भाग 2 · भारत का इतिहास

2.2 मध्यकालीन भारत

त्रिपक्षीय संघर्ष से लेकर मुगल साम्राज्य के पतन तक — सल्तनत, विजयनगर-बहमनी, भक्ति-सूफी, मुगल एवं मराठा। ≈ 8 प्रश्न/पेपर

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विषय-सूची

  1. पूर्व-मध्यकाल — त्रिपक्षीय संघर्ष एवं राजपूत राज्य
  2. अरब एवं तुर्क आक्रमण
  3. दिल्ली सल्तनत — पाँच वंश
  4. सल्तनत का प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था
  5. विजयनगर एवं बहमनी साम्राज्य
  6. प्रांतीय राज्य
  7. भक्ति आंदोलन एवं सूफी मत
  8. मुगल साम्राज्य — बाबर से औरंगजेब
  9. मुगल प्रशासन
  10. मुगलकालीन अर्थव्यवस्था एवं समाज
  11. मराठा शक्ति
  12. मुगल साम्राज्य का पतन एवं स्वतंत्र राज्यों का उदय
  13. समेकित कालक्रम
इस अध्याय को कैसे पढ़ें

2025 के मूल प्रश्नपत्र में मध्यकालीन इतिहास से लगभग 8 प्रश्न आए और उनमें सुमेलन, कालक्रम तथा अभिकथन–कारण का अनुपात सबसे ऊँचा रहा। इसलिए हर खंड के अंत में दी गई तालिका और तिथि-सूची को केवल पढ़ें नहीं — दोनों दिशाओं में याद करें (शासक से उपलब्धि, और उपलब्धि से शासक)। अंतिम खंड 13 की समेकित तिथि-सूची पूरे अध्याय का सार है।

1. पूर्व-मध्यकाल — त्रिपक्षीय संघर्ष एवं राजपूत राज्य

हर्षवर्धन (Harshavardhana) की मृत्यु (647 ई.) के बाद उत्तर भारत में कोई एक सर्वोपरि सत्ता नहीं रही। 8वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक तीन बड़ी शक्तियाँ उभरीं और तीनों का लक्ष्य एक ही नगर था — कन्नौज (Kannauj)। कन्नौज केवल एक नगर नहीं था; वह गंगा-यमुना दोआब की उपजाऊ भूमि, उत्तरापथ के व्यापार-मार्ग और हर्ष की विरासत से जुड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। जिसके पास कन्नौज, वही उत्तर भारत का "सम्राट"। इसी कारण लगभग दो शताब्दियों तक चला यह संघर्ष त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle) कहलाता है।

1.1 तीनों शक्तियाँ

शक्तिमूल क्षेत्र / राजधानीसंस्थापकप्रमुख शासक
गुर्जर-प्रतिहार (Gurjara-Pratihara)अवंति-जालोर; बाद में कन्नौजनागभट्ट प्रथमवत्सराज, नागभट्ट द्वितीय, मिहिर भोज, महेन्द्रपाल प्रथम
पाल (Pala)गौड़ (बंगाल-बिहार); मुद्गगिरि/मुंगेरगोपाल (लगभग 750 ई., निर्वाचित)धर्मपाल, देवपाल, महीपाल प्रथम
राष्ट्रकूट (Rashtrakuta)दक्कन; मान्यखेट (मालखेड)दन्तिदुर्ग (लगभग 753 ई.)ध्रुव, गोविन्द तृतीय, अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण तृतीय

1.2 संघर्ष के चरण

संघर्ष का परिणाम — यही मुख्य निष्कर्ष है

तीनों शक्तियों ने एक-दूसरे को थका दिया। कोई स्थायी विजेता नहीं निकला। 10वीं सदी के अंत तक तीनों साम्राज्य छोटे-छोटे सामंती राज्यों में बिखर गए — और ठीक उसी समय गजनी से तुर्क आक्रमण आरंभ हुए। राजनीतिक विकेन्द्रीकरण ही तुर्क विजय का सबसे बड़ा सहायक कारण बना।

1.3 राजपूत राज्यों का उदय एवं उनका स्वरूप

10वीं–12वीं शताब्दी में उत्तर एवं पश्चिम भारत में अनेक कुल "राजपूत" (राजपुत्र) नाम से शासक वर्ग के रूप में सामने आए। इनकी उत्पत्ति पर चार प्रमुख मत हैं:

सिद्धांतआधारप्रमुख समर्थक
अग्निकुल सिद्धांतचंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू पर्वत पर वशिष्ठ के यज्ञ-कुंड से चार कुल उत्पन्न — प्रतिहार, चौहान, परमार, चालुक्य (सोलंकी)चंदबरदाई (काव्यगत); आधुनिक इतिहासकार इसे मिथक मानते हैं
विदेशी उत्पत्तिशक, कुषाण, हूण आदि विदेशी जातियों का हिंदू समाज में समाहारकर्नल टॉड, वी.ए. स्मिथ, डी.आर. भंडारकर
देशी क्षत्रिय उत्पत्तिअभिलेखों में सूर्यवंशी/चंद्रवंशी वंशावली; गुहिलों का स्वयं को रघुवंशी कहनासी.वी. वैद्य, गौरीशंकर हीराचंद ओझा
मिश्रित/प्रक्रिया सिद्धांत (आज सर्वाधिक मान्य)"राजपूत" जन्म से अधिक एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया — स्थानीय भूस्वामी, जनजातीय सरदार एवं विदेशी तत्व भूमि-नियंत्रण पाकर क्षत्रिय वंशावली गढ़ते गएबी.डी. चट्टोपाध्याय, डी.सी. सरकार

प्रमुख राजपूत वंश — सुमेलन तालिका

वंशक्षेत्र / राजधानीप्रमुख शासकपहचान-चिह्न
चाहमान (चौहान)शाकम्भरी → अजमेर, दिल्लीविग्रहराज चतुर्थ, पृथ्वीराज तृतीयविग्रहराज ने हरकेलि नाटक लिखा; पृथ्वीराज तराइन में पराजित (1192)
चंदेलजेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) — खजुराहो, कालिंजर, महोबायशोवर्मन, धंग, विद्याधर, परमर्दिदेवखजुराहो के मंदिर; कालिंजर दुर्ग; आल्हा-ऊदल की गाथा
परमारमालवा — धार, उज्जैनमुंज, भोजभोज — समरांगणसूत्रधार; धार में भोजशाला; "कविराज"
चालुक्य (सोलंकी)गुजरात — अन्हिलवाड़ (पाटन)मूलराज, भीम प्रथम, जयसिंह सिद्धराज, कुमारपालमोढेरा सूर्य मंदिर, दिलवाड़ा; हेमचंद्र सूरि का संरक्षण
गहड़वालकन्नौज–वाराणसी (उ.प्र.)चंद्रदेव, गोविन्दचन्द्र, जयचंद"तुरुष्कदंड" कर; जयचंद 1194 में चंदावर में पराजित
तोमरढिल्लिका (दिल्ली), हरियाणाअनंगपालदिल्ली की स्थापना का श्रेय; बाद में चौहानों ने छीना
कलचुरित्रिपुरी (जबलपुर के निकट)गांगेयदेव, कर्णगहड़वालों से संघर्ष
गुहिल/सिसोदियामेवाड़ — चित्तौड़, कुम्भलगढ़बप्पा रावल, हम्मीर, कुम्भा, सांगा, प्रतापदीर्घतम प्रतिरोध-परंपरा
सेनबंगाल — लखनौती/नदियाविजयसेन, बल्लालसेन, लक्ष्मणसेनपालों को हटाया; जयदेव का गीतगोविंद लक्ष्मणसेन के दरबार से जुड़ा

राजपूत राज्य-व्यवस्था का स्वरूप

उत्तर प्रदेश संदर्भ

पूर्व-मध्यकाल की धुरी ही आज का उत्तर प्रदेश थी। कन्नौज तीनों शक्तियों के संघर्ष का केंद्र रहा; प्रयाग के निकट वत्सराज–धर्मपाल का पहला युद्ध हुआ; गहड़वाल वंश की सत्ता कन्नौज से वाराणसी तक फैली थी और उसी ने वाराणसी को पुनः एक बड़े नगर के रूप में स्थापित किया। चंदेलों का कालिंजर दुर्ग (बाँदा जनपद) तथा महोबा (हमीरपुर-महोबा क्षेत्र) आज के उ.प्र. में हैं; आल्हा-ऊदल की लोकगाथा बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान है। इटावा, बाराबंकी, एटा क्षेत्र में गहड़वाल-कालीन ताम्रपत्र मिले हैं।

ट्रैप — यहाँ छात्र फिसलते हैं

कालक्रम — खंड 1

वर्ष (लगभग)घटना
750गोपाल द्वारा पाल वंश की स्थापना (निर्वाचन)
753दन्तिदुर्ग द्वारा राष्ट्रकूट वंश की स्थापना (चालुक्य कीर्तिवर्मन द्वितीय को हटाकर)
790वत्सराज × धर्मपाल (प्रयाग के निकट); तत्पश्चात् ध्रुव द्वारा दोनों की पराजय
800–815गोविन्द तृतीय का उत्तर भारत अभियान; नागभट्ट द्वितीय पराजित
836–885मिहिर भोज का शासन — प्रतिहार शक्ति का चरम
916इन्द्र तृतीय (राष्ट्रकूट) द्वारा कन्नौज का विध्वंस
1018महमूद गजनवी का कन्नौज आक्रमण; राज्यपाल का पलायन एवं वध
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित स्थापत्य-कृतियों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनके निर्माण के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. कोणार्क का सूर्य मंदिर
2. साँची के महास्तूप का मूल निर्माण
3. खजुराहो के मंदिर
4. एलोरा का कैलास मंदिर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 2, 3, 1B4, 2, 1, 3C2, 4, 3, 1D2, 4, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)साँची के महास्तूप का मूल निर्माण तीसरी शताब्दी ई.पू. में अशोक ने करवाया। एलोरा का कैलास मंदिर आठवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम के काल का है। खजुराहो के मंदिर 10वीं-11वीं शताब्दी में चंदेलों ने तथा कोणार्क का सूर्य मंदिर लगभग 1250 ई. में पूर्वी गंग शासक नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया। अतः सही क्रम 2, 4, 3, 1 है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): एलोरा का कैलास मंदिर विश्व का विशालतम एकाश्म (monolithic) शैलकृत मंदिर माना जाता है।
कारण (R): इसे ऊपर से नीचे की ओर एक ही विशाल चट्टान को तराशकर राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के काल में उत्कीर्ण किया गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)एलोरा की गुफा संख्या 16 का कैलास मंदिर एक ही चट्टान को ऊपर से नीचे तराशकर बनाया गया, इसलिए वह जोड़-रहित एकाश्म संरचना है और विश्व का विशालतम शैलकृत एकाश्म मंदिर कहलाता है। इसका निर्माण राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम (लगभग 756-773 ई.) से जोड़ा जाता है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

प्र.3 तंत्रयान बौद्ध अध्ययन के लिए प्रसिद्ध विक्रमशिला महाविहार की स्थापना किस शासक ने करवाई थी?

Aकुमारगुप्त प्रथमBगोपालCधर्मपालDहर्षवर्धन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)विक्रमशिला महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल ने आठवीं-नवीं शताब्दी में करवाई, जो तंत्रयान अध्ययन का प्रमुख केंद्र बना और जहाँ से अतीश दीपंकर तिब्बत गए। नालंदा की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम से तथा ओदंतपुरी की स्थापना पाल वंश के संस्थापक गोपाल से जोड़ी जाती है।

2. अरब एवं तुर्क आक्रमण

2.1 अरब आक्रमण — मुहम्मद बिन कासिम (712 ई.)

सिंध पर अरब आक्रमण का तात्कालिक कारण था — देवल (Debal) बंदरगाह के निकट समुद्री लुटेरों द्वारा उन जहाजों का अपहरण जो श्रीलंका के राजा की ओर से इराक के गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ के लिए उपहार ले जा रहे थे। सिंध के शासक दाहिर ने क्षतिपूर्ति देने से इनकार किया। हज्जाज ने अपने भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम को भेजा। 712 ई. में रावर के युद्ध में दाहिर मारा गया; देवल, नेरून, ब्राह्मणाबाद, अरोड़ एवं मुल्तान पर अधिकार हुआ।

2.2 महमूद गजनवी (शासन 998–1030 ई.)

गजनी के यामिनी/गजनवी वंश का शासक। उसने 1000 से 1027 ई. के बीच लगभग 17 बार भारत पर आक्रमण किया। उसका उद्देश्य साम्राज्य-विस्तार नहीं, धन-लूट था — जिससे वह मध्य एशिया में अपनी सेना और गजनी नगर को समृद्ध कर सके; मूर्ति-भंजन से उसे "बुतशिकन" एवं खलीफा से मान्यता भी मिली।

वर्षआक्रमण का लक्ष्यपराजित शासक / टिप्पणी
1001वैहिंद (पेशावर के निकट)हिन्दूशाही जयपाल — पराजय के बाद आत्मदाह
1008–09वैहिंद का दूसरा युद्धआनंदपाल के नेतृत्व में हिंदू राजाओं का संघ पराजित
1014थानेश्वरचक्रस्वामिन की मूर्ति गजनी ले जाई गई
1018मथुरा एवं कन्नौज (उ.प्र.)प्रतिहार राज्यपाल भाग गया; मथुरा के मंदिरों की अपार लूट
1019कालिंजर क्षेत्रचंदेल विद्याधर से सामना
1025–26सोमनाथ (काठियावाड़)चालुक्य भीम प्रथम; सर्वाधिक कुख्यात एवं समृद्ध लूट
1027सिंधु के जाटअंतिम आक्रमण

2.3 मुहम्मद गोरी (मुइज़ुद्दीन मुहम्मद बिन साम)

गोर (अफगानिस्तान) के शंसबानी/गोरी वंश का शासक; भाई गयासुद्दीन के अधीन गजनी का शासक। महमूद से भिन्न, गोरी का उद्देश्य स्थायी साम्राज्य की स्थापना था — और यही भारत में तुर्की राज्य की नींव बना।

वर्षयुद्ध/अभियानपक्ष एवं परिणाम
1175मुल्तान एवं उच्छकर्माथियों से छीना — भारत में प्रथम सफलता
1178कयादरा/आबू (गुजरात)चालुक्य (सोलंकी) शासक भीम द्वितीय से पराजय — गोरी की भारत में पहली हार
1179–86पेशावर, सियालकोट, लाहौरगजनवी शासक खुसरो मलिक को हटाकर पंजाब पर अधिकार
1191 — तराइन प्रथमतराइन (थानेसर के निकट, हरियाणा)पृथ्वीराज चौहान तृतीय विजयी; गोरी घायल होकर भागा
1192 — तराइन द्वितीयवही स्थलगोरी विजयी; पृथ्वीराज बंदी बनाकर मारा गया — भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़
1194 — चंदावरचंदावर (फिरोजाबाद, उ.प्र.) — यमुना तट पर, आगरा के निकटगहड़वाल जयचंद पराजित एवं मारा गया; गंगा घाटी तुर्कों के लिए खुल गई
1206दमयक (झेलम के निकट)गोरी की हत्या; भारत का उत्तरदायित्व दास सेनापतियों पर

गोरी के सेनापति

परीक्षा-दृष्टि — "राजपूत क्यों हारे?" (अभिकथन–कारण का प्रिय विषय)
  1. राजनीतिक विघटन — कोई संयुक्त मोर्चा नहीं; पृथ्वीराज को जयचंद का सहयोग नहीं मिला।
  2. सैन्य पिछड़ापन — भारी हाथी-सेना एवं धीमी पैदल पंक्ति बनाम तुर्कों की तीव्र घुड़सवार तीरंदाज़ी (mounted archers), रकाब (stirrup), नालयुक्त घोड़े, "फ़ौज-ए-कर्रार" (आरक्षित दल) की रणनीति।
  3. रक्षात्मक मानसिकता — सीमांत पर आगे बढ़कर प्रहार करने की नीति का अभाव; आक्रांता को बार-बार लौटने का अवसर।
  4. सूचना-तंत्र का अभाव — तुर्कों के पास व्यवस्थित गुप्तचर एवं डाक व्यवस्था थी।
  5. सामाजिक कारक — जाति-आधारित सीमित सैनिक भर्ती; सामंती दस्ते जो केंद्रीय अनुशासन से बाहर थे।
उत्तर प्रदेश संदर्भ

चंदावर का युद्ध (1194) आज के फिरोजाबाद जनपद में यमुना तट पर लड़ा गया — तराइन (हरियाणा) से भी अधिक यह वह युद्ध था जिसने गंगा-यमुना दोआब पर तुर्की अधिकार पक्का किया। इसी अभियान में असनी (फतेहपुर) का कोष लूटा गया और वाराणसी पर आक्रमण हुआ। 1018 में महमूद ने मथुरा एवं कन्नौज को लूटा था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कोल (अलीगढ़) एवं मेरठ पर अधिकार किया। इस प्रकार तुर्क विजय का निर्णायक रंगमंच उत्तर प्रदेश ही रहा।

ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. महमूद गजनवी का सोमनाथ पर आक्रमण
2. चंदावर का युद्ध
3. मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध विजय
4. तराइन का द्वितीय युद्ध
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 3, 4, 2B3, 1, 2, 4C1, 3, 2, 4D3, 1, 4, 2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)मुहम्मद बिन कासिम ने 712 ई. में सिंध जीता। महमूद गजनवी ने 1025 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण किया। मुहम्मद गोरी ने 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को तथा 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में गहड़वाल नरेश जयचंद को पराजित किया। अतः सही क्रम 3, 1, 4, 2 है।

प्र.2 'भारत सेवक समाज (Servants of India Society)' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसकी स्थापना 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले ने पूना में की थी।
2. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सेवा के लिए 'मिशनरी भावना' से प्रशिक्षित पूर्णकालिक कार्यकर्ता तैयार करना था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)भारत सेवक समाज की स्थापना 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले ने पूना में की थी, अतः कथन 1 सही है। इसका उद्देश्य देश-सेवा को एक व्रत के रूप में अपनाने वाले, अल्प वेतन पर जीवनपर्यंत कार्य करने वाले 'राष्ट्रीय मिशनरी' तैयार करना था; अतः कथन 2 भी सही है। गांधीजी गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): लॉर्ड मेयो एकमात्र वायसराय थे जिनकी पद पर रहते हुए हत्या हुई।
कारण (R): 1872 में अंडमान के दंड-बस्ती (पोर्ट ब्लेयर) के निरीक्षण-दौरे पर एक बंदी शेर अली ने उन पर प्राणघातक आक्रमण किया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)8 फरवरी 1872 को पोर्ट ब्लेयर (अंडमान) की दंड-बस्ती के निरीक्षण के दौरान बंदी शेर अली अफरीदी ने वायसराय लॉर्ड मेयो पर छुरे से प्राणघातक हमला किया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। यह भारत के इतिहास में किसी वायसराय/गवर्नर-जनरल की पद पर रहते हुए हुई एकमात्र हत्या थी। अतः (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

3. दिल्ली सल्तनत — पाँच वंश (1206–1526)

वंशकालसंस्थापकअंतिम शासक
गुलाम / इल्बरी / मामलूक1206–1290कुतुबुद्दीन ऐबकशमसुद्दीन कयूमर्स
खलजी1290–1320जलालुद्दीन फ़िरोज़ खलजीख़ुसरो खाँ (हड़पने वाला)
तुगलक1320–1414गयासुद्दीन तुगलकनासिरुद्दीन महमूद शाह
सैयद1414–1451खिज्र खाँआलम शाह
लोदी1451–1526बहलोल लोदीइब्राहीम लोदी

3.1 गुलाम / इल्बरी वंश (1206–1290)

"गुलाम वंश" नाम भ्रामक है — केवल ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन ही दास रहे थे, और तीनों ने सुल्तान बनने से पूर्व दासता से मुक्ति पा ली थी। अधिकांश शासक इल्बरी तुर्क कबीले के थे, इसलिए इसे इल्बरी वंश कहना अधिक उचित है।

तराइन चंदावर पानीपत खानवा कन्नौज हल्दीघाटी तालिकोटा दिल्ली दौलताबाद
तुर्क विजय 1191–94मुगल–अफगान 1526–40क्षेत्रीय निर्णय 1565, 1576राजधानी
तराइन हरियाणा में, चंदावर उत्तर प्रदेश में (फिरोजाबाद) — "स्थल ↔ राज्य" का यही युग्म सर्वाधिक उलटा जाता है। पानीपत तीन बार — 1526, 1556, 1761। खानवा 1527 · कन्नौज 1540 · हल्दीघाटी 1576 · तालिकोटा 1565। दौलताबाद — मुहम्मद बिन तुगलक की 1326–27 की राजधानी, ~1335 में वापसी।
अलाई दरवाजा, कुतुब परिसर
अलाई दरवाजा (1311, अलाउद्दीन खलजी) — भारत में सच्ची मेहराब एवं सच्चे गुंबद का पहला वैज्ञानिक उदाहरण; इससे पहले कोरबेल (शिलाएँ आगे बढ़ाकर बनी) मेहराब चलती थी — जैसे पास के कुतुब मीनार एवं कुव्वत-उल-इस्लाम में, जिन्हें ऐबक ने आरंभ कर इल्तुतमिश ने पूरा किया (मीनार संत बख्तियार काकी को समर्पित)। मेहराब की कमल-कलिका झालर खलजी शैली की पहचान है। · Public domain · Vssun

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206–1210)

इल्तुतमिश (1210–1236) — सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

रजिया (1236–1240)

गयासुद्दीन बलबन (1266–1287)

3.2 खलजी वंश (1290–1320)

खलजी तुर्क-अफगान सीमा-क्षेत्र से आए थे, "शुद्ध" इल्बरी तुर्क नहीं। इनका सत्ता में आना तुर्की नस्लीय एकाधिकार का अंत था — इसे इतिहासकार "खलजी क्रांति" कहते हैं।

जलालुद्दीन फ़िरोज़ खलजी (1290–1296)

अलाउद्दीन खलजी (1296–1316) — सल्तनत का शिखर

साम्राज्य-विस्तार:

वर्षविजयपराजित शासक
1299गुजरातवाघेला कर्ण; यहीं से मलिक काफूर प्राप्त हुआ
1301रणथम्भौरचौहान हम्मीरदेव
1303चित्तौड़गुहिल रतन सिंह (पद्मिनी की कथा जायसी के पद्मावत, 1540 से आती है — समकालीन स्रोत नहीं)
1305मालवापरमार महलकदेव
1307–08देवगिरि (दूसरी बार)यादव रामचंद्र — "रायरायान" उपाधि देकर सामंत बनाया
1309–10वारंगलकाकतीय प्रतापरुद्र द्वितीय — विशाल क्षतिपूर्ति
1310–11द्वारसमुद्रहोयसल वीर बल्लाल तृतीय
1311मदुरै (मा'बर)पांड्य राज्य — मलिक काफूर रामेश्वरम् तक पहुँचा
1311जालोरचौहान कान्हड़देव

दक्षिण नीति की विशेषता: अलाउद्दीन ने दक्षिणी राज्यों का विलय नहीं किया — उन्हें वार्षिक कर देने वाले करद राज्य बनाया। यही नीति मुहम्मद बिन तुगलक के विलय-प्रयोग से भिन्न थी।

मंगोल आक्रमणों का प्रतिरोध: 1297–98, 1299 (कुतलुग ख्वाजा), 1303 (तर्गी — सबसे खतरनाक), 1305 (अली बेग), 1306 — सभी विफल। उसने सीरी को किलेबंद कर नई राजधानी बनाया, सीमांत दुर्ग सुदृढ़ किए और मंगोल बंदियों का नरसंहार किया। उपाधि "सिकंदर-ए-सानी" (द्वितीय सिकंदर) सिक्कों पर अंकित करवाई।

चार अध्यादेश (बरनी के अनुसार) — विद्रोह रोकने हेतु:

  1. दान में दी गई भूमि (इनाम, मिल्क, वक्फ) जब्त कर खालसा में मिला दी गई।
  2. गुप्तचर व्यवस्था (बरीद एवं मुनहियान) का सघन विस्तार — अमीरों की निजी बातचीत तक सुल्तान तक पहुँचती थी।
  3. मद्य-निषेध तथा नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध।
  4. अमीरों के आपसी भोज, वैवाहिक संबंध एवं मेल-जोल पर सुल्तान की अनुमति अनिवार्य।

राजस्व सुधार: भूमि की माप (मसाहत) के आधार पर बिस्वा इकाई में लगान; खराज उपज का 50% — सल्तनत काल का उच्चतम; साथ में घरी (गृह-कर) एवं चराई (पशु-कर)। बिचौलियों — खुत, मुकद्दम, चौधरी — की कर-मुक्ति समाप्त कर उन्हें भी सामान्य किसानों के बराबर कर देने को बाध्य किया। बकाया वसूली हेतु दीवान-ए-मुस्तख़राज बनाया।

बाजार नियंत्रण (यह अध्याय का सर्वाधिक पूछा जाने वाला अंश है) — खंड 4.4 में विस्तार से।

सैन्य सुधार: दिल्ली सल्तनत में सर्वप्रथम स्थायी सेना को नकद वेतन दिया; दाग (घोड़ों पर राजकीय मुहर) एवं चेहरा (सैनिक का हुलिया-विवरण) की व्यवस्था लागू की, जिससे एक ही घोड़ा-सैनिक बार-बार गिनती में न आ सके।

बाद के खलजी: 1316 में अलाउद्दीन की मृत्यु; मलिक काफूर ने कुछ समय सत्ता संभाली और मारा गया। कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खलजी (1316–1320) ने अलाउद्दीन के सभी नियंत्रण हटा दिए और स्वयं को "खलीफा" घोषित किया — दिल्ली का एकमात्र सुल्तान जिसने यह किया। उसकी हत्या उसके ही प्रिय ख़ुसरो खाँ ने की, जिसे 1320 में दीपालपुर के गवर्नर गाज़ी मलिक ने हराकर तुगलक वंश की नींव रखी।

3.3 तुगलक वंश (1320–1414)

गयासुद्दीन तुगलक (1320–1325)

मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351) — "विरोधाभासों का मिश्रण"

जूना खाँ के नाम से प्रसिद्ध; खगोल, गणित, चिकित्सा, दर्शन एवं फ़ारसी साहित्य का ज्ञाता — फिर भी उसके सारे प्रयोग असफल रहे। बरनी ने उसे "विरोधी गुणों का मिश्रण" कहा।

प्रयोगवर्षउद्देश्यविफलता का कारण
दोआब में कर-वृद्धिलगभग 1326–27सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र से अधिक आयठीक अकाल के वर्षों में लागू; किसान गाँव छोड़कर भागे, व्यापक विद्रोह
राजधानी का देवगिरि (दौलताबाद) स्थानांतरण1326–27दक्षिण पर नियंत्रण; मंगोल-सुरक्षित केंद्रदूरी, मार्ग में मृत्यु, जल-संकट; लगभग 1335 में दिल्ली वापसी
सांकेतिक मुद्रा (token currency)1329–30 से लगभग 1332चाँदी की कमी; चीन (काऊ) एवं ईरान (कैखातू) का अनुकरणताँबे/पीतल के सिक्कों की टकसाल पर राज्य का एकाधिकार नहीं था — घर-घर जाली सिक्के ढले; सभी वापस लेकर चाँदी में बदलने पड़े
खुरासान–इराक अभियानलगभग 1329मध्य एशिया में विस्तार3,70,000 की सेना एक वर्ष वेतन लेकर बिना युद्ध भंग कर दी गई
कराचिल अभियानलगभग 1329–30कुमाऊँ-गढ़वाल के हिमालयी क्षेत्र पर नियंत्रणवर्षा, रोग एवं पहाड़ी युद्ध — सेना लगभग नष्ट

फ़िरोज़ शाह तुगलक (1351–1388)

तुगलक वंश का अंत एवं तैमूर का आक्रमण (1398–99)

1388 के बाद उत्तराधिकार-संघर्ष से साम्राज्य बिखरा। 1398 में समरकंद के तैमूर ने नासिरुद्दीन महमूद शाह के समय आक्रमण किया, दिल्ली में भीषण नरसंहार एवं लूट की और लौटते समय खिज्र खाँ को मुल्तान-लाहौर का शासक नियुक्त कर गया — यही आगे सैयद वंश का संस्थापक बना।

3.4 सैयद वंश (1414–1451)

3.5 लोदी वंश (1451–1526) — प्रथम अफगान वंश

बहलोल लोदी (1451–1489)

सिकंदर लोदी (1489–1517) — लोदी वंश का श्रेष्ठतम शासक

इब्राहीम लोदी (1517–1526)

उत्तर प्रदेश संदर्भ — सल्तनत का केंद्र-क्षेत्र
ट्रैप — मिलते-जुलते नाम

कालक्रम — दिल्ली सल्तनत

वर्षघटना
1206कुतुबुद्दीन ऐबक का लाहौर में राज्याभिषेक
1221चंगेज खाँ सिंधु तट तक; इल्तुतमिश की तटस्थता
1229इल्तुतमिश को खलीफा से मंसूर (मान्यता-पत्र)
1236–40रजिया का शासन
1290खलजी वंश की स्थापना
1296अलाउद्दीन का देवगिरि अभियान एवं कड़ा में जलालुद्दीन की हत्या
1303चित्तौड़ विजय; तर्गी का मंगोल आक्रमण
1320गाज़ी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) द्वारा तुगलक वंश की स्थापना
1326–27दौलताबाद राजधानी-स्थानांतरण
1329–32सांकेतिक मुद्रा का प्रयोग
1333इब्न बतूता का भारत आगमन
1336विजयनगर की स्थापना
1347बहमनी राज्य की स्थापना
1359फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा जौनपुर की स्थापना
1394जौनपुर की स्वतंत्र शर्की सल्तनत
1398तैमूर का आक्रमण
1414सैयद वंश की स्थापना (खिज्र खाँ)
1451लोदी वंश की स्थापना (बहलोल लोदी)
1479बहलोल लोदी द्वारा जौनपुर का विलय
1504 / 1506आगरा की स्थापना / राजधानी-स्थानांतरण
21 अप्रैल 1526पानीपत का प्रथम युद्ध — सल्तनत का अंत
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 दिल्ली सल्तनत के निम्नलिखित राजवंशों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सत्ता में आने के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. सैयद वंश
2. खलजी वंश
3. लोदी वंश
4. तुगलक वंश
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 4, 1, 3B4, 2, 3, 1C2, 4, 3, 1D4, 2, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)जलालुद्दीन फिरोज खलजी ने 1290 ई. में खलजी वंश, गयासुद्दीन तुगलक ने 1320 ई. में तुगलक वंश, खिज्र खाँ ने 1414 ई. में सैयद वंश तथा बहलोल लोदी ने 1451 ई. में लोदी वंश की नींव रखी। अतः सही क्रम 2, 4, 1, 3 है।

प्र.2 निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. तैमूर का भारत पर आक्रमण
2. चंगेज खान का सिंधु नदी तक पहुँचना
3. दिल्ली सल्तनत की स्थापना
4. अलाउद्दीन खलजी का देवगिरि अभियान
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 3, 4, 1B2, 3, 1, 4C3, 2, 4, 1D3, 2, 1, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)दिल्ली सल्तनत की स्थापना 1206 ई. में हुई। इल्तुतमिश के काल में 1221 ई. में चंगेज खान ख्वारिज्म शाह जलालुद्दीन का पीछा करते हुए सिंधु तट तक आया। अलाउद्दीन खलजी ने जलालुद्दीन के शासनकाल में 1296 ई. में देवगिरि पर आक्रमण किया तथा तैमूर ने 1398 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया। अतः सही क्रम 3, 2, 4, 1 है।

प्र.3 सुल्तान इल्तुतमिश के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उसने चाँदी का 'टंका' तथा ताँबे का 'जीतल' प्रचलित किया।
2. उसने दिल्ली में 'हौज-ए-शम्सी' नामक जलाशय बनवाया।
3. 1229 ई. में बगदाद के खलीफा से उसे अधिकार-पत्र (मंशूर) प्राप्त हुआ।
4. उसने चालीस तुर्की सरदारों के दल 'तुर्कान-ए-चहलगानी' को समाप्त कर दिया।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)इल्तुतमिश ने सल्तनतकालीन मुद्रा-व्यवस्था का आधार बने चाँदी के 'टंका' तथा ताँबे के 'जीतल' चलाए, दिल्ली में 'हौज-ए-शम्सी' जलाशय एवं उससे लगा मदरसा बनवाया, और फरवरी 1229 में बगदाद के अब्बासी खलीफा का अधिकार-पत्र (मंशूर) प्राप्त कर अपनी सत्ता को वैधता दी; अतः कथन 1, 2 तथा 3 सही हैं। 'तुर्कान-ए-चहलगानी' (चालीसा) का गठन उसी से जोड़ा जाता है, जबकि उसे समाप्त करने का श्रेय बलबन को दिया जाता है; अतः कथन 4 गलत है।

4. सल्तनत का प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था

4.1 राज्य का स्वरूप — सुल्तान, शरीअत और उलेमा

दिल्ली सल्तनत को प्रायः "धर्मतंत्र (theocracy)" कहा जाता है, किंतु व्यवहार में यह एक सैन्य-केंद्रित निरंकुश राज्य था जिसे इस्लाम वैधता देता था, विधि नहीं।

4.2 केंद्रीय प्रशासन — विभाग एवं पद (सुमेलन तालिका)

विभागकार्यप्रमुख अधिकारी
दीवान-ए-विज़ारतवित्त एवं राजस्ववज़ीर (सहायक: नाइब वज़ीर, मुशरिफ-ए-मुमालिक — महालेखाकार, मुस्तौफी-ए-मुमालिक — महालेखा परीक्षक)
दीवान-ए-अर्ज़सैन्य विभाग — भर्ती, वेतन, दाग-चेहराआरिज़-ए-मुमालिक (बलबन द्वारा स्वतंत्र किया गया)
दीवान-ए-रिसालतधार्मिक मामले/दान (कुछ विद्वान विदेश-पत्राचार भी मानते हैं)सद्र-उस-सुदूर
दीवान-ए-इंशाशाही पत्राचार एवं फरमानदबीर-ए-खास / अमीर मुंशी
दीवान-ए-क़ज़ान्यायकाज़ी-उल-कुज़ात (प्रायः सद्र-उस-सुदूर ही)
बरीद-ए-मुमालिकगुप्तचर एवं डाकबरीद; स्थानीय सूचक — मुनहियान
दीवान-ए-मुस्तख़राजराजस्व-बकाया की वसूलीअलाउद्दीन खलजी द्वारा स्थापित
दीवान-ए-रियासतबाजार नियंत्रणअलाउद्दीन खलजी; नाइब-ए-रियासत मलिक याकूब
दीवान-ए-कोहीकृषि विस्तारमुहम्मद बिन तुगलक द्वारा स्थापित
दीवान-ए-खैरातदान एवं निर्धन कन्याओं का विवाहफ़िरोज़ शाह तुगलक
दीवान-ए-बंदगानदास-प्रबंधनफ़िरोज़ शाह तुगलक
दीवान-ए-इस्तिहक़ाक़पेंशन एवं वृत्तिकाएँफ़िरोज़ शाह तुगलक
अन्य दरबारी पदवकील-ए-दर (राजगृह), अमीर-ए-हाजिब (दरबार-शिष्टाचार), अमीर-ए-आखुर (अश्वशाला), शहना-ए-पील (हस्तिशाला), सर-ए-जानदार (अंगरक्षक)

4.3 इक्ता, खालसा एवं भू-राजस्व

इक्ता व्यवस्था

इक्ता भूमि का स्वामित्व नहीं, बल्कि एक निश्चित क्षेत्र से राजस्व वसूलने का अधिकार था, जो सैन्य/प्रशासनिक सेवा के बदले दिया जाता था। इसे भारत में व्यवस्थित रूप इल्तुतमिश ने दिया।

भूमि के प्रकार

प्रकारस्वरूप
खालसासुल्तान के प्रत्यक्ष नियंत्रण की भूमि; राजस्व सीधे शाही कोष में
इक्ताअधिकारियों/सैनिकों को सेवा के बदले राजस्व-निर्धारण
इनाम / मिल्क / वक्फ / इदरारविद्वानों, धर्मस्थलों एवं सूफियों को दी गई कर-मुक्त भूमि (अलाउद्दीन ने इनमें से बहुत-सी जब्त कीं)

कर-व्यवस्था

करकिस परदर/टिप्पणी
खराजगैर-मुस्लिम कृषकों की भूमि परउपज का 1/5 से 1/2 तक; अलाउद्दीन ने 50% किया
उश्रमुस्लिम कृषकों की भूमि परउपज का 1/10 (सिंचित पर 1/20)
ज़कातसंपन्न मुसलमानों पर धार्मिक करसंचित संपत्ति का 2.5%
जज़ियागैर-मुस्लिम (ज़िम्मी) पुरुषों परतीन श्रेणियाँ — 48, 24, 12 दिरहम; स्त्री, बालक, वृद्ध, दिव्यांग एवं संन्यासी मुक्त। फ़िरोज़ शाह ने पहली बार ब्राह्मणों पर भी लगाया
खम्सयुद्ध-लूट एवं खानों परशरीअत के अनुसार राज्य का भाग 1/5; अलाउद्दीन ने राज्य का भाग 4/5 कर दिया, फ़िरोज़ ने पुनः 1/5 किया
घरी / चराईगृह-कर / पशु-चराई करअलाउद्दीन द्वारा लगाए गए
हक-ए-शर्बनहर के जल से सिंचाईफ़िरोज़ शाह — उपज का 10%

4.4 अलाउद्दीन खलजी की बाजार नियंत्रण व्यवस्था

उद्देश्य पर दो मत: बरनी के अनुसार यह विशाल स्थायी सेना को कम वेतन पर रखने के लिए था (सैनिक-केंद्रित); अमीर खुसरो एवं कुछ आधुनिक इतिहासकार इसे सर्वसाधारण के हित का उपाय भी मानते हैं। परीक्षा में "मुख्य उद्देश्य" पूछा जाए तो — स्थायी सेना का किफायती भरण-पोषण।

बाजारवस्तुएँनियंत्रक अधिकारी
मंडी (गल्ला मंडी)अनाजशहना-ए-मंडी — बाजार का सर्वोच्च अधिकारी
सराय-ए-अदल (बदायूँ द्वार के भीतर)वस्त्र, शक्कर, मेवा, औषधि, दीपक-तेल आदि निर्मित/आयातित वस्तुएँदीवान-ए-रियासत के अधीन
घोड़ा, दास एवं पशु बाजारघोड़े, दास, मवेशीपृथक दर-सूची; दलालों पर कड़ा नियंत्रण

4.5 मुद्रा एवं सैन्य व्यवस्था

4.6 अर्थव्यवस्था, तकनीक एवं नगरीकरण

ट्रैप — एक-जैसे दिखने वाले पद
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 दिल्ली सल्तनत के प्रशासन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. 'इक्ता' राजस्व-निर्धारण की एक इकाई थी, जिसका आवंटन सेवा के बदले किया जाता था।
2. 'दीवान-ए-अर्ज' सैन्य विभाग था, जिसे बलबन ने सुदृढ़ किया।
3. दास-विभाग 'दीवान-ए-बंदगान' की स्थापना अलाउद्दीन खलजी ने की थी।
4. फिरोज शाह तुगलक ने 'दीवान-ए-खैरात' तथा 'दार-उल-शफा' की स्थापना करवाई।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 1, 2 और 4Cकेवल 2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)इक्ता भू-राजस्व निर्धारण की इकाई थी, जिसे वेतन के बदले सौंपा जाता था; दीवान-ए-अर्ज सैन्य विभाग था जिसे बलबन ने सुदृढ़ किया। दास-विभाग 'दीवान-ए-बंदगान' की स्थापना फिरोज शाह तुगलक ने की थी, अलाउद्दीन खलजी ने नहीं — अतः कथन 3 गलत है। दान-विभाग 'दीवान-ए-खैरात' तथा निःशुल्क चिकित्सालय 'दार-उल-शफा' भी फिरोज शाह की देन हैं।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अलाउद्दीन खलजी ने दिल्ली में व्यापक बाजार-नियंत्रण व्यवस्था लागू की।
कारण (R): वह मंगोल आक्रमणों के प्रतिरोध हेतु एक विशाल स्थायी सेना को अपेक्षाकृत कम नकद वेतन पर बनाए रखना चाहता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अलाउद्दीन खलजी ने अनाज, वस्त्र, दास तथा पशुओं के लिए पृथक बाजार बनाए और शहना-ए-मंडी, दीवान-ए-रियासत तथा बरीद जैसे तंत्र से कीमतें नियंत्रित कीं। बरनी के अनुसार इसका मूल उद्देश्य यही था कि कम नकद वेतन पर भी विशाल स्थायी सेना का निर्वाह हो सके, जो मंगोल आक्रमणों के प्रतिरोध हेतु आवश्यक थी। अतः (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

प्र.3 विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'अमरनायक' को राजा की ओर से 'अमरम्' नामक भू-भाग दिया जाता था, जिसकी आय से वे सैनिक टुकड़ी रखते थे।
2. 'आयगार' ग्राम-स्तर के वंशानुगत पदाधिकारी होते थे, जिन्हें सेवा के बदले कर-मुक्त भूमि दी जाती थी।
3. विजयनगर की प्रमुख स्वर्ण मुद्रा 'टंका' कहलाती थी।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)नायंकर व्यवस्था के अंतर्गत सैनिक सरदार 'अमरनायक' को राजस्व-अधिकार सहित 'अमरम्' भूमि सौंपी जाती थी, जिसकी आय से वे घुड़सवार एवं पैदल सैनिक रखते थे; ग्राम-स्तर पर 'आयगार' नामक वंशानुगत पदाधिकारी कर-मुक्त भूमि पर सेवा देते थे। अतः कथन 1 तथा 2 सही हैं। विजयनगर की प्रमुख स्वर्ण मुद्रा 'वराह' (यूरोपीय यात्रियों की भाषा में 'पगोडा') थी; 'टंका' दिल्ली सल्तनत की चाँदी की मुद्रा थी, अतः कथन 3 गलत है।

5. विजयनगर एवं बहमनी साम्राज्य

5.1 विजयनगर — स्थापना एवं वंश

1336 ई. में हरिहर प्रथम एवं बुक्का प्रथम (संगम के पुत्र) ने तुंगभद्रा के दक्षिण तट पर विजयनगर (हम्पी/हस्तिनावती) की स्थापना की; परंपरा के अनुसार उन्हें संत विद्यारण्य का आशीर्वाद प्राप्त था और राज्य की देवी विरूपाक्ष के नाम पर राजाज्ञाएँ जारी होती थीं।

विट्ठल मंदिर का प्रस्तर रथ, हम्पी
हम्पी का प्रस्तर रथ — वस्तुतः गरुड़ का मंदिर, ग्रेनाइट खंडों से रथ-रूप में गढ़ा; विट्ठल एवं हजारा राम मंदिर कृष्णदेव राय की देन। विजयनगर शैली की पहचान — ऊँचा रायगोपुरम, कल्याण-मंडप एवं यालि स्तंभ। 1565 के बाद हम्पी फिर नहीं बसा; आज UNESCO धरोहर एवं ₹50 के नोट पर। · CC BY-SA 4.0 · Ram Nagesh Thota
वंशकालसंस्थापकप्रमुख शासक
संगम1336–1485हरिहर प्रथमबुक्का प्रथम, हरिहर द्वितीय, देवराय प्रथम, देवराय द्वितीय
सालुव1485–1505सालुव नरसिंहसालुव नरसिंह (प्रथम हड़प)
तुलुव1505–1570वीर नरसिंहकृष्णदेव राय, अच्युतदेव राय, सदाशिव राय
अराविडु1570–1646तिरुमलराजधानी पेनुकोंडा, फिर चंद्रगिरि

प्रमुख शासक

कृष्णदेव राय — विस्तार से

तालिकोटा का युद्ध (23 जनवरी 1565)

राक्षसी-तंगड़ी के नाम से भी प्रसिद्ध। एक ओर राम राय, दूसरी ओर बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा एवं बीदर का संघ (बरार अलग रहा)। युद्ध में दो मुस्लिम सेनापतियों के दल-बदल तथा दक्कनी तोपखाने ने निर्णय किया; राम राय बंदी बनाकर मार डाला गया। इसके बाद हम्पी नगर महीनों तक लूटा एवं ध्वस्त किया गया और फिर कभी नहीं बसा। साम्राज्य अराविडु वंश के अधीन पेनुकोंडा/चंद्रगिरि से कुछ दशक और चला।

5.2 विजयनगर प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था

विदेशी यात्री — सुमेलन तालिका (अत्यंत बहु-पूछित)

यात्रीदेशकिसके काल मेंलगभग वर्ष
निकोलो कोंटीइटलीदेवराय प्रथम1420–21
अब्दुर रज़्ज़ाकफारस (शाहरुख का राजदूत)देवराय द्वितीय1443
अफनासी निकितिनरूसबहमनी — मुहम्मद शाह तृतीय का काल1466–72
दुआर्ते बारबोसापुर्तगालकृष्णदेव रायलगभग 1500–16
डोमिंगो पायसपुर्तगालकृष्णदेव रायलगभग 1520
फर्नाओ नुनिज़पुर्तगालअच्युतदेव रायलगभग 1535–37
सीज़र फ्रेडरिकइटलीतालिकोटा के बाद (सदाशिव/तिरुमल)लगभग 1567

5.3 बहमनी साम्राज्य (1347–1527)

महमूद गवाँ (प्रधानमंत्री 1466–1481)

बहमनी के उत्तराधिकारी — पाँच दक्कनी सल्तनतें

राज्यवंशसंस्थापकलगभग वर्ष
अहमदनगरनिज़ामशाहीमलिक अहमद1490
बीजापुरआदिलशाहीयूसुफ आदिल खाँ1490
बरारइमादशाहीफतहुल्लाह इमाद-उल-मुल्क1490
बीदरबरीदशाहीकासिम बरीदलगभग 1492–1504
गोलकुंडाकुतुबशाहीकुली कुतुब शाहलगभग 1512–18

विजयनगर एवं बहमनी के बीच संघर्ष के तीन स्थायी क्षेत्र थे — रायचूर दोआब (कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच), कृष्णा-गोदावरी डेल्टा, तथा मराठवाड़ा-कोंकण का तटीय क्षेत्र।

ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 भारत आने वाले निम्नलिखित विदेशी यात्रियों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनके भारत-आगमन के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. निकोलो कोंटी
2. अब्दुर रज्जाक
3. डोमिंगो पेस
4. मार्को पोलो
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 4, 3, 2B4, 1, 3, 2C1, 4, 2, 3D4, 1, 2, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)वेनिस का मार्को पोलो 13वीं शताब्दी के अंत में पांड्य तट पर आया; इटली का निकोलो कोंटी 15वीं सदी के आरंभ में देवराय प्रथम के काल में, फारस का अब्दुर रज्जाक 1443 ई. में देवराय द्वितीय के दरबार में तथा पुर्तगाली डोमिंगो पेस कृष्णदेवराय के शासनकाल में विजयनगर आया। अतः सही क्रम 4, 1, 2, 3 है।

प्र.2 विजयनगर साम्राज्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संगम साम्राज्य पर शासन करने वाला प्रथम राजवंश था।
2. 'आमुक्तमाल्यद' की रचना कृष्णदेवराय ने तेलुगु में की थी।
3. अरविडु वंश की स्थापना सालुव नरसिंह ने की थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)विजयनगर पर क्रमशः संगम (1336 से), सालुव (1485 से), तुलुव (1505 से) तथा अरविडु (1570 से) वंशों का शासन रहा; अतः कथन 1 सही है। तुलुव वंश के कृष्णदेवराय ने तेलुगु में 'आमुक्तमाल्यद' लिखा, अतः कथन 2 भी सही है। अरविडु वंश की नींव तिरुमल ने रखी थी, सालुव नरसिंह ने तो सालुव वंश की स्थापना की थी — इसलिए कथन 3 गलत है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): महमूद गवाँ बहमनी राज्य का प्रसिद्ध प्रधानमंत्री था, जिसने बीदर में एक भव्य मदरसा बनवाया।
कारण (R): उसने राज्य के प्रांतों (तरफों) की संख्या चार से बढ़ाकर आठ कर दी तथा प्रांतीय गवर्नरों की शक्ति सीमित की।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)ईरानी मूल के महमूद गवाँ बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने 1472 ई. में बीदर में विशाल पुस्तकालय-युक्त मदरसा बनवाया। 1473 ई. में उन्होंने तरफों की संख्या चार से आठ कर प्रांतीय गवर्नरों की शक्ति घटाई — दोनों कथन सही हैं, किन्तु यह प्रशासनिक सुधार मदरसा-निर्माण की व्याख्या नहीं करता।

6. प्रांतीय राज्य

14वीं सदी के उत्तरार्ध से 15वीं सदी तक दिल्ली की केंद्रीय शक्ति क्षीण होने पर अनेक प्रांत स्वतंत्र राज्यों में बदल गए। इनका महत्व केवल राजनीतिक नहीं — इन्हीं दरबारों में क्षेत्रीय भाषाएँ, स्थापत्य-शैलियाँ एवं मिश्रित संस्कृति विकसित हुईं।

अटाला मस्जिद, जौनपुर
अटाला मस्जिद — शर्की शैली: ऊँचा ढलवाँ तोरण-द्वार जो गुंबद को ढक लेता है और मीनारों का पूर्ण अभाव। नींव फ़िरोज़ शाह तुगलक ने रखी, 1408 में इब्राहीम शाह शर्की ने पूर्ण की — इन्हीं के काल में जौनपुर "शीराज़-ए-हिन्द" कहलाया। · CC BY-SA 4.0 · Rangan Datta Wiki

6.1 जौनपुर — शर्की सल्तनत (1394–1479)

उत्तर प्रदेश संदर्भ — जौनपुर

UPPSC के लिए जौनपुर केवल एक प्रांतीय राज्य नहीं, अनिवार्य विषय है। याद रखने योग्य शृंखला: 1359 — फ़िरोज़ शाह तुगलक ने जूना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में नगर बसाया → 1394 — मलिक सरवर द्वारा स्वतंत्र शर्की सल्तनत → 1408 — अटाला मस्जिद → "शीराज़-ए-हिन्द" की ख्याति → 1479 — बहलोल लोदी द्वारा विलय। जौनपुर की शाही किला एवं गोमती पर बना शाही पुल (अकबर के काल में मुनइम खाँ द्वारा) भी उल्लेखनीय है। पड़ोसी कालपी एवं इटावा भी उसी काल में स्वायत्त शक्ति-केंद्र थे।

6.2 बंगाल

6.3 गुजरात

6.4 मालवा

6.5 कश्मीर

6.6 मेवाड़

6.7 खानदेश

प्रांतीय राज्य — समेकित सुमेलन तालिका

राज्यसंस्थापक / वर्षराजधानीसर्वाधिक प्रसिद्ध शासकमुगल विलय
जौनपुरमलिक सरवर (ख्वाजा-ए-जहाँ), 1394जौनपुरइब्राहीम शाह शर्की1479 में बहलोल लोदी द्वारा (मुगल-पूर्व)
बंगालशमसुद्दीन इलियास शाह, 1342पांडुआ → गौड़अलाउद्दीन हुसैन शाह1576 (अकबर)
गुजरातज़फर खाँ (मुजफ्फर शाह), 1407अहमदाबाद (1411)महमूद बेगड़ा1572–73 (अकबर)
मालवादिलावर खाँ ग़ोरी, 1401धार → मांडूहोशंगशाह / महमूद खलजी1561–62 (अकबर)
कश्मीरशाहमीर, 1339श्रीनगरज़ैन-उल-आबिदीन1586 (अकबर)
मेवाड़सिसोदिया (हम्मीर द्वारा पुनःस्थापन)चित्तौड़ → उदयपुरराणा कुम्भा / राणा सांगा / प्रतापसंधि 1615 (जहाँगीर)
खानदेशमलिक राजा फ़ारूकी, 1382बुरहानपुर (असीरगढ़ दुर्ग)नासिर खाँ1601 (अकबर)
ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (मध्यकालीन प्रांतीय राज्य) को सूची-II (प्रसिद्ध शासक) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. कश्मीर  B. मालवा  C. गुजरात  D. मेवाड़
सूची-II: 1. महमूद बेगड़ा  2. राणा कुम्भा  3. ज़ैन-उल-आबिदीन  4. होशंगशाह
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-4, B-3, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-3, B-4, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)कश्मीर के ज़ैन-उल-आबिदीन को उदार नीतियों के कारण 'बुदशाह' कहा गया। मालवा में होशंगशाह ने माण्डू को राजधानी बनाया, गुजरात में महमूद बेगड़ा सर्वाधिक प्रतापी सुल्तान हुआ तथा मेवाड़ में राणा कुम्भा ने चित्तौड़ का कीर्तिस्तंभ बनवाया। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।

प्र.2 मुगलकालीन अनुवाद-कार्य के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अकबर के काल में महाभारत का फारसी अनुवाद 'रज़्मनामा' नाम से हुआ।
2. दारा शुकोह ने उपनिषदों का फारसी अनुवाद 'सिर्र-ए-अकबर' नाम से करवाया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अकबर ने अनुवाद विभाग (मक्तबखाना) की स्थापना कर महाभारत का फारसी अनुवाद 'रज़्मनामा' (युद्धों की पुस्तक) नाम से करवाया। शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शुकोह ने उपनिषदों का फारसी अनुवाद 'सिर्र-ए-अकबर' (महान रहस्य) नाम से किया तथा 'मज्म-उल-बहरैन' में हिंदू एवं इस्लामी रहस्यवाद के सामंजस्य का प्रयास किया। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): बुलंद दरवाजा का निर्माण अकबर ने अपनी गुजरात विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
कारण (R): लाल एवं बादामी बलुआ पत्थर का यह विजय-द्वार 1526 ई. में फतेहपुर सीकरी में बनवाया गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)बुलंद दरवाजा वस्तुतः अकबर की गुजरात विजय (1573 ई.) की स्मृति में बना विजय-द्वार है, अतः (A) सही है। किन्तु इसका निर्माण 1601 ई. के आसपास हुआ, 1526 ई. में नहीं — उस वर्ष तो बाबर ने पानीपत का प्रथम युद्ध लड़ा था। अतः (R) गलत है।

7. भक्ति आंदोलन एवं सूफी मत

7.1 पृष्ठभूमि एवं दार्शनिक आधार

भक्ति की जड़ें दक्षिण भारत में 7वीं–9वीं शताब्दी के आलवार (वैष्णव) एवं नयनार (शैव) संतों में हैं। मध्यकाल में यह उत्तर भारत में एक व्यापक सामाजिक आंदोलन बना। इसके पीछे थे — जाति-व्यवस्था की कठोरता, कर्मकांड का बोझ, इस्लाम के एकेश्वरवाद एवं समता के विचार का संपर्क, तथा सूफी मत का प्रभाव।

आचार्यदर्शनसंप्रदायइष्ट/विशेषता
शंकराचार्यअद्वैतनिर्गुण ब्रह्म; ज्ञानमार्ग
रामानुजविशिष्टाद्वैतश्री संप्रदायवैष्णव भक्ति का दार्शनिक आधार
निम्बार्कद्वैताद्वैतसनक/कुमार संप्रदायराधा-कृष्ण उपासना
मध्वाचार्यद्वैतब्रह्म संप्रदायजीव एवं ब्रह्म भिन्न
वल्लभाचार्यशुद्धाद्वैतरुद्र संप्रदाय — पुष्टिमार्गकृष्ण-बालरूप उपासना; केंद्र गोकुल-मथुरा (उ.प्र.)
रामानंदरामानंदी संप्रदायराम-भक्ति को उत्तर भारत में लाए; लोकभाषा में उपदेश

7.2 निर्गुण धारा (संत/ज्ञानाश्रयी)

निराकार, निर्गुण ईश्वर; मूर्ति-पूजा, तीर्थ, कर्मकांड, जाति एवं शास्त्रीय अधिकार का खंडन; गुरु का सर्वोच्च महत्व; लोकभाषा (सधुक्कड़ी/"पंचमेल खिचड़ी") में सहज काव्य।

7.3 सगुण धारा

राम-भक्ति शाखा

कृष्ण-भक्ति शाखा

महाराष्ट्र धर्म — वारकरी संप्रदाय

पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना। ज्ञानेश्वर (13वीं सदी; गीता पर मराठी टीका ज्ञानेश्वरी/भावार्थदीपिका), नामदेव (जिनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी हैं), एकनाथ, तुकाराम (अभंग; शिवाजी के समकालीन) तथा समर्थ रामदास (दासबोध; शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं)। इस आंदोलन ने मराठी अस्मिता एवं मराठा उत्थान की सांस्कृतिक भूमि तैयार की।

भक्ति संत — सुमेलन तालिका

संतधाराक्षेत्र/भाषाप्रमुख रचना/पहचान
कबीरनिर्गुणवाराणसी–मगहर / सधुक्कड़ीबीजक (साखी, सबद, रमैनी)
रविदासनिर्गुणवाराणसी"बेगमपुरा" की कल्पना
गुरु नानकनिर्गुणपंजाब / पंजाबीजपजी; लंगर एवं संगत
दादू दयालनिर्गुणराजस्थानदादूपंथ
तुलसीदाससगुण — रामअवध–काशी / अवधीरामचरितमानस (1574 में आरंभ)
सूरदाससगुण — कृष्णब्रज / ब्रजभाषासूरसागर; अष्टछाप
मीराबाईसगुण — कृष्णराजस्थानपदावली
चैतन्यसगुण — कृष्णबंगाल-उड़ीसासंकीर्तन; गौड़ीय संप्रदाय
शंकरदेवसगुण — कृष्णअसमएकशरण धर्म; बरगीत; सत्र
ज्ञानेश्वरवारकरीमहाराष्ट्र / मराठीज्ञानेश्वरी
तुकारामवारकरीमहाराष्ट्रअभंग
मलिक मुहम्मद जायसीसूफी प्रेमाख्यानजायस (रायबरेली, उ.प्र.) / अवधीपद्मावत (1540) — अवधी का प्रथम महत्वपूर्ण ग्रंथ

7.4 सूफी मत

तसव्वुफ़ इस्लाम की रहस्यवादी धारा है जो शरीअत के बाह्य पालन से आगे ईश्वर के प्रति प्रेम (इश्क़) एवं आत्मिक अनुभूति पर बल देती है। भारत में इसका प्रसार 12वीं–13वीं सदी से हुआ।

प्रमुख सिलसिले — सुमेलन तालिका

सिलसिलाभारत में प्रवर्तककेंद्रविशेषता
चिश्तीख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (आगमन लगभग 1192; निधन 1236)अजमेरराजकीय पद एवं धन से दूरी; फुतूह पर निर्वाह; सामा की अनुमति; लोकभाषा का प्रयोग — इसीलिए सर्वाधिक लोकप्रिय
सुहरावर्दीशेख बहाउद्दीन ज़करियामुल्तानराजकीय संरक्षण एवं संपत्ति स्वीकार; इल्तुतमिश ने "शेख-उल-इस्लाम" बनाया; बंगाल में जलालुद्दीन तबरीज़ी
फिरदौसीशर्फुद्दीन याह्या मनेरीबिहारप्रसिद्ध पत्र-संग्रह मकतूबात
कादिरीशेख अब्दुल कादिर जीलानी (बगदाद) की परंपरा; भारत में मुहम्मद ग़ौस एवं शाह नियामतुल्लाहउच्छ, लाहौरदारा शिकोह इसी से जुड़े (मियाँ मीर, मुल्ला शाह बदख्शी)
नक्शबंदीख्वाजा बाकी बिल्लाह; विस्तार शेख अहमद सरहिंदी (1564–1624) द्वारादिल्ली, सरहिंदकट्टर शरीअत-निष्ठा; अकबर की नीतियों का विरोध; उपाधि "मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी"; जहाँगीर ने ग्वालियर में बंदी बनाया
शत्तारीशाह अब्दुल्लाह; मुहम्मद ग़ौस ग्वालियरीग्वालियर, माँडूयोग-साधना से संपर्क; तानसेन से संबंध
मदारी (बे-शरा)शाह बदीउद्दीन मदारमकनपुर (कानपुर, उ.प्र.)लोकप्रिय मेला-परंपरा

चिश्ती परंपरा की शृंखला (क्रम याद रखें)

मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर)कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली)बाबा फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर (अजोधन/पाकपट्टन)निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली, 1238–1325)नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी। निज़ामुद्दीन औलिया "महबूब-ए-इलाही" कहलाए, सात सुल्तानों का काल देखा और किसी के दरबार में नहीं गए; अमीर खुसरो उनके सर्वाधिक प्रिय शिष्य थे। बाबा फरीद के पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं — भक्ति एवं सूफी धाराओं के मिलन का प्रत्यक्ष प्रमाण।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — भक्ति एवं सूफी का हृदय-स्थल

7.5 सिख गुरु परंपरा

#गुरुगुरुपद-कालप्रमुख योगदान
1गुरु नानक (1469–1539)तलवंडी (ननकाना साहिब) में जन्म; संगत (सामूहिक उपासना) एवं लंगर (सहभोज) की संस्था; करतारपुर की स्थापना; "न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान"
2गुरु अंगद1539–52गुरुमुखी लिपि को व्यवस्थित रूप; जन्मसाखी परंपरा; लंगर का विस्तार
3गुरु अमरदास1552–74गोइंदवाल की बावली; मंजी व्यवस्था (22 प्रचार-क्षेत्र); सती एवं पर्दा का विरोध; आनंद साहिब
4गुरु रामदास1574–81रामदासपुर (अमृतसर) की नींव; मसंद व्यवस्था (चंदा-संग्रह)
5गुरु अर्जुन देव1581–1606हरमंदिर साहिब का निर्माण; 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन; तरनतारन की स्थापना; 1606 में जहाँगीर द्वारा मृत्युदंड — प्रथम सिख शहीद
6गुरु हरगोबिंद1606–44मीरी एवं पीरी की दो तलवारें; अकाल तख्त की स्थापना; पंथ का सैन्यीकरण
7गुरु हर राय1644–61दारा शिकोह को सहायता — औरंगजेब से तनाव
8गुरु हरकिशन1661–64सबसे कम आयु के गुरु; दिल्ली में निधन (बंगला साहिब)
9गुरु तेग बहादुर1664–75आनंदपुर की स्थापना; 1675 में दिल्ली में औरंगजेब द्वारा मृत्युदंड (शीशगंज)
10गुरु गोबिंद सिंह1675–17081699 में आनंदपुर साहिब में खालसा की स्थापना; पंज प्यारे; पाँच ककार; दसम ग्रंथ, ज़फरनामा; व्यक्तिगत गुरु-परंपरा समाप्त कर गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु घोषित (1708, नांदेड़)

बंदा सिंह बहादुर (1708–1716) — गुरु गोबिंद सिंह द्वारा भेजे जाने पर पंजाब में मुगल सत्ता को चुनौती; 1710 में चप्पड़चिड़ी के युद्ध में सरहिंद विजय तथा वजीर खाँ का वध; भूमि-सुधार एवं अपने नाम से सिक्के; 1716 में दिल्ली में मृत्युदंड

ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 भक्ति आंदोलन के संतों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. कबीर निर्गुण भक्ति धारा के संत थे तथा उनकी वाणी 'बीजक' में संकलित है।
2. गुरु नानक देव की रचनाएँ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में सम्मिलित नहीं हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)कबीर निर्गुण-ज्ञानाश्रयी भक्ति धारा के संत थे और उनकी वाणी 'बीजक' (साखी, सबद, रमैनी) में संकलित है; उनके कुछ पद 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी मिलते हैं। गुरु अर्जुन देव द्वारा संकलित आदि ग्रंथ में गुरु नानक देव सहित प्रारंभिक गुरुओं की वाणी सम्मिलित है — अतः कथन 2 गलत है।

प्र.2 सिख इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. खालसा पंथ की स्थापना
2. गुरु तेग बहादुर की शहादत
3. गुरु नानक देव का जन्म
4. गुरु अर्जुन देव की शहादत
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 3, 2, 1B3, 4, 2, 1C4, 3, 1, 2D3, 4, 1, 2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)गुरु नानक देव का जन्म 1469 ई. में हुआ। पाँचवें गुरु अर्जुन देव की शहादत 1606 ई. में जहाँगीर के काल में तथा नवें गुरु तेग बहादुर की शहादत 1675 ई. में औरंगजेब के काल में हुई। गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 ई. की बैसाखी को आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की। अतः सही क्रम 3, 4, 2, 1 है।

प्र.3 शेख अहमद सरहिंदी के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. वे चिश्ती सिलसिले से संबद्ध थे तथा उन्हें 'मुजद्दिद अल्फ-ए-सानी' कहा गया।
2. उन्होंने इब्न-अल-अरबी के 'वहदत-उल-वुजूद' के स्थान पर 'वहदत-उल-शुहूद' की अवधारणा प्रस्तुत की।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)शेख अहमद सरहिंदी (1564-1624 ई.) चिश्ती नहीं, बल्कि नक्शबंदी सिलसिले के प्रमुख संत थे और उन्हें 'मुजद्दिद अल्फ-ए-सानी' (द्वितीय सहस्राब्दी का पुनरुद्धारक) कहा गया; अतः कथन 1 गलत है। उन्होंने इब्न-अल-अरबी की 'वहदत-उल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) के विरुद्ध 'वहदत-उल-शुहूद' (प्रत्यक्षीकरण की एकता) का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार यह एकता वस्तुगत न होकर साधक के अनुभव में ही होती है; अतः कथन 2 सही है।

8. मुगल साम्राज्य — बाबर से औरंगजेब

शेरशाह का मकबरा, सासाराम
शेरशाह का मकबरा, सासाराम — झील के बीच चबूतरे पर अष्टकोणीय मकबरा, कोनों पर छतरियाँ: लोदी-अफगान परंपरा का शिखर तथा मुगल उद्यान-मकबरे से ठीक पहले की कड़ी। मृत्यु 1545 में कालिंजर (बाँदा) में विस्फोट से; उसका चाँदी का रुपया (~178 ग्रेन) आधुनिक रुपये का पूर्वज। · CC BY-SA 3.0 · Nandanupadhyay
बुलंद दरवाजा, फतेहपुर सीकरी
बुलंद दरवाजा — लगभग 54 मीटर, भारत का सर्वोच्च प्रवेश-द्वार: विशाल अर्ध-गुंबदीय पेशताक, ऊपर छतरियों की पंक्ति, लाल बलुआ पत्थर पर संगमरमर की जड़ाई — अकबरी शैली। गुजरात विजय (1572–73) की स्मृति में बना; फतेहपुर सीकरी 1571–1585 राजधानी — यहीं इबादतखाना (1575) एवं सलीम चिश्ती की दरगाह। · CC BY-SA 3.0 · Marcin Białek
ताजमहल, आगरा
ताजमहल (~1632–1653) — मकबरा चारबाग के केंद्र में नहीं, उत्तरी छोर पर (हुमायूँ के मकबरे से यही भिन्नता), दोहरा प्याजाकार गुंबद, चार पृथक मीनारें, संगमरमर पर पित्रादुरा — यह परंपरा आगरा के इतमाद-उद-दौला (नूरजहाँ द्वारा निर्मित प्रथम पूर्णतः संगमरमर भवन) से आई। वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरीपादशाहनामा के लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी नहीं। · CC BY-SA 4.0 · Yann; edited by King of Hearts

8.1 बाबर (1526–1530)

युद्धतिथिप्रतिपक्षपरिणाम/महत्व
पानीपत (प्रथम)21 अप्रैल 1526इब्राहीम लोदीलोदी वंश एवं दिल्ली सल्तनत का अंत; मुगल सत्ता की स्थापना
खानवा17 मार्च 1527राणा सांगा (मेवाड़) एवं राजपूत संघउत्तर भारत में राजपूत प्रतिरोध टूटा; बाबर ने "गाज़ी" उपाधि ली, शराब त्यागी एवं तमगा कर समाप्त किया
चंदेरी29 जनवरी 1528मेदिनी रायमालवा में मुगल पैठ
घाघरा6 मई 1529महमूद लोदी के अफगान एवं बंगाल का नुसरत शाहबाबर का अंतिम युद्ध; पूर्वी अफगान शक्ति पर विजय

8.2 हुमायूँ (1530–40, 1555–56)

8.3 शेरशाह सूरी एवं सूर वंश (1540–1555)

शेरशाह का प्रशासन — अकबर का पूर्वाभ्यास

क्षेत्रव्यवस्था
इकाइयाँसाम्राज्य → सरकार (शिकदार-ए-शिकदारान — सैन्य/शांति; मुंसिफ-ए-मुंसिफान — न्याय/राजस्व) → परगना (शिकदार, अमीन, फोतदार/कोषाध्यक्ष, कारकुन/लेखक) → ग्राम (मुकद्दम, पटवारी)
भू-राजस्वभूमि की माप (ज़ब्ती); तीन श्रेणियों (अच्छी, मध्यम, खराब) की औसत उपज निकालकर उसका 1/3 भाग राज्य का; फसलों की दर-सूची "राय"; किसान को पट्टा (अधिकार-पत्र) एवं उससे कबूलियत (स्वीकृति-पत्र); सर्वेक्षण शुल्क जरीबाना (2.5%) एवं वसूली शुल्क मुहसिलाना (5%); आपदा में छूट एवं तकावी ऋण
मुद्राचाँदी का रुपया (लगभग 178 ग्रेन) — आधुनिक रुपये का पूर्वज; ताँबे का दाम; स्वर्ण अशर्फी; मिश्रित/घिसे सिक्के बंद किए
सड़कें एवं सरायसड़क-ए-आज़म (आज का ग्रैंड ट्रंक रोड) — सोनारगाँव (बंगाल) से सिंधु तक; आगरा–बुरहानपुर; आगरा–जोधपुर–चित्तौड़; लाहौर–मुल्तान। लगभग 1700 सराय — जिनमें हिंदू-मुस्लिम यात्रियों के लिए अलग व्यवस्था; ये डाक-चौकी का भी काम करती थीं
सेनासीधी भर्ती एवं नकद वेतन; दाग एवं चेहरा पुनर्जीवित; सीमावर्ती छावनियाँ
न्याय एवं अन्यस्थानीय अपराध के लिए कोतवाल एवं ग्रामवासियों की सामूहिक जवाबदेही; धार्मिक भेद के बिना कठोर न्याय; पुराना किला में किला-ए-कुहना मस्जिद, रोहतास दुर्ग

8.4 अकबर (1556–1605)

प्रमुख विजयें

वर्षविजयटिप्पणी
1561–62मालवाबाज बहादुर; अधम खाँ का नेतृत्व
1564गढ़-कटंगारानी दुर्गावती का वीरतापूर्ण प्रतिरोध
1568चित्तौड़जयमल एवं पत्ता का प्रतिरोध
1569रणथम्भौर, कालिंजर (बाँदा, उ.प्र.)
1572–73गुजरातइसी विजय की स्मृति में फतेहपुर सीकरी एवं बुलंद दरवाजा
1576बंगालतुकारोई/राजमहल; दाऊद खाँ कर्रानी पराजित
1576हल्दीघाटी (18 जून)मान सिंह × महाराणा प्रताप
1585काबुलमिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद
1586कश्मीरचक वंश का अंत
1591–92सिंध, उड़ीसा
1595कंधारईरान से कूटनीतिक रूप से प्राप्त
1600–01अहमदनगर (चाँद बीबी), असीरगढ़ (17 जनवरी 1601)अकबर की अंतिम विजय

राजपूत नीति

1562 में आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाह — केवल वैवाहिक संबंध नहीं, बल्कि राजपूतों को मनसबदारी में सम्मानजनक भागीदारीराजा मान सिंह को 7000 का उच्चतम मनसब मिला; टोडरमल, भगवानदास, बीरबल उच्च पदों पर। साथ ही 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जज़िया समाप्त। अपवाद — मेवाड़, जिसने अंत तक अधीनता स्वीकार नहीं की।

धार्मिक नीति का क्रम (कालक्रम-प्रश्न का प्रिय विषय)

  1. 1562 — युद्धबंदियों को दास बनाने पर रोक; आमेर से वैवाहिक संबंध
  2. 1563 — तीर्थयात्रा कर समाप्त
  3. 1564जज़िया समाप्त
  4. 1575फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना (आरंभ में केवल मुस्लिम विद्वान; 1578 से सभी धर्मों — हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई, चार्वाक — के लिए खुला)
  5. 1579महज़र (शेख मुबारक द्वारा प्रारूपित) — धार्मिक विवादों में अंतिम निर्णय का अधिकार बादशाह को; इसे "अचूकता का आदेश" कहना भ्रामक है, यह इमाम-ए-आदिल/मुजतहिद का अधिकार था
  6. 1582दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) — कोई ग्रंथ, पुरोहित या उपासना-पद्धति नहीं; अनुयायी बहुत कम; बीरबल एकमात्र प्रमुख हिंदू अनुयायी
  7. आजीवन नीति — सुलह-ए-कुल (सर्वधर्म समभाव); सती एवं बाल-विवाह को हतोत्साहित, विधवा-विवाह को मान्यता

अनुवाद-विभाग (मक्तबखाना) एवं दरबार

8.5 जहाँगीर (1605–1627)

8.6 शाहजहाँ (1628–1658)

उत्तराधिकार का युद्ध (1657–59)

युद्धवर्षपक्ष एवं परिणाम
बहादुरपुर1658शुजा × दारा का पुत्र सुलेमान शिकोह — शुजा पराजित
धरमतअप्रैल 1658औरंगजेब-मुराद × जसवंत सिंह (दारा की ओर से) — औरंगजेब विजयी
सामूगढ़ (आगरा के निकट, उ.प्र.)29 मई 1658निर्णायक युद्ध — दारा पराजित
खजुहा (फतेहपुर, उ.प्र.)जनवरी 1659औरंगजेब × शुजा
देवराई1659दारा की अंतिम पराजय; बाद में वध

शाहजहाँ को आगरा किले में बंदी बनाया गया (1658–66); जनवरी 1666 में मृत्यु; ताजमहल में मुमताज के पास दफन। मुराद 1661 में मारा गया, शुजा अराकान भाग गया।

यूरोपीय यात्री: पीटर मुंडी (शाहजहाँ के आरंभिक वर्ष; अकाल का विवरण), ज्याँ-बैप्टिस्ट तवर्नियर (फ्रांसीसी रत्न-व्यापारी), फ्रांस्वा बर्नियर (1656–68; चिकित्सक — "भारत में निजी भूमि-स्वामित्व नहीं" का विवादास्पद सिद्धांत), निकोलाओ मनूची (स्टोरिया दो मोगोर), थेवेनो।

8.7 औरंगजेब "आलमगीर" (1658–1707)

मुगल ग्रंथ ↔ लेखक — सुमेलन तालिका

ग्रंथलेखककिस काल पर
बाबरनामा (तुज़ुक-ए-बाबरी)बाबर (तुर्की); फ़ारसी अनुवाद अब्दुर रहीम खानखानाबाबर
हुमायूँनामागुलबदन बेगमहुमायूँ
तज़किरात-उल-वाक़यातजौहर आफताबचीहुमायूँ
तारीख-ए-शेरशाहीअब्बास खाँ सरवानीशेरशाह
अकबरनामा एवं आईन-ए-अकबरीअबुल फजलअकबर
मुंतखब-उत-तवारीखअब्दुल कादिर बदायूँनीअकबर (आलोचनात्मक)
तबकात-ए-अकबरीनिज़ामुद्दीन अहमदअकबर
तुज़ुक-ए-जहाँगीरीजहाँगीर (बाद में मुहम्मद हादी द्वारा पूर्ण)जहाँगीर
इक़बालनामा-ए-जहाँगीरीमुतमिद खाँजहाँगीर
पादशाहनामाअब्दुल हमीद लाहौरीशाहजहाँ
मज्म-उल-बहरैन, सिर्र-ए-अकबरदारा शिकोहशाहजहाँ-काल
मुंतखब-उल-लुबाबखाफी खाँऔरंगजेब
नुस्खा-ए-दिलकुशाभीमसेन सक्सेनाऔरंगजेब (दक्कन)
स्टोरिया दो मोगोरनिकोलाओ मनूची (इतालवी)शाहजहाँ–औरंगजेब
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मुगल साम्राज्य का हृदय
ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (मुगलकालीन ग्रंथ)    (लेखक)
1. हुमायूँनामा — गुलबदन बेगम
2. मुन्तखब-उत-तवारीख — अब्दुल कादिर बदायूँनी
3. पादशाहनामा — अबुल फजल
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)'हुमायूँनामा' हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम की तथा 'मुन्तखब-उत-तवारीख' अब्दुल कादिर बदायूँनी की रचना है — ये दोनों युग्म सही हैं। शाहजहाँ के शासन का प्रामाणिक इतिवृत्त 'पादशाहनामा' मुख्यतः अब्दुल हमीद लाहौरी ने लिखा; अबुल फजल अकबर का इतिहासकार था। अतः केवल युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

प्र.2 सूची-I (ग्रंथ) को सूची-II (रचनाकार) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. तबकात-ए-नासिरी  B. तारीख-ए-फिरोजशाही  C. तुजुक-ए-बाबरी  D. पादशाहनामा
सूची-II: 1. जियाउद्दीन बरनी  2. अब्दुल हमीद लाहौरी  3. मिनहाज-उस-सिराज  4. बाबर
कूट:

AA-4, B-1, C-3, D-2BA-3, B-1, C-4, D-2CA-3, B-2, C-4, D-1DA-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)'तबकात-ए-नासिरी' मिनहाज-उस-सिराज की कृति है, जो इल्तुतमिश एवं बलबन के काल का प्रमुख स्रोत है; 'तारीख-ए-फिरोजशाही' जियाउद्दीन बरनी ने लिखी। 'तुजुक-ए-बाबरी' (बाबरनामा) बाबर की तुर्की में लिखी आत्मकथा है तथा 'पादशाहनामा' शाहजहाँ के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी की रचना है। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।

प्र.3 'दीन-ए-इलाही' के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. अकबर ने इसका प्रवर्तन 1575 ई. में इबादतखाने के निर्माण के साथ ही कर दिया था।
2. बीरबल एकमात्र हिंदू था जिसने इसे स्वीकार किया।
3. अबुल फजल ने इसे 'तौहीद-ए-इलाही' कहा है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अकबर ने 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनवाया, किन्तु 'दीन-ए-इलाही' (तौहीद-ए-इलाही) की घोषणा 1582 ई. में की, अतः कथन 1 गलत है। इसे स्वीकार करने वालों की संख्या बहुत कम रही और बीरबल एकमात्र हिंदू था जिसने इसे अपनाया; अबुल फजल ने इसे 'तौहीद-ए-इलाही' कहा। अतः कथन 2 व 3 सही हैं।

9. मुगल प्रशासन

9.1 राजत्व का सिद्धांत

अबुल फजल के अनुसार बादशाह को "फर्र-ए-इज़दी" (ईश्वरीय प्रकाश) प्राप्त होता है — इसलिए वह किसी वर्ग या धर्म का नहीं, समस्त प्रजा का संरक्षक है। इसी से सुलह-ए-कुल की नीति निकलती है। व्यावहारिक रूप में:

9.2 केंद्रीय प्रशासन (सुमेलन तालिका)

पदकार्यक्षेत्र
वकीलबादशाह का प्रतिनिधि/प्रधानमंत्री — बैरम खाँ के बाद पद प्रायः औपचारिक रह गया
दीवान-ए-आला (वज़ीर)राजस्व एवं वित्त का सर्वोच्च अधिकारी; प्रांतीय दीवान सीधे उसी को रिपोर्ट करते थे
मीर बख्शीसैन्य विभाग — मनसब, हाजिरी, दाग-चेहरा; साथ ही गुप्तचर एवं सूचना-तंत्र का प्रमुख (वाकिया-नवीस, सवानिह-निगार, ख़ुफ़िया-नवीस, हरकारा)
मीर सामान (ख़ान-ए-सामान)शाही घराना, कारखाने, आपूर्ति एवं भंडार
सद्र-उस-सुदूरधार्मिक-दान विभाग; मदद-ए-माश (कर-मुक्त भूमि-अनुदान) की स्वीकृति
काज़ी-उल-कुज़ातन्याय विभाग का प्रमुख
मुहतसिबसार्वजनिक नैतिकता, बाट-माप, निषिद्ध आचरण पर नियंत्रण (औरंगजेब के काल में सर्वाधिक सक्रिय)
दरोगा-ए-डाक-चौकीडाक एवं संदेशवाहन

9.3 मनसबदारी व्यवस्था

अकबर ने लगभग 1573–75 में इसे व्यवस्थित रूप दिया। "मनसब" का अर्थ है पद/श्रेणी। प्रत्येक अधिकारी को दोहरा अंक मिलता था:

9.4 जागीरदारी व्यवस्था

9.5 भू-राजस्व व्यवस्था

विकास-क्रम

  1. करोड़ी प्रयोग (1573–74): प्रत्येक क्षेत्र में करोड़ी अधिकारी नियुक्त, जो एक करोड़ दाम राजस्व वाले क्षेत्र की माप एवं वसूली करता; अनेक जागीरें खालसा में बदलीं।
  2. दहसाला/ज़ब्ती बंदोबस्त (1580): राजा टोडरमल द्वारा। प्रत्येक क्षेत्र की पिछले 10 वर्षों की उपज एवं कीमतों का औसत निकालकर प्रति बीघा नकद माँग निश्चित की गई। इसके लिए एक-सी उत्पादकता वाले क्षेत्रों को "दस्तूर सर्किल" में बाँटा गया और प्रत्येक के लिए दस्तूर-उल-अमल (दर-सूची) बनी।
  3. माप: इकाई बीघा-ए-इलाही; लंबाई का मानक गज़-ए-इलाही (41 अंगुल) — सिकंदर लोदी के 32-अंगुल गज़ का स्थान लिया। 1586 के बाद रस्सी की जगह लोहे के छल्लों से जुड़े बाँस (तनाब) से माप — जिससे मौसम के अनुसार लंबाई बदलने की गड़बड़ी समाप्त हुई।

भूमि का वर्गीकरण

श्रेणीअर्थ
पोलजप्रतिवर्ष बोई जाने वाली भूमि
परौतीउर्वरता लौटाने के लिए एक-दो वर्ष परती छोड़ी गई
चाचरतीन-चार वर्ष से परती
बंजरपाँच या अधिक वर्षों से अकृष्ट

राज्य का भाग: औसत उपज का एक-तिहाई। पोलज एवं परौती को उर्वरता के आधार पर तीन कोटियों (अच्छी, मध्यम, निकृष्ट) में बाँटकर उनका औसत लिया जाता था।

राजस्व-निर्धारण की अन्य पद्धतियाँ

पद्धतिस्वरूप
ज़ब्ती (दहसाला)माप-आधारित, नकद, पूर्व-निर्धारित दर — आगरा, दिल्ली, इलाहाबाद, अवध, लाहौर, मालवा, मुल्तान आदि सुबों में
ग़ल्ला-बख्शी / बटाईफसल का वास्तविक बँटवारा — खेत बटाई (खड़ी फसल), लंक बटाई (कटी फसल), रई बटाई (दाना निकालने के बाद)
कनकूत / दानाबंदीखड़ी फसल देखकर उपज का अनुमान
नस्क़पुराने आँकड़ों के आधार पर मोटा-मोटी निर्धारण — बंगाल जैसे क्षेत्रों में प्रचलित

राजस्व अधिकारी एवं ज़मींदार

9.6 प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन

9.7 धार्मिक नीति — विकास एवं बहस

बादशाहनीति का सार
अकबरसुलह-ए-कुल; जज़िया एवं तीर्थकर समाप्त; इबादतखाना; महज़र; दीन-ए-इलाही; अनुवाद-विभाग; राजपूतों की उच्च भागीदारी
जहाँगीरमूलतः अकबर की नीति की निरंतरता, पर कुछ कठोर प्रसंग — गुरु अर्जुन देव को मृत्युदंड, शेख अहमद सरहिंदी की कारावास
शाहजहाँमध्यमार्गी रूढ़िवाद — नए मंदिरों के निर्माण पर रोक (1633), धर्मांतरण संबंधी नियम कठोर; फिर भी दारा शिकोह जैसी समन्वयवादी धारा दरबार में
औरंगजेबशरीअत-केंद्रित — जज़िया (1679), मुहतसिब, मंदिर-विध्वंस, फतावा-ए-आलमगीरी; किंतु अनेक हिंदू मनसबदार एवं मराठा भी उच्च पदों पर रहे
परीक्षा-दृष्टि — पतन की व्याख्याएँ (अभिकथन–कारण में बहु-पूछित)
ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 मुगलकालीन मनसबदारी व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'जात' पद मनसबदार की व्यक्तिगत हैसियत तथा वेतन का निर्धारण करता था।
2. 'सवार' पद उससे अपेक्षित घुड़सवारों की संख्या को दर्शाता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अकबर द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था में प्रत्येक मनसबदार को दोहरा पद मिलता था — 'जात' उसकी व्यक्तिगत श्रेणी, प्रतिष्ठा एवं वेतन तय करता था, जबकि 'सवार' उससे अपेक्षित घुड़सवारों की संख्या बताता था। जहाँगीर ने आगे चलकर इसमें 'दु-अस्पा सिह-अस्पा' की व्यवस्था जोड़ी। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (मुगल पदाधिकारी)    (कार्य)
1. मीर बख्शी — सैन्य एवं मनसबदारी विभाग का प्रमुख
2. सद्र-उस-सुदूर — साम्राज्य के वित्त विभाग का प्रमुख
3. मुहतसिब — शाही कारखानों एवं आपूर्ति का प्रभारी
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)मीर बख्शी सैन्य एवं मनसबदारी विभाग का प्रमुख था, अतः युग्म 1 सही है। 'सद्र-उस-सुदूर' धार्मिक मामलों, दान एवं मदद-ए-माश अनुदानों का प्रधान था; वित्त विभाग 'दीवान-ए-आला' के अधीन था। 'मुहतसिब' सार्वजनिक नैतिकता एवं बाजार-आचरण का निरीक्षक था, जबकि शाही कारखाने 'मीर सामान' के अधीन थे। अतः युग्म 2 तथा 3 सुमेलित नहीं हैं।

प्र.3 मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'दहसाला' व्यवस्था में विगत दस वर्षों की उपज एवं मूल्यों के औसत के आधार पर लगान निर्धारित होता था।
2. 'जब्ती' व्यवस्था के अंतर्गत भू-राजस्व की वसूली सामान्यतः उपज (जिन्स) के रूप में की जाती थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)टोडरमल की दहसाला (जब्ती) व्यवस्था में लगभग 1570-80 के दस वर्षों की उपज तथा मूल्यों का औसत निकालकर प्रति बीघा नकद लगान निर्धारित किया जाता था, अतः कथन 1 सही है। जब्ती के अंतर्गत वसूली नकद होती थी, उपज के रूप में नहीं; उपज-बँटवारा 'गल्ला-बख्शी' या 'बटाई' कहलाता था। अतः कथन 2 गलत है।

10. मुगलकालीन अर्थव्यवस्था एवं समाज

10.1 कृषि

10.2 शिल्प एवं उद्योग

उत्पादप्रसिद्ध क्षेत्र
मलमल (muslin) — मलमल खास, आब-ए-रवाँ, शबनमढाका (बंगाल)
छींट/कलमकारी (रंगीन छपा सूती वस्त्र)कोरोमंडल तट (मसुलीपट्टनम)
पटोला, जरी एवं रेशमपाटन एवं अहमदाबाद (गुजरात)
किमख्वाब/ब्रोकेड एवं रेशमी बनारसी वस्त्रबनारस एवं अवध (उ.प्र.)
शाल (पश्मीना)कश्मीर
नील (indigo) — सर्वोत्तम कोटिबयाना (आगरा के निकट, उ.प्र.) एवं सरखेज (गुजरात)
शोरा (saltpetre) — बारूद का कच्चा मालबिहार (पटना)
चीनी एवं गुड़बंगाल एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश
बिदरी धातु-कलाबीदर (दक्कन)
जहाज-निर्माणबंगाल, गुजरात (सूरत), मालाबार
कालीनअकबर द्वारा आगरा, फतेहपुर सीकरी एवं लाहौर में कारखाने
कागज़स्यालकोट, कश्मीर, दौलताबाद

10.3 व्यापार, मुद्रा एवं बैंकिंग

यूरोपीय कंपनियाँ (सीमा-संकेत: विस्तार अध्याय 2.3 में)

कंपनीस्थापनाभारत में प्रारंभिक केंद्र
पुर्तगाली (एस्तादो द इंडिया)1498 वास्को द गामा; 1505 सेगोवा, कोचीन, दीव, दमन; कार्ताज़ (समुद्री परमिट) प्रणाली
अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी1600सूरत (1613), मद्रास (1639), बंबई (1668), कलकत्ता (1690)
डच (VOC)1602पुलिकट, मसुलीपट्टनम, नागापट्टनम
डेनिश1616ट्रंकबार, श्रीरामपुर
फ्रांसीसी1664सूरत (1668), पांडिचेरी (1674), चंद्रनगर

