संधि (1775, रघुनाथराव से) → पुरंदर की संधि (1776) → वडगाँव की संधि (1779) → सालबाई की संधि (1782) | कोई पक्ष निर्णायक रूप से नहीं जीता; लगभग 20 वर्ष की शांति; अंग्रेजों को साल्सेट मिला |
| द्वितीय | 1803–05 | बसीन की संधि (31 दिसंबर 1802) — पेशवा बाजीराव द्वितीय ने सहायक संधि स्वीकार की; देवगाँव की संधि (भोंसले, 1803), सुर्जी-अर्जनगाँव की संधि (सिंधिया, 1803), राजघाट की संधि (होल्कर, 1805) | असई, लासवाड़ी तथा अड़गाँव के युद्धों में मराठे पराजित; उड़ीसा, दिल्ली-आगरा तथा गुजरात के क्षेत्र कंपनी को |
| तृतीय | 1817–19 | पूना की संधि (जून 1817, पेशवा), ग्वालियर की संधि (नवंबर 1817, सिंधिया), मंदसौर की संधि (जनवरी 1818, होल्कर) | खड़की, सीताबल्दी, कोरेगाँव एवं अष्टी के युद्ध; पेशवा पद समाप्त; शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को सतारा का राजा बनाया गया |
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अपदस्थ अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर बिठूर (कानपुर, उ.प्र.) भेज दिया गया। 1851 में उसकी मृत्यु पर कंपनी ने उसके दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन बंद कर दी — यही अपमान 1857 में कानपुर के विद्रोह का तात्कालिक व्यक्तिगत कारण बना। इस प्रकार महाराष्ट्र में लड़े गए युद्ध का अंतिम विस्फोट उत्तर प्रदेश में हुआ।
महाराजा रणजीत सिंह (मृत्यु 1839) के बाद लाहौर दरबार में अराजकता फैल गई। 1809 की अमृतसर की संधि से रणजीत सिंह ने सतलुज को सीमा मान लिया था; उनकी मृत्यु के बाद वह संतुलन टूट गया।
| युद्ध | काल | प्रमुख युद्धक्षेत्र | संधि / परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1845–46 | मुदकी, फ़िरोज़शाह, अलीवाल, सोबराँव | लाहौर की संधि (9 मार्च 1846) — जालंधर दोआब कंपनी को, 1.5 करोड़ हर्जाना; अमृतसर की संधि (16 मार्च 1846) — कश्मीर 75 लाख में गुलाब सिंह को; भैरोवाल की संधि (16 दिसंबर 1846) — बालक दलीप सिंह के लिए ब्रिटिश रेज़िडेंट (हेनरी लॉरेंस) के अधीन अभिभावक परिषद |
| द्वितीय | 1848–49 | रामनगर, चिलियाँवाला (जनवरी 1849), गुजरात (21 फरवरी 1849) | मुलतान के मूलराज के विद्रोह से आरंभ; गुजरात के युद्ध ('तोपों का युद्ध') के बाद 29 मार्च 1849 को डलहौज़ी ने पंजाब का विलय किया; दलीप सिंह को इंग्लैंड भेजा गया; प्रशासन तीन आयुक्तों के बोर्ड को सौंपा गया |
| युद्ध | काल | गवर्नर-जनरल / वायसराय | परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1824–26 | लॉर्ड एमहर्स्ट | यंडबू की संधि (24 फरवरी 1826) — अराकान एवं तेनासरिम कंपनी को; असम, मणिपुर, कछार तथा जयंतिया पर बर्मी दावा समाप्त; हर्जाना एवं रंगून में ब्रिटिश रेज़िडेंट |
| द्वितीय | 1852 | लॉर्ड डलहौज़ी | निचला बर्मा — पेगू तथा रंगून का विलय; कोई औपचारिक संधि नहीं, केवल विलय की घोषणा |
| तृतीय | 1885 | लॉर्ड डफ़रिन | राजा थीबॉ की फ्रांसीसियों से निकटता बहाना बनी; ऊपरी बर्मा का विलय (1 जनवरी 1886); थीबॉ रत्नागिरि निर्वासित; 1937 में बर्मा भारत से अलग कर दिया गया |
इसी विस्तार-क्रम में सिंध का विलय 1843 में चार्ल्स नेपियर ने किया (मीरानी एवं दब्बो के युद्ध) — एलनबरो के काल में। यह वह विलय है जिसे स्वयं ब्रिटिश अधिकारियों ने अनैतिक माना।
यद्यपि इसका बीज डूप्ले ने बोया और 1765 से कंपनी इसका प्रयोग करती रही, पर इसे व्यवस्थित नीति लॉर्ड वेलेज़ली (1798–1805) ने बनाया। शर्तें —
स्वीकार करने का क्रम: हैदराबाद (1798) → मैसूर (1799) → तंजौर (1799) → अवध (1801) → पेशवा/बसीन (1802) → भोंसले एवं सिंधिया (1803)।
1801 में नवाब सआदत अली खाँ द्वितीय पर सहायक संधि थोपकर वेलेज़ली ने रुहेलखंड, गोरखपुर तथा दोआब का बड़ा भाग कंपनी को दिलवा दिया — यही क्षेत्र आगे 'सीडेड एंड कॉन्क्वर्ड प्रॉविंसेज़' कहलाया और आधुनिक उत्तर प्रदेश का ढाँचा यहीं से बनना शुरू हुआ। शेष अवध 1856 में कुशासन के आरोप पर डलहौज़ी ने (7 फरवरी 1856 की घोषणा द्वारा) विलय कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता के मटियाबुर्ज भेज दिया। ध्यान रहे — अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत से नहीं हुआ; यह UPPSC का प्रिय ट्रैप है।
सिद्धांत यह था कि यदि किसी आश्रित देशी राज्य के शासक की मृत्यु प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी के बिना हो जाए तो गोद लिए पुत्र को मान्यता न देकर राज्य कंपनी में मिला लिया जाएगा। डलहौज़ी ने इसे व्यवस्थित रूप से लागू किया, यद्यपि ऐसे विलय उससे पहले भी हुए थे।
| राज्य | वर्ष | टिप्पणी |
|---|---|---|
| सतारा | 1848 | इस सिद्धांत से विलय होने वाला प्रथम राज्य |
| जैतपुर एवं संबलपुर | 1849 | — |
| बघाट | 1850 | बाद में लौटाया गया |
| उदयपुर (छोटा उदयपुर/छत्तीसगढ़ का उदयपुर) | 1852 | कैनिंग ने बाद में लौटाया |
| झाँसी | 1853 | राजा गंगाधर राव के दत्तक पुत्र दामोदर राव को मान्यता नहीं; रानी लक्ष्मीबाई का दावा अस्वीकृत |
| नागपुर | 1854 | इस सिद्धांत से विलय हुआ सबसे बड़ा राज्य |
| अधिकारी | काल | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|
| वारेन हेस्टिंग्स | 1772–85 | द्वैध शासन की समाप्ति (1772); कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (1774); कलकत्ता मदरसा (1781); एशियाटिक सोसाइटी को संरक्षण (1784); रुहेला युद्ध; महाभियोग |
| लॉर्ड कॉर्नवालिस | 1786–93 | स्थायी बंदोबस्त (1793); कॉर्नवालिस कोड; सिविल सेवा का भारतीयकरण-विरोधी पुनर्गठन; तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध; 'भारत में सिविल सेवा का जनक' |
| सर जॉन शोर | 1793–98 | अहस्तक्षेप की नीति |
| लॉर्ड वेलेज़ली | 1798–1805 | सहायक संधि; चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध; फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) |
| लॉर्ड विलियम बेंटिंक | 1828–35 | सती प्रथा पर रोक (1829); ठगी का दमन (कर्नल स्लीमन); मैकाले मिनट एवं अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम (1835); प्रथम गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया |
| लॉर्ड डलहौज़ी | 1848–56 | व्यपगत सिद्धांत; पंजाब एवं अवध का विलय; प्रथम रेल (1853); तार, डाक सुधार, लोक निर्माण विभाग; वुड डिस्पैच (1854); विधवा पुनर्विवाह की सिफ़ारिश |
| लॉर्ड कैनिंग | 1856–62 | 1857 का विद्रोह; कंपनी शासन का अंत; 1858 की महारानी की घोषणा (इलाहाबाद); 1857 में तीन विश्वविद्यालय; भारतीय दंड संहिता का क्रियान्वयन; अंतिम गवर्नर-जनरल एवं प्रथम वायसराय |
| लॉर्ड लिटन | 1876–80 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878); भारतीय शस्त्र अधिनियम (1878); दिल्ली दरबार (1877); अकाल आयोग (1878–80) |
| लॉर्ड रिपन | 1880–84 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट का निरसन (1882); स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव (1882); हंटर शिक्षा आयोग (1882); इल्बर्ट बिल विवाद; प्रथम फैक्ट्री अधिनियम (1881) |
| लॉर्ड कर्ज़न | 1899–1905 | भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904); प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम (1904); पुलिस आयोग (1902); बंगाल विभाजन (1905) |
प्र.1 सूची-I (संधि) को सूची-II (वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. मंगलौर की संधि B. श्रीरंगपट्टनम की संधि C. सालबाई की संधि D. बेसीन की संधि
सूची-II: 1. 1782 2. 1784 3. 1792 4. 1802
कूट:
प्र.2 बाबर द्वारा भारत में लड़े गए निम्नलिखित युद्धों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. खानवा का युद्ध
2. घाघरा का युद्ध
3. पानीपत का प्रथम युद्ध
4. चंदेरी का युद्ध
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सी रियासत लॉर्ड डलहौजी द्वारा 'व्यपगत के सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) के अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य में नहीं मिलाई गई थी?
