2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था से लगभग 19–20 प्रश्न आए और उनमें
राज्य सभा की सीटें, लोक सभा अध्यक्ष, समितियाँ तथा अनुच्छेद-संख्या जैसे
बिंदु सीधे कार्यपालिका-विधायिका से थे। इस अध्याय से प्रश्न चार रूपों में आता है —
(क) सुमेलन — अनुच्छेद ↔ विषय, समिति ↔ सदस्य-संख्या, पद ↔ नियुक्तिकर्ता;
(ख) दो-कथन — जिसमें “कुल सदस्य” बनाम “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” या
“निर्वाचित” बनाम “मनोनीत” जैसा एक शब्द उत्तर पलट देता है;
(ग) कालक्रम — विधेयक की अवस्थाएँ, बजट की अवस्थाएँ, संयुक्त बैठकें;
(घ) नकारात्मक युग्म — “कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है”।
2025 के प्रश्न 141 में तो सीधे यही पूछा गया था कि संयुक्त बैठक का उपबंध अनुच्छेद 108 में है या 109 में —
एक अंक की दूरी केवल एक संख्या की है।
इस अध्याय की सीमा
उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायपालिका अध्याय 4.5 में हैं;
निर्वाचन आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, वित्त आयोग, संघ लोक सेवा आयोग तथा पंचायती राज एवं
नगरीय शासन अध्याय 4.6 में; संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध तथा तीनों आपातकाल
(अनुच्छेद 352, 356, 360) अध्याय 4.3 में; मौलिक अधिकार एवं नीति-निदेशक तत्व
अध्याय 4.2 में। यहाँ केवल उतना संकेत है जितना कार्यपालिका-विधायिका को समझने के लिए अनिवार्य है।
1. राष्ट्रपति — निर्वाचन, अर्हता, महाभियोग एवं शक्तियाँ
1.1 संघीय कार्यपालिका का ढाँचा
संविधान का भाग V संघ से संबंधित है और उसका अध्याय I संघीय कार्यपालिका का।
अनुच्छेद 52 केवल इतना कहता है — “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”अनुच्छेद 53(1) संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है, जिसे वह
स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से संविधान के अनुसार प्रयोग करेगा।
अनुच्छेद 53(2) रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश (Supreme Command) राष्ट्रपति में
निहित करता है — किंतु इसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा, अर्थात् युद्ध की घोषणा या शांति-स्थापना
संसद की स्वीकृति के अधीन है।
संघीय कार्यपालिका में सम्मिलित हैं — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद
तथा भारत का महान्यायवादी (अनुच्छेद 76)। ध्यान रहे कि व्यवहार में राष्ट्रपति
नाममात्र (de jure) कार्यपालिका है और वास्तविक (de facto) कार्यपालिका मंत्रिपरिषद है —
यही संसदीय शासन-पद्धति का सार है, जिसे संविधान अनुच्छेद 74 के माध्यम से लागू करता है।
1.2 निर्वाचक मंडल — अनुच्छेद 54
राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता सीधे नहीं करती; उसे एक निर्वाचक मंडल (Electoral College)
चुनता है, जिसमें केवल दो प्रकार के सदस्य होते हैं —
संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य — लोक सभा तथा राज्य सभा;
राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य;
अनुच्छेद 54 का स्पष्टीकरण (70वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया) —
इसमें राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा संघ राज्यक्षेत्र पुदुचेरी की
विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भी सम्मिलित हैं।
जम्मू-कश्मीर का प्रश्न — अनुच्छेद 54 का स्पष्टीकरण नाम से केवल दिल्ली तथा
पुदुचेरी का उल्लेख करता है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के संघ राज्यक्षेत्र बन जाने के बाद
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 13 ने पुदुचेरी पर लागू
अनुच्छेद 239क के उपबंध जम्मू-कश्मीर पर भी लागू कर दिए — इसी आधार पर यह माना जाता है कि
वहाँ की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य भी निर्वाचक मंडल में आएँगे, यद्यपि अनुच्छेद 54 में संशोधन नहीं हुआ
और यह बिंदु विधिवेत्ताओं में विवादित रहा है। व्यावहारिक प्रभाव स्पष्ट है: 2017 के
निर्वाचन में सांसद के मत का मूल्य 708 था, किंतु 2022 में जम्मू-कश्मीर में
विधान सभा गठित न होने के कारण यह घटकर 700 रह गया। 2024 में वहाँ विधान सभा के पुनर्गठन के
बाद अगली गणना पुनः बदलेगी। परीक्षा के लिए निश्चित तथ्य यही है कि यह मूल्य 1971 की जनसंख्या तथा
विधायकों की वास्तविक संख्या पर निर्भर है, अतः स्थिर नहीं है।
सावधानी — निर्वाचक मंडल में कौन नहीं है
संसद के मनोनीत सदस्य (राज्य सभा के 12) — राष्ट्रपति के निर्वाचन में
भाग नहीं लेते, क्योंकि अनुच्छेद 54 में शब्द “निर्वाचित सदस्य” है।
किंतु महाभियोग (अनुच्छेद 61) में वे भाग लेते हैं — क्योंकि वहाँ शब्द
“सदन की कुल सदस्य-संख्या” है। यह दो-कथन प्रश्न का सर्वाधिक प्रिय बिंदु है।
विधान परिषदों के सदस्य — किसी भी राज्य की विधान परिषद का कोई सदस्य
राष्ट्रपति के निर्वाचन में मत नहीं देता।
राज्य विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य — भाग नहीं लेते।
अन्य संघ राज्यक्षेत्रों (जैसे चंडीगढ़, लक्षद्वीप) के लोक सभा सदस्य संसद-सदस्य के नाते
मत देते हैं, पर वहाँ विधान सभा न होने से कोई विधायक-मत नहीं होता।
1.3 निर्वाचन पद्धति — अनुच्छेद 55
अनुच्छेद 55 तीन बातें तय करता है — (1) विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में
यथासंभव एकरूपता होगी; (2) राज्यों तथा संघ के बीच भी समता होगी; और
(3) निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व
(Proportional Representation by means of the Single Transferable Vote) पद्धति से, तथा मतदान
गुप्त मतपत्र द्वारा होगा।
1. विधायक के मत का मूल्यराज्य की जनसंख्या ÷ विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या, फिर ÷ 1000 — शेष 500 या अधिक हो तो मूल्य में 1 जोड़ दिया जाता है
→
2. सांसद के मत का मूल्यसभी राज्यों के विधायकों के मतों का कुल मूल्य ÷ संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या — आधे से अधिक भिन्न को 1 गिना जाता है, शेष छोड़ दी जाती है
→
3. निर्वाचन कोटाकुल वैध मतों का मूल्य ÷ 2, फिर उसमें 1 जोड़ दें — इतने मूल्य का प्रथम वरीयता मत पाने वाला विजयी। न मिलने पर सबसे कम मत वाले की वरीयताएँ हस्तांतरित
“जनसंख्या” का अर्थ — अनुच्छेद 55 का स्पष्टीकरण कहता है कि इसका अर्थ वह अंतिम जनगणना है
जिसके सुसंगत आँकड़े प्रकाशित हो चुके हों; किंतु 2026 के बाद होने वाली प्रथम जनगणना के आँकड़े
प्रकाशित होने तक इसका अर्थ केवल 1971 की जनगणना है। (यह सीमा 84वें संविधान संशोधन, 2001
द्वारा 2000 से बढ़ाकर 2026 की गई थी।) इसी कारण आज भी राष्ट्रपति-चुनाव का गणित 1971 की जनसंख्या पर चलता है।
अनुच्छेद 71 — राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उठे सभी विवादों की जाँच एवं
विनिश्चय उच्चतम न्यायालय करेगा और उसका निर्णय अंतिम होगा।
अनुच्छेद 71(4) का निर्णायक बिंदु — निर्वाचक मंडल में किसी रिक्ति के आधार पर
निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती। अर्थात् किसी राज्य की विधान सभा भंग हो, तब भी चुनाव रोका नहीं जाता।
1.4 अर्हताएँ, पद-शर्तें एवं पदावधि
अनुच्छेद 58 — अर्हताएँ: (1) भारत का नागरिक हो; (2) 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो;
(3) लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने की अर्हता रखता हो; (4) भारत सरकार, किसी राज्य सरकार अथवा किसी
स्थानीय/अन्य प्राधिकारी के अधीन लाभ का कोई पद धारण न करता हो।
अनुच्छेद 58(2) का स्पष्टीकरण — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, किसी राज्य का राज्यपाल तथा
संघ या राज्य का मंत्री “लाभ का पद” धारण करने वाला नहीं माना जाता। इसलिए कोई राज्यपाल अथवा
कार्यरत मंत्री बिना त्यागपत्र दिए राष्ट्रपति-पद का उम्मीदवार हो सकता है।
नामांकन की शर्त (राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम, 1952 में संशोधन के बाद) —
नामांकन-पत्र पर 50 प्रस्तावक एवं 50 अनुमोदक के हस्ताक्षर तथा
₹15,000 की ज़मानत राशि आवश्यक है।
अनुच्छेद 56 — पदावधि: पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष। त्यागपत्र
उपराष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है; उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक वह पद पर बना रहता है।
अनुच्छेद 57 — पुनर्निर्वाचन का पात्र; कोई सीमा नहीं। (केवल डॉ. राजेंद्र प्रसाद
दो बार निर्वाचित हुए।)
अनुच्छेद 60 — शपथभारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा, उनकी अनुपस्थिति में
उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
अनुच्छेद 62 — पदावधि समाप्ति से रिक्ति हो तो निर्वाचन पदावधि समाप्त होने से पूर्व
पूरा होगा; मृत्यु/त्यागपत्र/पदच्युति से रिक्ति हो तो छह मास के भीतर निर्वाचन आवश्यक है और
नया राष्ट्रपति पूरे 5 वर्ष के लिए पद धारण करेगा।
अनुच्छेद 59 — राष्ट्रपति संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता; यदि कोई
सदस्य निर्वाचित होता है तो पद ग्रहण की तिथि से उसका स्थान रिक्त समझा जाएगा। उसकी उपलब्धियाँ पद-अवधि में
घटाई नहीं जा सकतीं, और वे भारत की संचित निधि पर भारित हैं।
अनुच्छेद 361 — पद-अवधि में राष्ट्रपति के विरुद्ध कोई दांडिक कार्यवाही नहीं; सिविल
कार्यवाही के लिए दो मास की पूर्व सूचना आवश्यक।
1.5 महाभियोग — अनुच्छेद 61
राष्ट्रपति को केवल “संविधान के अतिक्रमण” (violation of the Constitution) के आधार पर
हटाया जा सकता है — यह पद अकेला ऐसा है जिसके लिए संविधान महाभियोग शब्द का प्रयोग करता है।
ध्यान दें कि “संविधान का अतिक्रमण” संविधान में कहीं परिभाषित नहीं है।
1. आरोप कहाँ सेसंसद का कोई भी सदन आरोप लगा सकता है — प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के कम-से-कम एक-चौथाई सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित हो तथा 14 दिन की लिखित सूचना दी गई हो
→
2. प्रथम सदन में पारितउस सदन की कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित — “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” नहीं, कुल सदस्य-संख्या
→
3. दूसरा सदन जाँच करेदूसरा सदन स्वयं आरोप की जाँच करेगा या कराएगा; राष्ट्रपति को उपस्थित होने एवं प्रतिनिधित्व का अधिकार है (वकील/महान्यायवादी के माध्यम से)
→
4. दूसरे सदन में संकल्पजाँच करने वाले सदन में भी कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित हो — पारित होते ही उसी तिथि से राष्ट्रपति पदच्युत
सावधानी — महाभियोग के चार भ्रम-बिंदु
आरोप किसी भी सदन से आरंभ हो सकता है — यह “केवल लोक सभा से” नहीं है (जैसा अमेरिका में है)।
दोनों चरणों में बहुमत कुल सदस्य-संख्या का दो-तिहाई है, उपस्थित एवं मतदान करने वालों का नहीं।
संसद के मनोनीत सदस्य भाग लेते हैं (वे “कुल सदस्य-संख्या” में गिने जाते हैं),
जबकि निर्वाचन में वे भाग नहीं लेते।
राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य महाभियोग में भाग नहीं लेते — यद्यपि वे निर्वाचन में
भाग लेते हैं। अर्थात् जो राष्ट्रपति को चुनते हैं, वही उसे हटाते नहीं। आज तक किसी राष्ट्रपति पर महाभियोग
नहीं चला है।
1.6 राष्ट्रपति की शक्तियाँ — छह वर्गों में
सुमेलन-तालिका 1 : राष्ट्रपति की शक्तियाँ ↔ प्रमुख उपबंध
शक्ति-वर्ग
मुख्य अंश
अनुच्छेद
कार्यकारी
संघ का समस्त कार्यपालक कार्य उसके नाम से; प्रधानमंत्री एवं अन्य मंत्रियों, महान्यायवादी, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, राज्यपालों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, राजदूतों की नियुक्ति; कार्य-संचालन के नियम बनाना; अंतर-राज्य परिषद का गठन
53, 75, 76, 77, 155, 263, 324
विधायी
संसद का सत्र आहूत/सत्रावसान/लोक सभा का विघटन; अभिभाषण एवं संदेश; राज्य सभा में 12 सदस्यों का मनोनयन; कुछ विधेयकों के लिए पूर्व सिफ़ारिश; विधेयकों पर अनुमति/वीटो; अध्यादेश; CAG, UPSC, वित्त आयोग आदि के प्रतिवेदन सदन के पटल पर रखवाना
85, 86, 87, 80(1)(क), 111, 123
वित्तीय
वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) सदन के समक्ष रखवाना; धन विधेयक केवल उसकी पूर्व सिफ़ारिश से पुरःस्थापित; अनुदान की कोई माँग उसकी सिफ़ारिश के बिना नहीं; आकस्मिकता निधि से अग्रिम; प्रत्येक पाँचवें वर्ष वित्त आयोग का गठन
112, 117, 113(3), 267, 280
न्यायिक
उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति; क्षमादान आदि; विधि या तथ्य के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श (राय बाध्यकारी नहीं)
124, 217, 72, 143
आपातकालीन
राष्ट्रीय आपात, राष्ट्रपति शासन तथा वित्तीय आपात की उद्घोषणा (विस्तार अध्याय 4.3 में)
352, 356, 360
राजनयिक एवं सैन्य
अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ एवं करार उसके नाम से (संसद के अनुमोदन के अधीन); अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व; रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश; थल, जल एवं वायु सेनाध्यक्षों की नियुक्ति
53(2), 253
राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश किन विधेयकों के लिए अनिवार्य है
धन विधेयक (अनु. 117(1)) तथा अनु. 110(1) के उपखंड (क)–(च) के विषय वाला कोई भी विधेयक/संशोधन;
नए राज्य का निर्माण या विद्यमान राज्यों की सीमा/नाम में परिवर्तन वाला विधेयक (अनु. 3);
वह विधेयक जो भारत की संचित निधि से व्यय अंतर्ग्रस्त करता है — यहाँ सिफ़ारिश
पुरःस्थापन के लिए नहीं, पारित किए जाने के लिए चाहिए (अनु. 117(3));
राज्यों के बीच व्यापार-वाणिज्य की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने वाला राज्य-विधेयक (अनु. 304(ख) का परंतुक)।
1.7 क्षमादान की शक्ति — अनुच्छेद 72
अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति के दंड को
क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार देने अथवा दंडादेश को निलंबित, परिहार या लघुकृत
करने की शक्ति देता है — तीन स्थितियों में: (क) जहाँ दंड सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिया गया हो;
(ख) जहाँ अपराध संघ की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले किसी विधि-विषय से संबंधित हो;
(ग) जहाँ दंडादेश मृत्युदंड हो।
सुमेलन-तालिका 2 : क्षमादान के पाँच रूप — अर्थ का भेद
रूप
अंग्रेज़ी
प्रभाव
क्षमा
Pardon
दंड, दंडादेश एवं निरर्हताएँ — तीनों समाप्त; व्यक्ति ऐसा हो जाता है मानो कभी दोषसिद्ध ही न हुआ हो
लघुकरण
Commutation
दंड का स्वरूप बदलना — जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में, कठोर को साधारण कारावास में
परिहार
Remission
दंड की अवधि घटाना, स्वरूप वही — जैसे दो वर्ष के कठोर कारावास को एक वर्ष का कठोर कारावास
विराम
Respite
किसी विशेष परिस्थिति के कारण कम दंड — जैसे गर्भवती स्त्री या शारीरिक अशक्तता
प्रविलंबन
Reprieve
दंडादेश के निष्पादन पर अस्थायी रोक — प्रायः दया याचिका के निपटारे तक
राष्ट्रपति · अनुच्छेद 72
सेना न्यायालय द्वारा दिए दंड पर क्षमादान — हाँ
मृत्युदंड में क्षमा — हाँ; भारत में मृत्युदंड क्षमा करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास
संघ की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विधि-विषयों के अपराध
राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य विधि के अपराधों पर भी
राज्यपाल · अनुच्छेद 161
सेना न्यायालय के दंड पर क्षमादान — नहीं
मृत्युदंड को निलंबित, परिहार या लघुकृत कर सकता है, पर क्षमा नहीं (अनु. 72(3) यह शक्ति सुरक्षित रखता है)
केवल राज्य की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विधि-विषयों के अपराध
राज्यपाल की क्षमा राष्ट्रपति की क्षमा से छोटी है, समानांतर नहीं
मारू राम बनाम भारत संघ (1980) — अनुच्छेद 72 की शक्ति राष्ट्रपति
मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही प्रयोग करेगा; यह व्यक्तिगत विवेक नहीं।
केहर सिंह बनाम भारत संघ (1988) — राष्ट्रपति दया याचिका पर न्यायालय के निर्णय के
गुण-दोष पर पुनर्विचार कर सकता है; उसे कारण बताने की बाध्यता नहीं; पर यह शक्ति न्यायिक पुनर्विलोकन से
पूर्णतः परे नहीं।
एपुरु सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (2006) — क्षमादान का आदेश सीमित आधारों पर
न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है — जैसे बिना विचार-विमर्श, दुर्भावना, असंगत आधार अथवा सुसंगत तथ्यों की उपेक्षा।
शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014) — दया याचिका के निपटारे में
अत्यधिक एवं अस्पष्टीकृत विलंब मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का आधार है (अनुच्छेद 21)।
1.8 अध्यादेश — अनुच्छेद 123
अध्यादेश राष्ट्रपति की सर्वाधिक विलक्षण विधायी शक्ति है — कार्यपालिका द्वारा विधि-निर्माण।
यह उपबंध 1935 के भारत शासन अधिनियम से लिया गया है और इसका कोई समतुल्य ब्रिटेन या अमेरिका में नहीं है।
शर्त — संसद के दोनों सदनों के सत्र में होने के अतिरिक्त किसी भी समय;
अर्थात् यदि एक भी सदन सत्र में नहीं है तो अध्यादेश जारी किया जा सकता है।
राष्ट्रपति का यह समाधान होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनमें तुरंत कार्रवाई
आवश्यक है; वह इसे मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही जारी करता है।
अध्यादेश का वही बल एवं प्रभाव है जो संसद के अधिनियम का — पर वह उन्हीं विषयों पर हो सकता है
जिन पर संसद विधि बना सकती है, और मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता।
अवधि — इसे दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य है और यह
संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा;
यदि उससे पहले दोनों सदन असम्मति के संकल्प पारित कर दें तो दूसरे संकल्प के पारित होते ही समाप्त।
यदि दोनों सदन अलग-अलग तिथियों को समवेत हों तो छह सप्ताह बाद वाली तिथि से गिने जाएँगे।
अधिकतम जीवन-काल — छह सप्ताह + दो सत्रों के बीच अधिकतम छह मास का अंतराल =
लगभग साढ़े सात मास (6 मास + 6 सप्ताह)। राष्ट्रपति इसे कभी भी वापस ले सकता है।
डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) — बिहार में एक ही अध्यादेश को वर्षों तक
बार-बार पुनःप्रख्यापित (re-promulgation) करना “संविधान के साथ छल” घोषित किया गया।
कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) — सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि
अध्यादेश को सदन के पटल पर रखना अनिवार्य है, और पुनःप्रख्यापन संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है;
अध्यादेश समाप्त होने पर अधिकार स्वतः स्थायी नहीं हो जाते।
राज्यपाल की समतुल्य शक्ति अनुच्छेद 213 में है — किंतु वहाँ कुछ विषयों पर
राष्ट्रपति के पूर्व अनुदेश आवश्यक हैं।
1.9 वीटो की शक्ति — अनुच्छेद 111
संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत होने पर उसके पास तीन विकल्प हैं —
(1) अनुमति दे दे; (2) अनुमति रोक ले; अथवा (3) यदि वह
धन विधेयक नहीं है तो उसे सदनों को पुनर्विचार के लिए लौटा दे। लौटाए गए विधेयक को
यदि सदन संशोधन सहित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर दें, तो राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य है —
अर्थात् वह इसे केवल एक बार लौटा सकता है।
वीटो के तीन प्रकार — भारत में“पूर्ण – निलंबनकारी – जेबी”
पूर्ण वीटो (Absolute) — अनुमति रोक लेना; विधेयक समाप्त।
निलंबनकारी वीटो (Suspensive) — पुनर्विचार हेतु लौटाना; सदन पुनः पारित कर दें तो अनुमति अनिवार्य।
जेबी वीटो (Pocket) — न अनुमति दे, न रोके, न लौटाए — अनिश्चित काल तक रोके रखे; संभव इसलिए है
क्योंकि अनुच्छेद 111 कोई समय-सीमा नहीं देता।
अर्हक वीटो (Qualified veto) — जिसे विधानमंडल विशेष बहुमत से निरस्त कर सके —
भारत में नहीं है, वह अमेरिकी राष्ट्रपति के पास है। यही इस विषय का सबसे बड़ा ट्रैप है।
सुमेलन-तालिका 3 : वीटो का प्रकार ↔ प्रसिद्ध उदाहरण
वीटो
उदाहरण
राष्ट्रपति एवं वर्ष
पूर्ण वीटो
पेप्सू विनियोग विधेयक — पेप्सू में राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद से पारित, किंतु शासन हटने के बाद अनुमति रोक ली गई
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, 1954
पूर्ण वीटो
संसद सदस्य वेतन, भत्ता एवं पेंशन (संशोधन) विधेयक — लोक सभा के विघटन से ठीक पहले पारित
आर. वेंकटरमन, 1991
जेबी वीटो
भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक — डाक पर सरकारी निगरानी का प्रावधान; न अनुमति दी गई, न लौटाया गया
ज्ञानी ज़ैल सिंह, 1986
निलंबनकारी वीटो
कोई भी गैर-धन विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाना — संसद पुनः पारित करे तो अनुमति बाध्यकारी
अनुच्छेद 111 का परंतुक
सावधानी — वीटो के चार भ्रम
धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से ही आता है, इसलिए वह उसे
पुनर्विचार हेतु लौटा नहीं सकता — केवल अनुमति दे सकता है या रोक सकता है।
संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को अनुमति देनी ही होगी —
24वें संविधान संशोधन, 1971 ने अनुच्छेद 368(2) में यह बाध्यता जोड़ दी। अतः यहाँ कोई वीटो नहीं।
राज्य-विधेयक जो राज्यपाल ने राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा हो (अनु. 201) — वहाँ राष्ट्रपति के पास
पूर्ण वीटो भी है और उसकी कोई समय-सीमा भी नहीं; पुनर्विचार के बाद भी अनुमति देना उसके लिए
बाध्यकारी नहीं।
जेबी वीटो कोई संवैधानिक शब्द नहीं — यह केवल समय-सीमा के अभाव से उत्पन्न व्यावहारिक स्थिति है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — रायसीना पहाड़ी तक उत्तर प्रदेश का रास्ता
राम नाथ कोविंद — भारत के 14वें राष्ट्रपति (2017–2022) — का जन्म
कानपुर देहात ज़िले के परौंख गाँव में हुआ था। वे राष्ट्रपति बनने से पूर्व
उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सदस्य तथा बिहार के राज्यपाल रह चुके थे।
उत्तर प्रदेश ने देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री दिए — जवाहरलाल नेहरू (फूलपुर),
लाल बहादुर शास्त्री (इलाहाबाद), इंदिरा गांधी (रायबरेली), चौधरी चरण सिंह (बागपत), राजीव गांधी (अमेठी),
वी.पी. सिंह (फतेहपुर), चंद्रशेखर (बलिया), अटल बिहारी वाजपेयी (लखनऊ) तथा नरेंद्र मोदी (वाराणसी) —
सभी ने किसी-न-किसी समय उत्तर प्रदेश की लोक सभा सीट का प्रतिनिधित्व किया।
