भाग 4 · भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

4.4 कार्यपालिका एवं विधायिका

राष्ट्रपति से लेकर विधान परिषद तक — संघ एवं राज्य के कार्यपालक तथा विधायी अंगों की संरचना, शक्तियाँ, प्रक्रिया एवं परस्पर संतुलन

← भाग 4 की सूची4.2 मौलिक अधिकार

विषय-सूची

  1. राष्ट्रपति — निर्वाचन, अर्हता, महाभियोग एवं शक्तियाँ
  2. उपराष्ट्रपति — निर्वाचन, पदच्युति एवं सभापति की भूमिका
  3. प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 74 से 78
  4. संसद — संरचना, सदस्यता, निरर्हता एवं दसवीं अनुसूची
  5. संसदीय प्रक्रिया — सत्र, गणपूर्ति, प्रश्नकाल एवं प्रस्ताव
  6. विधायी प्रक्रिया — विधेयकों के प्रकार एवं संयुक्त बैठक
  7. बजट एवं वित्तीय प्रक्रिया — अनुच्छेद 112 से 117 तथा तीन निधियाँ
  8. संसदीय समितियाँ — वित्तीय, विभागीय स्थायी एवं तदर्थ
  9. संसदीय पदाधिकारी — अध्यक्ष, सभापति तालिका एवं विपक्ष का नेता
  10. राज्यपाल — नियुक्ति, शक्तियाँ एवं विवेकाधीन क्षेत्र
  11. मुख्यमंत्री एवं राज्य मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 163 एवं 164
  12. राज्य विधानमंडल — विधान सभा एवं विधान परिषद
  13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची, कालक्रम एवं रटने योग्य तथ्य
इस अध्याय का परीक्षा-भार बहुत उच्च

2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था से लगभग 19–20 प्रश्न आए और उनमें राज्य सभा की सीटें, लोक सभा अध्यक्ष, समितियाँ तथा अनुच्छेद-संख्या जैसे बिंदु सीधे कार्यपालिका-विधायिका से थे। इस अध्याय से प्रश्न चार रूपों में आता है — (क) सुमेलन — अनुच्छेद ↔ विषय, समिति ↔ सदस्य-संख्या, पद ↔ नियुक्तिकर्ता; (ख) दो-कथन — जिसमें “कुल सदस्य” बनाम “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” या “निर्वाचित” बनाम “मनोनीत” जैसा एक शब्द उत्तर पलट देता है; (ग) कालक्रम — विधेयक की अवस्थाएँ, बजट की अवस्थाएँ, संयुक्त बैठकें; (घ) नकारात्मक युग्म — “कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है”। 2025 के प्रश्न 141 में तो सीधे यही पूछा गया था कि संयुक्त बैठक का उपबंध अनुच्छेद 108 में है या 109 में — एक अंक की दूरी केवल एक संख्या की है

इस अध्याय की सीमा

उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायपालिका अध्याय 4.5 में हैं; निर्वाचन आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, वित्त आयोग, संघ लोक सेवा आयोग तथा पंचायती राज एवं नगरीय शासन अध्याय 4.6 में; संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध तथा तीनों आपातकाल (अनुच्छेद 352, 356, 360) अध्याय 4.3 में; मौलिक अधिकार एवं नीति-निदेशक तत्व अध्याय 4.2 में। यहाँ केवल उतना संकेत है जितना कार्यपालिका-विधायिका को समझने के लिए अनिवार्य है।

1. राष्ट्रपति — निर्वाचन, अर्हता, महाभियोग एवं शक्तियाँ

1.1 संघीय कार्यपालिका का ढाँचा

संविधान का भाग V संघ से संबंधित है और उसका अध्याय I संघीय कार्यपालिका का। अनुच्छेद 52 केवल इतना कहता है — “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।” अनुच्छेद 53(1) संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है, जिसे वह स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से संविधान के अनुसार प्रयोग करेगा। अनुच्छेद 53(2) रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश (Supreme Command) राष्ट्रपति में निहित करता है — किंतु इसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा, अर्थात् युद्ध की घोषणा या शांति-स्थापना संसद की स्वीकृति के अधीन है।

संघीय कार्यपालिका में सम्मिलित हैं — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद तथा भारत का महान्यायवादी (अनुच्छेद 76)। ध्यान रहे कि व्यवहार में राष्ट्रपति नाममात्र (de jure) कार्यपालिका है और वास्तविक (de facto) कार्यपालिका मंत्रिपरिषद है — यही संसदीय शासन-पद्धति का सार है, जिसे संविधान अनुच्छेद 74 के माध्यम से लागू करता है।

1.2 निर्वाचक मंडल — अनुच्छेद 54

राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता सीधे नहीं करती; उसे एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) चुनता है, जिसमें केवल दो प्रकार के सदस्य होते हैं —

  1. संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य — लोक सभा तथा राज्य सभा;
  2. राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य;
  3. अनुच्छेद 54 का स्पष्टीकरण (70वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया) — इसमें राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा संघ राज्यक्षेत्र पुदुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भी सम्मिलित हैं।

जम्मू-कश्मीर का प्रश्न — अनुच्छेद 54 का स्पष्टीकरण नाम से केवल दिल्ली तथा पुदुचेरी का उल्लेख करता है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के संघ राज्यक्षेत्र बन जाने के बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 13 ने पुदुचेरी पर लागू अनुच्छेद 239क के उपबंध जम्मू-कश्मीर पर भी लागू कर दिए — इसी आधार पर यह माना जाता है कि वहाँ की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य भी निर्वाचक मंडल में आएँगे, यद्यपि अनुच्छेद 54 में संशोधन नहीं हुआ और यह बिंदु विधिवेत्ताओं में विवादित रहा है। व्यावहारिक प्रभाव स्पष्ट है: 2017 के निर्वाचन में सांसद के मत का मूल्य 708 था, किंतु 2022 में जम्मू-कश्मीर में विधान सभा गठित न होने के कारण यह घटकर 700 रह गया। 2024 में वहाँ विधान सभा के पुनर्गठन के बाद अगली गणना पुनः बदलेगी। परीक्षा के लिए निश्चित तथ्य यही है कि यह मूल्य 1971 की जनसंख्या तथा विधायकों की वास्तविक संख्या पर निर्भर है, अतः स्थिर नहीं है।

सावधानी — निर्वाचक मंडल में कौन नहीं है

1.3 निर्वाचन पद्धति — अनुच्छेद 55

अनुच्छेद 55 तीन बातें तय करता है — (1) विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में यथासंभव एकरूपता होगी; (2) राज्यों तथा संघ के बीच भी समता होगी; और (3) निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation by means of the Single Transferable Vote) पद्धति से, तथा मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होगा।

1. विधायक के मत का मूल्यराज्य की जनसंख्या ÷ विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या, फिर ÷ 1000 — शेष 500 या अधिक हो तो मूल्य में 1 जोड़ दिया जाता है
2. सांसद के मत का मूल्यसभी राज्यों के विधायकों के मतों का कुल मूल्य ÷ संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या — आधे से अधिक भिन्न को 1 गिना जाता है, शेष छोड़ दी जाती है
3. निर्वाचन कोटाकुल वैध मतों का मूल्य ÷ 2, फिर उसमें 1 जोड़ दें — इतने मूल्य का प्रथम वरीयता मत पाने वाला विजयी। न मिलने पर सबसे कम मत वाले की वरीयताएँ हस्तांतरित

“जनसंख्या” का अर्थ — अनुच्छेद 55 का स्पष्टीकरण कहता है कि इसका अर्थ वह अंतिम जनगणना है जिसके सुसंगत आँकड़े प्रकाशित हो चुके हों; किंतु 2026 के बाद होने वाली प्रथम जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक इसका अर्थ केवल 1971 की जनगणना है। (यह सीमा 84वें संविधान संशोधन, 2001 द्वारा 2000 से बढ़ाकर 2026 की गई थी।) इसी कारण आज भी राष्ट्रपति-चुनाव का गणित 1971 की जनसंख्या पर चलता है।

अनुच्छेद 71 — राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उठे सभी विवादों की जाँच एवं विनिश्चय उच्चतम न्यायालय करेगा और उसका निर्णय अंतिम होगा। अनुच्छेद 71(4) का निर्णायक बिंदु — निर्वाचक मंडल में किसी रिक्ति के आधार पर निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती। अर्थात् किसी राज्य की विधान सभा भंग हो, तब भी चुनाव रोका नहीं जाता।

1.4 अर्हताएँ, पद-शर्तें एवं पदावधि

1.5 महाभियोग — अनुच्छेद 61

राष्ट्रपति को केवल “संविधान के अतिक्रमण” (violation of the Constitution) के आधार पर हटाया जा सकता है — यह पद अकेला ऐसा है जिसके लिए संविधान महाभियोग शब्द का प्रयोग करता है। ध्यान दें कि “संविधान का अतिक्रमण” संविधान में कहीं परिभाषित नहीं है।

1. आरोप कहाँ सेसंसद का कोई भी सदन आरोप लगा सकता है — प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के कम-से-कम एक-चौथाई सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित हो तथा 14 दिन की लिखित सूचना दी गई हो
2. प्रथम सदन में पारितउस सदन की कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित — “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” नहीं, कुल सदस्य-संख्या
3. दूसरा सदन जाँच करेदूसरा सदन स्वयं आरोप की जाँच करेगा या कराएगा; राष्ट्रपति को उपस्थित होने एवं प्रतिनिधित्व का अधिकार है (वकील/महान्यायवादी के माध्यम से)
4. दूसरे सदन में संकल्पजाँच करने वाले सदन में भी कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित हो — पारित होते ही उसी तिथि से राष्ट्रपति पदच्युत
सावधानी — महाभियोग के चार भ्रम-बिंदु

1.6 राष्ट्रपति की शक्तियाँ — छह वर्गों में

सुमेलन-तालिका 1 : राष्ट्रपति की शक्तियाँ ↔ प्रमुख उपबंध
शक्ति-वर्गमुख्य अंशअनुच्छेद
कार्यकारीसंघ का समस्त कार्यपालक कार्य उसके नाम से; प्रधानमंत्री एवं अन्य मंत्रियों, महान्यायवादी, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, राज्यपालों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, राजदूतों की नियुक्ति; कार्य-संचालन के नियम बनाना; अंतर-राज्य परिषद का गठन53, 75, 76, 77, 155, 263, 324
विधायीसंसद का सत्र आहूत/सत्रावसान/लोक सभा का विघटन; अभिभाषण एवं संदेश; राज्य सभा में 12 सदस्यों का मनोनयन; कुछ विधेयकों के लिए पूर्व सिफ़ारिश; विधेयकों पर अनुमति/वीटो; अध्यादेश; CAG, UPSC, वित्त आयोग आदि के प्रतिवेदन सदन के पटल पर रखवाना85, 86, 87, 80(1)(क), 111, 123
वित्तीयवार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) सदन के समक्ष रखवाना; धन विधेयक केवल उसकी पूर्व सिफ़ारिश से पुरःस्थापित; अनुदान की कोई माँग उसकी सिफ़ारिश के बिना नहीं; आकस्मिकता निधि से अग्रिम; प्रत्येक पाँचवें वर्ष वित्त आयोग का गठन112, 117, 113(3), 267, 280
न्यायिकउच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति; क्षमादान आदि; विधि या तथ्य के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श (राय बाध्यकारी नहीं)124, 217, 72, 143
आपातकालीनराष्ट्रीय आपात, राष्ट्रपति शासन तथा वित्तीय आपात की उद्घोषणा (विस्तार अध्याय 4.3 में)352, 356, 360
राजनयिक एवं सैन्यअंतर्राष्ट्रीय संधियाँ एवं करार उसके नाम से (संसद के अनुमोदन के अधीन); अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व; रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश; थल, जल एवं वायु सेनाध्यक्षों की नियुक्ति53(2), 253
राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश किन विधेयकों के लिए अनिवार्य है

1.7 क्षमादान की शक्ति — अनुच्छेद 72

अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति के दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार देने अथवा दंडादेश को निलंबित, परिहार या लघुकृत करने की शक्ति देता है — तीन स्थितियों में: (क) जहाँ दंड सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिया गया हो; (ख) जहाँ अपराध संघ की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले किसी विधि-विषय से संबंधित हो; (ग) जहाँ दंडादेश मृत्युदंड हो।

सुमेलन-तालिका 2 : क्षमादान के पाँच रूप — अर्थ का भेद
रूपअंग्रेज़ीप्रभाव
क्षमाPardonदंड, दंडादेश एवं निरर्हताएँ — तीनों समाप्त; व्यक्ति ऐसा हो जाता है मानो कभी दोषसिद्ध ही न हुआ हो
लघुकरणCommutationदंड का स्वरूप बदलना — जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में, कठोर को साधारण कारावास में
परिहारRemissionदंड की अवधि घटाना, स्वरूप वही — जैसे दो वर्ष के कठोर कारावास को एक वर्ष का कठोर कारावास
विरामRespiteकिसी विशेष परिस्थिति के कारण कम दंड — जैसे गर्भवती स्त्री या शारीरिक अशक्तता
प्रविलंबनReprieveदंडादेश के निष्पादन पर अस्थायी रोक — प्रायः दया याचिका के निपटारे तक

राष्ट्रपति · अनुच्छेद 72

  • सेना न्यायालय द्वारा दिए दंड पर क्षमादान — हाँ
  • मृत्युदंड में क्षमा — हाँ; भारत में मृत्युदंड क्षमा करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास
  • संघ की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विधि-विषयों के अपराध
  • राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य विधि के अपराधों पर भी

राज्यपाल · अनुच्छेद 161

  • सेना न्यायालय के दंड पर क्षमादान — नहीं
  • मृत्युदंड को निलंबित, परिहार या लघुकृत कर सकता है, पर क्षमा नहीं (अनु. 72(3) यह शक्ति सुरक्षित रखता है)
  • केवल राज्य की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विधि-विषयों के अपराध
  • राज्यपाल की क्षमा राष्ट्रपति की क्षमा से छोटी है, समानांतर नहीं

1.8 अध्यादेश — अनुच्छेद 123

अध्यादेश राष्ट्रपति की सर्वाधिक विलक्षण विधायी शक्ति है — कार्यपालिका द्वारा विधि-निर्माण। यह उपबंध 1935 के भारत शासन अधिनियम से लिया गया है और इसका कोई समतुल्य ब्रिटेन या अमेरिका में नहीं है।

1.9 वीटो की शक्ति — अनुच्छेद 111

संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत होने पर उसके पास तीन विकल्प हैं — (1) अनुमति दे दे; (2) अनुमति रोक ले; अथवा (3) यदि वह धन विधेयक नहीं है तो उसे सदनों को पुनर्विचार के लिए लौटा दे। लौटाए गए विधेयक को यदि सदन संशोधन सहित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर दें, तो राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य है — अर्थात् वह इसे केवल एक बार लौटा सकता है।

वीटो के तीन प्रकार — भारत में “पूर्ण – निलंबनकारी – जेबी”