कंपनी के लिए भू-राजस्व आय का सबसे बड़ा स्रोत था, अतः उसका सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न यही था — लगान किससे, कितना और कितने समय के लिए वसूला जाए? इन तीन प्रश्नों के तीन उत्तर ही तीन व्यवस्थाएँ बनीं।
22 मार्च 1793 को लॉर्ड कॉर्नवालिस ने इसे लागू किया (राजस्व-आँकड़े सर जॉन शोर के थे, यद्यपि शोर स्वयं इतनी जल्दी स्थायित्व देने के पक्ष में नहीं था)।
प्रभाव: कंपनी को निश्चित एवं बिना जोखिम की आय मिली तथा एक राजभक्त भू-स्वामी वर्ग तैयार हुआ, जो 1857 में और उसके बाद भी अंग्रेजों के साथ खड़ा रहा। किंतु कीमत किसान ने चुकाई — उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं मिला, अनुपस्थित ज़मींदारी (absentee landlordism) और उप-ज़मींदारी की लंबी शृंखला (पटनी प्रथा) विकसित हुई, जिसमें हर कड़ी किसान से कुछ न कुछ अधिक वसूलती थी। काश्तकार को कुछ संरक्षण बहुत बाद में बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 से मिला।
| आधार | स्थायी बंदोबस्त | रैयतवाड़ी | महालवाड़ी |
|---|---|---|---|
| वर्ष एवं प्रवर्तक | 1793 · कॉर्नवालिस (जॉन शोर की रिपोर्ट) | 1820 · टॉमस मुनरो (एवं अलेक्ज़ेंडर रीड) | 1822 / 1833 · होल्ट मैकेंज़ी, फिर आर. एम. बर्ड |
| किससे बंदोबस्त | ज़मींदार | व्यक्तिगत किसान (रैयत) | ग्राम/महाल का सामूहिक निकाय |
| क्षेत्र | बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस, उत्तरी सरकार | मद्रास, बंबई, असम, कुर्ग | उत्तर-पश्चिम प्रांत, अवध, पंजाब, मध्य भारत |
| अनुमानित विस्तार | ≈ 19% | ≈ 51% | ≈ 30% |
| लगान की प्रकृति | सदा के लिए स्थिर | 20–30 वर्ष पर पुनर्निर्धारित | निश्चित अवधि (30 वर्ष) के लिए |
| राज्य का हिस्सा | 10/11 | शुद्ध उपज का लगभग आधा | किराया-मूल्य का 80% → 66% → 50% |
| विशिष्ट शब्द | सूर्यास्त कानून, पटनी | रैयत, पट्टा | महाल, पट्टीदारी, भाईचारा |
उत्तर प्रदेश भू-राजस्व के दृष्टिकोण से बँटा हुआ प्रदेश था। बनारस प्रांत में जोनाथन डंकन के 1789 के दशसाला बंदोबस्त को 1795 में स्थायी कर दिया गया — अर्थात् पूर्वी उ.प्र. में बंगाल जैसा ज़मींदारी ढाँचा बना। इसके विपरीत उत्तर-पश्चिम प्रांत तथा अवध में महालवाड़ी लागू हुई, और अवध में तालुकेदारी का विशिष्ट रूप विकसित हुआ। 1856 के विलय के बाद अंग्रेजों ने अवध के तालुकेदारों की भूमि छीनने का प्रयास किया — यही तालुकेदार 1857 में विद्रोह की रीढ़ बने, और इसीलिए 1859 के बाद कैनिंग ने उन्हें भूमि लौटाकर 'सनद' दी और उन्हें अपना स्थायी सहयोगी वर्ग बना लिया।
प्र.1 'रैयतवाड़ी बंदोबस्त (Ryotwari Settlement)' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसका प्रारंभिक प्रयोग 1792 में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड ने मद्रास प्रेसीडेंसी के बारामहल क्षेत्र में किया था।
2. इस व्यवस्था में भू-राजस्व सीधे कृषक (रैयत) से वसूला जाता था तथा उसे भूमि का स्वामी माना जाता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 सूची-I (भू-राजस्व/प्रशासनिक व्यवस्था) को सूची-II (संबद्ध व्यक्ति) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. स्थायी बंदोबस्त B. रैयतवाड़ी व्यवस्था C. महालवाड़ी व्यवस्था D. सहायक संधि
सूची-II: 1. होल्ट मैकेंजी 2. लॉर्ड वेलेजली 3. लॉर्ड कॉर्नवालिस 4. थॉमस मुनरो
कूट:
प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): स्थायी बंदोबस्त, जिसे 'इस्तमरारी बंदोबस्त' भी कहा जाता है, लॉर्ड वेलेजली ने लागू किया था।
कारण (R): इस व्यवस्था में जमींदार को भूमि का स्वामी मान लिया गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| चरण | काल | स्वरूप | मुख्य साधन |
|---|---|---|---|
| वाणिज्यवादी (Mercantile) | 1757–1813 | एकाधिकार व्यापार एवं प्रत्यक्ष लूट | बंगाल के राजस्व से माल खरीदकर इंग्लैंड भेजना ('बंगाल का निवेश'); दस्तक; कंपनी का एकाधिकार |
| औद्योगिक पूँजी / मुक्त व्यापार | 1813–1858 | भारत = कच्चे माल का स्रोत + तैयार माल का बाज़ार | 1813 का चार्टर एक्ट; ब्रिटिश माल पर नाममात्र शुल्क, भारतीय माल पर इंग्लैंड में भारी शुल्क |
| वित्तीय पूँजी (Finance capital) | 1858 के बाद | ब्रिटिश पूँजी का भारत में निवेश | रेलवे में गारंटी प्रणाली, बागान (चाय, नील), खनन, बैंकिंग, प्रबंध एजेंसी (managing agency) प्रणाली |
18वीं शताब्दी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा वस्त्र-निर्यातक था। 19वीं शताब्दी के मध्य तक वही भारत ब्रिटिश वस्त्रों का सबसे बड़ा आयातक बन गया। कारण —
परिणाम था अर्थव्यवस्था का ग्रामीणीकरण — दस्तकारी छोड़कर लोग खेती पर लौटे, जिससे भूमि पर जनसंख्या का दबाव और बढ़ा। गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिंक की 1834–35 की प्रसिद्ध टिप्पणी उद्धृत होती है कि "सूती बुनकरों की हड्डियाँ भारत के मैदानों को सफेद कर रही हैं।"
दादाभाई नौरोजी ने 1867 में 'इंग्लैंड्स डेट टु इंडिया' शीर्षक पत्र में यह विचार रखा और 1901 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' में उसे पूर्ण रूप दिया। उन्हें 'भारत का वयोवृद्ध पुरुष' (Grand Old Man of India) कहा जाता है। रमेश चंद्र दत्त ने 'द इकॉनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया' (दो खंड, 1901 एवं 1903) में इसे ऐतिहासिक आँकड़ों से पुष्ट किया। महादेव गोविंद रानाडे, जी. वी. जोशी, जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर तथा पृथ्वीशचंद्र रे भी इस 'आर्थिक राष्ट्रवाद' की धारा के प्रमुख नाम हैं।
निष्कासन के घटक: गृह-व्यय (Home Charges) — अर्थात् लंदन में भारत कार्यालय का खर्च, ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन-पेंशन, भारत के सार्वजनिक ऋण पर ब्याज, रेलवे को दी गई गारंटीशुदा 5% आय, ब्रिटिश कंपनियों के लाभ की वापसी, तथा भारत के बाहर लड़े गए ब्रिटिश युद्धों का सैन्य व्यय। इस प्रकार भारत का एक बड़ा अधिशेष हर वर्ष बिना किसी प्रत्यावर्तन के इंग्लैंड चला जाता था — यही पूँजी-निर्माण के अभाव और स्थायी दरिद्रता का कारण बना।
19वीं शताब्दी में अकाल की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ीं। कारण केवल वर्षा की कमी नहीं थी — नकद लगान की बाध्यता, खाद्यान्न का निर्यात, रेल द्वारा अनाज का अकाल-क्षेत्र से बाहर चला जाना, तथा सरकार की 'अहस्तक्षेप' (laissez faire) विचारधारा भी उतनी ही ज़िम्मेदार थी।
| अकाल | आयोग / वर्ष | अध्यक्ष | प्रमुख परिणाम |
|---|---|---|---|
| बंगाल का महा-अकाल, 1770 | कोई आयोग नहीं | — | लगभग एक-तिहाई जनसंख्या का नाश; द्वैध शासन की विफलता उजागर |
| उड़ीसा का अकाल, 1866 | कैंपबेल आयोग (1866) | सर जॉर्ज कैंपबेल | प्रशासनिक विफलता की पहली स्वीकृति |
| महान अकाल, 1876–78 (दक्षिण एवं पश्चिम भारत) | स्ट्रेची आयोग (1880) | सर रिचर्ड स्ट्रेची | प्रथम अकाल संहिता (Famine Code), 1883; 'अभाव' एवं 'अकाल' की परिभाषा तथा राहत-कार्य का ढाँचा |
| अकाल, 1896–97 | लायल आयोग (1897) | सर जेम्स लायल | अकाल संहिता में लचीलापन |
| अकाल, 1899–1900 | मैकडॉनेल आयोग (1901) | सर एंटनी मैकडॉनेल | कर्ज़न के काल में; सिंचाई एवं कृषि-ऋण पर बल; प्रत्येक प्रांत में अकाल-आयुक्त |
| वर्ष | उपाय | आशय |
|---|---|---|
| 1835 | भारतीय सिक्का अधिनियम | सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए एकसमान चाँदी का रुपया |
| 1859 | कैनिंग का शुल्क | विद्रोह के बाद राजस्व-संकट में आयात पर लगभग 10% शुल्क — राजस्व के लिए, संरक्षण के लिए नहीं |
| 1882 | आयात शुल्क समाप्त | मैनचेस्टर के दबाव में लगभग सभी आयात शुल्क हटाए गए — पूर्ण मुक्त व्यापार |
| 1893 | टकसालें बंद | चाँदी की मुक्त ढलाई पर रोक — चाँदी के गिरते मूल्य से बचाव |
| 1898–99 | फाउलर समिति → स्वर्ण-विनिमय मानक | रुपये को 1 शिलिंग 4 पेंस पर स्थिर किया गया |
| 1894–96 | कपास पर आयात शुल्क तथा प्रतिकारी उत्पाद शुल्क (countervailing excise) | भारतीय मिलों के कपड़े पर वही शुल्क लगाकर ब्रिटिश माल को लाभ में रखा गया — भारतीय उद्योग की सबसे बड़ी शिकायत |
| 1917 | राजस्व-शुल्क 7.5% | प्रथम विश्वयुद्ध के व्यय के लिए |
| 1921–23 | राजकोषीय आयोग (1921) → विभेदकारी संरक्षण (Discriminating Protection), 1923 | चुने हुए उद्योगों को ही संरक्षण; टैरिफ बोर्ड की स्थापना |
| 1926 | कपास का उत्पाद शुल्क समाप्त | तीन दशक के भारतीय विरोध का परिणाम |
| 1926 → 1935 | हिल्टन-यंग आयोग (1926) → भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 | RBI ने 1 अप्रैल 1935 से कार्य आरंभ किया |
