भाग 2 · भारत का इतिहास

2.1 प्राचीन भारत

स्रोतों एवं प्रागितिहास से लेकर हर्ष तथा प्रायद्वीपीय राजवंशों तक (लगभग 1200 ई. तक) — विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के संदर्भ में

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UPPSC प्राचीन भारत से प्रायः 4–6 प्रश्न पूछता है, और उनका स्वरूप लगभग सदैव एक-सा रहता है — स्थल↔नदी/राज्य, अभिलेख↔शासक, ग्रंथ↔लेखक, शासक↔उपाधि का सुमेलन; अथवा घटनाओं का कालक्रम। इसलिए इस अध्याय में हर खंड के अंत में वही तालिका दी गई है जिस रूप में प्रश्न बनता है। पढ़ते समय कहानी समझिए, पर याद तालिका कीजिए।

कला, स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला तथा दर्शन का विस्तृत विवेचन अध्याय 2.5 (कला एवं संस्कृति) में है। यहाँ उनका उल्लेख केवल ऐतिहासिक संदर्भ जितना है।

विषय-सूची

  1. इतिहास के स्रोत
  2. प्रागैतिहासिक काल
  3. सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता
  4. वैदिक काल
  5. महाजनपद काल एवं धार्मिक आंदोलन
  6. मगध का उत्कर्ष
  7. विदेशी आक्रमण — ईरानी एवं यूनानी
  8. मौर्य साम्राज्य
  9. मौर्योत्तर काल
  10. संगम युग
  11. गुप्त साम्राज्य
  12. गुप्तोत्तर काल
  13. दक्षिण एवं प्रायद्वीपीय भारत
  14. प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज एवं धर्म का विकास — कालखंड-वार सारांश

1. इतिहास के स्रोत

प्राचीन भारत का इतिहास लिखना कठिन है क्योंकि यहाँ तिथि-सहित इतिहास-लेखन की परंपरा नहीं थी। कल्हण (Kalhana) की राजतरंगिणी (1148–50 ई., कश्मीर) को प्रायः भारत का पहला ऐतिहासिक चेतना-युक्त ग्रंथ कहा जाता है — उससे पहले का इतिहास हमें तीन प्रकार के स्रोतों को जोड़कर बनाना पड़ता है: साहित्यिक, पुरातात्विक तथा विदेशी विवरण

1.1 साहित्यिक स्रोत — धार्मिक

ब्राह्मण परंपरा: वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग तथा सूत्र-साहित्य से वैदिक समाज, अर्थव्यवस्था और विश्वासों की जानकारी मिलती है। महाकाव्य — रामायण (वाल्मीकि) तथा महाभारत (वेदव्यास)। महाभारत का विकास तीन चरणों में हुआ — मूल रूप जय संहिता (8,800 श्लोक) → भारत (24,000) → महाभारत (1,00,000 श्लोक; इसीलिए 'शतसाहस्री संहिता')। 18 महापुराण राजवंशावलियाँ देते हैं; मत्स्य, वायु, विष्णु तथा भागवत पुराण ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी हैं।

बौद्ध परंपरा: त्रिपिटक — विनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (उपदेश) तथा अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विवेचन); भाषा पालि। जातक कथाएँ (लगभग 547) बुद्ध के पूर्व-जन्मों की कथाओं के बहाने छठी शताब्दी ई.पू. के सामाजिक-आर्थिक जीवन का चित्र देती हैं। श्रीलंकाई इतिवृत्त दीपवंश तथा महावंश मौर्य इतिहास के लिए अनिवार्य हैं। अन्य — मिलिन्दपन्हो, महावस्तु, ललितविस्तर, दिव्यावदान

जैन परंपरा: 12 अंग, 12 उपांग तथा अन्य आगम; भाषा अर्धमागधी प्राकृत। भगवती सूत्र (महाजनपद एवं महावीर का जीवन), कल्पसूत्र (भद्रबाहु), आचारांग सूत्र, हेमचंद्र का परिशिष्टपर्वन् (चंद्रगुप्त मौर्य की अनुश्रुति)।

1.2 साहित्यिक स्रोत — धर्मेतर (लौकिक)

ग्रंथलेखककिस पर प्रकाश
अर्थशास्त्रकौटिल्य / चाणक्य / विष्णुगुप्तमौर्य प्रशासन, राजस्व, गुप्तचर, कूटनीति
अष्टाध्यायीपाणिनिसंस्कृत व्याकरण; तत्कालीन जनपद, संस्थाएँ
महाभाष्यपतंजलिशुंग काल; यवन आक्रमण का संकेत
मुद्राराक्षसविशाखदत्तनंद-उन्मूलन एवं चंद्रगुप्त मौर्य का उत्कर्ष
मालविकाग्निमित्रम्कालिदासपुष्यमित्र शुंग एवं अग्निमित्र
गार्गी संहितायवन (हिन्द-यवन) आक्रमण का उल्लेख
हर्षचरितबाणभट्टहर्षवर्धन; भारत की प्रथम ऐतिहासिक जीवनी-शैली की रचना
राजतरंगिणीकल्हणकश्मीर का क्रमबद्ध राजनीतिक इतिहास
कथासरित्सागरसोमदेवलोककथाओं में ऐतिहासिक संकेत
नीतिसारकामंदकगुप्तकालीन राजनीति-शास्त्र

1.3 पुरातात्विक स्रोत

(क) अभिलेख (Epigraphy) — सबसे विश्वसनीय स्रोत, क्योंकि इनमें बाद में परिवर्तन संभव नहीं। ब्राह्मी लिपि का वाचन 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) ने किया — इसी से अशोक के अभिलेख पढ़े जा सके। अभिलेख पत्थर, स्तंभ, ताम्रपत्र, मंदिर-भित्ति तथा मूर्ति-पीठ पर मिलते हैं।

अभिलेखशासकस्थानविषय
प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख)समुद्रगुप्त (रचयिता हरिषेण)प्रयागराज, उ.प्र.दिग्विजय; आर्यावर्त-दक्षिणापथ नीति
भितरी स्तंभ लेखस्कंदगुप्तगाजीपुर, उ.प्र.हूण एवं पुष्यमित्रों पर विजय; गुप्त वंशावली
जूनागढ़/गिरनार शिलालेख (लगभग 150 ई.)रुद्रदामन प्रथम (शक)जूनागढ़, गुजरातसुदर्शन झील की मरम्मत; संस्कृत गद्य का प्राचीनतम विस्तृत अभिलेख
जूनागढ़ अभिलेख (दूसरा)स्कंदगुप्तजूनागढ़सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण (पर्णदत्त–चक्रपालित)
हाथीगुंफा अभिलेखखारवेल (कलिंग)उदयगिरि, ओडिशासैन्य अभियान; जैन धर्म; 'नंदराज' की नहर
नासिक प्रशस्तिगौतमीपुत्र सातकर्णि (उत्कीर्ण माता गौतमी बलश्री द्वारा)नासिक, महाराष्ट्रशक नहपान पर विजय; 'एकब्राह्मण'
ऐहोल प्रशस्ति (634–35 ई.)पुलकेशिन द्वितीय (रचयिता रविकीर्ति)ऐहोल, कर्नाटकहर्ष की पराजय; मेगुती जैन मंदिर पर उत्कीर्ण
बेसनगर गरुड़ स्तंभ (लगभग 113 ई.पू.)हेलियोडोरस (राजदूत), शुंग नरेश भागभद्र के काल मेंविदिशा, म.प्र.भागवत/वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य
मंदसौर अभिलेख (473 ई.)कुमारगुप्त प्रथम के काल में, बंधुवर्मन के अधीनमंदसौर, म.प्र.रेशम-बुनकर श्रेणी द्वारा सूर्य मंदिर
एरण अभिलेख (510 ई.)भानुगुप्त के काल मेंसागर, म.प्र.सती-प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य
उत्तरमेरूर अभिलेख (919 एवं 921 ई.)परांतक चोल प्रथमकाँचीपुरम्, तमिलनाडुग्राम-सभा की चुनाव प्रणाली (कुडवोलै)
मंडगपट्टु अभिलेखमहेंद्रवर्मन प्रथम (पल्लव)तमिलनाडुईंट-लकड़ी-धातु-गारे के बिना गुहा-मंदिर

(ख) सिक्के (Numismatics) — जहाँ अभिलेख मौन हैं, वहाँ सिक्के राजवंश, विस्तार, धर्म तथा आर्थिक स्थिति बताते हैं। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं।

(ग) स्मारक एवं उत्खनन — नगर-अवशेष (हड़प्पा, कौशांबी, हस्तिनापुर), स्तूप, चैत्य-विहार, मंदिर, मृद्भांड-परंपराएँ (गैरिक मृद्भांड/OCP, चित्रित धूसर मृद्भांड/PGW, उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड/NBPW) तथा भौतिक अवशेष। मृद्भांड पुरातत्व की 'घड़ी' हैं — किसी स्तर की तिथि तय करने का सबसे सुलभ साधन।

1.4 विदेशी विवरण

यात्री / लेखकदेशकालकिसके समयकृति
हेरोडोटसयूनान5वीं शताब्दी ई.पू.ईरानी शासनहिस्टोरिका
मेगस्थनीजयूनानचौथी शताब्दी ई.पू.चंद्रगुप्त मौर्य (सेल्यूकस का राजदूत)इंडिका
डाइमेकसयूनानतीसरी शताब्दी ई.पू.बिंदुसार (एंटियोकस का राजदूत)
डायोनिसियसमिस्रतीसरी शताब्दी ई.पू.अशोक (टॉलेमी फिलाडेल्फस का राजदूत)
अज्ञात लेखकयूनानी-मिस्रीलगभग 80 ई.पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी (बंदरगाह एवं व्यापार)
टॉलेमीमिस्रदूसरी शताब्दी ई.ज्योग्रैफी (भूगोल)
प्लिनीरोमप्रथम शताब्दी ई.नेचुरलिस हिस्टोरिया (रोमन स्वर्ण के बहिर्गमन की शिकायत)
फाह्यानचीन399–414 ई. की यात्राचंद्रगुप्त द्वितीयफो-क्यो-की
ह्वेनसांगचीनलगभग 630–644 ई. भारत मेंहर्षवर्धनसी-यू-की ('यात्रियों का राजकुमार')
इत्सिंगचीनलगभग 671–695 ई.गुप्तोत्तरनालंदा एवं बौद्ध संघ का विवरण
सुलेमानअरब9वीं शताब्दीपाल एवं प्रतिहारव्यापारिक यात्रा-वृत्तांत
अल-मसूदीअरब10वीं शताब्दीमुरूज-उल-जहब
अल-बरूनीमध्य एशिया11वीं शताब्दीमहमूद गजनवी के साथतहकीक-ए-हिन्द (किताब-उल-हिन्द)
सावधानी — स्रोतों के भ्रम
उत्तर प्रदेश संदर्भ

प्राचीन भारत के कई निर्णायक अभिलेख उत्तर प्रदेश की भूमि पर हैं — प्रयाग प्रशस्ति (प्रयागराज; वही स्तंभ जो मूलतः कौशांबी में अशोक ने लगवाया था), भितरी स्तंभ लेख (गाजीपुर), कहौम स्तंभ लेख (गोरखपुर क्षेत्र, स्कंदगुप्त), बिलसड़ अभिलेख (एटा, कुमारगुप्त प्रथम), गढ़वा अभिलेख (प्रयागराज) तथा सारनाथ एवं कौशांबी के लघु स्तंभ लेख (अशोक)। UPPSC प्रायः यही पूछता है कि कोई अभिलेख किस जिले में है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित प्राचीन भारतीय अभिलेखों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन् प्रथम)
2. प्रयाग प्रशस्ति (हरिषेण)
3. हाथीगुम्फा अभिलेख (खारवेल)
4. ऐहोल प्रशस्ति (रविकीर्ति)
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 1, 3, 4B3, 4, 2, 1C3, 1, 2, 4D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. का है; शक क्षत्रप रुद्रदामन् प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख लगभग 150 ई. का तथा संस्कृत गद्य का प्रारंभिक विशिष्ट उदाहरण है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति चौथी शताब्दी की और पुलकेशिन द्वितीय की ऐहोल प्रशस्ति 634 ई. की है। अतः सही क्रम 3, 1, 2, 4 है।

प्र.2 भारत-रोम व्यापार के पुरातात्त्विक एवं साहित्यिक साक्ष्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' की रचना टॉलेमी ने की थी।
2. अरिकामेडु से रोमन 'एरेटाइन वेयर' तथा एम्फोरा के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
3. 'पेरिप्लस' में अरिकामेडु को 'पोदुके' नाम से उल्लिखित माना जाता है।
4. अरिकामेडु का वैज्ञानिक उत्खनन मोर्टिमर व्हीलर के निर्देशन में हुआ था।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 2, 3 और 4Cकेवल 1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' प्रथम शताब्दी ई. के किसी अज्ञात यूनानी नाविक-व्यापारी की रचना मानी जाती है, टॉलेमी की नहीं; अतः कथन 1 गलत है। पुडुचेरी के निकट अरिकामेडु से इटली में बने रोमन 'एरेटाइन वेयर', एम्फोरा, काँच एवं मनके मिले हैं; 'पेरिप्लस' तथा टॉलेमी दोनों में इसे 'पोदुके' कहा गया है, और 1945 में इसका वैज्ञानिक उत्खनन मोर्टिमर व्हीलर ने कराया था। अतः कथन 2, 3 तथा 4 सही हैं।

प्र.3 सौराष्ट्र की सुदर्शन झील के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसका निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने करवाया था।
2. स्कंदगुप्त के शासनकाल में इसके टूटे बाँध की मरम्मत राज्यपाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने करवाई थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)जूनागढ़ (गिरनार) शिलालेख के अनुसार सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के राष्ट्रिय (राज्यपाल) पुष्यगुप्त ने कराया तथा अशोक के काल में यवनराज तुषास्प ने उसमें नहरें जुड़वाईं। रुद्रदामन प्रथम ने लगभग 150 ई. में उसका जीर्णोद्धार करवाया और गुप्तकाल में स्कंदगुप्त के समय सुराष्ट्र के राज्यपाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने बाँध की मरम्मत करवाई। अतः दोनों कथन सही हैं।

2. प्रागैतिहासिक काल

जिस काल के लिखित साक्ष्य नहीं मिलते उसे प्रागैतिहासिक (Prehistoric) कहते हैं; जिसकी लिपि मिली है पर पढ़ी नहीं जा सकी (जैसे हड़प्पा) उसे आद्य-ऐतिहासिक (Proto-historic) कहते हैं। भारत में प्रागैतिहासिक उपकरणों की प्रथम खोज 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट (Robert Bruce Foote) ने पल्लवरम् (तमिलनाडु) में की — इसीलिए उन्हें 'भारतीय प्रागितिहास का जनक' कहा जाता है।

2.1 पुरापाषाण काल (Palaeolithic, लगभग 25 लाख – 10,000 ई.पू.)

आखेट एवं खाद्य-संग्रह पर आधारित जीवन; क्वार्ट्ज़ाइट के बड़े, अपरिष्कृत उपकरण। तीन चरण —

2.2 मध्यपाषाण काल (Mesolithic, लगभग 10,000 – 6000 ई.पू.)