पूर्ण वीटो (Absolute) — अनुमति रोक लेना; विधेयक समाप्त। निलंबनकारी वीटो (Suspensive) — पुनर्विचार हेतु लौटाना; सदन पुनः पारित कर दें तो अनुमति अनिवार्य। जेबी वीटो (Pocket) — न अनुमति दे, न रोके, न लौटाए — अनिश्चित काल तक रोके रखे; संभव इसलिए है क्योंकि अनुच्छेद 111 कोई समय-सीमा नहीं देताअर्हक वीटो (Qualified veto) — जिसे विधानमंडल विशेष बहुमत से निरस्त कर सके — भारत में नहीं है, वह अमेरिकी राष्ट्रपति के पास है। यही इस विषय का सबसे बड़ा ट्रैप है।

सुमेलन-तालिका 3 : वीटो का प्रकार ↔ प्रसिद्ध उदाहरण
वीटोउदाहरणराष्ट्रपति एवं वर्ष
पूर्ण वीटोपेप्सू विनियोग विधेयक — पेप्सू में राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद से पारित, किंतु शासन हटने के बाद अनुमति रोक ली गईडॉ. राजेंद्र प्रसाद, 1954
पूर्ण वीटोसंसद सदस्य वेतन, भत्ता एवं पेंशन (संशोधन) विधेयक — लोक सभा के विघटन से ठीक पहले पारितआर. वेंकटरमन, 1991
जेबी वीटोभारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक — डाक पर सरकारी निगरानी का प्रावधान; न अनुमति दी गई, न लौटाया गयाज्ञानी ज़ैल सिंह, 1986
निलंबनकारी वीटोकोई भी गैर-धन विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाना — संसद पुनः पारित करे तो अनुमति बाध्यकारीअनुच्छेद 111 का परंतुक
सावधानी — वीटो के चार भ्रम
उत्तर प्रदेश संदर्भ — रायसीना पहाड़ी तक उत्तर प्रदेश का रास्ता
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह शक्ति तभी प्रयोग की जा सकती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों अथवा उनमें से कोई एक सत्र में न हो।
2. प्रत्येक अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा।
3. अध्यादेश उन्हीं विषयों पर प्रख्यापित किया जा सकता है जिन पर संसद विधि बना सकती है, किन्तु वह किसी मूल अधिकार का अतिक्रमण कर सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 123(1) के अनुसार अध्यादेश तभी प्रख्यापित हो सकता है जब दोनों सदन सत्र में न हों या कोई एक सत्र में न हो, तथा वह संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर समाप्त हो जाता है — अतः कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 123(3) के अनुसार अध्यादेश की विधायी शक्ति संसद की शक्ति के सह-विस्तृत है, इसलिए वह मूल अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता; अतः कथन 3 गलत है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): राज्यपाल की क्षमादान शक्ति राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति से संकुचित है।
कारण (R): राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता तथा सेना न्यायालय (कोर्ट मार्शल) द्वारा दिए गए दंड के संबंध में उसे क्षमादान की शक्ति प्राप्त नहीं है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति सेना न्यायालय के दंड तथा मृत्युदंड, दोनों के मामलों में क्षमा दे सकता है, जबकि अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को ये दोनों शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं। राज्यपाल मृत्युदंड का निलंबन, परिहार या लघुकरण अवश्य कर सकता है, किन्तु उसे क्षमा (pardon) नहीं कर सकता। अतः दोनों कथन सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।

प्र.3 सूची-I (राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रकार) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. क्षमा (Pardon)  B. लघुकरण (Commutation)  C. परिहार (Remission)  D. प्रविलंबन (Reprieve)
सूची-II: 1. दंड के स्वरूप में परिवर्तन किए बिना उसकी अवधि को घटा देना  2. दोषसिद्धि तथा दंड दोनों को समाप्त कर अपराधी को पूर्णतः दोषमुक्त कर देना  3. दंड के निष्पादन को कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से रोक देना  4. एक दंड के स्थान पर उससे हल्के प्रकार का दंड दे देना
कूट:

AA-2, B-4, C-1, D-3BA-4, B-2, C-3, D-1CA-2, B-4, C-3, D-1DA-4, B-2, C-1, D-3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 72 के अंतर्गत क्षमा (Pardon) दोषसिद्धि एवं दंड दोनों समाप्त कर देती है; लघुकरण (Commutation) में दंड का स्वरूप बदलकर हल्का कर दिया जाता है (यथा मृत्युदंड को कठोर कारावास में); परिहार (Remission) में दंड का स्वरूप वही रहता है, केवल अवधि घट जाती है; प्रविलंबन (Reprieve) दंड के निष्पादन पर अस्थायी रोक है। विराम (Respite) में विशेष परिस्थिति, यथा गर्भावस्था, के कारण कम दंड दिया जाता है। (UPPSC में बहु-पूछित अवधारणा)

2. उपराष्ट्रपति — निर्वाचन, पदच्युति एवं सभापति की भूमिका

2.1 पद की प्रकृति

उपराष्ट्रपति का पद अनुच्छेद 63 से आरंभ होता है — “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।” यह पद अमेरिकी संविधान से लिया गया है, पर एक निर्णायक अंतर के साथ: अमेरिका में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की मृत्यु पर शेष अवधि के लिए स्वयं राष्ट्रपति बन जाता है; भारत में वह केवल अधिकतम छह मास तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, उसके भीतर नया निर्वाचन अनिवार्य है।

उपराष्ट्रपति का मुख्य कार्य अनुच्छेद 64 में है — वह राज्य सभा का पदेन सभापति है। इसी कारण वह न लोक सभा का सदस्य होता है, न राज्य सभा का; वह राज्य सभा का सदस्य नहीं, केवल उसका पीठासीन अधिकारी है, और इसीलिए सामान्य मतदान में भाग नहीं लेता — मत बराबर होने पर केवल निर्णायक मत (casting vote) देता है। अनुच्छेद 64 का परंतुक कहता है कि जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा हो, तब वह सभापति के कर्तव्य नहीं निभाएगा और राज्य सभा के वेतन का हकदार नहीं होगा — उस अवधि में उसे राष्ट्रपति का वेतन मिलता है और सदन का संचालन उपसभापति करते हैं।

2.2 निर्वाचन — अनुच्छेद 66

2.3 हटाने की प्रक्रिया — अनुच्छेद 67(ख)

यह पूरे संविधान की सबसे अनोखी पदच्युति-प्रक्रिया है, और इसीलिए परीक्षा का स्थायी बिंदु —

1. केवल राज्य सभा में आरंभसंकल्प केवल राज्य सभा में प्रस्तुत हो सकता है — लोक सभा में नहीं। 14 दिन की पूर्व सूचना अनिवार्य
2. राज्य सभा में पारित“तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत” से — अर्थात् प्रभावी बहुमत (effective majority), न कि दो-तिहाई और न ही उपस्थित सदस्यों का बहुमत
3. लोक सभा की सहमतिलोक सभा उससे सहमत हो — वहाँ साधारण बहुमत पर्याप्त है
4. कोई आधार नहींसंविधान कोई आधार निर्धारित नहीं करता — “संविधान का अतिक्रमण” जैसी कोई शर्त यहाँ नहीं है; यह महाभियोग नहीं कहलाता
सावधानी — राष्ट्रपति बनाम उपराष्ट्रपति की पदच्युति

राष्ट्रपति

  • निर्वाचक मंडल — संसद के निर्वाचित सदस्य + राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य + दिल्ली, पुदुचेरी, जम्मू-कश्मीर
  • अर्हता — लोक सभा सदस्यता की अर्हता, 35 वर्ष
  • शपथ — भारत का मुख्य न्यायाधीश
  • त्यागपत्र — उपराष्ट्रपति को
  • हटाना — महाभियोग, अनु. 61, दोनों सदनों में 2/3 (कुल सदस्य-संख्या)
  • मत का मूल्य असमान — जनसंख्या-आधारित

उपराष्ट्रपति

  • निर्वाचक मंडल — संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (मनोनीत सहित); कोई विधायक नहीं
  • अर्हता — राज्य सभा सदस्यता की अर्हता, 35 वर्ष
  • शपथ — राष्ट्रपति
  • त्यागपत्र — राष्ट्रपति को
  • हटाना — अनु. 67(ख), राज्य सभा में प्रभावी बहुमत + लोक सभा की सहमति
  • सबका मत-मूल्य समान (एक सदस्य = एक मत)
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के साथ-साथ राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट सदस्य भी सम्मिलित होते हैं।
2. 70वें संविधान संशोधन के पश्चात राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भी इस निर्वाचक मंडल का भाग हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधान सभाओं के केवल निर्वाचित सदस्य होते हैं; नामनिर्दिष्ट सदस्य तथा विधान परिषद के सदस्य इसमें सम्मिलित नहीं होते — अतः कथन 1 गलत है। 70वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा दिल्ली तथा पुडुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को इसमें जोड़ा गया, अतः कथन 2 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से किन संकल्पों को पारित करने के लिए 'प्रभावी बहुमत' (Effective Majority) अपेक्षित है?
1. राज्य सभा में उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प
2. लोक सभा के अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प
3. राज्य सभा के उपसभापति को उसके पद से हटाने का संकल्प
4. उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने का समावेदन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रभावी बहुमत सदन की प्रभावी संख्या (कुल संख्या में से रिक्तियाँ घटाकर) के 50 प्रतिशत से अधिक होता है और इसका प्रयोग अनुच्छेद 67(ख), 90 तथा 94 के अधीन क्रमशः उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने में होता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए विशेष बहुमत (Special Majority) आवश्यक है, प्रभावी बहुमत नहीं। अतः केवल 1, 2 और 3 सही हैं।

प्र.3 भारत का उपराष्ट्रपति, जो राज्य सभा का पदेन सभापति भी होता है, किसके द्वारा निर्वाचित किया जाता है?

Aकेवल राज्य सभा के सदस्यों द्वाराBसंसद के दोनों सदनों के निर्वाचित एवं नामनिर्दिष्ट, दोनों प्रकार के सदस्यों द्वाराCसंसद के दोनों सदनों तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वाराDसंसद के दोनों सदनों के केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों — निर्वाचित तथा नामनिर्दिष्ट — से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है। राज्य विधानमंडलों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती, जो इसे राष्ट्रपति के निर्वाचन से अलग करता है। वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने 12 सितम्बर, 2025 को शपथ ली।

3. प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 74 से 78

3.1 अनुच्छेद 74 — सलाह देने वाली परिषद

अनुच्छेद 74(1) कहता है — “राष्ट्रपति की सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।” इस एक वाक्य में दो संशोधनों का इतिहास छिपा है —

1950मूल पाठ — “सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद होगी”; “सलाह के अनुसार कार्य करेगा” शब्द नहीं थे। सलाह की बाध्यता केवल परंपरा से थी
197642वाँ संविधान संशोधन — जोड़ा गया कि राष्ट्रपति सलाह के अनुसार कार्य करेगा। सलाह अब स्पष्ट रूप से बाध्यकारी
197844वाँ संविधान संशोधन — परंतुक जोड़ा: राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर पुनर्विचार करने को कह सकता है, किंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने को बाध्य है — “एक बार लौटाने” की शक्ति

अनुच्छेद 74(2) — यह प्रश्न कि मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी, किसी न्यायालय में जाँच का विषय नहीं होगा। न्यायालय यह पूछ सकता है कि सलाह दी गई थी या नहीं तथा उस पर आधारित कार्रवाई वैध है या नहीं, पर सलाह की अंतर्वस्तु नहीं। एस.आर. बोम्मई (1994) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 74(2) उन सामग्रियों को संरक्षण नहीं देता जिनके आधार पर सलाह दी गई — वे न्यायिक जाँच के लिए मँगाई जा सकती हैं।

शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) — सात न्यायाधीशों की पीठ ने अंतिम रूप से तय किया कि भारत का राष्ट्रपति तथा राज्यपाल संवैधानिक प्रधान हैं और अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह से ही करते हैं — “व्यक्तिगत संतुष्टि” का अर्थ “सरकार की संतुष्टि” है

3.2 अनुच्छेद 75 — नियुक्ति, सीमा एवं उत्तरदायित्व

सुमेलन-तालिका 4 : अनुच्छेद 75 के खंड ↔ उपबंध
खंडउपबंधपरीक्षा-बिंदु
75(1)प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा; अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगाप्रधानमंत्री “निर्वाचित” नहीं होता — नियुक्त होता है
75(1क)प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या लोक सभा के कुल सदस्यों के 15% से अधिक नहीं होगी91वाँ संविधान संशोधन, 2003 द्वारा जोड़ा; संघ के लिए कोई न्यूनतम नहीं; 543 का 15% = 81
75(1ख)दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के कारण निरर्हित सदस्य, निरर्हता की अवधि तक मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता91वाँ संशोधन, 2003 — “निरर्हित होकर पिछले दरवाज़े से मंत्री” का मार्ग बंद
75(2)मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगेयही व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का आधार — राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी मंत्री को हटा सकता है
75(3)मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगीकेवल लोक सभा — राज्य सभा के प्रति नहीं। अविश्वास प्रस्ताव इसीलिए केवल लोक सभा में
75(4)मंत्री को राष्ट्रपति पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएगा — तीसरी अनुसूची के प्रारूप मेंशपथ का प्रारूप तीसरी अनुसूची में है, संविधान के मुख्य भाग में नहीं
75(5)जो मंत्री लगातार छह मास तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगागैर-सदस्य को मंत्री बनाया जा सकता है, पर छह मास में सदन में आना होगा
75(6)मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते संसद निर्धारित करेगीये संचित निधि पर भारित नहीं, मतदेय हैं

3.3 सामूहिक एवं व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

सामूहिक उत्तरदायित्व (अनु. 75(3)) संसदीय शासन का मूल सिद्धांत है। इसके तीन व्यावहारिक अर्थ हैं — (1) मंत्रिमंडल का हर निर्णय सब मंत्रियों का निर्णय है, चाहे वे बैठक में असहमत रहे हों; (2) जो मंत्री निर्णय से असहमत हो और उसका सार्वजनिक बचाव न कर सके, उसका एकमात्र मार्ग त्यागपत्र है; (3) लोक सभा यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है — केवल उस मंत्री को नहीं जिसके विरुद्ध आरोप था, और उसमें वे मंत्री भी सम्मिलित हैं जो राज्य सभा से हैं।

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (अनु. 75(2)) — मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर हैं, और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी भी मंत्री को हटा सकता है। इसी से प्रधानमंत्री को वह पकड़ मिलती है जिसे “समान लोगों में प्रथम” (primus inter pares) से आगे बढ़ाकर “ग्रहों के बीच सूर्य” कहा गया।