इस खंड से प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं — (क) अकाल ↔ आयोग का सुमेलन (कैंपबेल–1866, स्ट्रेची–1880, लायल–1897, मैकडॉनेल–1901); (ख) अभिकथन–कारण: "भारत में रेल का विस्तार भारतीय उद्योग के विकास का कारण नहीं बना" (अभिकथन सत्य) "क्योंकि रेल-मार्ग कच्चा माल बंदरगाहों तक ले जाने के लिए बनाए गए थे" (कारण सत्य एवं सही व्याख्या)। 'गारंटी प्रणाली' तथा 'गृह-व्यय' पारिभाषिक शब्दों के रूप में भी पूछे जाते हैं।
प्र.1 ब्रिटिशकालीन भारत के निम्नलिखित अकाल आयोगों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. स्ट्रेची आयोग
2. कैंपबेल आयोग
3. मैकडॉनेल आयोग
4. लॉयल आयोग
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 भारतीय मुद्रा एवं वित्त से संबंधित निम्नलिखित समितियों/आयोगों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनकी नियुक्ति के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. फाउलर समिति
2. हिल्टन यंग आयोग
3. हर्शेल समिति
4. चैंबरलेन आयोग
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(आयोग/समिति) (संबद्ध विषय)
1. पील आयोग (1859) — सेना का पुनर्गठन
2. फ्रेजर आयोग (1902-03) — पुलिस व्यवस्था
3. स्कीन समिति (1925) — भारतीय मुद्रा एवं वित्त
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
कॉर्नवालिस को 'भारत में सिविल सेवा का जनक' कहा जाता है। उसने कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया, निजी व्यापार पर रोक लगाई, पदोन्नति वरिष्ठता के आधार पर तय की — पर साथ ही यह नियम भी बनाया कि 500 पौंड वार्षिक से ऊपर के सभी पद केवल यूरोपीयों के लिए होंगे। सेवा दो भागों में बँटी — अनुबंधित (Covenanted) तथा अननुबंधित (Uncovenanted)। प्रशिक्षण के लिए वेलेज़ली ने फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) खोला; डाइरेक्टरों ने उसे अस्वीकार कर 1806 में इंग्लैंड में हेलीबरी कॉलेज स्थापित किया।
| वर्ष | घटना / आयोग | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1833 | चार्टर एक्ट | खुली प्रतियोगिता का प्रथम प्रस्ताव — डाइरेक्टरों के विरोध से रद्द |
| 1853 | चार्टर एक्ट | खुली प्रतियोगिता स्वीकृत; मैकाले समिति (1854) ने पाठ्यक्रम तय किया; प्रथम परीक्षा 1855 में लंदन में |
| 1863 | सत्येंद्रनाथ टैगोर | ICS में चयनित होने वाले प्रथम भारतीय |
| 1886 | एचिसन आयोग (डफ़रिन के काल में) | सेवाओं का त्रिस्तरीय वर्गीकरण — इंपीरियल, प्रांतीय, अधीनस्थ; आयु-सीमा बढ़ाकर 23 |
| 1893 | ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स का प्रस्ताव | भारत एवं इंग्लैंड में एक साथ परीक्षा की माँग स्वीकृत, पर लागू नहीं हुई |
| 1912 | इस्लिंगटन आयोग | उच्च पदों के 25% भारतीयों को देने की सिफ़ारिश |
| 1923–24 | ली आयोग | 15 वर्षों में ICS में 50:50 भारतीय-यूरोपीय अनुपात; लोक सेवा आयोग की स्थापना की सिफ़ारिश |
| 1926 | केंद्रीय लोक सेवा आयोग | 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित (1935 के अधिनियम से 'संघ लोक सेवा आयोग') |
1861 के अधिनियम के अंतर्गत 17 मार्च 1866 को 'उत्तर-पश्चिम प्रांत का उच्च न्यायालय' आगरा में स्थापित हुआ, जिसने पुरानी सदर दीवानी अदालत का स्थान लिया। 1869 में इसका मुख्यालय इलाहाबाद स्थानांतरित हुआ और नाम पड़ा 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय'। यह तीन प्रेसीडेंसी नगरों के बाहर स्थापित आरंभिक उच्च न्यायालयों में है — UPPSC में यह तथ्य (स्थापना 1866, आगरा में; स्थानांतरण 1869) बार-बार पूछा जाता है। 1948 में अवध मुख्य न्यायालय (लखनऊ) का इसमें विलय होकर लखनऊ पीठ बनी।
प्र.1 ब्रिटिशकालीन सेना तथा पुलिस के पुनर्गठन से जुड़ी निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. भारतीय पुलिस अधिनियम का पारित होना
2. पील आयोग की नियुक्ति
3. फ्रेजर पुलिस आयोग का गठन
4. भारतीय सैंडहर्स्ट (स्कीन) समिति की नियुक्ति
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारत में प्रथम लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की स्थापना 1926 में हुई।
कारण (R): ली आयोग (Lee Commission) ने अपनी रिपोर्ट में एक लोक सेवा आयोग शीघ्र गठित करने की संस्तुति की थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(आयोग) (प्रमुख संस्तुति)
1. हिल्टन यंग आयोग — भारत में एक केंद्रीय बैंक की स्थापना
2. स्ट्रेची आयोग — अकाल संहिता (Famine Code) का आधार
3. ली आयोग — सेना का भारतीयकरण
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
इस खंड को दो भागों में देखें — कंपनी शासन के अधिनियम (1773–1853) तथा ताज के शासन के अधिनियम (1858–1947)। पहले भाग का उद्देश्य कंपनी पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण बढ़ाना था; दूसरे का उद्देश्य भारतीयों को सीमित प्रतिनिधित्व देकर असंतोष को संभालना।
| अधिनियम | वर्ष | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|---|
| रेगुलेटिंग एक्ट | 1773 | कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करने का ब्रिटिश संसद का प्रथम प्रयास। बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' बनाया गया (प्रथम — वारेन हेस्टिंग्स) और उसकी 4 सदस्यीय कार्यकारी परिषद बनी। बंबई एवं मद्रास प्रेसीडेंसी बंगाल के अधीन। कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (1774) की व्यवस्था। कर्मचारियों के निजी व्यापार एवं उपहार लेने पर रोक। कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स को ब्रिटिश सरकार को राजस्व, नागरिक एवं सैन्य विवरण भेजना अनिवार्य। |
| संशोधक अधिनियम / एक्ट ऑफ सेटलमेंट | 1781 | 1773 के दोषों का निवारण। गवर्नर-जनरल एवं परिषद को उनके सरकारी कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता से मुक्त किया गया; राजस्व-संबंधी मामले भी बाहर किए गए। न्यायालय को निर्देश कि हिंदुओं पर हिंदू विधि तथा मुसलमानों पर मुस्लिम विधि लागू हो। प्रांतीय न्यायालयों से अपील गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल में। |
| पिट्स इंडिया एक्ट | 1784 | कंपनी के वाणिज्यिक एवं राजनीतिक कार्यों को अलग किया। व्यापार कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स के पास, राजनीतिक मामले नए बोर्ड ऑफ कंट्रोल के पास — यही "द्वैध शासन" (dual government of the Company and the Crown) कहलाया। गवर्नर-जनरल की परिषद 3 सदस्यों की। पहली बार कंपनी के क्षेत्रों को 'भारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र' कहा गया। |
| चार्टर एक्ट | 1793 | कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार 20 वर्ष और बढ़ाया गया। गवर्नर-जनरल को परिषद के निर्णय रद्द करने (override) का अधिकार। बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों का वेतन भारतीय राजस्व से। नियम/विनियम (Regulations) प्रकाशित करने की व्यवस्था — 'विनियम-विधि' की नींव। |
| चार्टर एक्ट | 1813 | कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त — केवल चाय तथा चीन के साथ व्यापार में बना रहा। ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति। शिक्षा हेतु ₹1 लाख वार्षिक का प्रावधान (जो 20 वर्ष तक विवाद में फँसा रहा)। कंपनी के क्षेत्रों पर ब्रिटिश ताज की प्रभुसत्ता स्पष्ट रूप से घोषित। |
| चार्टर एक्ट | 1833 | बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बनाया गया (प्रथम — लॉर्ड विलियम बेंटिंक)। बंबई एवं मद्रास की विधायी शक्तियाँ छीनकर विधायी केंद्रीकरण। कंपनी विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बनी, व्यापार समाप्त। परिषद में विधि सदस्य जोड़ा गया (मैकाले, 1834) तथा विधि आयोग बना। धारा 87 — धर्म, जन्म, वंश या रंग के आधार पर किसी भारतीय को पद से वंचित न करने का प्रावधान (व्यवहार में निष्प्रभावी)। दास प्रथा के उन्मूलन का मार्ग भी इसी से खुला। |
| चार्टर एक्ट | 1853 | पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी एवं कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण — 6 नए विधायी सदस्यों के साथ एक लघु-संसद जैसी भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद बनी। सिविल सेवा के लिए खुली प्रतियोगिता। कंपनी का शासन बिना अवधि निर्धारित किए बढ़ाया गया — अर्थात् संसद जब चाहे समाप्त कर सकती थी। स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत — 6 में से 4 विधायी सदस्य मद्रास, बंबई, बंगाल तथा आगरा की स्थानीय सरकारों द्वारा। |
| अधिनियम | वर्ष | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|---|