विशेषता — सूक्ष्म पाषाण उपकरण (microliths); आखेट के साथ पशुपालन का आरंभ; शव-संस्कार की व्यवस्थित परंपरा तथा शैलचित्रों की शुरुआत।

2.3 नवपाषाण काल (Neolithic, लगभग 7000 – 1000 ई.पू., क्षेत्रवार भिन्न)

यह मानव-इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ है — कृषि, पशु-पालन, स्थायी बस्ती, मृद्भांड (चाक), घिसे-पॉलिश किए पत्थर के औजार। गॉर्डन चाइल्ड ने इसे 'नवपाषाण क्रांति' कहा।

स्थलक्षेत्रविशिष्ट साक्ष्य
मेहरगढ़बलूचिस्तान (पाकिस्तान), बोलन नदीभारतीय उपमहाद्वीप में कृषि (गेहूँ, जौ) एवं पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य (लगभग 7000 ई.पू.); कपास का आरंभिक साक्ष्य
बुर्जहोमकश्मीर घाटीगर्त-आवास (pit dwelling); मानव के साथ कुत्ते का दफन; अस्थि-उपकरण
गुफकरालकश्मीर'कुम्हार की गुफा'; गर्त-आवास
चिरांदसारण, बिहार (गंगा-घाघरा क्षेत्र)हड्डी एवं सींग के उपकरणों की बहुलता
कोल्डिहवा एवं महगड़ाप्रयागराज, उ.प्र. (बेलन घाटी)धान (चावल) का अत्यंत प्राचीन साक्ष्य; गोलाकार झोपड़ियाँ, हस्तनिर्मित मृद्भांड
पिकलीहल, ब्रह्मगिरि, मस्की, संगनकल्लू, हल्लूरकर्नाटकराख के टीले (ash mounds); पशुपालक बस्तियाँ
पैयमपल्लीतमिलनाडुदक्षिणी नवपाषाण
दाओजली हैडिंगअसम (पूर्वोत्तर)जेडाइट पत्थर के औजार — पूर्वी एशिया से संपर्क का संकेत

ध्यान रखें: कोल्डिहवा से मिले धान की तिथि को लेकर विद्वानों में गंभीर मतभेद है — कुछ इसे 6500 ई.पू. तक ले जाते हैं, जबकि अनेक पुराविद् इसे बहुत बाद का (लगभग 2000 ई.पू.) मानते हैं। परीक्षा में यह स्थल 'चावल के प्राचीनतम साक्ष्य' के रूप में पूछा जाता है; तिथि विवादित है, इसलिए तिथि पर न अटकें।

2.4 ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic, लगभग 3000 – 1000 ई.पू.)

पत्थर के साथ ताँबे का प्रयोग। भारत में अधिकांश ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ हड़प्पा के समकालीन या उससे बाद की, पर ग्रामीण हैं — वे नगरीय नहीं थीं। मुख्य फसलें — गेहूँ, जौ, ज्वार, बाजरा, मसूर, कुल्थी; शिशु-मृत्यु-दर ऊँची; घर के फर्श के नीचे शवाधान।

संस्कृतिप्रमुख स्थलराज्य / नदीविशेषता
अहाड़ / बनासआहड़ (ताम्बवती), गिलुंड, बालाथलराजस्थान, बनास नदीपत्थर के मकान; ताम्र-गलन का बड़ा केंद्र
कायथाकायथाम.प्र., चंबल क्षेत्रपूर्व-हड़प्पा तत्वों का मेल
मालवानवदाटोली, एरण, महेश्वरम.प्र., नर्मदाउत्कृष्ट चित्रित मृद्भांड; एरण में परिखा-युक्त बस्ती
जोरवेइनामगाँव, दैमाबाद, चंदोली, नेवासा, जोरवेमहाराष्ट्रदक्कन की सर्वाधिक विकसित ताम्रपाषाणिक संस्कृति
ताम्र-निधि एवं गैरिक मृद्भांड (OCP)सैपई (एटा), बिसौली, राजपुर परसू, हस्तिनापुरउ.प्र. — गंगा-यमुना दोआबहार्पून, अंत्यास्त्र, मानवाकृति ताम्र-पिंड
उत्तर प्रदेश संदर्भ — प्रागितिहास का एक पूरा संग्रहालय
सावधानी — जिन युग्मों पर छात्र फिसलते हैं

कालक्रम — प्रागितिहास

क्रमकालअनुमानित तिथिनिर्णायक परिवर्तन
1निम्न पुरापाषाणलगभग 25 लाख – 1 लाख ई.पू.हस्तकुठार; आखेट-संग्रहण
2मध्य पुरापाषाणलगभग 1 लाख – 40,000 ई.पू.फलक-उपकरण
3उच्च पुरापाषाणलगभग 40,000 – 10,000 ई.पू.आधुनिक मानव; कला का आरंभ
4मध्यपाषाणलगभग 10,000 – 6000 ई.पू.सूक्ष्म पाषाण; पशुपालन
5नवपाषाणलगभग 7000 ई.पू. सेकृषि; स्थायी ग्राम; मृद्भांड
6ताम्रपाषाणलगभग 3000 – 1000 ई.पू.ताँबे का प्रयोग; ग्रामीण संस्कृतियाँ
7लौह युगलगभग 1200 ई.पू. सेलोहा; दोआब में विस्तार; PGW
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 नवपाषाण कालीन स्थलों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. मेहरगढ़ से भारतीय उपमहाद्वीप में गेहूँ-जौ की कृषि तथा पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं।
2. कश्मीर के बुर्जहोम से गर्तावास (pit-dwellings) तथा मानव के साथ कुत्ते के शवाधान के साक्ष्य मिले हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)बलूचिस्तान स्थित मेहरगढ़ उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषक ग्राम है, जहाँ गेहूँ-जौ की खेती तथा भेड़-बकरी-पशुपालन के आरंभिक साक्ष्य मिले हैं। कश्मीर के बुर्जहोम से गर्तावास, हड्डी के उपकरण तथा स्वामी के साथ कुत्ते के दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 ताम्रपाषाणिक (Chalcolithic) संस्कृतियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इनामगाँव महाराष्ट्र में घोड़ नदी के तट पर स्थित जोर्वे संस्कृति का प्रमुख स्थल है।
2. ताम्रपाषाणिक समुदाय लोहे के उपयोग से भली-भाँति परिचित थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)इनामगाँव महाराष्ट्र में घोड़ नदी के दाहिने तट पर अवस्थित है और यह उत्तर-जोर्वे तथा पूर्व-जोर्वे संस्कृति के अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहा है, अतः कथन 1 सही है। ताम्रपाषाण अवस्था में केवल ताँबे तथा पत्थर के उपकरण प्रयोग में थे; लोहे का ज्ञान इस अवस्था के पश्चात् हुआ, अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा स्थल हड़प्पा सभ्यता से संबद्ध नहीं है?

AबनावलीBचिरांदCरोपड़Dसुरकोटदा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)बनावली (हरियाणा), रोपड़ अर्थात् रूपनगर (पंजाब) तथा सुरकोटदा (गुजरात) हड़प्पा सभ्यता के उत्खनित स्थल हैं; सुरकोटदा घोड़े की अस्थियों के विवादास्पद साक्ष्य के लिए चर्चित है। चिरांद बिहार में गंगा के तट पर स्थित नवपाषाणकालीन बस्ती है, जो हड़प्पा सभ्यता से संबद्ध नहीं है।

3. सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता

यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम नगरीय सभ्यता है — मिस्र एवं मेसोपोटामिया की समकालीन, पर क्षेत्रफल में उन दोनों से बड़ी। इसे 'सिंधु घाटी सभ्यता' नाम भौगोलिक आधार पर मिला, किंतु चूँकि सर्वप्रथम उत्खनित स्थल हड़प्पा था, पुरातत्व की परंपरा के अनुसार इसे 'हड़प्पा सभ्यता' कहना अधिक सही है — और चूँकि इसके अनेक स्थल सिंधु से बाहर हैं, अब 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' नाम भी प्रचलित है।

हड़प्पा मोहनजोदड़ो धौलावीरा राखीगढ़ी कालीबंगा बनावली लोथल सुरकोटदा चन्हूदड़ो रोपड़ आलमगीरपुर
महानगर / प्रमुखबंदरगाहवर्तमान उत्तर प्रदेश
सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल। मोहनजोदड़ो एवं चन्हूदड़ो वर्तमान पाकिस्तान (सिंध) में हैं, इसीलिए वे रेखा के बाहर दिखते हैं। आलमगीरपुर (मेरठ) सभ्यता का सर्वाधिक पूर्वी ज्ञात स्थल है।
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार (Great Bath) — नगर-नियोजन एवं जल-प्रबंधन का प्रमाण · चित्र: CC BY-SA 3.0
धौलावीरा — जल-संरक्षण व्यवस्था
धौलावीरा (कच्छ, गुजरात) — जल-संरक्षण की उन्नत व्यवस्था; 2021 में UNESCO विश्व धरोहर घोषित · चित्र: CC BY-SA 4.0
पशुपति मुहर
पशुपति मुहर — सिंधु धर्म में प्राक्-शिव पूजा का संकेत माना जाता है · चित्र: Public domain

3.1 खोज एवं काल

3.2 विस्तार — चारों सीमांत स्थल

सभ्यता का आकार लगभग त्रिभुजाकार था और क्षेत्रफल लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर — समकालीन मिस्र एवं मेसोपोटामिया दोनों से बड़ा। सीमांत स्थल याद रखना UPPSC में सीधा प्रश्न है:

दिशास्थलनदीवर्तमान स्थिति
उत्तरमाण्डाचिनाबजम्मू-कश्मीर
दक्षिणदैमाबादप्रवराअहमदनगर, महाराष्ट्र
पूर्वआलमगीरपुरहिंडन (यमुना की सहायक)मेरठ, उत्तर प्रदेश
पश्चिमसुत्कागेनडोरदाश्कबलूचिस्तान, पाकिस्तान (मकरान तट)

3.3 नगर-नियोजन

यही इस सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है।

3.4 प्रमुख स्थल एवं उनकी विशिष्ट खोजें सबसे अधिक पूछा जाने वाला

स्थलनदीराज्य / देशविशिष्ट खोज
हड़प्पारावीसाहीवाल, पंजाब (पाकिस्तान)दो पंक्तियों में 6+6 अन्नागार; श्रमिक आवास; R-37 कब्रिस्तान तथा 'कब्रिस्तान H'; शंख का बैल; ताँबे का इक्का (गाड़ी)
मोहनजोदड़ोसिंधुलरकाना, सिंध (पाकिस्तान)विशाल स्नानागार (Great Bath); विशाल अन्नागार (सबसे बड़ी इमारत); पशुपति मुहर; नर्तकी की काँस्य मूर्ति; 'पुरोहित-राजा' की मूर्ति; बुने सूती वस्त्र का टुकड़ा; सभा-भवन
कालीबंगाघग्घरहनुमानगढ़, राजस्थानजुते हुए खेत (विश्व का प्राचीनतम); अग्नि-वेदिकाएँ; भूकंप का साक्ष्य; ऊँट की अस्थियाँ; लकड़ी की नाली; अलंकृत ईंट
लोथलभोगावाअहमदाबाद, गुजरातगोदीवाड़ा (dockyard); चावल की भूसी; फारस की खाड़ी की मुहर; युग्म-शवाधान; हाथीदाँत का पैमाना; अग्नि-वेदिका
धौलावीरामनहर एवं मानसर नाले (कच्छ का रण, खादिर बेट)कच्छ, गुजरातविशाल जल-संचय जलाशय; नगर का तीन भागों में विभाजन; 10 अक्षरों वाला विशाल साइनबोर्ड; स्टेडियम; 2021 में UNESCO विश्व धरोहर — यह सूची में आने वाला भारत का प्रथम हड़प्पाई स्थल है
राखीगढ़ीघग्घर (दृषद्वती क्षेत्र)हिसार, हरियाणाभारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल (लगभग 350 हेक्टेयर); प्राचीन DNA अध्ययन
चन्हूदड़ोसिंधुसिंध (पाकिस्तान)मनका बनाने का कारखाना; वक्राकार ईंट; बिल्ली का पीछा करते कुत्ते के पदचिह्न; दुर्ग-विहीन एकमात्र प्रमुख नगर
बनावलीरंगोईफतेहाबाद, हरियाणामिट्टी का हल (खिलौना); उत्तम किस्म का जौ; अरीय (radial) सड़क-योजना
सुरकोटदाकच्छ, गुजरातघोड़े की अस्थियों का सर्वाधिक स्पष्ट साक्ष्य; कब्रिस्तान में कलश-शवाधान
रोपड़ (रूपनगर)सतलजपंजाबस्वतंत्र भारत में उत्खनित प्रथम स्थल; मानव के साथ कुत्ते का दफन
आलमगीरपुरहिंडनमेरठ, उत्तर प्रदेशसभ्यता का पूर्वतम स्थल; स्थानीय नाम 'परशुराम का खेड़ा'
कोटदीजीसिंधुसिंध (पाकिस्तान)पूर्व-हड़प्पाई प्रस्तर-निर्मित रक्षा-प्राचीर; अग्निकांड के प्रमाण
सुत्कागेनडोरदाश्कबलूचिस्तान (पाकिस्तान)पश्चिमी सीमांत; बेबीलोन से व्यापार-चौकी
बालाकोट, अल्लाहदीनोसिंध (पाकिस्तान)शंख-उद्योग; लघु किंतु समृद्ध बस्ती
रंगपुर, देसलपुर, भगतरावगुजरातउत्तर-हड़प्पाई अवस्था; धान की भूसी (रंगपुर)

3.5 अर्थव्यवस्था

3.6 धर्म एवं समाज

3.7 लिपि

हड़प्पा लिपि भावचित्रात्मक (pictographic) है और आज तक पढ़ी नहीं जा सकी। इसमें लगभग 400–450 चिह्न हैं। लेखन की दिशा 'बुस्ट्रोफेडन' (गोमूत्रिका) है — पहली पंक्ति दाएँ से बाएँ, अगली बाएँ से दाएँ। सर्वाधिक लेख मुहरों पर मिलते हैं (सेलखड़ी/steatite की, प्रायः वर्गाकार)। सबसे लंबा ज्ञात लेख धौलावीरा के 'साइनबोर्ड' पर है।

3.8 पतन के सिद्धांत

सिद्धांतप्रतिपादकतर्क
आर्य आक्रमणमार्टिमर व्हीलर, गॉर्डन चाइल्डमोहनजोदड़ो में बिखरे कंकाल; ऋग्वेद का 'पुरंदर' इंद्र। अब लगभग अस्वीकृत
बाढ़ एवं नदी का मार्ग-परिवर्तनजॉन मार्शल, एस.आर. राव, एम.आर. साहनीमोहनजोदड़ो में गाद की परतें; बार-बार पुनर्निर्माण
भूकंप एवं जल-अवरोधजॉर्ज एफ. डेल्स, रॉबर्ट राइक्सभू-उत्थान से सिंधु का अवरुद्ध होना; कालीबंगा में भूकंप के चिह्न
जलवायु परिवर्तन / शुष्कताऑरेल स्टीन, अमलानंद घोषघग्घर-हाकड़ा का सूखना; वर्षा में कमी
पारिस्थितिक असंतुलनवॉल्टर फेयरसर्विसवनोन्मूलन, अति-चराई, ईंट-भट्टों हेतु लकड़ी की खपत
महामारी एवं आंतरिक ह्रासके.यू.आर. केनेडी आदिमलेरिया; प्रशासनिक शिथिलता