महाभियोग की गणना में उत्तर प्रदेश का महत्व इसलिए है कि लोक सभा में उसकी 80 सीटें
देश में सर्वाधिक हैं — किसी भी दो-तिहाई बहुमत की गणित इसी राज्य से आरंभ होती है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह शक्ति तभी प्रयोग की जा सकती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों अथवा उनमें से कोई एक सत्र में न हो। 2. प्रत्येक अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा। 3. अध्यादेश उन्हीं विषयों पर प्रख्यापित किया जा सकता है जिन पर संसद विधि बना सकती है, किन्तु वह किसी मूल अधिकार का अतिक्रमण कर सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 123(1) के अनुसार अध्यादेश तभी प्रख्यापित हो सकता है जब दोनों सदन सत्र में न हों या कोई एक सत्र में न हो, तथा वह संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर समाप्त हो जाता है — अतः कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 123(3) के अनुसार अध्यादेश की विधायी शक्ति संसद की शक्ति के सह-विस्तृत है, इसलिए वह मूल अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता; अतः कथन 3 गलत है।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): राज्यपाल की क्षमादान शक्ति राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति से संकुचित है। कारण (R): राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता तथा सेना न्यायालय (कोर्ट मार्शल) द्वारा दिए गए दंड के संबंध में उसे क्षमादान की शक्ति प्राप्त नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति सेना न्यायालय के दंड तथा मृत्युदंड, दोनों के मामलों में क्षमा दे सकता है, जबकि अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को ये दोनों शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं। राज्यपाल मृत्युदंड का निलंबन, परिहार या लघुकरण अवश्य कर सकता है, किन्तु उसे क्षमा (pardon) नहीं कर सकता। अतः दोनों कथन सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
प्र.3सूची-I (राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रकार) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. क्षमा (Pardon) B. लघुकरण (Commutation) C. परिहार (Remission) D. प्रविलंबन (Reprieve) सूची-II: 1. दंड के स्वरूप में परिवर्तन किए बिना उसकी अवधि को घटा देना 2. दोषसिद्धि तथा दंड दोनों को समाप्त कर अपराधी को पूर्णतः दोषमुक्त कर देना 3. दंड के निष्पादन को कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से रोक देना 4. एक दंड के स्थान पर उससे हल्के प्रकार का दंड दे देना कूट:
उत्तर: (A)अनुच्छेद 72 के अंतर्गत क्षमा (Pardon) दोषसिद्धि एवं दंड दोनों समाप्त कर देती है; लघुकरण (Commutation) में दंड का स्वरूप बदलकर हल्का कर दिया जाता है (यथा मृत्युदंड को कठोर कारावास में); परिहार (Remission) में दंड का स्वरूप वही रहता है, केवल अवधि घट जाती है; प्रविलंबन (Reprieve) दंड के निष्पादन पर अस्थायी रोक है। विराम (Respite) में विशेष परिस्थिति, यथा गर्भावस्था, के कारण कम दंड दिया जाता है। (UPPSC में बहु-पूछित अवधारणा)
2. उपराष्ट्रपति — निर्वाचन, पदच्युति एवं सभापति की भूमिका
2.1 पद की प्रकृति
उपराष्ट्रपति का पद अनुच्छेद 63 से आरंभ होता है — “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।”
यह पद अमेरिकी संविधान से लिया गया है, पर एक निर्णायक अंतर के साथ: अमेरिका में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की
मृत्यु पर शेष अवधि के लिए स्वयं राष्ट्रपति बन जाता है; भारत में वह केवल
अधिकतम छह मास तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, उसके भीतर नया निर्वाचन अनिवार्य है।
उपराष्ट्रपति का मुख्य कार्य अनुच्छेद 64 में है — वह राज्य सभा का पदेन सभापति है।
इसी कारण वह न लोक सभा का सदस्य होता है, न राज्य सभा का; वह राज्य सभा का सदस्य नहीं, केवल
उसका पीठासीन अधिकारी है, और इसीलिए सामान्य मतदान में भाग नहीं लेता — मत बराबर होने पर
केवल निर्णायक मत (casting vote) देता है। अनुच्छेद 64 का परंतुक कहता है कि जब वह राष्ट्रपति के
रूप में कार्य कर रहा हो, तब वह सभापति के कर्तव्य नहीं निभाएगा और राज्य सभा के वेतन का हकदार नहीं होगा —
उस अवधि में उसे राष्ट्रपति का वेतन मिलता है और सदन का संचालन उपसभापति करते हैं।
2.2 निर्वाचन — अनुच्छेद 66
निर्वाचक मंडल — केवल संसद के दोनों सदनों के सदस्य; इसमें
मनोनीत सदस्य भी सम्मिलित हैं। किसी राज्य विधान सभा या विधान परिषद का कोई सदस्य भाग नहीं लेता।
पद्धति — एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व; मतदान गुप्त मतपत्र से।
11वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1961 ने दो परिवर्तन किए — (क) निर्वाचक मंडल की
“संयुक्त बैठक” की शर्त हटा दी; (ख) यह जोड़ा कि निर्वाचक मंडल में किसी रिक्ति के आधार पर
निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती।
अर्हताएँ (अनु. 66(3)) — भारत का नागरिक; 35 वर्ष की आयु;
राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने की अर्हता (राष्ट्रपति के लिए यह लोक सभा की अर्हता है);
लाभ का कोई पद न हो।
नामांकन — 20 प्रस्तावक एवं 20 अनुमोदक तथा ₹15,000 ज़मानत।
शपथ (अनु. 69) — राष्ट्रपति दिलाते हैं। (राष्ट्रपति की शपथ मुख्य न्यायाधीश
दिलाते हैं — यह अंतर पूछा जाता है।)
पदावधि (अनु. 67) — 5 वर्ष; त्यागपत्र राष्ट्रपति को; पुनर्निर्वाचन का पात्र।
डॉ. एस. राधाकृष्णन तथा मोहम्मद हामिद अंसारी — दोनों लगातार दो कार्यकाल तक रहे।
विवाद — उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद भी उच्चतम न्यायालय तय करता है
(अनु. 71)।
2.3 हटाने की प्रक्रिया — अनुच्छेद 67(ख)
यह पूरे संविधान की सबसे अनोखी पदच्युति-प्रक्रिया है, और इसीलिए परीक्षा का स्थायी बिंदु —
1. केवल राज्य सभा में आरंभसंकल्प केवल राज्य सभा में प्रस्तुत हो सकता है — लोक सभा में नहीं। 14 दिन की पूर्व सूचना अनिवार्य
→
2. राज्य सभा में पारित“तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत” से — अर्थात् प्रभावी बहुमत (effective majority), न कि दो-तिहाई और न ही उपस्थित सदस्यों का बहुमत
→
3. लोक सभा की सहमतिलोक सभा उससे सहमत हो — वहाँ साधारण बहुमत पर्याप्त है
→
4. कोई आधार नहींसंविधान कोई आधार निर्धारित नहीं करता — “संविधान का अतिक्रमण” जैसी कोई शर्त यहाँ नहीं है; यह महाभियोग नहीं कहलाता
सावधानी — राष्ट्रपति बनाम उपराष्ट्रपति की पदच्युति
राष्ट्रपति → महाभियोग, आधार निर्धारित (संविधान का अतिक्रमण), किसी भी सदन से आरंभ,
दोनों सदनों में कुल सदस्य-संख्या का दो-तिहाई।
उपराष्ट्रपति → महाभियोग नहीं, कोई आधार निर्धारित नहीं, केवल राज्य सभा से आरंभ,
राज्य सभा में प्रभावी बहुमत + लोक सभा में साधारण बहुमत।
उपराष्ट्रपति उस सदन का पीठासीन अधिकारी है जिसमें उसे हटाने का प्रस्ताव आता है — अतः उस चर्चा के दौरान
वह पीठासीन नहीं हो सकता (यही तर्क लोक सभा अध्यक्ष पर भी लागू होता है, अनु. 96)।
राष्ट्रपति
निर्वाचक मंडल — संसद के निर्वाचित सदस्य + राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य + दिल्ली, पुदुचेरी, जम्मू-कश्मीर
अर्हता — लोक सभा सदस्यता की अर्हता, 35 वर्ष
शपथ — भारत का मुख्य न्यायाधीश
त्यागपत्र — उपराष्ट्रपति को
हटाना — महाभियोग, अनु. 61, दोनों सदनों में 2/3 (कुल सदस्य-संख्या)
मत का मूल्य असमान — जनसंख्या-आधारित
उपराष्ट्रपति
निर्वाचक मंडल — संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (मनोनीत सहित); कोई विधायक नहीं
अर्हता — राज्य सभा सदस्यता की अर्हता, 35 वर्ष
शपथ — राष्ट्रपति
त्यागपत्र — राष्ट्रपति को
हटाना — अनु. 67(ख), राज्य सभा में प्रभावी बहुमत + लोक सभा की सहमति
सबका मत-मूल्य समान (एक सदस्य = एक मत)
अनुच्छेद 65 — राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र, पदच्युति या अन्य कारण से पद रिक्त होने पर
उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा, तथा राष्ट्रपति के अनुपस्थित/अस्वस्थ होने पर
उसके कृत्यों का निर्वहन करेगा। उसे राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ एवं उन्मुक्तियाँ प्राप्त होंगी।
यदि उपराष्ट्रपति का पद भी रिक्त हो, तो राष्ट्रपति (कृत्यों का निर्वहन) अधिनियम, 1969 के अधीन
भारत का मुख्य न्यायाधीश, और उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश,
राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करेंगे।
1969 का अनूठा वर्ष — राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन का पद पर निधन हुआ, तब
उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने; गिरि ने चुनाव लड़ने के लिए त्यागपत्र दे दिया,
तब मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया।
हिदायतुल्लाह आगे चलकर स्वयं उपराष्ट्रपति (1979–84) भी बने — वे भारत के एकमात्र व्यक्ति हैं
जो मुख्य न्यायाधीश, कार्यवाहक राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति — तीनों रहे।
वर्तमान स्थिति — जगदीप धनखड़ ने जुलाई 2025 में त्यागपत्र दे दिया;
9 सितंबर 2025 को हुए निर्वाचन के बाद सी.पी. राधाकृष्णन ने
12 सितंबर 2025 को भारत के 15वें उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति
के रूप में शपथ ली।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के साथ-साथ राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट सदस्य भी सम्मिलित होते हैं। 2. 70वें संविधान संशोधन के पश्चात राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भी इस निर्वाचक मंडल का भाग हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधान सभाओं के केवल निर्वाचित सदस्य होते हैं; नामनिर्दिष्ट सदस्य तथा विधान परिषद के सदस्य इसमें सम्मिलित नहीं होते — अतः कथन 1 गलत है। 70वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा दिल्ली तथा पुडुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को इसमें जोड़ा गया, अतः कथन 2 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से किन संकल्पों को पारित करने के लिए 'प्रभावी बहुमत' (Effective Majority) अपेक्षित है? 1. राज्य सभा में उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प 2. लोक सभा के अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प 3. राज्य सभा के उपसभापति को उसके पद से हटाने का संकल्प 4. उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने का समावेदन नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रभावी बहुमत सदन की प्रभावी संख्या (कुल संख्या में से रिक्तियाँ घटाकर) के 50 प्रतिशत से अधिक होता है और इसका प्रयोग अनुच्छेद 67(ख), 90 तथा 94 के अधीन क्रमशः उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने में होता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए विशेष बहुमत (Special Majority) आवश्यक है, प्रभावी बहुमत नहीं। अतः केवल 1, 2 और 3 सही हैं।
प्र.3भारत का उपराष्ट्रपति, जो राज्य सभा का पदेन सभापति भी होता है, किसके द्वारा निर्वाचित किया जाता है?
Aकेवल राज्य सभा के सदस्यों द्वाराBसंसद के दोनों सदनों के निर्वाचित एवं नामनिर्दिष्ट, दोनों प्रकार के सदस्यों द्वाराCसंसद के दोनों सदनों तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वाराDसंसद के दोनों सदनों के केवल निर्वाचित सदस्यों द्वारा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों — निर्वाचित तथा नामनिर्दिष्ट — से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है। राज्य विधानमंडलों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती, जो इसे राष्ट्रपति के निर्वाचन से अलग करता है। वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने 12 सितम्बर, 2025 को शपथ ली।
3. प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 74 से 78
3.1 अनुच्छेद 74 — सलाह देने वाली परिषद
अनुच्छेद 74(1) कहता है — “राष्ट्रपति की सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी,
जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।”
इस एक वाक्य में दो संशोधनों का इतिहास छिपा है —
1950मूल पाठ — “सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद होगी”; “सलाह के अनुसार कार्य करेगा” शब्द नहीं थे। सलाह की बाध्यता केवल परंपरा से थी
197642वाँ संविधान संशोधन — जोड़ा गया कि राष्ट्रपति सलाह के अनुसार कार्य करेगा। सलाह अब स्पष्ट रूप से बाध्यकारी
197844वाँ संविधान संशोधन — परंतुक जोड़ा: राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर पुनर्विचार करने को कह सकता है, किंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने को बाध्य है — “एक बार लौटाने” की शक्ति
अनुच्छेद 74(2) — यह प्रश्न कि मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी,
किसी न्यायालय में जाँच का विषय नहीं होगा। न्यायालय यह पूछ सकता है कि
सलाह दी गई थी या नहीं तथा उस पर आधारित कार्रवाई वैध है या नहीं, पर
सलाह की अंतर्वस्तु नहीं। एस.आर. बोम्मई (1994) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 74(2) उन
सामग्रियों को संरक्षण नहीं देता जिनके आधार पर सलाह दी गई — वे न्यायिक जाँच के लिए मँगाई जा सकती हैं।
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) — सात न्यायाधीशों की पीठ ने अंतिम रूप से तय किया कि
भारत का राष्ट्रपति तथा राज्यपाल संवैधानिक प्रधान हैं और अपनी शक्तियों का प्रयोग
मंत्रिपरिषद की सलाह से ही करते हैं — “व्यक्तिगत संतुष्टि” का अर्थ “सरकार की संतुष्टि” है।
3.2 अनुच्छेद 75 — नियुक्ति, सीमा एवं उत्तरदायित्व
सुमेलन-तालिका 4 : अनुच्छेद 75 के खंड ↔ उपबंध
खंड
उपबंध
परीक्षा-बिंदु
75(1)
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा; अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा
प्रधानमंत्री “निर्वाचित” नहीं होता — नियुक्त होता है
75(1क)
प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या लोक सभा के कुल सदस्यों के 15% से अधिक नहीं होगी
91वाँ संविधान संशोधन, 2003 द्वारा जोड़ा; संघ के लिए कोई न्यूनतम नहीं; 543 का 15% = 81
75(1ख)
दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के कारण निरर्हित सदस्य, निरर्हता की अवधि तक मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता
91वाँ संशोधन, 2003 — “निरर्हित होकर पिछले दरवाज़े से मंत्री” का मार्ग बंद
75(2)
मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगे
यही व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का आधार — राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी मंत्री को हटा सकता है
75(3)
मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी
केवल लोक सभा — राज्य सभा के प्रति नहीं। अविश्वास प्रस्ताव इसीलिए केवल लोक सभा में
75(4)
मंत्री को राष्ट्रपति पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएगा — तीसरी अनुसूची के प्रारूप में
शपथ का प्रारूप तीसरी अनुसूची में है, संविधान के मुख्य भाग में नहीं
75(5)
जो मंत्री लगातार छह मास तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा
गैर-सदस्य को मंत्री बनाया जा सकता है, पर छह मास में सदन में आना होगा
75(6)
मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते संसद निर्धारित करेगी
ये संचित निधि पर भारित नहीं, मतदेय हैं
3.3 सामूहिक एवं व्यक्तिगत उत्तरदायित्व
सामूहिक उत्तरदायित्व (अनु. 75(3)) संसदीय शासन का मूल सिद्धांत है। इसके तीन व्यावहारिक अर्थ हैं —
(1) मंत्रिमंडल का हर निर्णय सब मंत्रियों का निर्णय है, चाहे वे बैठक में असहमत रहे हों;
(2) जो मंत्री निर्णय से असहमत हो और उसका सार्वजनिक बचाव न कर सके, उसका एकमात्र मार्ग
त्यागपत्र है; (3) लोक सभा यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे तो
पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है — केवल उस मंत्री को नहीं जिसके विरुद्ध आरोप था,
और उसमें वे मंत्री भी सम्मिलित हैं जो राज्य सभा से हैं।
व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (अनु. 75(2)) — मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर हैं, और
राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी भी मंत्री को हटा सकता है। इसी से प्रधानमंत्री को वह पकड़ मिलती है
जिसे “समान लोगों में प्रथम” (primus inter pares) से आगे बढ़ाकर
“ग्रहों के बीच सूर्य” कहा गया।
3.4 मंत्रियों की श्रेणियाँ
मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) — अनुच्छेद 74, 75; कुल संख्या ≤ लोक सभा का 15%
प्रधानमंत्री— परिषद का प्रधान; अनु. 78 के अधीन राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के बीच संचार की एकमात्र कड़ी
1. कैबिनेट मंत्री (Cabinet Minister)— गृह, रक्षा, वित्त, विदेश जैसे प्रमुख मंत्रालय; मंत्रिमंडल की बैठकों में भाग लेते हैं; नीति तय करते हैं
2. राज्य मंत्री — स्वतंत्र प्रभार— अपने मंत्रालय/विभाग का स्वतंत्र कार्यभार; किसी कैबिनेट मंत्री के अधीन नहीं; मंत्रिमंडल के सदस्य नहीं — केवल आमंत्रित होने पर बैठक में
3. राज्य मंत्री (Minister of State)— किसी कैबिनेट मंत्री से संलग्न, या उसके मंत्रालय के किसी विभाग का प्रभार
4. उप मंत्री (Deputy Minister)— स्वतंत्र प्रभार नहीं; कैबिनेट मंत्री/राज्य मंत्री की सहायता; मंत्रिमंडल के सदस्य नहीं
(संसदीय सचिव)— कभी-कभी नियुक्त; मंत्री नहीं, अतः 15% की सीमा के परीक्षण में यह प्रश्न उठता रहा है
सावधानी — मंत्रिपरिषद बनाम मंत्रिमंडल
मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) — संवैधानिक निकाय; चारों श्रेणियों के सभी मंत्री;
संख्या 60–80 तक; यह कभी एक साथ बैठक नहीं करती।
मंत्रिमंडल (Cabinet) — केवल कैबिनेट मंत्री, 15–20 सदस्य; प्रति सप्ताह बैठक; वास्तविक
निर्णय यहीं होते हैं।
मूल संविधान में “मंत्रिमंडल” (Cabinet) शब्द कहीं नहीं था। यह शब्द संविधान में केवल
अनुच्छेद 352(3) में आता है, जिसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 ने जोड़ा —
राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा “संघीय मंत्रिमंडल” की लिखित सिफ़ारिश पर ही होगी।
अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद की बात करता है, मंत्रिमंडल की नहीं — प्रश्न प्रायः इसी अंतर पर बनता है।
15% की सीमा केवल संख्या पर है, श्रेणी पर नहीं — कितने कैबिनेट मंत्री होंगे, यह संविधान
तय नहीं करता।
3.5 प्रधानमंत्री — पद की शक्ति का स्रोत
नियुक्ति — अनुच्छेद 75(1)। संविधान यह नहीं कहता कि राष्ट्रपति किसे प्रधानमंत्री नियुक्त करे;
परंपरा है कि लोक सभा में बहुमत दल के नेता को। किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर
राष्ट्रपति का व्यक्तिगत विवेक काम करता है — वह उस व्यक्ति को नियुक्त कर, निर्धारित समय में
सदन का विश्वास सिद्ध करने को कह सकता है।
प्रधानमंत्री दोनों में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है — इंदिरा गांधी (1966),
एच.डी. देवगौड़ा (1996) तथा डॉ. मनमोहन सिंह (2004–2014) नियुक्ति के समय राज्य सभा के सदस्य थे।
अनुच्छेद 78 — प्रधानमंत्री के कर्तव्य: (क) संघ के प्रशासन तथा विधान संबंधी
मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करना; (ख) राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई
कोई भी जानकारी देना; (ग) यदि किसी मंत्री ने अकेले कोई निर्णय लिया हो और राष्ट्रपति चाहे, तो उसे
मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रखवाना। — यह अनुच्छेद प्रधानमंत्री को
राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के बीच की एकमात्र कड़ी बनाता है।
अनुच्छेद 77 — भारत सरकार की समस्त कार्यपालक कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से
की जाएगी; राष्ट्रपति कार्य के अधिक सुविधाजनक संचालन के लिए नियम बनाएगा (कार्य-आबंटन नियम एवं
कार्य-संचालन नियम)।
प्रधानमंत्री नीति आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद, अंतर-राज्य परिषद तथा राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद
का पदेन अध्यक्ष होता है।
जवाहरलाल नेहरू सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे (1947–1964);
इंदिरा गांधी पहली एवं अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री;
चौधरी चरण सिंह एकमात्र प्रधानमंत्री जिन्होंने कभी लोक सभा का सामना नहीं किया।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — प्रधानमंत्री-पद का सबसे बड़ा स्रोत
स्वतंत्रता के बाद से उत्तर प्रदेश ने नौ प्रधानमंत्री दिए हैं — देश में सर्वाधिक।
इनमें चौधरी चरण सिंह (बागपत) का प्रसंग संवैधानिक दृष्टि से सबसे शिक्षाप्रद है:
वे जुलाई 1979 में प्रधानमंत्री नियुक्त हुए, किंतु लोक सभा में कभी विश्वास मत का सामना नहीं किया —
विश्वास मत से एक दिन पहले ही त्यागपत्र दे दिया। यह अनुच्छेद 75(3) के सामूहिक उत्तरदायित्व का सबसे
चर्चित उदाहरण है। चंद्रशेखर (बलिया) दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनकी सरकार
लोक सभा में समर्थन खोने पर गिरी। वी.पी. सिंह (फतेहपुर) ने 7 नवंबर 1990 को
स्वयं विश्वास प्रस्ताव रखा और 142 बनाम 346 मतों से हार गए — भारत के इतिहास में
यह पहला अवसर था जब कोई सरकार लोक सभा में विश्वास मत हारी। ध्यान दें — यहविश्वास प्रस्तावथा,अविश्वास प्रस्तावनहीं; दोनों में अंतर §5.5 में देखें।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1प्रधानमंत्री के पद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संविधान के अनुच्छेद 74 के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 2. संविधान यह उपबंध करता है कि प्रधानमंत्री केवल लोक सभा का ही सदस्य हो सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)प्रधानमंत्री की नियुक्ति का उपबंध अनुच्छेद 75(1) में है; अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद से संबंधित है — अतः कथन 1 गलत है। प्रधानमंत्री संसद के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है; इंदिरा गांधी, एच. डी. देवेगौड़ा एवं डॉ. मनमोहन सिंह राज्य सभा के सदस्य रहते हुए प्रधानमंत्री बने — अतः कथन 2 भी गलत है।