| भारत शासन अधिनियम (Act for the Good Government of India) | 1858 | 1857 के विद्रोह की सीधी प्रतिक्रिया। शासन कंपनी से ब्रिटिश ताज को हस्तांतरित। भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद — ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारत परिषद। गवर्नर-जनरल को वायसराय कहा गया (प्रथम — लॉर्ड कैनिंग)। बोर्ड ऑफ कंट्रोल तथा कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स समाप्त — द्वैध शासन का अंत। भारतीयों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला; यह मुख्यतः प्रशासनिक पुनर्गठन था। |
| भारतीय परिषद अधिनियम | 1861 | विधि-निर्माण में भारतीयों के मनोनयन की शुरुआत — कैनिंग ने 1862 में बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा तथा सर दिनकर राव को मनोनीत किया। विकेंद्रीकरण — बंबई एवं मद्रास को विधायी शक्ति वापस; बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (1866) तथा पंजाब (1897) के लिए नई परिषदें। वायसराय को अध्यादेश (6 माह) जारी करने का अधिकार। 1859 में कैनिंग द्वारा आरंभ की गई विभाग/पोर्टफोलियो प्रणाली को मान्यता। |
| भारतीय परिषद अधिनियम | 1892 | अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या में वृद्धि, पर सरकारी बहुमत बना रहा। सदस्यों को बजट पर चर्चा तथा कार्यपालिका से प्रश्न पूछने का अधिकार मिला — किंतु न मतदान का अधिकार, न पूरक प्रश्न का। निर्वाचन का सिद्धांत सीमित एवं अप्रत्यक्ष रूप में आया — विश्वविद्यालय, नगरपालिका, ज़िला बोर्ड, ज़मींदार एवं वाणिज्य मंडल नाम संस्तुत करते थे, नियुक्ति मनोनयन से होती थी; अधिनियम में 'निर्वाचन' शब्द का प्रयोग नहीं था। |
| भारतीय परिषद अधिनियम (मॉर्ले–मिंटो सुधार) | 1909 | केंद्रीय विधान परिषद की सदस्य-संख्या 16 से बढ़ाकर 60। केंद्र में सरकारी बहुमत बना रहा, पर प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी बहुमत की अनुमति। सदस्यों को बजट पर संकल्प रखने तथा पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार। सबसे विवादास्पद प्रावधान — मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (इसीलिए लॉर्ड मिंटो को 'सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का जनक' कहा जाता है)। पहली बार भारतीयों को कार्यकारी परिषदों से जोड़ा गया — सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारी परिषद के विधि सदस्य बने। |
| भारत शासन अधिनियम (मांटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार) | 1919 | 20 अगस्त 1917 की घोषणा (उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना) की परिणति। प्रांतीय विषयों को हस्तांतरित एवं आरक्षित में बाँटकर प्रांतों में द्वैध शासन (dyarchy)। केंद्रीय एवं प्रांतीय विषयों की सूचियाँ अलग। केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल — राज्य परिषद एवं विधान सभा; प्रत्यक्ष निर्वाचन की शुरुआत। पृथक निर्वाचक मंडल सिख, भारतीय ईसाई, आंग्ल-भारतीय एवं यूरोपीय तक विस्तारित। लोक सेवा आयोग के गठन तथा लंदन में भारत के उच्चायुक्त के पद का प्रावधान। दस वर्ष बाद समीक्षा हेतु आयोग का प्रावधान — जिससे 1927 में साइमन आयोग बना। |
| भारत शासन अधिनियम | 1935 | प्रांतों एवं देशी रियासतों को मिलाकर अखिल भारतीय संघ (All-India Federation) का प्रस्ताव — रियासतों के सम्मिलित न होने से कभी लागू नहीं हुआ। शक्तियों का तीन सूचियों में विभाजन — संघीय (59), प्रांतीय (54), समवर्ती (36); अवशिष्ट शक्ति वायसराय के पास। प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता (1937 से लागू); केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान, जो लागू नहीं हुआ। 11 में से 6 प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल। पृथक निर्वाचन दलित वर्गों, महिलाओं एवं श्रमिकों तक विस्तारित। भारत परिषद समाप्त। संघीय न्यायालय (1937) तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (1935) की स्थापना। बर्मा भारत से अलग (1937); सिंध एवं उड़ीसा नए प्रांत (1936)। |
| भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम | 1947 | माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) पर आधारित। 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश शासन समाप्त; भारत एवं पाकिस्तान — दो स्वतंत्र अधिराज्य (Dominions), जिन्हें राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार भी था। भारत सचिव का पद समाप्त। गवर्नर-जनरल तथा प्रांतीय गवर्नर संवैधानिक प्रमुख बने। संविधान सभाएँ अपने-अपने अधिराज्य की विधानमंडल भी बनीं और उन्हें ब्रिटिश संसद के किसी भी कानून (सहित इसी अधिनियम) को निरस्त करने का अधिकार मिला। देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने या स्वतंत्र रहने को मुक्त। नया संविधान बनने तक 1935 का अधिनियम अंतरिम संविधान के रूप में लागू रहा। |
प्र.1 'भारतीय परिषद अधिनियम, 1909' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इस अधिनियम ने केंद्रीय विधान परिषद में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत स्थापित कर दिया।
2. इस अधिनियम ने प्रांतों में उत्तरदायी शासन (responsible government) की स्थापना की।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 भारत शासन अधिनियम, 1935 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने केंद्र में द्वैध शासन (dyarchy) की व्यवस्था की।
2. इसने भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का प्रावधान किया।
3. इसने प्रांतीय विषयों को 'हस्तांतरित' तथा 'आरक्षित' श्रेणियों में विभाजित किया।
4. इसने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 भारत शासन अधिनियम, 1919 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने भारत में प्रथम बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की।
2. इसने केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की।
3. इसने सिखों, आंग्ल-भारतीयों, भारतीय ईसाइयों तथा यूरोपीयों तक पृथक प्रतिनिधित्व का विस्तार किया।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
19वीं शताब्दी के इन आंदोलनों को 'भारतीय पुनर्जागरण' कहा जाता है। इनके पीछे तीन शक्तियाँ थीं — पाश्चात्य शिक्षा एवं तर्कवाद, ईसाई मिशनरियों की आलोचना जिसने भारतीयों को आत्मनिरीक्षण पर विवश किया, और प्राच्यवादी (Orientalist) विद्वानों द्वारा प्राचीन भारतीय ग्रंथों की पुनर्खोज, जिसने आत्मगौरव लौटाया। मोटे तौर पर इन्हें दो प्रवृत्तियों में बाँटा जाता है — सुधारवादी (ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन), जो आधुनिक तर्क को स्वीकार करते थे, और पुनरुत्थानवादी (आर्य समाज, देवबंद), जो समाधान अतीत की शुद्ध परंपरा में खोजते थे।
रामकृष्ण परमहंस (1836–1886) दक्षिणेश्वर (कलकत्ता) के काली-भक्त संत थे, जिनका मूल संदेश था — सभी धर्म एक ही लक्ष्य के भिन्न मार्ग हैं तथा जीव-सेवा ही शिव-सेवा है। उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद (नरेंद्रनाथ दत्त, 1863–1902) ने सितंबर 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में भारतीय वेदांत का परिचय विश्व से कराया और लौटकर 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की; बेलूर मठ इसका मुख्यालय बना। मिशन ने धार्मिक प्रचार से अधिक शिक्षा, चिकित्सा एवं आपदा-राहत को अपना कार्यक्षेत्र बनाया — यह भारतीय संन्यास-परंपरा में एक नया मोड़ था। पत्रिकाएँ — प्रबुद्ध भारत एवं उद्बोधन।
स्थापना 1875, न्यूयॉर्क में मैडम एच. पी. ब्लावात्स्की तथा कर्नल एच. एस. ऑल्कॉट द्वारा। 1882 में इसका अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय अड्यार (मद्रास) स्थानांतरित हुआ। एनी बेसेंट 1893 में भारत आईं और 1907 में सोसाइटी की अध्यक्ष बनीं। सोसाइटी ने हिंदू दर्शन, पुनर्जन्म एवं कर्म के सिद्धांतों को पाश्चात्य श्रोताओं के समक्ष रखा और भारतीयों में आत्मविश्वास जगाया — यद्यपि उसकी रहस्यवादी प्रवृत्ति की आलोचना भी हुई।
दारुल उलूम, देवबंद (सहारनपुर, उ.प्र.) — 30 मई 1866; संस्थापक मुहम्मद क़ासिम नानौतवी तथा रशीद अहमद गंगोही। यह अलीगढ़ के ठीक विपरीत धारा थी — परंपरागत इस्लामी शिक्षा पर बल, सरकारी सहायता से दूरी और ब्रिटिश-विरोधी रुख। 20वीं शताब्दी में महमूद-उल-हसन तथा जमीअत-उल-उलेमा-ए-हिंद की धारा ने राष्ट्रीय आंदोलन और संयुक्त राष्ट्रवाद का समर्थन किया, जबकि अलीगढ़ की धारा पृथकतावाद की ओर गई।
| संस्था | संस्थापक | वर्ष | स्थान |
|---|---|---|---|
| आत्मीय सभा | राजा राममोहन राय | 1815 | कलकत्ता |
| ब्रह्म समाज (ब्रह्म सभा) | राजा राममोहन राय | 1828 | कलकत्ता |
| तत्वबोधिनी सभा | देवेंद्रनाथ टैगोर | 1839 | कलकत्ता |
| परमहंस मंडली | दादोबा पांडुरंग आदि | 1849 | बंबई |
| रहनुमाई मज़दयासनन सभा | नौरोजी फ़ुरदुनजी, दादाभाई नौरोजी | 1851 | बंबई |
| राधास्वामी मत | शिव दयाल सिंह | 1861 | आगरा |
