भाग 4 · भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

4.2 मौलिक अधिकार, कर्तव्य एवं नीति-निदेशक तत्व

अनुच्छेद 12 से 51क तक — अधिकारों का ढाँचा, उनका न्यायिक विस्तार, उन पर अपवाद, नागरिक के कर्तव्य तथा राज्य के मार्गदर्शी सिद्धांत

← भाग 4 की सूची

विषय-सूची

  1. मौलिक अधिकारों की अवधारणा — अनुच्छेद 12 एवं 13
  2. समता का अधिकार — अनुच्छेद 14 से 18
  3. स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 19 से 22
  4. अनुच्छेद 21 का विस्तार — गोपालन से पुट्टस्वामी तक
  5. शोषण, धर्म तथा संस्कृति-शिक्षा संबंधी अधिकार — अनुच्छेद 23 से 30
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार — अनुच्छेद 32 एवं पाँच रिट
  7. मौलिक अधिकारों पर अपवाद — 31क, 31ख, 31ग, नौवीं अनुसूची, 33, 34, 35
  8. मौलिक कर्तव्य — अनुच्छेद 51क
  9. राज्य के नीति-निदेशक तत्व — अनुच्छेद 36 से 51
  10. मौलिक अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व — टकराव एवं न्यायिक विकास
  11. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम — एक दृष्टि में
इस अध्याय का परीक्षा-भार उच्च

2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था एवं शासन से लगभग 19–20 प्रश्न आए, और इनमें सर्वाधिक हिस्सा अनुच्छेद-संख्या, संशोधन-संख्या तथा वाद-सिद्धांत का रहा। भाग III एवं भाग IV इस विषय का सबसे सघन क्षेत्र है — यहाँ से प्रश्न तीन रूपों में आता है: (क) सूची सुमेलन — अनुच्छेद ↔ विषय, रिट ↔ अर्थ, संशोधन ↔ जोड़ा गया अनुच्छेद; (ख) दो-कथन — जिसमें एक शब्द (“केवल”, “नागरिक”, “व्यक्ति”) उत्तर बदल देता है; (ग) कालक्रम — वादों तथा संशोधनों का क्रम। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में एक सुमेलन-तालिका तथा अध्याय के अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची एवं तिथि-सूची दी गई है।

इस अध्याय की सीमा

संविधान का निर्माण, प्रस्तावना तथा संशोधन-प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) अध्याय 4.1 में है; आपातकाल का मौलिक अधिकारों पर प्रभाव (अनुच्छेद 352, 358, 359) अध्याय 4.3 में विस्तार से है — यहाँ केवल उतना संकेत है जितना अधिकारों को समझने के लिए आवश्यक है; उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की संरचना एवं अधिकारिता अध्याय 4.5 में है।

1. मौलिक अधिकारों की अवधारणा — अनुच्छेद 12 एवं 13

1.1 पृष्ठभूमि — अधिकारों की माँग कहाँ से आई

भारत में लिखित अधिकार-पत्र की माँग औपनिवेशिक अनुभव से जन्मी। 1895 का कथित संविधान विधेयक (Constitution of India Bill), 1918 का कांग्रेस का दिल्ली अधिवेशन, मोतीलाल नेहरू की रिपोर्ट (1928) तथा कांग्रेस का कराची अधिवेशन (1931) — इन सबमें नागरिक अधिकारों की सूची क्रमशः स्पष्ट होती गई। कराची प्रस्ताव (जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत, सरदार पटेल की अध्यक्षता में पारित) ने पहली बार मौलिक अधिकारों के साथ आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम भी जोड़ा — यही द्वैत आगे चलकर भाग III और भाग IV के विभाजन में उतरा।

संविधान सभा में सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता वाली मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक तथा जनजातीय एवं बहिष्कृत क्षेत्र संबंधी परामर्श समिति के अंतर्गत बनी मौलिक अधिकार उप-समिति (अध्यक्ष — जे.बी. कृपलानी) ने इनका प्रारूप तैयार किया। भाग III अमेरिकी संविधान के बिल ऑफ राइट्स (Bill of Rights) से प्रेरित है, और इसे प्रायः “भारत का अधिकार-पत्र” कहा जाता है।

1.2 छह मौलिक अधिकार — मूलतः सात थे

भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का ढाँचा है। मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे; 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(च) तथा अनुच्छेद 31) को भाग III से हटाकर भाग XII में अनुच्छेद 300क के रूप में एक विधिक अधिकार (legal right) बना दिया। अब छह मौलिक अधिकार शेष हैं।

छह मौलिक अधिकार — क्रम में “समता–स्वतंत्रता–शोषण–धर्म–संस्कृति–उपचार”

समता (14–18) → स्वतंत्रता (19–22) → शोषण के विरुद्ध (23–24) → धर्म की स्वतंत्रता (25–28) → संस्कृति एवं शिक्षा (29–30) → संवैधानिक उपचार (32)। ध्यान दें — क्रम में अनुच्छेद 31 नहीं आता, क्योंकि वही संपत्ति का हटाया गया अधिकार था।

1.3 मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ

सुमेलन-तालिका 1 : केवल नागरिकों को उपलब्ध अधिकार बनाम सभी व्यक्तियों को उपलब्ध अधिकार
केवल भारतीय नागरिकों कोसभी व्यक्तियों को (विदेशी एवं निगम सहित, जहाँ लागू)
अनु. 15 — धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान पर विभेद का प्रतिषेधअनु. 14 — विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण
अनु. 16 — लोक नियोजन में अवसर की समताअनु. 20 — अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
अनु. 19 — छह स्वतंत्रताएँअनु. 21 — प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता
अनु. 29 — अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षणअनु. 21क — शिक्षा का अधिकार (6–14 वर्ष)
अनु. 30 — अल्पसंख्यकों का शिक्षा संस्था स्थापित करने का अधिकारअनु. 22 — गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण
अनु. 23, 24 — शोषण के विरुद्ध
अनु. 25–28 — धार्मिक स्वतंत्रता
अनु. 27 — विशिष्ट धर्म के संवर्धन हेतु करों से मुक्ति
सावधानी — “नागरिक” बनाम “व्यक्ति”

1.4 अनुच्छेद 12 — “राज्य” की परिभाषा

मौलिक अधिकार मुख्यतः “राज्य” के विरुद्ध प्रवर्तनीय हैं, इसलिए यह जानना पहली शर्त है कि राज्य किसे कहा जाएगा। अनुच्छेद 12 के अनुसार भाग III के प्रयोजनों के लिए “राज्य” में सम्मिलित हैं —

  1. भारत की सरकार एवं संसद — अर्थात् केंद्र की कार्यपालिका तथा विधायी अंग;
  2. प्रत्येक राज्य की सरकार एवं विधानमंडल — राज्यों की कार्यपालिका तथा विधायी अंग;
  3. सभी स्थानीय प्राधिकारी — नगरपालिका, पंचायत, ज़िला बोर्ड, छावनी बोर्ड, सुधार न्यास;
  4. अन्य प्राधिकारी (other authorities) — भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सांविधिक अथवा गैर-सांविधिक निकाय।

“अन्य प्राधिकारी” पद संविधान में परिभाषित नहीं है — इसका दायरा न्यायालयों ने क्रमशः फैलाया है। प्रारंभ में इसे केवल सरकार जैसे कार्य करने वाले निकायों तक सीमित माना गया, फिर “सरकार की एजेंसी या साधन (instrumentality or agency of government)” की कसौटी विकसित हुई।

सुमेलन-तालिका 2 : अनुच्छेद 12 — “अन्य प्राधिकारी” का न्यायिक विस्तार
वादवर्षनिर्णायक बिंदु
राजस्थान राज्य विद्युत बोर्ड बनाम मोहनलाल1967सांविधिक निगम भी “राज्य” — केवल सरकारी विभाग ही नहीं
सुखदेव सिंह बनाम भगतराम1975ONGC, LIC, IFC जैसे सांविधिक निगम “राज्य” — “सरकार की एजेंसी” की अवधारणा
आर.डी. शेट्टी बनाम अंतर्राष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण1979“साधन या एजेंसी” जाँचने की पाँच कसौटियाँ — वित्तीय संसाधन, गहन सरकारी नियंत्रण, एकाधिकार-स्थिति, लोक-महत्व का कार्य, स्थानांतरित सरकारी विभाग
अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब1981सोसाइटी अधिनियम के अधीन पंजीकृत निकाय भी “राज्य” हो सकता है; कसौटी संरचना की नहीं, नियंत्रण की है
प्रदीप कुमार विश्वास बनाम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी2002सात न्यायाधीशों की पीठ — CSIR “राज्य” है; कसौटी “गहन एवं व्यापक सरकारी नियंत्रण”
ज़ी टेलीफिल्म्स बनाम भारत संघ2005BCCI “राज्य” नहीं — सरकारी वित्तीय सहायता या गहन नियंत्रण नहीं; यद्यपि वह लोक-कृत्य करता है
न्यायपालिका “राज्य” है या नहीं?

अनुच्छेद 12 में न्यायपालिका का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं है। स्वीकृत स्थिति यह है कि न्यायालय जब प्रशासनिक या नियम-निर्माण की भूमिका में हो (जैसे कर्मचारियों की नियुक्ति, न्यायालय-नियम बनाना) तब वह “राज्य” है और उसके कार्य मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं; किंतु न्यायिक कार्य (किसी वाद का निर्णय) को सामान्यतः मौलिक अधिकार के उल्लंघन के रूप में चुनौती नहीं दी जाती — उसका उपाय अपील या पुनर्विलोकन है।

1.5 अनुच्छेद 13 — मौलिक अधिकारों से असंगत विधियाँ

अनुच्छेद 13 वह उपबंध है जो मौलिक अधिकारों को “दाँत” देता है — यही न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) का स्पष्ट संवैधानिक आधार है।

सुमेलन-तालिका 3 : अनुच्छेद 13 के चार खंड
खंडउपबंधपरीक्षा-बिंदु
13(1)संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले प्रवृत्त सभी विधियाँ, जहाँ तक वे मौलिक अधिकारों से असंगत हैं, उस असंगति की मात्रा तक शून्य होंगीयह भविष्यलक्षी (prospective) है — 26 जनवरी 1950 से पहले के लेन-देन अवैध नहीं होते
13(2)राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीने या न्यून करे; ऐसी विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगीयह भावी विधियों पर लागू — ऐसी विधि प्रारंभ से ही शून्य (void ab initio) होती है
13(3)“विधि” में सम्मिलित — अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि एवं प्रथा जिनका भारत में विधि का बल होअर्थात् केवल संसद/विधानमंडल का अधिनियम ही नहीं; कार्यपालिका के आदेश एवं प्रथा भी परखी जाती है
13(4)अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संविधान संशोधन पर यह अनुच्छेद लागू नहीं24वें संविधान संशोधन, 1971 द्वारा जोड़ा गया — गोलकनाथ (1967) के निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए

अनुच्छेद 13 से निकले चार सिद्धांत

सावधानी — 13(1) और 13(2) को गड्डमड्ड न करें
परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: अनुच्छेद 12 में “राज्य” की चार श्रेणियाँ; “अन्य प्राधिकारी” से संबंधित वाद (विशेषतः अजय हसिया तथा ज़ी टेलीफिल्म्स); अनुच्छेद 13(3) में “विधि” के अंतर्गत रूढ़ि एवं प्रथा का सम्मिलित होना; तथा अनुच्छेद 13(4) को जोड़ने वाला 24वाँ संशोधन (1971)। वैकल्पिक-जाल प्रायः “42वाँ संशोधन” या “25वाँ संशोधन” रखा जाता है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. ज़ी टेलीफिल्म्स वाद (2005) में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड को अनुच्छेद 12 के अर्थ में “राज्य” माना।
2. “राज्य” की परिभाषा में स्थानीय प्राधिकारी तथा भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन अन्य प्राधिकारी सम्मिलित हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)ज़ी टेलीफिल्म्स बनाम भारत संघ (2005) में न्यायालय ने BCCI को “राज्य” मानने से इनकार किया, क्योंकि उस पर सरकार का गहन एवं व्यापक नियंत्रण नहीं था — अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 12 में भारत की सरकार एवं संसद, प्रत्येक राज्य की सरकार एवं विधानमंडल, सभी स्थानीय प्राधिकारी तथा “अन्य प्राधिकारी” सम्मिलित हैं — कथन 2 सही है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अनुच्छेद 368 के अधीन किया गया संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में “विधि” नहीं माना जाता।
कारण (R): 24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा अनुच्छेद 13 में खंड (4) जोड़ा गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)गोलकनाथ वाद (1967) में संविधान संशोधन को अनुच्छेद 13 के अर्थ में “विधि” माना गया था। उसी को निष्प्रभावी करने के लिए 24वें संशोधन (1971) ने अनुच्छेद 13 में खंड (4) जोड़ा, जिससे संशोधन अनुच्छेद 13 के दायरे से बाहर हो गया। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण भी है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (सिद्धांत)    (आशय)
1. पृथक्करणीयता — विधि का केवल असंगत भाग शून्य होता है
2. आच्छादन — संविधान-पूर्व असंगत विधि निष्क्रिय होती है, मृत नहीं
3. अधित्यजन — व्यक्ति अपनी सहमति से मौलिक अधिकार का त्याग कर सकता है
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)बशेषर नाथ बनाम आयकर आयुक्त (1959) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों का अधित्यजन (waiver) नहीं किया जा सकता — ये लोकनीति पर आधारित हैं, व्यक्ति की सुविधा पर नहीं। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 2 सही हैं।

2. समता का अधिकार — अनुच्छेद 14 से 18

2.1 अनुच्छेद 14 — विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण

अनुच्छेद 14 कहता है: “राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।” इस एक वाक्य में दो भिन्न अवधारणाएँ हैं, जिनके स्रोत भी अलग हैं और अर्थ भी।

विधि के समक्ष समता · Equality before Law

  • स्रोत — ब्रिटिश संविधान (डायसी की विधि का शासन)
  • नकारात्मक अवधारणा — विशेषाधिकार का अभाव
  • सभी व्यक्ति विधि की दृष्टि में समान; कोई भी विधि से ऊपर नहीं
  • राज्य से अपेक्षा — भेद न करे