प्र.2अंतर्राज्यिक परिषद (Inter-State Council) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसका गठन 1990 में सरकारिया आयोग की संस्तुति पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किया गया था। 2. इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित छह केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री इसके सदस्य होते हैं। 3. इसकी स्थायी समिति का अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 263 के अधीन अंतर्राज्यिक परिषद की स्थापना 28 मई 1990 के राष्ट्रपति के आदेश द्वारा सरकारिया आयोग की संस्तुति पर हुई; अतः कथन 1 सही है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्यमंत्री/प्रशासक एवं प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित छह केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री सदस्य होते हैं; अतः कथन 2 सही है। परिषद की स्थायी समिति (1996 में गठित) का अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होता है, वित्त मंत्री नहीं; अतः कथन 3 गलत है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश सम्मिलित नहीं हैं। कारण (R): मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023 के अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)उच्चतम न्यायालय ने अनूप बरनवाल मामले (2023) में चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को रखने का निर्देश दिया था, किन्तु 2023 के अधिनियम ने उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा। इस प्रकार समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता (या एकल सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) तथा एक कैबिनेट मंत्री होते हैं; अतः दोनों कथन सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है। इसी प्रक्रिया से श्री ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया।
4. संसद — संरचना, सदस्यता, निरर्हता एवं दसवीं अनुसूची
4.1 संसद का अर्थ — अनुच्छेद 79
अनुच्छेद 79 की परिभाषा परीक्षा में सर्वाधिक चूकी जाने वाली पंक्ति है — “संघ के लिए एक संसद होगी
जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम क्रमशः
राज्य सभा और लोक सभा होंगे।” अर्थात् राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है,
यद्यपि वह किसी सदन का सदस्य नहीं है और सदन की बैठकों में नहीं बैठता। उसके बिना कोई विधेयक अधिनियम नहीं बन सकता।
यह ब्रिटिश परंपरा (King-in-Parliament) से लिया गया है और अमेरिका से भिन्न है, जहाँ राष्ट्रपति
विधानमंडल का अंग नहीं है।
4.2 राज्य सभा — अनुच्छेद 80
अधिकतम संख्या 250 — 238 राज्यों एवं संघ राज्यक्षेत्रों के प्रतिनिधि
(अप्रत्यक्ष निर्वाचन) तथा 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत।
वर्तमान संख्या 245 — 233 निर्वाचित + 12 मनोनीत।
सीटों का बँटवाराचौथी अनुसूची में दिया गया है, जो जनसंख्या के आधार पर है
(किंतु आनुपातिक रूप से नहीं — छोटे राज्यों को आनुपातिक से अधिक भार मिलता है)।
निर्वाचन — राज्य के प्रतिनिधि उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों
द्वारा एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से चुने जाते हैं।
संघ राज्यक्षेत्रों के प्रतिनिधि संसद द्वारा विहित रीति से चुने जाते हैं।
मतदान खुला होता है — 2003 के संशोधन के बाद राज्य सभा निर्वाचन में
खुली मतपत्र (open ballot) प्रणाली है, जिसमें विधायक अपना मत अपने दल के अधिकृत प्रतिनिधि को
दिखाता है। कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में उच्चतम न्यायालय ने खुले मतपत्र तथा
निवास-स्थान की शर्त हटाने — दोनों को वैध ठहराया। अर्थात् आज कोई भी व्यक्ति भारत के
किसी भी राज्य से राज्य सभा में चुना जा सकता है।
12 मनोनीत सदस्य — साहित्य, विज्ञान, कला एवं समाज सेवा में विशेष ज्ञान या
व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति (अनु. 80(3))। खेल इस सूची में नहीं है — खिलाड़ियों को
प्रायः “समाज सेवा” के अधीन मनोनीत किया जाता है।
स्थायी सदन (अनु. 83(1)) — राज्य सभा विघटन के अधीन नहीं है; उसके
एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं; कार्यकाल 6 वर्ष।
ध्यान दें — “6 वर्ष” का कार्यकाल संविधान में नहीं, बल्कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में है।
4.3 लोक सभा — अनुच्छेद 81
अधिकतम संख्या 550 — राज्यों से अधिकतम 530 + संघ राज्यक्षेत्रों से
अधिकतम 20।
वर्तमान संख्या 543 — सभी प्रत्यक्ष निर्वाचन से, वयस्क मताधिकार
(अनु. 326; मताधिकार की आयु 61वें संविधान संशोधन, 1988 द्वारा 21 से घटाकर 18 वर्ष)।
आंग्ल-भारतीय मनोनयन समाप्त — अनुच्छेद 331 के अधीन राष्ट्रपति लोक सभा में
दो आंग्ल-भारतीय सदस्य मनोनीत कर सकता था। 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019
ने यह व्यवस्था 25 जनवरी 2020 से समाप्त कर दी। (उसी संशोधन ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित
जनजाति का आरक्षण 2030 तक बढ़ाया।) अतः आज लोक सभा में कोई मनोनीत सदस्य नहीं है।
अनुच्छेद 82 — पुनःसमायोजन प्रत्येक जनगणना के बाद होना चाहिए; किंतु
84वें संविधान संशोधन, 2001 ने सीटों की संख्या 2026 के बाद की प्रथम जनगणना
तक 1971 की जनसंख्या पर स्थिर कर दी, तथा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन 2001 की जनसंख्या के आधार पर कराया
(87वाँ संशोधन, 2003)।
अनुच्छेद 83(2) — अवधि — प्रथम अधिवेशन की तिथि से 5 वर्ष; राष्ट्रपति
इससे पहले भी विघटित कर सकता है। राष्ट्रीय आपात के प्रवर्तन में संसद विधि द्वारा इसे
एक बार में एक वर्ष तक बढ़ा सकती है, किंतु किसी भी दशा में उद्घोषणा समाप्त होने के
छह मास से आगे नहीं। (1976 में पाँचवीं लोक सभा का कार्यकाल दो बार बढ़ाकर छह वर्ष से
अधिक किया गया था — एकमात्र उदाहरण।)
लोक सभा · House of the People
अधिकतम 550 (530 + 20); वर्तमान 543
प्रत्यक्ष निर्वाचन, वयस्क मताधिकार
न्यूनतम आयु 25 वर्ष (अनु. 84)
अवधि 5 वर्ष; विघटित की जा सकती है
पीठासीन — अध्यक्ष (Speaker), जो स्वयं सदन का सदस्य होता है
मंत्रिपरिषद इसी के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी; अविश्वास प्रस्ताव केवल यहीं
धन विधेयक केवल यहाँ पुरःस्थापित; धन विधेयक पर अंतिम शक्ति इसी की
संयुक्त बैठक में संख्या-बल अधिक, इसलिए निर्णायक
स्थगन प्रस्ताव यहाँ मान्य है
राज्य सभा · Council of States
अधिकतम 250 (238 + 12 मनोनीत); वर्तमान 245
अप्रत्यक्ष निर्वाचन — विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा, खुली मतपत्र से
न्यूनतम आयु 30 वर्ष (अनु. 84)
स्थायी सदन — विघटित नहीं होती; 1/3 सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त
पीठासीन — सभापति (उपराष्ट्रपति), जो सदन का सदस्य नहीं
मंत्रिपरिषद इसके प्रति उत्तरदायी नहीं; यह सरकार गिरा नहीं सकती
धन विधेयक केवल 14 दिन रोक सकती है, सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं
दो विशेष शक्तियाँ — अनु. 249 (राज्य सूची के विषय पर संसद को विधि-शक्ति) तथा अनु. 312 (नई अखिल भारतीय सेवा) — विस्तार 4.3 में
स्थगन प्रस्ताव यहाँ नहीं; उसके स्थान पर “विशेष उल्लेख” (Special Mention)
4.4 अर्हताएँ एवं निरर्हताएँ
सुमेलन-तालिका 5 : सदस्यता संबंधी अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेद
विषय
निर्णायक बिंदु
84
संसद-सदस्यता की अर्हता
भारत का नागरिक; निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ; राज्य सभा हेतु 30 वर्ष, लोक सभा हेतु 25 वर्ष; संसद द्वारा विहित अन्य अर्हताएँ
101
स्थानों का रिक्त होना
दोहरी सदस्यता — दोनों सदनों में चुने जाने पर 10 दिन में विकल्प; संसद एवं राज्य विधानमंडल दोनों में चुने जाने पर 14 दिन में राज्य का स्थान रिक्त; 60 दिन तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहने पर सदन स्थान रिक्त घोषित कर सकता है
102
निरर्हताएँ
(क) लाभ का पद; (ख) विकृतचित्त घोषित; (ग) अनुन्मोचित दिवालिया; (घ) भारत का नागरिक न रहना या विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से लेना; (ङ) संसद द्वारा बनाई विधि के अधीन निरर्हित; 102(2) — दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता
103
निरर्हता संबंधी प्रश्न का विनिश्चय
अनु. 102(1) के आधारों पर प्रश्न राष्ट्रपति तय करेगा — और वह निर्वाचन आयोग की राय लेगा तथा उसी के अनुसार कार्य करेगा। किंतु दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता का प्रश्न सभापति/अध्यक्ष तय करते हैं
104
शपथ से पूर्व बैठने का दंड
शपथ लिए बिना, या निरर्हित होते हुए बैठने/मत देने पर प्रत्येक दिन के लिए ₹500 का दंड
105
विशेषाधिकार
संसद में वाक्-स्वातंत्र्य; सदन में कही बात या दिए मत के लिए किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं; कार्यवाही के प्रकाशन पर संरक्षण
106
वेतन एवं भत्ते
संसद विधि द्वारा निर्धारित करेगी — अर्थात् सांसद अपना वेतन स्वयं तय करते हैं
122
कार्यवाही की वैधता
संसद की कार्यवाही की वैधता प्रक्रिया की कथित अनियमितता के आधार पर न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जा सकती
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 कुछ अपराधों में दोषसिद्धि पर निरर्हता लगाती है।
लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 8(4) — जो वर्तमान सदस्यों को
अपील लंबित रहने तक संरक्षण देती थी — को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अब दो वर्ष या उससे अधिक के
कारावास की सज़ा पाते ही सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है, और रिहाई के बाद
छह वर्ष तक निरर्हता बनी रहती है।
4.5 दसवीं अनुसूची — दल-बदल विरोधी विधि
दसवीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ी गई और इसी से
अनुच्छेद 102(2) तथा 191(2) जुड़े। इसका उद्देश्य “आया राम गया राम” की राजनीति रोकना था।
सुमेलन-तालिका 6 : दल-बदल के आधार ↔ किस पर लागू
आधार
किस सदस्य पर
अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग देना
निर्वाचित (दलीय) सदस्य
दल के निदेश (whip) के विरुद्ध मत देना या मतदान से अनुपस्थित रहना — बशर्ते दल ने 15 दिन के भीतर क्षमा न कर दी हो
निर्वाचित (दलीय) सदस्य
निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाना
निर्दलीय सदस्य
मनोनयन की तिथि से छह मास बीत जाने के बाद किसी दल में सम्मिलित होना
मनोनीत सदस्य — छह मास के भीतर सम्मिलित होना अनुमत है
एकमात्र अपवाद — विलय (merger)। यदि किसी दल का दूसरे दल में विलय हो और
उस दल के विधायी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों, तो न विलय में जाने
वाले निरर्हित होते हैं, न विलय अस्वीकार कर अलग समूह बनाने वाले।
91वें संविधान संशोधन, 2003 ने “विभाजन (split)” का अपवाद हटा दिया —
पहले किसी दल के एक-तिहाई सदस्य अलग होकर बच जाते थे; अब यह सुरक्षा समाप्त है।
याद रखें — बचा है केवल दो-तिहाई वाला विलय।
पैरा 5 का अपवाद — यदि कोई सदस्य लोक सभा अध्यक्ष, राज्य सभा के सभापति/उपसभापति,
विधान सभा अध्यक्ष आदि चुने जाने पर अपने दल से त्यागपत्र दे दे, तो वह निरर्हित नहीं होगा;
पद छोड़ने पर वह पुनः उसी दल में लौट सकता है।
विनिश्चय — प्रश्न सदन के सभापति/अध्यक्ष के समक्ष जाता है और उनका निर्णय
अंतिम होता है। किहोतो होलोहान बनाम ज़ाचिल्हू (1992) में उच्चतम न्यायालय ने
पैरा 7 (जो न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित करता था) को असंवैधानिक ठहराया —
क्योंकि वह अनुच्छेद 368(2) की अनुसमर्थन-प्रक्रिया के बिना पारित हुआ था। तय हुआ कि पीठासीन अधिकारी
यहाँ अधिकरण (tribunal) के रूप में कार्य करता है, अतः उसका निर्णय
न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है — यद्यपि निर्णय से पूर्व न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) — अध्यक्ष का
अनिश्चित काल तक निर्णय न लेना स्वयं न्यायिक हस्तक्षेप का आधार बन सकता है।
कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधान सभा अध्यक्ष (2020) — उच्चतम न्यायालय ने
कहा कि अध्यक्ष को दल-बदल याचिकाओं का निपटारा सामान्यतः तीन मास में करना चाहिए, और
सुझाव दिया कि यह शक्ति किसी स्वतंत्र अधिकरण को दी जाए।
दसवीं अनुसूची राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में दिए गए मत पर लागू नहीं होती —
वहाँ दलीय व्हिप जारी नहीं किया जा सकता, क्योंकि मतदान गुप्त होता है।
सावधानी — दसवीं अनुसूची के चार प्रिय ट्रैप
52वाँ संशोधन (1985) — दसवीं अनुसूची जोड़ी;
91वाँ संशोधन (2003) — विभाजन का अपवाद हटाया तथा 15% मंत्री-सीमा लगाई।
दोनों को उलट देना सबसे आम गलती है।
निर्दलीय सदस्य किसी दल में सम्मिलित हो तो निरर्हित; मनोनीत सदस्य
छह मास के भीतर सम्मिलित हो तो निरर्हित नहीं — यह असममिति पूछी जाती है।
निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल नहीं, बल्कि अध्यक्ष/सभापति करते हैं —
यह अनुच्छेद 103/192 से भिन्न व्यवस्था है।
दल-बदल पर निरर्हित सदस्य मंत्री नहीं बन सकता (अनु. 75(1ख)/164(1ख)), किंतु वह
पुनः निर्वाचन लड़ सकता है — दसवीं अनुसूची उसे चुनाव लड़ने से नहीं रोकती।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — संसद में सबसे बड़ा राज्य
लोक सभा — 80 सीटें, देश में सर्वाधिक। दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र (48),
तीसरे पर पश्चिम बंगाल (42)। अर्थात् लोक सभा की लगभग हर सातवीं सीट उत्तर प्रदेश की है।
राज्य सभा — 31 सीटें, यह भी देश में सर्वाधिक (चौथी अनुसूची के अनुसार);
इसके बाद महाराष्ट्र (19), तमिलनाडु (18), तथा बिहार एवं पश्चिम बंगाल (16-16)। UPPSC में “राज्य सभा में
सर्वाधिक/न्यूनतम सीटें किस राज्य की” लगभग स्थायी प्रश्न है।
राज्य सभा में 31 सीटें होने का अर्थ है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा के 403
निर्वाचित सदस्य ही उन्हें चुनते हैं — इसीलिए प्रदेश की विधान सभा का गणित सीधे संसद के ऊपरी सदन तक
पहुँचता है।
दसवीं अनुसूची की सर्वाधिक चर्चित व्याख्या राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007)
उत्तर प्रदेश विधान सभा से ही आई — जहाँ 13 विधायकों के दल-बदल पर अध्यक्ष के विलंब को
उच्चतम न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1संविधान की दसवीं अनुसूची के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 91वें संविधान संशोधन अधिनियम ने विलय (Merger) के आधार पर मिलने वाली छूट को समाप्त कर दिया। 2. यदि किसी दल के विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय पर सहमत हो जाएँ तो वे निरर्हित नहीं होंगे। 3. कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य यदि निर्वाचन के पश्चात किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है तो वह निरर्हित हो जाएगा। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने दसवीं अनुसूची के पैरा 3 का लोप कर 'विभाजन' (एक-तिहाई सदस्य) वाली छूट समाप्त की थी, विलय वाली छूट नहीं — अतः कथन 1 गलत है। पैरा 4 के अनुसार मूल दल के विलय पर यदि विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों तो निरर्हता नहीं होती — कथन 2 सही है। निर्दलीय सदस्य द्वारा निर्वाचन के पश्चात किसी दल में सम्मिलित होने पर निरर्हता होती है, जबकि नामनिर्दिष्ट सदस्य छह मास के भीतर किसी दल में सम्मिलित हो सकता है — कथन 3 सही है।
प्र.2निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए: 1. लिली थॉमस वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) का अपास्त किया जाना 2. निर्वाचक बॉण्ड योजना का अधिसूचित होना 3. दसवीं अनुसूची से 'विभाजन' (Split) संबंधी अपवाद का लोप 4. उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्वाचक बॉण्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया जाना नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1, 3, 2, 4B3, 1, 4, 2C1, 3, 4, 2D3, 1, 2, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)91वें संविधान संशोधन (2003) ने दसवीं अनुसूची के पैरा 3 का लोप कर एक-तिहाई सदस्यों के 'विभाजन' वाली छूट समाप्त की; लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में धारा 8(4) अपास्त हुई जिससे दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि तत्काल निरर्हित होने लगे; निर्वाचक बॉण्ड योजना जनवरी 2018 में अधिसूचित हुई; तथा 15 फरवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशीय पीठ ने उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। अतः सही अनुक्रम 3, 1, 2, 4 है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल संबंधी निरर्हता पर पीठासीन अधिकारी का विनिश्चय न्यायिक पुनर्विलोकन से पूर्णतः परे है। कारण (R): किहोतो होलोहन वाद (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के पैरा 7 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्लू (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के पैरा 7 को — जो न्यायालयों की अधिकारिता का पूर्ण वर्जन करता था — अवैध ठहराया और अभिनिर्धारित किया कि पीठासीन अधिकारी इस मामले में अधिकरण की भाँति कार्य करता है, अतः उसका विनिश्चय सीमित न्यायिक पुनर्विलोकन (दुर्भावना, विकृतता, संवैधानिक आदेश की अवहेलना आदि के आधार पर) के अधीन है। अतः (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
5. संसदीय प्रक्रिया — सत्र, गणपूर्ति, प्रश्नकाल एवं प्रस्ताव
5.1 सत्र — अनुच्छेद 85, 86 एवं 87
सुमेलन-तालिका 7 : सत्र-संबंधी तीन अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
निर्णायक बिंदु
85(1)
राष्ट्रपति समय-समय पर प्रत्येक सदन को आहूत (summon) करेगा
शर्त — एक सत्र की अंतिम बैठक तथा अगले सत्र की प्रथम बैठक के बीच छह मास से अधिक का अंतराल नहीं। अर्थात् वर्ष में कम-से-कम दो सत्र अनिवार्य हैं (“तीन सत्र” केवल परंपरा है, संविधान की शर्त नहीं)
85(2)
राष्ट्रपति किसी भी सदन का सत्रावसान (prorogue) कर सकता है तथा लोक सभा का विघटन (dissolve) कर सकता है
सत्रावसान की शक्ति राष्ट्रपति की; स्थगन (adjournment) की शक्ति पीठासीन अधिकारी की
86
राष्ट्रपति को किसी भी सदन में या दोनों की संयुक्त बैठक में अभिभाषण देने तथा किसी सदन को संदेश भेजने का अधिकार
संदेश विधेयक से संबंधित भी हो सकता है, और सदन उस पर शीघ्र विचार करेगा
87
विशेष अभिभाषण — राष्ट्रपति दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करेगा
केवल दो अवसरों पर — (1) प्रत्येक आम चुनाव के बाद के प्रथम सत्र के आरंभ में; (2) प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में। प्रथम संविधान संशोधन, 1951 से पहले यह हर सत्र के आरंभ में अनिवार्य था
परंपरागत तीन सत्र — बजट सत्र (फरवरी–मई, सबसे लंबा),
मानसून सत्र (जुलाई–अगस्त), शीतकालीन सत्र (नवंबर–दिसंबर, सबसे छोटा)।
स्थगन (Adjournment) — बैठक को निर्धारित समय (घंटे, दिन या सप्ताह) के लिए रोकना;
पीठासीन अधिकारी करता है। अनिश्चितकाल के लिए स्थगन (adjournment sine die) — बिना कोई तिथि
नियत किए बैठक समाप्त; यह भी पीठासीन अधिकारी की शक्ति है।
सत्रावसान (Prorogation) — सत्र का ही अंत; राष्ट्रपति अधिसूचना से करता है।
इससे लंबित विधेयक व्यपगत नहीं होते, किंतु सदन के समक्ष लंबित सूचनाएँ समाप्त हो जाती हैं।
विघटन (Dissolution) — केवल लोक सभा का; इससे सदन का जीवन ही समाप्त और
नए चुनाव अनिवार्य। इसका विधेयकों पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है (§6.6 देखें)।
गणपूर्ति (Quorum) — अनुच्छेद 100(3): किसी भी सदन की बैठक के लिए
उस सदन की कुल सदस्य-संख्या का दसवाँ भाग — लोक सभा में 55 तथा
राज्य सभा में 25। गणपूर्ति न होने पर पीठासीन अधिकारी का कर्तव्य है कि वह सदन को
स्थगित कर दे या बैठक निलंबित कर दे।
अनुच्छेद 100(1) — सभी प्रश्न उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत
से तय होंगे; पीठासीन अधिकारी पहली बार मत नहीं देता, किंतु मत बराबर होने पर
निर्णायक मत देता है। अनुच्छेद 100(2) — सदन की रिक्तियों के बावजूद
कार्यवाही वैध रहेगी।
5.2 प्रश्नकाल — सदन का सबसे तीखा घंटा
बैठक का पहला घंटा प्रश्नकाल होता है। यह संविधान में नहीं, प्रक्रिया-नियमों में है, और
इसी में कार्यपालिका की सर्वाधिक प्रत्यक्ष जवाबदेही तय होती है। प्रश्न की सूचना सामान्यतः
15 दिन पूर्व देनी होती है।
सुमेलन-तालिका 8 : प्रश्नों के प्रकार
प्रकार
पहचान
उत्तर
अनुपूरक प्रश्न
तारांकित प्रश्न (Starred)
तारांकित (*) चिह्न
मौखिक, सदन में
पूछे जा सकते हैं; लोक सभा में एक दिन में अधिकतम 20
अतारांकित प्रश्न (Unstarred)
कोई तारांक नहीं
लिखित, पटल पर रखा जाता है
नहीं; लोक सभा में एक दिन में अधिकतम 230
अल्प सूचना प्रश्न (Short Notice)
अत्यावश्यक लोक महत्व का विषय
मौखिक
सामान्य 10 दिन से कम सूचना पर; मंत्री की सहमति आवश्यक
गैर-सरकारी सदस्य से प्रश्न
किसी विधेयक/संकल्प का प्रभारी सदस्य
वही सदस्य देता है, मंत्री नहीं
सदन के कार्य से संबंधित विषय पर
5.3 शून्यकाल — भारतीय नवाचार
शून्यकाल (Zero Hour) प्रश्नकाल की समाप्ति के तुरंत बाद आरंभ होता है और इसमें सदस्य
बिना पूर्व सूचना अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय उठाते हैं। इसकी तीन विशेषताएँ याद रखें —
(1) यह प्रक्रिया-नियमों में कहीं उल्लिखित नहीं है, अतः यह
अनौपचारिक युक्ति है; (2) यह भारतीय संसदीय पद्धति का अपना आविष्कार है,
जो 1962 से चलन में आया; (3) इसकी कोई निश्चित अवधि नहीं है।
सावधानी — दोनों सदनों में समय अलग-अलग है
लोक सभा — प्रश्नकाल पूर्वाह्न 11 बजे से 12 बजे तक; शून्यकाल
12 बजे से आरंभ।
राज्य सभा — 2014 में तत्कालीन सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी ने
प्रश्नकाल को 11 बजे से हटाकर 12 बजे कर दिया, ताकि व्यवधान से प्रश्नकाल बाधित न हो।
अतः राज्य सभा में अब शून्यकाल पहले (11 बजे) और प्रश्नकाल बाद में (12 बजे) होता है।
यह क्रम-भेद अक्सर दो-कथन प्रश्न बनता है।
5.4 प्रस्तावों के प्रकार
सदन में कोई भी विषय प्रस्ताव (motion) के रूप में ही आता है। प्रस्ताव तीन मूल श्रेणियों में
बाँटे जाते हैं — मूल प्रस्ताव (Substantive) जो स्वयं में पूर्ण हो;
स्थानापन्न प्रस्ताव (Substitute) जो किसी मूल प्रस्ताव का विकल्प हो; तथा
सहायक प्रस्ताव (Subsidiary) जो अकेले खड़ा न हो सके। नीचे वे प्रस्ताव हैं जिन पर प्रश्न बनता है —
सुमेलन-तालिका 9 : प्रस्ताव ↔ प्रयोजन एवं शर्तें
प्रस्ताव
प्रयोजन
शर्त / विशेषता
स्थगन प्रस्ताव Adjournment Motion
अत्यावश्यक लोक महत्व के निश्चित विषय पर चर्चा हेतु सदन का सामान्य कार्य रोकना
50 सदस्यों का समर्थन; इसमें निंदा का तत्व निहित है, इसीलिए केवल लोक सभा में; चर्चा कम-से-कम ढाई घंटे की
अविश्वास प्रस्ताव No-Confidence Motion
मंत्रिपरिषद को पद से हटाना
50 सदस्यों का समर्थन; केवल लोक सभा में (अनु. 75(3)); कोई कारण बताना आवश्यक नहीं; पारित होने पर पूरी मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे
विश्वास प्रस्ताव Confidence Motion
सरकार स्वयं अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए लाती है
प्रक्रिया-नियमों में अलग से नहीं; गठबंधन-युग की उपज। हारने पर सरकार गिरती है
निंदा प्रस्ताव Censure Motion
किसी एक मंत्री, मंत्रि-समूह या पूरी मंत्रिपरिषद की किसी विशेष नीति/कार्य की निंदा
कारण बताना अनिवार्य; दोनों सदनों में लाया जा सकता है; पारित होने पर सरकार को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं
धन्यवाद प्रस्ताव Motion of Thanks
राष्ट्रपति के अभिभाषण (अनु. 87) पर चर्चा एवं धन्यवाद
इसका पारित होना अनिवार्य है — न पारित होना सरकार की पराजय मानी जाती है
विशेषाधिकार प्रस्ताव Privilege Motion
किसी मंत्री द्वारा सदन/सदस्य के विशेषाधिकार के हनन पर
कोई भी सदस्य ला सकता है; उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव Calling Attention
मंत्री का ध्यान किसी अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय पर खींचकर वक्तव्य माँगना
भारतीय संसदीय नवाचार, 1954 से; दोनों सदनों में; स्थगन प्रस्ताव के विपरीत इसमें निंदा का तत्व नहीं
कार्य-स्थगन/समापन प्रस्ताव Closure Motion
चर्चा समाप्त कर मतदान कराना
चार रूप — साधारण, कंगारू, गुलेटिन (Guillotine) तथा प्रश्न-समूहीकरण (Compartment)
किसी दिन के लिए नियत न किया गया प्रस्ताव
अध्यक्ष द्वारा स्वीकृत, पर चर्चा की तिथि अभी तय नहीं
“No-day-yet-named motion”
अल्पकालिक चर्चा (नियम 193)
अत्यावश्यक लोक महत्व के विषय पर दो घंटे की चर्चा
न कोई औपचारिक प्रस्ताव, न मतदान; सप्ताह में दो दिन
आधे घंटे की चर्चा
पर्याप्त सार्वजनिक महत्व वाले किसी उत्तर में उठे विषय पर
सप्ताह में तीन दिन; कोई मतदान नहीं
कौन-सा प्रस्ताव किस सदन में“अ-स्थ केवल लोक में, नि-ध्या दोनों में”
अविश्वास तथा स्थगन प्रस्ताव — केवल लोक सभा में
(क्योंकि सरकार केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, और दोनों में निंदा/अविश्वास का तत्व है)।
निंदा प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, विशेषाधिकार प्रस्ताव तथा धन्यवाद प्रस्ताव —
दोनों सदनों में। और कटौती प्रस्ताव भी केवल लोक सभा में, क्योंकि अनुदान की माँगें
केवल वहीं मतदेय हैं।
5.5 अविश्वास बनाम निंदा — एक शब्द का अंतर
अविश्वास प्रस्ताव
केवल लोक सभा में
कारण बताना आवश्यक नहीं
केवल पूरी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध — किसी एक मंत्री के विरुद्ध नहीं
पारित होने पर मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना ही होगा
50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक
निंदा प्रस्ताव
दोनों सदनों में
कारण बताना अनिवार्य — किस नीति/कार्य की निंदा
एक मंत्री, मंत्रि-समूह या पूरी परिषद — किसी के भी विरुद्ध
पारित होने पर त्यागपत्र आवश्यक नहीं; यह केवल नैतिक भर्त्सना है
ऐसी कोई न्यूनतम समर्थन-संख्या निर्धारित नहीं
5.6 कटौती प्रस्ताव — अनुदान की माँगों पर
बजट की चौथी अवस्था में जब लोक सभा अनुदान की माँगों पर मतदान करती है, तब विपक्ष
कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) के माध्यम से सरकार को घेरता है। ये केवल
लोक सभा में, केवल मतदेय व्यय पर, और केवल अध्यक्ष की अनुमति से
आते हैं। तीन प्रकार हैं —
सुमेलन-तालिका 10 : तीन कटौती प्रस्ताव ↔ राशि ↔ प्रयोजन
प्रस्ताव
प्रस्तावित राशि
प्रयोजन
नीति-निंदा कटौती Policy Cut
“माँग की राशि घटाकर ₹1 कर दी जाए”
माँग के मूल में निहित नीति की पूर्ण अस्वीकृति; प्रस्तावक नीति का विकल्प भी सुझा सकता है
मितव्ययिता कटौती Economy Cut
“माँग की राशि एक निर्दिष्ट राशि से घटाई जाए”
व्यय में बचत संभव है — मितव्ययिता का सुझाव; राशि एकमुश्त या किसी मद-विशेष की हो सकती है
सांकेतिक कटौती Token Cut
“माँग की राशि ₹100 कम की जाए”
भारत सरकार के उत्तरदायित्व के क्षेत्र की किसी विशिष्ट शिकायत को व्यक्त करना
कटौती प्रस्ताव का पारित होना सरकार के विरुद्ध अविश्वास के बराबर माना जाता है, क्योंकि इसका
अर्थ है कि लोक सभा ने सरकार की माँग अस्वीकार कर दी। व्यवहार में बहुमत वाली सरकार के काल में ये
कभी पारित नहीं होते — इनका महत्व चर्चा का अवसर देने में है।
गुलेटिन (Guillotine) — समय की तलवार
अनुदान की माँगों पर चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन, अध्यक्ष शेष सभी माँगों को —
चर्चा हुई हो या नहीं — एक साथ मतदान के लिए रख देता है। इसे गुलेटिन कहते हैं।
व्यवहार में लोक सभा प्रायः 80–90% माँगें इसी तरह पारित करती है; यही कारण है कि
विभागीय स्थायी समितियों द्वारा माँगों की पूर्व-संवीक्षा इतनी महत्वपूर्ण है (§8 देखें)।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I (संसदीय प्रस्ताव) को सूची-II (विशेषता) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. अविश्वास प्रस्ताव B. निंदा प्रस्ताव C. स्थगन प्रस्ताव D. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव सूची-II: 1. सदन का सामान्य कार्य रोककर अविलंबनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा; इसमें निंदा का तत्व अंतर्निहित होता है 2. केवल लोक सभा में ग्राह्य; समस्त मंत्रिपरिषद के विरुद्ध; कारण बताना आवश्यक नहीं 3. कारणों का उल्लेख आवश्यक; किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी लाया जा सकता है तथा राज्य सभा में भी ग्राह्य 4. मंत्री का ध्यान अविलंबनीय लोक महत्व के विषय की ओर आकृष्ट करना; यह भारतीय संसदीय प्रणाली का नवाचार है कूट:
उत्तर: (C)अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में, समस्त मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जाता है और उसमें कारण बताना आवश्यक नहीं; उसे कम-से-कम 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए। निंदा प्रस्ताव में कारण बताना अनिवार्य है, यह किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी लाया जा सकता है तथा राज्य सभा में भी ग्राह्य है। स्थगन प्रस्ताव सदन का सामान्य कार्य रोककर अविलंबनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा हेतु लाया जाता है और उसमें निंदा का तत्व निहित होता है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव भारतीय संसदीय व्यवहार का नवाचार है।
प्र.2सूची-I (संसदीय उपकरण) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. नीति कटौती प्रस्ताव B. मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव C. सांकेतिक कटौती प्रस्ताव D. लेखानुदान सूची-II: 1. माँग की राशि में 100 रुपये की कटौती, जो कोई विशिष्ट शिकायत व्यक्त करती है 2. नए वित्तीय वर्ष के प्रारंभिक भाग के व्यय हेतु लोक सभा द्वारा अग्रिम अनुदान 3. माँग की राशि घटाकर 1 रुपया कर देना, जो अंतर्निहित नीति की अस्वीकृति दर्शाता है 4. माँग की राशि में एक निश्चित रकम की कटौती, जो मितव्ययिता के उद्देश्य से की जाती है कूट:
उत्तर: (C)नीति कटौती प्रस्ताव में माँग की राशि घटाकर 1 रुपया कर दी जाती है, जो नीति की पूर्ण अस्वीकृति का प्रतीक है। मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव में एक निश्चित रकम की कटौती की जाती है और सांकेतिक कटौती प्रस्ताव में 100 रुपये की कटौती द्वारा किसी विशिष्ट शिकायत की ओर ध्यान आकृष्ट किया जाता है। लेखानुदान (अनुच्छेद 116) नए वित्तीय वर्ष के प्रारंभिक भाग के व्यय हेतु दिया गया अग्रिम अनुदान है।
प्र.3सूची-I (संसदीय पद) को सूची-II (आशय) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. गिलोटिन B. व्यवस्था का प्रश्न C. समापन प्रस्ताव D. विशेषाधिकार प्रस्ताव सूची-II: 1. चल रही चर्चा को समाप्त कर विषय को तुरंत मतदान हेतु रखने का प्रस्ताव 2. सदन की प्रक्रिया संबंधी नियमों के उल्लंघन की ओर ध्यान दिलाना; इस पर कोई चर्चा नहीं होती 3. सदन अथवा उसके किसी सदस्य के विशेषाधिकार के हनन पर निंदा के आशय से लाया जाने वाला प्रस्ताव 4. नियत समय पूरा हो जाने पर अनुदान की शेष माँगों को बिना चर्चा मतदान हेतु रख देना कूट:
उत्तर: (B)गिलोटिन वह प्रक्रिया है जिसमें अनुदान माँगों पर चर्चा के लिए नियत अंतिम दिन शेष सभी माँगों को बिना चर्चा मतदान हेतु रख दिया जाता है। 'व्यवस्था का प्रश्न' सदन की प्रक्रिया के नियमों के उल्लंघन पर उठाया जाता है और उस पर चर्चा नहीं होती। समापन प्रस्ताव चर्चा समाप्त कर तत्काल मतदान कराने हेतु लाया जाता है, जबकि विशेषाधिकार प्रस्ताव सदन या सदस्य के विशेषाधिकार के हनन पर निंदा के आशय से प्रस्तुत होता है।
6. विधायी प्रक्रिया — विधेयकों के प्रकार एवं संयुक्त बैठक
6.1 विधेयकों का वर्गीकरण
संसद में आने वाला हर विधेयक दो दृष्टियों से वर्गीकृत होता है — प्रस्तुतकर्ता के आधार पर
(सरकारी विधेयक बनाम गैर-सरकारी सदस्य का विधेयक) तथा विषय-वस्तु के आधार पर
(साधारण, धन, वित्त तथा संविधान संशोधन विधेयक)। परीक्षा दूसरी दृष्टि पर टिकी है।
साधारण विधेयक · अनु. 107
किसी भी सदन में पुरःस्थापित
मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य — दोनों ला सकते हैं
राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश आवश्यक नहीं
दूसरा सदन इसे अस्वीकार या संशोधित कर सकता है, या छह मास तक रोक सकता है
गतिरोध पर संयुक्त बैठक (अनु. 108) — संभव
राष्ट्रपति अनुमति दे, रोके या पुनर्विचार हेतु लौटाए
धन विधेयक · अनु. 110
केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से
केवल मंत्री ला सकता है
अनु. 110(1) के सात विषयों (क–छ) तक सीमित
राज्य सभा इसे अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती; 14 दिन में लौटाना अनिवार्य; उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं
संयुक्त बैठक का प्रश्न ही नहीं उठता
राष्ट्रपति अनुमति दे या रोके — लौटा नहीं सकता
वित्त विधेयक · अनु. 117
श्रेणी I — अनु. 117(1): अनु. 110 के विषय तथा अन्य विषय भी। केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से — यहाँ तक धन विधेयक जैसा
किंतु आगे साधारण विधेयक जैसा — राज्य सभा इसे अस्वीकार/संशोधित कर सकती है, और संयुक्त बैठक हो सकती है
श्रेणी II — अनु. 117(3): केवल संचित निधि से व्यय अंतर्ग्रस्त करता है, अनु. 110 का कोई विषय नहीं
किसी भी सदन में पुरःस्थापित; सिफ़ारिश पुरःस्थापन के लिए नहीं, पारित करने के लिए चाहिए
हर धन विधेयक वित्त विधेयक है, पर हर वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं
6.2 साधारण विधेयक का मार्ग — पाँच अवस्थाएँ
1. प्रथम वाचनपुरःस्थापन हेतु अनुमति; विधेयक का नाम एवं उद्देश्य पढ़ा जाता है; कोई चर्चा नहीं; राजपत्र में प्रकाशन। (राजपत्र में पूर्व-प्रकाशन हो चुका हो तो अनुमति की आवश्यकता नहीं)
→
2. द्वितीय वाचन — तीन उप-चरण(क) सामान्य चर्चा — सिद्धांत पर; यहीं तय होता है कि विधेयक प्रवर समिति, संयुक्त समिति, जनमत जानने या सीधे विचार में जाए। (ख) समिति अवस्था — खंडवार जाँच, प्रतिवेदन। (ग) विचार अवस्था — सदन में खंड-दर-खंड विचार एवं संशोधनों पर मतदान
→
3. तृतीय वाचन“विधेयक पारित किया जाए” पर मतदान; अब केवल औपचारिक/परिणामी संशोधन ही स्वीकार्य; उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत
→
4. दूसरे सदन मेंवही तीन वाचन। दूसरा सदन चार में से कुछ भी कर सकता है — पारित करे; संशोधन सहित लौटाए; अस्वीकार कर दे; या छह मास तक कोई कार्रवाई न करे (यही गतिरोध है)
→
5. राष्ट्रपति की अनुमति — अनु. 111अनुमति दे → अधिनियम; अनुमति रोक ले → समाप्त; पुनर्विचार हेतु लौटाए → सदन पुनः पारित करें तो अनुमति देना बाध्यकारी
6.3 धन विधेयक का मार्ग — जहाँ रास्ता अलग हो जाता है
1. केवल लोक सभाराष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से केवल लोक सभा में पुरःस्थापित; केवल मंत्री द्वारा। विधेयक पर अध्यक्ष का प्रमाणन (अनु. 110(4)) अंकित होता है
→
2. लोक सभा में पारितसाधारण बहुमत से; फिर अध्यक्ष के प्रमाणपत्र सहित राज्य सभा को भेजा जाता है (अनु. 109(1))
→
3. राज्य सभा — केवल 14 दिनवह इसे अस्वीकार नहीं कर सकती, संशोधित नहीं कर सकती — केवल सिफ़ारिशें कर सकती है और 14 दिन के भीतर लौटाना अनिवार्य
→
4. लोक सभा की इच्छा सर्वोपरिसिफ़ारिशें स्वीकार करे तो उन्हीं सहित, अस्वीकार करे तो मूल रूप में — दोनों दशाओं में विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है। 14 दिन में न लौटाए तो भी पारित माना जाएगा (अनु. 109(5))
→
5. राष्ट्रपतिअनुमति दे या रोके — पुनर्विचार हेतु लौटा नहीं सकता, क्योंकि विधेयक उसी की सिफ़ारिश से आया था
सावधानी — धन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं होती
अनुच्छेद 108(1) का परंतुक स्पष्ट कहता है — “इस खंड की कोई बात धन विधेयक पर लागू नहीं होगी।”
कारण सरल है: गतिरोध की संभावना ही नहीं — राज्य सभा धन विधेयक को न अस्वीकार कर सकती है,
न रोक सकती है। 14 दिन बाद वह स्वतः पारित मान लिया जाता है।
संविधान संशोधन विधेयक पर भी संयुक्त बैठक नहीं होती — कारण भिन्न है:
अनुच्छेद 368 अपेक्षा करता है कि विधेयक प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित हो।
संयुक्त बैठक होने पर यह शर्त पूरी नहीं होगी।
अतः संयुक्त बैठक केवल दो पर — साधारण विधेयक तथा वित्त विधेयक पर संभव है।
अनुच्छेद संख्या का ट्रैप — संयुक्त बैठक अनुच्छेद 108 में है;
अनुच्छेद 109 धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया है। 2025 के मूल प्रश्नपत्र में यही
अदला-बदली एक विकल्प के रूप में रखी गई थी।
राज्य स्तर पर संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान ही नहीं है — विधान परिषद वाले राज्यों में
गतिरोध का समाधान अनुच्छेद 197 की विलंब-सीमा से होता है (§12 देखें)।
6.4 संयुक्त बैठक — अनुच्छेद 108
तीन परिस्थितियाँ जिनमें राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है —
(क) विधेयक दूसरे सदन द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया हो;
(ख) संशोधनों पर दोनों सदनों में अंतिम असहमति हो;
(ग) दूसरे सदन को विधेयक प्राप्त हुए छह मास से अधिक बीत जाएँ और वह पारित न करे।
छह मास की गणना में वह अवधि नहीं गिनी जाती जब सदन का सत्रावसान हो या वह लगातार चार दिन से अधिक
स्थगित रहे।
यदि लोक सभा का विघटन हो चुका हो और विधेयक विघटन से व्यपगत हो गया हो, तो संयुक्त बैठक
नहीं बुलाई जा सकती। किंतु यदि राष्ट्रपति ने विघटन से पहले संयुक्त बैठक बुलाने का
आशय अधिसूचित कर दिया हो, तो विघटन के बावजूद बैठक हो सकती है (अनु. 108(5))।
पीठासीन अधिकारी — लोक सभा का अध्यक्ष (अनु. 118(4))। उसकी अनुपस्थिति में
लोक सभा का उपाध्यक्ष, उसकी भी अनुपस्थिति में राज्य सभा का उपसभापति, और उसकी भी
अनुपस्थिति में संयुक्त बैठक द्वारा निर्धारित अन्य व्यक्ति। उपराष्ट्रपति (राज्य सभा का सभापति)
संयुक्त बैठक की अध्यक्षता कभी नहीं करता — क्योंकि वह किसी सदन का सदस्य ही नहीं है।
पारित होने का बहुमत — संयुक्त बैठक में उपस्थित एवं मतदान करने वाले
दोनों सदनों के कुल सदस्यों का बहुमत। चूँकि लोक सभा (543) राज्य सभा (245) से कहीं बड़ी है,
व्यवहार में संयुक्त बैठक का परिणाम लोक सभा की इच्छा ही होता है।
अनुच्छेद 118(3) — संयुक्त बैठक की प्रक्रिया के नियम राष्ट्रपति
दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों से परामर्श के बाद बनाता है।
6–9 मई 1961दहेज प्रतिषेध विधेयक — पहली संयुक्त बैठक; संशोधनों पर असहमति; राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा आहूत; परिणाम — दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
16 मई 1978बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक — राज्य सभा ने विधेयक अस्वीकार कर दिया था; जनता पार्टी सरकार के काल में दूसरी संयुक्त बैठक
26 मार्च 2002आतंकवाद निवारण विधेयक (POTA) — तीसरी एवं अब तक की अंतिम संयुक्त बैठक; 425 बनाम 296 मतों से पारित
तीनों संयुक्त बैठकें — क्रम में“दहेज – बैंक – आतंक”
दहेज प्रतिषेध विधेयक (1961) → बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक (1978) →
आतंकवाद निवारण विधेयक/POTA (2002)। तीनों के वर्ष 1961, 1978, 2002 — कालक्रम प्रश्न में
यही तीन तिथियाँ आती हैं। ध्यान रहे कि दूसरी बैठक में विधेयक अस्वीकार हुआ था, पहली में
संशोधनों पर असहमति थी।
6.5 संविधान संशोधन विधेयक — संक्षेप में
(विस्तार अध्याय 4.1 में है; यहाँ केवल वह जो विधायी प्रक्रिया की तुलना के लिए आवश्यक है।)
अनुच्छेद 368 के अधीन ऐसा विधेयक किसी भी सदन में पुरःस्थापित हो सकता है,
राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश की आवश्यकता नहीं, और इसे प्रत्येक सदन में अलग-अलगविशेष बहुमत — अर्थात् उस सदन की कुल सदस्य-संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले
सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत — से पारित होना चाहिए। संघीय ढाँचे को छूने वाले उपबंधों के लिए
आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी चाहिए (यहाँ साधारण बहुमत पर्याप्त है, और
अनुसमर्थन के लिए कोई समय-सीमा नहीं)। 24वें संशोधन, 1971 के बाद राष्ट्रपति को
अनुमति देनी ही होगी।
6.6 विधेयकों का व्यपगत होना (Lapsing)
लोक सभा के विघटन पर कौन-सा विधेयक मरता है और कौन-सा जीवित रहता है — यह UPPSC का
स्थायी सुमेलन-प्रश्न है। मूल तर्क एक ही है: राज्य सभा स्थायी सदन है, इसलिए जो कुछ उसकी गोद में है
वह नहीं मरता; और जिस विधेयक की यात्रा दोनों सदनों में पूरी हो चुकी है, वह भी नहीं मरता।
सुमेलन-तालिका 11 : लोक सभा के विघटन पर विधेयक की स्थिति
विधेयक की स्थिति
परिणाम
लोक सभा में लंबित (पारित नहीं हुआ)
व्यपगत
लोक सभा द्वारा पारित, किंतु राज्य सभा में लंबित
व्यपगत
राज्य सभा में लंबित, जो लोक सभा द्वारा पारित नहीं हुआ (उसी में पुरःस्थापित था)
व्यपगत नहीं
दोनों सदनों द्वारा पारित, राष्ट्रपति की अनुमति लंबित
व्यपगत नहीं
दोनों सदनों द्वारा पारित, किंतु राष्ट्रपति ने पुनर्विचार हेतु लौटाया
व्यपगत नहीं
असहमति के कारण लंबित, और राष्ट्रपति ने विघटन से पूर्व संयुक्त बैठक की सूचना दे दी हो
व्यपगत नहीं
व्यपगत होने का नियम — एक वाक्य में“जो लोक सभा की गोद में था, वही मरा”
विघटन से केवल वही विधेयक मरते हैं जिनका अंतिम पड़ाव लोक सभा से जुड़ा था —
अर्थात् (1) लोक सभा में लंबित, और (2) लोक सभा से पारित होकर राज्य सभा में लंबित।
शेष सब — राज्य सभा में मूल रूप से लंबित, अनुमति की प्रतीक्षा में, लौटाया हुआ, तथा संयुक्त बैठक की
पूर्व-सूचना वाला — जीवित रहते हैं। सत्रावसान से कोई विधेयक व्यपगत नहीं होता;
केवल विघटन से होता है — यह सबसे आम भूल है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1संसद में विधेयकों के व्यपगत (Lapse) होने के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. लोक सभा में लंबित कोई विधेयक उस सदन के विघटन पर व्यपगत नहीं होता। 2. संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किंतु राष्ट्रपति की अनुमति की प्रतीक्षा में लंबित विधेयक लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)लोक सभा में लंबित विधेयक उसके विघटन पर व्यपगत हो जाता है, चाहे वह लोक सभा में पुरःस्थापित हुआ हो या राज्य सभा से पारित होकर आया हो — अतः कथन 1 गलत है। जो विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की अनुमति की प्रतीक्षा में है, वह व्यपगत नहीं होता; इसी प्रकार केवल राज्य सभा में लंबित तथा लोक सभा द्वारा अपारित विधेयक भी व्यपगत नहीं होता — अतः कथन 2 भी गलत है।
प्र.2संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संयुक्त बैठक का उपबंध संविधान के अनुच्छेद 108 में है। 2. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा का अध्यक्ष करता है। 3. धन विधेयक तथा संविधान संशोधन विधेयक, दोनों पर गतिरोध की दशा में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 108 गतिरोध की दशा में राष्ट्रपति को संयुक्त बैठक आहूत करने की शक्ति देता है तथा अनुच्छेद 118(4) के अनुसार इसकी अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष करता है; अतः कथन 1 और 2 सही हैं। धन विधेयक (अनुच्छेद 110) तथा संविधान संशोधन विधेयक इस प्रक्रिया से बाहर हैं, अतः कथन 3 गलत है। अब तक केवल तीन संयुक्त बैठकें हुई हैं — 1961, 1978 तथा 2002 में।
प्र.3संविधान संशोधन की प्रक्रिया के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है। 2. संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में पुरःस्थापित किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन विधेयक दोनों सदनों द्वारा पृथक्-पृथक् विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है; गतिरोध की दशा में संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) का उपबंध लागू नहीं होता। अतः कथन 1 गलत है। ऐसा विधेयक किसी भी सदन में, मंत्री या निजी सदस्य द्वारा, राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पुरःस्थापित किया जा सकता है — कथन 2 सही है।
7. बजट एवं वित्तीय प्रक्रिया — अनुच्छेद 112 से 117 तथा तीन निधियाँ
7.1 संसद की वित्तीय संप्रभुता — तीन आधारभूत अनुच्छेद
265विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं
266(3)विधि के अनुसार ही संचित निधि से निकासी
112वार्षिक वित्तीय विवरण — “बजट”
114(3)विनियोग के बिना कोई निकासी नहीं
ये चार पंक्तियाँ मिलकर वह सिद्धांत बनाती हैं जिसे “बिना प्रतिनिधित्व के कराधान नहीं” कहा जाता है —
कार्यपालिका न अपने आप कर लगा सकती है, न अपने आप ख़ज़ाने से पैसा निकाल सकती है।