वर्तमान सहमति: पतन किसी एक कारण से नहीं, बल्कि बहु-कारक प्रक्रिया थी और यह अचानक नहीं, क्रमिक था — नगर उजड़े, पर लोग नहीं मिटे; वे पूर्व एवं दक्षिण की ओर बढ़कर ग्रामीण उत्तर-हड़प्पाई संस्कृतियों में ढल गए।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — हड़प्पा का पूर्वी छोर
सावधानी — हड़प्पा के सर्वाधिक फँसाने वाले बिंदु
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 हड़प्पा सभ्यता के पुरातात्त्विक साक्ष्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. धौलावीरा में वर्षाजल संचयन हेतु विशाल जलाशयों की शृंखला मिली है।
2. कालीबंगा से जुते हुए खेत के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
3. विशाल स्नानागार (Great Bath) हड़प्पा नगर से प्राप्त हुआ है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)गुजरात के धौलावीरा में जल-प्रबंधन की उन्नत व्यवस्था तथा जलाशयों की शृंखला मिली है, और कालीबंगा से प्राक्-हड़प्पा स्तर पर जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है। विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो के दुर्ग-क्षेत्र से प्राप्त हुआ था, हड़प्पा से नहीं — अतः कथन 3 गलत है।

प्र.2 हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इस सभ्यता के लोग कपास की खेती से परिचित थे, जिसे यूनानियों ने आगे चलकर 'सिंडन' कहा।
2. इस सभ्यता के लोग लोहे के उपयोग से परिचित थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)मेहरगढ़ तथा हड़प्पाई स्थलों से कपास के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं और यूनानियों ने भारतीय कपास को 'सिंडन' कहा, अतः कथन 1 सही है। हड़प्पा सभ्यता कांस्य युगीन थी — ताँबा, काँसा, सोना व चाँदी ज्ञात थे, किन्तु लोहे से यह सभ्यता अपरिचित थी; अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 सूची-I (हड़प्पाई स्थल) को सूची-II (नदी) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. कालीबंगा  B. रोपड़  C. लोथल  D. सुत्कागेनडोर
सूची-II: 1. भोगवा  2. घग्घर  3. दाश्क  4. सतलुज
कूट:

AA-4, B-2, C-3, D-1BA-2, B-4, C-1, D-3CA-4, B-2, C-1, D-3DA-2, B-4, C-3, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)कालीबंगा (राजस्थान) घग्घर के तट पर, रोपड़ (पंजाब) सतलुज के तट पर तथा लोथल (गुजरात) भोगवा के तट पर स्थित था। सुत्कागेनडोर हड़प्पा सभ्यता का पश्चिमतम स्थल है, जो बलूचिस्तान में दाश्क नदी पर अवस्थित था। अतः सही सुमेलन A-2, B-4, C-1, D-3 है।

4. वैदिक काल

हड़प्पा के नगरों के पतन के बाद उपमहाद्वीप का केंद्र पश्चिमोत्तर से खिसककर सप्तसिंधु और फिर गंगा-यमुना दोआब की ओर आ गया। इस काल का ज्ञान हमें मुख्यतः साहित्य से मिलता है, पुरातत्व से कम — इसलिए इसे 'वैदिक काल' कहते हैं। इसे दो भागों में बाँटा जाता है।

4.1 ऋग्वैदिक (आरंभिक वैदिक) काल — लगभग 1500–1000 ई.पू.

भौगोलिक क्षेत्र: 'सप्तसिंधु' — सिंधु एवं उसकी सहायक नदियाँ, अफगानिस्तान से लेकर पश्चिमी उ.प्र. तक। ऋग्वेद में सिंधु का उल्लेख सर्वाधिक बार है, जबकि सरस्वती को सर्वाधिक पवित्र ('नदीतमा') कहा गया है। गंगा का उल्लेख केवल एक बार, यमुना का तीन बार।

वैदिक नामआधुनिक नामवैदिक नामआधुनिक नाम
वितस्ताझेलमकुभाकाबुल
अस्किनी / चंद्रभागाचिनाबक्रुमुकुर्रम
परुष्णीरावीसुवास्तुस्वात
विपाशाव्यासगोमती/गोमलगोमल
शुतुद्रीसतलजदृषद्वतीचौतंग / घग्घर की सहायक
सदानीरागंडक (सामान्यतः मान्य पहचान)सिंधुसिंधु

राजनीतिक जीवन

सामाजिक जीवन

आर्थिक जीवन

धार्मिक जीवन

4.2 उत्तर वैदिक काल — लगभग 1000–600 ई.पू.

भौगोलिक केंद्र गंगा-यमुना दोआब की ओर खिसक गया — कुरु एवं पांचाल इस युग के हृदय बन गए। इसका पुरातात्विक समकक्ष चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) संस्कृति है, और इसी काल में लोहे ('श्याम अयस' / 'कृष्ण अयस') का प्रयोग आरंभ हुआ, जिसने घने वन काटकर दोआब में कृषि संभव बनाई।

राजनीतिक परिवर्तन

सामाजिक परिवर्तन

आर्थिक परिवर्तन

धार्मिक परिवर्तन

4.3 वैदिक साहित्य — सुमेलन-योग्य तालिका

वेदविषयब्राह्मणआरण्यकप्रमुख उपनिषद
ऋग्वेद — 10 मंडल, 1028 सूक्त, लगभग 10,600 मंत्रदेवताओं की स्तुति; प्राचीनतम वेदऐतरेय, कौषीतकि (शांखायन)ऐतरेय, कौषीतकिऐतरेय, कौषीतकि
सामवेद — 1810 (या 1875) मंत्रगायन; भारतीय संगीत का मूलपंचविंश (ताण्ड्य), षड्विंश, जैमिनीयतवलकार (जैमिनीय)छांदोग्य, केन
यजुर्वेद — शुक्ल एवं कृष्णयज्ञ की विधि; गद्य एवं पद्य दोनोंशतपथ (शुक्ल — सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण ब्राह्मण), तैत्तिरीय (कृष्ण)बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, मैत्रायणीबृहदारण्यक (सबसे बड़ा एवं प्राचीनतम), ईश, कठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर
अथर्ववेद — 20 कांडजादू-टोना, रोग-निवारण, आयुर्वेद, लोक-जीवन; 'ब्रह्मवेद'गोपथ (एकमात्र)कोई आरण्यक नहींमुंडक ('सत्यमेव जयते'), प्रश्न, माण्डूक्य
उत्तर प्रदेश संदर्भ — उत्तर वैदिक काल की भूमि

उत्तर वैदिक संस्कृति का हृदय कुरु-पांचाल क्षेत्र था, जो आज का पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा है। PGW मृद्भांड तथा आरंभिक लोहे के साक्ष्य देने वाले प्रमुख स्थल उ.प्र. में हैं — हस्तिनापुर (मेरठ) (यहाँ बी.बी. लाल के उत्खनन में बाढ़ से बस्ती के उजड़ने का साक्ष्य मिला, जो पुराणों की 'कौशांबी स्थानांतरण' की अनुश्रुति से मेल खाता है), अतरंजीखेड़ा (एटा), अहिच्छत्र (बरेली), कांपिल्य (फर्रुखाबाद), श्रृंगवेरपुर (प्रयागराज) एवं कौशांबी। परीक्षा में PGW का संबंध सीधे इन स्थलों से पूछा जाता है।

सावधानी — वैदिक काल के क्लासिक distractor
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (ब्राह्मण ग्रंथ) को सूची-II (संबद्ध वेद) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. ऐतरेय ब्राह्मण  B. शतपथ ब्राह्मण  C. पंचविंश (ताण्ड्य) ब्राह्मण  D. गोपथ ब्राह्मण
सूची-II: 1. सामवेद  2. अथर्ववेद  3. ऋग्वेद  4. शुक्ल यजुर्वेद
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-1, D-2CA-3, B-4, C-2, D-1DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)ऐतरेय तथा कौषीतकि ब्राह्मण ऋग्वेद से, शतपथ ब्राह्मण शुक्ल (श्वेत) यजुर्वेद से तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। पंचविंश अथवा ताण्ड्य ब्राह्मण सामवेद का प्रमुख ब्राह्मण है, जबकि गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद का एकमात्र उपलब्ध ब्राह्मण है। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।

प्र.2 ऋग्वेद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. पुरुषसूक्त में चतुर्वर्ण की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है।
2. प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ऋग्वेद के दसवें मंडल में संकलित है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषसूक्त में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य तथा शूद्र की उत्पत्ति का वर्णन है, अतः कथन 1 सही है। किन्तु सवितृ को समर्पित गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल में है, जो विश्वामित्र से संबद्ध है, दसवें मंडल में नहीं। अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 वैदिक कालीन संस्थाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'सभा' तथा 'समिति' दोनों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
2. उत्तर वैदिक काल में 'विदथ' नामक संस्था का महत्व अत्यधिक बढ़ गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)ऋग्वेद में सभा, समिति तथा विदथ — तीनों जन-संस्थाओं का उल्लेख है, अतः कथन 1 सही है। उत्तर वैदिक काल में राजशक्ति के सुदृढ़ होने से 'विदथ' पूर्णतः लुप्त हो गई तथा सभा एवं समिति का प्रभाव भी घट गया, अतः कथन 2 गलत है।

5. महाजनपद काल एवं धार्मिक आंदोलन

छठी शताब्दी ई.पू. भारतीय इतिहास का सबसे गतिशील कालखंड है। लोहे के व्यापक प्रयोग से अधिशेष अन्न पैदा हुआ, अधिशेष से नगर बने (द्वितीय नगरीकरण), नगरों से व्यापार एवं मुद्रा (आहत सिक्के) आई, और व्यापारी वर्ग ने ऐसे धर्म माँगे जो जन्म नहीं, कर्म को महत्व दें। ठीक इसी समय 16 महाजनपद उभरे और बौद्ध एवं जैन आंदोलन प्रारंभ हुए।

सारनाथ कुशीनगर श्रावस्ती संकिसा कौशांबी पिपरहवा मथुरा अहिच्छत्र हस्तिनापुर अतरंजीखेड़ा आलमगीरपुर भितरी प्रयाग कन्नौज
बौद्ध स्थलपुरातात्विकगुप्त/अभिलेख
प्राचीन काल के वे स्थल जो वर्तमान उत्तर प्रदेश में हैं — UPPSC में यही सर्वाधिक पूछे जाते हैं।
धमेख स्तूप, सारनाथ
धमेख स्तूप, सारनाथ (वाराणसी) — बुद्ध का प्रथम उपदेश स्थल; 2026 में भारत का 45वाँ UNESCO विश्व धरोहर · चित्र: CC BY-SA 4.0

5.1 सोलह महाजनपद

सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में मिलती है; जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 की सूची है पर नाम कुछ भिन्न हैं।

#महाजनपदराजधानीवर्तमान क्षेत्र
1काशीवाराणसीवाराणसी, उ.प्र.
2कोसलश्रावस्ती (उत्तरी), साकेत/अयोध्या (दक्षिणी)पूर्वी उ.प्र. (श्रावस्ती, गोंडा, अयोध्या)
3अंगचंपाभागलपुर–मुंगेर, बिहार
4मगधगिरिव्रज/राजगृह, बाद में पाटलिपुत्रपटना–गया, बिहार
5वज्जि संघवैशालीउत्तर बिहार (8 कुलों का संघ; लिच्छवि प्रमुख)
6मल्ल संघकुशीनारा एवं पावाकुशीनगर–देवरिया, उ.प्र.
7चेदिशक्तिमती (सोत्थिवती)बुंदेलखंड, म.प्र.
8वत्सकौशांबीप्रयागराज, उ.प्र.
9कुरुइंद्रप्रस्थदिल्ली–मेरठ–हरियाणा
10पांचालअहिच्छत्र (उत्तर), कांपिल्य (दक्षिण)बरेली एवं फर्रुखाबाद, उ.प्र.
11मत्स्यविराटनगर (बैराठ)जयपुर–अलवर, राजस्थान
12शूरसेनमथुरामथुरा, उ.प्र.
13अश्मक (अस्सक)पोतन / पोटलीगोदावरी तट, महाराष्ट्र — एकमात्र दक्षिणी महाजनपद
14अवंतिउज्जयिनी (उत्तर), महिष्मती (दक्षिण)मालवा, म.प्र.
15गांधारतक्षशिलापेशावर–रावलपिंडी, पाकिस्तान
16कंबोजहाटक / राजपुरपुंछ–कश्मीर एवं पूर्वी अफगानिस्तान
उत्तर प्रदेश संदर्भ — 16 में से 6 महाजनपद उ.प्र. में

काशी, कोसल, मल्ल, वत्स, पांचाल एवं शूरसेन — छह महाजनपद पूर्णतः या मुख्यतः आज के उत्तर प्रदेश में थे (कुरु आंशिक रूप से)। यही कारण है कि UPPSC महाजनपद-राजधानी सुमेलन लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछता है।

तीन बड़ी प्रतिद्वंद्विताएँ भी यहीं की थीं — काशी बनाम कोसल (काशी पर अधिकार), कोसल का प्रसेनजित (श्रावस्ती) बनाम मगध का अजातशत्रु, तथा वत्सराज उदयन (कौशांबी) की कथाएँ, जो 'स्वप्नवासवदत्ता' (भास) एवं 'रत्नावली' (हर्ष) तक साहित्य में जीवित रहीं।

गणराज्य/संघ: सभी महाजनपद राजतंत्र नहीं थे। वज्जि एवं मल्ल गणराज्य थे। इनके अतिरिक्त शाक्य (कपिलवस्तु — बुद्ध का कुल), लिच्छवि (वैशाली), कोलिय (रामग्राम), मोरिय (पिप्पलिवन), बुलि, भग्ग तथा विदेह के गण थे। वज्जि संघ का अध्यक्ष 'गणपति' कहलाता था।

5.2 धार्मिक आंदोलनों के कारण

5.3 बौद्ध धर्म

चार आर्य सत्य: (1) दुःख, (2) दुःख-समुदाय (दुःख का कारण — तृष्णा), (3) दुःख-निरोध, (4) दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा (मार्ग)।
अष्टांगिक मार्ग: सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मांत, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
त्रिरत्न: बुद्ध, धम्म, संघ। मध्यम मार्ग — न अति भोग, न अति तप।

दार्शनिक आधार: अनीश्वरवाद (ईश्वर की सत्ता पर मौन), अनात्मवाद (नित्य आत्मा नहीं), क्षणिकवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद (कार्य-कारण की श्रृंखला) तथा कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास — किंतु जाति-व्यवस्था तथा वेदों की प्रामाणिकता का अस्वीकार।

संप्रदाय: हीनयान/थेरवाद (पालि; बुद्ध को महापुरुष मानता; मूर्ति-पूजा नहीं; श्रीलंका-म्यांमार-थाईलैंड), महायान (संस्कृत; बुद्ध की दैवी कल्पना, बोधिसत्व की धारणा, मूर्ति-पूजा; कनिष्क के संरक्षण में विकसित; चीन-जापान-कोरिया), वज्रयान (लगभग 8वीं शताब्दी, तंत्र-मंत्र एवं 'तारा' जैसी देवियाँ; पूर्वी भारत एवं तिब्बत)।