| साइंटिफ़िक सोसाइटी | सर सैयद अहमद खाँ | 1864 | गाज़ीपुर → अलीगढ़ |
| दारुल उलूम | मुहम्मद क़ासिम नानौतवी | 1866 | देवबंद (सहारनपुर) |
| प्रार्थना समाज | आत्माराम पांडुरंग | 1867 | बंबई |
| सत्यशोधक समाज | ज्योतिबा फुले | 1873 | पुणे |
| सिंह सभा (प्रथम) | सिख विद्वानों का समूह | 1873 | अमृतसर |
| आर्य समाज | स्वामी दयानंद सरस्वती | 1875 | बंबई |
| थियोसोफिकल सोसाइटी | ब्लावात्स्की एवं ऑल्कॉट | 1875 | न्यूयॉर्क (1882 से अड्यार) |
| देव समाज | शिव नारायण अग्निहोत्री | 1887 | लाहौर |
| अहमदिया आंदोलन | मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद | 1889 | कादियान |
| रामकृष्ण मिशन | स्वामी विवेकानंद | 1897 | बेलूर (कलकत्ता) |
| सेंट्रल हिंदू कॉलेज | एनी बेसेंट | 1898 | बनारस |
| चीफ़ खालसा दीवान | सिंह सभाओं का संघ | 1902 | अमृतसर |
| गुरुकुल कांगड़ी | स्वामी श्रद्धानंद | 1902 | हरिद्वार |
| एस.एन.डी.पी. योगम | श्री नारायण गुरु | 1903 | केरल |
| जस्टिस पार्टी | त्यागराज चेट्टी, टी. एम. नायर | 1916 | मद्रास |
| आत्म-सम्मान आंदोलन | ई. वी. रामासामी 'पेरियार' | 1925 | तमिलनाडु |
प्र.1 सूची-I (संस्था) को सूची-II (स्थापना वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. प्रार्थना समाज B. सत्यशोधक समाज C. आर्य समाज D. रामकृष्ण मिशन
सूची-II: 1. 1873 2. 1867 3. 1897 4. 1875
कूट:
प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(आंदोलन/संस्था) (संबद्ध व्यक्ति)
1. यंग बंगाल आंदोलन — केशव चंद्र सेन
2. सत्यशोधक समाज — गोपाल हरि देशमुख
3. रामकृष्ण मिशन — स्वामी विवेकानंद
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 सूची-I (संगठन/आंदोलन) को सूची-II (संबद्ध व्यक्ति) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. एस.एन.डी.पी. योगम B. आत्म-सम्मान आंदोलन C. हरिजन सेवक संघ (प्रथम अध्यक्ष) D. जस्टिस पार्टी
सूची-II: 1. ई.वी. रामास्वामी नायकर 2. पी. त्यागराय चेट्टी 3. श्री नारायण गुरु 4. घनश्याम दास बिड़ला
कूट:
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अंग्रेजों ने ये कानून किसी सुधारवादी उत्साह से नहीं, बल्कि भारतीय सुधारकों के दबाव तथा जनमत बनने पर ही बनाए — और 1857 के बाद तो उन्होंने सामाजिक हस्तक्षेप से सचेत दूरी ही बना ली, क्योंकि 'धर्म में हस्तक्षेप' विद्रोह का एक बड़ा कारण माना गया।
| विधान | वर्ष | प्रावधान एवं संदर्भ |
|---|---|---|
| कन्या-वध विरोधी विनियम | 1795 एवं 1804 | कन्या-वध को हत्या घोषित किया गया (वेलेज़ली के काल में विस्तार) |
| बंगाल सती विनियम (Regulation XVII) | 1829 | सती प्रथा अवैध एवं दंडनीय; लॉर्ड विलियम बेंटिंक; प्रेरक राजा राममोहन राय। 1830 में बंबई एवं मद्रास में विस्तार। राधाकांत देव की धर्म सभा ने प्रिवी काउंसिल में अपील की, जो 1832 में खारिज हुई। |
| ठगी का दमन | 1830 के दशक | कर्नल विलियम स्लीमन; बेंटिंक के काल में |
| दास प्रथा उन्मूलन (Act V) | 1843 | दासता की कानूनी मान्यता समाप्त; 1833 के चार्टर एक्ट के निर्देश की परिणति; 1860 की भारतीय दंड संहिता ने दास-व्यापार को अपराध बनाया |
| जाति-निर्योग्यता निवारण अधिनियम | 1850 | धर्म-परिवर्तन या जाति-बहिष्कार पर संपत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार सुरक्षित |
| हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (Act XV) | 1856 | विधवा विवाह को वैध मान्यता; ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अभियान का परिणाम; लॉर्ड कैनिंग के काल में (विधेयक डलहौज़ी के काल में तैयार) |
| देशी विवाह / सिविल मैरिज एक्ट | 1872 | केशवचंद्र सेन के प्रयास से; अंतर्जातीय एवं विधवा विवाह को वैधता; न्यूनतम आयु का प्रावधान |
| कन्या-वध निवारण अधिनियम | 1870 | जन्म-पंजीकरण अनिवार्य तथा कन्याओं का सत्यापन |
| सहमति की आयु अधिनियम (Age of Consent Act) | 1891 | सहमति की आयु 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष; बहरामजी मालाबारी का अभियान; फुलमनी दासी प्रकरण। तिलक जैसे नेताओं ने इसे 'धर्म में हस्तक्षेप' कहकर विरोध किया। 1925 में यह आयु और बढ़ाई गई। |
| बाल विवाह निरोधक अधिनियम (शारदा अधिनियम) | 1929 | हरबिलास शारदा (आर्य समाजी) द्वारा प्रस्तुत; विवाह की न्यूनतम आयु — लड़की 14, लड़का 18 वर्ष; 1930 से प्रभावी; सभी समुदायों पर लागू |
भारत का प्रथम अखिल भारतीय स्तर का महिला संगठन 'भारत स्त्री महामंडल' सरला देवी चौधुरानी द्वारा 1910 में इलाहाबाद में स्थापित किया गया — इसका मुख्य उद्देश्य स्त्री-शिक्षा का प्रसार था। इसी प्रकार शारदा अधिनियम (1929) के क्रियान्वयन तथा आर्य समाज की शुद्धि एवं स्त्री-शिक्षा गतिविधियों का सबसे सघन क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा।
प्र.1 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महिला अध्यक्षों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष एनी बेसेंट थीं, जो 1917 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्ष बनीं।
2. सरोजिनी नायडू कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली प्रथम महिला थीं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 निम्नलिखित अधिनियमों को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम
2. सहमति आयु अधिनियम
3. बाल विवाह निरोधक (शारदा) अधिनियम
4. विशेष विवाह अधिनियम
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 राष्ट्रीय आंदोलन-कालीन महिला संगठनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'वीमेंस इंडियन एसोसिएशन' (1917) की स्थापना मद्रास के अड्यार में हुई तथा एनी बेसेंट इसकी प्रथम अध्यक्ष बनीं।
2. 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' (AIWC) का प्रथम अधिवेशन 1927 में पूना में हुआ था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
2 फरवरी 1835 को विधि सदस्य टी. बी. मैकाले ने अपना प्रसिद्ध 'मिनट' प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीय एवं अरबी-फ़ारसी ज्ञान-परंपरा को हेय बताते हुए अंग्रेजी शिक्षा का पक्ष लिया गया। उसका घोषित लक्ष्य था — ऐसा वर्ग तैयार करना जो "रक्त एवं रंग में भारतीय, किंतु रुचि, विचार, नैतिकता एवं बुद्धि में अंग्रेज" हो। 7 मार्च 1835 को बेंटिंक ने इसे स्वीकार कर अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया। इसके साथ चली 'अधोमुखी निस्यंदन' (downward filtration) नीति — शिक्षा केवल उच्च वर्ग को दी जाए, वहाँ से वह स्वयं जनसामान्य तक रिस जाएगी। व्यवहार में यह रिसाव कभी हुआ ही नहीं — यही औपनिवेशिक शिक्षा-नीति की सबसे बड़ी विफलता है।
| आयोग / प्रतिवेदन | वर्ष | काल | मुख्य सिफ़ारिश |
|---|---|---|---|
| वुड डिस्पैच (चार्ल्स वुड) | 1854 | डलहौज़ी | 'भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा' — प्रत्येक प्रांत में लोक शिक्षा विभाग; कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास में लंदन विश्वविद्यालय के ढर्रे पर विश्वविद्यालय (तीनों 1857 में स्थापित); प्राथमिक स्तर पर देशी भाषा, उच्च स्तर पर अंग्रेजी; अनुदान-सहायता प्रणाली; शिक्षक-प्रशिक्षण एवं स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन |
| हंटर आयोग (डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर) | 1882 | रिपन | प्राथमिक शिक्षा पर विशेष बल तथा उसका प्रबंध ज़िला/नगर बोर्डों को; माध्यमिक स्तर पर दो धाराएँ — साहित्यिक एवं व्यावसायिक; निजी प्रयास को प्रोत्साहन |
| रैले आयोग (टॉमस रैले) → भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम | 1902 → 1904 | कर्ज़न | विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा लेने वाली संस्था से बदलकर अध्यापन एवं शोध से जोड़ना; सीनेट का आकार घटाना; संबद्धता के कठोर नियम। राष्ट्रवादियों ने इसे विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास माना |
| सरकारी शिक्षा नीति प्रस्ताव | 1913 | हार्डिंग द्वितीय | अनिवार्य शिक्षा का दायित्व लेने से इनकार, पर निरक्षरता उन्मूलन का संकल्प; प्रांतों से पहल की अपेक्षा |
| सैडलर आयोग (कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग, माइकल सैडलर) | 1917–19 | चेम्सफोर्ड | विद्यालय-शिक्षा 12 वर्ष; विश्वविद्यालय से पहले इंटरमीडिएट कॉलेज; 3 वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम; एकल एवं आवासीय अध्यापन-विश्वविद्यालय; स्त्री-शिक्षा, व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा पर बल |
| हर्टाग समिति (फिलिप हर्टाग) | 1929 | इर्विन | संख्या नहीं, गुणवत्ता — प्राथमिक शिक्षा का सुदृढ़ीकरण; औसत छात्रों को मध्य स्तर पर ही व्यावसायिक शिक्षा की ओर मोड़ना |