3.4 मंत्रियों की श्रेणियाँ

सावधानी — मंत्रिपरिषद बनाम मंत्रिमंडल

3.5 प्रधानमंत्री — पद की शक्ति का स्रोत

उत्तर प्रदेश संदर्भ — प्रधानमंत्री-पद का सबसे बड़ा स्रोत

स्वतंत्रता के बाद से उत्तर प्रदेश ने नौ प्रधानमंत्री दिए हैं — देश में सर्वाधिक। इनमें चौधरी चरण सिंह (बागपत) का प्रसंग संवैधानिक दृष्टि से सबसे शिक्षाप्रद है: वे जुलाई 1979 में प्रधानमंत्री नियुक्त हुए, किंतु लोक सभा में कभी विश्वास मत का सामना नहीं किया — विश्वास मत से एक दिन पहले ही त्यागपत्र दे दिया। यह अनुच्छेद 75(3) के सामूहिक उत्तरदायित्व का सबसे चर्चित उदाहरण है। चंद्रशेखर (बलिया) दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनकी सरकार लोक सभा में समर्थन खोने पर गिरी। वी.पी. सिंह (फतेहपुर) ने 7 नवंबर 1990 को स्वयं विश्वास प्रस्ताव रखा और 142 बनाम 346 मतों से हार गए — भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था जब कोई सरकार लोक सभा में विश्वास मत हारी। ध्यान दें — यह विश्वास प्रस्ताव था, अविश्वास प्रस्ताव नहीं; दोनों में अंतर §5.5 में देखें।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 प्रधानमंत्री के पद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. संविधान के अनुच्छेद 74 के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
2. संविधान यह उपबंध करता है कि प्रधानमंत्री केवल लोक सभा का ही सदस्य हो सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)प्रधानमंत्री की नियुक्ति का उपबंध अनुच्छेद 75(1) में है; अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद से संबंधित है — अतः कथन 1 गलत है। प्रधानमंत्री संसद के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है; इंदिरा गांधी, एच. डी. देवेगौड़ा एवं डॉ. मनमोहन सिंह राज्य सभा के सदस्य रहते हुए प्रधानमंत्री बने — अतः कथन 2 भी गलत है।

प्र.2 अंतर्राज्यिक परिषद (Inter-State Council) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका गठन 1990 में सरकारिया आयोग की संस्तुति पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किया गया था।
2. इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित छह केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री इसके सदस्य होते हैं।
3. इसकी स्थायी समिति का अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 263 के अधीन अंतर्राज्यिक परिषद की स्थापना 28 मई 1990 के राष्ट्रपति के आदेश द्वारा सरकारिया आयोग की संस्तुति पर हुई; अतः कथन 1 सही है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्यमंत्री/प्रशासक एवं प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित छह केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री सदस्य होते हैं; अतः कथन 2 सही है। परिषद की स्थायी समिति (1996 में गठित) का अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होता है, वित्त मंत्री नहीं; अतः कथन 3 गलत है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश सम्मिलित नहीं हैं।
कारण (R): मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023 के अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)उच्चतम न्यायालय ने अनूप बरनवाल मामले (2023) में चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को रखने का निर्देश दिया था, किन्तु 2023 के अधिनियम ने उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा। इस प्रकार समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता (या एकल सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) तथा एक कैबिनेट मंत्री होते हैं; अतः दोनों कथन सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है। इसी प्रक्रिया से श्री ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया।

4. संसद — संरचना, सदस्यता, निरर्हता एवं दसवीं अनुसूची

4.1 संसद का अर्थ — अनुच्छेद 79

अनुच्छेद 79 की परिभाषा परीक्षा में सर्वाधिक चूकी जाने वाली पंक्ति है — “संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम क्रमशः राज्य सभा और लोक सभा होंगे।” अर्थात् राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है, यद्यपि वह किसी सदन का सदस्य नहीं है और सदन की बैठकों में नहीं बैठता। उसके बिना कोई विधेयक अधिनियम नहीं बन सकता। यह ब्रिटिश परंपरा (King-in-Parliament) से लिया गया है और अमेरिका से भिन्न है, जहाँ राष्ट्रपति विधानमंडल का अंग नहीं है।

4.2 राज्य सभा — अनुच्छेद 80

4.3 लोक सभा — अनुच्छेद 81

लोक सभा · House of the People

  • अधिकतम 550 (530 + 20); वर्तमान 543
  • प्रत्यक्ष निर्वाचन, वयस्क मताधिकार
  • न्यूनतम आयु 25 वर्ष (अनु. 84)
  • अवधि 5 वर्ष; विघटित की जा सकती है
  • पीठासीन — अध्यक्ष (Speaker), जो स्वयं सदन का सदस्य होता है
  • मंत्रिपरिषद इसी के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी; अविश्वास प्रस्ताव केवल यहीं
  • धन विधेयक केवल यहाँ पुरःस्थापित; धन विधेयक पर अंतिम शक्ति इसी की
  • संयुक्त बैठक में संख्या-बल अधिक, इसलिए निर्णायक
  • स्थगन प्रस्ताव यहाँ मान्य है

राज्य सभा · Council of States

  • अधिकतम 250 (238 + 12 मनोनीत); वर्तमान 245
  • अप्रत्यक्ष निर्वाचन — विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा, खुली मतपत्र से
  • न्यूनतम आयु 30 वर्ष (अनु. 84)
  • स्थायी सदन — विघटित नहीं होती; 1/3 सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त
  • पीठासीन — सभापति (उपराष्ट्रपति), जो सदन का सदस्य नहीं
  • मंत्रिपरिषद इसके प्रति उत्तरदायी नहीं; यह सरकार गिरा नहीं सकती
  • धन विधेयक केवल 14 दिन रोक सकती है, सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं
  • दो विशेष शक्तियाँ — अनु. 249 (राज्य सूची के विषय पर संसद को विधि-शक्ति) तथा अनु. 312 (नई अखिल भारतीय सेवा) — विस्तार 4.3 में
  • स्थगन प्रस्ताव यहाँ नहीं; उसके स्थान पर “विशेष उल्लेख” (Special Mention)

4.4 अर्हताएँ एवं निरर्हताएँ

सुमेलन-तालिका 5 : सदस्यता संबंधी अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेदविषयनिर्णायक बिंदु
84संसद-सदस्यता की अर्हताभारत का नागरिक; निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ; राज्य सभा हेतु 30 वर्ष, लोक सभा हेतु 25 वर्ष; संसद द्वारा विहित अन्य अर्हताएँ
101स्थानों का रिक्त होनादोहरी सदस्यता — दोनों सदनों में चुने जाने पर 10 दिन में विकल्प; संसद एवं राज्य विधानमंडल दोनों में चुने जाने पर 14 दिन में राज्य का स्थान रिक्त; 60 दिन तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहने पर सदन स्थान रिक्त घोषित कर सकता है
102निरर्हताएँ(क) लाभ का पद; (ख) विकृतचित्त घोषित; (ग) अनुन्मोचित दिवालिया; (घ) भारत का नागरिक न रहना या विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से लेना; (ङ) संसद द्वारा बनाई विधि के अधीन निरर्हित; 102(2)दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता
103निरर्हता संबंधी प्रश्न का विनिश्चयअनु. 102(1) के आधारों पर प्रश्न राष्ट्रपति तय करेगा — और वह निर्वाचन आयोग की राय लेगा तथा उसी के अनुसार कार्य करेगाकिंतु दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता का प्रश्न सभापति/अध्यक्ष तय करते हैं
104शपथ से पूर्व बैठने का दंडशपथ लिए बिना, या निरर्हित होते हुए बैठने/मत देने पर प्रत्येक दिन के लिए ₹500 का दंड
105विशेषाधिकारसंसद में वाक्-स्वातंत्र्य; सदन में कही बात या दिए मत के लिए किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं; कार्यवाही के प्रकाशन पर संरक्षण
106वेतन एवं भत्तेसंसद विधि द्वारा निर्धारित करेगी — अर्थात् सांसद अपना वेतन स्वयं तय करते हैं
122कार्यवाही की वैधतासंसद की कार्यवाही की वैधता प्रक्रिया की कथित अनियमितता के आधार पर न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जा सकती

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 कुछ अपराधों में दोषसिद्धि पर निरर्हता लगाती है। लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 8(4) — जो वर्तमान सदस्यों को अपील लंबित रहने तक संरक्षण देती थी — को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अब दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास की सज़ा पाते ही सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है, और रिहाई के बाद छह वर्ष तक निरर्हता बनी रहती है।

4.5 दसवीं अनुसूची — दल-बदल विरोधी विधि

दसवीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ी गई और इसी से अनुच्छेद 102(2) तथा 191(2) जुड़े। इसका उद्देश्य “आया राम गया राम” की राजनीति रोकना था।

सुमेलन-तालिका 6 : दल-बदल के आधार ↔ किस पर लागू
आधारकिस सदस्य पर
अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग देनानिर्वाचित (दलीय) सदस्य
दल के निदेश (whip) के विरुद्ध मत देना या मतदान से अनुपस्थित रहना — बशर्ते दल ने 15 दिन के भीतर क्षमा न कर दी होनिर्वाचित (दलीय) सदस्य
निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जानानिर्दलीय सदस्य
मनोनयन की तिथि से छह मास बीत जाने के बाद किसी दल में सम्मिलित होनामनोनीत सदस्य — छह मास के भीतर सम्मिलित होना अनुमत है
सावधानी — दसवीं अनुसूची के चार प्रिय ट्रैप
उत्तर प्रदेश संदर्भ — संसद में सबसे बड़ा राज्य
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 संविधान की दसवीं अनुसूची के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 91वें संविधान संशोधन अधिनियम ने विलय (Merger) के आधार पर मिलने वाली छूट को समाप्त कर दिया।
2. यदि किसी दल के विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय पर सहमत हो जाएँ तो वे निरर्हित नहीं होंगे।
3. कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य यदि निर्वाचन के पश्चात किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है तो वह निरर्हित हो जाएगा।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने दसवीं अनुसूची के पैरा 3 का लोप कर 'विभाजन' (एक-तिहाई सदस्य) वाली छूट समाप्त की थी, विलय वाली छूट नहीं — अतः कथन 1 गलत है। पैरा 4 के अनुसार मूल दल के विलय पर यदि विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों तो निरर्हता नहीं होती — कथन 2 सही है। निर्दलीय सदस्य द्वारा निर्वाचन के पश्चात किसी दल में सम्मिलित होने पर निरर्हता होती है, जबकि नामनिर्दिष्ट सदस्य छह मास के भीतर किसी दल में सम्मिलित हो सकता है — कथन 3 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. लिली थॉमस वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) का अपास्त किया जाना
2. निर्वाचक बॉण्ड योजना का अधिसूचित होना
3. दसवीं अनुसूची से 'विभाजन' (Split) संबंधी अपवाद का लोप
4. उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्वाचक बॉण्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया जाना
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 3, 2, 4B3, 1, 4, 2C1, 3, 4, 2D3, 1, 2, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)91वें संविधान संशोधन (2003) ने दसवीं अनुसूची के पैरा 3 का लोप कर एक-तिहाई सदस्यों के 'विभाजन' वाली छूट समाप्त की; लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में धारा 8(4) अपास्त हुई जिससे दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि तत्काल निरर्हित होने लगे; निर्वाचक बॉण्ड योजना जनवरी 2018 में अधिसूचित हुई; तथा 15 फरवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशीय पीठ ने उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। अतः सही अनुक्रम 3, 1, 2, 4 है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल संबंधी निरर्हता पर पीठासीन अधिकारी का विनिश्चय न्यायिक पुनर्विलोकन से पूर्णतः परे है।
कारण (R): किहोतो होलोहन वाद (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के पैरा 7 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्लू (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के पैरा 7 को — जो न्यायालयों की अधिकारिता का पूर्ण वर्जन करता था — अवैध ठहराया और अभिनिर्धारित किया कि पीठासीन अधिकारी इस मामले में अधिकरण की भाँति कार्य करता है, अतः उसका विनिश्चय सीमित न्यायिक पुनर्विलोकन (दुर्भावना, विकृतता, संवैधानिक आदेश की अवहेलना आदि के आधार पर) के अधीन है। अतः (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।

5. संसदीय प्रक्रिया — सत्र, गणपूर्ति, प्रश्नकाल एवं प्रस्ताव

5.1 सत्र — अनुच्छेद 85, 86 एवं 87

सुमेलन-तालिका 7 : सत्र-संबंधी तीन अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंधनिर्णायक बिंदु
85(1)राष्ट्रपति समय-समय पर प्रत्येक सदन को आहूत (summon) करेगाशर्त — एक सत्र की अंतिम बैठक तथा अगले सत्र की प्रथम बैठक के बीच छह मास से अधिक का अंतराल नहीं। अर्थात् वर्ष में कम-से-कम दो सत्र अनिवार्य हैं (“तीन सत्र” केवल परंपरा है, संविधान की शर्त नहीं)
85(2)राष्ट्रपति किसी भी सदन का सत्रावसान (prorogue) कर सकता है तथा लोक सभा का विघटन (dissolve) कर सकता हैसत्रावसान की शक्ति राष्ट्रपति की; स्थगन (adjournment) की शक्ति पीठासीन अधिकारी की
86राष्ट्रपति को किसी भी सदन में या दोनों की संयुक्त बैठक में अभिभाषण देने तथा किसी सदन को संदेश भेजने का अधिकारसंदेश विधेयक से संबंधित भी हो सकता है, और सदन उस पर शीघ्र विचार करेगा
87विशेष अभिभाषण — राष्ट्रपति दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करेगाकेवल दो अवसरों पर — (1) प्रत्येक आम चुनाव के बाद के प्रथम सत्र के आरंभ में; (2) प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में। प्रथम संविधान संशोधन, 1951 से पहले यह हर सत्र के आरंभ में अनिवार्य था

5.2 प्रश्नकाल — सदन का सबसे तीखा घंटा

बैठक का पहला घंटा प्रश्नकाल होता है। यह संविधान में नहीं, प्रक्रिया-नियमों में है, और इसी में कार्यपालिका की सर्वाधिक प्रत्यक्ष जवाबदेही तय होती है। प्रश्न की सूचना सामान्यतः 15 दिन पूर्व देनी होती है।

सुमेलन-तालिका 8 : प्रश्नों के प्रकार
प्रकारपहचानउत्तरअनुपूरक प्रश्न
तारांकित प्रश्न (Starred)तारांकित (*) चिह्नमौखिक, सदन मेंपूछे जा सकते हैं; लोक सभा में एक दिन में अधिकतम 20
अतारांकित प्रश्न (Unstarred)कोई तारांक नहींलिखित, पटल पर रखा जाता हैनहीं; लोक सभा में एक दिन में अधिकतम 230
अल्प सूचना प्रश्न (Short Notice)अत्यावश्यक लोक महत्व का विषयमौखिकसामान्य 10 दिन से कम सूचना पर; मंत्री की सहमति आवश्यक
गैर-सरकारी सदस्य से प्रश्नकिसी विधेयक/संकल्प का प्रभारी सदस्यवही सदस्य देता है, मंत्री नहींसदन के कार्य से संबंधित विषय पर

5.3 शून्यकाल — भारतीय नवाचार

शून्यकाल (Zero Hour) प्रश्नकाल की समाप्ति के तुरंत बाद आरंभ होता है और इसमें सदस्य बिना पूर्व सूचना अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय उठाते हैं। इसकी तीन विशेषताएँ याद रखें — (1) यह प्रक्रिया-नियमों में कहीं उल्लिखित नहीं है, अतः यह अनौपचारिक युक्ति है; (2) यह भारतीय संसदीय पद्धति का अपना आविष्कार है, जो 1962 से चलन में आया; (3) इसकी कोई निश्चित अवधि नहीं है।

सावधानी — दोनों सदनों में समय अलग-अलग है

5.4 प्रस्तावों के प्रकार

सदन में कोई भी विषय प्रस्ताव (motion) के रूप में ही आता है। प्रस्ताव तीन मूल श्रेणियों में बाँटे जाते हैं — मूल प्रस्ताव (Substantive) जो स्वयं में पूर्ण हो; स्थानापन्न प्रस्ताव (Substitute) जो किसी मूल प्रस्ताव का विकल्प हो; तथा सहायक प्रस्ताव (Subsidiary) जो अकेले खड़ा न हो सके। नीचे वे प्रस्ताव हैं जिन पर प्रश्न बनता है —

सुमेलन-तालिका 9 : प्रस्ताव ↔ प्रयोजन एवं शर्तें
प्रस्तावप्रयोजनशर्त / विशेषता
स्थगन प्रस्ताव
Adjournment Motion
अत्यावश्यक लोक महत्व के निश्चित विषय पर चर्चा हेतु सदन का सामान्य कार्य रोकना50 सदस्यों का समर्थन; इसमें निंदा का तत्व निहित है, इसीलिए केवल लोक सभा में; चर्चा कम-से-कम ढाई घंटे की
अविश्वास प्रस्ताव
No-Confidence Motion
मंत्रिपरिषद को पद से हटाना50 सदस्यों का समर्थन; केवल लोक सभा में (अनु. 75(3)); कोई कारण बताना आवश्यक नहीं; पारित होने पर पूरी मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे
विश्वास प्रस्ताव
Confidence Motion
सरकार स्वयं अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए लाती हैप्रक्रिया-नियमों में अलग से नहीं; गठबंधन-युग की उपज। हारने पर सरकार गिरती है
निंदा प्रस्ताव
Censure Motion
किसी एक मंत्री, मंत्रि-समूह या पूरी मंत्रिपरिषद की किसी विशेष नीति/कार्य की निंदाकारण बताना अनिवार्य; दोनों सदनों में लाया जा सकता है; पारित होने पर सरकार को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं
धन्यवाद प्रस्ताव
Motion of Thanks
राष्ट्रपति के अभिभाषण (अनु. 87) पर चर्चा एवं धन्यवादइसका पारित होना अनिवार्य है — न पारित होना सरकार की पराजय मानी जाती है
विशेषाधिकार प्रस्ताव
Privilege Motion
किसी मंत्री द्वारा सदन/सदस्य के विशेषाधिकार के हनन परकोई भी सदस्य ला सकता है; उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
Calling Attention
मंत्री का ध्यान किसी अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय पर खींचकर वक्तव्य माँगनाभारतीय संसदीय नवाचार, 1954 से; दोनों सदनों में; स्थगन प्रस्ताव के विपरीत इसमें निंदा का तत्व नहीं
कार्य-स्थगन/समापन प्रस्ताव
Closure Motion
चर्चा समाप्त कर मतदान करानाचार रूप — साधारण, कंगारू, गुलेटिन (Guillotine) तथा प्रश्न-समूहीकरण (Compartment)
किसी दिन के लिए नियत न किया गया प्रस्तावअध्यक्ष द्वारा स्वीकृत, पर चर्चा की तिथि अभी तय नहीं“No-day-yet-named motion”
अल्पकालिक चर्चा (नियम 193)अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय पर दो घंटे की चर्चान कोई औपचारिक प्रस्ताव, न मतदान; सप्ताह में दो दिन
आधे घंटे की चर्चापर्याप्त सार्वजनिक महत्व वाले किसी उत्तर में उठे विषय परसप्ताह में तीन दिन; कोई मतदान नहीं
कौन-सा प्रस्ताव किस सदन में “अ-स्थ केवल लोक में, नि-ध्या दोनों में”

विश्वास तथा स्थगन प्रस्ताव — केवल लोक सभा में (क्योंकि सरकार केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, और दोनों में निंदा/अविश्वास का तत्व है)। निंदा प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, विशेषाधिकार प्रस्ताव तथा धन्यवाद प्रस्ताव — दोनों सदनों में। और कटौती प्रस्ताव भी केवल लोक सभा में, क्योंकि अनुदान की माँगें केवल वहीं मतदेय हैं।

5.5 अविश्वास बनाम निंदा — एक शब्द का अंतर

अविश्वास प्रस्ताव

  • केवल लोक सभा में
  • कारण बताना आवश्यक नहीं
  • केवल पूरी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध — किसी एक मंत्री के विरुद्ध नहीं
  • पारित होने पर मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना ही होगा
  • 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक

निंदा प्रस्ताव

  • दोनों सदनों में
  • कारण बताना अनिवार्य — किस नीति/कार्य की निंदा
  • एक मंत्री, मंत्रि-समूह या पूरी परिषद — किसी के भी विरुद्ध
  • पारित होने पर त्यागपत्र आवश्यक नहीं; यह केवल नैतिक भर्त्सना है
  • ऐसी कोई न्यूनतम समर्थन-संख्या निर्धारित नहीं

5.6 कटौती प्रस्ताव — अनुदान की माँगों पर

बजट की चौथी अवस्था में जब लोक सभा अनुदान की माँगों पर मतदान करती है, तब विपक्ष कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) के माध्यम से सरकार को घेरता है। ये केवल लोक सभा में, केवल मतदेय व्यय पर, और केवल अध्यक्ष की अनुमति से आते हैं। तीन प्रकार हैं —

सुमेलन-तालिका 10 : तीन कटौती प्रस्ताव ↔ राशि ↔ प्रयोजन
प्रस्तावप्रस्तावित राशिप्रयोजन
नीति-निंदा कटौती
Policy Cut
“माँग की राशि घटाकर ₹1 कर दी जाए”माँग के मूल में निहित नीति की पूर्ण अस्वीकृति; प्रस्तावक नीति का विकल्प भी सुझा सकता है
मितव्ययिता कटौती
Economy Cut
“माँग की राशि एक निर्दिष्ट राशि से घटाई जाए”व्यय में बचत संभव है — मितव्ययिता का सुझाव; राशि एकमुश्त या किसी मद-विशेष की हो सकती है
सांकेतिक कटौती
Token Cut
“माँग की राशि ₹100 कम की जाए”भारत सरकार के उत्तरदायित्व के क्षेत्र की किसी विशिष्ट शिकायत को व्यक्त करना

कटौती प्रस्ताव का पारित होना सरकार के विरुद्ध अविश्वास के बराबर माना जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि लोक सभा ने सरकार की माँग अस्वीकार कर दी। व्यवहार में बहुमत वाली सरकार के काल में ये कभी पारित नहीं होते — इनका महत्व चर्चा का अवसर देने में है।

गुलेटिन (Guillotine) — समय की तलवार

अनुदान की माँगों पर चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन, अध्यक्ष शेष सभी माँगों को — चर्चा हुई हो या नहीं — एक साथ मतदान के लिए रख देता है। इसे गुलेटिन कहते हैं। व्यवहार में लोक सभा प्रायः 80–90% माँगें इसी तरह पारित करती है; यही कारण है कि विभागीय स्थायी समितियों द्वारा माँगों की पूर्व-संवीक्षा इतनी महत्वपूर्ण है (§8 देखें)।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (संसदीय प्रस्ताव) को सूची-II (विशेषता) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. अविश्वास प्रस्ताव  B. निंदा प्रस्ताव  C. स्थगन प्रस्ताव  D. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
सूची-II: 1. सदन का सामान्य कार्य रोककर अविलंबनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा; इसमें निंदा का तत्व अंतर्निहित होता है  2. केवल लोक सभा में ग्राह्य; समस्त मंत्रिपरिषद के विरुद्ध; कारण बताना आवश्यक नहीं  3. कारणों का उल्लेख आवश्यक; किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी लाया जा सकता है तथा राज्य सभा में भी ग्राह्य  4. मंत्री का ध्यान अविलंबनीय लोक महत्व के विषय की ओर आकृष्ट करना; यह भारतीय संसदीय प्रणाली का नवाचार है
कूट:

AA-3, B-2, C-4, D-1BA-2, B-3, C-4, D-1CA-2, B-3, C-1, D-4DA-3, B-2, C-1, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में, समस्त मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जाता है और उसमें कारण बताना आवश्यक नहीं; उसे कम-से-कम 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए। निंदा प्रस्ताव में कारण बताना अनिवार्य है, यह किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी लाया जा सकता है तथा राज्य सभा में भी ग्राह्य है। स्थगन प्रस्ताव सदन का सामान्य कार्य रोककर अविलंबनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा हेतु लाया जाता है और उसमें निंदा का तत्व निहित होता है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव भारतीय संसदीय व्यवहार का नवाचार है।

प्र.2 सूची-I (संसदीय उपकरण) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. नीति कटौती प्रस्ताव  B. मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव  C. सांकेतिक कटौती प्रस्ताव  D. लेखानुदान
सूची-II: 1. माँग की राशि में 100 रुपये की कटौती, जो कोई विशिष्ट शिकायत व्यक्त करती है  2. नए वित्तीय वर्ष के प्रारंभिक भाग के व्यय हेतु लोक सभा द्वारा अग्रिम अनुदान  3. माँग की राशि घटाकर 1 रुपया कर देना, जो अंतर्निहित नीति की अस्वीकृति दर्शाता है  4. माँग की राशि में एक निश्चित रकम की कटौती, जो मितव्ययिता के उद्देश्य से की जाती है
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)नीति कटौती प्रस्ताव में माँग की राशि घटाकर 1 रुपया कर दी जाती है, जो नीति की पूर्ण अस्वीकृति का प्रतीक है। मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव में एक निश्चित रकम की कटौती की जाती है और सांकेतिक कटौती प्रस्ताव में 100 रुपये की कटौती द्वारा किसी विशिष्ट शिकायत की ओर ध्यान आकृष्ट किया जाता है। लेखानुदान (अनुच्छेद 116) नए वित्तीय वर्ष के प्रारंभिक भाग के व्यय हेतु दिया गया अग्रिम अनुदान है।

प्र.3 सूची-I (संसदीय पद) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. गिलोटिन  B. व्यवस्था का प्रश्न  C. समापन प्रस्ताव  D. विशेषाधिकार प्रस्ताव
सूची-II: 1. चल रही चर्चा को समाप्त कर विषय को तुरंत मतदान हेतु रखने का प्रस्ताव  2. सदन की प्रक्रिया संबंधी नियमों के उल्लंघन की ओर ध्यान दिलाना; इस पर कोई चर्चा नहीं होती  3. सदन अथवा उसके किसी सदस्य के विशेषाधिकार के हनन पर निंदा के आशय से लाया जाने वाला प्रस्ताव  4. नियत समय पूरा हो जाने पर अनुदान की शेष माँगों को बिना चर्चा मतदान हेतु रख देना
कूट:

AA-2, B-4, C-3, D-1BA-4, B-2, C-1, D-3CA-2, B-4, C-1, D-3DA-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)गिलोटिन वह प्रक्रिया है जिसमें अनुदान माँगों पर चर्चा के लिए नियत अंतिम दिन शेष सभी माँगों को बिना चर्चा मतदान हेतु रख दिया जाता है। 'व्यवस्था का प्रश्न' सदन की प्रक्रिया के नियमों के उल्लंघन पर उठाया जाता है और उस पर चर्चा नहीं होती। समापन प्रस्ताव चर्चा समाप्त कर तत्काल मतदान कराने हेतु लाया जाता है, जबकि विशेषाधिकार प्रस्ताव सदन या सदस्य के विशेषाधिकार के हनन पर निंदा के आशय से प्रस्तुत होता है।

6. विधायी प्रक्रिया — विधेयकों के प्रकार एवं संयुक्त बैठक

6.1 विधेयकों का वर्गीकरण

संसद में आने वाला हर विधेयक दो दृष्टियों से वर्गीकृत होता है — प्रस्तुतकर्ता के आधार पर (सरकारी विधेयक बनाम गैर-सरकारी सदस्य का विधेयक) तथा विषय-वस्तु के आधार पर (साधारण, धन, वित्त तथा संविधान संशोधन विधेयक)। परीक्षा दूसरी दृष्टि पर टिकी है।

साधारण विधेयक · अनु. 107

  • किसी भी सदन में पुरःस्थापित
  • मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य — दोनों ला सकते हैं
  • राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश आवश्यक नहीं
  • दूसरा सदन इसे अस्वीकार या संशोधित कर सकता है, या छह मास तक रोक सकता है
  • गतिरोध पर संयुक्त बैठक (अनु. 108)संभव
  • राष्ट्रपति अनुमति दे, रोके या पुनर्विचार हेतु लौटाए

धन विधेयक · अनु. 110

  • केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से
  • केवल मंत्री ला सकता है
  • अनु. 110(1) के सात विषयों (क–छ) तक सीमित
  • राज्य सभा इसे अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती; 14 दिन में लौटाना अनिवार्य; उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं
  • संयुक्त बैठक का प्रश्न ही नहीं उठता
  • राष्ट्रपति अनुमति दे या रोके — लौटा नहीं सकता

वित्त विधेयक · अनु. 117

  • श्रेणी I — अनु. 117(1): अनु. 110 के विषय तथा अन्य विषय भी। केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से — यहाँ तक धन विधेयक जैसा
  • किंतु आगे साधारण विधेयक जैसा — राज्य सभा इसे अस्वीकार/संशोधित कर सकती है, और संयुक्त बैठक हो सकती है
  • श्रेणी II — अनु. 117(3): केवल संचित निधि से व्यय अंतर्ग्रस्त करता है, अनु. 110 का कोई विषय नहीं
  • किसी भी सदन में पुरःस्थापित; सिफ़ारिश पुरःस्थापन के लिए नहीं, पारित करने के लिए चाहिए
  • हर धन विधेयक वित्त विधेयक है, पर हर वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं

6.2 साधारण विधेयक का मार्ग — पाँच अवस्थाएँ

1. प्रथम वाचनपुरःस्थापन हेतु अनुमति; विधेयक का नाम एवं उद्देश्य पढ़ा जाता है; कोई चर्चा नहीं; राजपत्र में प्रकाशन। (राजपत्र में पूर्व-प्रकाशन हो चुका हो तो अनुमति की आवश्यकता नहीं)
2. द्वितीय वाचन — तीन उप-चरण(क) सामान्य चर्चा — सिद्धांत पर; यहीं तय होता है कि विधेयक प्रवर समिति, संयुक्त समिति, जनमत जानने या सीधे विचार में जाए। (ख) समिति अवस्था — खंडवार जाँच, प्रतिवेदन। (ग) विचार अवस्था — सदन में खंड-दर-खंड विचार एवं संशोधनों पर मतदान
3. तृतीय वाचन“विधेयक पारित किया जाए” पर मतदान; अब केवल औपचारिक/परिणामी संशोधन ही स्वीकार्य; उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत
4. दूसरे सदन मेंवही तीन वाचन। दूसरा सदन चार में से कुछ भी कर सकता है — पारित करे; संशोधन सहित लौटाए; अस्वीकार कर दे; या छह मास तक कोई कार्रवाई न करे (यही गतिरोध है)
5. राष्ट्रपति की अनुमति — अनु. 111अनुमति दे → अधिनियम; अनुमति रोक ले → समाप्त; पुनर्विचार हेतु लौटाए → सदन पुनः पारित करें तो अनुमति देना बाध्यकारी

6.3 धन विधेयक का मार्ग — जहाँ रास्ता अलग हो जाता है

1. केवल लोक सभाराष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से केवल लोक सभा में पुरःस्थापित; केवल मंत्री द्वारा। विधेयक पर अध्यक्ष का प्रमाणन (अनु. 110(4)) अंकित होता है
2. लोक सभा में पारितसाधारण बहुमत से; फिर अध्यक्ष के प्रमाणपत्र सहित राज्य सभा को भेजा जाता है (अनु. 109(1))
3. राज्य सभा — केवल 14 दिनवह इसे अस्वीकार नहीं कर सकती, संशोधित नहीं कर सकती — केवल सिफ़ारिशें कर सकती है और 14 दिन के भीतर लौटाना अनिवार्य
4. लोक सभा की इच्छा सर्वोपरिसिफ़ारिशें स्वीकार करे तो उन्हीं सहित, अस्वीकार करे तो मूल रूप में — दोनों दशाओं में विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है। 14 दिन में न लौटाए तो भी पारित माना जाएगा (अनु. 109(5))
5. राष्ट्रपतिअनुमति दे या रोके — पुनर्विचार हेतु लौटा नहीं सकता, क्योंकि विधेयक उसी की सिफ़ारिश से आया था
सावधानी — धन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं होती

6.4 संयुक्त बैठक — अनुच्छेद 108

6–9 मई 1961दहेज प्रतिषेध विधेयक — पहली संयुक्त बैठक; संशोधनों पर असहमति; राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा आहूत; परिणाम — दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
16 मई 1978बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक — राज्य सभा ने विधेयक अस्वीकार कर दिया था; जनता पार्टी सरकार के काल में दूसरी संयुक्त बैठक
26 मार्च 2002आतंकवाद निवारण विधेयक (POTA) — तीसरी एवं अब तक की अंतिम संयुक्त बैठक; 425 बनाम 296 मतों से पारित
तीनों संयुक्त बैठकें — क्रम में “दहेज – बैंक – आतंक”

दहेज प्रतिषेध विधेयक (1961) → बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक (1978) → आतंकवाद निवारण विधेयक/POTA (2002)। तीनों के वर्ष 1961, 1978, 2002 — कालक्रम प्रश्न में यही तीन तिथियाँ आती हैं। ध्यान रहे कि दूसरी बैठक में विधेयक अस्वीकार हुआ था, पहली में संशोधनों पर असहमति थी।

6.5 संविधान संशोधन विधेयक — संक्षेप में

(विस्तार अध्याय 4.1 में है; यहाँ केवल वह जो विधायी प्रक्रिया की तुलना के लिए आवश्यक है।) अनुच्छेद 368 के अधीन ऐसा विधेयक किसी भी सदन में पुरःस्थापित हो सकता है, राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश की आवश्यकता नहीं, और इसे प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत — अर्थात् उस सदन की कुल सदस्य-संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत — से पारित होना चाहिए। संघीय ढाँचे को छूने वाले उपबंधों के लिए आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी चाहिए (यहाँ साधारण बहुमत पर्याप्त है, और अनुसमर्थन के लिए कोई समय-सीमा नहीं)। 24वें संशोधन, 1971 के बाद राष्ट्रपति को अनुमति देनी ही होगी

6.6 विधेयकों का व्यपगत होना (Lapsing)

लोक सभा के विघटन पर कौन-सा विधेयक मरता है और कौन-सा जीवित रहता है — यह UPPSC का स्थायी सुमेलन-प्रश्न है। मूल तर्क एक ही है: राज्य सभा स्थायी सदन है, इसलिए जो कुछ उसकी गोद में है वह नहीं मरता; और जिस विधेयक की यात्रा दोनों सदनों में पूरी हो चुकी है, वह भी नहीं मरता।

सुमेलन-तालिका 11 : लोक सभा के विघटन पर विधेयक की स्थिति
विधेयक की स्थितिपरिणाम
लोक सभा में लंबित (पारित नहीं हुआ)व्यपगत
लोक सभा द्वारा पारित, किंतु राज्य सभा में लंबितव्यपगत
राज्य सभा में लंबित, जो लोक सभा द्वारा पारित नहीं हुआ (उसी में पुरःस्थापित था)व्यपगत नहीं
दोनों सदनों द्वारा पारित, राष्ट्रपति की अनुमति लंबितव्यपगत नहीं
दोनों सदनों द्वारा पारित, किंतु राष्ट्रपति ने पुनर्विचार हेतु लौटायाव्यपगत नहीं
असहमति के कारण लंबित, और राष्ट्रपति ने विघटन से पूर्व संयुक्त बैठक की सूचना दे दी होव्यपगत नहीं
व्यपगत होने का नियम — एक वाक्य में “जो लोक सभा की गोद में था, वही मरा”

विघटन से केवल वही विधेयक मरते हैं जिनका अंतिम पड़ाव लोक सभा से जुड़ा था — अर्थात् (1) लोक सभा में लंबित, और (2) लोक सभा से पारित होकर राज्य सभा में लंबित। शेष सब — राज्य सभा में मूल रूप से लंबित, अनुमति की प्रतीक्षा में, लौटाया हुआ, तथा संयुक्त बैठक की पूर्व-सूचना वाला — जीवित रहते हैं। सत्रावसान से कोई विधेयक व्यपगत नहीं होता; केवल विघटन से होता है — यह सबसे आम भूल है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 संसद में विधेयकों के व्यपगत (Lapse) होने के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. लोक सभा में लंबित कोई विधेयक उस सदन के विघटन पर व्यपगत नहीं होता।
2. संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किंतु राष्ट्रपति की अनुमति की प्रतीक्षा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाता है, चाहे वह लोक सभा में पुरःस्थापित हुआ हो या राज्य सभा से पारित होकर आया हो — अतः कथन 1 गलत है। जो विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की अनुमति की प्रतीक्षा में है, वह व्यपगत नहीं होता; इसी प्रकार केवल राज्य सभा में लंबित तथा लोक सभा द्वारा अपारित विधेयक भी व्यपगत नहीं होता — अतः कथन 2 भी गलत है।

प्र.2 संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त बैठक का उपबंध संविधान के अनुच्छेद 108 में है।
2. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा का अध्यक्ष करता है।
3. धन विधेयक तथा संविधान संशोधन विधेयक, दोनों पर गतिरोध की दशा में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 108 गतिरोध की दशा में राष्ट्रपति को संयुक्त बैठक आहूत करने की शक्ति देता है तथा अनुच्छेद 118(4) के अनुसार इसकी अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष करता है; अतः कथन 1 और 2 सही हैं। धन विधेयक (अनुच्छेद 110) तथा संविधान संशोधन विधेयक इस प्रक्रिया से बाहर हैं, अतः कथन 3 गलत है। अब तक केवल तीन संयुक्त बैठकें हुई हैं — 1961, 1978 तथा 2002 में।

प्र.3 संविधान संशोधन की प्रक्रिया के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
2. संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में पुरःस्थापित किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक नहीं है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन विधेयक दोनों सदनों द्वारा पृथक्-पृथक् विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है; गतिरोध की दशा में संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) का उपबंध लागू नहीं होता। अतः कथन 1 गलत है। ऐसा विधेयक किसी भी सदन में, मंत्री या निजी सदस्य द्वारा, राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पुरःस्थापित किया जा सकता है — कथन 2 सही है।

7. बजट एवं वित्तीय प्रक्रिया — अनुच्छेद 112 से 117 तथा तीन निधियाँ

7.1 संसद की वित्तीय संप्रभुता — तीन आधारभूत अनुच्छेद

265विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं
266(3)विधि के अनुसार ही संचित निधि से निकासी
112वार्षिक वित्तीय विवरण — “बजट”
114(3)विनियोग के बिना कोई निकासी नहीं

ये चार पंक्तियाँ मिलकर वह सिद्धांत बनाती हैं जिसे “बिना प्रतिनिधित्व के कराधान नहीं” कहा जाता है — कार्यपालिका न अपने आप कर लगा सकती है, न अपने आप ख़ज़ाने से पैसा निकाल सकती है। ध्यान दें कि “बजट” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता; संविधान का शब्द है “वार्षिक वित्तीय विवरण” (Annual Financial Statement)

7.2 अनुच्छेद 112 — भारित बनाम मतदेय व्यय

वार्षिक वित्तीय विवरण में अनुमानित प्राप्तियाँ एवं व्यय दिखाए जाते हैं, और व्यय को दो भागों में अलग-अलग दिखाना अनिवार्य है — भारित व्यय (Charged Expenditure) तथा मतदेय व्यय (Voted Expenditure)। भारित व्यय पर संसद में चर्चा हो सकती है, किंतु मतदान नहीं (अनु. 113(1)); मतदेय व्यय पर लोक सभा अनुदान की माँगों के रूप में मतदान करती है (अनु. 113(2))।

भारित व्यय — सात मदें “राष्ट्र – पीठ – ऋण – न्याय – लेखा – डिक्री – विधि”

राष्ट्रपति का व्यय → दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी (सभापति/उपसभापति, अध्यक्ष/उपाध्यक्ष) → ऋण-भार → न्यायाधीश (उच्चतम न्यायालय के वेतन, उच्च न्यायालय की पेंशन) → लेखा परीक्षक यानी CAG → न्यायालय की डिक्री/पंचाट → संसद जिसे विधि से भारित घोषित कर दे। स्मरण-सूत्र: जो पद स्वतंत्र रहना चाहिए, उसका वेतन भारित है — क्योंकि भारित व्यय पर सदन मतदान नहीं कर सकता, अतः उसे वेतन रोककर दबाया नहीं जा सकता।

7.3 तीन निधियाँ — अनुच्छेद 266 एवं 267

सुमेलन-तालिका 12 : भारत की तीन सरकारी निधियाँ
निधिअनुच्छेदइसमें क्या जाता हैनिकासी की शर्त
भारत की संचित निधि
Consolidated Fund of India
266(1)सरकार की सभी प्राप्तियाँ — कर, ऋण से प्राप्त धन, ऋणों की वसूलीसंसद के विनियोग (अनु. 114) के बिना एक पैसा नहीं; सबसे बड़ी निधि; CAG इसका लेखापरीक्षण करता है
भारत का लोक लेखा
Public Account of India
266(2)वह धन जिसमें सरकार केवल बैंकर है — भविष्य निधि, लघु बचत, प्रेषण, जमाराशियाँसंसद के विनियोग की आवश्यकता नहीं; कार्यपालिका के आदेश से निकासी — क्योंकि पैसा सरकार का है ही नहीं
भारत की आकस्मिकता निधि
Contingency Fund of India
267(1)संसद द्वारा विधि से स्थापित अग्रदाय निधि (imprest); राष्ट्रपति के व्ययनाधीन रखी जाती हैअप्रत्याशित व्यय के लिए पहले खर्च, बाद में संसद की स्वीकृति; स्वीकृति मिलने पर संचित निधि से उतनी राशि लौटाकर निधि पुनर्भरित की जाती है

7.4 बजट की छह अवस्थाएँ

1. प्रस्तुतीकरणवित्त मंत्री बजट भाषण के साथ 1 फरवरी को लोक सभा में प्रस्तुत करते हैं; राज्य सभा में केवल रखा जाता है। 2017 से तिथि 28 फरवरी से बदलकर 1 फरवरी हुई और रेल बजट आम बजट में मिला दिया गया
2. सामान्य चर्चादोनों सदनों में; बजट की समग्र नीति पर, किसी अलग माँग पर नहीं; कोई प्रस्ताव नहीं, कोई मतदान नहीं; वित्त मंत्री का उत्तर
3. समितियों द्वारा संवीक्षासदन अवकाश पर जाते हैं; 24 विभागीय स्थायी समितियाँ अपने-अपने मंत्रालयों की अनुदान माँगों की विस्तृत जाँच कर प्रतिवेदन देती हैं। यह व्यवस्था 1993 से है
4. अनुदान माँगों पर मतदानकेवल लोक सभा; प्रत्येक मंत्रालय की माँग अलग; कटौती प्रस्ताव यहीं आते हैं; अंतिम दिन गुलेटिन। केवल मतदेय व्यय पर
5. विनियोग विधेयकअनु. 114 — स्वीकृत अनुदान तथा भारित व्यय, दोनों की संचित निधि से निकासी को विधिक रूप देता है। ऐसा कोई संशोधन नहीं रखा जा सकता जो अनुदान की राशि या उसका गंतव्य बदल दे
6. वित्त विधेयकआगामी वर्ष के कर-प्रस्तावों को विधिक रूप देता है; इसमें कर घटाने या हटाने के संशोधन रखे जा सकते हैं। 75 दिन के भीतर अधिनियमित होना आवश्यक
सावधानी — विनियोग बनाम वित्त विधेयक
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (अनुदान का प्रकार) को सूची-II (विवरण) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I:  A. लेखानुदान   B. प्रत्ययानुदान   C. अपवादानुदान   D. अनुपूरक अनुदान
सूची-II:  1. अनिश्चित स्वरूप की अप्रत्याशित माँग, जिसका ब्यौरा साधारण बजट की भाँति नहीं दिया जा सकता   2. चालू वित्तीय वर्ष के लिए प्राधिकृत राशि अपर्याप्त पाए जाने पर दी जाने वाली अतिरिक्त राशि   3. विनियोग अधिनियम पारित होने तक वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए दी जाने वाली अग्रिम राशि   4. किसी विशेष प्रयोजन हेतु ऐसा अनुदान जो चालू वर्ष की वर्तमान सेवा का भाग नहीं होता
कूट:

AA-1, B-3, C-2, D-4BA-1, B-3, C-4, D-2CA-3, B-1, C-2, D-4DA-3, B-1, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 116 में लेखानुदान (Vote on Account), प्रत्ययानुदान (Vote of Credit) तथा अपवादानुदान (Exceptional Grant) का उपबंध है, जबकि अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant) अनुच्छेद 115 के अंतर्गत आता है। लेखानुदान बजट पारित होने तक व्यय हेतु अग्रिम राशि है, प्रत्ययानुदान अनिश्चित स्वरूप की अप्रत्याशित माँग के लिए है तथा अपवादानुदान किसी वर्ष की वर्तमान सेवा से असंबद्ध विशेष प्रयोजन हेतु दिया जाता है। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।

प्र.2 विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. विनियोग विधेयक में ऐसा कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता जिससे किसी अनुदान की राशि में परिवर्तन हो अथवा उसका लक्ष्य बदल जाए।
2. विनियोग अधिनियम के प्राधिकार के बिना भारत की संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जा सकता।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 114(2) के अनुसार विनियोग विधेयक में ऐसा कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता जो किसी अनुदान की राशि या उसके लक्ष्य में परिवर्तन करे; अध्यक्ष का इस विषय पर निर्णय अंतिम होता है। अनुच्छेद 114(3) उपबंध करता है कि विनियोग अधिनियम द्वारा किए गए विनियोग के अतिरिक्त संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जाएगा। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उच्चतम न्यायालय के पद पर रह चुका कोई व्यक्ति भारत के राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं कर सकता।
2. उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है।
3. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 124(7) के अनुसार उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत में किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन नहीं कर सकता, जबकि अनुच्छेद 220 के अधीन उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है — अतः कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 202(3)(घ) के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।