विधियों का समान संरक्षण · Equal Protection of Laws

  • स्रोत — अमेरिकी संविधान (14वाँ संशोधन)
  • सकारात्मक अवधारणा — समान परिस्थितियों में समान व्यवहार
  • समानों के बीच समानता — असमानों के बीच भिन्न व्यवहार अपेक्षित है
  • राज्य से अपेक्षा — युक्तियुक्त वर्गीकरण करे

डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार विधि के शासन के तीन तत्व हैं — (1) विधि की सर्वोच्चता यानी मनमानी शक्ति का अभाव, (2) विधि के समक्ष समता, (3) व्यक्तिगत अधिकारों की प्रधानता, अर्थात् संविधान न्यायालयों के निर्णयों का परिणाम है। भारतीय संविधान ने इनमें से पहले दो तत्व अपनाए; तीसरा नहीं, क्योंकि यहाँ संविधान स्वयं अधिकारों का स्रोत है। इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में विधि के शासन को संविधान के मूल ढाँचे का अंग माना गया।

अनुच्छेद 14 के अपवाद

2.2 वर्गीकरण की कसौटी — अनुच्छेद 14 की व्यावहारिक परीक्षा

अनुच्छेद 14 वर्गीकरण का निषेध नहीं करता, वर्ग-विधान (class legislation) का निषेध करता है। यदि राज्य किसी वर्ग के लिए अलग विधि बनाता है तो वह तब ही वैध है जब वह दो-सूत्री कसौटी पर खरा उतरे — यह कसौटी पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार (1952) में स्पष्ट रूप से निरूपित हुई:

1. बोधगम्य अंतरIntelligible Differentia — वर्गीकरण किसी स्पष्ट, समझ में आने वाले आधार पर हो जो समूह के भीतर और बाहर के व्यक्तियों को अलग करता हो
2. तर्कसंगत संबंधRational Nexus — वह अंतर उस विधि के उद्देश्य से तर्कसंगत रूप से जुड़ा हो; केवल भिन्नता पर्याप्त नहीं
दोनों पूरे ⇒ वैधकिसी एक का अभाव ⇒ वर्गीकरण मनमाना, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

1974 के बाद न्यायालय ने इससे आगे जाकर “मनमानेपन का निषेध” (doctrine against arbitrariness) की नई अवधारणा विकसित की। ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) में कहा गया कि “समता और मनमानापन परस्पर शत्रु हैं”, और मेनका गांधी (1978) तथा अंतर्राष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण वाद (1979) ने इसे सुदृढ़ किया। अब राज्य का कोई कार्य केवल इसलिए वैध नहीं हो जाता कि वह वर्गीकरण की कसौटी पार कर लेता है — उसे मनमाना भी नहीं होना चाहिए

2.3 अनुच्छेद 15 — विभेद का प्रतिषेध

सुमेलन-तालिका 4 : अनुच्छेद 15 के छह खंड
खंडउपबंधजोड़ा गया
15(1)राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं करेगामूल संविधान
15(2)इन्हीं आधारों पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों, मनोरंजन-स्थलों तक पहुँच तथा कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों, सार्वजनिक समागम-स्थलों के प्रयोग पर कोई निर्योग्यता नहीं — यह निजी व्यक्तियों पर भी लागूमूल संविधान
15(3)राज्य स्त्रियों एवं बालकों के लिए विशेष उपबंध कर सकता हैमूल संविधान
15(4)राज्य सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति/जनजाति की उन्नति के लिए विशेष उपबंध कर सकता हैप्रथम संविधान संशोधन, 1951 — चंपकम दुरैराजन वाद की प्रतिक्रिया
15(5)पिछड़े वर्गों/अजा/अजजा के प्रवेश हेतु शिक्षा संस्थाओं (निजी सहायता-प्राप्त एवं गैर-सहायता-प्राप्त सहित) में विशेष उपबंध — अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं को छोड़कर93वाँ संशोधन, 2005
15(6)आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए विशेष उपबंध तथा शिक्षा संस्थाओं में अधिकतम 10% आरक्षण — अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाएँ बाहर103वाँ संशोधन, 2019
अनुच्छेद 15 के पाँच आधार “धर्म–मूल–जाति–लिंग–जन्म”

धर्म, मूलवंश (race), जाति, लिंग, जन्मस्थान — ठीक पाँच। अनुच्छेद 16 में इन्हीं पाँच के साथ “वंश (descent)” तथा “निवास” जुड़ जाते हैं — कुल सात। याद रखने का सूत्र — “पंद्रह में पाँच, सोलह में सात”

सावधानी — “केवल” शब्द ही उत्तर तय करता है

अनुच्छेद 15(1) तथा 16(2) में “केवल” (only) शब्द निर्णायक है। यदि विभेद केवल धर्म/जाति/लिंग आदि पर आधारित है तो वह वर्जित है; किंतु यदि उसके साथ कोई अन्य प्रासंगिक आधार भी जुड़ा हो (जैसे योग्यता, सेवा-आवश्यकता, प्रकृति-जन्य भिन्नता) तो वह वर्जित नहीं। इसीलिए स्त्रियों के लिए विशेष उपबंध (15(3)) विभेद नहीं, अपवाद है — और न्यायालयों ने इसे अनुच्छेद 15(1) का अपवाद माना है, उल्लंघन नहीं।

2.4 अनुच्छेद 16 — लोक नियोजन में अवसर की समता

सुमेलन-तालिका 5 : अनुच्छेद 16 के खंड एवं संबंधित संशोधन
खंडउपबंधजोड़ा/संशोधित
16(1)राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन के विषय में सभी नागरिकों को अवसर की समतामूल
16(2)केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव (वंश), जन्मस्थान, निवास के आधार पर अपात्रता नहींमूल — सात आधार
16(3)केवल संसद किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र के अधीन नियोजन के लिए निवास की शर्त विहित कर सकती हैमूल — राज्य विधानमंडल यह नहीं कर सकता
16(4)राज्य की राय में जिन पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके लिए नियुक्तियों/पदों में आरक्षणमूल
16(4क)अजा/अजजा के लिए प्रोन्नति में आरक्षण, परिणामी ज्येष्ठता सहित77वाँ संशोधन, 1995; “परिणामी ज्येष्ठता” शब्द 85वाँ संशोधन, 2001 से (भूतलक्षी प्रभाव 1995 से)
16(4ख)पिछले वर्ष की रिक्तियों का अग्रनयन (carry forward) — बैकलॉग रिक्तियों पर 50% की सीमा लागू नहीं81वाँ संशोधन, 2000
16(5)धार्मिक/सांप्रदायिक संस्था से जुड़े पद पर उसी धर्म/संप्रदाय का होने की शर्त विहित की जा सकती हैमूल
16(6)EWS के लिए अधिकतम 10% आरक्षण नियुक्तियों में103वाँ संशोधन, 2019
सावधानी — तीन संशोधनों को अलग-अलग याद रखें

2.5 आरक्षण-विधिशास्त्र — वादों की शृंखला

सुमेलन-तालिका 6 : आरक्षण संबंधी प्रमुख वाद ↔ सिद्धांत
वादवर्षनिर्णायक सिद्धांत
मद्रास राज्य बनाम चंपकम दुरैराजन1951सांप्रदायिक आधार पर सीट-आवंटन अनु. 29(2) के विरुद्ध; प्रथम संशोधन से अनु. 15(4) जोड़ा गया
एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य1963आरक्षण सामान्यतः 50% से अधिक नहीं; जाति अकेली कसौटी नहीं
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (मंडल वाद)16 नवंबर 19929-न्यायाधीश पीठ — OBC को 27% आरक्षण मान्य; 50% की अधिकतम सीमा; क्रीमी लेयर का बहिष्करण; प्रोन्नति में आरक्षण नहीं; केवल आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण अवैध
एम. नागराज बनाम भारत संघ200677वाँ, 81वाँ, 82वाँ एवं 85वाँ संशोधन वैध; किंतु प्रोन्नति-आरक्षण से पूर्व राज्य को परिमाणनीय आँकड़े (quantifiable data), अपर्याप्त प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक दक्षता दिखानी होगी
अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ200893वाँ संशोधन एवं केंद्रीय संस्थाओं में 27% OBC आरक्षण वैध — क्रीमी लेयर के बहिष्कार सहित
जरनैल सिंह बनाम लच्छमी नारायण गुप्ता2018नागराज की “पिछड़ेपन के आँकड़े” वाली शर्त हटाई; क्रीमी लेयर की अवधारणा अजा/अजजा की प्रोन्नति पर भी लागू
जनहित अभियान बनाम भारत संघ7 नवंबर 20225-न्यायाधीश पीठ ने 3:2 से 103वाँ संशोधन (EWS 10%) वैध ठहराया — केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण तथा 50% सीमा से परे जाना मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं
पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह1 अगस्त 20247-न्यायाधीश पीठ ने 6:1 से ई.वी. चिन्नैया (2004) को उलटते हुए अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण को अनुमत किया, बशर्ते उसका तर्कसंगत आधार हो
उत्तर प्रदेश संदर्भ — दो निर्णायक आरक्षण-वाद यहीं से आए

2.6 अनुच्छेद 17 — अस्पृश्यता का अंत

अनुच्छेद 17: “अस्पृश्यता” का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। “अस्पृश्यता” से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।

2.7 अनुच्छेद 18 — उपाधियों का अंत

परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: अनु. 15 के पाँच बनाम अनु. 16 के सात आधार; 16(3) केवल संसद को निवास-शर्त विहित करने की शक्ति देता है (राज्य विधानमंडल को नहीं); इंदिरा साहनी की 50% सीमा तथा क्रीमी लेयर; 103वें संशोधन का 15(6) एवं 16(6) से संबंध; और अनु. 18 के अधीन सैन्य तथा विद्या संबंधी सम्मान का अपवाद।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (उपबंध)    सूची-II (संविधान संशोधन)
A. अनुच्छेद 15(4) — पिछड़े वर्गों हेतु विशेष उपबंध   1. 93वाँ संशोधन
B. अनुच्छेद 15(5) — निजी शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश   2. 103वाँ संशोधन
C. अनुच्छेद 16(4क) — प्रोन्नति में आरक्षण   3. प्रथम संशोधन
D. अनुच्छेद 16(6) — EWS आरक्षण   4. 77वाँ संशोधन
कूट:

AA-3, B-1, C-2, D-4BA-1, B-3, C-4, D-2CA-3, B-1, C-4, D-2DA-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 15(4) प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा जोड़ा गया; अनुच्छेद 15(5) 93वें संशोधन, 2005 द्वारा; अनुच्छेद 16(4क) 77वें संशोधन, 1995 द्वारा; तथा अनुच्छेद 16(6) 103वें संशोधन, 2019 द्वारा। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-4, D-2 है।

प्र.2 निम्नलिखित वादों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. एम. नागराज बनाम भारत संघ
2. इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ
3. जनहित अभियान बनाम भारत संघ
4. मद्रास राज्य बनाम चंपकम दुरैराजन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 2, 3, 1B2, 4, 1, 3C4, 2, 1, 3D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)चंपकम दुरैराजन (1951) → इंदिरा साहनी (1992) → एम. नागराज (2006) → जनहित अभियान (2022)। अतः सही क्रम 4, 2, 1, 3 है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): उत्तर प्रदेश राज्य बनाम प्रदीप टंडन वाद में उच्चतम न्यायालय ने ग्रामीण क्षेत्र के लिए किए गए आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया।
कारण (R): न्यायालय ने माना कि पर्वतीय एवं उत्तराखंड क्षेत्रों के लिए किया गया आरक्षण भी अनुच्छेद 15(4) के विरुद्ध था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)न्यायालय ने ग्रामीण क्षेत्र के लिए किया गया आरक्षण अवश्य असंवैधानिक ठहराया, क्योंकि निवास-स्थान अकेला सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन का निर्धारक नहीं है — अतः (A) सही है। किन्तु पर्वतीय एवं उत्तराखंड क्षेत्रों का आरक्षण न्यायालय ने वैध ठहराया था, अतः (R) गलत है।

3. स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 19 से 22

3.1 अनुच्छेद 19 — छह स्वतंत्रताएँ

अनुच्छेद 19(1) मूल रूप से सात स्वतंत्रताएँ देता था। 44वें संविधान संशोधन, 1978 ने उपखंड (च) — संपत्ति के अर्जन, धारण एवं व्ययन की स्वतंत्रता को हटा दिया। इसीलिए आज अनुच्छेद 19 में उपखंड (क), (ख), (ग), (घ), (ङ) और (छ) हैं — (च) रिक्त है। यह अनुच्छेद केवल नागरिकों को उपलब्ध है।

सुमेलन-तालिका 7 : अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ ↔ निर्बंधन का खंड ↔ आधार
उपखंडस्वतंत्रतानिर्बंधन खंडयुक्तियुक्त निर्बंधन के आधार
19(1)(क)वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता19(2)भारत की प्रभुता एवं अखंडता · राज्य की सुरक्षा · विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध · लोक व्यवस्था · शिष्टाचार या सदाचार · न्यायालय का अवमान · मानहानि · अपराध-उद्दीपन — कुल आठ
19(1)(ख)शांतिपूर्वक एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता19(3)भारत की प्रभुता एवं अखंडता · लोक व्यवस्था
19(1)(ग)संगम, संघ या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता19(4)भारत की प्रभुता एवं अखंडता · लोक व्यवस्था · सदाचार
19(1)(घ)भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता19(5)साधारण जनता के हित · किसी अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण
19(1)(ङ)भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास एवं बस जाने की स्वतंत्रता19(5)साधारण जनता के हित · अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण
19(1)(छ)कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता19(6)साधारण जनता के हित; इसके अतिरिक्त राज्य वृत्तिक/तकनीकी अर्हता विहित कर सकता है तथा किसी व्यापार/उद्योग में पूर्ण या आंशिक राज्य-एकाधिकार स्थापित कर सकता है
19(1)(च) — निरसितसंपत्ति के अर्जन, धारण एवं व्ययन की स्वतंत्रता44वें संशोधन, 1978 द्वारा हटाया गया; अब अनुच्छेद 300क में विधिक अधिकार
अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ — क्रम में “वाणी–सभा–संघ, संचरण–निवास–वृत्ति”