| वर्धा योजना (बुनियादी शिक्षा) / सार्जेंट योजना | 1937 / 1944 | — | गांधीजी की 'नई तालीम' — हस्तशिल्प-केंद्रित, स्वावलंबी शिक्षा (डॉ. ज़ाकिर हुसैन समिति); सार्जेंट योजना ने 40 वर्षों में सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य रखा |
भारत का प्रथम समाचार-पत्र 'बंगाल गजट' (1780) था, जिसे जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने निकाला — इसीलिए इसे 'हिक्कीज़ गजट' भी कहते हैं। इसके बाद प्रेस और सरकार के बीच का संबंध प्रायः टकराव का ही रहा।
| अधिनियम | वर्ष | अधिकारी | प्रावधान |
|---|---|---|---|
| सेंसरशिप ऑफ प्रेस एक्ट | 1799 | वेलेज़ली | प्रकाशन से पूर्व सामग्री की जाँच (pre-censorship); फ्रांसीसी खतरे के नाम पर |
| लाइसेंसिंग रेगुलेशन | 1823 | कार्यवाहक गवर्नर-जनरल जॉन एडम | बिना लाइसेंस प्रकाशन दंडनीय; मुख्य निशाना भारतीय भाषाओं के पत्र — राममोहन राय का मिरात-उल-अख़बार इसी से बंद हुआ |
| मेटकाफ़ एक्ट | 1835 | चार्ल्स मेटकाफ़ | 1823 के नियम निरस्त; इसीलिए मेटकाफ़ को 'भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता' तथा इस अधिनियम को 'भारतीय प्रेस का मैग्ना कार्टा' कहा जाता है |
| लाइसेंसिंग एक्ट | 1857 | कैनिंग | विद्रोह के दौरान आपातकालीन लाइसेंस-व्यवस्था |
| प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम | 1867 | लॉरेंस | नियामक, दमनकारी नहीं — मुद्रक, प्रकाशक एवं प्रकाशन-स्थल छापना तथा एक प्रति सरकार को देना अनिवार्य |
| वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट | 1878 | लिटन | केवल भारतीय भाषाओं के पत्रों पर लागू, अंग्रेजी पत्रों पर नहीं — इसीलिए इसे 'मुँह बंद करने वाला कानून' (gagging act) कहा गया; ज़िला मजिस्ट्रेट बांड भरवा सकता था, प्रेस ज़ब्त कर सकता था; अपील का अधिकार नहीं। अमृत बाज़ार पत्रिका रातोंरात अंग्रेजी में छपने लगी। 1882 में रिपन ने इसे निरस्त किया। |
| समाचार-पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम | 1908 | मिंटो | 'उद्दीपक' सामग्री पर प्रेस की ज़ब्ती |
| भारतीय प्रेस अधिनियम | 1910 | मिंटो | नए प्रेस से जमानत की माँग; ज़ब्ती का व्यापक अधिकार |
| भारतीय प्रेस (आपात शक्तियाँ) अधिनियम | 1931 | विलिंग्डन | सविनय अवज्ञा आंदोलन के दमन हेतु प्रांतीय सरकारों को व्यापक शक्तियाँ |
| पत्र | संस्थापक / संपादक | भाषा एवं स्थान |
|---|---|---|
| बंगाल गजट (1780) | जेम्स ऑगस्टस हिक्की | अंग्रेजी · कलकत्ता — भारत का प्रथम समाचार-पत्र |
| संवाद कौमुदी (1821) | राजा राममोहन राय | बांग्ला |
| मिरात-उल-अख़बार (1822) | राजा राममोहन राय | फ़ारसी |
| रास्त गोफ़्तार (1851) | दादाभाई नौरोजी | गुजराती · बंबई |
| हिंदू पैट्रियट | हरिश्चंद्र मुखर्जी | अंग्रेजी · कलकत्ता — नील विद्रोह में किसानों का पक्ष |
| सोम प्रकाश (1858) | ईश्वरचंद्र विद्यासागर | बांग्ला |
| इंडियन मिरर | देवेंद्रनाथ टैगोर / केशवचंद्र सेन | अंग्रेजी · कलकत्ता |
| अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट (1866) | सर सैयद अहमद खाँ | उर्दू-अंग्रेजी · अलीगढ़ |
| कविवचन सुधा (1867) | भारतेंदु हरिश्चंद्र | हिंदी · काशी |
| अमृत बाज़ार पत्रिका (1868) | शिशिर कुमार घोष एवं मोतीलाल घोष | बांग्ला → अंग्रेजी |
| तहज़ीब-उल-अख़लाक़ | सर सैयद अहमद खाँ | उर्दू · अलीगढ़ |
| हरिश्चंद्र मैगज़ीन (1873) | भारतेंदु हरिश्चंद्र | हिंदी · काशी |
| द हिंदू (1878) | जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर | अंग्रेजी · मद्रास |
| केसरी एवं मराठा (1881) | बाल गंगाधर तिलक (एवं आगरकर) | मराठी एवं अंग्रेजी · पुणे |
| बंगाली | सुरेंद्रनाथ बनर्जी | अंग्रेजी · कलकत्ता |
| सुधारक | गोपाल कृष्ण गोखले | मराठी-अंग्रेजी · पुणे |
| हिंदुस्तान | राजा रामपाल सिंह द्वारा स्थापित; मदन मोहन मालवीय संपादक (1887 से) | हिंदी · कालाकांकर (प्रतापगढ़) |
| सरस्वती (1900) | इंडियन प्रेस; संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी (1903 से) | हिंदी · इलाहाबाद |
| अभ्युदय (1907) एवं द लीडर (1909) | मदन मोहन मालवीय | हिंदी / अंग्रेजी · इलाहाबाद |
| अल-हिलाल (1912) | अबुल कलाम आज़ाद | उर्दू · कलकत्ता |
| प्रताप (1913) | गणेश शंकर विद्यार्थी | हिंदी · कानपुर |
आधुनिक हिंदी गद्य एवं पत्रकारिता की धुरी उत्तर प्रदेश ही रही। भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–85) को 'आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक' कहा जाता है; उनका कविवचन सुधा काशी से निकला। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इलाहाबाद से सरस्वती का संपादन कर खड़ी बोली को साहित्यिक प्रतिष्ठा दी — इसीलिए 1900–20 का काल 'द्विवेदी युग' कहलाता है। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रताप निकालकर किसान-मज़दूर के प्रश्नों को राष्ट्रीय स्वर दिया और 1931 के कानपुर दंगों में शांति-प्रयास करते हुए प्राण गँवाए।
प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू होने के कुछ ही दिनों के भीतर 'अमृत बाजार पत्रिका' स्वयं को अंग्रेजी साप्ताहिक में बदल चुकी थी।
कारण (R): वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट के प्रावधान केवल देशी भाषाओं के समाचारपत्रों पर लागू होते थे, अंग्रेजी पत्रों पर नहीं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 सूची-I (शिक्षा संबंधी आयोग/योजना) को सूची-II (वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. हंटर आयोग B. रैले आयोग C. सैडलर आयोग D. सार्जेंट योजना
सूची-II: 1. 1902 2. 1917 3. 1944 4. 1882
कूट:
प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): चार्ल्स मेटकाफ को 'भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता' कहा जाता है।
कारण (R): 1835 के प्रेस अधिनियम द्वारा उन्होंने 1823 के दमनकारी लाइसेंसिंग विनियमों को निरस्त कर दिया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| वर्ग | प्रमुख कारण |
|---|---|
| राजनीतिक | व्यपगत सिद्धांत से रियासतों का विलय; अवध का विलय (1856) — जिसे देशभर के सिपाहियों ने अपमान माना क्योंकि बंगाल सेना का बड़ा भाग अवध का था; नाना साहब की पेंशन बंद; बहादुर शाह के उत्तराधिकारियों से मुग़ल उपाधि तथा लाल किला छीनने की घोषणा; कर्नाटक एवं तंजौर की उपाधियों का अंत |
| आर्थिक | भारी भू-राजस्व एवं कठोर वसूली; अवध में 1856 के 'संक्षिप्त बंदोबस्त' से तालुकेदारों की भूमि छिनना; इनाम कमीशन (बंबई) द्वारा कर-मुक्त भूमि की जाँच; हस्तशिल्प का विनाश एवं कारीगरों की बेरोज़गारी; धन-निष्कासन |
| सामाजिक-धार्मिक | ईसाई मिशनरियों की खुली गतिविधि; जाति-निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850 — जिसे धर्मांतरण को प्रोत्साहन माना गया; सती-निषेध एवं विधवा पुनर्विवाह को 'धर्म में हस्तक्षेप' समझा जाना; रेल-तार जैसी नवीनताओं पर संदेह; अंग्रेजों का नस्लीय दंभ |
| सैनिक | वेतन एवं भत्तों में भेदभाव, सूबेदार से ऊपर पदोन्नति असंभव; सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम, 1856 — जिसके अनुसार सिपाही को समुद्र पार भी सेवा देनी पड़ती (समुद्र-यात्रा को जाति-भ्रष्टता माना जाता था); डाकघर अधिनियम, 1854 से निःशुल्क डाक-सुविधा की समाप्ति; अंग्रेज एवं भारतीय सैनिकों का अनुपात लगभग 1:5 |
| तात्कालिक | एनफ़ील्ड P-53 राइफ़ल के चर्बीयुक्त कारतूस — जिन्हें दाँत से काटना पड़ता था और जिनमें गाय एवं सूअर की चर्बी होने की चर्चा फैली |
| केंद्र | भारतीय नेता | ब्रिटिश दमनकर्ता / परिणाम |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र (प्रतीकात्मक), जनरल बख़्त खाँ (वास्तविक) | जॉन निकोल्सन (मारा गया) एवं हडसन; सितंबर 1857 में दिल्ली पुनः अधिकार में; बहादुर शाह रंगून निर्वासित (मृत्यु 1862), उनके पुत्र लेफ्टिनेंट हडसन द्वारा गोली से मारे गए |
| कानपुर | नाना साहब (पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र), तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला खाँ | ह्यू व्हीलर, हैवलॉक, कॉलिन कैंपबेल — 6 दिसंबर 1857 को कानपुर पूर्णतः पुनः अधिकार में |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल, जिन्होंने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस क़द्र को नवाब घोषित किया | हेनरी लॉरेंस (रेज़िडेंसी की घेराबंदी में मारे गए), हैवलॉक एवं आउट्रम; मार्च 1858 में कॉलिन कैंपबेल द्वारा अंतिम पुनर्विजय; बेगम नेपाल चली गईं |
| झाँसी एवं ग्वालियर | रानी लक्ष्मीबाई, बाद में तात्या टोपे के साथ | सर ह्यू रोज़; अप्रैल 1858 में झाँसी का पतन; जून 1858 में ग्वालियर के निकट रानी वीरगति को प्राप्त हुईं — ह्यू रोज़ ने उन्हें 'विद्रोहियों में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक साहसी' कहा |