8. संसदीय समितियाँ — वित्तीय, विभागीय स्थायी एवं तदर्थ

संसद पूर्ण सदन के रूप में बजट के हर पन्ने या हर विधेयक के हर खंड की जाँच नहीं कर सकती — न उसके पास समय है, न विशेषज्ञता। इसीलिए कहा जाता है कि “संसद का असली काम समितियों में होता है”। समितियों का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 105 (विशेषाधिकार) तथा अनुच्छेद 118 (प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति) में है; विस्तृत व्यवस्था दोनों सदनों के प्रक्रिया एवं कार्य-संचालन नियमों में है।

8.1 तीन वित्तीय समितियाँ — सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग

सुमेलन-तालिका 13 : तीन वित्तीय समितियाँ — रचना एवं कार्य
समितिसदस्यस्थापनाकार्य एवं विशेषता
लोक लेखा समिति
Public Accounts Committee
22
15 लोक सभा + 7 राज्य सभा
1921 — 1919 के भारत शासन अधिनियम के अधीन; भारत की सबसे पुरानी संसदीय समितिविनियोग लेखाओं तथा CAG के प्रतिवेदनों की जाँच; देखती है कि धन उसी मद पर, उसी सीमा तक तथा विधि के अनुसार खर्च हुआ या नहीं। इसे “CAG की जुड़वाँ बहन” कहा जाता है। 1967 से परंपरा है कि इसका सभापति विपक्ष का सदस्य होता है; नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं
प्राक्कलन समिति
Estimates Committee
30
सभी लोक सभा से; राज्य सभा का एक भी सदस्य नहीं
1950 — तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफ़ारिश परबजट में निहित अनुमानों की जाँच; मितव्ययिता, संगठनात्मक सुधार तथा प्रशासनिक दक्षता के सुझाव। तीनों वित्तीय समितियों में सबसे बड़ी। इसे “सतत मितव्ययिता समिति” कहा जाता है। सभापति सदैव सत्ता पक्ष से; यह व्यय होने के बाद नहीं, पहले देखती है
सार्वजनिक उपक्रम समिति
Committee on Public Undertakings
22
15 लोक सभा + 7 राज्य सभा
(मूलतः 15 — 10 + 5; 1974 में बढ़ाकर 22)
1964कृष्ण मेनन समिति की सिफ़ारिश परसार्वजनिक उपक्रमों के प्रतिवेदनों, लेखाओं तथा उन पर CAG के प्रतिवेदनों की जाँच; देखती है कि उपक्रम व्यावसायिक सिद्धांतों एवं विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रथाओं के अनुसार चल रहे हैं या नहीं
तीन वित्तीय समितियाँ — संख्या एवं वर्ष “लोक 22 इक्कीस · प्राक् 30 पचास · उपक्रम 22 चौंसठ”

लोक लेखा समिति — 22 सदस्य, 1921 (“इक्कीस”) में स्थापित। प्राक्कलन समिति — 30 सदस्य, 1950 (“पचास”) में स्थापित। सार्वजनिक उपक्रम समिति — 22 सदस्य, 1964 (“चौंसठ”) में स्थापित। तीनों के सदस्य एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से प्रतिवर्ष चुने जाते हैं और कार्यकाल एक वर्ष का होता है। कोई मंत्री किसी भी वित्तीय समिति का सदस्य नहीं हो सकता; यदि सदस्य मंत्री बन जाए तो सदस्यता समाप्त।

सावधानी — 22 बनाम 30, और “राज्य सभा का कोई सदस्य नहीं”

8.2 विभागीय स्थायी समितियाँ (DRSC)

8.3 अन्य प्रमुख समितियाँ एवं तदर्थ समितियाँ

सुमेलन-तालिका 14 : अन्य समितियाँ ↔ रचना
समितिलोक सभाराज्य सभाविशेषता
कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory)1511सभापति स्वयं अध्यक्ष/सभापति होते हैं; सदन के कार्य का समय-आबंटन तय करती है
विशेषाधिकार समिति (Privileges)1510अर्ध-न्यायिक प्रकृति; विशेषाधिकार-भंग के मामलों की जाँच
अधीनस्थ विधान समिति (Subordinate Legislation)1515प्रत्यायोजित विधान की जाँच — क्या कार्यपालिका ने अपनी नियम-बनाने की शक्ति की सीमा पार की
सरकारी आश्वासन समिति (Government Assurances)1510मंत्रियों ने सदन में जो आश्वासन दिए, उनका अनुपालन जाँचती है
याचिका समिति (Petitions)1510विधेयकों तथा सामान्य लोक-महत्व के विषयों पर प्राप्त याचिकाओं पर विचार
अजा/अजजा कल्याण समिति30 — 20 लोक सभा + 10 राज्य सभाअनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के प्रतिवेदनों तथा कल्याण-योजनाओं की जाँच
महिला सशक्तीकरण समिति30 — 20 लोक सभा + 10 राज्य सभा1997 में गठित; राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रतिवेदनों की जाँच
लाभ के पदों संबंधी संयुक्त समिति15 — 10 लोक सभा + 5 राज्य सभायह जाँचती है कि कौन-सा पद धारण करने से सदस्य निरर्हित होगा
सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति15केवल लोक सभा में; अनुपस्थिति की अनुमति संबंधी आवेदनों पर विचार
आचार समिति (Ethics)2000 में गठित1997 में गठितसदस्यों के अनैतिक आचरण के मामले; राज्य सभा में पहले बनी — यह क्रम पूछा जाता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (संसदीय समिति) को सूची-II (गठन का वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. लोक लेखा समिति  B. प्राक्कलन समिति  C. सार्वजनिक उपक्रम समिति  D. विभाग-संबंधित स्थायी समिति प्रणाली
सूची-II: 1. 1950  2. 1993  3. 1921  4. 1964
कूट:

AA-1, B-3, C-4, D-2BA-3, B-1, C-2, D-4CA-3, B-1, C-4, D-2DA-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) 1921 में भारत शासन अधिनियम, 1919 के उपबंधों के अधीन गठित हुई और यह संसद की सबसे पुरानी वित्तीय समिति है। प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) 1950 में जॉन मथाई की अनुशंसा पर बनी तथा सार्वजनिक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) 1964 में कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर। विभाग-संबंधित स्थायी समिति (DRSC) प्रणाली 1993 में 17 समितियों के साथ प्रारंभ हुई, जिन्हें 2004 में बढ़ाकर 24 किया गया।

प्र.2 सूची-I (संविधान सभा की समिति) को सूची-II (अध्यक्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. संघ शक्ति समिति  B. प्रांतीय संविधान समिति  C. संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति  D. कार्य संचालन समिति
सूची-II: 1. सरदार वल्लभभाई पटेल  2. के. एम. मुंशी  3. जवाहरलाल नेहरू  4. जी. वी. मावलंकर
कूट:

AA-1, B-3, C-4, D-2BA-3, B-1, C-4, D-2CA-1, B-3, C-2, D-4DA-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)जवाहरलाल नेहरू संघ शक्ति समिति, संघ संविधान समिति तथा राज्यों संबंधी समिति के अध्यक्ष थे; सरदार पटेल प्रांतीय संविधान समिति तथा मूल अधिकार, अल्पसंख्यक एवं जनजातीय क्षेत्र संबंधी परामर्शदात्री समिति के; जी. वी. मावलंकर संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति के; तथा के. एम. मुंशी कार्य संचालन समिति (Order of Business Committee) के अध्यक्ष थे। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।

प्र.3 सूची-I (संसदीय समिति) को सूची-II (मुख्य कार्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I:  A. कार्य मंत्रणा समिति   B. नियम समिति   C. अधीनस्थ विधान संबंधी समिति   D. सरकारी आश्वासन समिति
सूची-II:  1. कार्यपालिका को प्रत्यायोजित विधायी शक्ति के उचित प्रयोग की जाँच करना   2. सदन में मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों के कार्यान्वयन का अनुवर्तन करना   3. सदन में विधायी तथा अन्य कार्यों के लिए समय का आवंटन करना   4. सदन की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन संबंधी नियमों पर विचार करना
कूट:

AA-4, B-3, C-2, D-1BA-3, B-4, C-1, D-2CA-4, B-3, C-1, D-2DA-3, B-4, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee) सदन के कार्यों हेतु समय का आवंटन करती है; नियम समिति (Rules Committee) प्रक्रिया-नियमों पर विचार करती है; अधीनस्थ विधान संबंधी समिति (Committee on Subordinate Legislation) प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) की जाँच करती है; तथा सरकारी आश्वासन समिति (Committee on Government Assurances) मंत्रियों के आश्वासनों के अनुपालन को देखती है। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।

9. संसदीय पदाधिकारी — अध्यक्ष, सभापति तालिका एवं विपक्ष का नेता

9.1 लोक सभा का अध्यक्ष — अनुच्छेद 93 से 97

सुमेलन-तालिका 15 : अध्यक्ष-संबंधी अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंध
93लोक सभा यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनेगी; पद रिक्त होने पर पुनः चुनेगी। कोई समय-सीमा नहीं दी गई
94पद रिक्त होने के तीन आधार — (क) सदन का सदस्य न रहना; (ख) त्यागपत्र — अध्यक्ष उपाध्यक्ष को, उपाध्यक्ष अध्यक्ष को; (ग) सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) से पारित संकल्प द्वारा हटाया जाना, जिसके लिए 14 दिन की सूचना आवश्यक है।
परंतुक — लोक सभा के विघटन पर अध्यक्ष अपना पद नहीं छोड़ता; वह अगली लोक सभा की प्रथम बैठक से ठीक पहले तक पद पर रहता है
95अध्यक्ष का पद रिक्त होने या अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष कर्तव्य निभाएगा
96जब अध्यक्ष (या उपाध्यक्ष) को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, तब वह पीठासीन नहीं होगा; किंतु उसे बोलने, भाग लेने तथा प्रथमतः मत देने का अधिकार है — निर्णायक मत का नहीं
97अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति एवं उपसभापति के वेतन एवं भत्ते संसद विधि द्वारा तय करेगी, और वे भारत की संचित निधि पर भारित होंगे

9.2 प्रोटेम अध्यक्ष एवं सभापति तालिका

प्रोटेम अध्यक्षनई लोक सभा के गठन पर, नियमित अध्यक्ष के निर्वाचन तक राष्ट्रपति किसी सदस्य को प्रोटेम अध्यक्ष नियुक्त करते हैं — परंपरा से वरिष्ठतम सदस्य। राष्ट्रपति स्वयं उन्हें शपथ दिलाते हैं
उसके तीन कार्य(1) नए सदस्यों को शपथ दिलाना; (2) सदन की प्रथम बैठक की अध्यक्षता; (3) अध्यक्ष के निर्वाचन की कार्यवाही कराना — इसके बाद उसका पद स्वतः समाप्त
सभापति तालिकालोक सभा — प्रक्रिया-नियम 9 के अधीन अध्यक्ष अधिकतम दस सदस्यों की सभापति तालिका (Panel of Chairpersons) नामनिर्देशित करते हैं। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में इनमें से कोई पीठासीन होता है
राज्य सभा में समतुल्यवहाँ इसे उपसभापतियों का पैनल (Panel of Vice-Chairmen) कहते हैं, जिसे सभापति नामनिर्देशित करते हैं। यदि सभी पद रिक्त हों, तो सदन स्वयं किसी सदस्य को पीठासीन नियुक्त करता है
सावधानी — तीन बारीक भेद

9.3 सदन के नेता, विपक्ष के नेता एवं सचेतक

उत्तर प्रदेश संदर्भ — सबसे बड़ा राज्य, पर पीठ पर कभी नहीं
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से किन पदों पर नियुक्ति हेतु गठित चयन/अनुशंसा समिति में लोक सभा में विपक्ष का नेता सदस्य होता है?
1. संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष
2. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त
3. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का निदेशक
4. मुख्य सूचना आयुक्त
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 3 और 4Bकेवल 4C1 और 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, विपक्ष का नेता), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक (प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, मुख्य न्यायमूर्ति अथवा उनके द्वारा नामनिर्दिष्ट न्यायाधीश) तथा मुख्य सूचना आयुक्त (प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री) — तीनों की चयन समितियों में विपक्ष का नेता सम्मिलित है। संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति सीधे करता है; उसके लिए ऐसी कोई समिति नहीं है।

प्र.2 संसद में विपक्ष के नेता के पद को वैधानिक मान्यता तथा कैबिनेट मंत्री के समकक्ष वेतन-भत्ते निम्नलिखित में से किस अधिनियम द्वारा प्रदान किए गए?

Aसंसद (सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन) अधिनियम, 1954Bसंसद में विपक्ष के नेताओं का वेतन एवं भत्ता अधिनियम, 1977Cसंसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959Dजन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) का पद संविधान में नहीं, अपितु 'संसद में विपक्ष के नेताओं का वेतन एवं भत्ता अधिनियम, 1977' में परिभाषित है, जिसके अंतर्गत उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष वेतन, भत्ते एवं सुविधाएँ मिलती हैं। दोनों सदनों में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को, जिसे अध्यक्ष/सभापति मान्यता दे, यह पद प्राप्त होता है। शेष अधिनियम अन्य विषयों से संबंधित हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): लोक सभा का उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है।
कारण (R): उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के अधीनस्थ होता है तथा अपने कार्यों के लिए अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 94 के अनुसार लोक सभा का अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है — अतः अभिकथन सही है। किंतु उपाध्यक्ष अध्यक्ष का अधीनस्थ नहीं होता; वह सीधे सदन के प्रति उत्तरदायी होता है और पीठासीन होने पर उसे अध्यक्ष की सभी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। अतः कारण गलत है।

10. राज्यपाल — नियुक्ति, शक्तियाँ एवं विवेकाधीन क्षेत्र

10.1 नियुक्ति एवं पद — अनुच्छेद 153 से 160

सुमेलन-तालिका 16 : राज्यपाल-संबंधी अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंधनिर्णायक बिंदु
153प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा जोड़ा गया परंतुक — एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है
154राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहितवह इसे स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से प्रयोग करेगा
155राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित अधिपत्र (warrant) द्वारा नियुक्त करेगाराज्यपाल का निर्वाचन नहीं होता। संविधान सभा ने निर्वाचित राज्यपाल का प्रस्ताव विचार कर अस्वीकार कर दिया था
156पदावधि 5 वर्ष, किंतु वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा; त्यागपत्र राष्ट्रपति को“प्रसादपर्यंत” के कारण 5 वर्ष कोई प्रत्याभूत कार्यकाल नहीं; उत्तराधिकारी के आने तक पद पर बना रहता है
157अर्हता — भारत का नागरिक हो तथा 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका होकेवल दो अर्हताएँ; शेष दो परंपराएँ हैं (नीचे देखें)
158पद की शर्तें — संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो (यदि हो तो पद ग्रहण करते ही स्थान रिक्त); लाभ का अन्य पद न हो; बिना किराया निवास; उपलब्धियाँ राज्य की संचित निधि पर भारितएक ही व्यक्ति दो राज्यों का राज्यपाल हो तो उपलब्धियाँ राष्ट्रपति के आदेश से राज्यों में बाँटी जाती हैं
159शपथ — उस राज्य के संबंध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा, उनकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वाराराष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं — यह भेद पूछा जाता है
160कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन — राष्ट्रपति जैसी व्यवस्था उचित समझे, कर सकता हैराज्य में “उपराज्यपाल” जैसा कोई स्थायी विकल्प-पद नहीं है — यही कारण है कि प्रायः पड़ोसी राज्य के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है
सावधानी — राज्यपाल की नियुक्ति होती है, निर्वाचन नहीं