वाणी = वाक् एवं अभिव्यक्ति (क) · सभा = शांतिपूर्ण सम्मेलन (ख) · संघ = संगम/संघ/सहकारी समिति (ग) · संचरण = अबाध आवागमन (घ) · निवास = निवास एवं बस जाना (ङ) · वृत्ति = व्यवसाय-व्यापार (छ)। बीच का (च) — संपत्ति — रिक्त है, इसीलिए छठी स्वतंत्रता का उपखंड (छ) है, (च) नहीं।

अनुच्छेद 19(2) के आठ आधार “प्रभु–सुरक्षा–मैत्री, व्यवस्था–शिष्टता, अवमान–मानहानि–उद्दीपन”

प्रभुता एवं अखंडता · राज्य की सुरक्षा · विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध · लोक व्यवस्था · शिष्टाचार या सदाचार · न्यायालय का अवमान · मानहानि · अपराध का उद्दीपन। ध्यान रखें — “राष्ट्रीय एकता”, “धर्मनिरपेक्षता” या “सामाजिक सद्भाव” जैसे शब्द 19(2) में नहीं हैं; ये विकल्पों में डाले जाने वाले नकली आधार हैं।

सावधानी — कौन-सा आधार किस संशोधन से जुड़ा है
अनुच्छेद 19(1)(क) में अंतर्निहित अधिकार — न्यायिक व्याख्या से

प्रेस की स्वतंत्रता (संविधान में अलग से उल्लेख नहीं — रोमेश थापर (1950), बेनेट कोलमैन (1973)); जानने का अधिकार; मौन रहने का अधिकार (बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य, 1986 — राष्ट्रगान में खड़े होना पर्याप्त, गाना अनिवार्य नहीं); सरकार की आलोचना का अधिकार; राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम नवीन जिंदल, 2004); व्यावसायिक विज्ञापन; तथा श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66क को अस्पष्ट एवं अति-व्यापक मानते हुए अपास्त किया गया।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — “जानने का अधिकार” यहीं से निकला

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण (1975) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि लोक-सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज़ों के अपवाद को छोड़कर जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके लोक-सेवक क्या कर रहे हैं — यह अनुच्छेद 19(1)(क) का अंग है। यही निर्णय आगे चलकर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की वैचारिक नींव बना। वाद का मूल विवाद रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र (उ.प्र.) से जुड़ा था और इसी शृंखला का दूसरा मुक़दमा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चला।

3.2 अनुच्छेद 20 — अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

अनुच्छेद 20 अभियुक्त को तीन संरक्षण देता है। यह अधिकार नागरिक, विदेशी तथा निगम — सभी को उपलब्ध है, और आपातकाल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता।

सुमेलन-तालिका 8 : अनुच्छेद 20 के तीन संरक्षण
खंडसंरक्षणसीमाएँ — जहाँ लागू नहीं
20(1)कार्योत्तर विधि (Ex post facto law) — अपराध के समय प्रवृत्त विधि के अतिक्रमण के सिवाय दोषसिद्धि नहीं; और उस समय प्रवृत्त दंड से अधिक दंड नहींकेवल दांडिक विधियों पर; कर-विधियों तथा सिविल विधियों पर नहीं। केवल दोषसिद्धि एवं दंड पर, विचारण की प्रक्रिया पर नहीं। लाभकारी कार्योत्तर विधि (जो दंड घटाए) लागू की जा सकती है
20(2)दोहरा दंड (Double jeopardy) — किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित एवं दंडित नहीं किया जाएगाकेवल न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के समक्ष कार्यवाही पर; विभागीय/अनुशासनिक कार्यवाही पर नहीं। “अभियोजित एवं दंडित” — दोनों शर्तें आवश्यक
20(3)आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध (Self-incrimination) — किसी अपराध के अभियुक्त को अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए विवश नहीं किया जाएगाकेवल आपराधिक कार्यवाही के अभियुक्त को; केवल मौखिक/लिखित साक्ष्य पर। कठी कालू ओघड़ (1961) — अंगुली-छाप, हस्तलेख एवं रक्त के नमूने इसमें नहीं आते। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ एवं ब्रेन-मैपिंग सहमति के बिना अनु. 20(3) का उल्लंघन

3.3 अनुच्छेद 21 — प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

“किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।” — संविधान का यह सबसे छोटा और सबसे विस्तृत अनुच्छेद है। इसके शब्द “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (procedure established by law) जापानी संविधान से लिए गए, न कि अमेरिकी “due process of law” से — यह भेद स्वयं परीक्षा का प्रश्न है। अनुच्छेद 21 का पूरा न्यायिक विकास अगले खंड (खंड 4) में है।

3.4 अनुच्छेद 21क — शिक्षा का अधिकार

3.5 अनुच्छेद 22 — गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण

अनुच्छेद 22 के दो भाग हैं, और यही विभाजन परीक्षा का केंद्र है — खंड (1) एवं (2) साधारण विधि के अधीन गिरफ्तार व्यक्ति के लिए, तथा खंड (4) से (7) निवारक निरोध (preventive detention) के लिए।

साधारण गिरफ्तारी · अनु. 22(1)–(2)

  • गिरफ्तारी के आधार बताए जाएँ
  • अपनी पसंद के विधि-व्यवसायी से परामर्श एवं प्रतिरक्षा का अधिकार
  • 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत — यात्रा में लगा समय छोड़कर
  • मजिस्ट्रेट की अनुज्ञा के बिना 24 घंटे से अधिक निरोध नहीं
  • लागू नहीं — शत्रु-विदेशी पर, तथा निवारक निरोध विधि के अधीन निरुद्ध व्यक्ति पर [अनु. 22(3)]

निवारक निरोध · अनु. 22(4)–(7)

  • 22(4)3 माह से अधिक निरोध नहीं, जब तक सलाहकार बोर्ड पर्याप्त कारण न बताए (बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के योग्य व्यक्ति)
  • 22(5) — निरुद्ध व्यक्ति को निरोध के आधार बताए जाएँ तथा अभ्यावेदन का शीघ्रतम अवसर मिले
  • 22(6) — जिन तथ्यों का प्रकटन लोकहित के विरुद्ध हो, वे न बताए जाएँ
  • 22(7) — संसद विहित कर सकती है: वे वर्ग जिनमें बोर्ड के बिना 3 माह से अधिक निरोध हो, बोर्ड की प्रक्रिया, तथा अधिकतम अवधि
  • यहाँ न आधार तत्काल बताना अनिवार्य है, न वकील का अधिकार प्राप्त है
सावधानी — 44वें संशोधन का वह उपबंध जो आज तक लागू नहीं हुआ

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने अनुच्छेद 22(4) में सलाहकार बोर्ड की राय के बिना निरोध की अधिकतम अवधि तीन माह से घटाकर दो माह करने का उपबंध किया था, और बोर्ड की संरचना भी बदली थी। किंतु यह उपबंध आज तक अधिसूचित होकर प्रवृत्त नहीं हुआ — इसलिए व्यावहारिक रूप से अवधि अब भी तीन माह ही है। परीक्षा में “44वें संशोधन के बाद अवधि दो माह है” कहने वाला विकल्प आकर्षक लगता है, पर वही जाल है। (इस निष्क्रियता को ए.के. रॉय बनाम भारत संघ, 1982 में चुनौती दी गई थी।)

सुमेलन-तालिका 9 : निवारक निरोध — विधायी शक्ति तथा प्रमुख अधिनियम
पहलूविवरण
संसद की अनन्य शक्तिरक्षा, विदेश कार्य तथा भारत की सुरक्षा से संबंधित कारणों से निवारक निरोध — संघ सूची की प्रविष्टि 9
संसद एवं राज्य विधानमंडल की समवर्ती शक्तिराज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था बनाए रखना तथा समुदाय के लिए आवश्यक पूर्ति एवं सेवाएँ — समवर्ती सूची की प्रविष्टि 3
प्रमुख अधिनियमनिवारक निरोध अधिनियम, 1950 (1969 तक) · MISA, 1971 (1978 में निरसित) · COFEPOSA, 1974 · राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 · कालाबाज़ारी निवारण एवं आवश्यक वस्तु प्रदाय अधिनियम, 1980 · TADA, 1985 (1995 में समाप्त) · POTA, 2002 (2004 में निरसित) · UAPA
वैश्विक विशिष्टताभारत विश्व के उन गिने-चुने देशों में है जहाँ शांतिकाल में भी निवारक निरोध को संविधान में ही स्थान मिला है — यह भाग III का सर्वाधिक विवादित उपबंध माना जाता है
परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: छठी स्वतंत्रता का उपखंड (छ) है, (च) नहीं; 19(2) के आठ आधार; 16वाँ संशोधन ↔ प्रभुता एवं अखंडता; अनुच्छेद 20 एवं 21 का आपातकाल में निलंबित न होना; 24 घंटे की गणना में यात्रा-काल का अपवर्जन; तथा निवारक निरोध पर अनु. 22(1) एवं (2) का लागू न होना

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 19(2) के अधीन युक्तियुक्त निर्बंधन के आधारों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. “लोक व्यवस्था” तथा “अपराध का उद्दीपन” आधार प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा जोड़े गए।
2. “भारत की प्रभुता एवं अखंडता” आधार 16वें संविधान संशोधन, 1963 द्वारा जोड़ा गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रथम संविधान संशोधन, 1951 ने अनुच्छेद 19(2) को प्रतिस्थापित करते हुए “लोक व्यवस्था”, “विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध” तथा “अपराध का उद्दीपन” जोड़े और “युक्तियुक्त” शब्द भी डाला। 16वें संशोधन, 1963 ने “भारत की प्रभुता एवं अखंडता” को खंड (2), (3) तथा (4) — तीनों में जोड़ा। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): निवारक निरोध विधि के अधीन निरुद्ध व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
कारण (R): अनुच्छेद 22(3) के अनुसार खंड (1) एवं (2) के उपबंध शत्रु-विदेशी तथा निवारक निरोध विधि के अधीन निरुद्ध व्यक्ति पर लागू नहीं होते।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 22(1) एवं (2) — गिरफ्तारी के आधार जानने, वकील से परामर्श तथा 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का अधिकार — अनुच्छेद 22(3) द्वारा शत्रु-विदेशी तथा निवारक निरोध के अधीन निरुद्ध व्यक्ति पर स्पष्टतः लागू नहीं किए गए हैं। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (विषय)
1. अनुच्छेद 20(2) — दोहरे दंड से संरक्षण
2. अनुच्छेद 21क — 6 से 14 वर्ष के बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा
3. अनुच्छेद 19(1)(च) — कोई वृत्ति या व्यापार करने की स्वतंत्रता
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(छ) में है। उपखंड (च) संपत्ति के अर्जन, धारण एवं व्ययन की स्वतंत्रता थी, जिसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 ने हटा दिया — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 2 सही हैं।

4. अनुच्छेद 21 का विस्तार — गोपालन से पुट्टस्वामी तक

भाग III का कोई अनुच्छेद उतना नहीं बदला जितना अनुच्छेद 21। शब्द वही रहे, अर्थ पूरा पलट गया। यह कहानी चार पड़ावों में समझी जा सकती है।

4.1 पड़ाव एक — ए.के. गोपालन (1950): संकीर्ण, शाब्दिक पाठ

ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया पहला बड़ा संवैधानिक वाद था। निवारक निरोध अधिनियम, 1950 के अधीन निरुद्ध गोपालन ने तर्क दिया कि उनका निरोध अनुच्छेद 19 तथा 21 दोनों का उल्लंघन है। न्यायालय ने बहुमत से कहा —

4.2 पड़ाव दो — खड़क सिंह (1962): पहली दरार

उत्तर प्रदेश संदर्भ — खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962)

खड़क सिंह को डकैती के एक मामले में साक्ष्य के अभाव में छोड़ दिया गया था, किंतु पुलिस ने उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस विनियम के विनियम 236 के अधीन “हिस्ट्री-शीटर” घोषित कर निगरानी में रखा — गुप्त पहरा, रात में घर-आगमन (domiciliary visits), नियतकालिक पूछताछ तथा गतिविधियों का लेखा। उन्होंने इसे अनुच्छेद 19(1)(घ) एवं 21 का उल्लंघन बताया।

उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से विनियम 236(ख) — रात के घर-आगमन — को असंवैधानिक ठहराया और कहा कि किसी व्यक्ति के घर में अनधिकृत प्रवेश दैहिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण है। बहुमत ने फिर भी यह माना कि संविधान निजता के अधिकार को स्पष्ट रूप से प्रत्याभूत नहीं करता। न्यायमूर्ति सुब्बाराव के प्रसिद्ध अल्पमत निर्णय ने कहा कि निजता दैहिक स्वतंत्रता का अनिवार्य अंग है। 55 वर्ष बाद पुट्टस्वामी (2017) में यही अल्पमत मत सर्वसम्मत विधि बना, और खड़क सिंह का बहुमत-निर्णय इस सीमा तक उलट दिया गया। एक उत्तर प्रदेश के वाद से भारत के निजता-विधिशास्त्र की शुरुआत हुई — यह UPPSC का स्वाभाविक प्रश्न-बिंदु है।

इसी दिशा में गोविंद बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1975) ने निजता को सीमित रूप में स्वीकार किया, और मेनका गांधी (1978) के बाद यह दिशा निर्णायक हो गई।

4.3 पड़ाव तीन — मेनका गांधी (1978): अर्थ का रूपांतरण

मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में याचिकाकर्ता का पासपोर्ट बिना कारण बताए ज़ब्त कर लिया गया था। सात न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या पूरी तरह बदल दी —

1. प्रक्रिया “उचित” हो“विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का अर्थ कोई भी प्रक्रिया नहीं — वह न्यायसंगत, उचित एवं युक्तियुक्त (just, fair and reasonable) होनी चाहिए; मनमानी प्रक्रिया “प्रक्रिया” ही नहीं है
2. स्वर्णिम त्रिकोणअनुच्छेद 14, 19 एवं 21 परस्पर अपवर्जी नहीं — कोई विधि तीनों की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। गोपालन का “अपवर्जी क्षेत्र” वाला सिद्धांत समाप्त
3. “प्राण” = गरिमामय जीवनअनुच्छेद 21 का “प्राण” केवल पशु-तुल्य अस्तित्व नहीं, मानव-गरिमा सहित जीवन है — इसी से दर्जनों नए अधिकार निकले

4.4 पड़ाव चार — पुट्टस्वामी (2017): निजता मौलिक अधिकार

न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ, निर्णय 24 अगस्त 2017नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से घोषित किया कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 तथा भाग III के अन्य उपबंधों द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार है। इसने एम.पी. शर्मा (1954) को पूर्णतः तथा खड़क सिंह (1962) को उस सीमा तक उलट दिया जहाँ तक उनमें कहा गया था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। निजता में हस्तक्षेप की तीन-सूत्री कसौटी दी गई — (1) विधि का अस्तित्व, (2) वैध राज्य-हित, (3) आनुपातिकता (proportionality)

1950ए.के. गोपालन — अनु. 19, 21, 22 परस्पर अपवर्जी; “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का शाब्दिक अर्थ
1954एम.पी. शर्मा — तलाशी एवं अभिग्रहण; निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं (2017 में उलटा)
1962खड़क सिंह बनाम उ.प्र. — रात के घर-आगमन असंवैधानिक; सुब्बाराव का ऐतिहासिक अल्पमत
1974ई.पी. रोयप्पा — “समता एवं मनमानापन परस्पर शत्रु हैं”; अनु. 14 की नई व्याख्या
1975गोविंद बनाम म.प्र. — निजता को सीमित मान्यता · उ.प्र. बनाम राज नारायण — जानने का अधिकार
1978मेनका गांधी — प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित एवं युक्तियुक्त हो; स्वर्णिम त्रिकोण 14–19–21
1979–80हुसैनारा खातून — शीघ्र विचारण · प्रेम शंकर शुक्ला — हथकड़ी पर रोक · सुनील बत्रा — एकांत परिरोध
1985ओल्गा टेलिस — जीविका का अधिकार अनु. 21 का अंग
1991–93सुभाष कुमार — प्रदूषणमुक्त जल-वायु · मोहिनी जैन एवं उन्नीकृष्णन — शिक्षा का अधिकार
1995चमेली सिंह बनाम उ.प्र.आश्रय (shelter) का अधिकार अनु. 21 का अभिन्न अंग
1997विशाखा बनाम राजस्थान राज्य — कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध दिशा-निर्देश (अनु. 14, 15, 19(1)(छ), 21)
2014नाल्सा बनाम भारत संघ — ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “तृतीय लिंग” की मान्यता
24 अगस्त 2017पुट्टस्वामी — 9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत; निजता मौलिक अधिकार; एम.पी. शर्मा एवं खड़क सिंह (उस सीमा तक) उलटे
2018कॉमन कॉज़ — गरिमा के साथ मृत्यु एवं “लिविंग विल” · नवतेज सिंह जौहर — धारा 377 का पठन सीमित · जोसेफ शाइन — धारा 497 अपास्त
सुमेलन-तालिका 10 : अनुच्छेद 21 से निकले अधिकार ↔ प्रमुख वाद
अनुच्छेद 21 से निकला अधिकारप्रमुख वादवर्ष
शीघ्र विचारण एवं निःशुल्क विधिक सहायताहुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य; एम.एच. होस्कोट1979 / 1978
हथकड़ी एवं एकांत परिरोध के विरुद्ध संरक्षणप्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन; सुनील बत्रा1980 / 1978
जीविका का अधिकारओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम1985
प्रदूषणमुक्त पर्यावरण एवं स्वच्छ जल-वायुसुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य; एम.सी. मेहता वाद1991
शिक्षा का अधिकार (14 वर्ष तक)मोहिनी जैन; उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य1992 / 1993
आश्रय (shelter) का अधिकारचमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य1995 [(1996) 2 SCC 549]
स्वास्थ्य एवं आपातकालीन चिकित्सा सहायतापरमानंद कटारा बनाम भारत संघ; पश्चिम बंगा खेत मज़दूर समिति1989 / 1996
कार्यस्थल पर गरिमा — यौन उत्पीड़न से संरक्षणविशाखा बनाम राजस्थान राज्य1997
एकांत/निजता में मृत्यु — गरिमा के साथ मरण, निष्क्रिय इच्छामृत्युअरुणा शानबाग; कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ2011 / 2018
तृतीय लिंग की पहचाननाल्सा बनाम भारत संघ2014
निजता का अधिकारके.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ2017
सावधानी — तीन बारीक भेद
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित वादों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. मेनका गांधी बनाम भारत संघ
2. ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
3. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ
4. खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 4, 1, 3B4, 2, 3, 1C4, 2, 1, 3D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)ए.के. गोपालन (1950) → खड़क सिंह (1962) → मेनका गांधी (1978) → पुट्टस्वामी (2017)। अतः सही क्रम 2, 4, 1, 3 है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): पुट्टस्वामी वाद (2017) में उच्चतम न्यायालय ने खड़क सिंह वाद के निर्णय को आंशिक रूप से उलट दिया।
कारण (R): खड़क सिंह वाद में बहुमत ने यह माना था कि संविधान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में प्रत्याभूत नहीं करता।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)खड़क सिंह (1962) के बहुमत ने निजता को मौलिक अधिकार मानने से इनकार किया था, यद्यपि रात के घर-आगमन को असंवैधानिक ठहराया। पुट्टस्वामी (2017) की नौ-सदस्यीय पीठ ने ठीक इसी भाग को उलटा तथा एम.पी. शर्मा को पूर्णतः उलटा। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

प्र.3 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (वाद)    सूची-II (अनुच्छेद 21 से निकला अधिकार)
A. ओल्गा टेलिस   1. आश्रय का अधिकार
B. चमेली सिंह   2. प्रदूषणमुक्त जल एवं वायु
C. सुभाष कुमार   3. जीविका का अधिकार
D. हुसैनारा खातून   4. शीघ्र विचारण का अधिकार
कूट:

AA-3, B-1, C-2, D-4BA-1, B-3, C-4, D-2CA-1, B-3, C-2, D-4DA-3, B-1, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम (1985) — जीविका का अधिकार; चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य — आश्रय का अधिकार; सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) — प्रदूषणमुक्त जल एवं वायु; हुसैनारा खातून (1979) — शीघ्र विचारण। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

5. शोषण, धर्म तथा संस्कृति-शिक्षा संबंधी अधिकार — अनुच्छेद 23 से 30

5.1 शोषण के विरुद्ध अधिकार — अनुच्छेद 23 एवं 24

सुमेलन-तालिका 11 : अनुच्छेद 23 एवं 24
अनुच्छेदउपबंधअपवाद एवं टिप्पणी
23(1)मानव का दुर्व्यापार (traffic in human beings), बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात् श्रम प्रतिषिद्ध; इसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराधयह अधिकार राज्य तथा निजी व्यक्तियों — दोनों के विरुद्ध उपलब्ध है। “दुर्व्यापार” में स्त्रियों-बालकों का विक्रय, देवदासी प्रथा तथा दास-प्रथा सम्मिलित
23(2)राज्य लोक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है (जैसे सैन्य सेवा, सामाजिक सेवा)किंतु ऐसा करते समय केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा
2414 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को कारखाने, खान या अन्य परिसंकटमय नियोजन में नियोजित नहीं किया जाएगासंविधान स्वयं गैर-परिसंकटमय कार्य को निषिद्ध नहीं करता; किंतु बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 ने 14 वर्ष से कम आयु में सभी व्यवसायों में नियोजन निषिद्ध किया (पारिवारिक उद्यम एवं दृश्य-श्रव्य मनोरंजन के अपवाद के साथ) तथा 14–18 वर्ष के “किशोर” को परिसंकटमय व्यवसायों में निषिद्ध किया

5.2 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 25 से 28

सुमेलन-तालिका 12 : अनुच्छेद 25–28 — किसका अधिकार, किस पर सीमा
अनुच्छेदकिसे प्राप्तसार
25सभी व्यक्तियों को (विदेशियों सहित)अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने एवं प्रचार करने का अधिकार — लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा भाग III के अन्य उपबंधों के अधीन। 25(2) राज्य को अनुमति देता है — (क) धार्मिक आचरण से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष क्रियाओं का विनियमन; (ख) सामाजिक कल्याण एवं सुधार, तथा हिंदू धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों के लिए खोलना
26धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग कोचार अधिकार — (क) धार्मिक एवं पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना एवं पोषण; (ख) धर्म-विषयक अपने कार्यों का प्रबंध; (ग) चल एवं अचल संपत्ति का अर्जन एवं स्वामित्व; (घ) उस संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन
27सभी व्यक्तियों कोकिसी व्यक्ति को ऐसे कर के संदाय के लिए विवश नहीं किया जाएगा जिसकी आय किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय के संवर्धन/पोषण में व्यय की जाती हो
28शिक्षा संस्थाओं के संदर्भ मेंचार स्थितियाँ — नीचे तालिका देखें
सुमेलन-तालिका 13 : अनुच्छेद 28 — चार प्रकार की शिक्षा संस्थाएँ
संस्था का प्रकारधार्मिक शिक्षा की स्थिति
पूर्णतः राज्य-निधि से पोषितपूर्णतः वर्जित
राज्य द्वारा प्रशासित, किंतु किसी ऐसे विन्यास/न्यास के अधीन स्थापित जिसमें धार्मिक शिक्षा अपेक्षित होअनुमत — यही एकमात्र अपवाद है
राज्य द्वारा मान्यताप्राप्तअनुमत, किंतु व्यक्ति की सहमति से (अवयस्क हो तो संरक्षक की सहमति)
राज्य से सहायता-प्राप्तअनुमत, किंतु सहमति से

5.3 संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार — अनुच्छेद 29 एवं 30

अनुच्छेद 29 — अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण

  • 29(1)नागरिकों के किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार
  • ध्यान दें — यहाँ “अल्पसंख्यक” शब्द नहीं है; बहुसंख्यक वर्ग का कोई अनुभाग भी इसका दावा कर सकता है
  • 29(2) — राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता-प्राप्त शिक्षा संस्था में धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं
  • 29(2) के चार आधारों में “लिंग” एवं “जन्मस्थान” नहीं हैं
  • यह अधिकार व्यक्ति को भी प्राप्त है (चंपकम दुरैराजन, 1951)

अनुच्छेद 30 — अल्पसंख्यकों का शिक्षा संस्था संबंधी अधिकार

  • 30(1)धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाएँ स्थापित एवं प्रशासित करने का अधिकार
  • 30(1क) — ऐसी संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन पर प्रतिकर की राशि ऐसी हो कि अधिकार निष्फल न हो — 44वाँ संशोधन, 1978 से जोड़ा गया
  • 30(2) — सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह अल्पसंख्यक-प्रबंधित है
  • यहाँ केवल अल्पसंख्यक — बहुसंख्यक वर्ग अनु. 30 का दावा नहीं कर सकता
  • अनु. 15(5) तथा RTE अधिनियम, 2009 दोनों में अल्पसंख्यक संस्थाएँ अपवर्जित
उत्तर प्रदेश संदर्भ — अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं अनुच्छेद 30

अनुच्छेद 30 की सबसे लंबी लड़ाई उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से जुड़ी है। एस. अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ (1967) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चूँकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अधिनियम, 1920 नामक केंद्रीय अधिनियम से निगमित हुआ, अतः वह मुस्लिम अल्पसंख्यक द्वारा “स्थापित” नहीं माना जा सकता और उसे अनुच्छेद 30(1) का संरक्षण उपलब्ध नहीं।

8 नवंबर 2024 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाम नरेश अग्रवाल में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:3 से अज़ीज़ बाशा को उलट दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी संस्था का किसी अधिनियम द्वारा निगमित (incorporated) होना उसके अल्पसंख्यक-चरित्र को स्वतः समाप्त नहीं करता; देखना यह है कि उसकी स्थापना के पीछे “मस्तिष्क” (genesis) किसका था और वह किसके हित में स्थापित हुई। AMU का अल्पसंख्यक दर्जा तथ्यात्मक रूप से तय करने का कार्य नियमित पीठ पर छोड़ा गया। यह 2024–25 का सर्वाधिक चर्चित संवैधानिक निर्णय है और UPPSC के लिए दोहरी प्रासंगिकता रखता है — अनुच्छेद 30 तथा उत्तर प्रदेश, दोनों।

सावधानी — 29 और 30 को आपस में न बदलें
अनुच्छेद 25–30 — एक पंक्ति में “पच्चीस व्यक्ति, छब्बीस संप्रदाय, सत्ताईस कर, अट्ठाईस शिक्षा; उनतीस संस्कृति, तीस संस्था”

25 = व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता · 26 = संप्रदाय के चार अधिकार · 27 = धर्म-संवर्धन हेतु कर से मुक्ति · 28 = शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा · 29 = भाषा-लिपि-संस्कृति का संरक्षण · 30 = अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्था

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 29 एवं 30 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 30(1क), जो अल्पसंख्यक शिक्षा संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन पर प्रतिकर से संबंधित है, 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
2. अनुच्छेद 29(1) का लाभ नागरिकों के किसी भी अनुभाग को प्राप्त है, चाहे वह अल्पसंख्यक हो या नहीं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 30(1क) 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा जोड़ा गया था, 42वें द्वारा नहीं — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 29(1) “नागरिकों के किसी अनुभाग” की बात करता है, इसमें अल्पसंख्यक होना आवश्यक नहीं — कथन 2 सही है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): पूर्णतः राज्य-निधि से पोषित शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती।
कारण (R): अनुच्छेद 28(1) इस पर पूर्ण प्रतिषेध लगाता है, जबकि राज्य द्वारा प्रशासित किन्तु किसी ऐसे विन्यास के अधीन स्थापित संस्था, जिसमें धार्मिक शिक्षा अपेक्षित हो, इस प्रतिषेध से बाहर है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 28(1) पूर्णतः राज्य-निधि से पोषित संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर पूर्ण प्रतिषेध लगाता है; 28(2) उस संस्था को छूट देता है जो राज्य द्वारा प्रशासित है किन्तु ऐसे विन्यास/न्यास के अधीन स्थापित हुई जिसमें धार्मिक शिक्षा अपेक्षित है। अतः दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (वाद)    (विषय)
1. पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (1982) — न्यूनतम मज़दूरी से कम पर श्रम “बलात् श्रम” है
2. रेव. स्टैनिस्लॉस (1977) — अनुच्छेद 25 का “प्रचार” शब्द धर्मांतरण का अधिकार देता है
3. टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन (2002) — अल्पसंख्यक का निर्धारण राज्य-स्तर पर होगा
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)रेव. स्टैनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) में उच्चतम न्यायालय ने ठीक इसके विपरीत कहा था — “प्रचार” का अर्थ अपने धर्म के सिद्धांतों का प्रसार है, किसी को धर्मांतरित करने का अधिकार नहीं। अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है; युग्म 1 एवं 3 सही हैं।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार — अनुच्छेद 32 एवं पाँच रिट

6.1 अनुच्छेद 32 — “संविधान की आत्मा”

अधिकार तभी अधिकार है जब उसके उल्लंघन पर उपाय उपलब्ध हो। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में अनुच्छेद 32 को “संविधान का हृदय एवं आत्मा (the very soul of the Constitution and the very heart of it)” कहा था। यह स्वयं एक मौलिक अधिकार है — अर्थात् उपचार का अधिकार भी उतना ही मौलिक है जितना मूल अधिकार।

सुमेलन-तालिका 14 : अनुच्छेद 32 के चार खंड
खंडउपबंध
32(1)भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार प्रत्याभूत किया जाता है
32(2)उच्चतम न्यायालय निदेश, आदेश या रिट निकाल सकेगा — जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा एवं उत्प्रेषण हैं
32(3)संसद विधि द्वारा किसी अन्य न्यायालय को भी ये शक्तियाँ दे सकती है (अब तक नहीं दी गईं)
32(4)यह अधिकार निलंबित नहीं किया जाएगा, सिवाय वैसे जैसा संविधान में अन्यत्र उपबंधित है (अर्थात् अनुच्छेद 359 के अधीन — विस्तार अध्याय 4.3 में)

एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 32 तथा 226 के अधीन न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति संविधान के मूल ढाँचे का अंग है, जिसे संशोधन द्वारा भी नहीं छीना जा सकता।

पाँच रिट — ठीक उसी क्रम में जिसमें अनुच्छेद 32(2) में लिखी हैं “बंदी–परम–प्रतिषेध–अधिकार–उत्प्रेषण”

बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) → परमादेश (Mandamus) → प्रतिषेध (Prohibition) → अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) → उत्प्रेषण (Certiorari)। ध्यान दें — संविधान के पाठ में अधिकार-पृच्छा, उत्प्रेषण से पहले आती है। अधिकांश पुस्तकें “प्रतिषेध–उत्प्रेषण–अधिकार-पृच्छा” क्रम में पढ़ाती हैं — यदि प्रश्न “अनुच्छेद 32(2) में उल्लिखित क्रम” पूछे, तो वह क्रम यही है। ये पाँचों रिट अंग्रेजी विधि से ली गई हैं और वहाँ इन्हें “विशेषाधिकार रिट (prerogative writs)” कहा जाता है।

6.2 पाँच रिट — अर्थ, दायरा एवं सीमाएँ

सुमेलन-तालिका 15 : पाँच रिट — शाब्दिक अर्थ ↔ प्रयोजन ↔ किसके विरुद्ध ↔ कब नहीं
रिटशाब्दिक अर्थप्रयोजनकिसके विरुद्ध जारीजारी नहीं होती
बंदी प्रत्यक्षीकरण
Habeas Corpus
“शरीर को प्रस्तुत करो” निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष लाकर निरोध की वैधता जाँचना; अवैध हो तो मुक्त करना लोक प्राधिकारी तथा निजी व्यक्ति — दोनों के विरुद्ध निरोध विधिपूर्ण हो; निरोध किसी सक्षम न्यायालय द्वारा हो; कार्यवाही न्यायालय/विधानमंडल के अवमान के लिए हो; निरोध न्यायालय की अधिकारिता से बाहर हो
परमादेश
Mandamus
“हम आदेश देते हैं” किसी लोक अधिकारी, निकाय, निगम, अधीनस्थ न्यायालय या सरकार को अपना लोक कर्तव्य निभाने का आदेश लोक प्राधिकारी, सरकार, अधीनस्थ न्यायालय, तथा लोक कर्तव्य से आबद्ध निकाय निजी व्यक्ति या निजी निकाय; विवेकाधीन (अनिवार्य नहीं) कर्तव्य; संविदात्मक बाध्यता; ऐसे विभागीय अनुदेश जिनका सांविधिक बल न हो; राष्ट्रपति एवं राज्यपाल; न्यायिक भूमिका में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति
प्रतिषेध
Prohibition
“रोकना” अधीनस्थ न्यायालय/अधिकरण को अपनी अधिकारिता से परे जाने या उसे हड़पने से रोकना — मामला अभी लंबित रहते केवल न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक प्राधिकारियों, विधायी निकायों तथा निजी व्यक्तियों/निकायों के विरुद्ध
उत्प्रेषण
Certiorari
“प्रमाणित होना / सूचित होना” लंबित मामला अपने पास मँगाना या अधीनस्थ का पारित आदेश अपास्त करना — अर्थात् निवारक एवं उपचारात्मक दोनों न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी; 1991 के बाद प्रशासनिक प्राधिकारी भी, जहाँ वे व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करते हों विधायी निकायों तथा निजी व्यक्तियों/निकायों के विरुद्ध
अधिकार-पृच्छा
Quo Warranto
“किस अधिकार से / किस प्राधिकार से” किसी व्यक्ति द्वारा लोक पद के अवैध धारण की जाँच; अवैध हो तो पद से हटाना संविधान या किसी संविधि द्वारा सृजित स्थायी प्रकृति के लोक पद को धारण करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध मंत्रिस्तरीय (ministerial) पद तथा निजी पद के संबंध में। विशेषता — कोई भी हितबद्ध व्यक्ति याचिका ला सकता है, व्यथित होना आवश्यक नहीं

प्रतिषेध · Prohibition

  • समय — कार्यवाही लंबित रहते; अंतिम आदेश से पहले
  • प्रकृति — केवल निवारक (preventive)
  • आदेश — “आगे मत बढ़ो”
  • किसके विरुद्ध — केवल न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक निकाय
  • प्रशासनिक प्राधिकारी — नहीं

उत्प्रेषण · Certiorari

  • समय — कार्यवाही लंबित रहते भी, और आदेश हो जाने के बाद भी
  • प्रकृतिनिवारक एवं उपचारात्मक (curative) दोनों
  • आदेश — “मामला मुझे भेजो” / “यह आदेश अपास्त”
  • किसके विरुद्ध — न्यायिक, अर्ध-न्यायिक तथा (1991 के बाद) प्रशासनिक निकाय
  • प्रशासनिक प्राधिकारी — हाँ, जहाँ व्यक्ति के अधिकार प्रभावित हों
सावधानी — रिट संबंधी चार सर्वाधिक पूछे जाने वाले जाल

6.3 अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 — यह भेद अलग से याद करें

सुमेलन-तालिका 16 : अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 का तुलनात्मक ढाँचा
आधारअनुच्छेद 32 — उच्चतम न्यायालयअनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय
स्वरूपस्वयं एक मौलिक अधिकार (भाग III में)एक संवैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं (भाग VI में)
प्रयोजनकेवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतुमौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु तथा “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए — अर्थात् साधारण विधिक अधिकारों के लिए भी
दायरासंकुचितव्यापक
विवेकन्यायालय सहायता देने से इनकार नहीं कर सकता — अधिकार स्वयं मौलिक हैविवेकाधीन — उच्च न्यायालय रिट जारी करने से इनकार कर सकता है
क्षेत्रीय अधिकारितासम्पूर्ण भारतअपनी क्षेत्रीय अधिकारिता, तथा वे मामले जहाँ वाद-हेतुक (cause of action) पूर्णतः या अंशतः उत्पन्न हुआ हो — अनुच्छेद 226(2)
आपातकाल मेंअनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति के आदेश से मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु न्यायालय जाने का अधिकार निलंबित हो सकता है — अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़करयही निलंबन मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन पर लागू होता है; किंतु “किसी अन्य प्रयोजन” वाली शक्ति बनी रहती है — अतः साधारण विधिक अधिकार के लिए उच्च न्यायालय तब भी खुला रहता है
व्यावहारिक नियमसामान्यतः उच्चतम न्यायालय अपेक्षा करता है कि पहले उच्च न्यायालय जाया जाएप्रायः प्रथम उपचार — और 226 का मंच अधिक व्यापक है
सावधानी — 32 और 226 के तीन निर्णायक अंतर

6.4 जनहित याचिका (PIL) — अनुच्छेद 32 का लोकतंत्रीकरण

परंपरागत विधि में केवल व्यथित पक्षकार (locus standi) ही न्यायालय जा सकता था। 1970 के दशक के उत्तरार्ध से न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती एवं न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर के नेतृत्व में यह बंधन शिथिल हुआ — अब कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति या संगठन उस वर्ग की ओर से याचिका ला सकता है जो निर्धनता, निरक्षरता या असमर्थता के कारण स्वयं न्यायालय नहीं आ सकता। साधारण डाक से भेजे गए पत्र को भी याचिका मान लिया गया — यही “एपिस्टोलरी अधिकारिता (epistolary jurisdiction)” कहलाई।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (रिट)    सूची-II (शाब्दिक अर्थ)
A. परमादेश   1. किस अधिकार से
B. उत्प्रेषण   2. शरीर को प्रस्तुत करो
C. अधिकार-पृच्छा   3. हम आदेश देते हैं
D. बंदी प्रत्यक्षीकरण   4. प्रमाणित होना
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)परमादेश (Mandamus) = “हम आदेश देते हैं”; उत्प्रेषण (Certiorari) = “प्रमाणित होना/सूचित होना”; अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) = “किस अधिकार से”; बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) = “शरीर को प्रस्तुत करो”। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।

प्र.2 रिट के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. प्रतिषेध की रिट प्रशासनिक प्राधिकारियों के विरुद्ध भी जारी की जा सकती है।
2. परमादेश की रिट किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)प्रतिषेध केवल न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध जारी होती है, प्रशासनिक प्राधिकारियों के विरुद्ध नहीं (यह छूट उत्प्रेषण को प्राप्त है) — कथन 1 गलत है। परमादेश केवल लोक कर्तव्य के प्रवर्तन हेतु है, अतः निजी व्यक्ति या निजी निकाय के विरुद्ध जारी नहीं होती — कथन 2 सही है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): रिट-अधिकारिता के संदर्भ में अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 से व्यापक है।
कारण (R): अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तक सीमित है, जबकि अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के साथ-साथ साधारण विधिक अधिकारों (“किसी अन्य प्रयोजन”) के लिए भी उपलब्ध है। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

7. मौलिक अधिकारों पर अपवाद — अनुच्छेद 31क, 31ख, 31ग तथा 33, 34, 35

भाग III केवल अधिकार नहीं देता — वह अपने भीतर ही कुछ सुरक्षा-कवच रखता है, जिनके अधीन राज्य की कुछ विधियों को मौलिक अधिकारों की चुनौती से बचा लिया जाता है। ये उपबंध मुख्यतः भूमि-सुधार तथा समाजवादी आर्थिक नीति की रक्षा के लिए आए।

7.1 अनुच्छेद 31क — सम्पदा के अर्जन संबंधी विधियों की व्यावृत्ति

प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से जोड़ा गया। यह पाँच श्रेणियों की विधियों को अनुच्छेद 14 एवं 19 की चुनौती से बचाता है (अनुच्छेद 21 से नहीं):

  1. सम्पदाओं (estates) का अर्जन तथा उनमें अधिकारों का समाप्तिकरण या उपांतरण;
  2. राज्य द्वारा किसी संपत्ति का प्रबंध अपने हाथ में लेना;
  3. दो या अधिक निगमों का समामेलन;
  4. निगमों के प्रबंध-अभिकर्ताओं, निदेशकों या अंशधारियों के अधिकारों का समाप्तिकरण या उपांतरण;
  5. खनिज-पट्टों (mining leases) का समाप्तिकरण या उपांतरण।

7.2 अनुच्छेद 31ख एवं नौवीं अनुसूची

अनुच्छेद 31ख भी प्रथम संविधान संशोधन, 1951 की देन है और इसी के साथ संविधान में नौवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसका दायरा 31क से कहीं व्यापक है — नौवीं अनुसूची में रखी गई विधि को भाग III के किसी भी उपबंध की चुनौती से संरक्षण मिल जाता है, केवल 14 एवं 19 से नहीं।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — नौवीं अनुसूची की मूल 13 प्रविष्टियों में उ.प्र.