बौद्ध संगीतियाँ अति महत्वपूर्ण सुमेलन

संगीतिवर्षस्थानसंरक्षकअध्यक्षपरिणाम
प्रथम483 ई.पू.राजगृह (सप्तपर्णि गुफा)अजातशत्रु (हर्यक)महाकस्सपविनय पिटक (उपालि) एवं सुत्त पिटक (आनंद) का संकलन
द्वितीय383 ई.पू.वैशालीकालाशोक (शिशुनाग)सबकमीसंघ में प्रथम विभाजन — स्थविरवादी एवं महासांघिक
तृतीय250 ई.पू.पाटलिपुत्रअशोक (मौर्य)मोग्गलिपुत्त तिस्सअभिधम्म पिटक जोड़ा गया; 'कथावत्थु' की रचना; धर्म-प्रचारक विदेश भेजे गए
चतुर्थप्रथम शताब्दी ई. (परंपरागत रूप से लगभग 72 ई.)कुण्डलवन (कश्मीर)कनिष्क (कुषाण)वसुमित्र (उपाध्यक्ष अश्वघोष)हीनयान–महायान विभाजन स्पष्ट; 'महाविभाषशास्त्र' का संकलन

चतुर्थ संगीति की तिथि कनिष्क के राज्यकाल पर निर्भर है, जो स्वयं विवादित है (परंपरागत 78 ई., अनेक आधुनिक विद्वान 127 ई.)। परीक्षा में स्थान (कुण्डलवन/कश्मीर), संरक्षक (कनिष्क) एवं अध्यक्ष (वसुमित्र) पूछे जाते हैं — तिथि कम।

5.4 जैन धर्म

जैन संगीतियाँ

संगीतिवर्षस्थानअध्यक्षपरिणाम
प्रथमलगभग 300 ई.पू. (चंद्रगुप्त मौर्य का काल)पाटलिपुत्रस्थूलभद्र12 अंगों का संकलन; दिगंबर–श्वेतांबर विभाजन की पृष्ठभूमि
द्वितीय512 ई. (कुछ विद्वान 453/466 ई. मानते हैं)वल्लभी (गुजरात)देवर्धिगणि क्षमाश्रमणआगम-साहित्य का अंतिम रूप से लेखन

5.5 आजीवक एवं अन्य सम्प्रदाय

छठी शताब्दी ई.पू. में केवल दो नहीं, दर्जनों सम्प्रदाय थे। बौद्ध ग्रंथों में 62 तथा जैन ग्रंथों में 363 मत-मतांतरों का उल्लेख है। छह प्रमुख गैर-वैदिक आचार्य ('षड् तीर्थंकर') —

आचार्यसम्प्रदाय / सिद्धांत
मक्खलि गोसालआजीवकनियतिवाद (सब कुछ पूर्व-निर्धारित; कर्म से कुछ नहीं बदलता)
पूरण कस्सपअक्रियावाद — कर्म का कोई फल नहीं
अजित केसकंबलिनउच्छेदवाद / भौतिकवाद — मृत्यु के बाद कुछ नहीं
पकुध कच्चायननित्यवाद — सात शाश्वत तत्त्व
संजय वेलट्ठपुत्तसंशयवाद / विक्षेपवाद — किसी प्रश्न का निश्चित उत्तर नहीं
निगंठ नातपुत्तमहावीर — जैन धर्म

आजीवक सम्प्रदाय को मौर्यों का संरक्षण मिला — अशोक ने बराबर की गुफाएँ तथा दशरथ ने नागार्जुनी की गुफाएँ (गया, बिहार) आजीवकों को दान दीं। इसी काल की भौतिकवादी धारा चार्वाक / लोकायत थी, जिसके प्रवर्तक बृहस्पति माने जाते हैं।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — बौद्ध भूगोल का केंद्र
सावधानी — चार स्थानों का चक्र
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 आजीवक संप्रदाय के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. आजीवक संप्रदाय के प्रमुख आचार्य निगंठ नातपुत्त थे।
2. अशोक ने बराबर की तथा उसके उत्तराधिकारी दशरथ ने नागार्जुनी की गुफाएँ आजीवकों को दान में दीं।
3. आजीवक मत 'नियतिवाद' (नियति द्वारा पूर्वनिर्धारण) में विश्वास करता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)आजीवक संप्रदाय के प्रमुख आचार्य मक्खलि गोसाल थे; 'निगंठ नातपुत्त' महावीर का बौद्ध ग्रंथों में प्रयुक्त नाम है, अतः कथन 1 गलत है। अशोक ने बराबर की तथा दशरथ मौर्य ने नागार्जुनी की गुफाएँ आजीवक भिक्षुओं को दान दीं, और यह संप्रदाय कठोर नियतिवाद में विश्वास करता था। अतः कथन 2 व 3 सही हैं।

प्र.2 जैन धर्म के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. महावीर के अनुयायी आरंभ में 'निर्ग्रन्थ' कहलाते थे।
2. 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा उपदिष्ट 'चातुर्याम' में ब्रह्मचर्य सम्मिलित नहीं था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)बौद्ध ग्रंथों में महावीर को 'निगंठ नातपुत्त' तथा उनके अनुयायियों को 'निर्ग्रन्थ' कहा गया है। पार्श्वनाथ के चातुर्याम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय तथा अपरिग्रह थे; ब्रह्मचर्य को पाँचवें महाव्रत के रूप में महावीर ने जोड़ा। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 बौद्ध संप्रदायों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. महायान संप्रदाय में बुद्ध की प्रतिमा-पूजा प्रचलित हुई तथा इसके अधिकांश ग्रंथ संस्कृत में हैं।
2. 'वज्रयान' का विकास मुख्यतः पूर्वी भारत में हुआ।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)महायान में बोधिसत्व-आदर्श तथा बुद्ध की मूर्ति-पूजा प्रचलित हुई और इसका साहित्य मुख्यतः संस्कृत में है। वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) का विकास आठवीं शताब्दी के बाद मुख्यतः बंगाल-बिहार अर्थात् पूर्वी भारत में हुआ, जहाँ विक्रमशिला व ओदंतपुरी इसके केंद्र बने। अतः दोनों कथन सही हैं।

6. मगध का उत्कर्ष

16 महाजनपदों में से अंततः मगध ने सबको निगल लिया और भारत का प्रथम साम्राज्य खड़ा किया। यह संयोग नहीं था।

6.1 मगध की सफलता के कारण

6.2 हर्यक वंश (लगभग 544–412 ई.पू.)

शासककाल (ई.पू.)उपलब्धियाँ
बिंबिसार ('श्रेणिक')544–492वंश का वास्तविक संस्थापक; अंग (राजा ब्रह्मदत्त) को जीतकर पहला विस्तार; वैवाहिक कूटनीति — कोसलदेवी (कोसल नरेश प्रसेनजित की बहन; दहेज में काशी का एक गाँव), चेल्लना (वैशाली के लिच्छवि प्रमुख चेटक की पुत्री), क्षेमा (मद्र); अवंति के प्रद्योत के उपचार हेतु राजवैद्य जीवक को भेजा; बुद्ध को वेणुवन दान; बुद्ध एवं महावीर दोनों का समकालीन
अजातशत्रु ('कुणिक')492–460पिता की हत्या कर सिंहासन; काशी-कोसल पर विजय; वज्जि संघ का विनाश — 16 वर्ष का संघर्ष, मंत्री वस्सकार की फूट-नीति तथा दो नए अस्त्र — रथमूसल (जुड़ा हुआ गदा-रथ) एवं महाशिलाकंटक (शिला-प्रक्षेपक); प्रथम बौद्ध संगीति का संरक्षक; पाटलिग्राम में दुर्ग बनवाया
उदयिन460–444पाटलिपुत्र नगर की स्थापना (गंगा–सोन संगम पर) तथा राजधानी का स्थानांतरण
अनिरुद्ध, मुंड, नागदशक444–412दुर्बल 'पितृहंता' शासक; अमात्य शिशुनाग द्वारा अपदस्थ

6.3 शिशुनाग वंश (लगभग 412–344 ई.पू.)

6.4 नंद वंश (लगभग 344–322 ई.पू.)

कालक्रम — मगध का उत्कर्ष

क्रमघटनातिथि (ई.पू.)
1बिंबिसार का राज्यारोहण; अंग विजय544
2बुद्ध का महापरिनिर्वाण; प्रथम बौद्ध संगीति (राजगृह)483
3अजातशत्रु द्वारा वज्जि संघ का अंतलगभग 484–468 के बीच
4उदयिन द्वारा पाटलिपुत्र की स्थापनालगभग 460–444
5द्वितीय बौद्ध संगीति (वैशाली), कालाशोक383
6महापद्मनंद द्वारा नंद वंश की स्थापनालगभग 344
7सिकंदर का भारत-अभियान326
8चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा नंद-उन्मूलनलगभग 322
उत्तर प्रदेश संदर्भ

मगध के विस्तार की पहली शिकार उत्तर प्रदेश की रियासतें ही बनीं — काशी बिंबिसार को दहेज में मिली, कोसल (श्रावस्ती) अजातशत्रु के हाथों गया, और वत्स (कौशांबी) भी अंततः मगध में समा गया। अर्थात् आज के पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्वतंत्रता का अंत छठी–पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में ही हो गया था।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 मगध के उत्कर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. हर्यक वंश के अजातशत्रु ने लिच्छवियों के विरुद्ध 'रथमूसल' तथा 'महाशिलाकंटक' नामक युद्धोपकरणों का प्रयोग किया।
2. शिशुनाग ने अवंति को मगध साम्राज्य में मिला लिया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)जैन एवं बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अजातशत्रु ने वज्जि संघ (लिच्छवि) के विरुद्ध रथमूसल तथा महाशिलाकंटक जैसे नवीन युद्धोपकरणों का प्रयोग किया। हर्यक वंश के बाद शिशुनाग ने अवंति को मगध में मिलाकर मगध-अवंति संघर्ष का अंत किया। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 निम्नलिखित बौद्ध संगीतियों के आयोजन-स्थलों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. वैशाली
2. राजगृह
3. कुण्डलवन (कश्मीर)
4. पाटलिपुत्र
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 2, 4, 3B2, 1, 3, 4C2, 1, 4, 3D1, 2, 3, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह में अजातशत्रु के संरक्षण में (महाकस्सप की अध्यक्षता), द्वितीय वैशाली में कालाशोक के काल में, तृतीय पाटलिपुत्र में अशोक के संरक्षण में (मोग्गलिपुत्त तिस्स) तथा चतुर्थ कश्मीर के कुण्डलवन में कनिष्क के संरक्षण में (वसुमित्र) हुई। अतः सही क्रम 2, 1, 4, 3 है।

प्र.3 जैन संगीतियों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. प्रथम जैन संगीति पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में आयोजित हुई थी।
2. द्वितीय जैन संगीति वल्लभी में देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में हुई, जिसमें जैन आगमों का अंतिम संकलन किया गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रथम जैन संगीति लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. में पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में हुई, जिसमें बारह अंगों का संकलन हुआ। द्वितीय संगीति गुजरात के वल्लभी में देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में हुई, जहाँ जैन आगम अंतिम रूप से लिपिबद्ध किए गए। अतः दोनों कथन सही हैं।

7. विदेशी आक्रमण — ईरानी एवं यूनानी

7.1 ईरानी (हखामनी / Achaemenid) आक्रमण

प्रभाव: (1) खरोष्ठी लिपि का प्रचलन — अरामाइक से व्युत्पन्न, दाएँ से बाएँ लिखी जाती है; अशोक ने इसे उत्तर-पश्चिमी अभिलेखों (शहबाजगढ़ी, मानसेहरा) में प्रयोग किया। (2) 'क्षत्रप' प्रशासनिक पद, जिसे आगे शक-कुषाणों ने अपनाया। (3) अभिलेख जारी करने की परंपरा तथा मौर्य स्थापत्य में पर्सिपोलिस शैली के घंटाकार शीर्ष। (4) भारत–पश्चिम एशिया व्यापार-मार्ग का खुलना।

7.2 सिकंदर का आक्रमण (326 ई.पू.)

परिणाम एवं महत्व: भारत–यूनान के बीच चार स्थल-मार्ग एवं एक समुद्री मार्ग खुले; गांधार कला तथा यूनानी ज्योतिष का प्रभाव आया; छोटे-छोटे गणराज्यों के नष्ट होने से उत्तर-पश्चिम में राजनीतिक शून्य बना, जिसे चंद्रगुप्त मौर्य ने भरा। सबसे बड़ा लाभ इतिहासकारों को हुआ — यूनानी लेखकों ने जो तिथियाँ दीं, वे भारतीय इतिहास की पहली निश्चित तिथियाँ (sheet anchor) बनीं, क्योंकि इस आक्रमण का उल्लेख किसी समकालीन भारतीय स्रोत में नहीं मिलता।

सावधानी
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित प्राचीन भारतीय घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. कलिंग युद्ध
2. शुंग वंश की स्थापना
3. हाइडेस्पीज (वितस्ता) का युद्ध
4. मगध में मौर्य वंश की स्थापना
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 3, 1, 2B4, 3, 2, 1C3, 4, 1, 2D3, 4, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)सिकंदर तथा पोरस के बीच हाइडेस्पीज (वितस्ता/झेलम) का युद्ध 326 ई.पू. में हुआ; चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 322 ई.पू. में मौर्य वंश की स्थापना की; अशोक का कलिंग युद्ध लगभग 261 ई.पू. में हुआ तथा पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ई.पू. में शुंग वंश की नींव रखी। अतः सही क्रम 3, 4, 1, 2 है।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): ब्राह्मी लिपि का सर्वप्रथम सफल वाचन जेम्स प्रिंसेप ने 1837 ई. में किया था।
कारण (R): ब्राह्मी लिपि सामान्यतः दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के सचिव तथा कलकत्ता टकसाल के परख-अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1836-38 के अपने लेखों में ब्राह्मी (तथा खरोष्ठी) का वाचन प्रस्तुत किया, जिससे अशोक के अभिलेख पढ़े जा सके; अतः (A) सही है। किन्तु ब्राह्मी बाईं से दाईं ओर लिखी जाती थी; दाईं से बाईं ओर लिखी जाने वाली लिपि खरोष्ठी थी, अतः (R) गलत है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): दिल्ली सल्तनत का सुल्तान सिकंदर लोदी 'गुलरुखी' उपनाम से फारसी में कविता लिखता था।
कारण (R): सिकंदर लोदी ने आगरा नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) विद्वान एवं कवि था तथा 'गुलरुखी' उपनाम से फारसी में काव्य-रचना करता था; अतः (A) सही है। उसने ग्वालियर की ओर के अभियानों के लिए आगरा नगर बसाकर उसे अपना केंद्र बनाया, अतः (R) भी सही है। किन्तु राजधानी बसाना उसके कवि होने का कारण नहीं है, इसलिए (R), (A) की व्याख्या नहीं करता।

8. मौर्य साम्राज्य (लगभग 322–185 ई.पू.)

भारत का प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य, और वह पहला कालखंड जिसके लिए हमारे पास समकालीन अभिलेखीय साक्ष्य हैं।

8.1 स्रोत

प्रकारस्रोत
साहित्यिक (भारतीय)कौटिल्य का अर्थशास्त्र; विशाखदत्त का मुद्राराक्षस; पुराण; पतंजलि का महाभाष्य
बौद्धदीपवंश, महावंश, दिव्यावदान (अशोकावदान), महाबोधिवंश
जैनहेमचंद्र का परिशिष्टपर्वन् (चंद्रगुप्त का श्रवणबेलगोला गमन)
विदेशीमेगस्थनीज की इंडिका; स्ट्रैबो, एरियन, प्लूटार्क, जस्टिन
पुरातात्विकअशोक के अभिलेख; रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख (सुदर्शन झील); आहत सिक्के; NBPW मृद्भांड; कुम्हरार (पाटलिपुत्र) का 80 स्तंभों वाला सभा-भवन

8.2 चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 322–298 ई.पू.)

8.3 बिंदुसार (लगभग 298–273 ई.पू.)

8.4 अशोक (लगभग 273/269–232 ई.पू.)

बिंदुसार की मृत्यु के बाद लगभग चार वर्ष के उत्तराधिकार-संघर्ष के बाद अशोक का राज्याभिषेक हुआ (लगभग 269 ई.पू.)। अभिलेखों में वह स्वयं को 'देवानांपिय' (देवताओं का प्रिय) तथा 'पियदस्सी' (सुंदर दिखने वाला) कहता है; 'अशोक' नाम केवल कुछ लघु शिलालेखोंमास्की, गुर्जरा, नेट्टूर, उडेगोलम एवं पानगुडरिया — में मिलता है।

कलिंग युद्ध (261 ई.पू.)

राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में लड़ा गया; अशोक का एकमात्र युद्ध। 13वें वृहद् शिलालेख में स्वयं अशोक लिखता है कि 1,00,000 मारे गए, 1,50,000 बंदी बनाए गए और उससे कहीं अधिक मरे। इसके बाद उसने 'भेरीघोष' (युद्ध-दुंदुभि) के स्थान पर 'धम्मघोष' की नीति अपनाई — यह विश्व-इतिहास में किसी विजयी सम्राट द्वारा सार्वजनिक पश्चाताप की दुर्लभ घोषणा है। उल्लेखनीय यह है कि कलिंग-विजय के बाद भी उसने कलिंग को लौटाया नहीं — वह साम्राज्य में बना रहा।

धम्म

अशोक का 'धम्म' कोई नया सम्प्रदाय नहीं, बल्कि सार्वभौम आचार-संहिता थी — माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का आदर, दास एवं सेवकों से सद्व्यवहार, ब्राह्मणों-श्रमणों को दान, प्राणि-हिंसा से विरति, सत्य, दया, तथा सभी सम्प्रदायों का आदर (12वाँ शिलालेख)। क्रियान्वयन के लिए उसने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष में 'धम्म महामात्र' नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए तथा 'विहार यात्रा' (आखेट-भ्रमण) के स्थान पर 'धम्म यात्रा' आरंभ की। उसने तृतीय बौद्ध संगीति करवाई, पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका (राजा तिस्स के पास) भेजा, तथा 13वें शिलालेख के अनुसार पाँच यवन राजाओं तक दूत भेजे — सीरिया का एंटियोकस द्वितीय, मिस्र का टॉलेमी द्वितीय, मकदूनिया का एंटीगोनस, साइरीन का मगस एवं एपिरस का अलेक्जेंडर।

अशोक के अभिलेख सर्वाधिक पूछा जाने वाला उपविषय

अभिलेखों की भाषा मुख्यतः प्राकृत; लिपियाँ — ब्राह्मी (अधिकांश), खरोष्ठी (शहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा), तथा अरामाइक एवं यूनानी (कंधार, अफगानिस्तान — शार-ए-कुना का द्विभाषी अभिलेख)। इन्हें 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा।

वर्गप्रमुख स्थलविशेष
14 वृहद् शिलालेखकालसी (उत्तराखंड), गिरनार (गुजरात), सोपारा (महाराष्ट्र), धौली एवं जौगढ़ (ओडिशा), येर्रागुडी (आंध्र प्रदेश), सन्नति (कर्नाटक), शहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा (पाकिस्तान)धौली एवं जौगढ़ में 11, 12, 13वें के स्थान पर दो पृथक् 'कलिंग शिलालेख' हैं
7 स्तंभ लेखदिल्ली-टोपरा, दिल्ली-मेरठ, इलाहाबाद-कौशांबी, लौरिया-अरराज, लौरिया-नंदनगढ़, रामपुरवासातवाँ स्तंभ लेख केवल दिल्ली-टोपरा स्तंभ पर है — सबसे बड़ा एवं अंतिम अभिलेख
लघु शिलालेखमास्की, गुर्जरा (दतिया, म.प्र.), ब्रह्मगिरि, सासाराम, रूपनाथ, बैराठ-भाब्रू (राजस्थान)मास्की एवं गुर्जरा में 'अशोक' नाम; भाब्रू लेख में बुद्ध, धम्म एवं संघ में आस्था की घोषणा
लघु स्तंभ लेखसारनाथ, कौशांबी, सांची, रुम्मिनदेई एवं निगालीसागर (नेपाल)सारनाथ-कौशांबी-सांची में संघभेद निषेध; रुम्मिनदेई में लुम्बिनी ग्राम को बलि से मुक्त एवं भाग घटाकर आठवाँ (1/8) करने का उल्लेख
गुहा अभिलेखबराबर पहाड़ी (गया, बिहार)आजीवकों को गुफाओं का दान

प्रमुख शिलालेखों का विषय

शिलालेखविषय
1पशु-बलि का निषेध; उत्सव-समाजों की निंदा
2मानव एवं पशु-चिकित्सा; चोल, पांड्य, सतियपुत्र, केरलपुत्र एवं ताम्रपर्णि का उल्लेख
3युक्त, रज्जुक एवं प्रादेशिक की पंचवर्षीय दौरा-व्यवस्था
4भेरीघोष का धम्मघोष में परिवर्तन
5धम्म महामात्र की नियुक्ति
6'प्रतिवेदक' (सूचना-अधिकारी); राजा की सदैव उपलब्धता
7सभी सम्प्रदायों के लिए सहिष्णुता की कामना
8धम्म यात्रा का आरंभ; बोधगया की यात्रा
9निरर्थक कर्मकांडों की निंदा; 'धम्म मंगल' श्रेष्ठ
10यश एवं कीर्ति की कामना की निरर्थकता
11धम्म की विस्तृत व्याख्या
12सम्प्रदायों के बीच समन्वय; 'स्त्री-महामात्र' का उल्लेख
13कलिंग युद्ध, पश्चाताप एवं पाँच यवन राजा — सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख
14अभिलेख उत्कीर्ण करवाने का उद्देश्य

8.5 मौर्य प्रशासन

8.6 अर्थशास्त्र

कौटिल्य का अर्थशास्त्र 15 अधिकरणों एवं 180 प्रकरणों में विभक्त है (लगभग 6,000 श्लोक)। यह राजनीति-शास्त्र, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, विधि, कूटनीति (षाड्गुण्य नीति — संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय; तथा मंडल सिद्धांत) एवं गुप्तचर-तंत्र का ग्रंथ है। यह लगभग सात शताब्दियों तक विस्मृत रहा और 1904–05 में आर. शामशास्त्री द्वारा पुनः खोजा गया; प्रकाशन 1909 में हुआ। ध्यान रहे — इसके वर्तमान स्वरूप में परवर्ती संशोधन भी हैं, इसलिए यह 'मौर्यकालीन दर्पण' के साथ-साथ आदर्श-ग्रंथ भी है।

8.7 मौर्य साम्राज्य का पतन

व्याख्याप्रमुख विद्वानसार
ब्राह्मण प्रतिक्रियाहरप्रसाद शास्त्रीअशोक की पशु-बलि-विरोधी नीति से ब्राह्मण असंतुष्ट; पुष्यमित्र का विद्रोह उसी की परिणति
आर्थिक संकटडी.डी. कोसंबीविशाल सेना एवं नौकरशाही का भार; सिक्कों में चाँदी की मात्रा घटना
अत्यधिक केंद्रीकरणरोमिला थापरव्यवस्था पूर्णतः सम्राट पर निर्भर; अशोक के बाद साम्राज्य पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बँट गया
प्रांतीय कुशासनतक्षशिला में बार-बार विद्रोह; अशोक के कलिंग शिलालेखों में स्वयं अधिकारियों को चेतावनी
अहिंसा-नीति से सैन्य-शिथिलताएच.सी. रायचौधरीविवादित मत — अशोक ने सेना भंग नहीं की थी
उत्तर-पश्चिम से आक्रमणबैक्ट्रियाई/यवन दबाव

अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की 185 ई.पू. में उसके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सेना के निरीक्षण के समय हत्या कर दी — मौर्य युग समाप्त।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — अशोक के स्तंभों की भूमि
सावधानी — मौर्य काल के सूक्ष्म भेद
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सम्राट अशोक के धम्म एवं धर्म-प्रचार के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. अशोक ने धर्म-प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा को चीन भेजा।
2. अशोक ने अपने अभिलेखों में 'चार आर्य सत्य' तथा 'निर्वाण' का विस्तृत विवेचन किया है।
3. अशोक ने धम्म-प्रचार के बावजूद अपनी आखेट-यात्राएँ (विहार यात्राएँ) यथावत जारी रखीं।
4. 'भाब्रू' (बैराट) लघु शिलालेख में बुद्ध, धम्म एवं संघ के प्रति अशोक की आस्था व्यक्त हुई है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 4C2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)महेंद्र तथा संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया था, चीन नहीं। अशोक के अभिलेखों में चार आर्य सत्य या निर्वाण की दार्शनिक विवेचना नहीं, बल्कि माता-पिता की सेवा, अहिंसा, दान व सहिष्णुता जैसे व्यावहारिक नैतिक उपदेश हैं। उसने विहार यात्राओं (आखेट) का त्याग कर धम्म यात्राएँ आरंभ कीं। केवल भाब्रू लघु शिलालेख में बुद्ध, धम्म एवं संघ के प्रति उसकी आस्था स्पष्ट है, अतः केवल कथन 4 सही है।

प्र.2 अशोक के अभिलेखों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. सम्राट का व्यक्तिगत नाम 'अशोक' मास्की, गुर्जरा तथा नेट्टूर जैसे लघु शिलालेखों में मिलता है।
2. अशोक के अधिकांश अभिलेख संस्कृत भाषा तथा खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अधिकांश अभिलेखों में सम्राट को 'देवानांपिय पियदसि' कहा गया है; 'अशोक' नाम मास्की, गुर्जरा, नेट्टूर तथा उडेगोलम् के लघु शिलालेखों में स्पष्ट आता है, अतः कथन 1 सही है। किन्तु उसके अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में हैं; खरोष्ठी का प्रयोग केवल उत्तर-पश्चिम (शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा) में हुआ। अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 मौर्य प्रशासन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. 'सीताध्यक्ष' राजकीय कृषि-भूमि का अधीक्षक होता था।
2. 'रज्जुक' भूमि-मापन तथा न्याय से संबद्ध अधिकारी थे।
3. 'पण्याध्यक्ष' सेना की पैदल टुकड़ी का प्रमुख होता था।
4. अशोक ने धम्म के प्रचार-प्रसार हेतु 'धम्म महामात्र' नियुक्त किए।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 1 और 2Bकेवल 1, 2 और 4Cकेवल 2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अर्थशास्त्र के अनुसार सीताध्यक्ष राजकीय कृषि (सीता भूमि) का अधीक्षक तथा पण्याध्यक्ष वाणिज्य/विक्रय का अधीक्षक होता था — अतः कथन 3 गलत है। रज्जुक भूमि-मापन एवं न्यायिक कार्यों से जुड़े अधिकारी थे और अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष धम्म महामात्रों की नियुक्ति की। अतः 1, 2 और 4 सही हैं।

9. मौर्योत्तर काल (लगभग 185 ई.पू. – 300 ई.)

राजनीतिक दृष्टि से यह विखंडन का युग है, पर आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से यह प्राचीन भारत का सबसे खुला एवं समृद्ध कालखंड है — रेशम मार्ग, रोमन व्यापार, गांधार-मथुरा कला, महायान और संस्कृत का पुनरुत्थान — सब यहीं से।

9.1 शुंग वंश (185–73 ई.पू.)

9.2 कण्व वंश (73–28 ई.पू.)

शुंग नरेश देवभूति की हत्या उसके अमात्य वासुदेव कण्व ने की और नए वंश की स्थापना की। यह ब्राह्मण वंश था; कुल चार शासक, लगभग 45 वर्ष। अंत सातवाहनों के हाथों हुआ।

9.3 सातवाहन (आंध्र) वंश

9.4 हिन्द-यवन (Indo-Greeks)

9.5 शक (Scythians) एवं पह्लव (Parthians)

9.6 कुषाण

9.7 कलिंग — खारवेल

चेदि/महामेघवाहन वंश का खारवेल (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू.) — हाथीगुंफा अभिलेख (उदयगिरि, भुवनेश्वर के निकट) उसकी उपलब्धियों का वर्ष-वार विवरण देता है। वह जैन धर्म का संरक्षक था; मगध पर आक्रमण कर वह जिन-प्रतिमा वापस लाया जिसे पहले 'नंदराज' ले गया था; उसने नहर का जीर्णोद्धार भी करवाया।

9.8 व्यापार एवं विदेशी संपर्क

कालक्रम — मौर्योत्तर काल

क्रमघटनातिथि
1पुष्यमित्र शुंग द्वारा शुंग वंश की स्थापना185 ई.पू.
2मिनांडर का शासनलगभग 165–145 ई.पू.
3हेलियोडोरस का बेसनगर गरुड़ स्तंभलगभग 113 ई.पू.
4वासुदेव कण्व द्वारा कण्व वंश की स्थापना73 ई.पू.
5विक्रम संवत् का आरंभ58 ई.पू.
6शक संवत् का आरंभ (परंपरागत रूप से कनिष्क से जुड़ा)78 ई.
7गौतमीपुत्र सातकर्णि द्वारा नहपान की पराजयलगभग 124–130 ई.
8रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेखलगभग 150 ई.
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मथुरा का स्वर्ण-युग

मथुरा कुषाणों का दूसरा प्रमुख केंद्र था — यहीं मथुरा कला शैली विकसित हुई, जिसमें लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर से बुद्ध, बोधिसत्व, जैन तीर्थंकर, यक्ष-यक्षिणी तथा विष्णु-शिव की प्रतिमाएँ बनीं। मथुरा के निकट माट से कनिष्क की शिरोविहीन प्रतिमा मिली है, जिसके वस्त्र मध्य एशियाई हैं — कुषाण पहचान का सबसे प्रसिद्ध प्रतीक। अहिच्छत्र (बरेली), कौशांबी, सोंख (मथुरा) एवं गंगा-दोआब के अन्य स्थलों से बड़ी संख्या में कुषाण-कालीन सिक्के एवं मूर्तियाँ मिली हैं।

सावधानी — मौर्योत्तर काल के तीन बड़े जाल
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 कुषाण शासक कनिष्क के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सामान्यतः यह माना जाता है कि उसने 78 ई. में शक संवत् का आरंभ किया।
2. चतुर्थ बौद्ध संगीति उसके संरक्षण में कश्मीर में आयोजित हुई थी।
3. आयुर्वेदाचार्य चरक उसका राजकवि था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)78 ई. से आरंभ शक संवत् का श्रेय प्रायः कनिष्क को दिया जाता है और यही भारत का राष्ट्रीय संवत् है। चतुर्थ बौद्ध संगीति उसके संरक्षण में कश्मीर के कुण्डलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता एवं अश्वघोष की उपाध्यक्षता में हुई। चरक उसका राजकवि नहीं, अपितु राजवैद्य माने जाते हैं — अतः कथन 3 गलत है।

प्र.2 बेसनगर (विदिशा) के प्रसिद्ध गरुड़-स्तंभ के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इस स्तंभ को स्थापित करने वाला हेलियोडोरस यूनानी नरेश डेमेट्रियस का राजदूत था।
2. यह स्तंभ वासुदेव (कृष्ण) को समर्पित है तथा इसे शुंग नरेश भागभद्र के दरबार में स्थापित किया गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)बेसनगर (आधुनिक विदिशा, मध्य प्रदेश) का स्तंभ-लेख स्पष्ट कहता है कि हेलियोडोरस तक्षशिला के इंडो-ग्रीक नरेश एंटियालकिडस (Antialkidas) का राजदूत था, न कि डेमेट्रियस का; अतः कथन 1 गलत है। लेख में उसे 'काशीपुत्र भागभद्र' के दरबार में भेजा जाना तथा स्तंभ को 'देवदेव वासुदेव' के लिए स्थापित करना उल्लिखित है, और मूलतः इसके शीर्ष पर गरुड़-आकृति थी; अतः कथन 2 सही है।

प्र.3 सातवाहन राजवंश के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. सातवाहनों के अभिलेख मुख्यतः संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण हैं।
2. गौतमीपुत्र सातकर्णि की उपलब्धियों का विवरण नासिक प्रशस्ति में मिलता है, जिसे उसकी माता गौतमी बलश्री ने उत्कीर्ण करवाया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)सातवाहन अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा तथा ब्राह्मी लिपि में हैं, संस्कृत में नहीं — अतः कथन 1 गलत है। नासिक गुहालेख (नासिक प्रशस्ति) गौतमीपुत्र सातकर्णि की माता गौतमी बलश्री ने उत्कीर्ण करवाया, जिसमें उसे 'क्षत्रिय-दर्प-मान-मर्दन' तथा शक-यवन-पह्लव विनाशक कहा गया है। अतः केवल कथन 2 सही है।

10. संगम युग (लगभग 300 ई.पू. – 300 ई.)

जब उत्तर भारत में मौर्य-शुंग-कुषाण चल रहे थे, सुदूर दक्षिण में तमिल-भूमि पर तीन राज्यों (मुवेन्दर) का युग चल रहा था। इस काल का नाम 'संगम' उन कवि-सम्मेलनों से आया है जो पांड्य राजाओं के संरक्षण में मदुरै में हुए।

10.1 तीन संगम

संगमस्थानअध्यक्ष (परंपरा)उपलब्ध साहित्य
प्रथममदुरैअगस्त्यकोई कृति उपलब्ध नहीं
द्वितीयकपाटपुरम् (अलैवाई)अगस्त्य, तोल्काप्पियरकेवल तोल्काप्पियम्
तृतीयमदुरैनक्कीररवर्तमान में उपलब्ध लगभग समस्त संगम साहित्य

10.2 संगम साहित्य

ग्रंथलेखकविशेषता
तोल्काप्पियम्तोल्काप्पियरतमिल का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ; व्याकरण एवं काव्यशास्त्र
एत्तुतोगैअनेक कवि'आठ संग्रह' — पुरनानूरु, अहनानूरु, कुरुन्तोगै आदि
पत्तुप्पाट्टुअनेक कवि'दस गीत' — तिरुमुरुगात्रुप्पडै, पट्टिनप्पालै आदि
पदिनेनकीलकणक्कुअनेक'अठारह लघु ग्रंथ' — इसी में तिरुक्कुरल
तिरुक्कुरलतिरुवल्लुवर'तमिल वेद'; 1330 दोहे; तीन भाग — अरम (धर्म), पोरुल (अर्थ), इन्बम (काम)
शिलप्पदिकारम्इलंगो अडिगल (चेर राजकुमार)'पायल की कथा'; कोवलन–कण्णगी–माधवी; तमिल का प्रथम महाकाव्य
मणिमेखलैसीत्तलै सात्तनारबौद्ध महाकाव्य; शिलप्पदिकारम् की अगली कड़ी (कोवलन-माधवी की पुत्री)
जीवक चिंतामणितिरुत्तक्कदेवरजैन महाकाव्य
वलयापति, कुण्डलकेशीशेष दो 'महाकाव्य'; अंश मात्र उपलब्ध

ध्यान दें: शिलप्पदिकारम् एवं मणिमेखलै को अनेक विद्वान संगमोत्तर (post-Sangam) रचनाएँ मानते हैं, यद्यपि परीक्षा-सामग्री में इन्हें प्रायः 'संगम युग के महाकाव्य' कहा जाता है।

10.3 तीन राज्य — चेर, चोल, पांड्य

राज्यराजधानीप्रमुख बंदरगाहराजचिह्नप्रसिद्ध शासक एवं उपलब्धि
चेर (केरल एवं पश्चिमी तमिलनाडु)वंजी (करूर)मुशिरि (मुज़िरिस), तोंडीधनुष एवं बाणसेनगुट्टुवन ('लाल चेर') — कण्णगी/पत्तिनी पूजा का आरंभ; उदियनजेरल
चोल (कावेरी डेल्टा)उरैयूर (सूती वस्त्र का केंद्र)पुहार / कावेरीपट्टिनमबाघकरिकालवेण्णि का युद्ध; कावेरी पर कल्लनै (ग्रैंड एनीकट) बाँध; पुहार बंदरगाह की स्थापना
पांड्य (दक्षिणी तमिलनाडु)मदुरैकोरकई (मोती का केंद्र)मछली (कार्प)नेडुंजेलियनतलैयालंगानम का युद्ध; रोमन सम्राट ऑगस्टस के पास दूतमंडल; मेगस्थनीज ने भी 'पांड्य' का उल्लेख किया

10.4 प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था

सावधानी — संगम युग के सुमेलन
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 संगम युग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'वेलिर' संगम युग में चोल शासकों की राजकीय उपाधि थी।
2. संगम युग के तीन प्रमुख राजवंश चेर, चोल तथा पांड्य थे।
3. 'तोल्काप्पियम्' तमिल व्याकरण एवं काव्यशास्त्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)संगम कालीन तमिलकम् में चेर, चोल तथा पांड्य — तीन प्रमुख राजवंश ('मुवेन्दर') थे, और तोल्काप्पियम् तमिल का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण-काव्यशास्त्र ग्रंथ है। 'वेलिर' इन तीनों से भिन्न छोटे स्थानीय सरदारों के लिए प्रयुक्त शब्द था, चोलों की उपाधि नहीं — अतः कथन 1 गलत है।

प्र.2 संगम साहित्य के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'एत्तुत्तोगै' (आठ संग्रह) तथा 'पत्तुप्पाट्टु' (दस गीत) संगम काव्य के प्रमुख संकलन हैं।
2. 'तिरुक्कुरल' को प्रायः संगमोत्तर 'पदिनेनकीलकणक्कु' (अठारह लघु ग्रंथ) वर्ग में रखा जाता है।
3. संगम के तीनों अधिवेशन चेर शासकों के संरक्षण में आयोजित हुए माने जाते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)'एत्तुत्तोगै' तथा 'पत्तुप्पाट्टु' मिलकर 'पदिनेनमेलकणक्कु' (अठारह बृहत् ग्रंथ) बनाते हैं और यही संगम काव्य का मूल भंडार है, अतः कथन 1 सही है। 'तिरुक्कुरल' परंपरागत रूप से संगमोत्तर 'पदिनेनकीलकणक्कु' वर्ग में रखा जाता है, अतः कथन 2 भी सही है। संगम की परंपरा पांड्य शासकों के संरक्षण तथा मदुरै से जुड़ी बताई जाती है, चेर से नहीं; अतः कथन 3 गलत है।

प्र.3 तमिल महाकाव्यों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 'शिलप्पदिकारम्' के रचयिता इलंगो अडिगल थे तथा इसका कथानक कोवलन एवं कण्णगी से संबंधित है।
2. 'मणिमेकलै' की रचना सीत्तलै सात्तनार ने की और इस पर बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)'शिलप्पदिकारम्' (नूपुर की कथा) चेर राजवंश से संबद्ध जैन मुनि इलंगो अडिगल की रचना है, जिसमें कोवलन-कण्णगी की गाथा है। इसका अनुवर्ती काव्य 'मणिमेकलै' सीत्तलै सात्तनार ने लिखा, जो कोवलन-माधवी की पुत्री पर केंद्रित है और बौद्ध दर्शन से ओतप्रोत है। अतः दोनों कथन सही हैं।

11. गुप्त साम्राज्य (लगभग 319–550 ई.)

गुप्त युग को प्रायः 'स्वर्ण युग' कहा जाता है — यह कथन साहित्य, विज्ञान, कला एवं धार्मिक समन्वय के लिए उचित है, किंतु सामान्य जन (विशेषकर शूद्र एवं स्त्री) की स्थिति तथा नगरीय व्यापार के लिए नहीं — यही संतुलित दृष्टिकोण परीक्षा में अपेक्षित है।

प्रयाग स्तंभ — प्रयाग प्रशस्ति
प्रयाग स्तंभ — मूलतः कौशांबी का अशोक स्तंभ, जिस पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति उत्कीर्ण है · चित्र: CC BY-SA 4.0
समुद्रगुप्त का वीणावादन सिक्का
समुद्रगुप्त का स्वर्ण सिक्का — वीणावादन प्रकार, जो उसकी संगीत-प्रियता दर्शाता है · चित्र: CC BY-SA 3.0

11.1 शासक

शासककाल (ई.)उपाधि / प्रमुख उपलब्धि
श्रीगुप्तलगभग 240–280वंश का संस्थापक; उपाधि 'महाराज' (सामंत-स्तर); इत्सिंग ने उल्लेख किया कि उसने चीनी बौद्ध यात्रियों के लिए मंदिर बनवाया
घटोत्कचलगभग 280–319'महाराज'
चंद्रगुप्त प्रथम319–335प्रथम स्वतंत्र सम्राट; उपाधि 'महाराजाधिराज'; लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह; गुप्त संवत् (319–320 ई.) का आरंभ; 'लिच्छवि-दौहित्र' मुद्राएँ
समुद्रगुप्त335–375'सर्वराजोच्छेत्ता', 'कविराज', 'परमभागवत', 'अश्वमेधकर्ता'; वी.ए. स्मिथ ने 'भारत का नेपोलियन' कहा; वीणा बजाते हुए सिक्के
रामगुप्तविवादितविशाखदत्त के 'देवीचंद्रगुप्तम्' तथा विदिशा से मिली जैन मूर्तियों के अभिलेखों से अस्तित्व का संकेत
चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य'375–415शक (पश्चिमी क्षत्रप) विजय → उपाधि 'शकारि'; चाँदी के सिक्के जारी किए; उज्जयिनी द्वितीय राजधानी; फाह्यान की यात्रा; वाकाटक से वैवाहिक संधि
कुमारगुप्त प्रथम415–455'महेंद्रादित्य'; नालंदा महाविहार की स्थापना का श्रेय; मयूर (कार्तिकेय) शैली के सिक्के; उसके अंतिम वर्षों में हूण-आक्रमण का आरंभ
स्कंदगुप्त455–467'विक्रमादित्य'; हूणों एवं पुष्यमित्रों को पराजित किया; भितरी (गाजीपुर) स्तंभ लेख, जूनागढ़ अभिलेख (सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण) एवं कहौम स्तंभ लेख; अंतिम महान गुप्त सम्राट
पुरुगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य, कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त, विष्णुगुप्त467–550क्रमशः दुर्बल; बुधगुप्त का एरण अभिलेख; नरसिंहगुप्त बालादित्य से हूण मिहिरकुल की पराजय की अनुश्रुति

प्रयाग प्रशस्ति — समुद्रगुप्त की दिग्विजय अनिवार्य

रचयिता हरिषेण — समुद्रगुप्त का संधिविग्रहिक (युद्ध एवं शांति मंत्री), महादंडनायक तथा कुमारामात्य। शैली चंपू (गद्य एवं पद्य का मिश्रण), भाषा संस्कृत, लिपि गुप्त-ब्राह्मी। यह उसी अशोक-स्तंभ पर उत्कीर्ण है जो मूलतः कौशांबी में था और अब प्रयागराज के किले में है। इसमें समुद्रगुप्त की नीति चार भागों में बताई गई है:

क्षेत्रनीतिविवरण
आर्यावर्त (उत्तर)प्रसभोद्धरण — बलपूर्वक उन्मूलन एवं विलय9 राजा पराजित कर राज्य साम्राज्य में मिलाए गए
दक्षिणापथ (दक्षिण)ग्रहण–मोक्ष–अनुग्रह — बंदी बनाओ, छोड़ो, अनुग्रह करो12 राजा पराजित किए पर राज्य लौटा दिए (जैसे काँची का विष्णुगोप)
प्रत्यंत (सीमावर्ती) राज्यकर एवं आज्ञा-पालनसमतट, डवाक, कामरूप, नेपाल, कर्तृपुर आदि
विदेशी शक्तियाँमैत्री एवं अधीनता-स्वीकृतिदैवपुत्र-षाहि-षाहानुषाहि (कुषाण), शक, मुरुण्ड तथा सिंहल (श्रीलंका)

11.2 प्रशासन

11.3 अर्थव्यवस्था

11.4 समाज

11.5 धर्म

गुप्त शासक 'परमभागवत' थे — भागवत/वैष्णव धर्म राजधर्म बना; गरुड़ राजचिह्न। साथ ही शैव, शाक्त, सौर तथा बौद्ध-जैन का सह-अस्तित्व रहा। मूर्ति-पूजा एवं मंदिर-निर्माण इसी युग में संस्थागत हुआ — और यहीं से नागर शैली के संरचनात्मक मंदिर आरंभ होते हैं (भीतरगाँव का ईंट-मंदिर, कानपुर; देवगढ़ का दशावतार मंदिर, ललितपुर; साँची का मंदिर संख्या 17 — विस्तार अध्याय 2.5 में)। पुराणों को अंतिम रूप, तथा अवतारवाद की परिपक्वता इसी काल की है।

11.6 विज्ञान एवं साहित्य

विद्वानकृतियोगदान
आर्यभटआर्यभटीय (499 ई.), आर्यभटसिद्धांतपृथ्वी का अपनी धुरी पर घूर्णन; ग्रहण का वैज्ञानिक कारण; π का सन्निकट मान; स्थानमान एवं त्रिकोणमिति
वराहमिहिरबृहत्संहिता, पंचसिद्धांतिका, बृहज्जातकज्योतिष, खगोल, भूगर्भ-जल, वास्तु का विश्वकोश
ब्रह्मगुप्तब्रह्मस्फुटसिद्धांत (628 ई. — गुप्तोत्तर)शून्य के गणितीय नियम; गुरुत्वाकर्षण जैसी अवधारणा का संकेत
धन्वंतरि, वाग्भट्टअष्टांगहृदय (वाग्भट्ट)आयुर्वेद का संकलन
पालकाप्यहस्त्यायुर्वेदहाथियों की चिकित्सा
कालिदासअभिज्ञानशाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् (नाटक); रघुवंशम्, कुमारसंभवम् (महाकाव्य); मेघदूतम्, ऋतुसंहार (खंडकाव्य)संस्कृत साहित्य का शिखर
विशाखदत्तमुद्राराक्षस, देवीचंद्रगुप्तम्राजनीतिक नाटक
शूद्रकमृच्छकटिकम्सामाजिक नाटक (चारुदत्त–वसंतसेना)
अमरसिंहअमरकोशसंस्कृत पर्यायवाची कोश
वात्स्यायनकामसूत्रनागरक-जीवन का चित्रण

नवरत्न की परंपरा (कालिदास, अमरसिंह, धन्वंतरि, वराहमिहिर, वररुचि, घटकर्पर, क्षपणक, वेतालभट्ट एवं शंकु) चंद्रगुप्त द्वितीय से जोड़ी जाती है, किंतु यह परवर्ती अनुश्रुति है — समकालीन अभिलेखीय प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार मेहरौली का लौह स्तंभ, जिस पर 'चंद्र' नामक राजा का उल्लेख है, सामान्यतः चंद्रगुप्त द्वितीय से पहचाना जाता है — यह जंग-रोधी धातु-विज्ञान का विश्व-प्रसिद्ध उदाहरण है।

11.7 गुप्त साम्राज्य का पतन

उत्तर प्रदेश संदर्भ — गुप्त युग का हृदय
सावधानी — गुप्त काल के प्रमुख भ्रम
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 गुप्तकालीन मुद्राओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त शासकों ने कभी चाँदी के सिक्के जारी नहीं किए।
2. समुद्रगुप्त की 'वीणावादन' प्रकार की स्वर्ण मुद्राएँ उसकी संगीत-अभिरुचि का संकेत देती हैं।
3. 'व्याघ्रहनन' (tiger-slayer) प्रकार की स्वर्ण मुद्राएँ गुप्त शासकों द्वारा जारी की गई थीं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)चंद्रगुप्त द्वितीय पश्चिमी क्षत्रपों पर विजय के पश्चात् चाँदी के सिक्के जारी करने वाला पहला गुप्त शासक था, जिन पर क्षत्रप-चिह्न के स्थान पर गरुड़ अंकित हुआ; अतः कथन 1 गलत है। समुद्रगुप्त की वीणावादन (lyrist) प्रकार की स्वर्ण मुद्राएँ तथा व्याघ्रहनन (tiger-slayer) प्रकार की मुद्राएँ दोनों ही प्रमाणित हैं, अतः कथन 2 एवं 3 सही हैं।

प्र.2 सूची-I (अभिलेख) को सूची-II (संबद्ध शासक) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. भितरी स्तंभ लेख  B. मेहरौली लौह-स्तंभ लेख  C. सोंदनी (मंदसौर) स्तंभ लेख  D. एरण वराह-प्रतिमा लेख
सूची-II: 1. यशोधर्मन  2. तोरमाण  3. स्कंदगुप्त  4. 'चंद्र' (चंद्रगुप्त द्वितीय)
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-4, B-3, C-2, D-1DA-3, B-4, C-1, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)भितरी स्तंभ लेख स्कंदगुप्त का है, जिसमें हूणों से संघर्ष तथा कुलवंश की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का उल्लेख है। मेहरौली (कुतुब परिसर) के लौह-स्तंभ लेख में 'चंद्र' नामक शासक का उल्लेख है, जिसकी पहचान सामान्यतः चंद्रगुप्त द्वितीय से की जाती है। मंदसौर जिले के सोंदनी स्थित स्तंभ लेख यशोधर्मन की हूण नरेश मिहिरकुल पर विजय का स्मारक है, जबकि एरण (सागर, म.प्र.) की वराह-प्रतिमा पर उत्कीर्ण लेख हूण शासक तोरमाण का है। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।

प्र.3 गुप्तकालीन प्रशासन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. 'कुमारामात्य' गुप्त प्रशासन के उच्चतम श्रेणी के पदाधिकारी होते थे।
2. 'उपरिक' भुक्ति (प्रांत) का प्रशासक होता था।
3. 'विषयपति' ग्राम-स्तर का सबसे छोटा अधिकारी होता था।
4. 'अक्षपटलाधिकृत' साम्राज्य का प्रधान सेनापति होता था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 4C2, 3 और 4Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)गुप्त प्रशासन में कुमारामात्य उच्च पदाधिकारी थे तथा उपरिक भुक्ति (प्रांत) का प्रधान होता था — कथन 1 व 2 सही हैं। 'विषयपति' विषय अर्थात् जिले का प्रमुख था, ग्राम-स्तरीय अधिकारी नहीं; तथा 'अक्षपटलाधिकृत' अभिलेख एवं लेखा विभाग का अधिकारी था, सेनापति नहीं। अतः कथन 3 व 4 गलत हैं।

12. गुप्तोत्तर काल

12.1 वाकाटक (लगभग 250–500 ई.)

12.2 हूण

12.3 मौखरि

12.4 पुष्यभूति (वर्धन) वंश एवं हर्षवर्धन

उत्तर प्रदेश संदर्भ — कन्नौज, उत्तर भारत की धुरी

छठी शताब्दी में मौखरियों ने और सातवीं में हर्ष ने कन्नौज को उत्तर भारत की राजधानी बनाया — यह वही नगर है जिसके लिए आगे चलकर 8वीं–9वीं शताब्दी में पाल, प्रतिहार एवं राष्ट्रकूट के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ। ईशानवर्मन का हड़हा अभिलेख (बाराबंकी), हर्ष की प्रयाग महामोक्षपरिषद तथा कन्नौज धर्म-सभा — तीनों उ.प्र. की भूमि पर हैं। ह्वेनसांग ने अयोध्या, श्रावस्ती, कौशांबी, वाराणसी, प्रयाग एवं मथुरा — सभी का विवरण दिया है।

सावधानी
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 ऐहोल प्रशस्ति, जिसमें चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्षवर्धन की पराजय का उल्लेख है, किसके द्वारा रची गई थी?

AहरिषेणBरविकीर्तिCवत्सभट्टिDबाणभट्ट
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)ऐहोल प्रशस्ति (लगभग 634 ई.) पुलकेशिन द्वितीय के जैन दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में रची और यह ऐहोल के मेगुती जैन मंदिर पर उत्कीर्ण है। हरिषेण ने समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, वत्सभट्टि ने मंदसौर अभिलेख तथा बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' लिखा था।

प्र.2 निम्नलिखित संस्कृत कवियों/लेखकों पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. बाणभट्ट
2. जयदेव
3. अश्वघोष
4. कालिदास
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 3, 1, 2B3, 4, 2, 1C4, 3, 2, 1D3, 4, 1, 2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अश्वघोष कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन (प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई.) थे; कालिदास सामान्यतः गुप्तकाल (चौथी-पाँचवीं शताब्दी) में रखे जाते हैं; बाणभट्ट सातवीं शताब्दी में हर्ष के दरबारी कवि थे; तथा 'गीतगोविन्द' के रचयिता जयदेव बारहवीं शताब्दी के हैं। अतः सही क्रम 3, 4, 1, 2 है।

प्र.3 सूची-I (चरितकाव्य) को सूची-II (जिस शासक पर केंद्रित) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. गौडवहो  B. नवसाहसांकचरित  C. विक्रमांकदेवचरित  D. हर्षचरित
सूची-II: 1. सिंधुराज  2. हर्षवर्धन  3. यशोवर्मन  4. विक्रमादित्य षष्ठ
कूट:

AA-3, B-1, C-4, D-2BA-1, B-3, C-4, D-2CA-3, B-1, C-2, D-4DA-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)प्राकृत महाकाव्य 'गौडवहो' के रचयिता वाक्पतिराज हैं और इसका नायक कन्नौज का यशोवर्मन है। पद्मगुप्त 'परिमल' रचित 'नवसाहसांकचरित' का नायक परमार शासक सिंधुराज है, जिसकी उपाधि ही 'नवसाहसांक' थी। बिल्हण के 'विक्रमांकदेवचरित' का नायक कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ तथा बाणभट्ट के 'हर्षचरित' का नायक हर्षवर्धन है।

13. दक्षिण एवं प्रायद्वीपीय भारत

छठी से बारहवीं शताब्दी के बीच प्रायद्वीपीय भारत में चार बड़ी शक्तियाँ क्रमशः उभरीं — बादामी चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट एवं चोल — और उनकी प्रतिद्वंद्विताओं ने दक्षिण भारत के राजनीतिक मानचित्र के साथ-साथ मंदिर-स्थापत्य, भक्ति-आंदोलन तथा समुद्री व्यापार को भी आकार दिया।

13.1 बादामी (वातापी) के चालुक्य (543–753 ई.)

13.2 पल्लव (लगभग छठी–नौवीं शताब्दी)

शासककाल (ई.)उपलब्धि
सिंहविष्णु575–600'अवनिसिंह'; काँची को सुदृढ़ किया; कवि भारवि दरबार में
महेंद्रवर्मन प्रथमलगभग 600–630बहुमुखी प्रतिभा — 'मत्तविलास प्रहसन' (व्यंग्य-नाटक) का लेखक; उपाधियाँ 'विचित्रचित्त', 'चित्रकारपुलि', 'मत्तविलास'; मंडगपट्टु अभिलेख — ईंट, लकड़ी, धातु एवं गारे के बिना गुहा-मंदिर; जैन से शैव मत में परिवर्तन (संत अप्पर के प्रभाव से)
नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल'630–668642 ई. में वातापी विजय → उपाधि 'वातापीकोंड'; महाबलीपुरम् के एकाश्म रथ; ह्वेनसांग की काँची यात्रा (640 ई.); श्रीलंका में मानवर्मा की पुनर्स्थापना हेतु नौ-अभियान
नरसिंहवर्मन द्वितीय 'राजसिंह'700–728काँची का कैलाशनाथ मंदिर तथा महाबलीपुरम् का तट मंदिर; कवि दंडी दरबार में; चीन से दूत-विनिमय
नंदिवर्मन द्वितीय8वीं शताब्दीकाँची का वैकुंठ पेरुमाल मंदिर
अपराजितवर्मन9वीं शताब्दी अंतअंतिम पल्लव; चोल आदित्य प्रथम द्वारा पराजित

पल्लव योगदान: द्रविड़ मंदिर-शैली का क्रमिक विकास (महेंद्र शैली → मामल्ल शैली → राजसिंह शैली → नंदिवर्मन शैली); संस्कृत एवं तमिल दोनों का संरक्षण; घटिका (काँची का उच्च शिक्षा-केंद्र); तथा भक्ति आंदोलन के शैव नायनार एवं वैष्णव अलवार संतों का उदय।

13.3 राष्ट्रकूट (753–982 ई.)

13.4 चोल साम्राज्य (850–1279 ई.)

शासककाल (ई.)उपलब्धि
विजयालयलगभग 850साम्राज्यकालीन चोलों का संस्थापक; पल्लव सामंत के रूप में तंजौर पर अधिकार; निशुंभसूदिनी (दुर्गा) मंदिर
आदित्य प्रथम871–907पल्लव अपराजितवर्मन को हराकर तोंडैमंडलम पर अधिकार
परांतक प्रथम907–955मदुरै विजय → 'मदुरैकोंड'; उत्तरमेरूर अभिलेख (919 एवं 921 ई.); 949 ई. में तक्कोलम में राष्ट्रकूटों से पराजय
राजराज प्रथम985–1014'मुम्मडिचोल', 'जयंकोंड'; तंजौर का बृहदीश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर (लगभग 1010 ई.); श्रीलंका के उत्तरी भाग एवं मालदीव पर विजय; व्यापक भू-सर्वेक्षण
राजेंद्र प्रथम1014–1044गंगा तक उत्तरी अभियान → 'गंगैकोंडचोल'; नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् एवं वहाँ का बृहदीश्वर मंदिर (लगभग 1035 ई.); 1025 ई. में श्रीविजय (शैलेंद्र) पर नौ-अभियान → 'कडारम्कोंडन'; श्रीलंका की पूर्ण विजय
राजाधिराज, राजेंद्र द्वितीय, वीरराजेंद्र1044–1070कल्याणी के चालुक्यों से दीर्घ संघर्ष
कुलोत्तुंग प्रथम1070–1122चालुक्य-चोल शाखा का आरंभ; चुंगी समाप्त करने से उपाधि 'सुंगम तविर्त्त'; चीन को 72 व्यापारियों का दूतमंडल

चोल स्थानीय स्वशासन UPPSC का प्रिय विषय

चोल प्रशासन की विश्व-प्रसिद्ध विशेषता ग्राम-स्तरीय स्वशासन है, जिसका विस्तृत विवरण काँचीपुरम् ज़िले के उत्तरमेरूर (वैकुंठ पेरुमाल मंदिर) के दो अभिलेखों (919 एवं 921 ई., परांतक चोल प्रथम के शासनकाल) से मिलता है।

सभास्वरूप
उरसाधारण गाँव की सभा — भूमिधारी कृषकों की
सभा / महासभाब्रह्मदेय / अग्रहार (ब्राह्मणों को दान में दिए) गाँवों की सभा — सर्वाधिक विकसित
नगरम्व्यापारियों एवं शिल्पियों की सभा

अन्य प्रशासनिक इकाइयाँ: मंडलम् → वलनाडु → नाडु → कुर्रम → ग्राम। राजा 'को', 'पेरुमाल अडिगल' कहलाता था; केंद्रीय परिषद 'उदनकुट्टम'। भू-राजस्व सामान्यतः उपज का एक-तिहाई; 'कडमै' भू-कर तथा 'वेट्टि' बेगार। राजराज प्रथम एवं राजेंद्र प्रथम के भू-सर्वेक्षण प्रसिद्ध हैं। चोल नौसेना प्राचीन भारत की सबसे शक्तिशाली नौसेना थी।

13.5 पांड्य

संगम युग के बाद कलभ्रों के आक्रमण ('अंधकार युग') से तमिल भूमि अस्त-व्यस्त हुई; कडुंगोन ने छठी शताब्दी में पांड्य सत्ता पुनः स्थापित की। सातवीं–नौवीं शताब्दी में पांड्यों का पल्लवों एवं चोलों से संघर्ष चला; परांतक चोल प्रथम ने मदुरै जीत लिया। बारहवीं शताब्दी के अंत तक पांड्य पुनः शक्ति संचित कर रहे थे, और तेरहवीं शताब्दी में उन्होंने चोल सत्ता समाप्त कर दी — वह कालखंड इस अध्याय की सीमा (1200 ई.) से बाहर है और मध्यकालीन अध्याय में आता है।

उत्तर प्रदेश संदर्भ

दक्षिण के राजवंशों का उ.प्र. से सीधा संबंध कन्नौज के माध्यम से है — राष्ट्रकूट शासकों ध्रुव एवं गोविंद तृतीय ने गंगा-यमुना दोआब तक अभियान किए और कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (पाल–प्रतिहार–राष्ट्रकूट) में भाग लिया। इसी प्रकार चोल राजेंद्र प्रथम की उत्तरी दिग्विजय गंगा तक पहुँची, जिसकी स्मृति में उसने 'गंगैकोंडचोलपुरम्' बसाया और गंगा-जल से वहाँ का जलाशय भरवाया — अर्थात् उत्तर भारत की गंगा दक्षिण की राजनीति में प्रतीक बनी रही।