| बरेली | खान बहादुर खाँ — रुहेला नवाब के वंशज, जिन्होंने स्वयं को शासक घोषित किया | कैंपबेल; मई 1858 में बरेली पुनः अधिकार में |
| फ़ैज़ाबाद | मौलवी अहमदुल्ला शाह — 'अवध के विद्रोह का प्रकाश-स्तंभ' | 1858 में शाहजहाँपुर के निकट पवायाँ में विश्वासघात द्वारा मारे गए |
| इलाहाबाद | मौलवी लियाक़त अली — मुख्यालय खुसरो बाग | कर्नल नील का कुख्यात दमन |
| फ़र्रुख़ाबाद | नवाब तुफ़ज़्ज़ुल हसन खाँ | — |
| मथुरा | देवी सिंह — समानांतर सरकार चलाई | पकड़कर फाँसी |
| बिजनौर | महमूद खाँ | — |
| जगदीशपुर (बिहार) | कुँवर सिंह एवं अमर सिंह — 80 वर्ष की आयु में नेतृत्व | विलियम टेलर एवं विंसेंट आयर; 1858 में कुँवर सिंह की मृत्यु |
| ग्वालियर/कालपी | तात्या टोपे — छापामार युद्ध का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण | मानसिंह के विश्वासघात से पकड़े गए; 18 अप्रैल 1859 को फाँसी |
| कोटा (राजस्थान) | जयदयाल एवं हरदयाल सिंह | — |
| मंदसौर | फ़िरोज़ शाह | — |
1857 का विद्रोह मूलतः उत्तर प्रदेश का विद्रोह था — आरंभ मेरठ से, प्रतीक दिल्ली, पर सबसे लंबा एवं सबसे व्यापक संघर्ष अवध तथा रुहेलखंड में हुआ। याद रखने योग्य युग्म —
दूसरी ओर बनारस के राजा तथा अनेक बड़े ज़मींदार अंग्रेजों के साथ रहे — विद्रोह उत्तर प्रदेश में भी सर्वसम्मत नहीं था। विद्रोह के बाद अवध के तालुकेदारों को भूमि लौटाकर कैनिंग ने उन्हें स्थायी रूप से अपने पक्ष में कर लिया।
असफलता के कारण:
| विद्वान / लेखक | 1857 को क्या कहा |
|---|---|
| वी. डी. सावरकर (The Indian War of Independence, 1857, 1909) | 'प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर' — सुनियोजित राष्ट्रीय एवं धार्मिक युद्ध |
| सर जॉन सीले, सर जॉन लॉरेंस | 'पूर्णतः अराष्ट्रीय एवं स्वार्थी सैनिक विद्रोह', जिसे न देशी नेतृत्व मिला, न जन-समर्थन |
| आर. सी. मजूमदार | 'यह न प्रथम था, न राष्ट्रीय, और न ही स्वतंत्रता का युद्ध' |
| एस. एन. सेन (Eighteen Fifty-Seven, 1957) | 'जो धर्म के लिए युद्ध के रूप में आरंभ हुआ, वह स्वतंत्रता के युद्ध के रूप में समाप्त हुआ' |
| जवाहरलाल नेहरू | सामंती नेतृत्व वाला विद्रोह, जिसमें राष्ट्रीय भावना के तत्व अवश्य थे |
| कार्ल मार्क्स | 'राष्ट्रीय विद्रोह' — औपनिवेशिक शोषण की प्रतिक्रिया |
| टी. आर. होम्स | 'सभ्यता एवं बर्बरता के बीच संघर्ष' |
| अशोक मेहता | 'महान विद्रोह' — इसमें राष्ट्रीय चरित्र के तत्व विद्यमान थे |
| एरिक स्टोक्स | एकल विद्रोह नहीं, बल्कि स्थानीय शिकायतों से उपजे अनेक विद्रोहों का समुच्चय |
प्र.1 1857 के विद्रोह के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिल्ली में विद्रोहियों ने बहादुर शाह द्वितीय को भारत का सम्राट घोषित किया।
2. कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहेब ने किया।
3. लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व कुँवर सिंह ने किया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 '1857 के विद्रोह के नेतृत्व' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. विद्रोहियों ने बहादुर शाह द्वितीय को कानपुर में भारत का सम्राट घोषित किया।
2. बरेली में विद्रोह का नेतृत्व खान बहादुर खान ने किया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 सूची-I (महिला स्वतंत्रता सेनानी) को सूची-II (संबद्ध भूमिका) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. अरुणा आसफ अली B. उषा मेहता C. कैप्टन लक्ष्मी सहगल D. रानी गाइदिन्ल्यू
सूची-II: 1. भूमिगत 'कांग्रेस रेडियो' का संचालन 2. रानी झाँसी रेजिमेंट का नेतृत्व 3. ज़ेलियांग्रोंग (नागा) आंदोलन 4. गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराना
कूट:
1857 अकेली घटना नहीं थी। 1763 से 1900 तक भारत के किसी न किसी भाग में औसतन हर कुछ वर्ष में एक सशस्त्र विद्रोह हुआ। इनका मूल कारण एक ही था — औपनिवेशिक भू-राजस्व, वन-कानून तथा साहूकार-व्यापारी की तिहरी मार, जिसने जनजातियों को उनकी परंपरागत भूमि-व्यवस्था (खूँटकट्टी) तथा वन-अधिकारों से वंचित कर दिया और किसानों को ऋणग्रस्तता में धकेल दिया। बाहरी लोगों को जनजातियाँ 'दिकू' कहती थीं।
| विद्रोह | काल | क्षेत्र | नेता / विशेष |
|---|---|---|---|
| संन्यासी विद्रोह | 1763–1800 | बंगाल | 1770 के अकाल एवं तीर्थयात्रा पर प्रतिबंध की प्रतिक्रिया; बंकिमचंद्र के आनंदमठ का आधार |
| चुआड़ विद्रोह | 1766–72, 1798–99 | मिदनापुर (बंगाल) | दुर्जन सिंह |
| भील विद्रोह | 1817–19 एवं आगे | खानदेश (पश्चिमी भारत) | सेवाराम; कंपनी के अधिकार-विस्तार के विरुद्ध |
| रमोसी विद्रोह | 1822–29 | पश्चिमी घाट (महाराष्ट्र) | चित्तूर सिंह, उमाजी नाइक |
| पागलपंथी | 1825–35 | मयमनसिंह (बंगाल) | करम शाह एवं टीपू |
| अहोम विद्रोह | 1828 | असम | गोमधर कुँवर |
| खासी विद्रोह | 1829–33 | खासी पहाड़ियाँ (मेघालय) | यू. तीरत सिंह; सड़क-निर्माण एवं बाहरी लोगों के प्रवेश के विरुद्ध |
| कोल विद्रोह | 1831–32 | छोटानागपुर | बुद्धू भगत; बाहरी ठेकेदारों को भूमि हस्तांतरण के विरुद्ध |
| फ़राज़ी आंदोलन | 1838–57 | पूर्वी बंगाल | हाजी शरीअतुल्लाह एवं दूदू मियाँ; धार्मिक सुधार से आरंभ होकर ज़मींदार-विरोधी किसान आंदोलन बना |
| खोंड विद्रोह | 1846–55 | उड़ीसा | चक्र बिसोई; नरबलि (मेरिया) पर रोक तथा नए करों के विरुद्ध |
| संथाल विद्रोह (हूल) | 1855–56 | राजमहल पहाड़ियाँ (झारखंड) | सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू (साथ में चाँद एवं भैरव); साहूकारों तथा ज़मींदारी व्यवस्था के विरुद्ध; परिणामस्वरूप संथाल परगना का अलग प्रशासनिक क्षेत्र बना |
वहाबी (वलिउल्लाही) आंदोलन के प्रवर्तक सैयद अहमद बरेलवी थे, जिनका जन्म रायबरेली (उ.प्र.) में हुआ था। शाह वलिउल्लाह एवं उनके पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ की शिक्षाओं से प्रेरित इस आंदोलन ने इस्लाम में शुद्धीकरण के साथ-साथ भारत को 'दार-उल-हर्ब' से 'दार-उल-इस्लाम' में बदलने का आह्वान किया — व्यवहार में यह पहले सिख शासन और बाद में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष बना। पटना इसका प्रमुख संगठनात्मक केंद्र रहा तथा सीमांत क्षेत्र (सित्ताना) सैन्य केंद्र। 1857 के बाद अंग्रेजों ने इसका व्यवस्थित दमन किया। उत्तर प्रदेश के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण यह है कि 19वीं शताब्दी के सबसे संगठित ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों में से एक की जड़ें रायबरेली में थीं।
| विद्रोह | काल | क्षेत्र एवं नेता | परिणाम |
|---|---|---|---|
| नील विद्रोह | 1859–60 | बंगाल (नदिया ज़िले से आरंभ); दिगंबर विश्वास एवं विष्णुचरण विश्वास | यूरोपीय नील-बागान मालिकों की ज़ोर-ज़बरदस्ती के विरुद्ध; नील आयोग (1860); दीनबंधु मित्र का नाटक 'नील दर्पण' (हरीशचंद्र मुखर्जी के हिंदू पैट्रियट ने किसानों का पक्ष लिया) |
| पाबना कृषक विद्रोह | 1873–76 | पूर्वी बंगाल; 'कृषक संघ' (Agrarian League) | ज़मींदारों द्वारा मनमानी लगान-वृद्धि एवं बेदखली के विरुद्ध; अंततः बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 |
| दक्कन दंगे | 1875 | पुणे एवं अहमदनगर (महाराष्ट्र) | मारवाड़ी एवं गुजराती साहूकारों के विरुद्ध; बहीखाते जलाए गए; परिणाम — दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879 |
| रम्पा विद्रोह | 1879–80 | आंध्र की पहाड़ियाँ | नए वन-कानूनों एवं मनसबदारों के विरुद्ध (1922–24 में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में पुनरावृत्ति) |
| कोया विद्रोह | 1879–80 | पूर्वी गोदावरी (आंध्र); टोम्मा सोरा | वन-अधिकारों एवं पुलिस-अत्याचार के विरुद्ध |
| मुंडा उलगुलान | 1899–1900 | राँची के दक्षिण का क्षेत्र; बिरसा मुंडा ('धरती आबा') | 'खूँटकट्टी' भूमि-व्यवस्था के विनाश, बेगारी तथा मिशनरी दबाव के विरुद्ध; परिणाम — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908, जिसने जनजातीय भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई |
| तानाभगत आंदोलन | 1914–15 | छोटानागपुर; जतरा भगत (उराँव) | शुद्धीकरण एवं अहिंसक असहयोग; आगे चलकर कांग्रेस से जुड़ा |
| मोपला विद्रोह | 1921 | मालाबार (केरल) | काश्तकारी असुरक्षा एवं अत्यधिक लगान; खिलाफ़त-असहयोग आंदोलन के दौरान उग्र रूप |
20वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश किसान-आंदोलन का सबसे सक्रिय क्षेत्र बना — 1918 की उत्तर प्रदेश किसान सभा, 1920 की अवध किसान सभा (बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में, प्रतापगढ़–रायबरेली–फ़ैज़ाबाद क्षेत्र) तथा 1921–22 का एका आंदोलन (हरदोई, बहराइच, सीतापुर; मदारी पासी)। इनकी मुख्य माँगें थीं — बेदखली पर रोक, 'नज़राना' एवं बेगार की समाप्ति तथा लगान में कमी। इन आंदोलनों का विस्तृत विवरण तथा किसान-सभा का राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव अध्याय 2.4 में देखें।