ध्यान दें कि “बजट” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता; संविधान का शब्द है
“वार्षिक वित्तीय विवरण” (Annual Financial Statement)।
7.2 अनुच्छेद 112 — भारित बनाम मतदेय व्यय
वार्षिक वित्तीय विवरण में अनुमानित प्राप्तियाँ एवं व्यय दिखाए जाते हैं, और व्यय को
दो भागों में अलग-अलग दिखाना अनिवार्य है — भारित व्यय (Charged Expenditure) तथा
मतदेय व्यय (Voted Expenditure)। भारित व्यय पर संसद में चर्चा हो सकती है,
किंतु मतदान नहीं (अनु. 113(1)); मतदेय व्यय पर लोक सभा अनुदान की माँगों के रूप में
मतदान करती है (अनु. 113(2))।
भारत की संचित निधि पर भारित व्यय — अनुच्छेद 112(3):
राष्ट्रपति की उपलब्धियाँ, भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय;
राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
के वेतन एवं भत्ते;
ऋण-भार — ब्याज, निक्षेप निधि प्रभार, मोचन प्रभार तथा उधार लेने से जुड़े अन्य व्यय;
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन;
तत्कालीन फ़ेडरल कोर्ट के न्यायाधीशों की पेंशन; तथा
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन;
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के वेतन, भत्ते एवं पेंशन;
किसी न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए अपेक्षित राशि;
कोई अन्य व्यय जिसे संविधान या संसद विधि द्वारा भारित घोषित कर दे।
ध्यान दें — उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन संबंधित
राज्य की संचित निधि पर भारित हैं; केवल उनकी पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित है।
यह अंतर परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
मंत्रियों के वेतन भारित नहीं — वे मतदेय हैं। इसी प्रकार संसद-सदस्यों के वेतन भी मतदेय हैं।
राष्ट्रपति का व्यय → दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी (सभापति/उपसभापति,
अध्यक्ष/उपाध्यक्ष) → ऋण-भार → न्यायाधीश (उच्चतम न्यायालय के वेतन, उच्च न्यायालय की पेंशन) →
लेखा परीक्षक यानी CAG → न्यायालय की डिक्री/पंचाट → संसद जिसे विधि से भारित घोषित कर दे।
स्मरण-सूत्र: जो पद स्वतंत्र रहना चाहिए, उसका वेतन भारित है — क्योंकि भारित व्यय पर सदन मतदान नहीं कर सकता,
अतः उसे वेतन रोककर दबाया नहीं जा सकता।
7.3 तीन निधियाँ — अनुच्छेद 266 एवं 267
सुमेलन-तालिका 12 : भारत की तीन सरकारी निधियाँ
निधि
अनुच्छेद
इसमें क्या जाता है
निकासी की शर्त
भारत की संचित निधि Consolidated Fund of India
266(1)
सरकार की सभी प्राप्तियाँ — कर, ऋण से प्राप्त धन, ऋणों की वसूली
संसद के विनियोग (अनु. 114) के बिना एक पैसा नहीं; सबसे बड़ी निधि; CAG इसका लेखापरीक्षण करता है
भारत का लोक लेखा Public Account of India
266(2)
वह धन जिसमें सरकार केवल बैंकर है — भविष्य निधि, लघु बचत, प्रेषण, जमाराशियाँ
संसद के विनियोग की आवश्यकता नहीं; कार्यपालिका के आदेश से निकासी — क्योंकि पैसा सरकार का है ही नहीं
भारत की आकस्मिकता निधि Contingency Fund of India
267(1)
संसद द्वारा विधि से स्थापित अग्रदाय निधि (imprest); राष्ट्रपति के व्ययनाधीन रखी जाती है
अप्रत्याशित व्यय के लिए पहले खर्च, बाद में संसद की स्वीकृति; स्वीकृति मिलने पर संचित निधि से उतनी राशि लौटाकर निधि पुनर्भरित की जाती है
आकस्मिकता निधि की राशि — आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950 के अधीन आरंभ में
₹50 लाख, फिर बढ़ते-बढ़ते ₹500 करोड़ (2005) हुई, और
वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा इसे बढ़ाकर ₹30,000 करोड़ कर दिया गया —
यह साठ गुना वृद्धि थी।
अनुच्छेद 267(2) — इसी प्रकार राज्य की आकस्मिकता निधि राज्य विधानमंडल
विधि द्वारा स्थापित कर सकता है; वह राज्यपाल के व्ययनाधीन रहती है।
अनुच्छेद 266(1) राज्यों के लिए भी उतना ही लागू है — प्रत्येक राज्य की अपनी
संचित निधि तथा लोक लेखा होता है।
7.4 बजट की छह अवस्थाएँ
1. प्रस्तुतीकरणवित्त मंत्री बजट भाषण के साथ 1 फरवरी को लोक सभा में प्रस्तुत करते हैं; राज्य सभा में केवल रखा जाता है। 2017 से तिथि 28 फरवरी से बदलकर 1 फरवरी हुई और रेल बजट आम बजट में मिला दिया गया
→
2. सामान्य चर्चादोनों सदनों में; बजट की समग्र नीति पर, किसी अलग माँग पर नहीं; कोई प्रस्ताव नहीं, कोई मतदान नहीं; वित्त मंत्री का उत्तर
→
3. समितियों द्वारा संवीक्षासदन अवकाश पर जाते हैं; 24 विभागीय स्थायी समितियाँ अपने-अपने मंत्रालयों की अनुदान माँगों की विस्तृत जाँच कर प्रतिवेदन देती हैं। यह व्यवस्था 1993 से है
→
4. अनुदान माँगों पर मतदानकेवल लोक सभा; प्रत्येक मंत्रालय की माँग अलग; कटौती प्रस्ताव यहीं आते हैं; अंतिम दिन गुलेटिन। केवल मतदेय व्यय पर
→
5. विनियोग विधेयकअनु. 114 — स्वीकृत अनुदान तथा भारित व्यय, दोनों की संचित निधि से निकासी को विधिक रूप देता है। ऐसा कोई संशोधन नहीं रखा जा सकता जो अनुदान की राशि या उसका गंतव्य बदल दे
→
6. वित्त विधेयकआगामी वर्ष के कर-प्रस्तावों को विधिक रूप देता है; इसमें कर घटाने या हटाने के संशोधन रखे जा सकते हैं। 75 दिन के भीतर अधिनियमित होना आवश्यक
अनुच्छेद 116 — लेखानुदान, प्रत्यानुदान एवं अपवादानुदान:
लेखानुदान (Vote on Account) — 116(1)(क): पूरी बजट-प्रक्रिया में समय लगता है,
इसलिए 1 अप्रैल से खर्च चलाने के लिए लोक सभा अनुमानित व्यय का एक अग्रिम भाग स्वीकृत
करती है। सामान्यतः यह दो मास के लिए, सकल अनुमान के 1/6 भाग के बराबर होता है;
आम चुनाव के वर्ष में यह अवधि लंबी हो सकती है।
प्रत्यानुदान (Vote of Credit) — 116(1)(ख): देश की अप्रत्याशित माँग पूरी करने के लिए,
जब ब्योरा नहीं दिया जा सकता — जैसे युद्ध। इसे “संसद का कोरा चेक” कहा जाता है।
अपवादानुदान (Exceptional Grant) — 116(1)(ग): किसी विशेष प्रयोजन के लिए,
जो किसी वित्तीय वर्ष की वर्तमान सेवा का भाग नहीं है।
अनुच्छेद 115 — अनुपूरक, अतिरिक्त एवं अधिक अनुदान:अनुपूरक अनुदान — स्वीकृत राशि अपर्याप्त निकले; अतिरिक्त अनुदान —
उस वर्ष के बजट में न सोची गई नई सेवा पर व्यय; अधिक अनुदान (Excess Grant) —
वर्ष में स्वीकृत से अधिक खर्च हो गया; यह वर्ष समाप्त होने के बाद माँगा जाता है और इसे
पहले लोक लेखा समिति की संस्तुति मिलनी चाहिए।
75 दिन का नियम — अस्थायी कर संग्रहण अधिनियम, 2023
(जिसने 1931 के अधिनियम का स्थान लिया) के अधीन, वित्त विधेयक में घोषित कुछ सीमा-शुल्क एवं उत्पाद-शुल्क
प्रस्ताव तत्काल प्रभावी हो जाते हैं; किंतु यदि विधेयक 75 दिन में
अधिनियमित न हो, तो वे प्रभावहीन हो जाते हैं और वसूला गया शुल्क लौटाना पड़ता है।
सावधानी — विनियोग बनाम वित्त विधेयक
विनियोग विधेयक = पैसा निकालने की अनुमति (व्यय पक्ष)।
वित्त विधेयक = पैसा जुटाने की अनुमति (राजस्व/कर पक्ष)। दोनों
धन विधेयक हैं, पर उद्देश्य विपरीत हैं।
विनियोग विधेयक में ऐसा कोई संशोधन नहीं रखा जा सकता जो अनुदान की राशि बदल दे या
भारित व्यय की राशि/गंतव्य बदल दे (अनु. 114(2))। वित्त विधेयक में कर घटाने/हटाने के
संशोधन रखे जा सकते हैं।
विनियोग विधेयक में भारित व्यय भी सम्मिलित होता है — यद्यपि उस पर मतदान नहीं हुआ था।
यही कारण है कि विनियोग विधेयक की राशि, अनुदान माँगों की राशि से अधिक होती है।
“मतदान नहीं होता” का अर्थ “चर्चा नहीं होती” नहीं है — भारित व्यय पर संसद
खुलकर चर्चा कर सकती है (अनु. 113(1))।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I (अनुदान का प्रकार) को सूची-II (विवरण) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. लेखानुदान B. प्रत्ययानुदान C. अपवादानुदान D. अनुपूरक अनुदान सूची-II: 1. अनिश्चित स्वरूप की अप्रत्याशित माँग, जिसका ब्यौरा साधारण बजट की भाँति नहीं दिया जा सकता 2. चालू वित्तीय वर्ष के लिए प्राधिकृत राशि अपर्याप्त पाए जाने पर दी जाने वाली अतिरिक्त राशि 3. विनियोग अधिनियम पारित होने तक वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए दी जाने वाली अग्रिम राशि 4. किसी विशेष प्रयोजन हेतु ऐसा अनुदान जो चालू वर्ष की वर्तमान सेवा का भाग नहीं होता कूट:
उत्तर: (D)अनुच्छेद 116 में लेखानुदान (Vote on Account), प्रत्ययानुदान (Vote of Credit) तथा अपवादानुदान (Exceptional Grant) का उपबंध है, जबकि अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant) अनुच्छेद 115 के अंतर्गत आता है। लेखानुदान बजट पारित होने तक व्यय हेतु अग्रिम राशि है, प्रत्ययानुदान अनिश्चित स्वरूप की अप्रत्याशित माँग के लिए है तथा अपवादानुदान किसी वर्ष की वर्तमान सेवा से असंबद्ध विशेष प्रयोजन हेतु दिया जाता है। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।
प्र.2विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. विनियोग विधेयक में ऐसा कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता जिससे किसी अनुदान की राशि में परिवर्तन हो अथवा उसका लक्ष्य बदल जाए। 2. विनियोग अधिनियम के प्राधिकार के बिना भारत की संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जा सकता। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 114(2) के अनुसार विनियोग विधेयक में ऐसा कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता जो किसी अनुदान की राशि या उसके लक्ष्य में परिवर्तन करे; अध्यक्ष का इस विषय पर निर्णय अंतिम होता है। अनुच्छेद 114(3) उपबंध करता है कि विनियोग अधिनियम द्वारा किए गए विनियोग के अतिरिक्त संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जाएगा। अतः दोनों कथन सही हैं।
प्र.3न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. उच्चतम न्यायालय के पद पर रह चुका कोई व्यक्ति भारत के राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं कर सकता। 2. उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है। 3. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं। उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं? नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 124(7) के अनुसार उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत में किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन नहीं कर सकता, जबकि अनुच्छेद 220 के अधीन उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है — अतः कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 202(3)(घ) के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।
8. संसदीय समितियाँ — वित्तीय, विभागीय स्थायी एवं तदर्थ
संसद पूर्ण सदन के रूप में बजट के हर पन्ने या हर विधेयक के हर खंड की जाँच नहीं कर सकती —
न उसके पास समय है, न विशेषज्ञता। इसीलिए कहा जाता है कि “संसद का असली काम समितियों में होता है”।
समितियों का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 105 (विशेषाधिकार) तथा अनुच्छेद 118
(प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति) में है; विस्तृत व्यवस्था दोनों सदनों के
प्रक्रिया एवं कार्य-संचालन नियमों में है।
संसदीय समितियाँ
क. स्थायी समितियाँ (Standing Committees) — निरंतर, प्रतिवर्ष पुनर्गठित
1. वित्तीय समितियाँ— लोक लेखा समिति · प्राक्कलन समिति · सार्वजनिक उपक्रम समिति
2. विभागीय स्थायी समितियाँ— 24 समितियाँ, प्रत्येक में 31 सदस्य
3. जाँच समितियाँ— याचिका समिति · विशेषाधिकार समिति · आचार समिति
4. संवीक्षा एवं नियंत्रण समितियाँ— सरकारी आश्वासन समिति · अधीनस्थ विधान समिति · पटल पर रखे गए पत्रों संबंधी समिति · अजा/अजजा कल्याण समिति · महिला सशक्तीकरण समिति · लाभ के पदों संबंधी संयुक्त समिति
5. दिन-प्रतिदिन के कार्य से संबंधित— कार्य मंत्रणा समिति · नियम समिति · गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों एवं संकल्पों संबंधी समिति · सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति (केवल लोक सभा)
6. सदन-सेवा समितियाँ— सामान्य प्रयोजन समिति · आवास समिति · पुस्तकालय समिति
ख. तदर्थ समितियाँ (Ad hoc Committees) — कार्य पूरा होते ही समाप्त
1. जाँच समितियाँ— किसी विशिष्ट विषय पर, जैसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) एवं रेल दुर्घटना जाँच समितियाँ
2. सलाहकार समितियाँ— किसी विधेयक पर प्रवर समिति (Select Committee) — एक ही सदन की; तथा संयुक्त समिति (Joint Committee) — दोनों सदनों की
8.1 तीन वित्तीय समितियाँ — सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग
सुमेलन-तालिका 13 : तीन वित्तीय समितियाँ — रचना एवं कार्य
समिति
सदस्य
स्थापना
कार्य एवं विशेषता
लोक लेखा समिति Public Accounts Committee
22 15 लोक सभा + 7 राज्य सभा
1921 — 1919 के भारत शासन अधिनियम के अधीन; भारत की सबसे पुरानी संसदीय समिति
विनियोग लेखाओं तथा CAG के प्रतिवेदनों की जाँच; देखती है कि धन उसी मद पर, उसी सीमा तक तथा विधि के अनुसार खर्च हुआ या नहीं। इसे “CAG की जुड़वाँ बहन” कहा जाता है। 1967 से परंपरा है कि इसका सभापति विपक्ष का सदस्य होता है; नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं
प्राक्कलन समिति Estimates Committee
30 सभी लोक सभा से; राज्य सभा का एक भी सदस्य नहीं
1950 — तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफ़ारिश पर
बजट में निहित अनुमानों की जाँच; मितव्ययिता, संगठनात्मक सुधार तथा प्रशासनिक दक्षता के सुझाव। तीनों वित्तीय समितियों में सबसे बड़ी। इसे “सतत मितव्ययिता समिति” कहा जाता है। सभापति सदैव सत्ता पक्ष से; यह व्यय होने के बाद नहीं, पहले देखती है
सार्वजनिक उपक्रम समिति Committee on Public Undertakings
22 15 लोक सभा + 7 राज्य सभा (मूलतः 15 — 10 + 5; 1974 में बढ़ाकर 22)
1964 — कृष्ण मेनन समिति की सिफ़ारिश पर
सार्वजनिक उपक्रमों के प्रतिवेदनों, लेखाओं तथा उन पर CAG के प्रतिवेदनों की जाँच; देखती है कि उपक्रम व्यावसायिक सिद्धांतों एवं विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रथाओं के अनुसार चल रहे हैं या नहीं
तीन वित्तीय समितियाँ — संख्या एवं वर्ष“लोक 22 इक्कीस · प्राक् 30 पचास · उपक्रम 22 चौंसठ”
लोक लेखा समिति — 22 सदस्य, 1921 (“इक्कीस”) में स्थापित।
प्राक्कलन समिति — 30 सदस्य, 1950 (“पचास”) में स्थापित।
सार्वजनिक उपक्रम समिति — 22 सदस्य, 1964 (“चौंसठ”) में स्थापित।
तीनों के सदस्य एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से प्रतिवर्ष चुने जाते हैं और
कार्यकाल एक वर्ष का होता है। कोई मंत्री किसी भी वित्तीय समिति का सदस्य नहीं हो सकता; यदि सदस्य
मंत्री बन जाए तो सदस्यता समाप्त।
सावधानी — 22 बनाम 30, और “राज्य सभा का कोई सदस्य नहीं”
लोक लेखा — 22 (15 + 7)। सार्वजनिक उपक्रम — 22 (15 + 7)।
प्राक्कलन — 30। तीनों में केवल प्राक्कलन समिति की संख्या भिन्न है — और वही
विकल्पों में उलटी दी जाती है।
प्राक्कलन समिति में राज्य सभा का एक भी सदस्य नहीं होता — यह तीनों में
अकेली ऐसी समिति है। कारण: प्राक्कलन का संबंध अनुदान की माँगों से है, और उन पर मतदान
केवल लोक सभा करती है।
लोक लेखा एवं सार्वजनिक उपक्रम समितियों में राज्य सभा के सदस्य होते हैं, किंतु वे
सभापति नहीं बन सकते — सभापति सदैव लोक सभा का सदस्य होता है, जिसे
लोक सभा अध्यक्ष नियुक्त करते हैं।
प्राक्कलन समिति व्यय से पूर्व (ex ante) देखती है; लोक लेखा समिति व्यय के बाद (ex post)।
इसीलिए एक को “सतत मितव्ययिता समिति” और दूसरी को “CAG की जुड़वाँ बहन” कहा जाता है।
CAG की भूमिका — वह लोक लेखा तथा सार्वजनिक उपक्रम समितियों का
“मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक” कहलाता है; प्राक्कलन समिति के साथ उसका यह संबंध नहीं है।
(CAG का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.6 में।)
8.2 विभागीय स्थायी समितियाँ (DRSC)
1993 में 17 समितियों से आरंभ; जुलाई 2004 में
सात और जोड़कर संख्या 24 कर दी गई। यह भारत की संसदीय व्यवस्था का सबसे बड़ा
संस्थागत सुधार माना जाता है।
प्रत्येक समिति में 31 सदस्य — 21 लोक सभा से + 10 राज्य सभा से।
(1993 में यह 45 थी — 30 + 15; 2004 में घटाकर 31 की गई।)
24 में से 16 लोक सभा अध्यक्ष के अधीन तथा 8 राज्य सभा के सभापति के अधीन।
सदस्य क्रमशः अध्यक्ष तथा सभापति द्वारा नामनिर्देशित किए जाते हैं; कार्यकाल एक वर्ष।
कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता; सदस्य बनने के बाद मंत्री बन जाए तो सदस्यता समाप्त।
चार कार्य — (1) संबंधित मंत्रालयों की अनुदान माँगों की जाँच;
(2) उन्हें निर्दिष्ट विधेयकों की जाँच; (3) मंत्रालयों के वार्षिक प्रतिवेदनों
की जाँच; (4) सदन में रखे गए दीर्घकालिक नीति-दस्तावेज़ों पर विचार।
सीमाएँ — ये समितियाँ मंत्रालय के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन पर विचार नहीं करतीं;
इनके प्रतिवेदन परामर्शी (advisory) होते हैं, बाध्यकारी नहीं; तथा
अनुदान माँगों में कटौती का सुझाव वे नहीं दे सकतीं।
8.3 अन्य प्रमुख समितियाँ एवं तदर्थ समितियाँ
सुमेलन-तालिका 14 : अन्य समितियाँ ↔ रचना
समिति
लोक सभा
राज्य सभा
विशेषता
कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory)
15
11
सभापति स्वयं अध्यक्ष/सभापति होते हैं; सदन के कार्य का समय-आबंटन तय करती है
विशेषाधिकार समिति (Privileges)
15
10
अर्ध-न्यायिक प्रकृति; विशेषाधिकार-भंग के मामलों की जाँच
अधीनस्थ विधान समिति (Subordinate Legislation)
15
15
प्रत्यायोजित विधान की जाँच — क्या कार्यपालिका ने अपनी नियम-बनाने की शक्ति की सीमा पार की
सरकारी आश्वासन समिति (Government Assurances)
15
10
मंत्रियों ने सदन में जो आश्वासन दिए, उनका अनुपालन जाँचती है
याचिका समिति (Petitions)
15
10
विधेयकों तथा सामान्य लोक-महत्व के विषयों पर प्राप्त याचिकाओं पर विचार
अजा/अजजा कल्याण समिति
30 — 20 लोक सभा + 10 राज्य सभा
अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के प्रतिवेदनों तथा कल्याण-योजनाओं की जाँच
महिला सशक्तीकरण समिति
30 — 20 लोक सभा + 10 राज्य सभा
1997 में गठित; राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रतिवेदनों की जाँच
लाभ के पदों संबंधी संयुक्त समिति
15 — 10 लोक सभा + 5 राज्य सभा
यह जाँचती है कि कौन-सा पद धारण करने से सदस्य निरर्हित होगा
सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति
15
—
केवल लोक सभा में; अनुपस्थिति की अनुमति संबंधी आवेदनों पर विचार
आचार समिति (Ethics)
2000 में गठित
1997 में गठित
सदस्यों के अनैतिक आचरण के मामले; राज्य सभा में पहले बनी — यह क्रम पूछा जाता है
प्रवर समिति (Select Committee) — केवल एक सदन के सदस्यों की;
किसी विशिष्ट विधेयक की जाँच के लिए; प्रतिवेदन देते ही समाप्त।
संयुक्त समिति / संयुक्त संसदीय समिति (JPC) — दोनों सदनों के सदस्यों की;
किसी विधेयक अथवा किसी विशिष्ट प्रकरण की जाँच के लिए; इसके सदस्य प्रायः लोक सभा से दोगुने
रखे जाते हैं। प्रमुख उदाहरण — बोफोर्स (1987), प्रतिभूति घोटाला (1992), शेयर बाज़ार घोटाला (2001),
शीतल पेयों में कीटनाशक (2003), 2G स्पेक्ट्रम (2011)।
वर्तमान उदाहरण — संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024
(“एक राष्ट्र, एक चुनाव”) की जाँच के लिए दिसंबर 2024 में गठित संयुक्त संसदीय समिति में
39 सदस्य हैं — 27 लोक सभा + 12 राज्य सभा; अध्यक्ष पी.पी. चौधरी।
लोक सभा ने इसका कार्यकाल मानसून सत्र 2026 तक बढ़ाया है।
समितियों की सीमाएँ — इनके प्रतिवेदन बाध्यकारी नहीं; प्रतिवेदन पर सदन में
प्रायः चर्चा नहीं होती; और विधेयकों को समिति को भेजना अनिवार्य नहीं है — यह
पीठासीन अधिकारी/सदन के विवेक पर है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I (संसदीय समिति) को सूची-II (गठन का वर्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. लोक लेखा समिति B. प्राक्कलन समिति C. सार्वजनिक उपक्रम समिति D. विभाग-संबंधित स्थायी समिति प्रणाली सूची-II: 1. 1950 2. 1993 3. 1921 4. 1964 कूट:
उत्तर: (C)लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) 1921 में भारत शासन अधिनियम, 1919 के उपबंधों के अधीन गठित हुई और यह संसद की सबसे पुरानी वित्तीय समिति है। प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) 1950 में जॉन मथाई की अनुशंसा पर बनी तथा सार्वजनिक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) 1964 में कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर। विभाग-संबंधित स्थायी समिति (DRSC) प्रणाली 1993 में 17 समितियों के साथ प्रारंभ हुई, जिन्हें 2004 में बढ़ाकर 24 किया गया।
प्र.2सूची-I (संविधान सभा की समिति) को सूची-II (अध्यक्ष) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. संघ शक्ति समिति B. प्रांतीय संविधान समिति C. संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति D. कार्य संचालन समिति सूची-II: 1. सरदार वल्लभभाई पटेल 2. के. एम. मुंशी 3. जवाहरलाल नेहरू 4. जी. वी. मावलंकर कूट:
उत्तर: (B)जवाहरलाल नेहरू संघ शक्ति समिति, संघ संविधान समिति तथा राज्यों संबंधी समिति के अध्यक्ष थे; सरदार पटेल प्रांतीय संविधान समिति तथा मूल अधिकार, अल्पसंख्यक एवं जनजातीय क्षेत्र संबंधी परामर्शदात्री समिति के; जी. वी. मावलंकर संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति के; तथा के. एम. मुंशी कार्य संचालन समिति (Order of Business Committee) के अध्यक्ष थे। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।
प्र.3सूची-I (संसदीय समिति) को सूची-II (मुख्य कार्य) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए: सूची-I: A. कार्य मंत्रणा समिति B. नियम समिति C. अधीनस्थ विधान संबंधी समिति D. सरकारी आश्वासन समिति सूची-II: 1. कार्यपालिका को प्रत्यायोजित विधायी शक्ति के उचित प्रयोग की जाँच करना 2. सदन में मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों के कार्यान्वयन का अनुवर्तन करना 3. सदन में विधायी तथा अन्य कार्यों के लिए समय का आवंटन करना 4. सदन की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन संबंधी नियमों पर विचार करना कूट:
उत्तर: (B)कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee) सदन के कार्यों हेतु समय का आवंटन करती है; नियम समिति (Rules Committee) प्रक्रिया-नियमों पर विचार करती है; अधीनस्थ विधान संबंधी समिति (Committee on Subordinate Legislation) प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) की जाँच करती है; तथा सरकारी आश्वासन समिति (Committee on Government Assurances) मंत्रियों के आश्वासनों के अनुपालन को देखती है। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।
9. संसदीय पदाधिकारी — अध्यक्ष, सभापति तालिका एवं विपक्ष का नेता
9.1 लोक सभा का अध्यक्ष — अनुच्छेद 93 से 97
सुमेलन-तालिका 15 : अध्यक्ष-संबंधी अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
93
लोक सभा यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनेगी; पद रिक्त होने पर पुनः चुनेगी। कोई समय-सीमा नहीं दी गई
94
पद रिक्त होने के तीन आधार — (क) सदन का सदस्य न रहना; (ख) त्यागपत्र — अध्यक्ष उपाध्यक्ष को, उपाध्यक्ष अध्यक्ष को; (ग) सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) से पारित संकल्प द्वारा हटाया जाना, जिसके लिए 14 दिन की सूचना आवश्यक है। परंतुक — लोक सभा के विघटन पर अध्यक्ष अपना पद नहीं छोड़ता; वह अगली लोक सभा की प्रथम बैठक से ठीक पहले तक पद पर रहता है
95
अध्यक्ष का पद रिक्त होने या अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष कर्तव्य निभाएगा
96
जब अध्यक्ष (या उपाध्यक्ष) को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, तब वह पीठासीन नहीं होगा; किंतु उसे बोलने, भाग लेने तथा प्रथमतः मत देने का अधिकार है — निर्णायक मत का नहीं
97
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति एवं उपसभापति के वेतन एवं भत्ते संसद विधि द्वारा तय करेगी, और वे भारत की संचित निधि पर भारित होंगे
अध्यक्ष की विशिष्ट शक्तियाँ —
धन विधेयक का प्रमाणन (अनु. 110(3)–(4)) — उसका विनिश्चय अंतिम है;
संयुक्त बैठक की अध्यक्षता (अनु. 118(4));
निर्णायक मत (अनु. 100(1)) — सामान्य मतदान में भाग नहीं लेता;
दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल पर निरर्हता का विनिश्चय;
गणपूर्ति के अभाव में सदन स्थगित करना; व्यवस्था के प्रश्न तय करना; नियमों की व्याख्या;
सभी संसदीय समितियों के सभापतियों की नियुक्ति; कार्य मंत्रणा, नियम एवं सामान्य प्रयोजन समितियों का स्वयं सभापति होना;
किसी सदस्य के अनुरोध पर सदन की गुप्त बैठक की अनुमति;
सदस्यों के विशेषाधिकारों का संरक्षक।
स्वतंत्रता के उपाय — वेतन भारित; आचरण पर सदन में चर्चा केवल
मूल प्रस्ताव पर; प्रक्रिया-विनियमन की शक्तियाँ न्यायालय की अधिकारिता से बाहर (अनु. 122);
वरीयता-क्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष स्थान।
उपाध्यक्ष — अध्यक्ष के अधीनस्थ नहीं; वह सीधे सदन के प्रति उत्तरदायी है।
जब वह किसी संसदीय समिति का सदस्य नियुक्त होता है, तो वह स्वतः उसका सभापति हो जाता है।
1990 के दशक से परंपरा है कि उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया जाए —
यद्यपि यह संवैधानिक बाध्यता नहीं है। 17वीं लोक सभा (2019–2024) अपना पूरा कार्यकाल
बिना उपाध्यक्ष के पूरा करने वाली पहली लोक सभा बनी, क्योंकि अनुच्छेद 93 में
“यथाशीघ्र” के अतिरिक्त कोई समय-सीमा नहीं है।
9.2 प्रोटेम अध्यक्ष एवं सभापति तालिका
प्रोटेम अध्यक्षनई लोक सभा के गठन पर, नियमित अध्यक्ष के निर्वाचन तक राष्ट्रपति किसी सदस्य को प्रोटेम अध्यक्ष नियुक्त करते हैं — परंपरा से वरिष्ठतम सदस्य। राष्ट्रपति स्वयं उन्हें शपथ दिलाते हैं
→
उसके तीन कार्य(1) नए सदस्यों को शपथ दिलाना; (2) सदन की प्रथम बैठक की अध्यक्षता; (3) अध्यक्ष के निर्वाचन की कार्यवाही कराना — इसके बाद उसका पद स्वतः समाप्त
→
सभापति तालिकालोक सभा — प्रक्रिया-नियम 9 के अधीन अध्यक्ष अधिकतम दस सदस्यों की सभापति तालिका (Panel of Chairpersons) नामनिर्देशित करते हैं। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में इनमें से कोई पीठासीन होता है
→
राज्य सभा में समतुल्यवहाँ इसे उपसभापतियों का पैनल (Panel of Vice-Chairmen) कहते हैं, जिसे सभापति नामनिर्देशित करते हैं। यदि सभी पद रिक्त हों, तो सदन स्वयं किसी सदस्य को पीठासीन नियुक्त करता है
सावधानी — तीन बारीक भेद
प्रोटेम अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं — अध्यक्ष या सदन नहीं।
वहीं सभापति तालिका के सदस्य अध्यक्ष नामनिर्देशित करते हैं।
सभापति तालिका का सदस्य तब पीठासीन नहीं हो सकता जब अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष — दोनों के पद रिक्त हों;
ऐसी दशा में राष्ट्रपति किसी सदस्य को यह कार्य सौंपते हैं (अनु. 95(2))।
राज्य सभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) सदन का सदस्य नहीं होता, इसलिए उसे हटाने की
प्रक्रिया अनुच्छेद 67(ख) है — अनुच्छेद 94 नहीं। किंतु राज्य सभा का उपसभापति सदन का सदस्य होता है
और उसे प्रभावी बहुमत से (अनु. 90) हटाया जा सकता है।
9.3 सदन के नेता, विपक्ष के नेता एवं सचेतक
सदन का नेता (Leader of the House) — लोक सभा में स्वयं प्रधानमंत्री,
यदि वे उस सदन के सदस्य हों; अन्यथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित कोई मंत्री। राज्य सभा में
प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित कोई मंत्री। यह पद प्रक्रिया-नियमों में उल्लिखित है।
विपक्ष का नेता (Leader of the Opposition) — विपक्ष में बैठे उस दल का नेता जिसकी
सदन में सर्वाधिक संख्या हो और जिसे पीठासीन अधिकारी मान्यता दे।
इसे संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन एवं भत्ते अधिनियम, 1977 द्वारा
सांविधिक मान्यता मिली — इससे पहले यह केवल परंपरागत पद था।
“दसवाँ भाग” की शर्त — 1956 में तत्कालीन अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के
निदेश से यह परंपरा बनी कि मान्यता के लिए दल के पास सदन की कुल संख्या का कम-से-कम 1/10
सदस्य होने चाहिए (लोक सभा में 55)। यही कारण था कि
16वीं (2014–19) तथा 17वीं (2019–24) लोक सभा में विपक्ष के नेता का पद रिक्त रहा।
विपक्ष के नेता की वैधानिक भूमिका — वे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक,
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, मुख्य सूचना आयुक्त, लोकपाल तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष
के चयन-मंडलों के सदस्य होते हैं। इसीलिए पद का रिक्त रहना केवल प्रतीकात्मक नहीं, संस्थागत प्रश्न है।
सचेतक (Whip) — यह पद न संविधान में है, न सदन के प्रक्रिया-नियमों में,
न किसी संसदीय क़ानून में; यह पूर्णतः संसदीय शासन की परंपरा पर आधारित है।
फिर भी उसके निदेश की अवहेलना दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता ला सकती है — यह विरोधाभास
परीक्षा में पूछा जाता है।
महासचिव (Secretary-General) — सदन का स्थायी अधिकारी; लोक सभा में
अध्यक्ष द्वारा नियुक्त; पद का स्तर कैबिनेट सचिव के समकक्ष;
वह सदन को सलाह देता है पर स्वयं सदन के प्रति उत्तरदायी नहीं, केवल अध्यक्ष के प्रति।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — सबसे बड़ा राज्य, पर पीठ पर कभी नहीं
लोक सभा में 80 सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश से आज तक कोई लोक सभा अध्यक्ष
नहीं बना — यह भारतीय संसदीय इतिहास का एक चर्चित विरोधाभास है। सर्वाधिक अध्यक्ष
आंध्र प्रदेश (एम.ए. अय्यंगार, नीलम संजीव रेड्डी, जी.एम.सी. बालयोगी) तथा
पंजाब (सरदार हुकम सिंह, जी.एस. ढिल्लों, बलराम जाखड़) से रहे — तीन-तीन।
UPPSC में “निम्नलिखित में से कौन उत्तर प्रदेश से लोक सभा अध्यक्ष रहे?” जैसा नकारात्मक प्रश्न
इसी तथ्य पर बनता है।
किंतु विपक्ष का नेता उत्तर प्रदेश से आया है — जून 2024 में
राहुल गांधी ने रायबरेली (उ.प्र.) का प्रतिनिधित्व करते हुए
18वीं लोक सभा में यह पद ग्रहण किया; दस वर्ष बाद यह पद फिर से भरा गया।
राज्य स्तर पर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन संयुक्त प्रांत/उत्तर प्रदेश विधान सभा के
प्रथम अध्यक्ष थे (1937–39 तथा 1946–50)। वे ही आगे चलकर 1950 में कांग्रेस के
अध्यक्ष बने और हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के प्रमुख प्रवक्ता रहे। उत्तर प्रदेश विधान सभा के
वर्तमान अध्यक्ष सतीश महाना हैं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित में से किन पदों पर नियुक्ति हेतु गठित चयन/अनुशंसा समिति में लोक सभा में विपक्ष का नेता सदस्य होता है? 1. संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष 2. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त 3. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का निदेशक 4. मुख्य सूचना आयुक्त नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A2, 3 और 4Bकेवल 4C1 और 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, विपक्ष का नेता), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक (प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, मुख्य न्यायमूर्ति अथवा उनके द्वारा नामनिर्दिष्ट न्यायाधीश) तथा मुख्य सूचना आयुक्त (प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री) — तीनों की चयन समितियों में विपक्ष का नेता सम्मिलित है। संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति सीधे करता है; उसके लिए ऐसी कोई समिति नहीं है।
प्र.2संसद में विपक्ष के नेता के पद को वैधानिक मान्यता तथा कैबिनेट मंत्री के समकक्ष वेतन-भत्ते निम्नलिखित में से किस अधिनियम द्वारा प्रदान किए गए?
Aसंसद (सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन) अधिनियम, 1954Bसंसद में विपक्ष के नेताओं का वेतन एवं भत्ता अधिनियम, 1977Cसंसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959Dजन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) का पद संविधान में नहीं, अपितु 'संसद में विपक्ष के नेताओं का वेतन एवं भत्ता अधिनियम, 1977' में परिभाषित है, जिसके अंतर्गत उसे कैबिनेट मंत्री के समकक्ष वेतन, भत्ते एवं सुविधाएँ मिलती हैं। दोनों सदनों में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को, जिसे अध्यक्ष/सभापति मान्यता दे, यह पद प्राप्त होता है। शेष अधिनियम अन्य विषयों से संबंधित हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): लोक सभा का उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है। कारण (R): उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के अधीनस्थ होता है तथा अपने कार्यों के लिए अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 94 के अनुसार लोक सभा का अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है — अतः अभिकथन सही है। किंतु उपाध्यक्ष अध्यक्ष का अधीनस्थ नहीं होता; वह सीधे सदन के प्रति उत्तरदायी होता है और पीठासीन होने पर उसे अध्यक्ष की सभी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। अतः कारण गलत है।
10. राज्यपाल — नियुक्ति, शक्तियाँ एवं विवेकाधीन क्षेत्र
10.1 नियुक्ति एवं पद — अनुच्छेद 153 से 160
सुमेलन-तालिका 16 : राज्यपाल-संबंधी अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
निर्णायक बिंदु
153
प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा
7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा जोड़ा गया परंतुक — एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है
154
राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित
वह इसे स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से प्रयोग करेगा
155
राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित अधिपत्र (warrant) द्वारा नियुक्त करेगा
राज्यपाल का निर्वाचन नहीं होता। संविधान सभा ने निर्वाचित राज्यपाल का प्रस्ताव विचार कर अस्वीकार कर दिया था
156
पदावधि 5 वर्ष, किंतु वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा; त्यागपत्र राष्ट्रपति को
“प्रसादपर्यंत” के कारण 5 वर्ष कोई प्रत्याभूत कार्यकाल नहीं; उत्तराधिकारी के आने तक पद पर बना रहता है
157
अर्हता — भारत का नागरिक हो तथा 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
केवल दो अर्हताएँ; शेष दो परंपराएँ हैं (नीचे देखें)
158
पद की शर्तें — संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो (यदि हो तो पद ग्रहण करते ही स्थान रिक्त); लाभ का अन्य पद न हो; बिना किराया निवास; उपलब्धियाँ राज्य की संचित निधि पर भारित
एक ही व्यक्ति दो राज्यों का राज्यपाल हो तो उपलब्धियाँ राष्ट्रपति के आदेश से राज्यों में बाँटी जाती हैं
159
शपथ — उस राज्य के संबंध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा, उनकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा
राष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं — यह भेद पूछा जाता है
160
कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन — राष्ट्रपति जैसी व्यवस्था उचित समझे, कर सकता है
राज्य में “उपराज्यपाल” जैसा कोई स्थायी विकल्प-पद नहीं है — यही कारण है कि प्रायः पड़ोसी राज्य के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है
दो परंपराएँ (संविधान में नहीं) — (1) राज्यपाल उस राज्य का निवासी न हो
जहाँ उसकी नियुक्ति हो रही है; (2) नियुक्ति से पूर्व राष्ट्रपति संबंधित राज्य के
मुख्यमंत्री से परामर्श करे। सरकारिया आयोग (1988) तथा
पुंछी आयोग (2010) ने इन्हें औपचारिक रूप देने की सिफ़ारिश की थी।
बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) — पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि
अनुच्छेद 156 का “प्रसादपर्यंत” निरंकुश नहीं है। राज्यपाल को केवल इसलिए नहीं हटाया जा सकता
कि केंद्र में सरकार बदल गई या उसकी विचारधारा सरकार से मेल नहीं खाती। हटाने के लिए कारण
बताना आवश्यक नहीं, किंतु यदि हटाना मनमाना, विद्वेषपूर्ण या असंगत सिद्ध हो तो
न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तीन शक्तियाँ नहीं हैं —
(1) राजनयिक शक्ति; (2) सैन्य शक्ति (कोई “सर्वोच्च समादेश” नहीं);
(3) आपातकालीन शक्ति (वह कोई आपात-उद्घोषणा नहीं कर सकता; केवल
अनुच्छेद 356 के अधीन प्रतिवेदन भेज सकता है)।
सावधानी — राज्यपाल की नियुक्ति होती है, निर्वाचन नहीं
अनुच्छेद 155 के शब्द हैं — “किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति
अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करेगा।” अर्थात् यह पद
न प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरा जाता है, न विधान सभा द्वारा, न किसी निर्वाचक मंडल द्वारा।
यह उसे राष्ट्रपति से मौलिक रूप से भिन्न बनाता है — राष्ट्रपति निर्वाचित होता है (अनु. 54),
राज्यपाल नियुक्त।
संविधान सभा में राज्यपाल के प्रत्यक्ष निर्वाचन तथा
राज्य विधानमंडल द्वारा निर्वाचन — दोनों प्रस्तावों पर विचार हुआ और दोनों
अस्वीकार कर दिए गए। तर्क था कि निर्वाचित राज्यपाल मुख्यमंत्री का प्रतिद्वंद्वी बन जाएगा
और संघीय कड़ी की भूमिका टूट जाएगी।
इसी से अगला भेद निकलता है — राष्ट्रपति को महाभियोग (अनु. 61) से हटाया जाता है,
जबकि राज्यपाल को हटाने की कोई प्रक्रिया संविधान में है ही नहीं; वह केवल
अनुच्छेद 156 के “प्रसादपर्यंत” के अधीन राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
इसी प्रकार मुख्यमंत्री की नियुक्ति भी राज्यपाल करता है (अनु. 164(1)) —
विधान सभा उसे “चुनती” नहीं; वह केवल बहुमत-दल के नेता का चयन करती है, और राज्यपाल उसे नियुक्त करता है।
“निर्वाचित” बनाम “नियुक्त” का यह भेद दो-कथन प्रश्नों का सर्वाधिक सामान्य साँचा है।
10.2 राज्यपाल की शक्तियाँ
कार्यकारी — मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति (अनु. 164);
महाधिवक्ता की नियुक्ति (अनु. 165) — जो राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है;
राज्य निर्वाचन आयुक्त तथा राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति
(इन्हें हटाने की शक्ति राज्यपाल के पास नहीं — वह राष्ट्रपति/उच्चतम न्यायालय की जाँच पर है;
विस्तार अध्याय 4.6 में); कार्य-संचालन के नियम बनाना (अनु. 166)।
विधायी — विधानमंडल का सत्र आहूत/सत्रावसान, विधान सभा का विघटन (अनु. 174);
अभिभाषण एवं संदेश (अनु. 175, 176); विधान परिषद में शेष 1/6 सदस्यों का मनोनयन (अनु. 171(3)(ङ) एवं 171(5));
विधान सभा में एक आंग्ल-भारतीय सदस्य का मनोनयन (अनु. 333) —
यह भी 104वें संशोधन से 25 जनवरी 2020 को समाप्त; विधेयकों पर अनुमति (अनु. 200);
अध्यादेश (अनु. 213); राज्य वित्त आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग तथा CAG के प्रतिवेदन सदन के पटल पर रखवाना।
वित्तीय — राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण सदन के समक्ष रखवाना (अनु. 202);
धन विधेयक उसकी पूर्व सिफ़ारिश के बिना नहीं (अनु. 207); अनुदान की कोई माँग
उसकी सिफ़ारिश के बिना नहीं; राज्य की आकस्मिकता निधि उसके व्ययनाधीन (अनु. 267(2));
प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन (अनु. 243झ/243म)।
न्यायिक — अनुच्छेद 161 के अधीन क्षमादान; ज़िला न्यायाधीशों की
नियुक्ति, पदस्थापन एवं पदोन्नति में उच्च न्यायालय से परामर्श (अनु. 233); उच्च न्यायालय के
न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति द्वारा उससे परामर्श।
10.3 विवेकाधीन शक्तियाँ — अनुच्छेद 163
यहीं राज्यपाल राष्ट्रपति से निर्णायक रूप से भिन्न हो जाता है। अनुच्छेद 163(1) कहता है —
“राज्यपाल को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा,
सिवाय उन बातों के जिनमें वह इस संविधान द्वारा या इसके अधीन अपने कृत्यों को अपने विवेकानुसार
करने के लिए अपेक्षित है।” — यह अपवाद-वाक्य अनुच्छेद 74 में नहीं है।
इसीलिए राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तुलना में अधिक विवेकाधीन क्षेत्र है।
अनुच्छेद 163(2) — यदि यह प्रश्न उठे कि कोई विषय विवेकाधीन है या नहीं, तो
राज्यपाल का विनिश्चय अंतिम होगा, और उसके किसी कार्य की विधिमान्यता इस आधार पर
प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि उसे विवेक से कार्य करना चाहिए था या नहीं।
अनुच्छेद 163(3) — मंत्रियों ने क्या सलाह दी, यह न्यायालय में जाँच का विषय नहीं
(अनु. 74(2) के समान)।
संवैधानिक विवेक · Constitutional Discretion
विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना — अनु. 200
राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजना — अनु. 356
किसी संलग्न संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कार्य करना (अनु. 239(2)) — उस भूमिका में वह राज्य मंत्रिपरिषद से स्वतंत्र है
मुख्यमंत्री से प्रशासन एवं विधान संबंधी जानकारी माँगना — अनु. 167
असम के राज्यपाल का यह निर्धारण कि स्वायत्त जनजातीय ज़िला परिषद को खनिज-रॉयल्टी में से कितनी राशि देय है — छठी अनुसूची
विशेष उत्तरदायित्व — महाराष्ट्र एवं गुजरात (अनु. 371), नागालैंड (371क), मणिपुर (371ग), सिक्किम (371च), अरुणाचल प्रदेश (371ज)
परिस्थितिजन्य विवेक · Situational Discretion
जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत न हो, तब मुख्यमंत्री की नियुक्ति
जब मंत्रिपरिषद सदन का विश्वास सिद्ध न कर सके, तब उसे बर्खास्त करना
जब मंत्रिपरिषद बहुमत खो चुकी हो, तब विधान सभा का विघटन
मुख्यमंत्री की आकस्मिक मृत्यु पर स्पष्ट उत्तराधिकारी न होने की स्थिति
यह विवेक संविधान के किसी उपबंध से नहीं, परिस्थिति की अनिवार्यता से जन्मता है — और यही सर्वाधिक विवादित क्षेत्र है
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) — बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं,
सदन के पटल पर होगा; राज्यपाल की व्यक्तिगत राय निर्णायक नहीं।
रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) — बिहार विधान सभा का विघटन, जो राज्यपाल के
इस अनुमान पर आधारित था कि दल-बदल से बहुमत जुटाया जा रहा है, असंवैधानिक ठहराया गया।
नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016) — अरुणाचल प्रदेश; उच्चतम न्यायालय ने कहा कि
राज्यपाल अपने विवेक से विधान सभा का सत्र आहूत या पूर्वप्रेषित नहीं कर सकता;
अनुच्छेद 163 का विवेक सीमित एवं अपवादात्मक है, सामान्य नियम नहीं।
शिवराज सिंह चौहान बनाम विधान सभा अध्यक्ष, म.प्र. (2020) — राज्यपाल को
शक्ति-परीक्षण (floor test) कराने का आदेश देने का अधिकार है, यदि उसके पास यह मानने का
वस्तुनिष्ठ आधार हो कि सरकार बहुमत खो चुकी है।
10.4 अनुच्छेद 200 — विधेयकों पर अनुमति
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत होने पर उसके पास
चार विकल्प हैं —
1. अनुमति दे देविधेयक अधिनियम बन जाता है
→
2. अनुमति रोक लेविधेयक समाप्त — पूर्ण वीटो
→
3. पुनर्विचार हेतु लौटाए(पहला परंतुक) — यदि वह धन विधेयक न हो; सदन पुनः पारित कर दे तो राज्यपाल अनुमति रोक नहीं सकता — निलंबनकारी वीटो
→
4. राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखेविधेयक राज्यपाल के हाथ से निकलकर अनुच्छेद 201 के अधीन राष्ट्रपति के पास चला जाता है
सावधानी — अनुच्छेद 200 का “विचारार्थ सुरक्षित रखना”
यह चौथा विकल्प ही राज्यपाल को राष्ट्रपति से अलग करता है — राष्ट्रपति के पास ऐसा कोई
विकल्प नहीं, क्योंकि उसके ऊपर कोई नहीं है।
दूसरा परंतुक — यह विवेकाधीन नहीं, बाध्यकारी है: यदि राज्यपाल की राय में कोई विधेयक
विधि बन जाने पर उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार कम कर देगा कि उस न्यायालय की वह स्थिति
संकट में पड़ जाए जिसके लिए वह संविधान द्वारा बनाया गया है, तो राज्यपाल
“अनुमति नहीं देगा, बल्कि राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखेगा।”
यहाँ “सुरक्षित रखना” अनिवार्य है, विकल्प नहीं।
अन्य अनिवार्य सुरक्षण — जैसे अनुच्छेद 254(2) (समवर्ती सूची पर केंद्रीय विधि से
विरोधी राज्य-विधि को संरक्षण दिलाने हेतु) तथा अनुच्छेद 31क का परंतुक (भूमि-सुधार विधियों हेतु)।
धन विधेयक राज्यपाल पुनर्विचार हेतु लौटा नहीं सकता — पर उसे
राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है। दोनों को एक मान लेना आम गलती है।
अनुच्छेद 201 — राष्ट्रपति या तो अनुमति देगा या रोकेगा। वह राज्यपाल को निदेश दे सकता है
कि विधेयक (यदि धन विधेयक न हो) सदन को लौटा दिया जाए; सदन उसे छह मास के भीतर पुनर्विचार
करेगा और पुनः पारित कर राष्ट्रपति के समक्ष रखेगा — किंतु इसके बाद भी राष्ट्रपति के लिए अनुमति
देना बाध्यकारी नहीं है। यह अनुच्छेद 111 से मौलिक भेद है।
2023–2025 की सबसे बड़ी संवैधानिक बहस — “कब तक?”