10.2 राज्यपाल की शक्तियाँ

10.3 विवेकाधीन शक्तियाँ — अनुच्छेद 163

यहीं राज्यपाल राष्ट्रपति से निर्णायक रूप से भिन्न हो जाता है। अनुच्छेद 163(1) कहता है — “राज्यपाल को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा, सिवाय उन बातों के जिनमें वह इस संविधान द्वारा या इसके अधीन अपने कृत्यों को अपने विवेकानुसार करने के लिए अपेक्षित है।” — यह अपवाद-वाक्य अनुच्छेद 74 में नहीं हैइसीलिए राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तुलना में अधिक विवेकाधीन क्षेत्र है।

अनुच्छेद 163(2) — यदि यह प्रश्न उठे कि कोई विषय विवेकाधीन है या नहीं, तो राज्यपाल का विनिश्चय अंतिम होगा, और उसके किसी कार्य की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि उसे विवेक से कार्य करना चाहिए था या नहीं। अनुच्छेद 163(3) — मंत्रियों ने क्या सलाह दी, यह न्यायालय में जाँच का विषय नहीं (अनु. 74(2) के समान)।

संवैधानिक विवेक · Constitutional Discretion

  • विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना — अनु. 200
  • राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजना — अनु. 356
  • किसी संलग्न संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कार्य करना (अनु. 239(2)) — उस भूमिका में वह राज्य मंत्रिपरिषद से स्वतंत्र है
  • मुख्यमंत्री से प्रशासन एवं विधान संबंधी जानकारी माँगना — अनु. 167
  • असम के राज्यपाल का यह निर्धारण कि स्वायत्त जनजातीय ज़िला परिषद को खनिज-रॉयल्टी में से कितनी राशि देय है — छठी अनुसूची
  • विशेष उत्तरदायित्व — महाराष्ट्र एवं गुजरात (अनु. 371), नागालैंड (371क), मणिपुर (371ग), सिक्किम (371च), अरुणाचल प्रदेश (371ज)

परिस्थितिजन्य विवेक · Situational Discretion

  • जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत न हो, तब मुख्यमंत्री की नियुक्ति
  • जब मंत्रिपरिषद सदन का विश्वास सिद्ध न कर सके, तब उसे बर्खास्त करना
  • जब मंत्रिपरिषद बहुमत खो चुकी हो, तब विधान सभा का विघटन
  • मुख्यमंत्री की आकस्मिक मृत्यु पर स्पष्ट उत्तराधिकारी न होने की स्थिति
  • यह विवेक संविधान के किसी उपबंध से नहीं, परिस्थिति की अनिवार्यता से जन्मता है — और यही सर्वाधिक विवादित क्षेत्र है

10.4 अनुच्छेद 200 — विधेयकों पर अनुमति

राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत होने पर उसके पास चार विकल्प हैं —

1. अनुमति दे देविधेयक अधिनियम बन जाता है
2. अनुमति रोक लेविधेयक समाप्त — पूर्ण वीटो
3. पुनर्विचार हेतु लौटाए(पहला परंतुक) — यदि वह धन विधेयक न हो; सदन पुनः पारित कर दे तो राज्यपाल अनुमति रोक नहीं सकता — निलंबनकारी वीटो
4. राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखेविधेयक राज्यपाल के हाथ से निकलकर अनुच्छेद 201 के अधीन राष्ट्रपति के पास चला जाता है
सावधानी — अनुच्छेद 200 का “विचारार्थ सुरक्षित रखना”
2023–2025 की सबसे बड़ी संवैधानिक बहस — “कब तक?”

अनुच्छेद 200 के पहले परंतुक में शब्द है “यथाशीघ्र (as soon as possible)”, किंतु कोई समय-सीमा नहीं। इसी शून्य से हाल का सबसे बड़ा केंद्र-राज्य विवाद जन्मा —

उत्तर प्रदेश संदर्भ — राजभवन, लखनऊ
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 राज्यपाल के पद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित है।
2. कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन अथवा राज्य विधानमंडल का सदस्य रहते हुए भी राज्यपाल का पद धारण कर सकता है।
3. राज्यपाल अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है, 30 वर्ष नहीं — अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 158 के अनुसार यदि कोई सांसद या विधायक राज्यपाल नियुक्त होता है तो पद ग्रहण करते ही उसका स्थान रिक्त समझा जाता है, अतः कथन 2 गलत है। अनुच्छेद 156(2) के अनुसार वह त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करता है, अतः केवल कथन 3 सही है। सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जाना संभव हुआ।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-से कार्य राज्यपाल की संवैधानिक विवेकाधीन शक्तियों के अंतर्गत आते हैं?
1. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करना
2. किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना
3. किसी पड़ोसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कृत्यों का निर्वहन करना
4. राज्य के प्रशासन संबंधी विषयों की जानकारी मुख्यमंत्री से माँगना
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 200 के अधीन विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना, अनुच्छेद 239(2) के अधीन पड़ोसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कार्य करना तथा अनुच्छेद 167(ख) के अधीन मुख्यमंत्री से प्रशासनिक जानकारी माँगना राज्यपाल की संवैधानिक विवेकाधीन शक्तियों में आते हैं; राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की रिपोर्ट भेजना भी इसी श्रेणी में है। महाधिवक्ता की नियुक्ति अनुच्छेद 165 के अधीन मंत्रिपरिषद की सलाह से होती है, अतः वह विवेकाधीन नहीं है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): राज्यपाल कुछ विषयों पर राष्ट्रपति से अनुदेश प्राप्त किए बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता।
कारण (R): अनुच्छेद 213 के अनुसार, यदि उसी विषय पर विधेयक को राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना आवश्यक होता, तो अध्यादेश के लिए राष्ट्रपति के अनुदेश अनिवार्य हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 213 के परंतुक के अनुसार तीन स्थितियों में राज्यपाल राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता — जब उसी उपबंध वाले विधेयक के पुरःस्थापन हेतु राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती, जब उसे विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना आवश्यक होता, अथवा जब राष्ट्रपति की अनुमति के बिना वैसा अधिनियम अविधिमान्य होता। अतः (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

11. मुख्यमंत्री एवं राज्य मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 163 एवं 164

11.1 नियुक्ति एवं रचना

सावधानी — 15% की सीमा में संघ और राज्य का भेद
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश की सबसे बड़ी राज्य मंत्रिपरिषद की सीमा
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 संविधान के अनुच्छेद 167 के अधीन राज्य के मुख्यमंत्री के निम्नलिखित में से कौन-से कर्तव्य हैं?
1. मंत्रिपरिषद के प्रशासन संबंधी सभी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देना
2. राज्यपाल द्वारा माँगी गई प्रशासन एवं विधान संबंधी जानकारी देना
3. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करना
4. ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय तो कर लिया है किंतु परिषद ने विचार नहीं किया है
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C1, 2 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के तीन कर्तव्य बताता है — मंत्रिपरिषद के प्रशासन संबंधी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देना, राज्यपाल द्वारा माँगी गई जानकारी देना, तथा राज्यपाल के कहने पर ऐसा कोई विषय मंत्रिपरिषद के समक्ष रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो किंतु परिषद ने विचार न किया हो। यह संघ स्तर पर अनुच्छेद 78 का समरूप है। महाधिवक्ता की नियुक्ति अनुच्छेद 165 के अधीन राज्यपाल करता है। अतः 1, 2 और 4 सही हैं।

प्र.2 राज्य की मंत्रिपरिषद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. राज्य में विधान परिषद होने पर भी मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से केवल विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
2. कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की अवधि तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है — द्विसदनीय राज्यों में भी विधान परिषद के प्रति नहीं। अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई मंत्री यदि निरंतर छह मास तक राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता, तो वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहता। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 संविधान के अनुच्छेद 164(1) के परंतुक के अनुसार, निम्नलिखित में से किन राज्यों में जनजातीय कल्याण का भारसाधक मंत्री होना अनिवार्य है?
1. बिहार
2. झारखंड
3. ओडिशा
4. राजस्थान
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 4C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)मूल संविधान में यह उपबंध बिहार, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा (तत्कालीन उड़ीसा) के लिए था। 94वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2006 द्वारा बिहार को इससे बाहर कर छत्तीसगढ़ एवं झारखंड को जोड़ा गया। अतः वर्तमान में यह उपबंध छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा पर लागू है; राजस्थान इसमें सम्मिलित नहीं है।

12. राज्य विधानमंडल — विधान सभा एवं विधान परिषद

12.1 गठन — अनुच्छेद 168

अनुच्छेद 168 कहता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा जो राज्यपाल तथा एक या दो सदनों से मिलकर बनेगा। (जैसे संसद में राष्ट्रपति अंग है, वैसे ही राज्य विधानमंडल में राज्यपाल।) जहाँ दो सदन हैं वहाँ ऊपरी सदन विधान परिषद तथा निचला विधान सभा कहलाता है; जहाँ एक ही सदन है वहाँ वह विधान सभा है।

12.2 विधान परिषद का सृजन एवं उत्सादन — अनुच्छेद 169

1. राज्य विधान सभा का संकल्पसंकल्प दोहरे बहुमत से पारित हो — (क) विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या का बहुमत, तथा (ख) उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई
2. संसद विधि बनाएसंसद साधारण बहुमत से विधि बनाकर परिषद का सृजन या उत्सादन करती है। संसद बाध्य नहीं है — वह संकल्प पर कोई कार्रवाई न भी करे तो चल सकता है
3. यह संविधान संशोधन नहींअनुच्छेद 169(3) — ऐसी कोई विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान का संशोधन नहीं मानी जाएगी, यद्यपि वह संविधान (चौथी अनुसूची जैसे भाग) को बदलती है
सावधानी — अनुच्छेद 169 के तीन ट्रैप

12.3 किन राज्यों में विधान परिषद है

उत्तर प्रदेश बिहार महाराष्ट्र कर्नाटक आंध्र प्रदेश तेलंगाना पंजाब प. बंगाल तमिलनाडु जम्मू-कश्मीर मध्य प्रदेश
विधान परिषद विद्यमान (6 राज्य)परिषद समाप्त की गईविधि में प्रावधान, पर कभी गठित नहीं
द्विसदनीय राज्य विधानमंडल — 2026 की स्थिति। केवल छह राज्यों में विधान परिषद है — उत्तर प्रदेश (100 सदस्य, देश में सबसे बड़ी), महाराष्ट्र (78), बिहार (75), कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (58) तथा तेलंगाना (40)। पंजाब (1970), प. बंगाल (1969) तथा तमिलनाडु (1986) ने अपनी परिषदें समाप्त कर दीं; जम्मू-कश्मीर की परिषद 2019 में राज्य के संघ राज्यक्षेत्र बनने पर समाप्त हो गई। मध्य प्रदेश के लिए परिषद का विधिक प्रावधान है, पर वह आज तक गठित नहीं हुई। बिंदु राज्य की राजधानी पर हैं — मानचित्र केवल शैक्षिक, सर्वेक्षण-सटीक नहीं।
छह राज्य जिनमें विधान परिषद है “एक उत्तर, एक पूरब, एक पश्चिम, तीन दक्षिण”

दिशा से याद रखिए, नाम से नहीं — तब यह कभी नहीं भूलेगा। उत्तर से एक — उत्तर प्रदेश (100, देश की सबसे बड़ी परिषद); पूरब से एक — बिहार (75); पश्चिम से एक — महाराष्ट्र (78); दक्षिण से तीन — कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (58) तथा तेलंगाना (40)। उत्तर-पूर्व, मध्य भारत तथा पूरे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा) में एक भी नहीं

जिन राज्यों ने परिषद समाप्त की — कालक्रम “बंगाल – पंजाब – तमिल = 69, 70, 86”

प. बंगाल 1969पंजाब 1970तमिलनाडु 1986 — पहले दो लगातार वर्षों में, तीसरा सोलह वर्ष बाद। इनसे अलग आंध्र प्रदेश की कहानी दो बार मुड़ी — 1985 में समाप्त, 2007 में पुनः सृजित; और जम्मू-कश्मीर की परिषद 2019 में राज्य के संघ राज्यक्षेत्र बनने पर समाप्त हो गई। कालक्रम-प्रश्न इन्हीं पाँच तिथियों से बनता है।

12.4 विधान सभा — अनुच्छेद 170

12.5 विधान परिषद — अनुच्छेद 171

विधान परिषद की रचना पूरे संविधान की सबसे मिश्रित (composite) रचना है — इसमें निर्वाचन के चार भिन्न प्रकार तथा मनोनयन — पाँचों तत्व हैं।

सुमेलन-तालिका 17 : विधान परिषद की रचना — अनुच्छेद 171(3)
अंशकिसके द्वारा निर्वाचित/मनोनीतशर्त
1/3स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा — नगरपालिका, ज़िला बोर्ड तथा संसद द्वारा विनिर्दिष्ट अन्य स्थानीय प्राधिकारीसबसे बड़ा एकल अंश
1/12स्नातकों द्वाराभारत के किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हुए कम-से-कम तीन वर्ष हो चुके हों
1/12अध्यापकों द्वाराराज्य में माध्यमिक विद्यालय से निम्न स्तर की नहीं ऐसी संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष से अध्यापनरत हों
1/3विधान सभा के सदस्यों द्वारानिर्वाचित व्यक्ति विधान सभा का सदस्य न हो
शेष 1/6राज्यपाल द्वारा मनोनीतसाहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा में विशेष ज्ञान/व्यावहारिक अनुभव
(राज्य सभा की सूची से भिन्न — वहाँ “सहकारिता आंदोलन” नहीं है)

12.6 विधान परिषद की सीमित शक्तियाँ — अनुच्छेद 197 एवं 198

राज्य सभा संघ में एक सह-समान सदन है (धन विधेयक को छोड़कर), किंतु विधान परिषद राज्य में एक गौण सदन है — वह किसी विधेयक को रोक सकती है, हरा नहीं सकती

साधारण विधेयक — पहली यात्राविधान सभा पारित कर परिषद को भेजती है। परिषद उसे अस्वीकार कर सकती है, संशोधन सहित लौटा सकती है, या तीन मास तक कुछ न करे
विधान सभा पुनः पारित करेवह विधेयक फिर से पारित कर परिषद को भेजती है — परिषद के संशोधन स्वीकार करके या ठुकराकर
दूसरी यात्रा — केवल एक मासअब परिषद यदि पुनः अस्वीकार करे, या ऐसे संशोधन करे जो विधान सभा स्वीकार न करे, या एक मास तक कुछ न करे — तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है
कुल विलंब — अधिकतम चार मास3 मास + 1 मास = 4 मास। परिषद विधान सभा की इच्छा को इससे आगे नहीं रोक सकती, और संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश की सबसे बड़ी विधान परिषद
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): संविधान के अनुसार किसी राज्य की विधान परिषद की सदस्य-संख्या सामान्यतः 40 से कम नहीं होगी।
कारण (R): विधान परिषद की कुल सदस्य-संख्या उस राज्य की विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की सदस्य-संख्या विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी, किन्तु किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी। दोनों कथन सही हैं, परंतु एक न्यूनतम सीमा है और दूसरा अधिकतम सीमा — इसलिए कारण अभिकथन की व्याख्या नहीं करता। वर्तमान में केवल छह राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश — में विधान परिषद है, जिनमें उत्तर प्रदेश की परिषद (100 सदस्य) सबसे बड़ी है।

प्र.2 निम्नलिखित में से किस राज्य में वर्तमान में विधान परिषद नहीं है?