प्र.1 सूची-I (विद्रोह/आंदोलन) को सूची-II (नेतृत्वकर्ता) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. मुंडा उलगुलान B. रम्पा विद्रोह (1922) C. संथाल हूल D. तानाभगत आंदोलन
सूची-II: 1. अल्लूरी सीताराम राजू 2. सिदो व कान्हू मुर्मू 3. जतरा भगत 4. बिरसा मुंडा
कूट:
प्र.2 कृषक/जनजातीय आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'तेभागा आंदोलन' का संबंध पंजाब से था।
2. पाबना कृषक संघर्ष (1873) का आरंभ बिहार के दरभंगा जिले से हुआ था।
3. 'बिजोलिया किसान आंदोलन' का संबंध बंगाल से था।
4. मोपला विद्रोह (1921) मालाबार क्षेत्र में हुआ था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 'दक्कन दंगे (1875)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ये दंगे मुख्यतः बंगाली तथा तमिल साहूकारों के विरुद्ध भड़के थे।
2. इनका आरंभ पूना जिले के सुपा गाँव से हुआ था।
3. इनकी प्रतिक्रिया में सरकार ने 1879 में दक्कन कृषक राहत अधिनियम पारित किया।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1498 | वास्को द गामा कालीकट पहुँचा |
| 1510 | अल्बुकर्क द्वारा गोवा पर अधिकार |
| 1600 | अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का चार्टर |
| 1602 | डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना |
| 1613 | सूरत में अंग्रेजी कारखाना |
| 1639 | मद्रास — फोर्ट सेंट जॉर्ज |
| 1664 | फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी (कॉलबर्ट) |
| 1674 | पांडिचेरी की स्थापना (फ्रांस्वा मार्टिन) |
| 1690 | जॉब चारनॉक — कलकत्ता की नींव |
| 1717 | फर्रुखसियर का फ़रमान — 'कंपनी का मैग्ना कार्टा' |
| 1746–48 / 1749–54 / 1756–63 | प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कर्नाटक युद्ध |
| 1757 | प्लासी का युद्ध (23 जून) |
| 1760 | वांडीवाश का युद्ध (आयर कूट बनाम लाली) |
| 1764 | बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर) |
| 1765 | इलाहाबाद की संधियाँ; दीवानी; द्वैध शासन का आरंभ |
| 1770 | बंगाल का महा-अकाल |
| 1772 | वारेन हेस्टिंग्स — द्वैध शासन की समाप्ति |
| 1773 | रेगुलेटिंग एक्ट; बनारस की प्रथम संधि |
| 1774 | कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय; रुहेला युद्ध |
| 1775 | फ़ैज़ाबाद की संधि — बनारस एवं गाज़ीपुर कंपनी को; प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध आरंभ |
| 1780 | बंगाल गजट — भारत का प्रथम समाचार-पत्र |
| 1781 | संशोधक अधिनियम; कलकत्ता मदरसा; चेतसिंह प्रकरण |
| 1782 | सालबाई की संधि |
| 1784 | पिट्स इंडिया एक्ट; मंगलौर की संधि; एशियाटिक सोसाइटी (1784) |
| 1791 | बनारस संस्कृत कॉलेज (जोनाथन डंकन) |
| 1792 | श्रीरंगपट्टनम की संधि |
| 1793 | स्थायी बंदोबस्त; चार्टर एक्ट; कॉर्नवालिस कोड |
| 1795 | बनारस प्रांत में स्थायी बंदोबस्त |
| 1798 | वेलेज़ली — हैदराबाद के साथ प्रथम सहायक संधि |
| 1799 | चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध; टीपू की मृत्यु; प्रेस सेंसरशिप अधिनियम |
| 1800 | फोर्ट विलियम कॉलेज |
| 1801 | अवध पर सहायक संधि; रुहेलखंड एवं दोआब कंपनी को |
| 1802 | बसीन की संधि |
| 1813 | चार्टर एक्ट — व्यापारिक एकाधिकार समाप्त; शिक्षा हेतु ₹1 लाख |
| 1815 | आत्मीय सभा |
| 1817 | हिंदू कॉलेज, कलकत्ता; तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध आरंभ |
| 1818 | पेशवा पद की समाप्ति; बाजीराव द्वितीय बिठूर भेजे गए |
| 1822 / 1833 | महालवाड़ी — रेगुलेशन VII (मैकेंज़ी) एवं रेगुलेशन IX (बर्ड) |
| 1824–26 | प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध; यंडबू की संधि (1826) |
| 1828 | ब्रह्म समाज की स्थापना |
| 1829 | सती प्रथा पर रोक (बेंटिंक) |
| 1831–32 / 1855–56 | कोल विद्रोह / संथाल विद्रोह |
| 1833 | चार्टर एक्ट — भारत का गवर्नर-जनरल; कंपनी का व्यापार समाप्त |
| 1835 | मैकाले मिनट एवं अंग्रेजी शिक्षा; मेटकाफ़ प्रेस एक्ट; एकसमान रुपया |
| 1843 | सिंध का विलय; दास प्रथा उन्मूलन (Act V) |
| 1845–46 / 1848–49 | प्रथम एवं द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध; 1849 — पंजाब का विलय |
| 1849 | बेथ्यून स्कूल; सतारा का विलय (1848) |
| 1851 | रहनुमाई मज़दयासनन सभा |
| 1852 | द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध — पेगू का विलय |
| 1853 | प्रथम रेल (बंबई–ठाणे, 16 अप्रैल); चार्टर एक्ट; झाँसी का विलय |
| 1854 | वुड डिस्पैच; प्रथम सूती मिल (बंबई); नागपुर का विलय (1854) |
| 1855 | प्रथम जूट मिल (रिसड़ा); सहारनपुर नियम |
| 1856 | अवध का विलय; विधवा पुनर्विवाह अधिनियम; सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम |
| 1857 | विद्रोह — 29 मार्च बैरकपुर, 10 मई मेरठ, 11 मई दिल्ली; तीन विश्वविद्यालय (कलकत्ता, बंबई, मद्रास) |
| 1858 | भारत शासन अधिनियम; 1 नवंबर — इलाहाबाद में महारानी की घोषणा |
| 1859 | पील आयोग; नील विद्रोह; इलाहाबाद–कानपुर रेल; 8 जुलाई 1859 — शांति की घोषणा |
| 1860–61 | भारतीय दंड संहिता लागू; पुलिस अधिनियम 1861; भारतीय परिषद अधिनियम 1861; उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 |
| 1866 | देवबंद दारुल उलूम; आगरा में उच्च न्यायालय; उड़ीसा का अकाल एवं कैंपबेल आयोग |
| 1867 | प्रार्थना समाज; प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम; कविवचन सुधा |
| 1869 | उच्च न्यायालय का इलाहाबाद स्थानांतरण |
| 1873 | सत्यशोधक समाज; सिंह सभा (अमृतसर); पाबना विद्रोह आरंभ |
| 1875 | आर्य समाज (बंबई); थियोसोफिकल सोसाइटी (न्यूयॉर्क); मदरसतुल उलूम, अलीगढ़; दक्कन दंगे (1875) |
| 1878 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट एवं भारतीय शस्त्र अधिनियम (लिटन) |
| 1880 / 1882 | स्ट्रेची अकाल आयोग / हंटर शिक्षा आयोग, स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट का निरसन |
| 1883 | प्रथम अकाल संहिता; इल्बर्ट बिल विवाद |
| 1885 | बंगाल काश्तकारी अधिनियम |
| 1886–87 | एचिसन आयोग; डी.ए.वी. लाहौर (1886); इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1887) |
| 1891 | सहमति की आयु अधिनियम |
| 1892 | भारतीय परिषद अधिनियम — अप्रत्यक्ष निर्वाचन का सिद्धांत |
| 1893 | नागरी प्रचारिणी सभा (काशी); विवेकानंद का शिकागो भाषण |
| 1897 / 1901 | लायल / मैकडॉनेल अकाल आयोग; रामकृष्ण मिशन (1897) |
| 1898 | सेंट्रल हिंदू कॉलेज (बनारस); नदवा का दारुल उलूम (लखनऊ) |
| 1899–1900 | मुंडा उलगुलान (बिरसा मुंडा) |
| 1902–04 | फ्रेज़र पुलिस आयोग; रैले आयोग; भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904); गुरुकुल कांगड़ी (1902) |
| 1903 / 1916 / 1925 | एस.एन.डी.पी. योगम / जस्टिस पार्टी / आत्म-सम्मान आंदोलन |
| 1909 | मॉर्ले–मिंटो सुधार — पृथक निर्वाचक मंडल |
| 1916 / 1920 | काशी हिंदू विश्वविद्यालय / अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं लखनऊ विश्वविद्यालय |
| 1917–19 | सैडलर आयोग |
| 1919 | भारत शासन अधिनियम — प्रांतों में द्वैध शासन |
| 1923 / 1926 | विभेदकारी संरक्षण की नीति / लोक सेवा आयोग (1 अक्टूबर 1926) |
| 1929 | हर्टाग समिति; शारदा अधिनियम |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम; भारतीय रिज़र्व बैंक (1 अप्रैल 1935) |
| 1937 | प्रांतीय स्वायत्तता लागू; संघीय न्यायालय; बर्मा भारत से पृथक |
| 1947 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम — 15 अगस्त 1947 |
प्र.1 'भारत शासन अधिनियम, 1935' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की।
2. इसी अधिनियम के अंतर्गत 1937 में दिल्ली में संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना हुई।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): 1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को 'मुँह बंद करने वाला अधिनियम' (Gagging Act) कहा गया।
कारण (R): इस अधिनियम ने अंग्रेजी तथा देशी भाषाओं के समाचार-पत्रों पर समान प्रतिबंध लगाए थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
(उपाय) (वायसराय)
1. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, 1878 — लॉर्ड रिपन
2. इल्बर्ट बिल विवाद — लॉर्ड रिपन
3. भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 — लॉर्ड कर्जन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए: