संविधान सभा से 26 जनवरी 1950 तक — स्रोत, प्रस्तावना, विशेषताएँ, संघ एवं राज्यक्षेत्र (अनु. 1–4), नागरिकता (अनु. 5–11), संशोधन-प्रक्रिया (अनु. 368) तथा भागों-अनुसूचियों की पूरी सूची
राजव्यवस्था से आने वाले लगभग 19–20 प्रश्नों में सबसे अधिक अनुमानित (predictable) हिस्सा
यही अध्याय देता है, क्योंकि यहाँ का लगभग पूरा तथ्य-भंडार संख्या, तिथि एवं नाम के रूप में है —
और UPPSC इन्हीं तीन रूपों में पूछता है। परीक्षा में यह अध्याय चार साँचों में आता है:
(क) सूची सुमेलन — समिति ↔ अध्यक्ष, उपबंध ↔ स्रोत-देश, अनुसूची ↔ विषय,
अनुच्छेद ↔ विषय, राज्य ↔ गठन-वर्ष;
(ख) कालक्रम — संविधान सभा की तिथियाँ, राज्यों के गठन का क्रम, मूल-ढाँचा वादों का क्रम;
(ग) दो-कथन — जहाँ “अनुच्छेद 2” बनाम “अनुच्छेद 3” या
“कुल सदस्यता” बनाम “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” जैसा एक शब्द उत्तर पलट देता है;
(घ) अभिकथन–कारण — विशेषतः प्रस्तावना एवं मूल ढाँचे पर। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में
सुमेलन-तालिका तथा अध्याय के अंत में पूरी तिथि-सूची दी गई है।
इस अध्याय की सीमा
मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य तथा नीति-निदेशक तत्व (अनुच्छेद 12–51क) अध्याय 4.2 में
विस्तार से हैं — यहाँ उनका उल्लेख केवल उतना है जितना संशोधन-प्रक्रिया एवं मूल ढाँचे को समझने के लिए
ज़रूरी है। संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, सातवीं अनुसूची की तीनों सूचियों का विषय-विश्लेषण तथा आपातकालीन
उपबंध अध्याय 4.3 में; राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद, संसद एवं राज्य विधानमंडल अध्याय
4.4 में; उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय अध्याय 4.5 में; पंचायती राज,
नगरपालिकाएँ तथा संवैधानिक-वैधानिक आयोग अध्याय 4.6 में। औपनिवेशिक अधिनियमों
(1773–1935) का पूरा विवेचन अध्याय 2.3 में है; यहाँ केवल उनकी संवैधानिक विरासत दी गई है।
1. संवैधानिक विकास की पृष्ठभूमि — 1946 तक के अधिनियमों की विरासत
भारत का संविधान शून्य से नहीं लिखा गया। जिस दिन संविधान सभा बैठी, उस दिन देश में एक पूरा
प्रशासनिक तंत्र पहले से चल रहा था — विधानमंडल, गवर्नर, संघीय न्यायालय, लोक सेवा आयोग, तीन विधायी सूचियाँ।
संविधान सभा का काम इस ढाँचे को उखाड़ना नहीं, उसे लोकतांत्रिक बनाना था। इसीलिए संविधान का
बड़ा भाग — विशेषकर प्रशासनिक विवरण — भारत शासन अधिनियम, 1935 से सीधे उतरा है। यही कारण है
कि आलोचक इसे “1935 के अधिनियम की कार्बन प्रति” कहते हैं, और यही कारण है कि परीक्षा में
“यह उपबंध किस अधिनियम से आया?” बार-बार पूछा जाता है।
सुमेलन-तालिका 1 : अधिनियम ↔ वह विशेषता जो संविधान में उतरी
अधिनियम
उस समय क्या दिया
संविधान में कहाँ दिखता है
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773
बंगाल का गवर्नर-जनरल; कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय (1774)
केंद्रीकृत प्रशासन एवं लिखित न्यायिक संरचना की पहली नींव
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784
नियंत्रण बोर्ड; दोहरा शासन
राजनीतिक विषयों पर ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण — “गृह सरकार” की अवधारणा
चार्टर एक्ट, 1833
भारत का गवर्नर-जनरल; विधि सदस्य (मैकॉले); अखिल-भारतीय विधायन
एकल अखिल-भारतीय विधायी शक्ति का सिद्धांत
चार्टर एक्ट, 1853
विधायी एवं कार्यपालिका कृत्यों का पृथक्करण; सेवाओं में खुली प्रतियोगिता
पृथक विधानमंडल की अवधारणा; संघ लोक सेवा आयोग की वैचारिक जड़
भारत शासन अधिनियम, 1858
कंपनी-शासन समाप्त; भारत-सचिव एवं भारत परिषद
ताज के अधीन उत्तरदायी प्रशासन — “राज्य-सचिव” प्रतिरूप
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
विधायी परिषद में गैर-सरकारी भारतीय; विभाग प्रणाली; वायसराय की अध्यादेश-शक्ति
मंत्रिमंडल की विभाग प्रणाली; अध्यादेश (अनु. 123, 213)
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
सीमित अप्रत्यक्ष निर्वाचन (“संस्तुति”); बजट पर चर्चा का अधिकार
विधानमंडल की वित्तीय चर्चा-शक्ति
मॉर्ले-मिंटो, 1909
मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडल; वायसराय की कार्यकारिणी में प्रथम भारतीय (एस.पी. सिन्हा, विधि सदस्य)
यही वह उपबंध है जिसे संविधान ने अस्वीकार किया — संविधान में पृथक निर्वाचन-मंडल नहीं
मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड, 1919
प्रांतों में द्वैध शासन; द्विसदनीय केंद्रीय विधानमंडल; केंद्रीय-प्रांतीय विषयों का पृथक्करण; प्रत्यक्ष निर्वाचन; लोक सेवा आयोग (1926)
द्विसदनीयता; शक्तियों का विभाजन; लोक सेवा आयोग (अनु. 315)
भारत शासन अधिनियम, 1935
अखिल-भारतीय संघ की योजना; प्रांतीय स्वायत्तता; केंद्र में द्वैध शासन; तीन सूचियाँ (संघीय 59, प्रांतीय 54, समवर्ती 36); संघीय न्यायालय (1937); रिज़र्व बैंक; गवर्नर की स्वविवेक-शक्तियाँ
सबसे बड़ा एकल स्रोत — संघीय योजना, राज्यपाल का पद, सातवीं अनुसूची, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध, प्रशासनिक विवरण
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
दो अधिराज्य; संविधान सभा पूर्ण प्रभुसत्ता-सम्पन्न निकाय बनी तथा विधानमंडल का कार्य भी करने लगी
संविधान सभा की संप्रभुता का विधिक आधार
सावधानी — ये तीन अधिनियम परीक्षा में सबसे अधिक आपस में बदले जाते हैं
पृथक निर्वाचन-मंडल = 1909 (मुसलमानों के लिए)। 1919 ने इसे सिखों, भारतीय ईसाइयों,
आंग्ल-भारतीयों एवं यूरोपीयों तक बढ़ाया; 1935 ने दलित वर्गों, महिलाओं एवं श्रमिकों तक।
केवल “पृथक निर्वाचन-मंडल की शुरुआत” पूछा जाए तो उत्तर 1909 है।
प्रांतों में द्वैध शासन = 1919; केंद्र में द्वैध शासन = 1935।
1935 ने प्रांतीय द्वैध शासन को समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता दी। यह उलटा याद रह जाता है।
तीन सूचियाँ = 1935, न कि 1919। 1919 ने केवल केंद्रीय एवं प्रांतीय विषयों को अलग किया था।
अनुच्छेद 395 ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तथा
भारत शासन अधिनियम, 1935 — दोनों का निरसन किया; किंतु
प्रिवी काउंसिल अधिकारिता उन्मूलन अधिनियम, 1949 का निरसन नहीं किया। यह सूक्ष्म बिंदु
पूछा जा चुका है।
1.1 संविधान सभा की माँग — विचार से वास्तविकता तक
“भारत का संविधान भारतीय स्वयं बनाएँ” — यह माँग क्रमशः पकी। इसका क्रम UPPSC का प्रिय कालक्रम-प्रश्न है।
1934 · एम.एन. रॉयसंविधान सभा का विचार सर्वप्रथम मानवेंद्रनाथ रॉय ने रखा
→
1935 · कांग्रेसकांग्रेस ने पहली बार आधिकारिक माँग की कि संविधान भारतीयों द्वारा बने
→
1938 · नेहरूघोषणा — संविधान वयस्क मताधिकार पर निर्वाचित संविधान सभा बनाएगी, बिना बाहरी हस्तक्षेप
→
1940 · अगस्त प्रस्तावब्रिटिश सरकार ने माँग को सैद्धांतिक रूप से पहली बार स्वीकार किया
→
1942 · क्रिप्स मिशनयुद्धोत्तर संविधान-निर्माण निकाय का प्रस्ताव — मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस दोनों ने अस्वीकार किया
→
1946 · कैबिनेट मिशनवह योजना जिसके अंतर्गत वास्तव में संविधान सभा बनी
संविधान सभा की माँग — छह पड़ाव“रॉय काँग्रे नेहरू, अगस्त क्रिप्स कैबिनेट”
रॉय 1934 → कांग्रेस 1935 → नेहरू 1938 → अगस्त प्रस्ताव 1940 →
क्रिप्स मिशन 1942 → कैबिनेट मिशन 1946। ध्यान रहे — स्वीकृति 1940 में मिली, पर
गठन 1946 में हुआ।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अधिनियम) सूची-II (विशेषता) A. भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 1. प्रांतों में द्वैध शासन B. भारत शासन अधिनियम, 1919 2. विभाग प्रणाली एवं अध्यादेश-शक्ति C. भारत शासन अधिनियम, 1935 3. मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडल D. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 4. तीन विधायी सूचियाँ कूट:
उत्तर: (B)1861 का अधिनियम विभाग प्रणाली (portfolio system) तथा वायसराय की अध्यादेश-शक्ति लाया; 1919 ने प्रांतों में द्वैध शासन दिया; 1935 ने संघीय, प्रांतीय एवं समवर्ती — तीन सूचियाँ दीं; 1909 ने पृथक निर्वाचन-मंडल दिया। अतः A-2, B-1, C-4, D-3।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारतीय संविधान को प्रायः “1935 के अधिनियम की कार्बन प्रति” कहा जाता है। कारण (R): संविधान की संघीय योजना, राज्यपाल का पद, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग तथा आपातकालीन उपबंध बड़ी सीमा तक भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिए गए हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)यह आलोचना ठीक इसी आधार पर की जाती है कि संविधान का प्रशासनिक ढाँचा — संघीय योजना, राज्यपाल, संघीय न्यायालय से विकसित उच्चतम न्यायालय, लोक सेवा आयोग तथा आपातकालीन उपबंध — 1935 के अधिनियम से लिया गया। अतः (R), (A) का ठीक कारण है।
प्र.3निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए। 1. अगस्त प्रस्ताव 2. एम.एन. रॉय द्वारा संविधान सभा का विचार 3. कैबिनेट मिशन योजना 4. क्रिप्स मिशन कूट:
A2, 1, 3, 4B1, 2, 4, 3C2, 1, 4, 3D1, 2, 3, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)एम.एन. रॉय — 1934; अगस्त प्रस्ताव — 1940; क्रिप्स मिशन — 1942; कैबिनेट मिशन — 1946। अतः सही क्रम 2, 1, 4, 3 है।
2. कैबिनेट मिशन एवं संविधान सभा — गठन, संरचना, प्रथम बैठक, उद्देश्य प्रस्ताव
2.1 कैबिनेट मिशन, 1946
ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने सत्ता-हस्तांतरण की रूपरेखा तय करने के लिए तीन ब्रिटिश
मंत्रिमंडलीय सदस्यों का एक मिशन भारत भेजा, जो 24 मार्च 1946 को भारत पहुँचा।
इसने 16 मई 1946 को अपनी योजना घोषित की।
सुमेलन-तालिका 2 : कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य ↔ उनका ब्रिटिश पद
सदस्य
पद
टिप्पणी
लॉर्ड पैथिक-लॉरेंस (Pethick-Lawrence)
भारत-सचिव (Secretary of State for India)
मिशन के अध्यक्ष
सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स (Stafford Cripps)
व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष (President of the Board of Trade)
1942 के क्रिप्स मिशन के भी प्रमुख — इसीलिए भ्रम होता है
ए.वी. अलेक्ज़ैंडर (A.V. Alexander)
नौसेना मंत्री (First Lord of the Admiralty)
तीसरे सदस्य
योजना के मुख्य बिंदु —
पाकिस्तान की माँग अस्वीकार; अलग संविधान सभा नहीं — एक ही संविधान सभा।
त्रिस्तरीय ढाँचा — नीचे प्रांत, बीच में प्रांतों के समूह (Groups),
ऊपर संघ, जिसके पास केवल विदेश, रक्षा एवं संचार रहते।
प्रांतों को तीन समूहों में बाँटा गया — समूह A (हिंदू-बहुल प्रांत, जिसमें संयुक्त प्रांत
सम्मिलित था), समूह B (उत्तर-पश्चिमी मुस्लिम-बहुल प्रांत), समूह C (बंगाल एवं असम)।
देशी रियासतों को संघ में सम्मिलित होने की स्वतंत्रता; संविधान सभा के साथ बातचीत।
अंतरिम सरकार का गठन — जो 2 सितंबर 1946 को नेहरू के नेतृत्व में बनी।
2.2 संविधान सभा की संरचना — संख्याएँ जो पूछी जाती हैं
389कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार कुल प्रस्तावित सदस्य
296ब्रिटिश भारत के लिए (292 प्रांत + 4 मुख्य आयुक्त प्रांत)
93देशी रियासतों के लिए आरक्षित
299विभाजन के बाद वास्तविक सदस्य-संख्या
10 लाखलगभग इतनी जनसंख्या पर एक सीट
55संयुक्त प्रांत (उ.प्र.) को मिली सीटें
सीटों का बँटवारा — प्रत्येक प्रांत को उसकी जनसंख्या के अनुपात में, लगभग
दस लाख जनसंख्या पर एक सीट। प्रांत की सीटें तीन समुदायों में बाँटी गईं —
मुस्लिम, सिख तथा साधारण (साधारण = मुस्लिम एवं सिख के अतिरिक्त सभी)।
कुल 292 प्रांतीय सीटों में साधारण 210, मुस्लिम 78, सिख 4 थीं; शेष 4 सीटें
चार मुख्य आयुक्त प्रांतों (दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान) को एक-एक।
निर्वाचन पद्धति — प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन,
आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत (single transferable vote) पद्धति से।
रियासतों के प्रतिनिधि निर्वाचित नहीं, नामित (nominated) होते थे — उनके शासकों द्वारा।
निर्वाचन — जुलाई–अगस्त 1946 में हुआ। परिणाम — कांग्रेस 208, मुस्लिम लीग 73,
अन्य/स्वतंत्र 15 (296 में से)।
अंशतः निर्वाचित, पूर्णतः प्रभुसत्ता-सम्पन्न — सभा वयस्क मताधिकार पर सीधे नहीं चुनी गई थी,
इसलिए इसकी प्रतिनिधित्वशीलता पर प्रश्न उठते हैं; किंतु भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के बाद
यह पूर्णतः प्रभुसत्ता-सम्पन्न हो गई और विधानमंडल के रूप में भी कार्य करने लगी।
सावधानी — “389” या “299”?