1951 में नौवीं अनुसूची में रखे गए मूल 13 अधिनियमों में उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 सम्मिलित था। इसी दौर में ज़मींदारी उन्मूलन की विधियों पर उच्च न्यायालयों के परस्पर-विरोधी निर्णय आए — पटना उच्च न्यायालय ने बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 को असंवैधानिक ठहराया, जबकि इलाहाबाद तथा नागपुर उच्च न्यायालयों ने अपने-अपने राज्यों (उ.प्र. तथा म.प्र.) के संबंधित अधिनियमों को वैध माना। इसी असमंजस को समाप्त करने के लिए प्रथम संविधान संशोधन, 1951 लाया गया, जिसने अनु. 31क, 31ख तथा नौवीं अनुसूची जोड़ी। अर्थात् नौवीं अनुसूची के जन्म में उत्तर प्रदेश का भूमि-सुधार सीधे कारण-शृंखला का हिस्सा है

7.3 अनुच्छेद 31ग — नीति-निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियाँ

यह अनुच्छेद 25वें संविधान संशोधन, 1971 द्वारा जोड़ा गया और इसकी कहानी स्वयं मौलिक अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व के टकराव की कहानी है (विस्तार खंड 10 में)।

1971 · 25वाँ संशोधनअनु. 31ग जोड़ा — दो भाग: (क) अनु. 39(ख) एवं 39(ग) को प्रभावी करने वाली विधि अनु. 14 एवं 19 से चुनौती-मुक्त; (ख) ऐसी घोषणा वाली विधि न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जा सकेगी
1973 · केशवानंद भारती31ग का दूसरा भाग (न्यायिक पुनर्विलोकन का निषेध) असंवैधानिक घोषित — वह मूल ढाँचे पर प्रहार था। पहला भाग बना रहा
1976 · 42वाँ संशोधन (धारा 4)31ग का विस्तार — अब भाग IV के किसी भी नीति-निदेशक तत्व को प्रभावी करने वाली विधि अनु. 14 एवं 19 से संरक्षित
1980 · मिनर्वा मिल्स42वें संशोधन की धारा 4 (31ग का विस्तार) तथा धारा 55 (अनु. 368(4) एवं (5)) अपास्त — मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन ही मूल ढाँचा है
5 नवंबर 2024 · प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य9 न्यायाधीशों की पीठ ने एकमत से कहा कि मिनर्वा मिल्स के बाद भी केशवानंद में यथा-उपधारित मूल अनुच्छेद 31ग जीवित है — अर्थात् 39(ख)/(ग) वाली विधियों का अनु. 14 एवं 19 से संरक्षण बना हुआ है। साथ ही 8:1 से यह भी कि प्रत्येक निजी संपत्ति अनु. 39(ख) की “समुदाय के भौतिक संसाधन” नहीं है
सावधानी — 31क, 31ख, 31ग का दायरा अलग-अलग है

7.4 अनुच्छेद 33 — सशस्त्र बल एवं अन्य बल

7.5 अनुच्छेद 34 — मार्शल लॉ लागू रहने पर निर्बंधन

मार्शल लॉ · अनुच्छेद 34

  • केवल मौलिक अधिकार ही नहीं, सरकार एवं सामान्य न्यायालयों का कार्य भी प्रभावित
  • केवल किसी विशिष्ट क्षेत्र में लागू
  • आधार — विधि-व्यवस्था का पूर्ण भंग, सैन्य विद्रोह जैसी स्थिति
  • संविधान में परिभाषित नहीं; स्पष्ट प्रक्रिया नहीं
  • सैन्य अधिकरण नागरिकों को भी दंडित कर सकते हैं

राष्ट्रीय आपातकाल · अनुच्छेद 352

  • सरकार एवं न्यायालय यथावत् कार्य करते हैं; केंद्र-राज्य संबंध बदलते हैं
  • सम्पूर्ण देश या उसके किसी भाग में
  • आधार — युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह
  • संविधान में विस्तार से उपबंधित (अनु. 352–360)
  • अनु. 358/359 के अधीन अधिकारों का निलंबन — 20 एवं 21 को छोड़कर
    विस्तार → अध्याय 4.3
सावधानी — 44वें संशोधन की सबसे अधिक पूछी जाने वाली देन

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 से पहले अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति भाग III के किसी भी अधिकार के प्रवर्तन को निलंबित कर सकते थे — 1975–77 के आपातकाल में ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) में तो यह तक कहा गया कि आपातकाल में जीवन के अधिकार के लिए भी न्यायालय नहीं जाया जा सकता। 44वें संशोधन ने यह द्वार सदा के लिए बंद कर दिया — अब अनुच्छेद 20 एवं 21 किसी भी आपातकाल में निलंबित नहीं किए जा सकते। (पुट्टस्वामी, 2017 में ए.डी.एम. जबलपुर के बहुमत-निर्णय को स्पष्ट रूप से अनुचित ठहराया गया।) प्रश्न प्रायः यह पूछता है कि “आपातकाल में कौन-से अनुच्छेद निलंबित नहीं होते?” — उत्तर सदैव 20 एवं 21; “19 एवं 21” या “21 एवं 22” जैसे विकल्प जाल हैं। पूरा विवरण अध्याय 4.3 में।

7.6 अनुच्छेद 35 — भाग III को प्रभावी करने के लिए विधि-निर्माण

अनुच्छेद 35 केवल संसद को — राज्य विधानमंडलों को नहीं — कुछ विषयों पर विधि बनाने की अनन्य शक्ति देता है, ताकि पूरे देश में एकरूपता बनी रहे:

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (संबंधित संविधान संशोधन)
1. अनुच्छेद 31क तथा 31ख — प्रथम संविधान संशोधन, 1951
2. अनुच्छेद 31ग — 42वाँ संविधान संशोधन, 1976
3. अनुच्छेद 31घ — 43वें संविधान संशोधन, 1977 द्वारा निरसित
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 31ग को 25वें संविधान संशोधन, 1971 द्वारा जोड़ा गया था; 42वें संशोधन ने तो केवल उसका विस्तार किया, जिसे मिनर्वा मिल्स (1980) में अपास्त कर दिया गया। अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। 31क एवं 31ख प्रथम संशोधन, 1951 की देन हैं तथा 31घ को 43वें संशोधन, 1977 ने निरसित किया — ये दोनों युग्म सही हैं।

प्र.2 नौवीं अनुसूची के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया और आरंभ में इसमें 13 अधिनियम रखे गए थे।
2. आई.आर. कोएलो वाद (2007) के अनुसार 24 अप्रैल 1973 के पश्चात् नौवीं अनुसूची में रखी गई विधियाँ मूल ढाँचे के आधार पर चुनौती-योग्य हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)नौवीं अनुसूची अनुच्छेद 31ख के साथ प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा जोड़ी गई और उसमें मूलतः 13 (मुख्यतः ज़मींदारी-उन्मूलन संबंधी) अधिनियम रखे गए, जिनमें उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 भी था। आई.आर. कोएलो (2007) की नौ-सदस्यीय पीठ ने 24 अप्रैल 1973 की रेखा की पुष्टि की। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 तथा 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रवर्तन निलंबित नहीं किया जा सकता।
कारण (R): 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने अनुच्छेद 359 में संशोधन कर अनुच्छेद 20 एवं 21 को उसके दायरे से बाहर कर दिया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)1975–77 के आपातकाल के अनुभव के बाद 44वें संशोधन, 1978 ने अनुच्छेद 359 से अनुच्छेद 20 एवं 21 को अपवर्जित कर दिया, जिससे इन दोनों का प्रवर्तन किसी भी आपातकाल में निलंबित नहीं किया जा सकता। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

8. मौलिक कर्तव्य — अनुच्छेद 51क

8.1 पृष्ठभूमि — स्वर्ण सिंह समिति

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं था; उसमें केवल अधिकार थे। 1976 में आंतरिक आपातकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसे संविधान में आवश्यक परिवर्तनों पर सुझाव देने थे। समिति ने नागरिकों के लिए एक पृथक अध्याय जोड़ने की सिफ़ारिश की।

8.2 अनुच्छेद 51क — ग्यारह मौलिक कर्तव्य

सुमेलन-तालिका 17 : अनुच्छेद 51क — प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह —
खंडकर्तव्य
(क)संविधान का पालन करे तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज एवं राष्ट्रगान का आदर करे
(ख)स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे
(ग)भारत की प्रभुता, एकता एवं अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे
(घ)देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे
(ङ)भारत के सभी लोगों में समरसता एवं समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे, जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हो; तथा स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करे
(च)हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे
(छ)प्राकृतिक पर्यावरण की — जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी एवं वन्य जीव हैं — रक्षा करे तथा उसका संवर्धन करे और प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे
(ज)वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करे
(झ)सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे
(ञ)व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे
(ट)यदि माता-पिता या संरक्षक है, तो 6 से 14 वर्ष के अपने बालक या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए — 86वाँ संशोधन, 2002
ग्यारह मौलिक कर्तव्य — तीन गुच्छों में “संविधान–स्वतंत्रता–अखंडता–रक्षा · समरसता–संस्कृति–पर्यावरण–विज्ञान · संपत्ति–उत्कर्ष–शिक्षा”

पहला गुच्छा राष्ट्र के प्रति (क–घ) · दूसरा समाज एवं सभ्यता के प्रति (ङ–ज) · तीसरा व्यक्ति एवं परिवार के प्रति (झ–ट)। अंतिम — शिक्षा — ही वह इकलौता कर्तव्य है जो 42वें नहीं, 86वें संशोधन (2002) से आया।

8.3 प्रवर्तनीयता — कर्तव्य कागज़ी हैं या नहीं?

सावधानी — मौलिक कर्तव्यों के चार सामान्य भ्रम
उत्तर प्रदेश संदर्भ — कर्तव्य से जुड़ी संस्थाएँ एवं विधान

मौलिक कर्तव्य 51क(छ) (पर्यावरण-संरक्षण) तथा 51क(च) (सामासिक संस्कृति का परिरक्षण) उत्तर प्रदेश के संदर्भ में विशेष अर्थ रखते हैं — गंगा-यमुना की स्वच्छता संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्देश तथा एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ वाद की “गंगा प्रदूषण” शृंखला, जिसमें कानपुर की चर्म-शोधन इकाइयों (tanneries) के विरुद्ध ऐतिहासिक आदेश आए, इसी वैचारिक आधार पर टिके हैं। इसी प्रकार ताजमहल (आगरा) के संरक्षण हेतु ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन संबंधी निर्देश अनुच्छेद 48क तथा 51क(छ) एवं 51क(च) को एक साथ पढ़कर दिए गए — अर्थात् कर्तव्य स्वयं प्रवर्तनीय न होते हुए भी न्यायिक तर्क का आधार बनते हैं।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. समिति ने कर्तव्य-पालन न करने पर दंड का उपबंध सुझाया था, जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया।
2. स्वर्ण सिंह समिति ने आठ मौलिक कर्तव्यों की सिफ़ारिश की थी, किन्तु 42वें संविधान संशोधन द्वारा दस कर्तव्य जोड़े गए।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)दंड तथा ऐसी दंड-विधि पर न्यायिक पुनर्विलोकन के निषेध वाले सुझाव सरकार ने स्वीकार नहीं किए — कथन 1 गलत है। स्वर्ण सिंह समिति ने आठ कर्तव्यों की सिफ़ारिश की थी, पर 42वें संशोधन, 1976 ने दस जोड़े — कथन 2 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद 51क के अधीन मौलिक कर्तव्य नहीं है?

Aवैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानववाद का विकास करनाBनियमित रूप से कर अदा करनाCसार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना एवं हिंसा से दूर रहनाDप्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं संवर्धन करना
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)“कर अदा करना” स्वर्ण सिंह समिति के सुझावों में अवश्य था, किन्तु अनुच्छेद 51क की अंतिम सूची में इसे सम्मिलित नहीं किया गया। शेष तीनों क्रमशः 51क(ज), 51क(झ) तथा 51क(छ) में हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): मौलिक कर्तव्य न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं।
कारण (R): अनुच्छेद 51क में उनके उल्लंघन के लिए किसी विधिक शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 51क केवल कर्तव्यों की घोषणा करता है; उसमें उल्लंघन पर कोई शास्ति या उपचार नहीं दिया गया, इसलिए वे सीधे प्रवर्तनीय नहीं। संसद पृथक विधि बनाकर उन्हें प्रवर्तनीय बना सकती है — जैसे राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

9. राज्य के नीति-निदेशक तत्व — अनुच्छेद 36 से 51

9.1 स्वरूप, स्रोत एवं अनुच्छेद 36–37

भाग IV (अनुच्छेद 36 से 51) में राज्य के नीति-निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) हैं। डॉ. अंबेडकर ने इन्हें “संविधान की अनूठी विशेषता” तथा ग्रेनविल ऑस्टिन ने भाग III एवं भाग IV को मिलकर “संविधान की अंतरात्मा (conscience of the Constitution)” कहा। ये तत्व आयरलैंड (Ireland) के संविधान से लिए गए, जिसने इन्हें स्वयं स्पेन से लिया था।

9.2 वर्गीकरण — समाजवादी, गांधीवादी, उदार-बौद्धिक

संविधान स्वयं नीति-निदेशक तत्वों का कोई वर्गीकरण नहीं करता; यह विभाजन विषय-वस्तु एवं वैचारिक झुकाव के आधार पर किया जाता है, और UPPSC इसी वर्गीकरण पर सुमेलन-प्रश्न बनाता है।

सुमेलन-तालिका 18 : नीति-निदेशक तत्वों का वर्गीकरण
वर्गसम्मिलित अनुच्छेदकेंद्रीय विचार
समाजवादी38, 39, 39क, 41, 42, 43, 43क, 47सामाजिक-आर्थिक न्याय; आय-असमानता में कमी; श्रमिक-कल्याण; लोकतांत्रिक समाजवाद का मार्ग
गांधीवादी40, 43, 43ख, 46, 47, 48ग्राम स्वराज्य, पंचायत, कुटीर उद्योग, सहकारिता, दुर्बल वर्गों की उन्नति, मद्य-निषेध, गोवध-निषेध
उदार-बौद्धिक44, 45, 48, 48क, 49, 50, 51उदारवादी विचारधारा — समान नागरिक संहिता, बाल-शिक्षा, आधुनिक कृषि, पर्यावरण, स्मारक-संरक्षण, न्यायपालिका का पृथक्करण, अंतर्राष्ट्रीय शांति

ध्यान दें — अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योग सहित) तथा अनुच्छेद 47 (मद्य-निषेध सहित) एवं अनुच्छेद 48 (गोवध-निषेध सहित) दो-दो वर्गों में गिने जाते हैं, क्योंकि उनके भीतर दोनों प्रकार के निर्देश हैं।

गांधीवादी तत्व — छह “पंचायत–कुटीर–सहकार–कमज़ोर–नशा–गोवंश”

पंचायत (40) · कुटीर उद्योग (43) · सहकारी समितियाँ (43ख) · कमज़ोर वर्ग/अजा-अजजा की उन्नति (46) · नशा-निषेध (47) · गोवंश-वध का प्रतिषेध (48)। संख्याएँ लगभग क्रम में हैं — 40 · 43 · 43ख · 46 · 47 · 48

उदार-बौद्धिक तत्व — सात “संहिता–बचपन–पशु–पर्यावरण–स्मारक–न्याय–शांति”

समान नागरिक संहिता (44) · बचपन — छह वर्ष से कम की देखरेख एवं शिक्षा (45) · कृषि एवं पशुपालन (48) · पर्यावरण, वन एवं वन्य जीव (48क) · ऐतिहासिक स्मारक (49) · कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (50) · अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा (51)। क्रम — 44 · 45 · 48 · 48क · 49 · 50 · 51, अर्थात् अंतिम आठ अनुच्छेदों का लगभग पूरा समूह

समाजवादी तत्व — आठ “कल्याण–नीति–विधिक सहायता · काम–दशा–मज़दूरी–प्रबंधन–पोषण”

कल्याणकारी राज्य (38) · नीति के सिद्धांत (39) · निःशुल्क विधिक सहायता (39क) · काम, शिक्षा एवं लोक सहायता का अधिकार (41) · काम की न्यायसंगत दशाएँ एवं प्रसूति सहायता (42) · निर्वाह मज़दूरी (43) · उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (43क) · पोषण, जीवन-स्तर एवं लोक स्वास्थ्य (47)।

9.3 अनुच्छेदवार विवरण — 38 से 51

सुमेलन-तालिका 19 : नीति-निदेशक तत्व — अनुच्छेद ↔ विषय (यह तालिका ही प्रश्न का रूप है)
अनुच्छेदविषयटिप्पणी
38लोक-कल्याण की अभिवृद्धि हेतु सामाजिक व्यवस्था; 38(2) — आय की असमानता कम करना तथा प्रतिष्ठा, सुविधाओं एवं अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास38(2) — 44वाँ संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया
39नीति के छह सिद्धांत — (क) पुरुष एवं स्त्री को जीविका के पर्याप्त साधन; (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व एवं नियंत्रण सामूहिक हित में बँटे; (ग) धन एवं उत्पादन-साधनों का संकेंद्रण न हो; (घ) समान कार्य के लिए समान वेतन; (ङ) श्रमिकों एवं बालकों के स्वास्थ्य का दुरुपयोग न हो; (च) बालकों के स्वस्थ विकास के अवसर39(च) को 42वें संशोधन, 1976 ने संशोधित किया; 39(ख) एवं (ग) ही अनुच्छेद 31ग से जुड़े हैं
39कसमान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता42वाँ संशोधन, 1976
40ग्राम पंचायतों का संगठन तथा उन्हें स्वायत्त शासन की इकाई बनाने हेतु शक्तियाँगांधीवादी; 73वें संशोधन (1992) की वैचारिक जड़
41काम, शिक्षा तथा बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी एवं नि:शक्तता की दशा में लोक सहायता का अधिकारराज्य की आर्थिक सामर्थ्य की सीमा में
42काम की न्यायसंगत एवं मानवोचित दशाएँ तथा प्रसूति सहायता
43सभी कामगारों को निर्वाह मज़दूरी (living wage) तथा शिष्ट जीवन-स्तर; ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों का संवर्धनसमाजवादी + गांधीवादी — दोनों
43कउद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी42वाँ संशोधन, 1976
43खसहकारी समितियों का संवर्धन — स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त संचालन, लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं व्यावसायिक प्रबंधन97वाँ संशोधन, 2011 (प्रवृत्त 15 फ़रवरी 2012)
44नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)गोवा में पुर्तगाली काल से समान संहिता प्रचलित; उत्तराखंड ने 2024 में UCC अधिनियम पारित किया
45छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख एवं शिक्षा86वें संशोधन, 2002 से बदला गया; मूल अनुच्छेद 45 में 10 वर्ष के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का निर्देश था
46अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों की अभिवृद्धि तथा सामाजिक अन्याय एवं शोषण से संरक्षण
47पोषाहार-स्तर एवं जीवन-स्तर ऊँचा करना तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार; मादक पेयों एवं स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के सेवन का प्रतिषेध (औषधीय प्रयोजन छोड़कर)समाजवादी + गांधीवादी
48कृषि एवं पशुपालन का आधुनिक एवं वैज्ञानिक प्रणाली से संगठन; गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू एवं वाहक पशुओं के वध का प्रतिषेध तथा नस्ल-सुधारउदार-बौद्धिक + गांधीवादी
48कपर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा42वाँ संशोधन, 1976 — मौलिक कर्तव्य 51क(छ) का जुड़वाँ उपबंध
49राष्ट्रीय महत्व घोषित स्मारकों, स्थानों एवं वस्तुओं का संरक्षण
50न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करणदंड प्रक्रिया संहिता, 1973 ने इसे लागू किया
51अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि; राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत एवं सम्मानपूर्ण संबंध; अंतर्राष्ट्रीय विधि एवं संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर; माध्यस्थम् (arbitration) द्वारा विवाद-निपटाराएकमात्र तत्व जो वैदेशिक नीति से संबंधित है

9.4 बाद में जोड़े गए नीति-निदेशक तत्व — यह तालिका अलग से याद करें

सुमेलन-तालिका 20 : संशोधन ↔ जोड़ा/बदला गया नीति-निदेशक तत्व
संविधान संशोधनवर्षपरिवर्तन
42वाँ1976तीन नए तत्व जोड़े39क (समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता), 43क (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी), 48क (पर्यावरण, वन एवं वन्य जीव)। साथ ही 39(च) को संशोधित कर बालकों के स्वस्थ विकास पर बल दिया
44वाँ197838(2) जोड़ा — आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं एवं अवसरों की असमानताएँ न्यूनतम करना
86वाँ2002अनुच्छेद 45 का विषय बदला — अब छह वर्ष से कम आयु के बालकों की प्रारंभिक देखरेख एवं शिक्षा (शिक्षा का मूल निर्देश अनु. 21क में मौलिक अधिकार बन गया)
97वाँ201143ख जोड़ा — सहकारी समितियों का संवर्धन
42वें संशोधन के तीन नीति-निदेशक तत्व “सब पर एक ‘क’ — 39क · 43क · 48क”

42वें संशोधन (1976) ने जो तीन तत्व जोड़े, तीनों की संख्या के साथ ‘क’ लगा है — 39क विधिक सहायता · 43क श्रमिक-भागीदारी · 48क पर्यावरण। 43ख पर ‘ख’ है — इसलिए वह 42वें का नहीं, 97वें (2011) का है। यह अक्षर-भेद ही याद रखने की कुंजी है।

9.5 क्रियान्वयन — कौन-सा तत्व किस विधि में उतरा

उत्तर प्रदेश संदर्भ — नीति-निदेशक तत्वों का प्रदेश-स्तरीय क्रियान्वयन
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (नीति-निदेशक तत्व)    सूची-II (अनुच्छेद)
A. समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता   1. अनुच्छेद 48क
B. ग्राम पंचायतों का संगठन   2. अनुच्छेद 50
C. पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन   3. अनुच्छेद 39क
D. न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण   4. अनुच्छेद 40
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 39क — समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता; अनुच्छेद 40 — ग्राम पंचायतों का संगठन; अनुच्छेद 48क — पर्यावरण, वन एवं वन्य जीव; अनुच्छेद 50 — न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।

प्र.2 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भाग IV में जोड़े गए नीति-निदेशक तत्वों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसने सहकारी समितियों के संवर्धन संबंधी अनुच्छेद 43ख भी जोड़ा।
2. इसने अनुच्छेद 39क, 43क तथा 48क जोड़े।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 43ख 97वें संविधान संशोधन, 2011 की देन है, जो 15 फ़रवरी 2012 से प्रवृत्त हुआ — कथन 1 गलत है। 42वें संशोधन ने 39क, 43क तथा 48क — तीन नए तत्व जोड़े — कथन 2 सही है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (नीति-निदेशक तत्व)    (वर्ग)
1. अनुच्छेद 40 — ग्राम पंचायतों का संगठन — गांधीवादी
2. अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता — उदार-बौद्धिक
3. अनुच्छेद 43क — प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी — गांधीवादी
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 43क (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) समाजवादी वर्ग में आता है, गांधीवादी में नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। अनुच्छेद 40 गांधीवादी तथा अनुच्छेद 44 उदार-बौद्धिक वर्ग में ही रखा जाता है।

10. मौलिक अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व — टकराव एवं न्यायिक विकास

10.1 दोनों का मूल अंतर — यह तुलना सर्वाधिक पूछी जाती है

मौलिक अधिकार · भाग III (12–35)

  • वाद-योग्यतावाद-योग्य (justiciable); उल्लंघन पर सीधे अनु. 32/226
  • प्रवर्तन — न्यायालय द्वारा विधिक रूप से प्रवर्तनीय; उल्लंघनकारी विधि शून्य घोषित हो सकती है
  • प्रकृति — अधिकांशतः नकारात्मक — राज्य को कुछ करने से रोकते हैं
  • लक्ष्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना
  • किसके हित में — मुख्यतः व्यक्ति के कल्याण हेतु
  • स्रोतअमेरिकी संविधान (Bill of Rights)
  • क्रियान्वयनस्वतः प्रवर्तनीय; पृथक विधि आवश्यक नहीं
  • स्वीकृतिविधिक (legal sanction)

नीति-निदेशक तत्व · भाग IV (36–51)

  • वाद-योग्यतावाद-योग्य नहीं; अनुच्छेद 37 स्पष्ट रूप से प्रवर्तन वर्जित करता है
  • प्रवर्तनप्रवर्तनीय नहीं; इन्हें लागू न करने मात्र से कोई विधि अवैध नहीं होती
  • प्रकृतिसकारात्मक — राज्य से कुछ करने की अपेक्षा
  • लक्ष्यसामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र, कल्याणकारी राज्य
  • किसके हित में — मुख्यतः समुदाय के कल्याण हेतु
  • स्रोतआयरलैंड का संविधान (जिसने स्पेन से लिया)
  • क्रियान्वयन — लागू करने के लिए पृथक विधि आवश्यक
  • स्वीकृतिराजनीतिक एवं नैतिक (मतदाता के प्रति उत्तरदायित्व)

10.2 टकराव की कहानी — चंपकम से मिनर्वा मिल्स तक

संविधान लागू होते ही यह प्रश्न उठा: यदि कोई विधि नीति-निदेशक तत्व को लागू करती है पर किसी मौलिक अधिकार से टकराती है, तो कौन जीतेगा? इस प्रश्न ने तीन दशक तक संसद और न्यायपालिका को आमने-सामने रखा, और अंततः उत्तर “न कोई जीतेगा — दोनों का संतुलन रहेगा” पर आकर ठहरा।

1951 · चंपकम दुरैराजनमद्रास राज्य बनाम चंपकम दुरैराजन — टकराव की स्थिति में मौलिक अधिकार प्रधान रहेंगे; नीति-निदेशक तत्वों को उनके अधीन रहकर चलना होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि संशोधन द्वारा अधिकारों को नीति-निदेशक तत्वों के अनुरूप ढाला जा सकता है
1951 · प्रथम संविधान संशोधनसंसद की प्रतिक्रिया — अनु. 15(4), अनु. 31क, अनु. 31ख तथा नौवीं अनुसूची जोड़ी गईं; अनु. 19(2) में तीन नए आधार तथा “युक्तियुक्त” शब्द
1951 · शंकरी प्रसादशंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ — प्रथम संशोधन वैध; अनुच्छेद 13 का “विधि” शब्द संविधान संशोधन को नहीं समेटता। (सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, 1965 में इसकी पुष्टि, पर दो न्यायाधीशों ने संदेह उठाया)
1967 · गोलकनाथआई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य — 11 न्यायाधीश, 6:5। संसद मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती; संविधान संशोधन भी अनु. 13 के अर्थ में “विधि” है। भावी-प्रभावी निर्णय (prospective overruling) का सिद्धांत पहली बार प्रयुक्त
1971 · 24वाँ एवं 25वाँ संशोधन24वाँ — अनु. 13(4) तथा 368(1) एवं (3) जोड़कर संसद की संशोधन-शक्ति की पुष्टि। 25वाँ — अनु. 31ग जोड़ा; 39(ख)/(ग) वाली विधियाँ अनु. 14 एवं 19 से परे, और ऐसी घोषणा न्यायालय में प्रश्नगत नहीं
24 अप्रैल 1973 · केशवानंद भारतीकेशवानंद भारती बनाम केरल राज्य — 13 न्यायाधीश, 7:6। संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, किंतु “मूल ढाँचे (basic structure)” को नष्ट नहीं कर सकती। गोलकनाथ उलटा। अनु. 31ग का दूसरा भाग (न्यायिक पुनर्विलोकन का निषेध) असंवैधानिक
1976 · 42वाँ संशोधन“लघु संविधान” — धारा 4 ने अनु. 31ग का विस्तार कर सभी नीति-निदेशक तत्वों को अनु. 14 एवं 19 पर वरीयता दी; धारा 55 ने अनु. 368(4) एवं (5) जोड़कर संशोधनों को न्यायिक समीक्षा से बाहर करने का प्रयास किया। साथ ही भाग IV-क (मौलिक कर्तव्य) एवं तीन नए नीति-निदेशक तत्व
31 जुलाई 1980 · मिनर्वा मिल्समिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ — 42वें संशोधन की धारा 4 एवं धारा 55 दोनों अपास्त। दो सूत्र स्थापित — (1) संसद की संशोधन-शक्ति सीमित है, और सीमित शक्ति को असीमित बनाना स्वयं मूल ढाँचे का उल्लंघन; (2) मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन ही मूल ढाँचा है — एक को दूसरे पर पूर्ण वरीयता नहीं
1981 · वामन राववामन राव बनाम भारत संघ24 अप्रैल 1973 की रेखा; उस तिथि के बाद नौवीं अनुसूची में डाली गई विधियाँ मूल ढाँचे के आधार पर चुनौती-योग्य
1997 · एल. चंद्रकुमारअनु. 32 एवं 226 के अधीन न्यायिक पुनर्विलोकन स्वयं मूल ढाँचे का अंग
11 जनवरी 2007 · आई.आर. कोएलो9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत — नौवीं अनुसूची की प्रविष्टियाँ (24 अप्रैल 1973 के बाद की) मूल ढाँचे तथा “स्वर्णिम त्रिकोण” (अनु. 14, 19, 21) की कसौटी पर परखी जाएँगी
5 नवंबर 2024 · प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन9 न्यायाधीश — एकमत: केशवानंद में यथा-उपधारित मूल अनुच्छेद 31ग जीवित है; 8:1: अनु. 39(ख) की “समुदाय के भौतिक संसाधन” में प्रत्येक निजी संपत्ति स्वतः सम्मिलित नहीं — संदर्भ, सार्वजनिक हित तथा विधायी उद्देश्य देखकर तय होगा
सुमेलन-तालिका 21 : वाद ↔ वर्ष ↔ एक पंक्ति का सिद्धांत
वादवर्षसिद्धांत
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ1951संविधान संशोधन अनु. 13 का “विधि” नहीं; प्रथम संशोधन वैध
मद्रास राज्य बनाम चंपकम दुरैराजन1951टकराव में मौलिक अधिकार प्रधान
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य1965शंकरी प्रसाद की पुष्टि (अल्पमत में संदेह)
आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य1967संसद मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती; भावी-प्रभावी निर्णय
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य1973मूल ढाँचे का सिद्धांत; 31ग का दूसरा भाग अपास्त
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण1975मूल ढाँचे का प्रथम प्रयोग — अनु. 329क(4) अपास्त; निर्वाचन-विवाद पर न्यायिक समीक्षा मूल ढाँचा
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ198042वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त; संतुलन ही मूल ढाँचा
वामन राव बनाम भारत संघ198124 अप्रैल 1973 की रेखा
एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ1997न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचा
आई.आर. कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य2007नौवीं अनुसूची भी मूल ढाँचे की कसौटी पर
प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य2024मूल अनु. 31ग जीवित; अनु. 39(ख) की सीमित व्याख्या
टकराव की पूरी शृंखला — एक पंक्ति में “चंपक शंकर गोलक, केशव मिनर्वा वामन, कोएलो”