10.4 नगर एवं नगरीय जीवन

उत्तर प्रदेश संदर्भ — कस्बा-संस्कृति

मुगलकालीन उत्तर प्रदेश की सबसे विशिष्ट देन उसका कस्बा-जाल है — जौनपुर, बिलग्राम, काकोरी, अमरोहा, संडीला, रुदौली, कड़ा, मानिकपुर, बदायूँ, सहारनपुर, बहराइच। इन कस्बों में फ़ारसी-शिक्षित सेवा-वर्ग (क़ाज़ी, क़ानूनगो, मुंशी, शेखज़ादे), सूफी खानकाहें, स्थानीय मंडी एवं बुनकर-बस्तियाँ एक साथ पनपीं। मुगल प्रशासन की ज़मीनी कड़ी यही वर्ग था और 18वीं सदी में अवध जैसे क्षेत्रीय राज्य इसी आधार पर खड़े हुए। साथ ही बयाना (आगरा) का नील तथा बनारस का ब्रोकेड मुगलकालीन निर्यात-सूची के शीर्ष पर थे।

10.5 समाज एवं वर्ग-संरचना

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): उग्रवादी (गरम दल) नेताओं ने 'स्वराज्य' को अपना घोषित लक्ष्य बनाया।
कारण (R): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1907 के सूरत अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' को अपना ध्येय स्वीकार कर लिया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)उग्रवादी नेताओं ने स्वदेशी-बहिष्कार के दौर में 'स्वराज्य' को अपना लक्ष्य घोषित किया, अतः (A) सही है। किंतु कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' को अपना औपचारिक ध्येय 1929 के लाहौर अधिवेशन में स्वीकार किया, 1907 के सूरत अधिवेशन में नहीं — सूरत में तो कांग्रेस ही विभाजित हो गई थी; अतः (R) गलत है।

प्र.2 '1813 का चार्टर अधिनियम' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसने चीन के साथ व्यापार में भी कंपनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया।
2. इसने भारत में ईसाई मिशनरियों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)1813 के चार्टर अधिनियम ने भारत के साथ व्यापार में कंपनी का एकाधिकार समाप्त किया, किन्तु चीन के साथ व्यापार तथा चाय के व्यापार पर उसका एकाधिकार बनाए रखा — वह 1833 के अधिनियम से समाप्त हुआ; अतः कथन 1 गलत है। इसी अधिनियम ने मिशनरियों को भारत आकर धर्म-प्रचार की अनुमति दी, प्रतिबंध नहीं लगाया; अतः कथन 2 भी गलत है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): शेरशाह सूरी को मध्यकालीन भारत की मुद्रा-व्यवस्था के सुधारक के रूप में स्मरण किया जाता है।
कारण (R): उसने शुद्ध चाँदी का 'रुपया' तथा ताँबे का 'दाम' प्रचलित किया, जिनकी परंपरा मुगलकाल में भी चलती रही।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)शेरशाह ने मिश्रित धातु के सिक्कों के स्थान पर शुद्ध चाँदी का 'रुपया' तथा ताँबे का 'दाम' चलाया और उन पर टकसाल एवं तिथि अंकित करवाई; यही मानक मुगलों ने भी अपनाया। मुद्रा-सुधार का यह कार्य ही उसे मुद्रा-व्यवस्था का सुधारक बनाता है, अतः (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

11. मराठा शक्ति

11.1 उदय के कारण

  1. भूगोल: सह्याद्रि की दुर्गम घाटियाँ, सैकड़ों पहाड़ी दुर्ग, संकरे दर्रे — जो गुरिल्ला युद्ध (गनिमी कावा) के लिए आदर्श थे और बड़ी शाही सेनाओं के लिए दुःस्वप्न।
  2. सांस्कृतिक एकता: वारकरी/भक्ति आंदोलन (ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, रामदास) ने मराठी भाषा एवं साझा पहचान की भूमि तैयार की — जिसे रानाडे ने "महाराष्ट्र धर्म" कहा।
  3. प्रशासनिक अनुभव: अहमदनगर एवं बीजापुर की सेवा में मराठा देशमुख, देशपांडे एवं सरदार प्रशासन तथा घुड़सवार युद्ध में प्रशिक्षित हो चुके थे। मलिक अंबर की सैन्य एवं राजस्व-पद्धति का सीधा प्रभाव।
  4. राजनीतिक शून्य: मुगलों द्वारा दक्कनी सल्तनतों के दमन से उत्पन्न रिक्तता।

11.2 शिवाजी (1630–1680)

अष्टप्रधान — पद ↔ कार्य (सुमेलन तालिका)

पदवैकल्पिक नामकार्य
पेशवामुख्य प्रधानसामान्य प्रशासन; राजा की अनुपस्थिति में प्रतिनिधि; राजमुद्रा
अमात्यमजुमदारवित्त एवं लेखा-परीक्षा
सचिवसुरनवीस/शुरुनवीसशाही पत्राचार एवं अभिलेख
मंत्रीवाकिया-नवीसराजा का व्यक्तिगत विवरण, दरबार की दैनंदिनी, गुप्तचर
सुमंतदबीरविदेश-नीति एवं संधि
सेनापतिसरनौबतसेना का प्रधान
पंडितरावसद्रधार्मिक-दान एवं धर्माधिकार
न्यायाधीशन्याय

महत्वपूर्ण बिंदु: पंडितराव एवं न्यायाधीश को छोड़कर शेष छह के पास सैन्य दायित्व भी थे; तथा शिवाजी के समय ये पद वंशानुगत नहीं थे — पेशवा-काल में वंशानुगत हुए।

शिवाजी की राजस्व एवं सैन्य व्यवस्था

11.3 शिवाजी के उत्तराधिकारी

11.4 पेशवा काल

पेशवाकालप्रमुख उपलब्धि
बालाजी विश्वनाथ1713–20मराठा राज्य का "द्वितीय संस्थापक"; 1719 में सैयद बंधुओं से संधि — मुगलों द्वारा स्वराज्य की मान्यता तथा दक्कन के छह सूबों की चौथ एवं सरदेशमुखी का अधिकार, बदले में मराठा सैन्य सहायता। इसी संधि ने मराठों को अखिल भारतीय शक्ति बनाया।
बाजीराव प्रथम1720–40महानतम पेशवा; "मुरझाते वृक्ष के तने पर प्रहार करो" की नीति; पालखेड़ (1728) एवं भोपाल (1737) में निज़ाम को पराजित; मालवा, बुंदेलखंड (छत्रसाल की सहायता, 1729) एवं गुजरात में विस्तार; 1737 में दिल्ली तक छापा; 1739 में पुर्तगालियों से बसीन (वसई) छीना। इसी काल में गायकवाड़ (बड़ौदा), होल्कर (इंदौर), सिंधिया (ग्वालियर), पवार (धार) तथा आगे भोंसले (नागपुर) घरानों की स्थापना।
बालाजी बाजीराव (नाना साहेब)1740–61साम्राज्य का अधिकतम विस्तार (अटक से कटक तक); किंतु पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जनवरी 1761) में विनाशकारी पराजय; उसी वर्ष जून में मृत्यु।
माधवराव प्रथम1761–72पानीपत के बाद पुनरुत्थान; निज़ाम एवं हैदर अली पर विजय; 1772 में शाह आलम द्वितीय को दिल्ली की गद्दी पर पुनः बैठाया। क्षय रोग से असामयिक मृत्यु — ग्रांट डफ: "पानीपत की अपेक्षा माधवराव की मृत्यु से मराठा राज्य को अधिक घातक आघात लगा।"
नारायणराव / रघुनाथराव / सवाई माधवराव / बाजीराव द्वितीय1772–18181773 में नारायणराव की हत्या से आंतरिक संघर्ष; नाना फड़नवीस ("मराठा मैकियावेली") का प्रभुत्व; आगे आंग्ल-मराठा युद्ध (विस्तार अध्याय 2.3 में)

पानीपत का तृतीय युद्ध — 14 जनवरी 1761

पक्षनेतृत्व एवं सहयोगी
मराठासदाशिवराव भाऊ (सेनापति), विश्वासराव (पेशवा का पुत्र), मल्हारराव होल्कर, जनकोजी सिंधिया, इब्राहीम खाँ गार्दी (तोपखाना)
अफगान संघअहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी), नजीब-उद-दौला (रुहेला), शुजा-उद-दौला (अवध), दोआब के रुहेले

परिणाम: सदाशिवराव भाऊ एवं विश्वासराव मारे गए; भारी जनहानि। किंतु अब्दाली भारत में सत्ता स्थापित नहीं कर सका और लौट गया। असली लाभ अंग्रेजों को हुआ — उत्तर भारत में मराठा एवं अफगान दोनों कमजोर पड़ गए, और ठीक इन्हीं वर्षों में बंगाल में कंपनी की शक्ति बढ़ रही थी।

11.5 मराठा संघ (Maratha Confederacy)

18वीं सदी के उत्तरार्ध तक मराठा शक्ति एक केंद्रीकृत साम्राज्य नहीं, बल्कि पेशवा के नाममात्र नेतृत्व में सरदार-घरानों का संघ बन गई थी:

घरानाकेंद्र
पेशवा (भट)पुणे — संघ का नेतृत्व
गायकवाड़बड़ौदा
होल्करइंदौर
सिंधिया (शिंदे)ग्वालियर
भोंसलेनागपुर

दुर्बलताएँ: ढीला संघीय बंधन एवं आपसी ईर्ष्या (सिंधिया × होल्कर); कोई साझा राजकोषीय या प्रशासनिक ढाँचा नहीं; चौथ-सरदेशमुखी पर आधारित अर्थव्यवस्था, जो विजित क्षेत्रों में स्थायी वैधता नहीं बना सकी; कमजोर नौसेना (आंग्रे परिवार के पतन के बाद); कूटनीतिक दूरदर्शिता का अभाव; एवं आधुनिक यूरोपीय प्रशिक्षित पैदल सेना-तोपखाने के सामने पुरानी घुड़सवार रणनीति की सीमाएँ।

ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 मराठा राज्य के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. शिवाजी का राज्याभिषेक 1674 ई. में रायगढ़ में हुआ था।
2. 'चौथ' अधिकृत क्षेत्र के भू-राजस्व का दसवाँ भाग होता था।
3. पुरंदर की संधि (1665) पर शिवाजी तथा शाइस्ता खाँ के बीच हस्ताक्षर हुए थे।
4. 'सरदेशमुखी' मुगलों द्वारा मराठों को दिया जाने वाला अतिरिक्त चौथाई भाग था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 1, 2 और 4Cकेवल 2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)शिवाजी का राज्याभिषेक 1674 ई. में रायगढ़ में हुआ, अतः कथन 1 सही है। 'चौथ' भू-राजस्व का चौथा भाग (1/4) तथा 'सरदेशमुखी' अतिरिक्त दसवाँ भाग (1/10) था — अतः कथन 2 एवं 4 दोनों उलट दिए गए हैं और गलत हैं। पुरंदर की संधि शिवाजी तथा मुगल सेनापति राजा जयसिंह के बीच हुई थी, शाइस्ता खाँ के साथ नहीं। अतः केवल कथन 1 सही है।

प्र.2 शिवाजी की 'अष्टप्रधान' व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'पेशवा' अष्टप्रधान का प्रमुख था और उसका स्थान प्रधानमंत्री के समकक्ष था।
2. 'सुरनवीस' (सचिव) राजकीय पत्राचार तथा दस्तावेजों का उत्तरदायी होता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)शिवाजी की अष्टप्रधान परिषद् में पेशवा (मुख्य प्रधान) का स्थान प्रधानमंत्री के समकक्ष था, अमात्य वित्त, सुमंत विदेश, सेनापति सैन्य तथा न्यायाधीश एवं पंडितराव क्रमशः न्याय व धार्मिक कार्य देखते थे। 'सचिव' अथवा 'सुरनवीस' राजकीय पत्राचार एवं दस्तावेजों की जाँच का उत्तरदायी था। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 बारदोली सत्याग्रह (1928) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह भू-राजस्व में की गई लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि के विरुद्ध चलाया गया कर-बंदी अभियान था।
2. ब्रूमफील्ड–मैक्सवेल जाँच के पश्चात यह वृद्धि घटाकर लगभग 6 प्रतिशत कर दी गई थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)बंबई सरकार द्वारा बारदोली तालुका में भू-राजस्व में लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि के विरुद्ध फरवरी 1928 में कर-बंदी सत्याग्रह आरंभ हुआ, जिसका नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया; अतः कथन 1 सही है। न्यायिक अधिकारी ब्रूमफील्ड तथा राजस्व अधिकारी मैक्सवेल की जाँच-रिपोर्ट (1929) ने वृद्धि को अत्यधिक बताया और इसे घटाकर लगभग 6 प्रतिशत कर दिया गया; अतः कथन 2 भी सही है। इसी आंदोलन में बारदोली की स्त्रियों ने पटेल को 'सरदार' कहा।

12. मुगल साम्राज्य का पतन एवं स्वतंत्र राज्यों का उदय

12.1 पतन के कारण — संक्षेप में

  1. व्यक्तिगत/नीतिगत: औरंगजेब की 25-वर्षीय दक्कन नीति ने कोष, सेना एवं केंद्रीय पर्यवेक्षण तीनों को खोखला किया; धार्मिक नीति ने राजपूत, जाट, सतनामी, सिख एवं मराठा — सभी को एक साथ शत्रु बना दिया।
  2. संरचनात्मक: जागीरदारी संकट (बेजागीरी, जमा-हासिल का अंतर), कृषि संकट (अत्यधिक राजस्व-दोहन → किसान-ज़मींदार विद्रोह)।
  3. राजनीतिक: उत्तराधिकार का नियम न होना; कमजोर उत्तराधिकारी; अमीर-गुटबंदी (तूरानी × ईरानी × हिंदुस्तानी); "राजा-निर्माता" अमीरों का उदय (जुल्फिकार खाँ, सैयद बंधु)।
  4. सैन्य: घुड़सवार-प्रधान सेना का पिछड़ापन; दाग-चेहरा में ढिलाई; तोपखाने का आधुनिकीकरण न होना।
  5. बाहरी आघात: नादिर शाह (1739) एवं अहमद शाह अब्दाली के बार-बार आक्रमण।
  6. क्षेत्रीय शक्तियों का उभार: मराठा, सिख, जाट, तथा स्वयं मुगल सूबेदारों की स्वायत्तता।

नादिर शाह का आक्रमण: करनाल का युद्ध, 24 फरवरी 1739 — मुहम्मद शाह कुछ घंटों में पराजित; 22 मार्च 1739 को दिल्ली में भीषण कत्लेआम; तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) एवं कोहिनूर सहित अपार संपत्ति ले गया; सिंधु के पश्चिम का क्षेत्र भी छीना। इस एक आघात ने मुगल प्रतिष्ठा का जो बचा-खुचा आवरण था, उसे भी हटा दिया।