अनुच्छेद 200 के पहले परंतुक में शब्द है “यथाशीघ्र (as soon as possible)”, किंतु कोई
समय-सीमा नहीं। इसी शून्य से हाल का सबसे बड़ा केंद्र-राज्य विवाद जन्मा —
पंजाब राज्य बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव (नवंबर 2023) — उच्चतम न्यायालय ने कहा कि
राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चित काल तक “बैठ” नहीं सकता; “यथाशीघ्र” शब्दों का
स्पष्ट संवैधानिक अर्थ है, और अनुमति रोकने पर उसे विधेयक सदन को लौटाना ही होगा।
तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (8 अप्रैल 2025) — दस पुनःपारित विधेयकों पर
राज्यपाल की निष्क्रियता अवैध ठहराई गई; न्यायालय ने समय-सीमाएँ निर्धारित कीं तथा
“मानी गई अनुमति (deemed assent)” की अवधारणा लागू की।
राष्ट्रपति का निर्देश — अनुच्छेद 143 (20 नवंबर 2025) — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने
14 प्रश्न भेजे। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों
की पीठ ने परामर्शी मत दिया कि न्यायालय अनुच्छेद 200/201 के अधीन राज्यपाल या राष्ट्रपति पर
समय-सीमा नहीं थोप सकते, और “मानी गई अनुमति” संविधान की भावना के विरुद्ध है;
साथ ही यह भी कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोक भी नहीं सकते।
ध्यान रहे — अनुच्छेद 143 के अधीन दी गई राय परामर्शी होती है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — राजभवन, लखनऊ
सरोजिनी नायडू 15 अगस्त 1947 को संयुक्त प्रांत (बाद में उत्तर प्रदेश) की
राज्यपाल बनीं — वे भारत की प्रथम महिला राज्यपाल थीं और 1949 में पद पर रहते हुए उनका
निधन हुआ। यह “प्रथम महिला” वाला तथ्य UPPSC में बार-बार आता है।
उत्तर प्रदेश की वर्तमान राज्यपाल आनंदीबेन पटेल हैं, जिन्होंने
29 जुलाई 2019 को पद ग्रहण किया।
राज्यपाल की नियुक्ति को समझने के लिए ध्यान रहे — उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में भी
राज्यपाल का चयन जनता या विधान सभा नहीं करती; वह राष्ट्रपति के अधिपत्र से आता है और
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत रहता है। यही संघीय ढाँचे में केंद्र की सबसे प्रत्यक्ष उपस्थिति है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1राज्यपाल के पद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित है। 2. कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन अथवा राज्य विधानमंडल का सदस्य रहते हुए भी राज्यपाल का पद धारण कर सकता है। 3. राज्यपाल अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है, 30 वर्ष नहीं — अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 158 के अनुसार यदि कोई सांसद या विधायक राज्यपाल नियुक्त होता है तो पद ग्रहण करते ही उसका स्थान रिक्त समझा जाता है, अतः कथन 2 गलत है। अनुच्छेद 156(2) के अनुसार वह त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करता है, अतः केवल कथन 3 सही है। सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जाना संभव हुआ।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-से कार्य राज्यपाल की संवैधानिक विवेकाधीन शक्तियों के अंतर्गत आते हैं? 1. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करना 2. किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना 3. किसी पड़ोसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कृत्यों का निर्वहन करना 4. राज्य के प्रशासन संबंधी विषयों की जानकारी मुख्यमंत्री से माँगना नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 200 के अधीन विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना, अनुच्छेद 239(2) के अधीन पड़ोसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में कार्य करना तथा अनुच्छेद 167(ख) के अधीन मुख्यमंत्री से प्रशासनिक जानकारी माँगना राज्यपाल की संवैधानिक विवेकाधीन शक्तियों में आते हैं; राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की रिपोर्ट भेजना भी इसी श्रेणी में है। महाधिवक्ता की नियुक्ति अनुच्छेद 165 के अधीन मंत्रिपरिषद की सलाह से होती है, अतः वह विवेकाधीन नहीं है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): राज्यपाल कुछ विषयों पर राष्ट्रपति से अनुदेश प्राप्त किए बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता। कारण (R): अनुच्छेद 213 के अनुसार, यदि उसी विषय पर विधेयक को राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना आवश्यक होता, तो अध्यादेश के लिए राष्ट्रपति के अनुदेश अनिवार्य हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 213 के परंतुक के अनुसार तीन स्थितियों में राज्यपाल राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता — जब उसी उपबंध वाले विधेयक के पुरःस्थापन हेतु राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती, जब उसे विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना आवश्यक होता, अथवा जब राष्ट्रपति की अनुमति के बिना वैसा अधिनियम अविधिमान्य होता। अतः (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
11. मुख्यमंत्री एवं राज्य मंत्रिपरिषद — अनुच्छेद 163 एवं 164
11.1 नियुक्ति एवं रचना
अनुच्छेद 164(1) — मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा; अन्य मंत्रियों की
नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा; मंत्री
राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगे।
अनुच्छेद 164(1) का परंतुक — जनजातीय कल्याण मंत्री:छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा — इन चार राज्यों में जनजातीय कल्याण के लिए
एक प्रभारी मंत्री होगा, जो अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण का या कोई अन्य कार्य भी देख सकता है।
मूल संविधान में इस सूची में बिहार भी था; झारखंड के अलग होने के बाद
94वें संविधान संशोधन, 2006 ने बिहार को हटाकर छत्तीसगढ़ एवं झारखंड को जोड़ा।
अनुच्छेद 164(1क) — मुख्यमंत्री सहित मंत्रिपरिषद की कुल संख्या उस राज्य की
विधान सभा के कुल सदस्यों के 15% से अधिक नहीं होगी, किंतु 12 से कम नहीं।
(91वाँ संशोधन, 2003) — यह “न्यूनतम 12” वाली शर्त संघ के लिए नहीं है; वहाँ केवल अधिकतम सीमा है।
अनुच्छेद 164(1ख) — दल-बदल के कारण निरर्हित सदस्य उस अवधि में मंत्री नहीं बन सकता।
अनुच्छेद 164(2) — मंत्रिपरिषद राज्य की विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से
उत्तरदायी होगी। विधान परिषद के प्रति नहीं — इसीलिए विधान परिषद सरकार गिरा नहीं सकती।
अनुच्छेद 164(3) — शपथ राज्यपाल दिलाएगा (तीसरी अनुसूची का प्रारूप)।
164(4) — जो मंत्री लगातार छह मास तक विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं है,
वह मंत्री नहीं रहेगा। 164(5) — वेतन एवं भत्ते राज्य विधानमंडल तय करेगा।
मुख्यमंत्री विधान सभा या विधान परिषद — किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
विधान परिषद वाले राज्यों में परिषद-सदस्य भी मुख्यमंत्री बन सकता है।
अनुच्छेद 167 — मुख्यमंत्री के कर्तव्य (अनु. 78 का राज्य-रूप) —
(क) मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करना; (ख) राज्यपाल द्वारा माँगी गई जानकारी देना;
(ग) यदि राज्यपाल चाहे, तो किसी मंत्री के अकेले लिए गए निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष रखवाना।
अनुच्छेद 166 — राज्य सरकार की समस्त कार्यपालक कार्रवाई राज्यपाल के नाम से।
सावधानी — 15% की सीमा में संघ और राज्य का भेद
संघ (अनु. 75(1क)) — केवल अधिकतम सीमा: लोक सभा के कुल सदस्यों का 15%;
कोई न्यूनतम नहीं।
राज्य (अनु. 164(1क)) — अधिकतम 15% तथा न्यूनतम 12।
यह न्यूनतम इसलिए है कि सिक्किम, गोवा, मिज़ोरम जैसी छोटी विधान सभाओं में 15% से 12 मंत्री भी नहीं बनते।
गणना विधान सभा की कुल संख्या पर होती है — विधान परिषद को नहीं जोड़ा जाता,
यद्यपि परिषद-सदस्य भी मंत्री बन सकते हैं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश की सबसे बड़ी राज्य मंत्रिपरिषद की सीमा
उत्तर प्रदेश विधान सभा में 403 सदस्य हैं। अनुच्छेद 164(1क) के अनुसार
403 का 15% = 60.45, अतः प्रदेश की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित
अधिकतम 60 सदस्य हो सकते हैं — यह देश में किसी भी राज्य की सबसे बड़ी अनुमत मंत्रिपरिषद है।
यह गणना UPPSC का प्रिय संख्यात्मक प्रश्न है।
गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) के प्रथम मुख्यमंत्री थे;
बाद में वे केंद्रीय गृह मंत्री बने और उन्हें भारत रत्न मिला।
सुचेता कृपलानी 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं —
भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री।
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद होने के कारण यहाँ मुख्यमंत्री या मंत्री
परिषद का सदस्य होकर भी पद पर रह सकता है — यह उन राज्यों में संभव नहीं जहाँ
केवल विधान सभा है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1संविधान के अनुच्छेद 167 के अधीन राज्य के मुख्यमंत्री के निम्नलिखित में से कौन-से कर्तव्य हैं? 1. मंत्रिपरिषद के प्रशासन संबंधी सभी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देना 2. राज्यपाल द्वारा माँगी गई प्रशासन एवं विधान संबंधी जानकारी देना 3. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करना 4. ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय तो कर लिया है किंतु परिषद ने विचार नहीं किया है नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C1, 2 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के तीन कर्तव्य बताता है — मंत्रिपरिषद के प्रशासन संबंधी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देना, राज्यपाल द्वारा माँगी गई जानकारी देना, तथा राज्यपाल के कहने पर ऐसा कोई विषय मंत्रिपरिषद के समक्ष रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो किंतु परिषद ने विचार न किया हो। यह संघ स्तर पर अनुच्छेद 78 का समरूप है। महाधिवक्ता की नियुक्ति अनुच्छेद 165 के अधीन राज्यपाल करता है। अतः 1, 2 और 4 सही हैं।
प्र.2राज्य की मंत्रिपरिषद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. राज्य में विधान परिषद होने पर भी मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से केवल विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है। 2. कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की अवधि तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है — द्विसदनीय राज्यों में भी विधान परिषद के प्रति नहीं। अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई मंत्री यदि निरंतर छह मास तक राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता, तो वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहता। अतः दोनों कथन सही हैं।
प्र.3संविधान के अनुच्छेद 164(1) के परंतुक के अनुसार, निम्नलिखित में से किन राज्यों में जनजातीय कल्याण का भारसाधक मंत्री होना अनिवार्य है? 1. बिहार 2. झारखंड 3. ओडिशा 4. राजस्थान नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 4C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)मूल संविधान में यह उपबंध बिहार, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा (तत्कालीन उड़ीसा) के लिए था। 94वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2006 द्वारा बिहार को इससे बाहर कर छत्तीसगढ़ एवं झारखंड को जोड़ा गया। अतः वर्तमान में यह उपबंध छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा पर लागू है; राजस्थान इसमें सम्मिलित नहीं है।
12. राज्य विधानमंडल — विधान सभा एवं विधान परिषद
12.1 गठन — अनुच्छेद 168
अनुच्छेद 168 कहता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा जो
राज्यपाल तथा एक या दो सदनों से मिलकर बनेगा।
(जैसे संसद में राष्ट्रपति अंग है, वैसे ही राज्य विधानमंडल में राज्यपाल।)
जहाँ दो सदन हैं वहाँ ऊपरी सदन विधान परिषद तथा निचला विधान सभा कहलाता है;
जहाँ एक ही सदन है वहाँ वह विधान सभा है।
12.2 विधान परिषद का सृजन एवं उत्सादन — अनुच्छेद 169
1. राज्य विधान सभा का संकल्पसंकल्प दोहरे बहुमत से पारित हो — (क) विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या का बहुमत, तथा (ख) उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई
→
2. संसद विधि बनाएसंसद साधारण बहुमत से विधि बनाकर परिषद का सृजन या उत्सादन करती है। संसद बाध्य नहीं है — वह संकल्प पर कोई कार्रवाई न भी करे तो चल सकता है
→
3. यह संविधान संशोधन नहींअनुच्छेद 169(3) — ऐसी कोई विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान का संशोधन नहीं मानी जाएगी, यद्यपि वह संविधान (चौथी अनुसूची जैसे भाग) को बदलती है
सावधानी — अनुच्छेद 169 के तीन ट्रैप
विधान सभा का संकल्प दो शर्तें एक साथ पूरी करे — कुल सदस्य-संख्या का बहुमततथाउपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई। केवल एक बता देना ही
विकल्प को ग़लत बना देता है।
संसद में इसके लिए साधारण बहुमत पर्याप्त है — विशेष बहुमत नहीं,
क्योंकि यह अनुच्छेद 368 के अर्थ में संशोधन नहीं है।
आंध्र प्रदेश ने 2020 में अपनी विधान परिषद के उत्सादन का संकल्प पारित किया था,
किंतु संसद ने आज तक उस पर विधि नहीं बनाई — इसलिए आंध्र प्रदेश विधान परिषद आज भी अस्तित्व में है।
यह दिखाता है कि पहल राज्य की है, पर अंतिम शक्ति संसद की।
12.3 किन राज्यों में विधान परिषद है
विधान परिषद विद्यमान (6 राज्य)परिषद समाप्त की गईविधि में प्रावधान, पर कभी गठित नहीं
द्विसदनीय राज्य विधानमंडल — 2026 की स्थिति। केवल छह राज्यों में विधान परिषद है — उत्तर प्रदेश (100 सदस्य, देश में सबसे बड़ी), महाराष्ट्र (78), बिहार (75), कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (58) तथा तेलंगाना (40)। पंजाब (1970), प. बंगाल (1969) तथा तमिलनाडु (1986) ने अपनी परिषदें समाप्त कर दीं; जम्मू-कश्मीर की परिषद 2019 में राज्य के संघ राज्यक्षेत्र बनने पर समाप्त हो गई। मध्य प्रदेश के लिए परिषद का विधिक प्रावधान है, पर वह आज तक गठित नहीं हुई। बिंदु राज्य की राजधानी पर हैं — मानचित्र केवल शैक्षिक, सर्वेक्षण-सटीक नहीं।
छह राज्य जिनमें विधान परिषद है“एक उत्तर, एक पूरब, एक पश्चिम, तीन दक्षिण”
दिशा से याद रखिए, नाम से नहीं — तब यह कभी नहीं भूलेगा।
उत्तर से एक — उत्तर प्रदेश (100, देश की सबसे बड़ी परिषद);
पूरब से एक — बिहार (75);
पश्चिम से एक — महाराष्ट्र (78);
दक्षिण से तीन — कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (58) तथा तेलंगाना (40)।
उत्तर-पूर्व, मध्य भारत तथा पूरे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा) में
एक भी नहीं।
जिन राज्यों ने परिषद समाप्त की — कालक्रम“बंगाल – पंजाब – तमिल = 69, 70, 86”
प. बंगाल 1969 → पंजाब 1970 → तमिलनाडु 1986 —
पहले दो लगातार वर्षों में, तीसरा सोलह वर्ष बाद। इनसे अलग आंध्र प्रदेश की कहानी दो बार मुड़ी —
1985 में समाप्त, 2007 में पुनः सृजित; और जम्मू-कश्मीर की परिषद 2019 में
राज्य के संघ राज्यक्षेत्र बनने पर समाप्त हो गई। कालक्रम-प्रश्न इन्हीं पाँच तिथियों से बनता है।
जम्मू-कश्मीर की विधान परिषद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के
अंतर्गत राज्य के संघ राज्यक्षेत्र बनने पर समाप्त हो गई।
आंध्र प्रदेश की परिषद का इतिहास सबसे उलझा हुआ है — यह 1985 में
समाप्त की गई और 2007 में पुनः सृजित हुई; 2020 का उत्सादन-संकल्प अभी संसद में लंबित है।
मध्य प्रदेश के लिए विधान परिषद का विधिक प्रावधान है, किंतु वह
आज तक गठित नहीं हुई — इसलिए उसे “परिषद वाला राज्य” नहीं गिना जाता।
राजस्थान, असम तथा ओडिशा की विधान सभाएँ परिषद-सृजन के संकल्प पारित कर चुकी हैं,
पर संसद की विधि अभी नहीं बनी।
12.4 विधान सभा — अनुच्छेद 170
संख्या — अधिकतम 500, न्यूनतम 60; सभी प्रत्यक्ष निर्वाचन से।
कुछ छोटे राज्यों के लिए संविधान/अधिनियम द्वारा न्यूनतम 60 से छूट दी गई है —
सिक्किम (32), गोवा (40), मिज़ोरम (40); अरुणाचल प्रदेश तथा पुदुचेरी के लिए भी विशेष उपबंध हैं।
अवधि (अनु. 172) — 5 वर्ष; राज्यपाल पहले भी विघटित कर सकता है;
राष्ट्रीय आपात में एक बार में एक वर्ष तक विस्तार, किंतु आपात समाप्त होने के
छह मास से आगे नहीं।
अर्हता (अनु. 173) — भारत का नागरिक; शपथ; विधान सभा हेतु 25 वर्ष,
विधान परिषद हेतु 30 वर्ष। (संसद की तरह ही — निचले सदन 25, ऊपरी सदन 30।)
अनुच्छेद 174–177 सत्र, अभिभाषण एवं संदेश के बारे में हैं — अनुच्छेद 85–87 के समतुल्य;
दो सत्रों के बीच छह मास से अधिक अंतर नहीं। अनुच्छेद 188 शपथ;
189(3) गणपूर्ति — कुल सदस्यों का दसवाँ भाग या 10 सदस्य, जो भी अधिक हो(संसद की तुलना में यह भिन्न है — वहाँ केवल दसवाँ भाग)।
अनुच्छेद 178 — विधान सभा का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष;
अनुच्छेद 182 — विधान परिषद का सभापति एवं उपसभापति।
ध्यान दें — विधान परिषद का सभापति स्वयं परिषद का सदस्य होता है और परिषद द्वारा चुना जाता है;
यह राज्य सभा से भिन्न है, जहाँ सभापति (उपराष्ट्रपति) सदन का सदस्य नहीं होता।
अनुच्छेद 192 — राज्य विधानमंडल के सदस्य की निरर्हता का प्रश्न
राज्यपाल तय करेगा, और वह निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार
कार्य करेगा (अनु. 103 का राज्य-रूप)।
12.5 विधान परिषद — अनुच्छेद 171
विधान परिषद की रचना पूरे संविधान की सबसे मिश्रित (composite) रचना है — इसमें
निर्वाचन के चार भिन्न प्रकार तथा मनोनयन — पाँचों तत्व हैं।
सुमेलन-तालिका 17 : विधान परिषद की रचना — अनुच्छेद 171(3)
अंश
किसके द्वारा निर्वाचित/मनोनीत
शर्त
1/3
स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा — नगरपालिका, ज़िला बोर्ड तथा संसद द्वारा विनिर्दिष्ट अन्य स्थानीय प्राधिकारी
सबसे बड़ा एकल अंश
1/12
स्नातकों द्वारा
भारत के किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हुए कम-से-कम तीन वर्ष हो चुके हों
1/12
अध्यापकों द्वारा
राज्य में माध्यमिक विद्यालय से निम्न स्तर की नहीं ऐसी संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष से अध्यापनरत हों
1/3
विधान सभा के सदस्यों द्वारा
निर्वाचित व्यक्ति विधान सभा का सदस्य न हो
शेष 1/6
राज्यपाल द्वारा मनोनीत
साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा में विशेष ज्ञान/व्यावहारिक अनुभव (राज्य सभा की सूची से भिन्न — वहाँ “सहकारिता आंदोलन” नहीं है)
कुल संख्या — विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं,
किंतु 40 से कम नहीं। इसीलिए तेलंगाना की परिषद 40 सदस्यों की है — न्यूनतम सीमा पर।
स्थायी सदन (अनु. 172(2)) — विघटित नहीं होती; 1/3 सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष
सेवानिवृत्त; कार्यकाल 6 वर्ष।
अनुच्छेद 171(2) — जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, रचना वही रहेगी
जो 171(3) में है। अर्थात् परिषद की रचना बदलने की शक्ति संसद के पास है, राज्य के पास नहीं।
अनुच्छेद 171(4) — उपर्युक्त निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक
प्रतिनिधित्व पद्धति से होंगे।
12.6 विधान परिषद की सीमित शक्तियाँ — अनुच्छेद 197 एवं 198
राज्य सभा संघ में एक सह-समान सदन है (धन विधेयक को छोड़कर), किंतु विधान परिषद
राज्य में एक गौण सदन है — वह किसी विधेयक को रोक सकती है, हरा नहीं सकती।
साधारण विधेयक — पहली यात्राविधान सभा पारित कर परिषद को भेजती है। परिषद उसे अस्वीकार कर सकती है, संशोधन सहित लौटा सकती है, या तीन मास तक कुछ न करे
→
विधान सभा पुनः पारित करेवह विधेयक फिर से पारित कर परिषद को भेजती है — परिषद के संशोधन स्वीकार करके या ठुकराकर
→
दूसरी यात्रा — केवल एक मासअब परिषद यदि पुनः अस्वीकार करे, या ऐसे संशोधन करे जो विधान सभा स्वीकार न करे, या एक मास तक कुछ न करे — तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है
→
कुल विलंब — अधिकतम चार मास3 मास + 1 मास = 4 मास। परिषद विधान सभा की इच्छा को इससे आगे नहीं रोक सकती, और संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है
धन विधेयक (अनु. 198) — केवल विधान सभा में पुरःस्थापित;
परिषद को 14 दिन में लौटाना होगा; वह केवल सिफ़ारिशें कर सकती है, जो बाध्यकारी नहीं;
14 दिन में न लौटाए तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा।
अनुच्छेद 199 धन विधेयक की परिभाषा देता है (अनु. 110 के समतुल्य) और
प्रमाणन विधान सभा का अध्यक्ष करता है।
विधान परिषद की अन्य सीमाएँ —
वह मंत्रिपरिषद को हटा नहीं सकती (अनु. 164(2) — उत्तरदायित्व केवल विधान सभा के प्रति);
उसके सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में मत नहीं देते;
वे राज्य सभा के सदस्यों के निर्वाचन में भी भाग नहीं लेते — वह केवल
विधान सभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं;
परिषद का अस्तित्व ही विधान सभा एवं संसद की इच्छा पर निर्भर है (अनु. 169)।
परिषद के पक्ष में तर्क — जल्दबाज़ी में बने विधान की जाँच; विशेषज्ञों, स्नातकों
एवं अध्यापकों को प्रतिनिधित्व; उन योग्य व्यक्तियों को विधानमंडल में लाना जो प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ सकते।
विरोध में तर्क — व्यय; विलंब; और उन नेताओं के लिए “पिछले दरवाज़े” का मार्ग जो
चुनाव हार चुके हैं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश की सबसे बड़ी विधान परिषद
उत्तर प्रदेश विधान परिषद में 100 सदस्य हैं — भारत की सबसे बड़ी विधान परिषद।
रचना इस प्रकार है — 38 विधान सभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित, 36
स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्रों से, 8 स्नातक क्षेत्रों से, 8
अध्यापक क्षेत्रों से तथा 10 राज्यपाल द्वारा मनोनीत।
उत्तर प्रदेश विधान सभा में 403 निर्वाचित सदस्य हैं — देश में सर्वाधिक।
अनुच्छेद 171(1) की सीमा (विधान सभा का 1/3) के अनुसार परिषद अधिकतम 134 तक हो सकती थी;
वास्तविक संख्या 100 है।
दोनों सदन लखनऊ के विधान भवन में बैठते हैं। उत्तर प्रदेश उन गिने-चुने राज्यों में है
जहाँ परिषद कभी समाप्त नहीं की गई — इसलिए यहाँ मुख्यमंत्री या मंत्री का परिषद-सदस्य होना
संवैधानिक रूप से सामान्य है।
परीक्षा-बिंदु — “सबसे बड़ी विधान परिषद” (उ.प्र., 100), “सबसे छोटी विधान परिषद”
(तेलंगाना, 40 — जो अनुच्छेद 171 की न्यूनतम सीमा भी है) तथा “सबसे बड़ी विधान सभा”
(उ.प्र., 403) — तीनों प्रश्न एक ही अनुच्छेद-समूह से बनते हैं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): संविधान के अनुसार किसी राज्य की विधान परिषद की सदस्य-संख्या सामान्यतः 40 से कम नहीं होगी। कारण (R): विधान परिषद की कुल सदस्य-संख्या उस राज्य की विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की सदस्य-संख्या विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी, किन्तु किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी। दोनों कथन सही हैं, परंतु एक न्यूनतम सीमा है और दूसरा अधिकतम सीमा — इसलिए कारण अभिकथन की व्याख्या नहीं करता। वर्तमान में केवल छह राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश — में विधान परिषद है, जिनमें उत्तर प्रदेश की परिषद (100 सदस्य) सबसे बड़ी है।
प्र.2निम्नलिखित में से किस राज्य में वर्तमान में विधान परिषद नहीं है?