चंपकम (1951) → शंकरी प्रसाद (1951) → गोलकनाथ (1967) → केशवानंद (1973) → मिनर्वा मिल्स (1980) → वामन राव (1981) → कोएलो (2007)। साथ में संशोधन-क्रम भी जोड़ लें — प्रथम (1951) → 24वाँ एवं 25वाँ (1971) → 42वाँ (1976) → 44वाँ (1978)

सावधानी — इस शृंखला के पाँच जाल
परीक्षा-दृष्टि — यह खंड प्रश्न के तीन रूपों में आता है

(1) कालक्रम — “निम्नलिखित वादों/संशोधनों को कालक्रम में रखिए”; (2) सुमेलन — वाद ↔ वर्ष, वाद ↔ सिद्धांत, संशोधन ↔ जोड़ा गया अनुच्छेद; (3) अभिकथन–कारण — प्रायः “मिनर्वा मिल्स ने संतुलन को मूल ढाँचा बताया” (अभिकथन) के साथ कोई अधूरा या उलटा कारण। सुरक्षित तैयारी यह है कि प्रत्येक वाद के लिए वर्ष + राज्य + एक पंक्ति का सिद्धांत याद रखें।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. केशवानंद भारती वाद का निर्णय
2. मद्रास राज्य बनाम चंपकम दुरैराजन वाद का निर्णय
3. मिनर्वा मिल्स वाद का निर्णय
4. आई.सी. गोलकनाथ वाद का निर्णय
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 4, 3, 1B4, 2, 1, 3C4, 2, 3, 1D2, 4, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)चंपकम दुरैराजन (1951) → गोलकनाथ (1967) → केशवानंद भारती (1973) → मिनर्वा मिल्स (1980)। अतः सही क्रम 2, 4, 1, 3 है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में उच्चतम न्यायालय ने 42वें संविधान संशोधन की धारा 4 को अपास्त कर दिया।
कारण (R): उक्त धारा ने अनुच्छेद 31ग का विस्तार कर भाग IV के सभी नीति-निदेशक तत्वों को अनुच्छेद 14 एवं 19 पर वरीयता दे दी थी, जिससे अधिकारों एवं निदेशक तत्वों का संतुलन नष्ट होता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)42वें संशोधन की धारा 4 ने अनुच्छेद 31ग का दायरा 39(ख)/(ग) से बढ़ाकर सम्पूर्ण भाग IV तक कर दिया था। मिनर्वा मिल्स ने इसे अपास्त करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों तथा नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन ही संविधान का मूल ढाँचा है। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है।

प्र.3 मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन वाद (2024) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 31ग को पूर्णतः निष्प्रभावी घोषित कर दिया।
2. नीति-निदेशक तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी वे देश के शासन में मूलभूत माने गए हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य (5 नवंबर 2024) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने एकमत से यह माना कि केशवानंद भारती में यथा-उपधारित मूल अनुच्छेद 31ग आज भी विद्यमान है — उसे निष्प्रभावी नहीं किया गया; अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 37 ठीक कथन 2 वाली बात कहता है — वह सही है।

11. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम — एक दृष्टि में

11.1 भाग III, IV-क एवं IV — पूरी अनुच्छेद-सूची

सुमेलन-तालिका 22 : अनुच्छेद 12 से 51क — एक पंक्ति में विषय
अनुच्छेदविषयअनुच्छेदविषय
12“राज्य” की परिभाषा31गकुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति
13मौलिक अधिकारों से असंगत विधियाँ32संवैधानिक उपचारों का अधिकार
14विधि के समक्ष समता33सशस्त्र बलों आदि पर अधिकारों का उपांतरण
15विभेद का प्रतिषेध34मार्शल लॉ लागू रहने पर निर्बंधन
16लोक नियोजन में अवसर की समता35भाग III को प्रभावी करने हेतु विधि-निर्माण (केवल संसद)
17अस्पृश्यता का अंत36भाग IV में “राज्य” की परिभाषा
18उपाधियों का अंत37निदेशक तत्वों का प्रवर्तन — वाद-योग्य नहीं
19छह स्वतंत्रताएँ38लोक-कल्याणकारी सामाजिक व्यवस्था
20दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण39नीति के छह सिद्धांत
21प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता39कसमान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता
21कशिक्षा का अधिकार (6–14 वर्ष)40ग्राम पंचायतों का संगठन
22गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण41काम, शिक्षा एवं लोक सहायता का अधिकार
23मानव-दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम का प्रतिषेध42काम की न्यायसंगत दशाएँ एवं प्रसूति सहायता
24कारखानों आदि में बाल-नियोजन का प्रतिषेध43निर्वाह मज़दूरी एवं कुटीर उद्योग
25अंतःकरण एवं धर्म की स्वतंत्रता43कप्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
26धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता43खसहकारी समितियों का संवर्धन
27धर्म-संवर्धन हेतु करों से स्वतंत्रता44समान नागरिक संहिता
28शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा से स्वतंत्रता45छह वर्ष से कम आयु के बालकों की देखरेख एवं शिक्षा
29अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण46अजा/अजजा एवं दुर्बल वर्गों के हितों की अभिवृद्धि
30अल्पसंख्यकों का शिक्षा संस्था संबंधी अधिकार47पोषण, जीवन-स्तर, लोक स्वास्थ्य एवं मद्य-निषेध
31संपत्ति का अधिकार — 44वें संशोधन, 1978 से निरसित48कृषि, पशुपालन एवं गोवध-प्रतिषेध
31कसम्पदाओं के अर्जन संबंधी विधियों की व्यावृत्ति48कपर्यावरण, वन एवं वन्य जीवों की रक्षा
31खनौवीं अनुसूची की विधियों का विधिमान्यकरण49राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण
31घराष्ट्र-विरोधी क्रियाकलाप — 43वें संशोधन, 1977 से निरसित50न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण
300कसंपत्ति का अधिकार — अब विधिक अधिकार (भाग XII)51अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि
भाग IV-क →51कग्यारह मौलिक कर्तव्य (42वाँ संशोधन, 1976 — दस; 86वाँ, 2002 — ग्यारहवाँ)

11.2 कालक्रम — संशोधन एवं निर्णय एक साथ

सुमेलन-तालिका 23 : भाग III एवं IV का सम्पूर्ण कालक्रम
वर्षघटनाप्रभाव
1950संविधान प्रवृत्त; ए.के. गोपालन वादसात मौलिक अधिकार; अनु. 19, 21, 22 परस्पर अपवर्जी
1951चंपकम दुरैराजन · शंकरी प्रसाद · प्रथम संविधान संशोधनअनु. 15(4), 31क, 31ख, नौवीं अनुसूची; 19(2) में तीन नए आधार एवं “युक्तियुक्त” शब्द; 19(6) में राज्य-एकाधिकार
1955अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियमअनु. 17 का प्रवर्तन; 1976 में नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम
1962खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्यरात के घर-आगमन असंवैधानिक; निजता पर सुब्बाराव का अल्पमत
196316वाँ संविधान संशोधनअनु. 19(2), (3), (4) में “भारत की प्रभुता एवं अखंडता”
196417वाँ संविधान संशोधनअनु. 31क में व्यक्तिगत जोत संबंधी परंतुक; नौवीं अनुसूची में वृद्धि
1967गोलकनाथ · अज़ीज़ बाशासंसद अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती; AMU का अल्पसंख्यक दर्जा अस्वीकृत
197124वाँ एवं 25वाँ संविधान संशोधनअनु. 13(4), 368(1)/(3); अनु. 31ग
1973केशवानंद भारती (24 अप्रैल)मूल ढाँचे का सिद्धांत; 31ग का दूसरा भाग अपास्त
197642वाँ संविधान संशोधन · स्वर्ण सिंह समिति · ए.डी.एम. जबलपुरभाग IV-क एवं दस मौलिक कर्तव्य; DPSP में 39क, 43क, 48क; 31ग का विस्तार; अनु. 31घ
197743वाँ संविधान संशोधनअनु. 31घ निरसित
197844वाँ संविधान संशोधन · मेनका गांधीसंपत्ति का अधिकार भाग III से हटा → अनु. 300क; अनु. 30(1क); DPSP में 38(2); अनु. 359 से 20 एवं 21 बाहर; अनु. 352 में “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह”
1980मिनर्वा मिल्स (31 जुलाई)42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त; संतुलन ही मूल ढाँचा
1992इंदिरा साहनी (16 नवंबर)OBC 27%; 50% सीमा एवं क्रीमी लेयर
1995 · 2000 · 200177वाँ · 81वाँ · 85वाँ संशोधनअनु. 16(4क) · 16(4ख) · “परिणामी ज्येष्ठता”
200286वाँ संविधान संशोधन · टी.एम.ए. पाईअनु. 21क; अनु. 45 का नया विषय; मौलिक कर्तव्य 51क(ट)
200593वाँ संविधान संशोधनअनु. 15(5) — निजी शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण
2007आई.आर. कोएलो (11 जनवरी)नौवीं अनुसूची मूल ढाँचे की कसौटी पर
2009 · 2010शिक्षा का अधिकार अधिनियम1 अप्रैल 2010 से प्रवृत्त; निजी विद्यालयों में 25% सीटें
2011 · 201297वाँ संविधान संशोधनअनु. 19(1)(ग) में “सहकारी समितियाँ”; अनु. 43ख; भाग IX-ख (15 फ़रवरी 2012 से प्रवृत्त)
2017पुट्टस्वामी (24 अगस्त) · शायरा बानोनिजता मौलिक अधिकार; तत्काल तीन तलाक अपास्त
2019103वाँ संविधान संशोधनअनु. 15(6) एवं 16(6) — EWS को 10% आरक्षण
2022जनहित अभियान (7 नवंबर)103वाँ संशोधन 3:2 से वैध
2024दविंदर सिंह (1 अगस्त) · AMU बनाम नरेश अग्रवाल (8 नवंबर) · प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन (5 नवंबर)अजा में उप-वर्गीकरण अनुमत (6:1) · अज़ीज़ बाशा उलटा (4:3) · मूल अनु. 31ग जीवित; अनु. 39(ख) की सीमित व्याख्या (8:1)

11.3 रटने योग्य निर्णायक तथ्य

स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (संविधान संशोधन)    सूची-II (प्रभाव)
A. 42वाँ संशोधन   1. संपत्ति का अधिकार भाग III से हटाया गया
B. 44वाँ संशोधन   2. अनुच्छेद 21क जोड़ा गया
C. 86वाँ संशोधन   3. मौलिक कर्तव्यों का भाग IV-क जोड़ा गया
D. 97वाँ संशोधन   4. अनुच्छेद 43ख जोड़ा गया
कूट:

AA-1, B-3, C-4, D-2BA-3, B-1, C-2, D-4CA-3, B-1, C-4, D-2DA-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)42वाँ संशोधन (1976) — भाग IV-क एवं मौलिक कर्तव्य; 44वाँ (1978) — संपत्ति का अधिकार हटाकर अनुच्छेद 300क; 86वाँ (2002) — अनुच्छेद 21क; 97वाँ (2011) — अनुच्छेद 43ख। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (वाद)    (संबंधित राज्य)
1. केशवानंद भारती — केरल
2. आई.सी. गोलकनाथ — कर्नाटक
3. खड़क सिंह — उत्तर प्रदेश
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)गोलकनाथ वाद “आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य” (1967) है, कर्नाटक नहीं — अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। केशवानंद भारती केरल राज्य के विरुद्ध तथा खड़क सिंह उत्तर प्रदेश राज्य के विरुद्ध थे; ये दोनों युग्म सही हैं। (मिनर्वा मिल्स कर्नाटक से संबंधित था।)

प्र.3 भारतीय संविधान के भाग III के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 32(2) में रिटों का उल्लेख जिस क्रम में है, उसमें अधिकार-पृच्छा, उत्प्रेषण से पहले आती है।
2. नौवीं अनुसूची में वर्तमान में 284 अधिनियम हैं, जबकि 1951 में इसमें 13 अधिनियम रखे गए थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 32(2) का पाठ क्रम है — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा तथा उत्प्रेषण; अतः कथन 1 सही है। नौवीं अनुसूची में 1951 में 13 अधिनियम थे और अब 284 हैं (78वें संशोधन, 1995 द्वारा 27 भूमि-सुधार विधियाँ जोड़े जाने पर यह संख्या पूरी हुई); कथन 2 भी सही है।