बदायूँ चंदावर आगरा फतेहपुर सीकरी कन्नौज जौनपुर कालिंजर कड़ा चुनार मगहर जायस वाराणसी
सल्तनत एवं युद्ध-स्थलसूर–मुगल केंद्रभक्ति एवं सूफी
बदायूँ — इल्तुतमिश का इक्ता · कन्नौज — 1018 की लूट, 1540 की पराजय · चंदावर 1194 · कड़ा — 1296 में जलालुद्दीन का वध · जौनपुर — 1359/1394/1479 · कालिंजर (बाँदा) — 1545 में शेरशाह की मृत्यु · चुनार — उसका पहला दुर्ग · आगरा 1504 · फतेहपुर सीकरी 1571 · मगहर — कबीर 1518 · जायस — पद्मावत 1540 · वाराणसी — रामानंद, कबीर, रविदास।

12.2 उत्तरवर्ती मुगल — कालानुक्रमिक तालिका

बादशाहकालपहचान-बिंदु
बहादुर शाह प्रथम (शाह आलम प्रथम)1707–12समझौते की नीति — राजपूत, मराठा एवं सिखों से; इतिहासकार खाफी खाँ ने उसे "शाह-ए-बेखबर" कहा
जहांदार शाह1712–13जुल्फिकार खाँ का प्रभुत्व; इजारा (राजस्व-ठेका) को प्रोत्साहन; लाल कुँवर का प्रसंग
फर्रुखसियर1713–19सैयद बंधुओं (अब्दुल्ला खाँ एवं हुसैन अली खाँ — "राजा-निर्माता") के हाथों कठपुतली; 1717 का फरमान अंग्रेज़ कंपनी को (कंपनी का "मैग्ना कार्टा"); अंततः सैयदों द्वारा अपदस्थ एवं मारा गया
रफी-उद-दरजात एवं रफी-उद-दौला1719कुछ महीनों के कठपुतली शासक
मुहम्मद शाह "रंगीला"1719–481720 में निज़ाम-उल-मुल्क की सहायता से सैयद बंधुओं का अंत; इसी काल में हैदराबाद, बंगाल एवं अवध व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हुए; 1739 नादिर शाह
अहमद शाह1748–54अब्दाली के आक्रमण आरंभ; उधम बाई का प्रभाव
आलमगीर द्वितीय1754–591757 में अब्दाली की दिल्ली-लूट
शाह आलम द्वितीय1759–1806लंबे समय तक दिल्ली से बाहर; 1765 में इलाहाबाद की संधि; 1772 में मराठों द्वारा दिल्ली वापसी (आगे 2.3 में)
अकबर द्वितीय / बहादुर शाह ज़फर1806–37 / 1837–57नाममात्र के सम्राट (विस्तार 2.3 में)

12.3 स्वतंत्र राज्यों का वर्गीकरण

प्रकारस्वरूपउदाहरण
उत्तराधिकारी राज्य (Successor states)मुगल सूबे, जिनके सूबेदारों ने व्यावहारिक स्वतंत्रता ले ली पर बादशाह की नाममात्र अधीनता बनाए रखीहैदराबाद, बंगाल, अवध
विद्रोही/नए राज्य (New states)मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह से बनेमराठा, सिख, जाट, रुहेला (एवं फर्रुखाबाद के बंगश)
स्वतंत्र/पुनरुत्थित राज्यपुरानी या नई स्थानीय शक्तियाँ, जिन पर मुगल नियंत्रण कभी दृढ़ नहीं रहामैसूर, राजपूत राज्य, त्रावणकोर

12.4 अवध

12.5 बंगाल

12.6 हैदराबाद

12.7 मैसूर

12.8 सिख

12.9 जाट

12.10 रुहेला एवं बंगश — उत्तर प्रदेश के दो अफगान राज्य

उत्तर प्रदेश संदर्भ — 18वीं सदी का उ.प्र.

मुगल पतन के बाद आज के उत्तर प्रदेश का क्षेत्र चार शक्तियों में बँट गया — अवध (फैजाबाद, फिर लखनऊ), रुहेलखंड (आँवला/बरेली, नजीबाबाद), फर्रुखाबाद के बंगश, तथा बनारस राज (रामनगर); पश्चिम में जाटों का प्रभाव आगरा-मथुरा तक और मराठों का ग्वालियर से दोआब तक। UPPSC के लिए यह खंड अत्यंत उपयोगी है — आँवला ↔ अली मुहम्मद खाँ, नजीबाबाद ↔ नजीब-उद-दौला, फर्रुखाबाद ↔ मुहम्मद खाँ बंगश, रामनगर ↔ बलवंत सिंह, लखनऊ ↔ आसफ-उद-दौला (1775), फैजाबाद ↔ शुजा-उद-दौला — ये छह युग्म सीधे सुमेलन-प्रश्न बनते हैं।

ट्रैप
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 उत्तरकालीन मुगल इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. नादिरशाह का भारत पर आक्रमण
2. सैयद बंधुओं की सत्ता का अंत
3. औरंगजेब की मृत्यु
4. मनुपुर का युद्ध (अहमदशाह अब्दाली बनाम मुगल सेना)
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 2, 1, 4B2, 3, 4, 1C3, 2, 4, 1D2, 3, 1, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)औरंगजेब की मृत्यु 1707 ई. में हुई। 'राजा बनाने वाले' कहे जाने वाले सैयद बंधुओं की सत्ता 1720 ई. में समाप्त हुई। नादिरशाह ने 1739 ई. में आक्रमण कर दिल्ली को लूटा तथा अहमदशाह अब्दाली के पहले आक्रमण के दौरान 1748 ई. में मनुपुर का युद्ध लड़ा गया। अतः सही क्रम 3, 2, 1, 4 है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (व्यक्ति)    (संबद्ध रियासत)
1. शेख अब्दुल्ला — जम्मू-कश्मीर
2. स्वामी रामानंद तीर्थ — हैदराबाद
3. के.एम. मुंशी — जूनागढ़
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता थे तथा स्वामी रामानंद तीर्थ हैदराबाद स्टेट कांग्रेस के प्रमुख नेता — ये दोनों युग्म सही हैं। के.एम. मुंशी को भारत सरकार ने हैदराबाद में अपना एजेंट-जनरल नियुक्त किया था, जूनागढ़ में नहीं; अतः केवल युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

प्र.3 निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. जूनागढ़ में जनमत-संग्रह
2. जम्मू-कश्मीर द्वारा विलय-पत्र पर हस्ताक्षर
3. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का प्रभावी होना
4. हैदराबाद के विरुद्ध 'ऑपरेशन पोलो'
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 3, 1, 4B3, 2, 4, 1C2, 3, 4, 1D3, 2, 1, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 15 अगस्त 1947 से प्रभावी हुआ; जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए; जूनागढ़ में जनमत-संग्रह फरवरी 1948 में हुआ तथा हैदराबाद के विरुद्ध 'ऑपरेशन पोलो' सितंबर 1948 में चला। अतः सही क्रम 3, 2, 1, 4 है।

13. समेकित कालक्रम (750–1761)

यह तालिका पूरे अध्याय की रीढ़ है। UPPSC के कालक्रम-प्रश्न इसी शृंखला से बनते हैं — विशेषकर पास-पास की तिथियों वाले युग्मों से

वर्षघटना
712मुहम्मद बिन कासिम का सिंध विजय (रावर का युद्ध; दाहिर की मृत्यु)
750 / 753पाल वंश (गोपाल) / राष्ट्रकूट वंश (दन्तिदुर्ग) की स्थापना
लगभग 790त्रिपक्षीय संघर्ष का आरंभ
1000–1027महमूद गजनवी के 17 आक्रमण (1018 कन्नौज-मथुरा; 1025–26 सोमनाथ)
1191 / 1192तराइन का प्रथम / द्वितीय युद्ध
1194चंदावर का युद्ध — जयचंद पराजित
1206कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्याभिषेक; मुहम्मद गोरी की हत्या
1221चंगेज खाँ सिंधु तक
1229इल्तुतमिश को खलीफा की मान्यता
1236–40रजिया का शासन
1290 / 1296खलजी वंश की स्थापना / अलाउद्दीन का सत्ता-ग्रहण
1303चित्तौड़ विजय
1320 / 1325तुगलक वंश की स्थापना / मुहम्मद बिन तुगलक का शासनारंभ
1326–27दौलताबाद राजधानी-स्थानांतरण
1329–32सांकेतिक मुद्रा
1333इब्न बतूता का आगमन
1336 / 1347विजयनगर / बहमनी की स्थापना
1351फ़िरोज़ शाह तुगलक का शासनारंभ
1359जौनपुर नगर की स्थापना
1382 / 1394खानदेश (फ़ारूकी) / जौनपुर (शर्की) सल्तनत की स्थापना
1398तैमूर का आक्रमण
1401 / 1407 / 1411मालवा / गुजरात की स्वतंत्रता / अहमदाबाद की स्थापना
1414 / 1451सैयद / लोदी वंश की स्थापना
1420–70ज़ैन-उल-आबिदीन (कश्मीर)
1443अब्दुर रज़्ज़ाक का विजयनगर आगमन
1448चित्तौड़ का विजय स्तंभ (राणा कुम्भा)
1469गुरु नानक का जन्म
1479 / 1481बहलोल लोदी द्वारा जौनपुर का विलय / महमूद गवाँ का वध
1490–1512दक्कन की पाँच सल्तनतों का उदय
1504 / 1506आगरा की स्थापना / लोदी राजधानी
1509–29कृष्णदेव राय
1518कबीर का मगहर में देहावसान
1526 / 1527 / 1528 / 1529पानीपत / खानवा / चंदेरी / घाघरा — बाबर के चार युद्ध
1539 / 1540चौसा / कन्नौज (बिलग्राम) — शेरशाह की विजय
1540जायसी का पद्मावत
1545कालिंजर में शेरशाह की मृत्यु
1556पानीपत का द्वितीय युद्ध; अकबर का राज्याभिषेक
1564 / 1565जज़िया की समाप्ति / तालिकोटा का युद्ध
1571 / 1575 / 1579 / 1580 / 1582फतेहपुर सीकरी / इबादतखाना / महज़र / दहसाला बंदोबस्त / दीन-ए-इलाही
1574तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस का आरंभ (अयोध्या)
1576हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून); बंगाल विजय
1586 / 1601कश्मीर / असीरगढ़ (अकबर की अंतिम विजय)
1600 / 1602 / 1664अंग्रेज़ / डच / फ्रांसीसी कंपनी की स्थापना
1604 / 1606आदि ग्रंथ का संकलन / गुरु अर्जुन देव की शहादत
1615–19सर टॉमस रो का भारत-प्रवास
1632–53ताजमहल का निर्माण
1658 / 1659सामूगढ़ का युद्ध / औरंगजेब का राज्याभिषेक
1665 / 1666 / 1674पुरंदर की संधि / शिवाजी का आगरा-पलायन / रायगढ़ में राज्याभिषेक
1675 / 1679 / 1680गुरु तेग बहादुर की शहादत / जज़िया की पुनर्स्थापना / शिवाजी का निधन
1686 / 1687 / 1689बीजापुर / गोलकुंडा का विलय / संभाजी का वध
1699 / 1707खालसा की स्थापना / औरंगजेब की मृत्यु
1713–20बालाजी विश्वनाथ; सैयद बंधुओं का युग
1717 / 1722 / 1724बंगाल / अवध / हैदराबाद की व्यावहारिक स्वतंत्रता
1720–40बाजीराव प्रथम का पेशवा-काल
1739करनाल का युद्ध एवं नादिर शाह की दिल्ली-लूट; बसीन पर मराठा अधिकार
14 जनवरी 1761पानीपत का तृतीय युद्ध
अंतिम पुनरावृत्ति — 12 सर्वाधिक संभावित बिंदु
  1. चंदावर (1194) एवं तराइन (1191/92) — स्थल, राज्य एवं पराजित शासक।
  2. इक्ता ↔ जागीर ↔ अमरम् — तीनों का अंतर।
  3. अलाउद्दीन की बाजार व्यवस्था — सराय-ए-अदल, शहना-ए-मंडी, दीवान-ए-रियासत।
  4. मुहम्मद बिन तुगलक के पाँच प्रयोग एवं उनका क्रम।
  5. फ़िरोज़ शाह तुगलक के चार नगर एवं दीवान-ए-खैरात/बंदगान।
  6. जौनपुर की शर्की सल्तनत — 1359, 1394, 1408, 1479।
  7. विदेशी यात्री ↔ शासक (कोंटी, रज़्ज़ाक, पायस, नुनिज़, निकितिन)।
  8. महमूद गवाँ के सुधार एवं 1481।
  9. ज़ात-सवार, दु-अस्पा सिह-अस्पा, दहसाला, पोलज-परौती-चाचर-बंजर।
  10. अकबर के 12 सूबे (जिनमें आगरा, अवध एवं इलाहाबाद) एवं धार्मिक नीति का कालक्रम।
  11. अष्टप्रधान ↔ कार्य; चौथ (25%) एवं सरदेशमुखी (10%)।
  12. 1717–1724 की तीन स्वतंत्रताएँ एवं 18वीं सदी के उ.प्र. के छह केंद्र।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (विदेशी यात्री) को सूची-II (जिसके शासनकाल में भारत आया) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. अल-बरूनी  B. इब्न बतूता  C. अफनासी निकितिन  D. फ्रांस्वा बर्नियर
सूची-II: 1. मुहम्मद बिन तुगलक  2. औरंगजेब  3. महमूद गजनवी  4. बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय
कूट:

AA-1, B-3, C-4, D-2BA-1, B-3, C-2, D-4CA-3, B-1, C-4, D-2DA-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अल-बरूनी महमूद गजनवी के साथ भारत आया और 'तहकीक-ए-हिंद' लिखी; इब्न बतूता मुहम्मद बिन तुगलक के काल में आया और दिल्ली का काजी बना। रूसी व्यापारी अफनासी निकितिन 1471-74 के बीच बहमनी राज्य (सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय के काल) में रहा तथा फ्रांस्वा बर्नियर औरंगजेब के समय भारत आया। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।

प्र.2 अकबर के शासनकाल की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. हल्दीघाटी का युद्ध
2. पानीपत का द्वितीय युद्ध
3. जजिया कर की समाप्ति
4. फतेहपुर सीकरी की स्थापना
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 2, 4, 1B2, 3, 4, 1C3, 2, 1, 4D2, 3, 1, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)पानीपत का द्वितीय युद्ध 1556 ई. में हेमू के विरुद्ध लड़ा गया। अकबर ने 1564 ई. में जजिया समाप्त किया, 1571 ई. में फतेहपुर सीकरी को राजधानी के रूप में बसाना आरंभ किया और 1576 ई. में महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। अतः सही क्रम 2, 3, 4, 1 है।

प्र.3 मध्यकालीन दक्षिण भारत की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. कृष्णदेवराय का राज्यारोहण
2. बहमनी राज्य की स्थापना
3. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना
4. तालीकोटा (राक्षसी-तांगड़ी) का युद्ध
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 3, 4, 1B3, 2, 4, 1C3, 2, 1, 4D2, 3, 1, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में हरिहर एवं बुक्का ने की; अलाउद्दीन बहमन शाह ने 1347 ई. में बहमनी राज्य की नींव रखी। कृष्णदेवराय 1509 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ और 1565 ई. के तालीकोटा युद्ध में दक्कनी सल्तनतों के संघ ने विजयनगर को पराजित किया। अतः सही क्रम 3, 2, 1, 4 है।