AओडिशाBतेलंगानाCकर्नाटकDबिहार
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)वर्तमान में केवल छह राज्यों — आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा उत्तर प्रदेश — में विधान परिषद है। ओडिशा विधान सभा ने 2018 में परिषद के सृजन का संकल्प पारित किया था, किन्तु अनुच्छेद 169 के अधीन संसद द्वारा विधि न बनाए जाने से वहाँ अब तक विधान परिषद अस्तित्व में नहीं आई है।

प्र.3 राज्य में विधान परिषद के सृजन अथवा उत्सादन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. संसद ऐसा तभी कर सकती है जब संबंधित राज्य की विधान सभा अपनी कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे।
2. ऐसी विधि को अनुच्छेद 368 के प्रयोजनार्थ संविधान का संशोधन समझा जाता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 169(1) के अनुसार संसद विधि द्वारा किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, किन्तु इसके लिए उस राज्य की विधान सभा द्वारा विशेष बहुमत — कुल सदस्य-संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत — से संकल्प पारित होना आवश्यक है; अतः कथन 1 सही है। अनुच्छेद 169(3) स्पष्ट करता है कि ऐसी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं मानी जाएगी; अतः कथन 2 गलत है।

13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची, कालक्रम एवं रटने योग्य तथ्य

13.1 अनुच्छेद ↔ विषय — एक ही जगह

सुमेलन-तालिका 18 : संघ की कार्यपालिका एवं संसद — अनुच्छेद 52 से 123
अनुच्छेदविषयअनुच्छेदविषय
52भारत का राष्ट्रपति85संसद के सत्र, सत्रावसान एवं विघटन
53संघ की कार्यपालिका शक्ति86राष्ट्रपति का अभिभाषण एवं संदेश भेजने का अधिकार
54राष्ट्रपति का निर्वाचन — निर्वाचक मंडल87राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण
55निर्वाचन की रीति — मत का मूल्य88मंत्रियों एवं महान्यायवादी के सदनों संबंधी अधिकार
56पदावधि (5 वर्ष; त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को)89राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति
57पुनर्निर्वाचन की पात्रता90उपसभापति का पद रिक्त होना/हटाया जाना
58अर्हताएँ (35 वर्ष, लोक सभा की अर्हता)93लोक सभा का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
59पद की शर्तें94अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना एवं हटाया जाना
60शपथ — मुख्य न्यायाधीश द्वारा96हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तो पीठासीन न होना
61महाभियोग की प्रक्रिया97पीठासीन अधिकारियों का वेतन — भारित
62रिक्ति भरने का समय (छह मास)100मतदान, निर्णायक मत एवं गणपूर्ति (1/10)
63–64उपराष्ट्रपति; राज्य सभा का पदेन सभापति101–104स्थानों का रिक्त होना, निरर्हताएँ, विनिश्चय एवं दंड
65राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन105संसद के विशेषाधिकार
66–67उपराष्ट्रपति का निर्वाचन एवं पदच्युति107–108विधेयकों की प्रक्रिया; संयुक्त बैठक
71निर्वाचन संबंधी विवाद — उच्चतम न्यायालय109–110धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया एवं परिभाषा
72क्षमादान की शक्ति111विधेयकों पर अनुमति — वीटो
74मंत्रिपरिषद की बाध्यकारी सलाह112–114वार्षिक वित्तीय विवरण; अनुदान माँगें; विनियोग विधेयक
75मंत्रियों की नियुक्ति, 15% सीमा, सामूहिक उत्तरदायित्व115–116अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान; लेखानुदान
76भारत का महान्यायवादी117वित्त विधेयक संबंधी विशेष उपबंध
77–78सरकार का कार्य-संचालन; प्रधानमंत्री के कर्तव्य118प्रक्रिया के नियम; संयुक्त बैठक की अध्यक्षता
79–81संसद का गठन; राज्य सभा एवं लोक सभा की रचना122कार्यवाही की न्यायालयों द्वारा जाँच नहीं
82–84पुनःसमायोजन; सदनों की अवधि; सदस्यता की अर्हताएँ123राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
सुमेलन-तालिका 19 : राज्य की कार्यपालिका एवं विधानमंडल — अनुच्छेद 153 से 213
अनुच्छेदविषयअनुच्छेदविषय
153राज्यों के राज्यपाल (एक व्यक्ति दो राज्यों का भी)170विधान सभा की रचना (500 / 60)
154राज्य की कार्यपालिका शक्ति171विधान परिषद की रचना (1/3, 1/12, 1/12, 1/3, 1/6)
155राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति172सदनों की अवधि
156पदावधि — राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत173सदस्यता की अर्हता (सभा 25, परिषद 30)
157–158अर्हताएँ (35 वर्ष) एवं पद की शर्तें174–176सत्र; अभिभाषण एवं संदेश; विशेष अभिभाषण
159शपथ — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा178–182विधान सभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष; परिषद के सभापति/उपसभापति
161राज्यपाल की क्षमादान शक्ति189(3)गणपूर्ति — 1/10 या 10, जो अधिक हो
163मंत्रिपरिषद एवं विवेकाधीन शक्ति192निरर्हता का विनिश्चय — राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की राय से
164मुख्यमंत्री एवं मंत्री; 15% / न्यूनतम 12197–198परिषद की सीमित शक्ति (3+1 मास); धन विधेयक (14 दिन)
165राज्य का महाधिवक्ता199राज्य का धन विधेयक — प्रमाणन विधान सभा अध्यक्ष द्वारा
166–167कार्य-संचालन; मुख्यमंत्री के कर्तव्य200–201राज्यपाल की अनुमति; राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित विधेयक
168राज्य विधानमंडल का गठन202–207राज्य का बजट, विनियोग एवं वित्त विधेयक
169विधान परिषद का सृजन/उत्सादन213राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति

13.2 कालक्रम — इस अध्याय की निर्णायक तिथियाँ

1921लोक लेखा समिति की स्थापना — 1919 के भारत शासन अधिनियम के अधीन; भारत की सबसे पुरानी संसदीय समिति
1950प्राक्कलन समिति — वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफ़ारिश पर; 30 सदस्य, सभी लोक सभा से
1951प्रथम संविधान संशोधन — अनुच्छेद 87 का विशेष अभिभाषण “हर सत्र” से घटाकर “वर्ष के प्रथम सत्र” तक सीमित
1954पेप्सू विनियोग विधेयक पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पूर्ण वीटो · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का आरंभ
19567वाँ संविधान संशोधन — एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल · अध्यक्ष मावलंकर का 1/10 वाला निदेश (विपक्ष के नेता की मान्यता)
6–9 मई 1961पहली संयुक्त बैठक — दहेज प्रतिषेध विधेयक
196111वाँ संविधान संशोधन — उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की “संयुक्त बैठक” की शर्त हटाई गई
1962शून्यकाल का आरंभ — प्रक्रिया-नियमों में अनुल्लिखित भारतीय नवाचार
1964सार्वजनिक उपक्रम समिति — कृष्ण मेनन समिति की सिफ़ारिश पर
1967परंपरा बनी कि लोक लेखा समिति का सभापति विपक्ष से होगा
1969राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन का निधन → उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि कार्यवाहक; गिरि के त्यागपत्र पर मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्लाह कार्यवाहक राष्ट्रपति · प. बंगाल ने विधान परिषद समाप्त की
1970पंजाब ने विधान परिषद समाप्त की
1974शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य — राष्ट्रपति एवं राज्यपाल संवैधानिक प्रधान; मंत्रिपरिषद की सलाह ही निर्णायक
197642वाँ संशोधन — अनुच्छेद 74 की सलाह बाध्यकारी बनाई गई
16 मई 1978दूसरी संयुक्त बैठक — बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक
197844वाँ संशोधन — राष्ट्रपति को सलाह पर एक बार पुनर्विचार कहने की शक्ति; “मंत्रिमंडल” शब्द अनु. 352(3) में
198552वाँ संशोधनदसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी विधि) जोड़ी गई · आंध्र प्रदेश ने परिषद समाप्त की
1986जेबी वीटो — ज्ञानी ज़ैल सिंह एवं भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक · तमिलनाडु ने विधान परिषद समाप्त की
1987डी.सी. वाधवा बनाम बिहार — अध्यादेशों का पुनःप्रख्यापन “संविधान के साथ छल”
1991पूर्ण वीटो — आर. वेंकटरमन एवं सांसद वेतन-भत्ता (संशोधन) विधेयक
1992किहोतो होलोहान — दसवीं अनुसूची का पैरा 7 अपास्त; अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन
199317 विभागीय स्थायी समितियाँ गठित — संसदीय संवीक्षा का सबसे बड़ा संस्थागत सुधार
1994एस.आर. बोम्मई — बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर, राजभवन में नहीं
26 मार्च 2002तीसरी संयुक्त बैठक — आतंकवाद निवारण विधेयक (POTA), 425 बनाम 296
200391वाँ संशोधन — मंत्रिपरिषद पर 15% की सीमा; दसवीं अनुसूची से “विभाजन” का अपवाद हटाया · राज्य सभा में खुला मतपत्र एवं निवास-शर्त समाप्त
2004विभागीय स्थायी समितियाँ 17 से बढ़कर 24; प्रत्येक में 31 सदस्य
2006रामेश्वर प्रसाद — बिहार विधान सभा का विघटन असंवैधानिक · कुलदीप नैयर — खुला मतपत्र वैध · 94वाँ संशोधन से बिहार हटाकर छत्तीसगढ़ एवं झारखंड जुड़े
2007आंध्र प्रदेश की विधान परिषद पुनः सृजित · राजेंद्र सिंह राणा (उ.प्र.) — अध्यक्ष के विलंब पर न्यायिक हस्तक्षेप
2010बी.पी. सिंघल — राज्यपाल को केवल विचारधारा के आधार पर नहीं हटाया जा सकता
2013लिली थॉमस — दोषसिद्धि पर सदस्यता तत्काल समाप्त; लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) अपास्त
2016नबाम रेबिया — राज्यपाल स्वविवेक से विधान सभा का सत्र आहूत नहीं कर सकता
2017बजट की तिथि 1 फरवरी; रेल बजट आम बजट में विलीन · कृष्ण कुमार सिंह — अध्यादेश पटल पर रखना अनिवार्य
2019104वाँ संशोधन — आंग्ल-भारतीय मनोनयन समाप्त (प्रभावी 25 जनवरी 2020) · जम्मू-कश्मीर की विधान परिषद समाप्त
2020कीशम मेघचंद्र सिंह — दल-बदल याचिकाओं पर तीन मास में निर्णय का मार्गदर्शन · आंध्र प्रदेश का उत्सादन-संकल्प (आज तक लंबित)
2021आकस्मिकता निधि ₹500 करोड़ से बढ़ाकर ₹30,000 करोड़ (वित्त अधिनियम, 2021)
2023पंजाब राज्य बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव — राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चित काल तक नहीं बैठ सकता · अस्थायी कर संग्रहण अधिनियम, 2023
8 अप्रैल 2025तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल — दस विधेयकों पर निष्क्रियता अवैध; समय-सीमा एवं “मानी गई अनुमति”
12 सितंबर 2025सी.पी. राधाकृष्णन भारत के 15वें उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति के रूप में शपथबद्ध
20 नवंबर 2025अनुच्छेद 143 का राष्ट्रपति-निर्देश — पाँच न्यायाधीशों की पीठ का परामर्शी मत: न्यायालय अनुच्छेद 200/201 पर समय-सीमा नहीं थोप सकते; “मानी गई अनुमति” असंवैधानिक

13.3 रटने योग्य निर्णायक तथ्य

550लोक सभा की अधिकतम संख्या (530+20)
250राज्य सभा की अधिकतम संख्या (238+12)
1/10संसद की गणपूर्ति — लोक सभा 55, राज्य सभा 25
14दिन — धन विधेयक पर राज्य सभा की सीमा
6सप्ताह — पुनः समवेत होने के बाद अध्यादेश की सीमा
15%मंत्रिपरिषद की सीमा (राज्य में न्यूनतम 12)
3अब तक की संयुक्त बैठकें
6राज्य जिनमें विधान परिषद है
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (समिति)    सूची-II (सदस्य-संख्या)
A. प्राक्कलन समिति   1. 22
B. लोक लेखा समिति   2. 31
C. प्रत्येक विभागीय स्थायी समिति   3. 30
D. कार्य मंत्रणा समिति (लोक सभा)   4. 15
कूट:

AA-1, B-3, C-2, D-4BA-3, B-1, C-4, D-2CA-3, B-1, C-2, D-4DA-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्राक्कलन समिति में 30 सदस्य होते हैं और सभी लोक सभा से; लोक लेखा समिति में 22 (15 लोक सभा + 7 राज्य सभा); प्रत्येक विभागीय स्थायी समिति में 31 (21 + 10); लोक सभा की कार्य मंत्रणा समिति में 15 सदस्य होते हैं, जिनके सभापति स्वयं अध्यक्ष होते हैं। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): धन विधेयक के संबंध में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।
कारण (R): राज्य सभा धन विधेयक को न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें संशोधन कर सकती है; उसे 14 दिन के भीतर विधेयक लौटाना ही होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) तथा (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं हैB(A) ग़लत है, किंतु (R) सही हैC(A) सही है, किंतु (R) ग़लत हैD(A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 108(1) का परंतुक स्पष्ट रूप से धन विधेयक को संयुक्त बैठक के दायरे से बाहर रखता है — अतः (A) सही है। इसका कारण ठीक वही है जो (R) में दिया गया है: अनुच्छेद 109 के अधीन राज्य सभा धन विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती और उसे 14 दिन में लौटाना होता है; न लौटाने पर विधेयक स्वतः पारित माना जाता है। जब गतिरोध संभव ही नहीं, तो संयुक्त बैठक की आवश्यकता भी नहीं — इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या है।

प्र.3 भारत के उपराष्ट्रपति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. उसके निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित तथा मनोनीत — दोनों प्रकार के सदस्य सम्मिलित होते हैं।
2. उसे हटाने का संकल्प संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, किंतु उसे दोनों सदनों में कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 66(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा होता है — मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं; अतः कथन 1 सही है। कथन 2 ग़लत है: अनुच्छेद 67(ख) के अधीन संकल्प केवल राज्य सभा में प्रस्तुत हो सकता है, वहाँ तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) से पारित होना चाहिए, और उसके बाद लोक सभा की सहमति चाहिए — दो-तिहाई बहुमत की कोई शर्त नहीं है। दो-तिहाई की शर्त राष्ट्रपति के महाभियोग (अनुच्छेद 61) में है।