AओडिशाBतेलंगानाCकर्नाटकDबिहार
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)वर्तमान में केवल छह राज्यों — आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा उत्तर प्रदेश — में विधान परिषद है। ओडिशा विधान सभा ने 2018 में परिषद के सृजन का संकल्प पारित किया था, किन्तु अनुच्छेद 169 के अधीन संसद द्वारा विधि न बनाए जाने से वहाँ अब तक विधान परिषद अस्तित्व में नहीं आई है।
प्र.3राज्य में विधान परिषद के सृजन अथवा उत्सादन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संसद ऐसा तभी कर सकती है जब संबंधित राज्य की विधान सभा अपनी कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे। 2. ऐसी विधि को अनुच्छेद 368 के प्रयोजनार्थ संविधान का संशोधन समझा जाता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 169(1) के अनुसार संसद विधि द्वारा किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, किन्तु इसके लिए उस राज्य की विधान सभा द्वारा विशेष बहुमत — कुल सदस्य-संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत — से संकल्प पारित होना आवश्यक है; अतः कथन 1 सही है। अनुच्छेद 169(3) स्पष्ट करता है कि ऐसी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं मानी जाएगी; अतः कथन 2 गलत है।
13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची, कालक्रम एवं रटने योग्य तथ्य
13.1 अनुच्छेद ↔ विषय — एक ही जगह
सुमेलन-तालिका 18 : संघ की कार्यपालिका एवं संसद — अनुच्छेद 52 से 123
अनुच्छेद
विषय
अनुच्छेद
विषय
52
भारत का राष्ट्रपति
85
संसद के सत्र, सत्रावसान एवं विघटन
53
संघ की कार्यपालिका शक्ति
86
राष्ट्रपति का अभिभाषण एवं संदेश भेजने का अधिकार
54
राष्ट्रपति का निर्वाचन — निर्वाचक मंडल
87
राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण
55
निर्वाचन की रीति — मत का मूल्य
88
मंत्रियों एवं महान्यायवादी के सदनों संबंधी अधिकार
56
पदावधि (5 वर्ष; त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को)
89
राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति
57
पुनर्निर्वाचन की पात्रता
90
उपसभापति का पद रिक्त होना/हटाया जाना
58
अर्हताएँ (35 वर्ष, लोक सभा की अर्हता)
93
लोक सभा का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
59
पद की शर्तें
94
अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना एवं हटाया जाना
60
शपथ — मुख्य न्यायाधीश द्वारा
96
हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तो पीठासीन न होना
61
महाभियोग की प्रक्रिया
97
पीठासीन अधिकारियों का वेतन — भारित
62
रिक्ति भरने का समय (छह मास)
100
मतदान, निर्णायक मत एवं गणपूर्ति (1/10)
63–64
उपराष्ट्रपति; राज्य सभा का पदेन सभापति
101–104
स्थानों का रिक्त होना, निरर्हताएँ, विनिश्चय एवं दंड
65
राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन
105
संसद के विशेषाधिकार
66–67
उपराष्ट्रपति का निर्वाचन एवं पदच्युति
107–108
विधेयकों की प्रक्रिया; संयुक्त बैठक
71
निर्वाचन संबंधी विवाद — उच्चतम न्यायालय
109–110
धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया एवं परिभाषा
72
क्षमादान की शक्ति
111
विधेयकों पर अनुमति — वीटो
74
मंत्रिपरिषद की बाध्यकारी सलाह
112–114
वार्षिक वित्तीय विवरण; अनुदान माँगें; विनियोग विधेयक
75
मंत्रियों की नियुक्ति, 15% सीमा, सामूहिक उत्तरदायित्व
115–116
अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान; लेखानुदान
76
भारत का महान्यायवादी
117
वित्त विधेयक संबंधी विशेष उपबंध
77–78
सरकार का कार्य-संचालन; प्रधानमंत्री के कर्तव्य
118
प्रक्रिया के नियम; संयुक्त बैठक की अध्यक्षता
79–81
संसद का गठन; राज्य सभा एवं लोक सभा की रचना
122
कार्यवाही की न्यायालयों द्वारा जाँच नहीं
82–84
पुनःसमायोजन; सदनों की अवधि; सदस्यता की अर्हताएँ
123
राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
सुमेलन-तालिका 19 : राज्य की कार्यपालिका एवं विधानमंडल — अनुच्छेद 153 से 213
अनुच्छेद
विषय
अनुच्छेद
विषय
153
राज्यों के राज्यपाल (एक व्यक्ति दो राज्यों का भी)
170
विधान सभा की रचना (500 / 60)
154
राज्य की कार्यपालिका शक्ति
171
विधान परिषद की रचना (1/3, 1/12, 1/12, 1/3, 1/6)
155
राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
172
सदनों की अवधि
156
पदावधि — राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत
173
सदस्यता की अर्हता (सभा 25, परिषद 30)
157–158
अर्हताएँ (35 वर्ष) एवं पद की शर्तें
174–176
सत्र; अभिभाषण एवं संदेश; विशेष अभिभाषण
159
शपथ — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा
178–182
विधान सभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष; परिषद के सभापति/उपसभापति
161
राज्यपाल की क्षमादान शक्ति
189(3)
गणपूर्ति — 1/10 या 10, जो अधिक हो
163
मंत्रिपरिषद एवं विवेकाधीन शक्ति
192
निरर्हता का विनिश्चय — राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की राय से
164
मुख्यमंत्री एवं मंत्री; 15% / न्यूनतम 12
197–198
परिषद की सीमित शक्ति (3+1 मास); धन विधेयक (14 दिन)
165
राज्य का महाधिवक्ता
199
राज्य का धन विधेयक — प्रमाणन विधान सभा अध्यक्ष द्वारा
166–167
कार्य-संचालन; मुख्यमंत्री के कर्तव्य
200–201
राज्यपाल की अनुमति; राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित विधेयक
168
राज्य विधानमंडल का गठन
202–207
राज्य का बजट, विनियोग एवं वित्त विधेयक
169
विधान परिषद का सृजन/उत्सादन
213
राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति
13.2 कालक्रम — इस अध्याय की निर्णायक तिथियाँ
1921लोक लेखा समिति की स्थापना — 1919 के भारत शासन अधिनियम के अधीन; भारत की सबसे पुरानी संसदीय समिति
1950प्राक्कलन समिति — वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफ़ारिश पर; 30 सदस्य, सभी लोक सभा से
1951प्रथम संविधान संशोधन — अनुच्छेद 87 का विशेष अभिभाषण “हर सत्र” से घटाकर “वर्ष के प्रथम सत्र” तक सीमित
1954पेप्सू विनियोग विधेयक पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पूर्ण वीटो · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का आरंभ
19567वाँ संविधान संशोधन — एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल · अध्यक्ष मावलंकर का 1/10 वाला निदेश (विपक्ष के नेता की मान्यता)
6–9 मई 1961पहली संयुक्त बैठक — दहेज प्रतिषेध विधेयक
196111वाँ संविधान संशोधन — उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की “संयुक्त बैठक” की शर्त हटाई गई
1962शून्यकाल का आरंभ — प्रक्रिया-नियमों में अनुल्लिखित भारतीय नवाचार
1964सार्वजनिक उपक्रम समिति — कृष्ण मेनन समिति की सिफ़ारिश पर
1967परंपरा बनी कि लोक लेखा समिति का सभापति विपक्ष से होगा
1969राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन का निधन → उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि कार्यवाहक; गिरि के त्यागपत्र पर मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्लाह कार्यवाहक राष्ट्रपति · प. बंगाल ने विधान परिषद समाप्त की
1970पंजाब ने विधान परिषद समाप्त की
1974शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य — राष्ट्रपति एवं राज्यपाल संवैधानिक प्रधान; मंत्रिपरिषद की सलाह ही निर्णायक
197642वाँ संशोधन — अनुच्छेद 74 की सलाह बाध्यकारी बनाई गई
16 मई 1978दूसरी संयुक्त बैठक — बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक
197844वाँ संशोधन — राष्ट्रपति को सलाह पर एक बार पुनर्विचार कहने की शक्ति; “मंत्रिमंडल” शब्द अनु. 352(3) में
198552वाँ संशोधन — दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी विधि) जोड़ी गई · आंध्र प्रदेश ने परिषद समाप्त की
1986जेबी वीटो — ज्ञानी ज़ैल सिंह एवं भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक · तमिलनाडु ने विधान परिषद समाप्त की
1987डी.सी. वाधवा बनाम बिहार — अध्यादेशों का पुनःप्रख्यापन “संविधान के साथ छल”
1991पूर्ण वीटो — आर. वेंकटरमन एवं सांसद वेतन-भत्ता (संशोधन) विधेयक
1992किहोतो होलोहान — दसवीं अनुसूची का पैरा 7 अपास्त; अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन
199317 विभागीय स्थायी समितियाँ गठित — संसदीय संवीक्षा का सबसे बड़ा संस्थागत सुधार
1994एस.आर. बोम्मई — बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर, राजभवन में नहीं
26 मार्च 2002तीसरी संयुक्त बैठक — आतंकवाद निवारण विधेयक (POTA), 425 बनाम 296
200391वाँ संशोधन — मंत्रिपरिषद पर 15% की सीमा; दसवीं अनुसूची से “विभाजन” का अपवाद हटाया · राज्य सभा में खुला मतपत्र एवं निवास-शर्त समाप्त
2004विभागीय स्थायी समितियाँ 17 से बढ़कर 24; प्रत्येक में 31 सदस्य
2006रामेश्वर प्रसाद — बिहार विधान सभा का विघटन असंवैधानिक · कुलदीप नैयर — खुला मतपत्र वैध · 94वाँ संशोधन से बिहार हटाकर छत्तीसगढ़ एवं झारखंड जुड़े
2007आंध्र प्रदेश की विधान परिषद पुनः सृजित · राजेंद्र सिंह राणा (उ.प्र.) — अध्यक्ष के विलंब पर न्यायिक हस्तक्षेप
2010बी.पी. सिंघल — राज्यपाल को केवल विचारधारा के आधार पर नहीं हटाया जा सकता
2013लिली थॉमस — दोषसिद्धि पर सदस्यता तत्काल समाप्त; लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) अपास्त
2016नबाम रेबिया — राज्यपाल स्वविवेक से विधान सभा का सत्र आहूत नहीं कर सकता
2017बजट की तिथि 1 फरवरी; रेल बजट आम बजट में विलीन · कृष्ण कुमार सिंह — अध्यादेश पटल पर रखना अनिवार्य
2019104वाँ संशोधन — आंग्ल-भारतीय मनोनयन समाप्त (प्रभावी 25 जनवरी 2020) · जम्मू-कश्मीर की विधान परिषद समाप्त
2020कीशम मेघचंद्र सिंह — दल-बदल याचिकाओं पर तीन मास में निर्णय का मार्गदर्शन · आंध्र प्रदेश का उत्सादन-संकल्प (आज तक लंबित)
2023पंजाब राज्य बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव — राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चित काल तक नहीं बैठ सकता · अस्थायी कर संग्रहण अधिनियम, 2023
8 अप्रैल 2025तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल — दस विधेयकों पर निष्क्रियता अवैध; समय-सीमा एवं “मानी गई अनुमति”
12 सितंबर 2025सी.पी. राधाकृष्णन भारत के 15वें उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति के रूप में शपथबद्ध
20 नवंबर 2025अनुच्छेद 143 का राष्ट्रपति-निर्देश — पाँच न्यायाधीशों की पीठ का परामर्शी मत: न्यायालय अनुच्छेद 200/201 पर समय-सीमा नहीं थोप सकते; “मानी गई अनुमति” असंवैधानिक
13.3 रटने योग्य निर्णायक तथ्य
550लोक सभा की अधिकतम संख्या (530+20)
250राज्य सभा की अधिकतम संख्या (238+12)
1/10संसद की गणपूर्ति — लोक सभा 55, राज्य सभा 25
14दिन — धन विधेयक पर राज्य सभा की सीमा
6सप्ताह — पुनः समवेत होने के बाद अध्यादेश की सीमा
15%मंत्रिपरिषद की सीमा (राज्य में न्यूनतम 12)
3अब तक की संयुक्त बैठकें
6राज्य जिनमें विधान परिषद है
बहुमत के चार प्रकार — साधारण (उपस्थित एवं मतदान करने वालों का आधे से अधिक);
प्रभावी (सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों का — उपराष्ट्रपति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष,
उपसभापति को हटाने में); पूर्ण (कुल सदस्य-संख्या का आधे से अधिक);
विशेष (कुल सदस्य-संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का
दो-तिहाई — अनु. 368; तथा कुल सदस्य-संख्या का दो-तिहाई — अनु. 61 महाभियोग एवं अनु. 249/312)।
“कुल सदस्य-संख्या का दो-तिहाई” — राष्ट्रपति का महाभियोग (अनु. 61)।
“उपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई” — अनु. 249, अनु. 312 तथा अनु. 368 का दूसरा अंश।
2025 के प्रश्नपत्र में अनुच्छेद 312 पर ठीक यही भेद पूछा गया था।
निर्वाचन में मनोनीत सदस्य — राष्ट्रपति के निर्वाचन में नहीं;
उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में हाँ; राष्ट्रपति के महाभियोग में हाँ।
शपथ कौन दिलाता है — राष्ट्रपति को भारत का मुख्य न्यायाधीश;
उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मंत्रियों को राष्ट्रपति; राज्यपाल को
उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति; मुख्यमंत्री एवं राज्य के मंत्रियों को
राज्यपाल; नए सांसदों को प्रोटेम अध्यक्ष।
त्यागपत्र किसे — राष्ट्रपति → उपराष्ट्रपति;
उपराष्ट्रपति एवं राज्यपाल → राष्ट्रपति;
लोक सभा अध्यक्ष → उपाध्यक्ष; उपाध्यक्ष → अध्यक्ष;
राज्य सभा का उपसभापति → सभापति।
संचित निधि पर भारित — राष्ट्रपति; दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी
(इसी नाते उपराष्ट्रपति का राज्य सभा के सभापति के रूप में वेतन भी — अनु. 97);
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन; CAG; उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन;
ऋण-भार; न्यायालय की डिक्री। भारित नहीं — मंत्रियों तथा संसद-सदस्यों के वेतन;
ये मतदेय हैं।
समितियों की संख्या — लोक लेखा 22; सार्वजनिक उपक्रम 22;
प्राक्कलन 30 (राज्य सभा का कोई सदस्य नहीं); विभागीय स्थायी 24 × 31
(21 + 10; 16 लोक सभा के अधीन, 8 राज्य सभा के अधीन)।
“भारतीय नवाचार” — शून्यकाल तथा ध्यानाकर्षण प्रस्ताव;
दोनों का ब्रिटिश संसद में कोई समतुल्य नहीं।
संविधान में अनुपस्थित शब्द — “बजट”, “मंत्रिमंडल” (केवल अनु. 352(3) में),
“शून्यकाल”, “सचेतक”, “गुलेटिन”, “विपक्ष का नेता” (यह 1977 के अधिनियम में है)।
राज्य में गणपूर्ति — 1/10 या 10 सदस्य, जो भी अधिक हो (अनु. 189(3));
संसद में केवल 1/10 (अनु. 100(3)) — यह असममिति पूछी जाती है।
विधान परिषद वाले छह राज्य — उ.प्र. (100), महाराष्ट्र (78), बिहार (75),
कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (58), तेलंगाना (40)।
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (समिति) सूची-II (सदस्य-संख्या) A. प्राक्कलन समिति 1. 22 B. लोक लेखा समिति 2. 31 C. प्रत्येक विभागीय स्थायी समिति 3. 30 D. कार्य मंत्रणा समिति (लोक सभा) 4. 15 कूट:
उत्तर: (C)प्राक्कलन समिति में 30 सदस्य होते हैं और सभी लोक सभा से; लोक लेखा समिति में 22 (15 लोक सभा + 7 राज्य सभा); प्रत्येक विभागीय स्थायी समिति में 31 (21 + 10); लोक सभा की कार्य मंत्रणा समिति में 15 सदस्य होते हैं, जिनके सभापति स्वयं अध्यक्ष होते हैं। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): धन विधेयक के संबंध में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती। कारण (R): राज्य सभा धन विधेयक को न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें संशोधन कर सकती है; उसे 14 दिन के भीतर विधेयक लौटाना ही होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) तथा (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं हैB(A) ग़लत है, किंतु (R) सही हैC(A) सही है, किंतु (R) ग़लत हैD(A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 108(1) का परंतुक स्पष्ट रूप से धन विधेयक को संयुक्त बैठक के दायरे से बाहर रखता है — अतः (A) सही है। इसका कारण ठीक वही है जो (R) में दिया गया है: अनुच्छेद 109 के अधीन राज्य सभा धन विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती और उसे 14 दिन में लौटाना होता है; न लौटाने पर विधेयक स्वतः पारित माना जाता है। जब गतिरोध संभव ही नहीं, तो संयुक्त बैठक की आवश्यकता भी नहीं — इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या है।
प्र.3भारत के उपराष्ट्रपति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उसके निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित तथा मनोनीत — दोनों प्रकार के सदस्य सम्मिलित होते हैं। 2. उसे हटाने का संकल्प संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, किंतु उसे दोनों सदनों में कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 66(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा होता है — मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं; अतः कथन 1 सही है। कथन 2 ग़लत है: अनुच्छेद 67(ख) के अधीन संकल्प केवल राज्य सभा में प्रस्तुत हो सकता है, वहाँ तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) से पारित होना चाहिए, और उसके बाद लोक सभा की सहमति चाहिए — दो-तिहाई बहुमत की कोई शर्त नहीं है। दो-तिहाई की शर्त राष्ट्रपति के महाभियोग (अनुच्छेद 61) में है।