दोनों सही हैं, पर अलग-अलग समय के लिए। 389 कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार
प्रस्तावित कुल संख्या थी (296 + 93)। विभाजन के बाद पाकिस्तान में गए क्षेत्रों के प्रतिनिधि
सभा से बाहर हो गए और सभा की सदस्य-संख्या 299 रह गई (229 प्रांतों से + 70 रियासतों से)।
प्रश्न में यदि “कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार” लिखा हो → 389; यदि “विभाजन के बाद” या
“संविधान पर हस्ताक्षर के समय” → 299। सभा में लगभग 15 महिला सदस्य थीं
(कुछ सूचियों में, बाद में आए सदस्यों को जोड़कर, यह संख्या 17 दी जाती है)।
2.3 प्रथम बैठक — 9 दिसंबर 1946
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली के संविधान भवन
(आज का संसद भवन का केंद्रीय कक्ष) में हुई। मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया और पृथक
पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा की माँग दोहराई — इसलिए पहले दिन लगभग 210 सदस्य ही उपस्थित थे।
डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा — सभा के सबसे वरिष्ठ (आयु में सबसे बड़े) सदस्य होने के
कारण अस्थायी अध्यक्ष चुने गए। यह फ़्रांसीसी परंपरा का अनुसरण था।
11 दिसंबर 1946 — डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित।
उपाध्यक्ष — एच.सी. मुखर्जी (H.C. Mookerjee); बाद में
वी.टी. कृष्णमाचारी दूसरे उपाध्यक्ष बने।
संवैधानिक सलाहकार — सर बी.एन. राव (B.N. Rau)। ये सभा के सदस्य नहीं थे;
इन्होंने ही अक्टूबर 1947 में प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया।
सभा के सचिव — एच.वी.आर. अय्यंगर; मुख्य प्रारूपकार (Chief Draftsman) —
एस.एन. मुखर्जी।
सावधानी — “अध्यक्ष” के चार अलग-अलग पद
संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष — डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा (9 दिसंबर 1946)।
संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष — डॉ. राजेंद्र प्रसाद (11 दिसंबर 1946)।
प्रारूप समिति के अध्यक्ष — डॉ. बी.आर. अंबेडकर (30 अगस्त 1947)।
संविधान सभा (विधायी) के अध्यक्ष — जी.वी. मावलंकर, जब सभा विधानमंडल के रूप में बैठती थी।
यही आगे चलकर लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष बने।
2.4 उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution)
जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को यह ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा, जिसने
संविधान की दार्शनिक दिशा तय कर दी। 16–19 दिसंबर तक बहस चली, फिर 21 दिसंबर को इसे स्थगित किया गया
ताकि मुस्लिम लीग को सम्मिलित होने का अवसर मिले। अंततः यह 22 जनवरी 1947 को
सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ। इसी प्रस्ताव ने आगे चलकर प्रस्तावना का रूप लिया।
सुमेलन-तालिका 3 : उद्देश्य प्रस्ताव का अंश ↔ प्रस्तावना में उसका रूप
उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946)
प्रस्तावना में रूपांतरण
भारत को एक स्वतंत्र प्रभुत्व-सम्पन्न गणराज्य घोषित करना
“संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न … गणराज्य”
शक्ति का स्रोत जनता है
“हम, भारत के लोग …”
सभी को न्याय — सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक
“न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक”
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संघ एवं कर्म की स्वतंत्रता
“विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता”
प्रतिष्ठा एवं अवसर की समता; अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों एवं जनजातियों के लिए संरक्षण
“प्रतिष्ठा और अवसर की समता”
राष्ट्र की अखंडता तथा भूमि, समुद्र एवं वायु पर संप्रभु अधिकार
“राष्ट्र की एकता और अखंडता” (शब्द “अखंडता” 42वें संशोधन से)
विश्व-शांति एवं मानव-कल्याण में योगदान
प्रस्तावना में नहीं — अनुच्छेद 51 (नीति-निदेशक तत्व) में उतरा
24 मार्च 1946कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा
16 मई 1946कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा — पाकिस्तान की माँग अस्वीकार, एक संविधान सभा
जुलाई–अगस्त 1946संविधान सभा का अप्रत्यक्ष निर्वाचन — कांग्रेस 208, मुस्लिम लीग 73, अन्य 15
2 सितंबर 1946अंतरिम सरकार का गठन — नेहरू के नेतृत्व में
9 दिसंबर 1946प्रथम बैठक — डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष; मुस्लिम लीग का बहिष्कार
11 दिसंबर 1946डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित; एच.सी. मुखर्जी उपाध्यक्ष
13 दिसंबर 1946उद्देश्य प्रस्ताव — नेहरू द्वारा प्रस्तुत
22 जनवरी 1947उद्देश्य प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत
22 जुलाई 1947राष्ट्रीय ध्वज अंगीकृत
15 अगस्त 1947स्वतंत्रता — सभा अब प्रभुसत्ता-सम्पन्न, साथ ही विधानमंडल भी
29 अगस्त 1947प्रारूप समिति का गठन — अगले दिन अंबेडकर अध्यक्ष चुने गए
फ़रवरी 1948प्रारूप संविधान प्रकाशित — जनता की राय के लिए आठ माह
4 नवंबर 1948प्रथम वाचन आरंभ — अंबेडकर ने प्रारूप संविधान सभा के समक्ष रखा
15 नवंबर 1948 – 17 अक्टूबर 1949द्वितीय वाचन — खंडवार विचार; 7,635 संशोधन प्रस्तावित, 2,473 पर वास्तव में चर्चा
17 अक्टूबर 1949प्रस्तावना पर बहस — “ईश्वर के नाम पर” जोड़ने का संशोधन 68 बनाम 41 से अस्वीकृत
24 जनवरी 1950अंतिम बैठक — 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए; जन गण मन राष्ट्रगान एवं वंदे मातरम् राष्ट्रगीत घोषित; राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित
26 जनवरी 1950संविधान प्रवृत्त (commenced) — भारत गणराज्य बना; संविधान सभा अस्थायी संसद में बदली
उत्तर प्रदेश संदर्भ — संविधान सभा में संयुक्त प्रांत
ब्रिटिश भारत की 296 सीटों में से 55 सीटें संयुक्त प्रांत (United Provinces) को मिलीं —
बंगाल के बाद सर्वाधिक। 1946 के निर्वाचन में इनमें से कांग्रेस को 45, मुस्लिम लीग को 7 तथा
स्वतंत्र उम्मीदवारों को 3 सीटें मिलीं। विभाजन के बाद जब बंगाल एवं पंजाब बँट गए, तो संयुक्त
प्रांत का प्रतिनिधिमंडल सभा का सबसे बड़ा एकल प्रांतीय समूह बन गया — और संविधान की भाषा,
हिंदी के प्रश्न तथा ज़मींदारी उन्मूलन पर उसकी आवाज़ निर्णायक रही।
प्रमुख सदस्य —
जवाहरलाल नेहरू (इलाहाबाद) — उद्देश्य प्रस्ताव के प्रस्तावक; संघ शक्ति समिति,
संघीय संविधान समिति तथा राज्यों संबंधी समिति — तीनों के अध्यक्ष।
गोविंद बल्लभ पंत — उस समय संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री (Premier); सभा में
प्रांतीय स्वायत्तता तथा अल्पसंख्यक-प्रश्न पर प्रभावी हस्तक्षेप।
पुरुषोत्तम दास टंडन (इलाहाबाद) — हिंदी को राजभाषा बनाने के सर्वाधिक मुखर पक्षधर;
भाषा-विवाद का समाधान अंततः “मुंशी-अय्यंगर सूत्र” के रूप में निकला।
रफ़ी अहमद किदवई — राष्ट्रवादी मुस्लिम नेतृत्व का स्वर; पृथक निर्वाचन-मंडल के विरोधी।
आचार्य जे.बी. कृपलानी — मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष;
सुचेता कृपलानी — सभा की महिला सदस्य, जिन्होंने 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि बैठक में
वंदे मातरम् गाया और आगे चलकर उत्तर प्रदेश की — तथा भारत की — प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनीं।
बेगम ऐज़ाज़ रसूल (सांडीला, हरदोई) — संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य;
उन्होंने पृथक निर्वाचन-मंडल का विरोध किया और ज़मींदारी उन्मूलन का समर्थन किया, जबकि वे स्वयं
तालुकेदार परिवार से थीं।
हृदयनाथ कुंज़रू (इलाहाबाद) — आगे चलकर राज्य पुनर्गठन आयोग (1953–55) के सदस्य।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारत की संविधान सभा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. रियासतों के प्रतिनिधि आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से निर्वाचित हुए थे। 2. प्रांतों की सीटें मुस्लिम, सिख तथा साधारण — तीन समुदायों में जनसंख्या के अनुपात में बाँटी गई थीं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)रियासतों के प्रतिनिधि निर्वाचित नहीं, नामित होते थे — उनके शासकों द्वारा। एकल संक्रमणीय मत वाली अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति केवल प्रांतीय विधानसभाओं से चुने जाने वाले सदस्यों पर लागू थी; अतः कथन 1 गलत है। सीटों का सांप्रदायिक बँटवारा (साधारण 210, मुस्लिम 78, सिख 4) योजना का अंग था — कथन 2 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (व्यक्ति) (भूमिका) 1. सच्चिदानंद सिन्हा — संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष 2. बी.एन. राव — संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार 3. जी.वी. मावलंकर — संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे (11 दिसंबर 1946)। जी.वी. मावलंकर उस समय पीठासीन होते थे जब सभा विधानमंडल के रूप में बैठती थी — अर्थात् वे “संविधान सभा (विधायी)” के अध्यक्ष थे। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
प्र.3निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए। 1. उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति 2. संविधान सभा की प्रथम बैठक 3. प्रारूप समिति का गठन 4. राष्ट्रीय ध्वज का अंगीकरण कूट:
A2, 1, 4, 3B1, 2, 3, 4C2, 1, 3, 4D1, 2, 4, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 → उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति 22 जनवरी 1947 → राष्ट्रीय ध्वज 22 जुलाई 1947 → प्रारूप समिति 29 अगस्त 1947। अतः क्रम 2, 1, 4, 3 है। ध्यान दें — प्रस्ताव प्रस्तुत 13 दिसंबर 1946 को हुआ था, स्वीकृत 22 जनवरी 1947 को।
3. संविधान सभा की समितियाँ, प्रारूप समिति तथा निर्माण की अवधि एवं व्यय
संविधान सभा ने काम को समितियों में बाँटा — कुछ बड़ी (मूल संवैधानिक प्रश्नों पर),
कुछ प्रक्रियात्मक। परीक्षा में यहीं से सबसे अधिक सुमेलन बनता है, और कुंजी यह है कि
तीन नाम बार-बार लौटते हैं — नेहरू, पटेल एवं राजेंद्र प्रसाद। जो समिति इन तीनों में से किसी की नहीं,
उसे अलग से याद रखिए।
संविधान सभा — डॉ. राजेंद्र प्रसाद (स्थायी अध्यक्ष)
जवाहरलाल नेहरू की तीन समितियाँ
संघ शक्ति समिति— Union Powers Committee : संघ को कौन-सी शक्तियाँ मिलें
संघीय संविधान समिति— Union Constitution Committee : केंद्र का ढाँचा
राज्यों संबंधी समिति— रियासतों से वार्ता हेतु (Committee for Negotiating with States)
सरदार वल्लभभाई पटेल की दो समितियाँ
प्रांतीय संविधान समिति— Provincial Constitution Committee : प्रांतों का ढाँचा
मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक तथा जनजातीय एवं बहिष्कृत क्षेत्र संबंधी परामर्श समिति
मौलिक अधिकार उप-समिति— जे.बी. कृपलानी
अल्पसंख्यक उप-समिति— एच.सी. मुखर्जी
उत्तर-पूर्व सीमांत (असम) जनजातीय एवं बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति— गोपीनाथ बारदोलोई
बहिष्कृत एवं आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति (असम के अतिरिक्त)— ए.वी. ठक्कर
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की तीन समितियाँ
संचालन समिति— Steering Committee
प्रक्रिया नियम समिति— Rules of Procedure Committee (10 दिसंबर 1946)
वित्त एवं स्टाफ़ समिति— तथा राष्ट्रीय ध्वज संबंधी तदर्थ समिति
प्रारूप समिति — डॉ. बी.आर. अंबेडकर— 29 अगस्त 1947, सात सदस्य
अन्य प्रमुख समितियाँ
कार्य-संचालन समिति (Order of Business)— के.एम. मुंशी
संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति— जी.वी. मावलंकर
प्रत्यय-पत्र समिति (Credentials)— अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
आवास समिति (House Committee)— बी. पट्टाभि सीतारमैया
भाषाई प्रांत आयोग (धर आयोग)— एस.के. धर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश
संघ की वित्तीय व्यवस्था संबंधी विशेषज्ञ समिति— नलिनी रंजन सरकार
नागरिकता तथा उच्चतम न्यायालय संबंधी तदर्थ समितियाँ— एस. वरदाचारियर
सुमेलन-तालिका 4 : समिति ↔ अध्यक्ष (यही रूप परीक्षा में आता है)
समिति
अध्यक्ष
संघ शक्ति समिति
जवाहरलाल नेहरू
संघीय संविधान समिति
जवाहरलाल नेहरू
राज्यों संबंधी समिति (रियासतों से वार्ता)
जवाहरलाल नेहरू
प्रांतीय संविधान समिति
सरदार वल्लभभाई पटेल
मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक एवं जनजातीय क्षेत्र परामर्श समिति
सरदार वल्लभभाई पटेल
संचालन समिति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद
प्रक्रिया नियम समिति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद
राष्ट्रीय ध्वज संबंधी तदर्थ समिति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद
प्रारूप समिति
डॉ. बी.आर. अंबेडकर
मौलिक अधिकार उप-समिति
जे.बी. कृपलानी
अल्पसंख्यक उप-समिति
एच.सी. मुखर्जी
उत्तर-पूर्व सीमांत (असम) जनजातीय क्षेत्र उप-समिति
गोपीनाथ बारदोलोई
बहिष्कृत एवं आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति (असम के अतिरिक्त)
ए.वी. ठक्कर
कार्य-संचालन समिति
के.एम. मुंशी
संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति
जी.वी. मावलंकर
प्रत्यय-पत्र समिति
अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
आवास समिति · मुख्य आयुक्त प्रांत संबंधी समिति
बी. पट्टाभि सीतारमैया
भाषाई प्रांत आयोग (धर आयोग, जून 1948)
एस.के. धर
संघ की वित्तीय व्यवस्था संबंधी विशेषज्ञ समिति
नलिनी रंजन सरकार
सावधानी — दो जोड़े जो लगातार उलटे जाते हैं
संघ शक्ति समिति (नेहरू) बनाम प्रांतीय संविधान समिति (पटेल) — “संघ = नेहरू,
प्रांत = पटेल” याद रखें। संघीय संविधान समिति भी नेहरू की ही है।
परामर्श समिति के अध्यक्ष पटेल हैं, किंतु उसके अंतर्गत बनी
मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी हैं। प्रश्न प्रायः “मौलिक अधिकार समिति”
लिखकर पटेल का विकल्प देता है — पढ़ते समय “उप-समिति” शब्द देखिए।
संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद थे, पर प्रारूप समिति के अध्यक्ष अंबेडकर।
3.1 प्रारूप समिति — सात सदस्य
29 अगस्त 1947 को गठित; 30 अगस्त 1947 की प्रथम बैठक में
डॉ. भीमराव अंबेडकर अध्यक्ष चुने गए। सभी समितियों में यही सबसे महत्वपूर्ण रही, क्योंकि
इसी ने बी.एन. राव के प्रारंभिक प्रारूप की समीक्षा कर प्रारूप संविधान तैयार किया।
सुमेलन-तालिका 5 : प्रारूप समिति के सात सदस्य
सदस्य
टिप्पणी
डॉ. बी.आर. अंबेडकर
अध्यक्ष; “भारतीय संविधान के जनक”; तत्कालीन विधि मंत्री
एन. गोपालस्वामी अय्यंगर
पूर्व दीवान, जम्मू-कश्मीर; अनुच्छेद 370 के प्रारूप से जुड़े
अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
प्रत्यय-पत्र समिति तथा प्रारूप संविधान की जाँच हेतु विशेष समिति के भी अध्यक्ष
के.एम. मुंशी
कार्य-संचालन समिति के अध्यक्ष; भाषा-विवाद में “मुंशी-अय्यंगर सूत्र” के सह-प्रवर्तक
सैयद मोहम्मद सादुल्ला
असम के पूर्व प्रधानमंत्री (Premier)
बी.एल. मित्तर → एन. माधव राव
मित्तर ने अस्वस्थता के कारण त्यागपत्र दिया; उनके स्थान पर एन. माधव राव
डी.पी. खेतान → टी.टी. कृष्णमाचारी
खेतान का 1948 में निधन; उनके स्थान पर टी.टी. कृष्णमाचारी
प्रारूप समिति के सात सदस्य“अंबेडकर के आगे — गोपाल, अल्लादी, मुंशी, सादुल्ला, मित्तर, खेतान”
अंबेडकर (अध्यक्ष) · गोपालस्वामी अय्यंगर · अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ·
के.एम. मुंशी · मोहम्मद सादुल्ला · बी.एल. मित्तर · डी.पी. खेतान।
अंतिम दो ही बदले — मित्तर → माधव राव (त्यागपत्र) तथा खेतान → टी.टी. कृष्णमाचारी (निधन)।
परीक्षा का पसंदीदा बिंदु यही अंतिम दो प्रतिस्थापन हैं।
3.2 निर्माण की प्रक्रिया, अवधि एवं व्यय
बी.एन. राव ने अक्टूबर 1947 में प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया; प्रारूप समिति ने उसकी
समीक्षा कर फ़रवरी 1948 में प्रारूप संविधान प्रकाशित किया। जनता, संगठनों एवं
विशेषज्ञों को सुझाव देने हेतु आठ माह दिए गए।
तीन वाचन —प्रथम (सामान्य चर्चा) 4–9 नवंबर 1948; द्वितीय (खंडवार विचार)
15 नवंबर 1948 से 17 अक्टूबर 1949; तृतीय 14–26 नवंबर 1949।
द्वितीय वाचन में 7,635 संशोधन प्रस्तावित हुए, जिनमें से 2,473 पर वास्तव में
चर्चा एवं मतदान हुआ।
26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत हुआ। उस दिन प्रस्तावना सहित
395 अनुच्छेद, 22 भाग तथा 8 अनुसूचियाँ थीं।
24 जनवरी 1950 — अंतिम बैठक; 284 सदस्यों ने संविधान की हस्तलिखित प्रतियों पर
हस्ताक्षर किए; उसी दिन जन गण मन राष्ट्रगान एवं वंदे मातरम् राष्ट्रगीत घोषित हुए और
डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
26 जनवरी 1950 — संविधान प्रवृत्त हुआ। यह तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि
26 जनवरी 1930 को लाहौर अधिवेशन के संकल्प के बाद पहली बार पूर्ण स्वराज्य दिवस
मनाया गया था।
11संविधान सभा के अधिवेशन
165कुल बैठक-दिवस
114केवल प्रारूप संविधान पर विचार के दिन
2 वर्ष 11 माह 18 दिन9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक
₹64 लाखसंविधान-निर्माण पर कुल व्यय
28424 जनवरी 1950 को हस्ताक्षर करने वाले सदस्य
“18 दिन” या “17 दिन”?
पाठ्यपुस्तकों में सर्वाधिक प्रचलित उत्तर 2 वर्ष, 11 माह एवं 18 दिन है और परीक्षा में
सामान्यतः यही कुंजी मानी जाती है। किंतु लोक सभा/राज्य सभा की आधिकारिक वेबसाइट इसे
“दो वर्ष, ग्यारह माह एवं सत्रह दिन” लिखती है — अंतर केवल यह है कि प्रारंभ-तिथि
(9 दिसंबर 1946) को गिनती में जोड़ा जाए या नहीं। यदि विकल्पों में दोनों हों तो
18 दिन चुनें; यदि केवल 17 दिन हो तो वह भी गलत नहीं।
3.3 हस्तलिखित संविधान
मूल संविधान छापा नहीं गया, हाथ से लिखा गया — यह विश्व का सबसे बड़ा हस्तलिखित
संविधान है।
अंग्रेज़ी सुलेख — प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा, जिन्होंने पारिश्रमिक लेने से
इनकार करते हुए केवल यह चाहा कि हर पृष्ठ पर उनका नाम और अंतिम पृष्ठ पर उनके बाबा का नाम भी लिखा जाए।
उन्होंने इसे बहती इटैलिक शैली में लिखा।
हिंदी सुलेख — वसंत कृष्ण वैद्य।
सज्जा एवं चित्रांकन — नंदलाल बोस तथा शांतिनिकेतन (विश्व-भारती) के उनके
शिष्यों ने — प्रत्येक भाग के आरंभ में मोहनजोदड़ो, वैदिक काल, रामायण-महाभारत, बुद्ध, अशोक, गुप्त काल,
अकबर, शिवाजी तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दृश्य बनाए। प्रस्तावना-पृष्ठ की सज्जा बेओहर राममनोहर सिन्हा
ने की।
मूल प्रतियाँ आज संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम-भरित पात्रों में संरक्षित हैं।
अनुच्छेद 394क — हिंदी में प्राधिकृत पाठ का उपबंध — मूल संविधान में नहीं था;
इसे 58वें संविधान संशोधन, 1987 ने जोड़ा।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (समिति) सूची-II (अध्यक्ष) A. प्रांतीय संविधान समिति 1. जवाहरलाल नेहरू B. संघ शक्ति समिति 2. के.एम. मुंशी C. कार्य-संचालन समिति 3. सरदार पटेल D. संचालन समिति 4. डॉ. राजेंद्र प्रसाद कूट:
उत्तर: (D)प्रांतीय संविधान समिति — पटेल; संघ शक्ति समिति — नेहरू; कार्य-संचालन समिति — के.एम. मुंशी; संचालन समिति — राजेंद्र प्रसाद। अतः A-3, B-1, C-2, D-4।
प्र.2प्रारूप समिति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. बी.एल. मित्तर के स्थान पर टी.टी. कृष्णमाचारी को समिति में लिया गया। 2. समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ और उसमें कुल सात सदस्य थे। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अस्वस्थता के कारण त्यागपत्र देने वाले बी.एल. मित्तर के स्थान पर एन. माधव राव आए; टी.टी. कृष्णमाचारी उस रिक्ति पर आए जो 1948 में डी.पी. खेतान के निधन से हुई। अतः कथन 1 गलत है। समिति 29 अगस्त 1947 को बनी और सात सदस्यीय थी — कथन 2 सही है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): संविधान को प्रवृत्त करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनी गई। कारण (R): लाहौर अधिवेशन के संकल्प के बाद 26 जनवरी 1930 को पहली बार पूर्ण स्वराज्य दिवस मनाया गया था। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)दोनों कथन सही हैं और (R) ही (A) का कारण है — इसी स्मृति को जीवित रखने के लिए 26 जनवरी चुनी गई। ध्यान रहे: संविधान अंगीकृत 26 नवंबर 1949 को हुआ और प्रवृत्त 26 जनवरी 1950 को।
4. संविधान के स्रोत — कौन-सा उपबंध किस देश से
डॉ. अंबेडकर ने स्वयं कहा था कि संविधान “विश्व के संविधानों को छानकर” बनाया गया है। आलोचकों ने इसे
“उधार की थैली (bag of borrowings)” कहा, जिस पर अंबेडकर का उत्तर था — संविधान-निर्माण में
मौलिकता की कोई पेटेंट नहीं होती; प्रश्न यह है कि उधार ली गई व्यवस्था भारतीय परिस्थितियों में
ढाली गई या नहीं। ध्यान रहे — सबसे बड़ा एकल स्रोत कोई विदेशी संविधान नहीं, बल्कि
भारत शासन अधिनियम, 1935 है — संविधान का प्रशासनिक ढाँचा बड़ी सीमा तक उसी की पुनर्रचना है।
सुमेलन-तालिका 6 : स्रोत-देश ↔ लिए गए उपबंध
स्रोत
ग्रहण किए गए उपबंध
भारत शासन अधिनियम, 1935
संघीय योजना; राज्यपाल का पद; न्यायपालिका; लोक सेवा आयोग; आपातकालीन उपबंध; समस्त प्रशासनिक विवरण
ब्रिटेन
संसदीय शासन; विधि का शासन; विधायी प्रक्रिया; एकल नागरिकता; मंत्रिमंडल प्रणाली; परमादेश आदि रिट; संसदीय विशेषाधिकार; द्विसदनीयता
संयुक्त राज्य अमेरिका
मौलिक अधिकार; न्यायपालिका की स्वतंत्रता; न्यायिक पुनर्विलोकन; राष्ट्रपति पर महाभियोग; उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना; उपराष्ट्रपति का पद; प्रस्तावना का “हम, भारत के लोग” रूप
आयरलैंड
राज्य के नीति-निदेशक तत्व; राज्य सभा में मनोनयन; राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति
कनाडा
सशक्त केंद्र वाला संघ; अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र में; राज्यपालों की केंद्र द्वारा नियुक्ति; उच्चतम न्यायालय की परामर्शदात्री अधिकारिता (अनु. 143)
ऑस्ट्रेलिया
समवर्ती सूची; व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता (अनु. 301); संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनु. 108)
जर्मनी (वाइमर संविधान)
आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन
सोवियत संघ (तत्कालीन USSR)
मौलिक कर्तव्य; प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय का आदर्श
फ़्रांस
गणतंत्र; प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता एवं बंधुता के आदर्श
दक्षिण अफ़्रीका
संविधान संशोधन की प्रक्रिया; राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन
जापान
“विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (procedure established by law) — अनुच्छेद 21 की मूल भाषा
दस स्रोत — एक-एक शब्द में“संसद ब्रिटेन, अधिकार अमेरिका · निदेशक आयरलैंड, केंद्र कनाडा · समवर्ती ऑस्ट्रेलिया, आपात जर्मनी · कर्तव्य सोवियत, गणतंत्र फ़्रांस · संशोधन अफ़्रीका, प्रक्रिया जापान”
दस युग्मों की यह लय एक बार बोलकर याद कर लीजिए — परीक्षा में सुमेलन इसी रूप में आता है।
संसद = संसदीय शासन, विधि का शासन, एकल नागरिकता, रिट, विशेषाधिकार (ब्रिटेन)।
अधिकार = मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, उपराष्ट्रपति, महाभियोग (अमेरिका)।
निदेशक = नीति-निदेशक तत्व, राज्य सभा में मनोनयन, राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति (आयरलैंड)।
केंद्र = सशक्त केंद्र वाला संघ, अवशिष्ट शक्तियाँ, राज्यपाल की नियुक्ति, अनु. 143 (कनाडा)।
समवर्ती = समवर्ती सूची, अनु. 301, संयुक्त बैठक अनु. 108 (ऑस्ट्रेलिया)।
आपात = आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन (वाइमर जर्मनी)।
कर्तव्य = मौलिक कर्तव्य तथा न्याय का आदर्श (सोवियत संघ)।
गणतंत्र = गणराज्य तथा स्वतंत्रता-समता-बंधुता (फ़्रांस)।
संशोधन = संशोधन-प्रक्रिया तथा राज्य सभा सदस्यों का निर्वाचन (दक्षिण अफ़्रीका)।
प्रक्रिया = “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (जापान)।
इन दस के ऊपर ग्यारहवाँ एवं सबसे बड़ा स्रोत — भारत शासन अधिनियम, 1935, जिससे संपूर्ण
प्रशासनिक ढाँचा आया।
सावधानी — चार जोड़े जो सबसे अधिक उलझाते हैं
अमेरिका बनाम जापान — अमेरिका से न्यायिक पुनर्विलोकन एवं मौलिक अधिकार;
जापान से “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया”। अमेरिकी “विधि की सम्यक् प्रक्रिया (due process of law)”
भारत ने नहीं अपनाई — यद्यपि मेनका गांधी (1978) के बाद न्यायालय ने व्यवहारतः वही अर्थ निकाल लिया।
कनाडा बनाम ऑस्ट्रेलिया — कनाडा से अवशिष्ट शक्तियाँ एवं सशक्त केंद्र;
ऑस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची एवं संयुक्त बैठक। “सूची” सुनते ही ऑस्ट्रेलिया याद कीजिए।
आयरलैंड बनाम सोवियत संघ — आयरलैंड से नीति-निदेशक तत्व;
सोवियत संघ से मौलिक कर्तव्य। दोनों ही “कर्तव्य-जैसे” लगते हैं, पर स्रोत भिन्न हैं।
फ़्रांस बनाम अमेरिका (प्रस्तावना) — “हम, भारत के लोग” का प्रारूप अमेरिका से;
“स्वतंत्रता, समता, बंधुता” का त्रयी-आदर्श फ़्रांस की क्रांति से; “न्याय — सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक”
सोवियत संघ से।
“संयुक्त बैठक” का जाल — संयुक्त बैठक का उपबंध अनुच्छेद 108 है
(अनुच्छेद 109 नहीं — वह धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया है), और यह ऑस्ट्रेलिया से लिया गया।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (उपबंध) सूची-II (स्रोत-देश) A. समवर्ती सूची 1. आयरलैंड B. नीति-निदेशक तत्व 2. कनाडा C. अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र में 3. ऑस्ट्रेलिया D. संविधान संशोधन की प्रक्रिया 4. दक्षिण अफ़्रीका कूट:
उत्तर: (C)समवर्ती सूची — ऑस्ट्रेलिया; नीति-निदेशक तत्व — आयरलैंड; अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र में — कनाडा; संशोधन की प्रक्रिया — दक्षिण अफ़्रीका। अतः A-3, B-1, C-2, D-4।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (उपबंध) (स्रोत) 1. उपराष्ट्रपति का पद — संयुक्त राज्य अमेरिका 2. मौलिक कर्तव्य — आयरलैंड 3. आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन — जर्मनी का वाइमर संविधान नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)मौलिक कर्तव्य सोवियत संघ से लिए गए हैं, आयरलैंड से नहीं — आयरलैंड से नीति-निदेशक तत्व, राज्य सभा में मनोनयन तथा राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति ली गई। शेष दोनों युग्म सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारतीय संविधान ने अमेरिकी “विधि की सम्यक् प्रक्रिया” के स्थान पर “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” पदावली अपनाई। कारण (R): यह पदावली जापान के संविधान से ली गई है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)दोनों कथन सही हैं — पदावली जापान से आई। किंतु (R) यह नहीं बताता कि क्यों सम्यक् प्रक्रिया को छोड़ा गया; वह कारण बी.एन. राव की न्यायमूर्ति फ़्रैंकफ़र्टर से हुई चर्चा तथा न्यायिक अति-हस्तक्षेप की आशंका थी। अतः (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
प्रस्तावना संविधान का परिचय-पत्र है। के.एम. मुंशी ने इसे “हमारे प्रभुत्व-सम्पन्न
लोकतांत्रिक गणराज्य की जन्मपत्री” कहा; सर अर्नेस्ट बार्कर ने इसे संविधान की “कुंजी-टिप्पणी
(keynote)” माना और अपनी पुस्तक Principles of Social and Political Theory के आरंभ में इसे उद्धृत किया;
ठाकुरदास भार्गव ने इसे “संविधान की आत्मा … संविधान का सबसे मूल्यवान अंग” बताया।
प्रस्तावना का पाठ — “हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न,
समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को —
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की
स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई.
(मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हज़ार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
आधिकारिक हिंदी पाठ में शब्द “पंथनिरपेक्ष” है — “धर्मनिरपेक्ष” नहीं। अंग्रेज़ी पाठ में
Secular।
प्रस्तावना में तिथि 26 नवंबर 1949 अंकित है — 26 जनवरी 1950 नहीं।
यह सबसे सामान्य त्रुटि है।
5.1 चार अंग, चार शब्द, चार आदर्श
प्रस्तावना को चार भागों में पढ़िए — (1) शक्ति का स्रोत (“हम, भारत के लोग”),
(2) राज्य का स्वरूप (पाँच विशेषण), (3) उद्देश्य (न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता),
(4) अंगीकरण की तिथि।
राज्य का स्वरूप — पाँच शब्द, इसी क्रम में“संप समा पंथ लोक गण”
संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न (Sovereign) → समाजवादी (Socialist) →
पंथनिरपेक्ष (Secular) → लोकतंत्रात्मक (Democratic) → गणराज्य (Republic)।
बीच के दो — समाजवादी एवं पंथनिरपेक्ष — ही 42वें संशोधन से जुड़े; शेष तीन मूल हैं।
चार उद्देश्य — इसी क्रम में“न्याय स्व-समता बंधु”
न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक — रूसी क्रांति से) → स्वतंत्रता
(विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना — पाँच) → समता (प्रतिष्ठा एवं अवसर की) →
बंधुता (व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करने वाली)।
अंतिम तीन — स्वतंत्रता, समता, बंधुता — फ़्रांसीसी क्रांति से।
सुमेलन-तालिका 7 : प्रस्तावना का शब्द ↔ उसका संवैधानिक अर्थ
शब्द
अर्थ
संविधान में कहाँ मूर्त होता है
संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न
भारत न भीतर किसी के अधीन है, न बाहर किसी के; राष्ट्रमंडल की सदस्यता या संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता इस पर आँच नहीं आने देती
अनु. 1; अनु. 53 एवं 154 (कार्यपालिका शक्ति); विदेशी राज्यक्षेत्र अर्जित करने की शक्ति
समाजवादी
भारतीय समाजवाद — “लोकतांत्रिक समाजवाद”, जिसमें सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्र रहते हैं; उत्पादन के साधनों का पूर्ण राष्ट्रीयकरण नहीं
भाग IV के अनु. 38, 39, 39क, 43 आदि
पंथनिरपेक्ष
राज्य का कोई धर्म नहीं; सभी धर्म समान रूप से संरक्षित — “सर्व धर्म समभाव”, न कि धर्म-विरोध
अनु. 14, 15, 16, 25–28; अनु. 44; अनु. 325
लोकतंत्रात्मक
केवल राजनीतिक नहीं — सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र भी; अंबेडकर की चेतावनी कि आर्थिक असमानता राजनीतिक लोकतंत्र को उड़ा सकती है
राज्य का प्रमुख निर्वाचित हो, वंशानुगत नहीं; पद सभी नागरिकों के लिए खुला
अनु. 52–62 (राष्ट्रपति का निर्वाचन)
बंधुता
भाईचारा — जो व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करे
एकल नागरिकता; अनु. 51क(ङ) एवं (ञ); अनु. 1 की “अखंडता”
5.2 42वाँ संविधान संशोधन, 1976 — प्रस्तावना में एकमात्र संशोधन
आज तक प्रस्तावना केवल एक बार संशोधित हुई है — 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976
द्वारा, जो 3 जनवरी 1977 से प्रभावी हुआ। इसने तीन शब्द जोड़े —
“समाजवादी” (Socialist) तथा “पंथनिरपेक्ष” (Secular) —
“प्रभुत्व-सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य” के स्थान पर “प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष
लोकतंत्रात्मक गणराज्य” किया गया;
“अखंडता” (Integrity) — “राष्ट्र की एकता” के स्थान पर “राष्ट्र की एकता और अखंडता”।
सावधानी — 42वाँ बनाम 44वाँ संशोधन
42वाँ संशोधन, 1976 · “लघु संविधान”
प्रस्तावना में तीन शब्द — समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता
भाग IV-क तथा दस मौलिक कर्तव्य (अनु. 51क)
नीति-निदेशक तत्वों में अनु. 39क, 43क, 48क
अनु. 368 में खंड (4) एवं (5) — संशोधन न्यायालय में चुनौती-रहित घोषित
लोक सभा एवं विधानसभाओं का कार्यकाल 5 → 6 वर्ष
राज्य सूची के पाँच विषय समवर्ती सूची में — शिक्षा, वन, नाप-तौल, वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण, न्याय-प्रशासन
भाग XIV-क — अधिकरण (अनु. 323क, 323ख); अनु. 31घ जोड़ा
स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुतियों पर आधारित; आपातकाल के दौरान पारित
44वाँ संशोधन, 1978 · “प्रति-संशोधन”
प्रस्तावना को छुआ ही नहीं — यही सबसे बड़ा जाल
संपत्ति का अधिकार भाग III से हटाकर अनु. 300क — विधिक अधिकार
लोक सभा एवं विधानसभाओं का कार्यकाल 6 → 5 वर्ष (पुनर्स्थापित)
अनु. 352 में “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह”
राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए मंत्रिमंडल की लिखित सिफ़ारिश अनिवार्य
अनु. 20 एवं 21 आपातकाल में भी निलंबित नहीं
अनु. 31घ का निरसन 43वें संशोधन, 1977 ने किया था — 44वें ने नहीं
जनता सरकार के काल में, मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में
एक पंक्ति में कुंजी — प्रस्तावना से जुड़ा कोई भी प्रश्न हो, उत्तर सदैव
42वाँ संशोधन, 1976 है। 44वाँ संशोधन प्रस्तावना पर लागू ही नहीं होता।
और 42वें संशोधन के अनुच्छेद 368(4)–(5) को मिनर्वा मिल्स (1980) ने अपास्त कर दिया,
यद्यपि वे आज भी संविधान के मुद्रित पाठ में पाद-टिप्पणी सहित दिखाई देते हैं।
5.3 न्यायिक व्याख्या — बेरुबाड़ी से केशवानंद तक
1960बेरुबाड़ी संघ मामला (In re Berubari Union) — अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति के निर्देश पर आठ न्यायाधीशों की राय, 14 मार्च 1960। दो निर्णायक बातें — (क) प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं; वह “निर्माताओं के मस्तिष्क की कुंजी” अवश्य है, पर शक्ति का स्रोत या शक्ति पर निर्बंधन नहीं; (ख) भारतीय राज्यक्षेत्र किसी विदेशी राज्य को देना अनुच्छेद 3 से संभव नहीं — उसके लिए अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन चाहिए
1973केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (24 अप्रैल 1973, 13 न्यायाधीश, 7:6) — बेरुबाड़ी उलटा: प्रस्तावना संविधान का अंग है, क्योंकि वह संविधान सभा द्वारा उसी प्रक्रिया से, सबसे अंत में, संविधान के भाग के रूप में स्वीकृत हुई थी; साथ ही वह अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधनीय है, पर मूल ढाँचे को नष्ट किए बिना
197642वाँ संशोधन — केशवानंद के इसी सिद्धांत के बल पर प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े गए। यदि प्रस्तावना संशोधनीय न होती, तो यह संशोधन संभव ही न था
1995भारत संघ बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC of India) — पुनः पुष्टि कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है
प्रस्तावना वाद-योग्य (justiciable) नहीं है — इसके आधार पर सीधे न्यायालय नहीं जाया जा सकता;
यह न तो विधायिका को शक्ति देती है, न उस पर निर्बंधन लगाती है।
किंतु जहाँ संविधान की कोई पदावली अस्पष्ट हो, वहाँ न्यायालय प्रस्तावना का सहारा
व्याख्या के लिए लेते हैं — यही उसकी वास्तविक विधिक उपयोगिता है।
प्रस्तावना संशोधनीय है, पर उसके “मूल ढाँचे” वाले तत्व (लोकतांत्रिक गणराज्य, पंथनिरपेक्षता,
संप्रभुता) नष्ट नहीं किए जा सकते।
प्रस्तावना संविधान का सबसे अंत में स्वीकृत अंग थी — उस पर चर्चा 17 अक्टूबर 1949 को हुई,
शेष संविधान पर निर्णय हो चुकने के बाद। अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद का तर्क था कि प्रस्तावना
शेष संविधान के अनुरूप होनी चाहिए, इसलिए उसे अंत में लिया जाए।
17 अक्टूबर 1949 को एच.वी. कामथ का यह संशोधन कि प्रस्तावना “ईश्वर के नाम पर” से आरंभ हो,
41 बनाम 68 मतों से अस्वीकृत हुआ — संविधान सभा का मत था कि आस्था व्यक्ति का विषय है,
राज्य का नहीं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारतीय संविधान की प्रस्तावना के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. प्रस्तावना में अंकित तिथि 26 जनवरी 1950 है। 2. 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा प्रस्तावना में “अखंडता” शब्द जोड़ा गया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)प्रस्तावना में अंकित तिथि 26 नवंबर 1949 है (अंगीकरण की तिथि), 26 जनवरी 1950 नहीं — कथन 1 गलत। “अखंडता” सहित तीनों शब्द 42वें संशोधन, 1976 ने जोड़े; 44वें संशोधन ने प्रस्तावना को छुआ ही नहीं — कथन 2 भी गलत।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में संशोधन किया जा सका। कारण (R): बेरुबाड़ी संघ मामले (1960) में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)दोनों कथन तथ्यतः सही हैं, किंतु (R) कारण नहीं है — बल्कि उलटा है। 42वाँ संशोधन इसलिए संभव हुआ क्योंकि केशवानंद भारती (1973) ने बेरुबाड़ी को उलटते हुए प्रस्तावना को संविधान का अंग तथा अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधनीय घोषित किया था।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (प्रस्तावना का आदर्श) (प्रेरणा-स्रोत) 1. स्वतंत्रता, समता, बंधुता — फ़्रांसीसी क्रांति 2. सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय — रूसी क्रांति 3. “हम, भारत के लोग” का प्रारूप — आयरिश संविधान नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)“We the People” का प्रारूप अमेरिकी संविधान से लिया गया है, आयरिश से नहीं — आयरलैंड से नीति-निदेशक तत्व आए। शेष दोनों युग्म सही हैं।
6. संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
6.1 विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान
ब्रिटेन का संविधान अलिखित है, अमेरिका का लिखित पर अत्यंत संक्षिप्त (7 अनुच्छेद)। भारत का संविधान
लिखित भी है और विश्व का सबसे विस्तृत भी। इसके चार कारण हैं —
(1) देश का विशाल भौगोलिक एवं सामाजिक विस्तार; (2) केंद्र तथा राज्य — दोनों का
संविधान एक ही दस्तावेज़ में (जम्मू-कश्मीर का अपवाद 2019 तक); (3) भारत शासन अधिनियम, 1935
से लिया गया विस्तृत प्रशासनिक विवरण; (4) अनुसूचित जाति-जनजाति, अल्पसंख्यक, आंग्ल-भारतीय
जैसे वर्गों के लिए विशेष उपबंध।
395मूल संविधान में अनुच्छेद
22मूल भाग
8मूल अनुसूचियाँ
25वर्तमान भाग
12वर्तमान अनुसूचियाँ
106अब तक पारित संविधान संशोधन
सावधानी — “आज कितने अनुच्छेद हैं?”
मूल संख्याएँ निर्विवाद हैं — 395 अनुच्छेद, 22 भाग, 8 अनुसूचियाँ।
वर्तमान संख्या विवादित है, क्योंकि संशोधनों ने नए अनुच्छेद “क, ख, ग” उपांतरों के साथ
जोड़े (जैसे 21क, 31ग, 239कक, 243झ, 371ञ) और कुछ अनुच्छेद निरसित कर दिए। इसीलिए अंतिम अनुच्छेद की
संख्या आज भी 395 ही है, जबकि वास्तव में प्रवृत्त अनुच्छेद लगभग 450 हैं —
गणना की पद्धति के अनुसार पुस्तकों में यह आँकड़ा 448 से 470 के बीच मिलता है। परीक्षा में
सुरक्षित एवं निर्विवाद उत्तर हैं — मूल में 395, भाग आज 25, अनुसूचियाँ आज 12।
निरसित पूरा भाग — भाग VII (7वें संशोधन, 1956 द्वारा), जिसमें भाग-ख राज्यों के उपबंध थे।
6.2 कठोरता एवं लचीलापन का संयोजन
अमेरिकी संविधान कठोर है, ब्रिटिश लचीला। भारतीय संविधान दोनों है — कुछ उपबंध संसद के
साधारण बहुमत से बदल जाते हैं, कुछ के लिए विशेष बहुमत चाहिए, और कुछ के लिए आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी।
यह त्रि-स्तरीय व्यवस्था अनुच्छेद 368 में है (विस्तार खंड 9 में)।
6.3 संघीय ढाँचा, एकात्मक झुकाव के साथ
संविधान में “संघ (Federation)” शब्द कहीं नहीं आता। अनुच्छेद 1 कहता है — भारत
“राज्यों का संघ (Union of States)” होगा। अंबेडकर ने इसका कारण बताया:
(क) भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते (agreement) का परिणाम नहीं है; और
(ख) किसी राज्य को संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं है।
के.सी. व्हीयर ने इसे “अर्ध-संघीय (quasi-federal)” कहा; ग्रेनविल ऑस्टिन ने
“सहकारी संघवाद (cooperative federalism)”; कुछ विद्वान इसे
“रूप में संघीय, आत्मा में एकात्मक” कहते हैं।
संघीय लक्षण
दोहरी राजव्यवस्था — केंद्र एवं राज्य
लिखित संविधान तथा उसकी सर्वोच्चता
शक्तियों का विभाजन — सातवीं अनुसूची की तीन सूचियाँ
कठोर संविधान — संघीय उपबंधों में राज्यों का अनुसमर्थन
स्वतंत्र न्यायपालिका तथा केंद्र-राज्य विवादों का न्यायनिर्णयन
द्विसदनीयता — राज्य सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व
एकात्मक लक्षण
सशक्त केंद्र — संघ सूची सबसे बड़ी; समवर्ती विषय पर केंद्र की प्रधानता
राज्यों का अविनाशी न होना — अनु. 3 से संसद राज्य का नाम, क्षेत्र, सीमा बदल सकती है
एकल संविधान तथा एकल नागरिकता
एकीकृत न्यायपालिका — एक ही पदानुक्रम, शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय
अखिल भारतीय सेवाएँ (अनु. 312) — IAS, IPS, IFoS
राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा; आपातकालीन उपबंध; एकीकृत निर्वाचन आयोग एवं CAG
6.4 संसदीय शासन-प्रणाली
भारत ने अमेरिकी अध्यक्षात्मक नहीं, ब्रिटिश संसदीय (वेस्टमिंस्टर) प्रणाली चुनी —
क्योंकि, अंबेडकर के शब्दों में, इसमें “दैनिक उत्तरदायित्व” अधिक है, यद्यपि स्थिरता कम।
इसके लक्षण — नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका (राष्ट्रपति/राज्यपाल बनाम मंत्रिपरिषद),
बहुमत दल का शासन, सामूहिक उत्तरदायित्व (अनु. 75(3), 164(2)),
मंत्रियों की विधानमंडल-सदस्यता, प्रधानमंत्री का नेतृत्व तथा
निचले सदन का विघटन। किंतु एक निर्णायक अंतर है — ब्रिटेन में संसदीय संप्रभुता है,
भारत में संविधान की सर्वोच्चता। भारतीय संसद संविधान की संतान है, उसकी जननी नहीं।
6.5 पंथनिरपेक्ष राज्य
भारतीय पंथनिरपेक्षता पश्चिमी “धर्म एवं राज्य की दीवार” वाली नहीं, बल्कि
“सर्व धर्म समभाव” वाली है — राज्य किसी धर्म को राजधर्म नहीं बनाता, पर धार्मिक संस्थाओं के
सामाजिक सुधार में हस्तक्षेप कर सकता है (जैसे अनु. 25(2)(ख) — हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए
खोलना)। यह अनुच्छेद 14, 15, 16, 25–28, 44 एवं 325 में मूर्त होती है।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में उच्चतम न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को संविधान के
मूल ढाँचे का अंग घोषित किया।
6.6 अन्य निर्णायक विशेषताएँ
सुमेलन-तालिका 8 : विशेषता ↔ संबंधित अनुच्छेद/स्रोत
विशेषता
कहाँ
टिप्पणी
एकल नागरिकता
अनु. 5–11
ब्रिटेन से; अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं स्विट्ज़रलैंड में दोहरी नागरिकता है
सार्वभौम वयस्क मताधिकार
अनु. 326
1989 के 61वें संशोधन से मताधिकार की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष
एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका
भाग V अध्याय IV, भाग VI अध्याय V
अमेरिका से भिन्न — वहाँ संघीय एवं राज्य न्यायालय अलग हैं
संविधान के बारे में प्रसिद्ध कथन — आइवर जेनिंग्स: “वकीलों का स्वर्ग
(lawyer’s paradise)” · के.सी. व्हीयर: “अर्ध-संघीय” · सर आइवर जेनिंग्स: “सबसे लंबा एवं
सबसे विस्तृत” · अंबेडकर (अनु. 32 पर): “संविधान का हृदय एवं आत्मा” ·
ग्रेनविल ऑस्टिन (भाग III + IV पर): “संविधान की अंतरात्मा”।
अंबेडकर की चेतावनी (25 नवंबर 1949) — संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले
बुरे हों तो वह बुरा सिद्ध होगा; और उन्होंने “भक्ति या नायक-पूजा” को भारतीय लोकतंत्र के लिए
निश्चित ख़तरा बताया।
संविधान न तो पूर्णतः ब्रिटिश “संसदीय संप्रभुता” अपनाता है, न पूर्णतः अमेरिकी “न्यायिक सर्वोच्चता” —
वह बीच का संश्लेषण है, जिसका माध्यम है “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” तथा
“युक्तियुक्त निर्बंधन”।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संविधान में “संघ (Federation)” शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है। 2. अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत राज्यों का संघ (Union of States) है, और किसी राज्य को संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)दोनों कथन सही हैं। अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि “Union” शब्द इसलिए चुना गया क्योंकि भारतीय संघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है और कोई राज्य इससे अलग नहीं हो सकता।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (विशेषता) (संबंधित संशोधन) 1. पंचायत एवं नगरपालिका — 73वाँ एवं 74वाँ संशोधन, 1992 2. मताधिकार की आयु 21 से 18 वर्ष — 61वाँ संशोधन, 1989 3. सहकारी समितियाँ (भाग IX-ख) — 86वाँ संशोधन, 2002 नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)भाग IX-ख (सहकारी समितियाँ) 97वें संशोधन, 2011 द्वारा जोड़ा गया, जो 15 फ़रवरी 2012 से प्रवृत्त हुआ; 86वाँ संशोधन (2002) शिक्षा का अधिकार — अनुच्छेद 21क — से संबंधित है। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। कारण (R): इसमें केंद्र तथा राज्यों — दोनों का संविधान एक ही दस्तावेज़ में समाहित है और भारत शासन अधिनियम, 1935 से विस्तृत प्रशासनिक विवरण लिया गया है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)दोनों सही हैं और (R) ही (A) का कारण है। अमेरिकी संविधान में राज्यों के अपने-अपने संविधान हैं, इसलिए संघीय संविधान छोटा रह जाता है; भारत में दोनों एक साथ हैं (2019 तक जम्मू-कश्मीर अपवाद था)।
7. संघ एवं उसका राज्यक्षेत्र — अनुच्छेद 1 से 4 तथा राज्यों का पुनर्गठन
संविधान का भाग I केवल चार अनुच्छेदों का है, पर परीक्षा में इनका भार बहुत अधिक है —
क्योंकि यहीं वह शक्ति है जिससे भारत का नक़्शा बदलता है।
सुमेलन-तालिका 9 : भाग I के चार अनुच्छेद
अनुच्छेद
विषय
निर्णायक बिंदु
अनु. 1
संघ का नाम एवं राज्यक्षेत्र
“इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा”। भारत का राज्यक्षेत्र = (क) राज्यों के राज्यक्षेत्र + (ख) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघ राज्यक्षेत्र + (ग) ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएँ
अनु. 2
नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना
संसद विधि द्वारा संघ में नए राज्यों को सम्मिलित (admit) कर सकती है या नए राज्य स्थापित (establish) कर सकती है — “ऐसे निबंधनों एवं शर्तों पर जो वह ठीक समझे”। यह भारत के बाहर के राज्यक्षेत्र से संबंधित है
अनु. 3
नए राज्यों का निर्माण तथा वर्तमान राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन
संसद विधि द्वारा — (क) किसी राज्य से क्षेत्र अलग कर, या दो/अधिक राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है; (ख) क्षेत्र बढ़ा सकती है; (ग) घटा सकती है; (घ) सीमाएँ बदल सकती है; (ङ)नाम बदल सकती है। यह भारत के भीतर का पुनर्गठन है
अनु. 4
अनु. 2 एवं 3 के अधीन बनी विधियों में पहली एवं चौथी अनुसूची का संशोधन
ऐसी विधि पहली अनुसूची (राज्य एवं संघ राज्यक्षेत्र) तथा चौथी अनुसूची (राज्य सभा में सीटों का आवंटन) में परिवर्तन कर सकती है, और अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए वह “संविधान संशोधन” नहीं मानी जाएगी — अर्थात् साधारण बहुमत पर्याप्त है
सावधानी — अनुच्छेद 2 बनाम अनुच्छेद 3 (यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला भेद है)
अनुच्छेद 2 · प्रवेश या स्थापना
भारत के बाहर के राज्यक्षेत्र से संबंधित — जो अभी संघ का अंग नहीं है
शब्द — “सम्मिलित करना (admit)” तथा “स्थापित करना (establish)”
राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश आवश्यक नहीं
किसी राज्य विधानमंडल के मत की आवश्यकता नहीं — स्वाभाविक है, क्योंकि क्षेत्र किसी भारतीय राज्य का है ही नहीं
उदाहरण — सिक्किम (1975), पुदुचेरी (पूर्व फ़्रांसीसी बस्तियाँ), गोवा, दमण एवं दीव (पूर्व पुर्तगाली क्षेत्र)
अनुच्छेद 3 · निर्माण एवं परिवर्तन
भारत के भीतर — वर्तमान राज्यों का पुनर्गठन
शब्द — “निर्माण (form)”, “बढ़ाना/घटाना”, “सीमा बदलना”, “नाम बदलना”
विधेयक केवल राष्ट्रपति की सिफ़ारिश पर प्रस्तुत हो सकता है
राष्ट्रपति विधेयक को संबंधित राज्य विधानमंडल को उसके मत के लिए भेजेंगे — किंतु वह मत बाध्यकारी नहीं; राष्ट्रपति उसे मानने को बाध्य नहीं, और नियत अवधि बीत जाने पर आगे बढ़ा जा सकता है
स्पष्टीकरण I एवं II (18वाँ संशोधन, 1966) — खंड (क) से (ङ) में “राज्य” में संघ राज्यक्षेत्र सम्मिलित है, किंतु परंतुक में नहीं; तथा संसद किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र के भाग को जोड़कर नया राज्य या संघ राज्यक्षेत्र बना सकती है
एक वाक्य में —बाहर से भीतर लाना = अनुच्छेद 2; भीतर का नक़्शा बदलना = अनुच्छेद 3।
दोनों ही दशाओं में विधि साधारण बहुमत से पारित होती है (अनुच्छेद 4 के कारण) —
यह तीसरा बिंदु प्रायः प्रश्न का उत्तर होता है।
1. राष्ट्रपति की सिफ़ारिशअनु. 3 का विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश से प्रस्तुत हो सकता है
→
2. राज्य विधानमंडल को निर्देशयदि विधेयक किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति उसे उस राज्य के विधानमंडल के पास मत व्यक्त करने हेतु भेजेंगे, नियत अवधि के भीतर
→
3. मत बाध्यकारी नहींराज्य चाहे विरोध करे, चाहे चुप रहे — अवधि बीतते ही संसद आगे बढ़ सकती है (बाबूलाल पराते बनाम बंबई राज्य, 1960)
→
4. साधारण बहुमत से पारितअनुच्छेद 4 के कारण यह विधि संविधान संशोधन नहीं मानी जाती — न विशेष बहुमत चाहिए, न राज्यों का अनुसमर्थन
परीक्षा-दृष्टि — “राज्यक्षेत्र का अर्जन एवं अध्यर्पण”
अर्जन (acquisition) — भारत नया राज्यक्षेत्र अनुच्छेद 1(3)(ग) के अधीन अर्जित कर
सकता है; इसके लिए कोई संविधान संशोधन आवश्यक नहीं, क्योंकि यह प्रत्येक प्रभुसत्ता-सम्पन्न राज्य का
अंतर्निहित अधिकार है।
अध्यर्पण (cession) — किसी विदेशी राज्य को भारतीय राज्यक्षेत्र देनाअनुच्छेद 3 से संभव नहीं; उसके लिए अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन चाहिए।
यही बेरुबाड़ी संघ मामले (1960) की मुख्य व्यवस्था है, जिसके कारण
9वाँ संविधान संशोधन, 1960 पारित करना पड़ा।
अपवाद —मगनभाई ईश्वरभाई पटेल बनाम भारत संघ (1969) में न्यायालय ने कहा कि यदि
मामला केवल सीमा-विवाद का निपटारा है (अर्थात् यह तय करना कि सीमा वास्तव में कहाँ है),
तो वह अध्यर्पण नहीं है और उसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक नहीं — कार्यपालिका का करार पर्याप्त है।
नवीनतम उदाहरण —100वाँ संविधान संशोधन, 2015 — बांग्लादेश के साथ
भूमि सीमा समझौते (Land Boundary Agreement) को लागू करने हेतु; असम, पश्चिम बंगाल,
मेघालय एवं त्रिपुरा से संबंधित परिक्षेत्रों (enclaves) का आदान-प्रदान; पहली अनुसूची में संशोधन।
7.1 राज्यों का पुनर्गठन — 1950 से आज तक
1950 में पहली अनुसूची में राज्यों का चार-स्तरीय वर्गीकरण था — यह ब्रिटिश प्रांतों एवं
देशी रियासतों के विलय की विरासत थी।
सुमेलन-तालिका 10 : मूल पहली अनुसूची का चार-स्तरीय वर्गीकरण (1950)
श्रेणी
संख्या
क्या थे
प्रमुख उदाहरण
भाग-क (Part A)
9
पूर्ववर्ती ब्रिटिश गवर्नरी प्रांत — राज्यपाल एवं निर्वाचित विधानमंडल
असम, बिहार, बंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, संयुक्त प्रांत, पश्चिम बंगाल
भाग-ख (Part B)
9
पूर्ववर्ती देशी रियासतें/संघ — राजप्रमुख एवं विधानमंडल
हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ (PEPSU), राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर-कोचीन, विंध्य प्रदेश
भाग-ग (Part C)
10
पूर्ववर्ती मुख्य आयुक्त प्रांत एवं कुछ रियासतें — राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त मुख्य आयुक्त/उपराज्यपाल
जून 1948धर आयोग (भाषाई प्रांत आयोग) — अध्यक्ष एस.के. धर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश। रिपोर्ट 10 दिसंबर 1948 — राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा के आधार पर हो
दिसंबर 1948कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में JVP समिति — जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया। अप्रैल 1949 की रिपोर्ट में भाषाई आधार को अस्वीकार, पर आंध्र के लिए द्वार खुला छोड़ा
1 अक्टूबर 1953आंध्र राज्य — भाषा के आधार पर बना पहला राज्य; मद्रास से अलग। पृष्ठभूमि — पोट्टी श्रीरामुलु का 58 दिन का आमरण अनशन (19 अक्टूबर 1952 से) एवं 15–16 दिसंबर 1952 की मध्यरात्रि में निधन; राजधानी कर्नूल
दिसंबर 1953राज्य पुनर्गठन आयोग (फ़ज़ल अली आयोग) — सैयद फ़ज़ल अली (अध्यक्ष), के.एम. पणिक्कर, एच.एन. कुंज़रू। रिपोर्ट सितंबर 1955 — भाषा को आधार तो माना, पर “एक भाषा एक राज्य” को अस्वीकार; चार-स्तरीय वर्गीकरण समाप्त करने की सिफ़ारिश
1 नवंबर 1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 + 7वाँ संविधान संशोधन — भाग क/ख/ग/घ का वर्गीकरण समाप्त; 14 राज्य एवं 6 संघ राज्यक्षेत्र; भाग VII निरसित; केरल, कर्नाटक (तब मैसूर), मध्य प्रदेश एवं आंध्र प्रदेश का वर्तमान स्वरूप
1 मई 1960बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 — बंबई राज्य से महाराष्ट्र एवं गुजरात
1 दिसंबर 1963नागालैंड — नागालैंड राज्य अधिनियम, 1962 के अधीन असम से
1 नवंबर 1966पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 — हरियाणा राज्य; चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र; पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में
25 जनवरी 1971हिमाचल प्रदेश — संघ राज्यक्षेत्र से पूर्ण राज्य
21 जनवरी 1972उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 — मणिपुर, त्रिपुरा एवं मेघालय पूर्ण राज्य; मिज़ोरम एवं अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र बने
1975सिक्किम — 35वें संशोधन, 1974 से “सहयुक्त राज्य (associate state)” (अनु. 2क); फिर 36वें संशोधन, 1975 से पूर्ण राज्य (16 मई 1975); अनुच्छेद 2क निरसित, अनु. 371च जोड़ा गया
1987तीन नए राज्य — मिज़ोरम एवं अरुणाचल प्रदेश (20 फ़रवरी 1987) तथा गोवा (30 मई 1987); गोवा के साथ दमण एवं दीव संघ राज्यक्षेत्र बने रहे
नवंबर 2000तीन राज्य एक ही माह में — छत्तीसगढ़ (1 नवंबर, मध्य प्रदेश से), उत्तरांचल (9 नवंबर, उत्तर प्रदेश से), झारखंड (15 नवंबर, बिहार से)
1 जनवरी 2007उत्तरांचल → उत्तराखंड — उत्तरांचल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2006; यह अनुच्छेद 3(ङ) का सबसे स्पष्ट उदाहरण है
2 जून 2014तेलंगाना — आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014; 29वाँ राज्य। आंध्र प्रदेश विधानसभा ने विधेयक अस्वीकार कर दिया था, फिर भी संसद ने पारित किया — अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का मत बाध्यकारी न होने का जीवंत उदाहरण
31 अक्टूबर 2019जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 — राज्य समाप्त; दो संघ राज्यक्षेत्र — जम्मू-कश्मीर (विधानमंडल सहित) एवं लद्दाख (विधानमंडल रहित)। राज्यों की संख्या 29 से घटकर 28
26 जनवरी 2020दादरा एवं नगर हवेली तथा दमण एवं दीव का विलय — एक ही संघ राज्यक्षेत्र; संघ राज्यक्षेत्रों की संख्या 9 से 8
1950 के बाद बने राज्य — गठन-वर्ष सहित। 1956 का पुनर्गठन दक्षिण एवं मध्य भारत तक सीमित रहा; 1960–72 की लहर पश्चिम एवं पूर्वोत्तर में चली; 1987 में तीन राज्य एक ही वर्ष बने; 2000 में तीन राज्य एक ही वर्ष (छत्तीसगढ़ 1 नवंबर, उत्तराखंड 9 नवंबर, झारखंड 15 नवंबर) और अंतिम राज्य तेलंगाना 2 जून 2014। मानचित्र में दिखाया गया बिंदु राज्य के भीतर एक प्रतिनिधि स्थान है, राजधानी आवश्यक नहीं। उत्तर प्रदेश इस पूरे मानचित्र में अनुपस्थित है — क्योंकि वह 1950 से ही अस्तित्व में था; वह इस कहानी में घटने वाला राज्य है, बनने वाला नहीं (2000 में उससे उत्तराखंड निकला)।
छत्तीसगढ़ — 1 नवंबर 2000 (मध्य प्रदेश से) → उत्तरांचल — 9 नवंबर 2000
(उत्तर प्रदेश से) → झारखंड — 15 नवंबर 2000 (बिहार से)। तीनों एक ही नवंबर में, पर क्रम यही है —
कालक्रम-प्रश्न ठीक इसी क्रम पर बनता है। ध्यान रहे — झारखंड सबसे बाद में बना, यद्यपि उसकी माँग
सबसे पुरानी थी।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — नाम, विभाजन एवं “चार राज्य” का प्रस्ताव
नाम कब बदला — मूल संविधान की पहली अनुसूची के भाग-क में प्रदेश का नाम
“संयुक्त प्रांत (The United Provinces)” ही अंकित था। गवर्नर-जनरल के
संयुक्त प्रांत (नाम परिवर्तन) आदेश, 1950 द्वारा 24 जनवरी 1950 को —
संविधान प्रवृत्त होने से ठीक दो दिन पहले — इसका नाम उत्तर प्रदेश हुआ। इसीलिए
24 जनवरी को उत्तर प्रदेश दिवस मनाया जाता है।
1956 में क्यों नहीं बदला — राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 ने दक्षिण एवं मध्य भारत का
नक़्शा बदल दिया, पर उत्तर प्रदेश की सीमाएँ लगभग यथावत रहीं — क्योंकि पूरा प्रदेश एक ही भाषा-क्षेत्र
(हिंदी) में था, और भाषाई पुनर्गठन का तर्क यहाँ लागू ही नहीं होता था। भाषाई पुनर्गठन के दो प्रमुख
शिल्पी भी उत्तर प्रदेश से ही थे — धर आयोग के अध्यक्ष एस.के. धर (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
तथा राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्य एच.एन. कुंज़रू (इलाहाबाद)।
2000 का विभाजन —उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 द्वारा
गढ़वाल एवं कुमाऊँ मंडलों के 13 ज़िलों को अलग कर 9 नवंबर 2000 को
उत्तरांचल बना — भारत का 27वाँ राज्य। यह पूर्णतः अनुच्छेद 3 के अधीन,
साधारण बहुमत से पारित विधि थी। आज उत्तर प्रदेश में 75 ज़िले एवं
18 मंडल हैं।
नाम-परिवर्तन का उदाहरण —उत्तरांचल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2006 से
1 जनवरी 2007 को नाम उत्तराखंड हुआ — अनुच्छेद 3(ङ) की शक्ति का
पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण, और यह भी कि नाम बदलने के लिए संविधान संशोधन नहीं, साधारण विधि पर्याप्त है।
चार राज्यों का प्रस्ताव —21 नवंबर 2011 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने
प्रदेश को चार राज्यों — पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश एवं पश्चिम प्रदेश (हरित प्रदेश) —
में बाँटने का संकल्प ध्वनिमत से पारित किया। किंतु अनुच्छेद 3 के अधीन अंतिम शक्ति संसद के पास है,
राज्य विधानमंडल के पास नहीं — केंद्र सरकार ने प्रस्ताव लौटा दिया और वह आगे नहीं बढ़ा।
यह प्रकरण अनुच्छेद 3 की दिशा स्पष्ट करता है: राज्य प्रस्ताव कर सकता है, निर्णय संसद करती है।
वर्तमान स्थिति (2026) —28 राज्य एवं 8 संघ राज्यक्षेत्र।
आठ संघ राज्यक्षेत्र — दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र), पुदुचेरी, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख,
चंडीगढ़, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, तथा दादरा एवं नगर हवेली तथा दमण एवं दीव।
इनमें विधानमंडल केवल तीन के पास है — दिल्ली, पुदुचेरी एवं जम्मू-कश्मीर।
भारत में विलय के तीन विशिष्ट प्रकरण —पुदुचेरी (फ़्रांसीसी बस्तियाँ; 14वाँ संशोधन, 1962),
गोवा, दमण एवं दीव (पुर्तगाली क्षेत्र; 1961 में सैन्य कार्रवाई, 12वाँ संशोधन, 1962),
सिक्किम (35वाँ एवं 36वाँ संशोधन, 1974–75)।
तेलंगाना के गठन के समय आंध्र प्रदेश विधानसभा ने विधेयक अस्वीकार किया था —
फिर भी वह पारित हुआ। यह अनुच्छेद 3 के परंतुक की प्रकृति का सबसे नया उदाहरण है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संबंधित राज्य के विधानमंडल द्वारा व्यक्त मत संसद पर बाध्यकारी होता है। 2. अनुच्छेद 3 के अधीन बनी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं मानी जाती। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राष्ट्रपति विधेयक राज्य विधानमंडल को “मत व्यक्त करने” के लिए भेजते हैं, पर वह मत बाध्यकारी नहीं — तेलंगाना (2014) इसका ताज़ा उदाहरण है; कथन 1 गलत। अनुच्छेद 4(2) स्पष्ट कहता है कि ऐसी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं मानी जाएगी — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित राज्यों को उनके गठन के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए। 1. हरियाणा 2. नागालैंड 3. सिक्किम 4. हिमाचल प्रदेश कूट:
A2, 1, 4, 3B1, 2, 3, 4C2, 1, 3, 4D1, 2, 4, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)नागालैंड 1 दिसंबर 1963 → हरियाणा 1 नवंबर 1966 → हिमाचल प्रदेश 25 जनवरी 1971 → सिक्किम 16 मई 1975। अतः क्रम 2, 1, 4, 3 है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): बेरुबाड़ी संघ मामले के बाद 9वाँ संविधान संशोधन, 1960 पारित करना पड़ा। कारण (R): उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भारतीय राज्यक्षेत्र किसी विदेशी राज्य को अध्यर्पित करने के लिए अनुच्छेद 3 के अधीन साधारण विधि पर्याप्त नहीं, अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन आवश्यक है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)दोनों कथन सही हैं और (R) ही (A) का ठीक कारण है। इसी तर्क पर आगे चलकर बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौते के लिए 100वाँ संविधान संशोधन, 2015 करना पड़ा।
8. नागरिकता — अनुच्छेद 5 से 11, नागरिकता अधिनियम 1955, OCI एवं CAA
संविधान का भाग II (अनुच्छेद 5–11) यह तय नहीं करता कि नागरिकता सदा के लिए कैसे
मिलेगी — वह केवल यह तय करता है कि 26 जनवरी 1950 को, संविधान के प्रारंभ के समय कौन भारत का
नागरिक होगा। आगे की सारी व्यवस्था अनुच्छेद 11 ने संसद को सौंप दी, जिसके अधीन
नागरिकता अधिनियम, 1955 बना। यही विभाजन परीक्षा का पहला प्रश्न-बिंदु है।
परीक्षा-दृष्टि — अनुच्छेद 5 से 9 “एक तिथि” के उपबंध हैं
अनुच्छेद 5 से 9 तक की सारी कसौटियाँ संविधान के प्रारंभ (26 जनवरी 1950) पर आकर रुक जाती हैं।
इन्हीं में से पाँच अनुच्छेद — 5, 6, 7, 8 एवं 9 — उन 15 अनुच्छेदों में हैं जो
26 नवंबर 1949 को ही तत्काल प्रवृत्त हो गए थे, ताकि 26 जनवरी 1950 को “नागरिक” कौन है,
यह पहले से तय हो सके। यह छोटा-सा तर्क UPPSC का पसंदीदा अभिकथन-कारण बनता है।
सुमेलन-तालिका 11 : भाग II के सात अनुच्छेद
अनुच्छेद
विषय
सार
अनु. 5
संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता
जिसका अधिवास (domicile) भारत में हो और जो — (क) भारत में जन्मा हो, या (ख) जिसके माता या पिता में से कोई भारत में जन्मा हो, या (ग) जो प्रारंभ से ठीक पहले कम-से-कम पाँच वर्ष से भारत में सामान्यतः निवासी हो
अनु. 6
पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता
यदि वह या उसके माता-पिता/दादा-दादी-नाना-नानी में से कोई भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में जन्मा हो; तथा — 19 जुलाई 1948 से पहले आया हो तो केवल सामान्य निवास पर्याप्त; 19 जुलाई 1948 को या उसके बाद आया हो तो पंजीकरण आवश्यक (आवेदन से पहले कम-से-कम छह माह का निवास)
अनु. 7
पाकिस्तान गए प्रवासियों की नागरिकता
1 मार्च 1947 के बाद जो भारत से पाकिस्तान चला गया, वह नागरिक नहीं माना जाएगा — परंतु यदि वह पुनर्वास या स्थायी वापसी के परमिट पर लौट आया हो, तो उसे 19 जुलाई 1948 के बाद आया हुआ माना जाएगा और अनु. 6(ख) लागू होगा
अनु. 8
भारत के बाहर रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति
यदि वह या उसके माता-पिता/दादा-दादी में से कोई 1935 के अधिनियम वाले भारत में जन्मा हो और वह विदेश में सामान्यतः निवासी हो, तो भारतीय राजनयिक/वाणिज्य दूत के यहाँ पंजीकरण से नागरिक
अनु. 9
विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले
ऐसा व्यक्ति अनु. 5, 6 या 8 के आधार पर नागरिक नहीं रहेगा — यही एकल नागरिकता का संवैधानिक आधार है
अनु. 10
नागरिकता के अधिकारों का बना रहना
संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन रहते हुए, नागरिक बना रहेगा
अनु. 11
संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विनियमन
नागरिकता के अर्जन एवं समाप्ति तथा उससे जुड़े सभी विषयों पर विधि बनाने की पूर्ण शक्ति संसद को — इसी से नागरिकता अधिनियम, 1955 बना
8.1 नागरिकता अधिनियम, 1955 — अर्जन के पाँच तरीके
सुमेलन-तालिका 12 : नागरिकता के अर्जन की पाँच विधियाँ
धारा
विधि
मुख्य शर्तें
धारा 3
जन्म से (by birth)
तीन कालखंड — नीचे ट्रैप-बॉक्स देखें
धारा 4
वंश-परंपरा से (by descent)
भारत के बाहर जन्म। 26 जनवरी 1950 – 9 दिसंबर 1992 : जन्म के समय पिता भारतीय नागरिक हो। 10 दिसंबर 1992 या बाद : माता या पिता में से कोई भारतीय नागरिक हो। 3 दिसंबर 2004 या बाद : जन्म का एक वर्ष के भीतर भारतीय दूतावास में पंजीकरण अनिवार्य, तथा यह घोषणा कि शिशु के पास किसी अन्य देश का पासपोर्ट नहीं है
धारा 5
पंजीकरण से (by registration)
भारतीय मूल का व्यक्ति जो आवेदन से पहले सात वर्ष से भारत में सामान्यतः निवासी हो; भारतीय नागरिक से विवाहित व्यक्ति (सात वर्ष का निवास); भारतीय नागरिकों के अवयस्क बच्चे; पाँच वर्ष से OCI कार्डधारक जो आवेदन से पहले एक वर्ष भारत में रहा हो — आदि
धारा 6
देशीयकरण से (by naturalisation)
सामान्य नियम — आवेदन से ठीक पहले 12 माह का निरंतर निवास, तथा उससे पूर्व के 14 वर्षों में कुल 11 वर्ष का निवास; साथ ही अच्छा चरित्र, आठवीं अनुसूची की किसी भाषा का ज्ञान तथा विदेशी नागरिकता का त्याग। विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य, विश्व-शांति या मानव-उन्नति में विशिष्ट सेवा करने वाले के लिए सरकार सभी शर्तें शिथिल कर सकती है
धारा 7
राज्यक्षेत्र के अधिग्रहण से (by incorporation of territory)
यदि कोई नया राज्यक्षेत्र भारत का अंग बने, तो सरकार अधिसूचना द्वारा वहाँ के व्यक्तियों को नागरिक घोषित करती है — जैसे पुदुचेरी (1962) तथा गोवा, दमण एवं दीव (1961–62)
सावधानी — जन्म से नागरिकता की तीन कट-ऑफ तिथियाँ (सर्वाधिक पूछा जाने वाला बिंदु)
जन्म-काल
शर्त
किस संशोधन से
26 जनवरी 1950 को या बाद, किंतु 1 जुलाई 1987 से पहले
भारत में जन्म ही पर्याप्त — माता-पिता की नागरिकता से कोई मतलब नहीं
मूल अधिनियम, 1955
1 जुलाई 1987 को या बाद, किंतु 3 दिसंबर 2004 से पहले
जन्म के समय माता या पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 1986
3 दिसंबर 2004 को या उसके बाद
दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों; अथवा एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी (illegal migrant) न हो
तिथि 1987 है, 1986 नहीं — संशोधन 1986 में हुआ, पर वह 1 जुलाई 1987 से
प्रभावी हुआ। इसी तरह संशोधन 2003 का है, पर तिथि 3 दिसंबर 2004 है।
विकल्पों में “1986” और “2003” जान-बूझकर रखे जाते हैं।
“3 दिसंबर 2004” है, “4 दिसंबर” नहीं — कुछ कोचिंग-सामग्री में 4 दिसंबर लिखा मिलता है,
जो अधिनियम की भाषा से मेल नहीं खाता।
विदेशी राजनयिकों एवं शत्रु विदेशियों की भारत में जन्मी संतान को जन्म से नागरिकता
कभी नहीं मिलती — यह अपवाद तीनों कालखंडों पर लागू है।
8.2 नागरिकता की समाप्ति — तीन तरीके
सुमेलन-तालिका 13 : नागरिकता की समाप्ति
धारा
विधि
सार
धारा 8
परित्याग (Renunciation) — स्वैच्छिक
वयस्क एवं सक्षम नागरिक घोषणा द्वारा नागरिकता त्याग सकता है; उसके अवयस्क बच्चों की नागरिकता भी समाप्त हो जाती है, किंतु वे 18 वर्ष के होने पर एक वर्ष के भीतर उसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं। युद्ध-काल में ऐसी घोषणा रोकी जा सकती है
धारा 9
पर्यवसान (Termination) — स्वतः
यदि नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ले लेता है, तो भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त — कोई आदेश आवश्यक नहीं। यह अनु. 9 का ही वैधानिक विस्तार है
धारा 10
वंचन (Deprivation) — अनिवार्य, सरकार के आदेश से
केंद्र सरकार पंजीकरण/देशीयकरण से बने नागरिक को वंचित कर सकती है यदि — नागरिकता कपट या तथ्य छिपाकर ली गई हो; संविधान के प्रति अनिष्ठा दिखाई हो; युद्ध-काल में शत्रु से व्यापार या संपर्क किया हो; पंजीकरण/देशीयकरण के पाँच वर्ष के भीतर किसी देश में दो वर्ष का कारावास भोगा हो; या लगातार सात वर्ष भारत से बाहर सामान्यतः निवासी रहा हो
समाप्ति के तीन तरीके“परित्याग स्वयं, पर्यवसान स्वतः, वंचन सरकार से”
परित्याग (धारा 8) = नागरिक स्वयं छोड़ता है · पर्यवसान (धारा 9) = विदेशी नागरिकता
लेते ही स्वतः समाप्त · वंचन (धारा 10) = सरकार छीनती है। ध्यान दें — वंचन केवल पंजीकरण या
देशीयकरण से बने नागरिक का हो सकता है; जन्म से नागरिक का नहीं। यही भेद प्रश्न में आता है।
8.3 एकल नागरिकता — और उसकी व्यावहारिक सीमाएँ
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं स्विट्ज़रलैंड जैसे संघों में दोहरी नागरिकता है — संघ की और राज्य की।
भारत ने संघीय होते हुए भी एकल नागरिकता अपनाई, ताकि क्षेत्रीय एवं सांप्रदायिक विभाजन न बढ़े।
अर्थात् कोई “उत्तर प्रदेश का नागरिक” नहीं होता — केवल “भारत का नागरिक” होता है, जो उत्तर प्रदेश का
निवासी है। फिर भी कुछ उपबंध निवास के आधार पर भेद करने देते हैं —
अनुच्छेद 16(3) — संसद किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र के अधीन कुछ वर्गों के नियोजन के लिए
निवास की शर्त विहित कर सकती है।
अनुच्छेद 19(1)(ङ) एवं (छ) पर अनुसूचित क्षेत्रों में निर्बंधन, जनजातीय
संस्कृति की रक्षा हेतु।
अनुच्छेद 371 से 371ञ — कुछ राज्यों के लिए विशेष उपबंध।
पहले जम्मू-कश्मीर में “स्थायी निवासी” की अलग श्रेणी थी (अनुच्छेद 35क के अधीन);
5 अगस्त 2019 के बाद वह समाप्त हो गई।
8.4 प्रवासी भारतीय — PIO एवं OCI
PIO कार्ड — योजना 1999 में आरंभ।
OCI (प्रवासी भारतीय नागरिक) — नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 में उपबंध जोड़ा गया;
योजना 2005 में लागू हुई तथा 2006 के हैदराबाद प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में औपचारिक रूप से
शुरू की गई। यह भारतीय प्रवासी पर उच्च स्तरीय समिति (एल.एम. सिंघवी समिति) की संस्तुति पर आधारित थी।
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2015 — PIO एवं OCI दोनों योजनाएँ मिला दी गईं;
अब एकमात्र श्रेणी है — “प्रवासी भारतीय नागरिक कार्डधारक (OCI Cardholder)”। सभी मौजूदा PIO कार्ड
OCI कार्ड मान लिए गए।
पात्रता — वह विदेशी नागरिक जो 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत का नागरिक रहा हो,
या उस तिथि को नागरिक बनने के योग्य रहा हो, या ऐसे व्यक्ति का वंशज हो।
पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के नागरिक (या उनके पूर्वज) पात्र नहीं।
OCI कार्डधारक नागरिक नहीं है — उसे बहु-प्रवेश आजीवन वीज़ा, विदेशी क्षेत्रीय
पंजीकरण अधिकारी के यहाँ रिपोर्ट से छूट तथा आर्थिक-शैक्षिक क्षेत्र में NRI-समान सुविधाएँ मिलती हैं;
किंतु उसे मताधिकार नहीं, वह संवैधानिक पद (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीश,
सांसद/विधायक) नहीं ले सकता, सामान्यतः सरकारी सेवा में नियुक्त नहीं हो सकता, और
कृषि या बागान भूमि नहीं ख़रीद सकता।
8.5 नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 — CAA
संसद से पारित; 12 दिसंबर 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति।
तीन देश —अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान।
छह समुदाय —हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी एवं ईसाई।
कट-ऑफ तिथि — जो 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत आए हों।
ऐसे व्यक्तियों को “अवैध प्रवासी” नहीं माना जाएगा, और उनके लिए देशीयकरण की निवास-अवधि
11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दी गई (तीसरी अनुसूची में संशोधन)।
छूट-क्षेत्र — यह अधिनियम असम, मेघालय, मिज़ोरम एवं त्रिपुरा के छठी अनुसूची
वाले जनजातीय क्षेत्रों तथा इनर लाइन परमिट व्यवस्था वाले क्षेत्रों
(अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम तथा दिसंबर 2019 से मणिपुर) पर लागू नहीं है।
नियम —नागरिकता (संशोधन) नियम, 2024 — 11 मार्च 2024 को
गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित; आवेदन पूर्णतः ऑनलाइन, ज़िला स्तरीय समिति के माध्यम से सशक्त समिति को।
विवाद — आलोचकों का तर्क है कि धर्म को नागरिकता की कसौटी बनाना अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है;
सरकार का तर्क है कि यह एक युक्तियुक्त वर्गीकरण है जो धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे विशिष्ट समूहों को
एकबारगी राहत देता है और किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनता। मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है।
सावधानी — CAA की चार संख्याएँ उलटी न पड़ें
3 देश (अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान) · 6 समुदाय (हिंदू, सिख, बौद्ध,
जैन, पारसी, ईसाई) · 31 दिसंबर 2014 कट-ऑफ · 11 वर्ष → 5 वर्ष देशीयकरण-अवधि।
विकल्पों में प्रायः “श्रीलंका” या “म्याँमार” जोड़ दिया जाता है (ये सम्मिलित नहीं हैं), या कट-ऑफ
“31 दिसंबर 2019” कर दिया जाता है, या अवधि “6 वर्ष” लिख दी जाती है। अधिनियम 2019 का है,
पर नियम 2024 के हैं — यह भेद भी पूछा जा सकता है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (विषय) A. अनुच्छेद 6 1. विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से लेने वाले B. अनुच्छेद 7 2. पाकिस्तान से भारत आए व्यक्ति C. अनुच्छेद 9 3. संसद द्वारा नागरिकता का विनियमन D. अनुच्छेद 11 4. पाकिस्तान गए प्रवासी कूट:
उत्तर: (C)अनु. 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्ति; अनु. 7 — भारत से पाकिस्तान गए प्रवासी; अनु. 9 — स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता लेने वाले; अनु. 11 — संसद की विधायी शक्ति। अतः A-2, B-4, C-1, D-3।
प्र.2भारत में जन्म से नागरिकता के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. 1 जुलाई 1987 को या उसके बाद किंतु 3 दिसंबर 2004 से पहले भारत में जन्मा व्यक्ति तभी नागरिक है जब जन्म के समय उसके माता या पिता में से कोई भारत का नागरिक हो। 2. 3 दिसंबर 2004 को या उसके बाद भारत में जन्मे व्यक्ति के लिए यह पर्याप्त है कि उसका एक अभिभावक भारतीय नागरिक हो, दूसरे की स्थिति चाहे जो हो। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)कथन 1 ठीक है। कथन 2 अधूरा एवं इसलिए गलत है — 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्म पर या तो दोनों अभिभावक भारतीय नागरिक हों, या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी न हो। “दूसरे की स्थिति चाहे जो हो” कहना गलत है।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (विषय) (तथ्य) 1. CAA, 2019 की कट-ऑफ तिथि — 31 दिसंबर 2014 2. PIO एवं OCI योजनाओं का विलय — नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2015 3. वंचन (deprivation) — जन्म से बने नागरिक पर भी लागू नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)धारा 10 के अधीन वंचन मुख्यतः पंजीकरण या देशीयकरण से बने नागरिक पर लागू होता है, जन्म से बने नागरिक पर नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। शेष दोनों युग्म सही हैं।
9. संविधान संशोधन — अनुच्छेद 368 एवं मूल ढाँचा सिद्धांत
संविधान का भाग XX में केवल एक अनुच्छेद है — अनुच्छेद 368,
जिसका शीर्षक है “संसद की संविधान का संशोधन करने की शक्ति तथा उसकी प्रक्रिया”।
मूल संविधान में इसका शीर्षक केवल “संविधान के संशोधन की प्रक्रिया” था; शब्द “शक्ति”24वें संविधान संशोधन, 1971 ने जोड़ा — और यह मात्र शब्द-परिवर्तन नहीं था, यह
गोलकनाथ (1967) के उत्तर में संसद का दावा था कि संशोधन की शक्ति उसकी संविधायी (constituent)
शक्ति है, साधारण विधायी शक्ति नहीं।
9.1 तीन प्रकार की संशोधन-प्रक्रिया
ध्यान दें — अनुच्छेद 368 में केवल दो प्रकार वर्णित हैं (विशेष बहुमत, तथा विशेष बहुमत
+ राज्यों का अनुसमर्थन)। पहला प्रकार — साधारण बहुमत — अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर है;
वह संविधान के अन्य अनुच्छेदों में बिखरा है और तकनीकी दृष्टि से “संविधान संशोधन” कहलाता ही नहीं।
यह भेद परीक्षा में निर्णायक होता है।
1 · साधारण बहुमत — 368 से बाहर
संसद के प्रत्येक सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत
नए राज्यों का प्रवेश/निर्माण, सीमा एवं नाम में परिवर्तन (अनु. 2, 3, 4)
राज्य में विधान परिषद का सृजन या उत्सादन (अनु. 169) — संबंधित विधानसभा के संकल्प पर
नागरिकता का अर्जन एवं समाप्ति (अनु. 11)
पाँचवीं अनुसूची (पैरा 7) एवं छठी अनुसूची (पैरा 21) में संशोधन
वेतन-भत्ते; गणपूर्ति; प्रक्रिया-नियम; संसदीय विशेषाधिकार; संसद में अंग्रेज़ी का प्रयोग
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या; उसे अतिरिक्त अधिकारिता देना
राजभाषा का प्रयोग; निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन; संघ राज्यक्षेत्र
तकनीकी दृष्टि से ये “संविधान संशोधन अधिनियम” नहीं कहलाते — इन्हें गिनती में नहीं लिया जाता
2 · विशेष बहुमत — अनु. 368(2)
दोहरी शर्त, दोनों आवश्यक — (क) उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत, तथा (ख) उस सदन के उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई
यह अधिकांश संशोधनों की प्रक्रिया है — मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व तथा वे सभी उपबंध जो न पहली श्रेणी में हैं, न तीसरी में
विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत हो सकता है — मंत्री या निजी सदस्य द्वारा; राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं
प्रत्येक सदन में अलग-अलग पारित होना आवश्यक — संयुक्त बैठक का उपबंध नहीं
असहमति की दशा में विधेयक समाप्त हो जाता है
3 · विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुसमर्थन
विशेष बहुमत के अतिरिक्त, कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा संकल्प पारित कर अनुसमर्थन
राज्यों में साधारण बहुमत पर्याप्त; कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं; अनुसमर्थन विधेयक के राष्ट्रपति के पास जाने से पहले होना चाहिए
राष्ट्रपति का निर्वाचन एवं उसकी रीति — अनु. 54, 55
संघ एवं राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार — अनु. 73, 162; संघ राज्यक्षेत्रों के उच्च न्यायालय — अनु. 241; GST परिषद — अनु. 279क (101वें संशोधन, 2016 से जोड़ा गया)
उच्चतम न्यायालय (भाग V का अध्याय IV) तथा राज्यों के उच्च न्यायालय (भाग VI का अध्याय V)
केंद्र-राज्य विधायी संबंध — भाग XI का अध्याय I
सातवीं अनुसूची की कोई भी सूची
संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व (चौथी अनुसूची)
स्वयं अनुच्छेद 368
अनुसमर्थन चाहने वाले सात विषय — अनु. 368(2) का परंतुक“राष्ट्रपति, कार्यपालिका, न्यायालय, विधायी-संबंध, सातवीं सूची, राज्य-प्रतिनिधित्व, स्वयं 368”
क्रम वही है जो परंतुक के खंड (क) से (ङ) में है —
(क) अनु. 54, 55 (राष्ट्रपति का निर्वाचन) तथा 73, 162, 241, 279क (कार्यपालिका शक्ति, संघ राज्यक्षेत्रों के उच्च न्यायालय, GST परिषद);
(ख) भाग V का अध्याय IV (उच्चतम न्यायालय), भाग VI का अध्याय V (उच्च न्यायालय), भाग XI का अध्याय I (विधायी संबंध);
(ग) सातवीं अनुसूची की कोई सूची; (घ) संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व; (ङ) इस अनुच्छेद के उपबंध।
सूत्र यह है — जो-जो बात संघीय संतुलन को छूती है, उसमें राज्यों की सहमति चाहिए।
1. पुरःस्थापनकिसी भी सदन में; मंत्री या निजी सदस्य द्वारा; राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति नहीं चाहिए
→
2. दोनों सदनों में अलग-अलगप्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित; संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं
→
3. राज्यों का अनुसमर्थनकेवल संघीय विषयों वाले संशोधनों में — आधे राज्यों के विधानमंडल साधारण बहुमत से संकल्प पारित करें
→
4. राष्ट्रपति की स्वीकृतिराष्ट्रपति स्वीकृति देंगे ही — न रोक सकते हैं, न पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं (24वाँ संशोधन, 1971)
→
5. संविधान संशोधितस्वीकृति मिलते ही संविधान विधेयक की शर्तों के अनुसार संशोधित हो जाता है
सावधानी — “कुल सदस्यता” बनाम “उपस्थित एवं मतदान करने वाले”
विशेष बहुमत की दो शर्तें हैं, और दोनों पूरी होनी चाहिए —
कुल सदस्यता का बहुमत (यानी लोक सभा में 543 में से कम-से-कम 272, चाहे उस दिन कितने भी उपस्थित हों)
तथाउपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई। प्रश्न प्रायः केवल एक शर्त लिखकर
“सही है?” पूछता है — तब उत्तर गलत होगा।
“दो-तिहाई” कुल सदस्यता का नहीं, उपस्थित एवं मतदान करने वालों का होता है।
यह एक शब्द उत्तर बदल देता है।
अनुसमर्थन आधे राज्यों का चाहिए — “दो-तिहाई राज्यों का” नहीं; और राज्यों में
साधारण बहुमत पर्याप्त है, विशेष बहुमत नहीं।
अनुसमर्थन के लिए कोई समय-सीमा नहीं है, और राज्य द्वारा एक बार दिया गया अनुसमर्थन
वापस नहीं लिया जा सकता।
संविधान संशोधन विधेयक धन विधेयक नहीं है, और उस पर संयुक्त बैठक (अनु. 108)
नहीं बुलाई जा सकती।
राज्य विधानमंडल स्वयं संशोधन प्रस्तावित नहीं कर सकते — एकमात्र अपवाद
अनुच्छेद 169 है, जहाँ विधान परिषद के सृजन/उत्सादन का संकल्प राज्य विधानसभा से ही आता है।
9.2 मूल ढाँचा सिद्धांत का विकास
प्रश्न सरल था और उत्तर पचास वर्ष में बना: क्या संसद संविधान के किसी भी भाग को बदल सकती है?
इसका इतिहास संसद और न्यायपालिका के बीच का सबसे लंबा संवाद है।
1951शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ — पहले संविधान संशोधन, 1951 (नौवीं अनुसूची, अनु. 31क एवं 31ख) को चुनौती। न्यायालय — अनुच्छेद 13 का “विधि” शब्द साधारण विधि तक सीमित है, संविधान संशोधन नहीं; संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है
1965सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य — 17वाँ संशोधन; पाँच न्यायाधीश, 3:2। बहुमत ने शंकरी प्रसाद दोहराया; किंतु न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला एवं मुधोलकर के अल्पमत ने पहली बार यह प्रश्न उठाया कि क्या मौलिक अधिकार “सत्तारूढ़ दल की सनक” पर छोड़े जा सकते हैं — यहीं “मूल विशेषताओं” की बीज-कल्पना है
1967आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य — 11 न्यायाधीश, 6:5। पिछले दोनों निर्णय उलटे: संविधान संशोधन भी अनुच्छेद 13 के अर्थ में “विधि” है, अतः संसद मौलिक अधिकारों को छीन या न्यून नहीं कर सकती। साथ ही भविष्यलक्षी अपास्तीकरण (prospective overruling) का सिद्धांत लागू
197124वाँ संविधान संशोधन — गोलकनाथ का उत्तर। अनु. 13(4) तथा अनु. 368(1) एवं (3) जोड़े गए; राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य की गई; अनुच्छेद 368 का शीर्षक बदलकर “शक्ति तथा प्रक्रिया” किया गया। साथ ही 25वें संशोधन ने अनु. 31ग जोड़ा
24 अप्रैल 1973केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य — 13 न्यायाधीश (अब तक की सबसे बड़ी पीठ), 7:6, मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी। गोलकनाथ उलटा: संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है — किंतु संविधान के “मूल ढाँचे” को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती। 31ग का दूसरा भाग (न्यायिक पुनर्विलोकन का वर्जन) अपास्त
7 नवंबर 1975इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण — मूल ढाँचे का पहला प्रयोग। 39वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 329क(4) को अपास्त किया गया — प्रधानमंत्री एवं अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक पुनर्विलोकन से बाहर करना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन तथा न्यायिक पुनर्विलोकन — दोनों मूल विशेषताओं का उल्लंघन
197642वाँ संविधान संशोधन — अनु. 368(4) (संशोधन किसी न्यायालय में चुनौती-योग्य नहीं) एवं 368(5) (संसद की संविधायी शक्ति पर कोई सीमा नहीं) जोड़े गए — मूल ढाँचे को ही निष्प्रभावी करने का प्रयास
31 जुलाई 1980मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ — 42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त, अर्थात् अनुच्छेद 368(4) एवं (5) असंवैधानिक। न्यायालय — “सीमित संशोधन-शक्ति स्वयं मूल ढाँचे का अंग है”; तथा मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन भी मूल ढाँचा
1981वामन राव बनाम भारत संघ — 24 अप्रैल 1973 को निर्णायक तिथि माना गया: उस तिथि के बाद नौवीं अनुसूची में डाली गई विधियाँ मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकेंगी
1992–94किहोतो होलोहन (1992) — दसवीं अनुसूची का पैरा 7 इसलिए अपास्त क्योंकि वह अनु. 136, 226, 227 को प्रभावित करते हुए भी राज्यों के अनुसमर्थन के बिना पारित हुआ था · एस.आर. बोम्मई (1994) — पंथनिरपेक्षता एवं संघवाद मूल ढाँचा
1997 · 2007एल. चंद्र कुमार (1997) — अनु. 32 एवं 226 के अधीन न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचा · आई.आर. कोएलो (11 जनवरी 2007) — नौवीं अनुसूची में रखी गई विधियाँ भी मूल ढाँचे की कसौटी से बच नहीं सकतीं
16 अक्टूबर 2015उच्चतम न्यायालय अधिवक्ता संघ (NJAC वाद) — 99वाँ संविधान संशोधन तथा NJAC अधिनियम, 2014 अपास्त (4:1); न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं नियुक्ति में न्यायिक प्रधानता मूल ढाँचा। कॉलेजियम व्यवस्था बहाल
मूल ढाँचे की कोई सूची संविधान में नहीं है — न्यायालय ने वाद-दर-वाद तत्व जोड़े हैं।
अब तक मान्य तत्वों में — संविधान की सर्वोच्चता; प्रभुत्व-सम्पन्न, लोकतांत्रिक एवं गणतंत्रात्मक स्वरूप;
पंथनिरपेक्षता; शक्तियों का पृथक्करण; संघीय स्वरूप; राष्ट्र की एकता एवं अखंडता; कल्याणकारी राज्य;
न्यायिक पुनर्विलोकन; व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा; संसदीय प्रणाली; विधि का शासन;
मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन; स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन;
न्यायपालिका की स्वतंत्रता; तथा संसद की संशोधन-शक्ति का सीमित होना।
अब तक 106 संविधान संशोधन पारित हो चुके हैं; नवीनतम — 106वाँ संशोधन, 2023
(नारी शक्ति वंदन अधिनियम), जो लोक सभा, राज्य विधानसभाओं तथा दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए
एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। यह आरक्षण परिसीमन के बाद प्रभावी होगा।
अनुच्छेद 368(4) एवं (5) आज भी संविधान के मुद्रित पाठ में दिखते हैं, क्योंकि संसद ने
उन्हें औपचारिक रूप से निरसित नहीं किया — पर मिनर्वा मिल्स के बाद वे विधिक रूप से निष्प्रभावी हैं।
आधिकारिक पाठ की पाद-टिप्पणी में यह स्पष्ट लिखा है।
आलोचनाएँ — संशोधन के लिए कोई विशेष निकाय (संविधान सम्मेलन) नहीं; राज्यों की भूमिका
नगण्य; अनुसमर्थन की कोई समय-सीमा नहीं; प्रक्रिया अत्यंत संक्षिप्त होने से बहुत कुछ न्यायिक व्याख्या पर छूटा।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 368 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति होने पर संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है। 2. विशेष बहुमत का अर्थ है — सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक का उपबंध नहीं है — अनुच्छेद 108 साधारण विधेयकों पर लागू होता है; असहमति की दशा में विधेयक समाप्त हो जाता है। अतः कथन 1 गलत, कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-से विषय ऐसे हैं जिनमें संशोधन के लिए कम-से-कम आधे राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है? 1. सातवीं अनुसूची की कोई सूची 2. राज्य के नीति-निदेशक तत्व 3. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C1 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)सातवीं अनुसूची की सूचियाँ तथा संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व — दोनों अनुच्छेद 368(2) के परंतुक में हैं, अतः अनुसमर्थन आवश्यक। नीति-निदेशक तत्वों में संशोधन केवल विशेष बहुमत से हो जाता है — अनुसमर्थन आवश्यक नहीं।
प्र.3निम्नलिखित वादों/संशोधनों को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए। 1. मिनर्वा मिल्स वाद 2. गोलकनाथ वाद 3. 24वाँ संविधान संशोधन 4. केशवानंद भारती वाद कूट:
A2, 3, 1, 4B3, 2, 4, 1C3, 2, 1, 4D2, 3, 4, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)गोलकनाथ 1967 → 24वाँ संशोधन 1971 → केशवानंद भारती 1973 → मिनर्वा मिल्स 1980। अतः क्रम 2, 3, 4, 1 है — और यही वह शृंखला है जिसमें संसद तथा न्यायपालिका बारी-बारी उत्तर देती रहीं।
10. संविधान के भाग एवं अनुसूचियाँ — पूर्ण सूची
यह खंड रटने का है — और UPPSC में इसका प्रतिफल सीधा मिलता है, क्योंकि
“भाग ↔ विषय” तथा “अनुसूची ↔ विषय” हर दूसरे वर्ष सुमेलन के रूप में आते हैं।
नीचे दी गई सूचियाँ संविधान के आधिकारिक अद्यतन पाठ से मिलाई गई हैं।
10.1 संविधान के 25 भाग
सुमेलन-तालिका 14 : भाग ↔ विषय ↔ अनुच्छेद
भाग
विषय
अनुच्छेद
I
संघ और उसका राज्यक्षेत्र
1 – 4
II
नागरिकता
5 – 11
III
मूल अधिकार
12 – 35
IV
राज्य की नीति के निदेशक तत्व
36 – 51
IV-क
मूल कर्तव्य (42वाँ संशोधन, 1976)
51क
V
संघ — राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद, संसद, उच्चतम न्यायालय, CAG
52 – 151
VI
राज्य — राज्यपाल, मंत्रिपरिषद, विधानमंडल, उच्च न्यायालय
152 – 237
VII
[निरसित] पहली अनुसूची के भाग ख के राज्य (7वाँ संशोधन, 1956)
238
VIII
संघ राज्यक्षेत्र
239 – 242
IX
पंचायत (73वाँ संशोधन, 1992)
243 – 243ण
IX-क
नगरपालिकाएँ (74वाँ संशोधन, 1992)
243त – 243यछ
IX-ख
सहकारी सोसाइटियाँ (97वाँ संशोधन, 2011)
243यज – 243यन
X
अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र
244 – 244क
XI
संघ और राज्यों के बीच संबंध — विधायी एवं प्रशासनिक
245 – 263
XII
वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद (अनु. 300क — संपत्ति का अधिकार यहीं है)
264 – 300क
XIII
भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम
301 – 307
XIV
संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ (अनु. 312 — अखिल भारतीय सेवाएँ; 315 — लोक सेवा आयोग)
308 – 323
XIV-क
अधिकरण (Tribunals) (42वाँ संशोधन, 1976)
323क – 323ख
XV
निर्वाचन (अनु. 329क निरसित)
324 – 329
XVI
कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध — अजा/अजजा, आंग्ल-भारतीय, पिछड़े वर्ग
330 – 342क
XVII
राजभाषा
343 – 351
XVIII
आपात उपबंध
352 – 360
XIX
प्रकीर्ण (अनु. 361 — राष्ट्रपति एवं राज्यपाल का संरक्षण)
361 – 367
XX
संविधान का संशोधन
368
XXI
अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध (अनु. 370; 371 से 371ञ)