सावधानी — दक्षिण भारत के निर्णायक युग्म
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I (मंदिर) को सूची-II (निर्माता) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. बृहदीश्वर मंदिर, तंजावुर  B. बृहदीश्वर मंदिर, गंगैकोंडचोलपुरम्  C. ऐरावतेश्वर मंदिर, दारासुरम  D. कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम
सूची-II: 1. राजेन्द्र प्रथम  2. नरसिंहवर्मन द्वितीय  3. राजराज प्रथम  4. राजराज द्वितीय
कूट:

AA-1, B-3, C-2, D-4BA-1, B-3, C-4, D-2CA-3, B-1, C-2, D-4DA-3, B-1, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)तंजावुर का बृहदीश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर राजराज प्रथम ने लगभग 1010 ई. में तथा गंगैकोंडचोलपुरम् का मंदिर उसके पुत्र राजेन्द्र प्रथम ने बनवाया; दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर राजराज द्वितीय की देन है — ये तीनों 'महान जीवंत चोल मंदिर' (Great Living Chola Temples) हैं। कांचीपुरम का कैलासनाथ मंदिर पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) ने बनवाया था।

प्र.2 सूची-I (स्थापत्य-स्थल) को सूची-II (संरक्षक राजवंश) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I: A. महाबलीपुरम् के एकाश्म रथ  B. बादामी के गुफा-मंदिर  C. खजुराहो के मंदिर  D. कोणार्क का सूर्य मंदिर
सूची-II: 1. चंदेल  2. पूर्वी गंग  3. पल्लव  4. वातापी के चालुक्य
कूट:

AA-3, B-4, C-1, D-2BA-4, B-3, C-2, D-1CA-4, B-3, C-1, D-2DA-3, B-4, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)महाबलीपुरम् के एकाश्म रथ पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन प्रथम (मामल्ल) के काल की देन हैं; बादामी के गुफा-मंदिर वातापी के चालुक्यों ने उत्कीर्ण करवाए। खजुराहो के मंदिर चंदेल शासकों ने तथा कोणार्क का सूर्य मंदिर पूर्वी गंग नरेश नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया। अतः सही सुमेलन A-3, B-4, C-1, D-2 है।

प्र.3 निम्नलिखित दक्षिण भारतीय शासकों पर विचार कीजिए तथा इन्हें उनके राज्यारोहण के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. कृष्ण प्रथम (राष्ट्रकूट)
2. राजराज प्रथम (चोल)
3. महेंद्रवर्मन प्रथम (पल्लव)
4. पुलकेशिन द्वितीय (चालुक्य)
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 3, 1, 2B3, 4, 1, 2C3, 4, 2, 1D4, 3, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)पल्लव नरेश महेंद्रवर्मन प्रथम लगभग 600 ई. में, वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय लगभग 610 ई. में, राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम 756 ई. में तथा चोल सम्राट राजराज प्रथम 985 ई. में सिंहासनारूढ़ हुए। एलोरा का कैलास मंदिर अभिलेखीय आधार पर कृष्ण प्रथम से जोड़ा जाता है। अतः सही कालक्रम 3, 4, 1, 2 है।

14. प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज एवं धर्म का विकास — कालखंड-वार सारांश

यह खंड पूरे अध्याय को एक साथ रखकर देखने के लिए है। UPPSC प्रायः ऐसे प्रश्न पूछता है जिनमें एक ही विषय के कालखंड-वार परिवर्तन को पहचानना होता है — इसीलिए यहाँ तथ्य 'शासक-वार' नहीं, 'विषय-वार' क्रम में दिए गए हैं।

14.1 प्रशासन का विकास

कालखंडराजा की प्रकृतिइकाइयाँनिर्णायक विशेषता
ऋग्वैदिक'राजन्' — जन का नेता; निरंकुश नहींकुल–ग्राम–विश्–जनसभा, समिति, विदथ; स्वैच्छिक 'बलि'; न स्थायी सेना, न नियमित कर
उत्तर वैदिक'सम्राट', 'एकराट'; दैवी आधारजनपदराजसूय, अश्वमेध, वाजपेय; 12 रत्निन; विदथ लुप्त; बलि अनिवार्य
महाजनपदराजतंत्र एवं गणतंत्र — दोनों16 महाजनपदस्थायी सेना; नियमित भू-राजस्व (1/6); दुर्ग-नगर
मौर्यनिरंकुश किंतु 'पितृवत्'; अशोक के बाद नैतिकप्रांत–ज़िला–ग्रामअति-केंद्रीकरण; 18 तीर्थ; व्यापक गुप्तचर-तंत्र; नगर एवं सैन्य की 6-6 समितियाँ
मौर्योत्तरविदेशी उपाधियाँ — 'देवपुत्र', 'शाओनानोशाओ'क्षत्रपीक्षत्रप प्रणाली; राजा के देवत्व की धारणा; सातवाहनों से भूमि-अनुदान का आरंभ
गुप्त'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज'भुक्ति–विषय–वीथी–ग्रामविकेंद्रीकरण; वेतन के बदले भूमि; सामंतवाद की नींव; नगर परिषदों में व्यापारी-शिल्पी भागीदारी
हर्ष'शिलादित्य'भुक्ति–विषय–ग्रामसामंतवाद और गहरा; अधिकारियों को भूमि-अनुदान सामान्य
चोल'पेरुमाल अडिगल'; मंदिर-केंद्रित वैधतामंडलम्–वलनाडु–नाडु–कुर्रम–ग्रामसुसंगठित ग्राम स्वशासन (उर, सभा, नगरम्; कुडवोलै); शक्तिशाली नौसेना; भू-सर्वेक्षण

14.2 अर्थव्यवस्था का विकास

कालखंडआधारमुद्राव्यापार
हड़प्पाकृषि + नगरीय शिल्पमुद्रा नहीं; वस्तु-विनिमय; 16 के गुणज वाले बाटमेलुहा–दिलमुन–मकान; लोथल का गोदीवाड़ा
ऋग्वैदिकपशुचारण; गाय = धननिष्क (आभूषण)नगण्य; 'पणि' व्यापारी
उत्तर वैदिककृषि (लोहे से दोआब में विस्तार)निष्क, शतमान, कृष्णलआरंभिक; शिल्प-विविधता
महाजनपदअधिशेष कृषि; द्वितीय नगरीकरणआहत सिक्के (कार्षापण)उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ; श्रेणियाँ
मौर्यराजकीय नियंत्रण; 'सीता' भूमिचाँदी एवं ताँबे के आहत सिक्केराज्य-नियंत्रित; अध्यक्ष-प्रणाली
मौर्योत्तरशिल्प एवं वाणिज्य का शिखरकुषाण स्वर्ण; सातवाहन सीसा; हिन्द-यवन चित्र-युक्तरोम एवं रेशम मार्ग; मानसून की खोज; अरिकामेडु
गुप्तकृषि; भूमि-अनुदानस्वर्ण 'दीनार', चाँदी 'रूपक'पश्चिमी व्यापार का ह्रास; नगरों का क्षय
चोलसिंचाई-आधारित कृषि; मंदिर-अर्थव्यवस्थास्वर्ण 'कासु'समुद्री व्यापार पुनर्जीवित — चीन एवं दक्षिण-पूर्व एशिया; अय्यावोले एवं मणिग्रामम् व्यापारी संघ

14.3 समाज का विकास

14.4 धर्म का विकास

चरणस्वरूप
हड़प्पामातृदेवी, पशुपति, वृक्ष एवं पशु-पूजा; मंदिर नहीं
ऋग्वैदिकप्रकृति-पूजा; इंद्र–अग्नि–वरुण; न मूर्ति, न मंदिर
उत्तर वैदिकप्रजापति सर्वोच्च; विष्णु–रुद्र का उदय; कर्मकांड की प्रधानता; अंत में उपनिषदीय प्रतिक्रिया
छठी शताब्दी ई.पू.बौद्ध, जैन, आजीवक, चार्वाक — श्रमण परंपराओं का उदय
मौर्यअशोक का धम्म — राज्य द्वारा प्रचारित सार्वभौम नैतिकता
मौर्योत्तरमहायान एवं बोधिसत्व; भागवत/वैष्णव धर्म (हेलियोडोरस स्तंभ); मूर्ति-पूजा का आरंभ; गांधार-मथुरा में बुद्ध-प्रतिमा
गुप्तवैष्णव धर्म राजधर्म; मंदिर-निर्माण संस्थागत; पुराणों को अंतिम रूप; अवतारवाद
गुप्तोत्तर एवं दक्षिणभक्ति आंदोलन — तमिल अलवार (वैष्णव) एवं नायनार (शैव); तंत्र एवं वज्रयान; मंदिर सामाजिक-आर्थिक केंद्र बने

14.5 मुख्य कालक्रम — एक दृष्टि में

क्रमघटनातिथि
1हड़प्पा सभ्यता का परिपक्व चरणलगभग 2600–1900 ई.पू.
2ऋग्वैदिक काललगभग 1500–1000 ई.पू.
3उत्तर वैदिक काल (PGW एवं लोहा)लगभग 1000–600 ई.पू.
4महाजनपदों का उदय; बुद्ध एवं महावीरलगभग 600–500 ई.पू.
5बिंबिसार का राज्यारोहण544 ई.पू.
6बुद्ध का महापरिनिर्वाण; प्रथम बौद्ध संगीति483 ई.पू.
7द्वितीय बौद्ध संगीति (वैशाली)383 ई.पू.
8नंद वंश की स्थापना (महापद्मनंद)लगभग 344 ई.पू.
9सिकंदर का आक्रमण; वितस्ता का युद्ध326 ई.पू.
10चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा मौर्य साम्राज्य की स्थापनालगभग 322 ई.पू.
11चंद्रगुप्त–सेल्यूकस संधिलगभग 303 ई.पू.
12कलिंग युद्ध261 ई.पू.
13तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र)250 ई.पू.
14अशोक की मृत्यु232 ई.पू.
15पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य वंश का अंत185 ई.पू.
16हेलियोडोरस का बेसनगर स्तंभलगभग 113 ई.पू.
17कण्व वंश की स्थापना73 ई.पू.
18विक्रम संवत् का आरंभ58 ई.पू.
19शक संवत् का आरंभ (कनिष्क से परंपरागत रूप से जुड़ा)78 ई.
20रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेखलगभग 150 ई.
21गुप्त संवत् का आरंभ (चंद्रगुप्त प्रथम)319–320 ई.
22फाह्यान की भारत-यात्रा399–414 ई.
23आर्यभटीय की रचना499 ई.
24सती का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य (एरण)510 ई.
25यशोधर्मन का मंदसौर अभिलेख532 ई.
26हर्षवर्धन का राज्यारोहण; हर्ष संवत्606 ई.
27पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्ष की पराजय (नर्मदा)लगभग 618–619 ई.
28ऐहोल प्रशस्ति (रविकीर्ति)634–635 ई.
29नरसिंहवर्मन प्रथम द्वारा वातापी विजय642 ई.
30कन्नौज धर्म-सभा (ह्वेनसांग अध्यक्ष)643 ई.
31हर्ष की मृत्यु647 ई.
32दंतिदुर्ग द्वारा राष्ट्रकूट वंश की स्थापना753 ई.
33विजयालय द्वारा साम्राज्यकालीन चोलों का आरंभलगभग 850 ई.
34उत्तरमेरूर अभिलेख (परांतक प्रथम)919 एवं 921 ई.
35तक्कोलम का युद्ध (कृष्ण तृतीय बनाम चोल)949 ई.
36राजराज प्रथम का राज्यारोहण985 ई.
37तंजौर का बृहदीश्वर मंदिरलगभग 1010 ई.
38राजेंद्र प्रथम का श्रीविजय नौ-अभियान1025 ई.
39गंगैकोंडचोलपुरम् का बृहदीश्वर मंदिरलगभग 1035 ई.
40कल्हण की 'राजतरंगिणी'1148–1150 ई.

14.6 अंतिम दोहराव — वे तथ्य जो प्रश्न बनते हैं

परीक्षा-दृष्टि — इस अध्याय से प्रश्न किस रूप में आएगा
  1. सूची सुमेलन: हड़प्पाई स्थल↔नदी/खोज; अभिलेख↔शासक; ग्रंथ↔लेखक; महाजनपद↔राजधानी; संगम कृति↔कवि; शासक↔उपाधि।
  2. कालक्रम: बौद्ध संगीतियाँ; मगध के वंश; सुदर्शन झील की चार मरम्मतें; दक्षिण भारत की चार निर्णायक तिथियाँ (642, 753, 949, 1025 ई.)।
  3. अभिकथन–कारण: जैसे — "(A) अशोक ने कलिंग के बाद कोई युद्ध नहीं किया। (R) उसने सेना भंग कर दी थी।" — यहाँ (A) सत्य पर (R) असत्य है। ऐसे प्रश्नों में कारण की सत्यता अलग से जाँचें
  4. 'सुमेलित नहीं है': प्रायः एक निकट-समान युग्म बदल दिया जाता है — जैसे 'कालीबंगा – बंदरगाह', 'मिलिन्दपन्हो – नागार्जुन', 'उत्तरमेरूर – राजराज प्रथम'।
  5. उत्तर प्रदेश-केंद्रित प्रश्न: उ.प्र. के किसी पुरातात्विक स्थल का ज़िला, या किसी अभिलेख का स्थान — यह UPPSC की स्थायी आदत है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित प्राचीन भारतीय घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. हर्षवर्धन का राज्यारोहण
2. रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख
3. शक संवत् का आरंभ
4. गुप्त संवत् का आरंभ
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 2, 4, 1B2, 3, 1, 4C3, 2, 1, 4D2, 3, 4, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)शक संवत् का आरंभ 78 ई. माना जाता है। रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ (गिरनार) शिलालेख लगभग 150 ई. का है, जिसमें सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का उल्लेख है। गुप्त संवत् लगभग 319-20 ई. में आरंभ हुआ और हर्षवर्धन 606 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। अतः सही क्रम 3, 2, 4, 1 है।

प्र.2 चोल शासकों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. राजराज प्रथम ने तंजावुर में बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर बनवाया, जिसे 'दक्षिण मेरु' भी कहा जाता है।
2. राजेंद्र प्रथम ने उत्तर भारत के अभियान के उपलक्ष्य में 'गंगैकोंडचोल' उपाधि धारण की तथा गंगैकोंडचोलपुरम् नामक नई राजधानी बसाई।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राजराज प्रथम द्वारा निर्मित तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर द्रविड़ स्थापत्य का शिखर है और 'दक्षिण मेरु' कहलाता है। उसके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने गंगा-अभियान के बाद 'गंगैकोंडचोल' उपाधि लेकर गंगैकोंडचोलपुरम् बसाया और वहाँ भी विशाल शिव मंदिर बनवाया। अतः दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (शासक)    (उपाधि)
1. मिहिरभोज — 'आदिवराह'
2. समुद्रगुप्त — 'कविराज'
3. कनिष्क — 'वातापीकोंड'
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)गुर्जर-प्रतिहार नरेश मिहिरभोज 'श्रीमद्-आदिवराह' कहलाता था और हरिषेण-रचित प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त को 'कविराज' (कविराज-शब्द) कहती है; अतः युग्म 1 तथा 2 सही सुमेलित हैं। 'वातापीकोंड' अर्थात् वातापी को जीतने वाला — यह उपाधि पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन प्रथम की थी, जिसने चालुक्य राजधानी वातापी पर अधिकार किया था; कुषाण शासक कनिष्क की उपाधियाँ 'देवपुत्र', 'शाओनानोशाओ' आदि थीं। अतः केवल युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है।