369 – 392
XXII
संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन
393 – 395
सावधानी — भाग-सूची के चार सूक्ष्म बिंदु
भाग VII निरसित है (7वाँ संशोधन, 1956) — इसीलिए क्रम-संख्या I से XXII तक जाने पर भी
वर्तमान भागों की संख्या 25 बनती है (22 − 1 निरसित + 4 नए: IV-क, IX-क, IX-ख, XIV-क)।
संपत्ति का अधिकार भाग III में नहीं, भाग XII में है — अनुच्छेद 300क
(44वाँ संशोधन, 1978)।
अनुच्छेद 368 अकेला भाग XX है — पूरा भाग एक ही अनुच्छेद का।
पंचायत (भाग IX) एवं नगरपालिका (भाग IX-क) मूल संविधान में नहीं थे —
दोनों 1992 के संशोधनों से आए; पंचायत का भाग 1 अप्रैल 1993 से तथा नगरपालिका का
1 जून 1993 से प्रवृत्त हुआ।
10.2 बारह अनुसूचियाँ
सुमेलन-तालिका 15 : अनुसूची ↔ विषय ↔ संबंधित अनुच्छेद
अनुसूची
विषय
संबंधित अनुच्छेद
कब जुड़ी
पहली
राज्य तथा संघ राज्यक्षेत्र एवं उनके राज्यक्षेत्रों का विवरण
अनु. 1 एवं 4
मूल
दूसरी
वेतन, भत्ते एवं विशेषाधिकार — राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोक सभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष, राज्य सभा के सभापति/उपसभापति, विधानसभा के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति/उपसभापति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक
शपथ या प्रतिज्ञान के प्ररूप — मंत्री, सांसद/विधायक, न्यायाधीश, CAG
अनु. 75(4), 99, 124(6), 148(2), 164(3), 188, 219
मूल
चौथी
राज्य सभा में स्थानों का आवंटन
अनु. 4(1) एवं 80(2)
मूल
पाँचवीं
अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण के उपबंध
अनु. 244(1)
मूल
छठी
असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के उपबंध — स्वशासी ज़िला परिषदें
अनु. 244(2) एवं 275(1)
मूल
सातवीं
संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची — मूलतः क्रमशः 97, 66 एवं 47 विषय (विस्तार अध्याय 4.3 में)
अनु. 246
मूल
आठवीं
भाषाएँ — आज 22; मूलतः 14
अनु. 344(1) एवं 351
मूल
नौवीं
कुछ अधिनियमों एवं विनियमों का विधिमान्यकरण — मुख्यतः भूमि-सुधार विधियाँ; मूलतः 13, आज 284
अनु. 31ख
1वाँ संशोधन, 1951
दसवीं
दल-बदल के आधार पर निरर्हता के उपबंध
अनु. 102(2) एवं 191(2)
52वाँ संशोधन, 1985
ग्यारहवीं
पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व — 29 विषय
अनु. 243छ
73वाँ संशोधन, 1992
बारहवीं
नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व — 18 विषय
अनु. 243ब
74वाँ संशोधन, 1992
बारह अनुसूचियाँ — क्रम में“राज्य वेतन शपथ सीट · जनजाति-पूर्वोत्तर सूची भाषा · भूमि दल-बदल · पंचायत नगर”
राज्य (1: राज्य एवं संघ राज्यक्षेत्र) · वेतन (2) · शपथ (3) ·
सीट (4: राज्य सभा में स्थान) · जनजाति (5: अनुसूचित क्षेत्र) ·
पूर्वोत्तर (6: असम-मेघालय-त्रिपुरा-मिज़ोरम) · सूची (7: तीन सूचियाँ) · भाषा (8: 22 भाषाएँ) ·
भूमि (9: भूमि-सुधार विधियों का संरक्षण) · दल-बदल (10) · पंचायत (11: 29 विषय) ·
नगर (12: 18 विषय)।
अंतिम चार अनुसूचियाँ ही बाद में जुड़ीं — 9वीं (1951), 10वीं (1985), 11वीं एवं 12वीं (1992)।
क्रम याद रखने की कुंजी — पहली चार “व्यवस्था” की, बीच की चार “क्षेत्र एवं शक्ति” की,
अंतिम चार “संशोधनों से आई”।
सावधानी — अनुसूचियों के पाँच लोकप्रिय भ्रम
पाँचवीं बनाम छठी —पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम
को छोड़कर शेष राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू है; छठी केवल उन चार
पूर्वोत्तर राज्यों पर। छठी अनुसूची में नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश एवं मणिपुर सम्मिलित नहीं हैं।
आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं — मूलतः 14 थीं। 21वाँ संशोधन, 1967 —
सिंधी; 71वाँ संशोधन, 1992 — कोंकणी, मणिपुरी एवं नेपाली; 92वाँ संशोधन, 2003
(प्रवृत्त 7 जनवरी 2004) — बोडो, डोगरी, मैथिली एवं संताली। 96वें संशोधन, 2011 ने
“ओड़िया” की वर्तनी बदली (Oriya → Odia)। अंग्रेज़ी आठवीं अनुसूची में नहीं है।
नौवीं अनुसूची पूर्ण कवच नहीं है —आई.आर. कोएलो (2007) के बाद
24 अप्रैल 1973 के पश्चात् इसमें डाली गई विधियाँ मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं।
ग्यारहवीं में 29 विषय, बारहवीं में 18 — संख्याएँ उलटी न कर दें। ग्यारहवीं
पंचायत की है (अनु. 243छ), बारहवीं नगरपालिका की (अनु. 243ब)।
दूसरी अनुसूची में प्रधानमंत्री का वेतन नहीं है — वह संसद द्वारा बनाई गई विधि से
तय होता है। दूसरी अनुसूची में राष्ट्रपति, राज्यपाल, पीठासीन अधिकारी, न्यायाधीश एवं CAG हैं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुसूची) सूची-II (विषय) A. चौथी अनुसूची 1. दल-बदल के आधार पर निरर्हता B. छठी अनुसूची 2. राज्य सभा में स्थानों का आवंटन C. दसवीं अनुसूची 3. नगरपालिकाओं की शक्तियाँ D. बारहवीं अनुसूची 4. असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजाति क्षेत्र कूट:
उत्तर: (D)चौथी — राज्य सभा में स्थानों का आवंटन; छठी — चार पूर्वोत्तर राज्यों के जनजाति क्षेत्र; दसवीं — दल-बदल; बारहवीं — नगरपालिकाओं की शक्तियाँ (18 विषय)। अतः A-2, B-4, C-1, D-3।
प्र.2निम्नलिखित अनुसूचियों को संविधान में जोड़े जाने के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए। 1. दसवीं अनुसूची 2. नौवीं अनुसूची 3. बारहवीं अनुसूची 4. ग्यारहवीं अनुसूची कूट:
प्र.3भारतीय संविधान के भागों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. भाग VII को 7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा निरसित कर दिया गया। 2. संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 300क) संविधान के भाग III में आता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)भाग VII (पहली अनुसूची के भाग ख के राज्य) 7वें संशोधन, 1956 से निरसित है — कथन 1 सही। अनुच्छेद 300क भाग XII में है, भाग III में नहीं — 44वें संशोधन, 1978 ने संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर विधिक अधिकार बनाया था। अतः कथन 2 गलत।
11. सम्पूर्ण कालक्रम एवं रटने योग्य तथ्य — एक दृष्टि में
11.1 निर्णायक तिथियाँ
सुमेलन-तालिका 16 : तिथि ↔ घटना (कालक्रम-प्रश्नों के लिए)
तिथि
घटना
1934
एम.एन. रॉय द्वारा संविधान सभा का विचार
1940
अगस्त प्रस्ताव — माँग की पहली सैद्धांतिक स्वीकृति
24 मार्च 1946
कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा
16 मई 1946
कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा
2 सितंबर 1946
अंतरिम सरकार का गठन
9 दिसंबर 1946
संविधान सभा की प्रथम बैठक — सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष
11 दिसंबर 1946
डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष
13 दिसंबर 1946
उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत (नेहरू)
22 जनवरी 1947
उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकृत
22 जुलाई 1947
राष्ट्रीय ध्वज अंगीकृत
15 अगस्त 1947
स्वतंत्रता; सभा प्रभुसत्ता-सम्पन्न एवं विधानमंडल भी
29 अगस्त 1947
प्रारूप समिति का गठन (30 अगस्त को अंबेडकर अध्यक्ष)
फ़रवरी 1948
प्रारूप संविधान प्रकाशित
जून 1948 · 10 दिसंबर 1948
धर आयोग का गठन · उसकी रिपोर्ट
4 नवंबर 1948
प्रथम वाचन आरंभ
17 अक्टूबर 1949
प्रस्तावना पर बहस — अंतिम रूप से स्वीकृत अंग
26 नवंबर 1949
संविधान अंगीकृत; 15 अनुच्छेद तत्काल प्रवृत्त — संविधान दिवस
24 जनवरी 1950
अंतिम बैठक; 284 हस्ताक्षर; राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत; राजेंद्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित · संयुक्त प्रांत का नाम उत्तर प्रदेश
26 जनवरी 1950
संविधान प्रवृत्त — गणतंत्र दिवस
1951
1वाँ संशोधन — नौवीं अनुसूची, अनु. 15(4), 31क, 31ख · शंकरी प्रसाद वाद
1 अक्टूबर 1953
आंध्र राज्य — भाषाई आधार पर पहला राज्य
सितंबर 1955
फ़ज़ल अली आयोग की रिपोर्ट
1 नवंबर 1956
राज्य पुनर्गठन अधिनियम + 7वाँ संशोधन — 14 राज्य, 6 संघ राज्यक्षेत्र
14 मार्च 1960
बेरुबाड़ी संघ मामला — प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं (बाद में उलटा)
1960 · 1962
9वाँ संशोधन (बेरुबाड़ी) · 12वाँ एवं 14वाँ संशोधन (गोवा-दमण-दीव; पुदुचेरी)
1967
गोलकनाथ वाद · 21वाँ संशोधन — सिंधी आठवीं अनुसूची में
1971
24वाँ एवं 25वाँ संशोधन — अनु. 13(4), 368(1)/(3), 31ग
24 अप्रैल 1973
केशवानंद भारती — मूल ढाँचा सिद्धांत; प्रस्तावना संविधान का अंग
1974–75
35वाँ एवं 36वाँ संशोधन — सिक्किम पूर्ण राज्य (16 मई 1975)
7 नवंबर 1975
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण — मूल ढाँचे का पहला प्रयोग
1976
42वाँ संशोधन — प्रस्तावना में तीन शब्द; भाग IV-क; अनु. 368(4)-(5)
1977 · 1978
43वाँ संशोधन · 44वाँ संशोधन — संपत्ति का अधिकार हटा; अनु. 300क
31 जुलाई 1980
मिनर्वा मिल्स — अनु. 368(4) एवं (5) अपास्त
1985 · 1987
52वाँ संशोधन — दसवीं अनुसूची · मिज़ोरम, अरुणाचल (20 फ़रवरी), गोवा (30 मई)
1989 · 1992
61वाँ संशोधन — मताधिकार 18 वर्ष · 71वाँ संशोधन — कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली
1992
73वाँ एवं 74वाँ संशोधन — भाग IX एवं IX-क; ग्यारहवीं एवं बारहवीं अनुसूची
1994 · 1997
एस.आर. बोम्मई — पंथनिरपेक्षता एवं संघवाद मूल ढाँचा · एल. चंद्र कुमार — न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचा
92वाँ संशोधन — बोडो, डोगरी, मैथिली, संताली (प्रवृत्त 7 जनवरी 2004) · नागरिकता संशोधन प्रवृत्त 3 दिसंबर 2004
11 जनवरी 2007 · 1 जनवरी 2007
आई.आर. कोएलो — नौवीं अनुसूची मूल ढाँचे की कसौटी पर · उत्तरांचल का नाम उत्तराखंड
2011 · 2015
97वाँ संशोधन — भाग IX-ख · 100वाँ संशोधन — बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता
16 अक्टूबर 2015
NJAC वाद — 99वाँ संशोधन अपास्त
2 जून 2014 · 2016
तेलंगाना — 29वाँ राज्य · 101वाँ संशोधन — GST; अनु. 279क
31 अक्टूबर 2019 · 12 दिसंबर 2019
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन — 28 राज्य · CAA, 2019 को स्वीकृति
2023 · 11 मार्च 2024
106वाँ संशोधन — महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण · CAA नियम अधिसूचित
11.2 रटने योग्य निर्णायक तथ्य
संविधान सभा — प्रस्तावित 389, विभाजन के बाद 299;
11 अधिवेशन, 165 दिन, प्रारूप पर 114 दिन,
₹64 लाख, 2 वर्ष 11 माह 18 दिन।
तीन तिथियाँ — अंगीकरण 26 नवंबर 1949, हस्ताक्षर
24 जनवरी 1950, प्रवर्तन 26 जनवरी 1950।
26 नवंबर 1949 को तत्काल प्रवृत्त 15 अनुच्छेद — 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366,
367, 379, 380, 388, 391, 392 एवं 393 (तथा स्वयं अनुच्छेद 394, जिसमें यह सूची दी गई है)।
अनुच्छेद 395 ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 एवं
भारत शासन अधिनियम, 1935 का निरसन किया — पर प्रिवी काउंसिल अधिकारिता उन्मूलन अधिनियम, 1949
का नहीं।
मूल संविधान — प्रस्तावना + 395 अनुच्छेद + 22 भाग +
8 अनुसूचियाँ। वर्तमान —25 भाग, 12 अनुसूचियाँ,
लगभग 450 प्रवृत्त अनुच्छेद (अंतिम क्रमांक आज भी 395)।
प्रस्तावना — केवल एक बार संशोधित (42वाँ, 1976); तीन शब्द —
समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता; अंकित तिथि 26 नवंबर 1949।
नागरिकता की तीन कट-ऑफ तिथियाँ —26 जनवरी 1950,
1 जुलाई 1987, 3 दिसंबर 2004। CAA की कट-ऑफ
31 दिसंबर 2014; देशीयकरण 11 → 5 वर्ष।
अनुसूची-संख्याएँ — आठवीं में 22 भाषाएँ · नौवीं में 284
अधिनियम · ग्यारहवीं में 29 विषय · बारहवीं में 18 विषय ·
सातवीं में मूलतः 97 / 66 / 47 विषय।
वर्तमान भारत —28 राज्य, 8 संघ राज्यक्षेत्र;
विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्र केवल तीन — दिल्ली, पुदुचेरी, जम्मू-कश्मीर।
अब तक संशोधन —106; नवीनतम 106वाँ (2023) —
नारी शक्ति वंदन अधिनियम।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — इस अध्याय के UP-सूत्र एक साथ
संविधान सभा में 55 सीटें — बंगाल के बाद सर्वाधिक; विभाजन के बाद सबसे बड़ा प्रांतीय समूह।
सदस्य — नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, पुरुषोत्तम दास टंडन, रफ़ी अहमद किदवई,
जे.बी. कृपलानी, सुचेता कृपलानी, हृदयनाथ कुंज़रू, तथा एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य
बेगम ऐज़ाज़ रसूल (सांडीला, हरदोई)।
24 जनवरी 1950 — संयुक्त प्रांत का नाम उत्तर प्रदेश; आज
उत्तर प्रदेश दिवस।
भाषाई पुनर्गठन के दो शिल्पी UP से — धर आयोग के अध्यक्ष एस.के. धर
(इलाहाबाद उच्च न्यायालय) तथा राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्य एच.एन. कुंज़रू।
9 नवंबर 2000 — उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 से उत्तरांचल;
1 जनवरी 2007 से नाम उत्तराखंड — अनुच्छेद 3(ङ) का उदाहरण।
21 नवंबर 2011 — UP विधानसभा का चार राज्यों (पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश,
पश्चिम प्रदेश) में विभाजन का संकल्प; केंद्र ने लौटाया — अनुच्छेद 3 में अंतिम शक्ति संसद की।
पहले संविधान संशोधन (1951) की नौवीं अनुसूची में उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन
एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 मूल 13 प्रविष्टियों में सम्मिलित था।
मूल ढाँचे का पहला प्रयोग UP से जुड़े वाद में —इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण
का मूल विवाद रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र का था, जिस पर 12 जून 1975 को
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने निर्णय दिया था।
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (संविधान संशोधन) सूची-II (परिवर्तन) A. 7वाँ संशोधन 1. अनुच्छेद 279क (GST परिषद) B. 36वाँ संशोधन 2. भाग VII का निरसन एवं राज्यों का चार-स्तरीय वर्गीकरण समाप्त C. 92वाँ संशोधन 3. सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा D. 101वाँ संशोधन 4. आठवीं अनुसूची में चार भाषाएँ जोड़ी गईं कूट:
उत्तर: (C)7वाँ संशोधन (1956) — भाग VII निरसित, भाग क/ख/ग/घ का वर्गीकरण समाप्त; 36वाँ (1975) — सिक्किम पूर्ण राज्य; 92वाँ (2003) — बोडो, डोगरी, मैथिली एवं संताली; 101वाँ (2016) — GST एवं अनुच्छेद 279क। अतः A-2, B-3, C-4, D-1।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): अनुच्छेद 5 से 9 संविधान के अंगीकरण के दिन, 26 नवंबर 1949 को ही प्रवृत्त हो गए थे। कारण (R): यह आवश्यक था कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते समय यह पहले से निश्चित हो कि भारत का नागरिक कौन है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 394 उन 15 अनुच्छेदों की सूची देता है जो तत्काल प्रवृत्त हुए — उनमें नागरिकता वाले अनुच्छेद 5, 6, 7, 8 एवं 9 सम्मिलित हैं। कारण भी ठीक यही है — प्रवर्तन के दिन “नागरिक” की परिभाषा पहले से तैयार होनी चाहिए थी।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (तथ्य) (विवरण) 1. संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन — 9 दिसंबर 1946 2. प्रस्तावना में अंकित तिथि — 26 नवंबर 1949 3. उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड — संविधान संशोधन द्वारा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)नाम-परिवर्तन अनुच्छेद 3(ङ) के अधीन संसद की साधारण विधि — उत्तरांचल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2006 — से हुआ, संविधान संशोधन से नहीं (अनुच्छेद 4 के कारण ऐसी विधि संविधान संशोधन मानी ही नहीं जाती)। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।