2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था एवं शासन से लगभग 19–20 प्रश्न आए। इस अध्याय का हिस्सा
इसमें असामान्य रूप से बड़ा रहता है, क्योंकि यहाँ वह सब कुछ है जिसे परीक्षा सूची सुमेलन में ढाल सकती है —
निकाय ↔ अनुच्छेद, संशोधन ↔ अनुसूची, समिति ↔ वर्ष,
पद ↔ नियुक्तिकर्ता, निकाय ↔ संवैधानिक/वैधानिक। UPPSC की तीन पसंदीदा चालें यहाँ
बार-बार दिखती हैं: (क) 73वें और 74वें संशोधन के आँकड़े आपस में बदल देना (29 बनाम 18, भाग IX बनाम IXक);
(ख) “राज्य निर्वाचन आयोग” और “भारत निर्वाचन आयोग” को एक मान लेना; (ग) नीति आयोग,
सीबीआई या लोकपाल को “संवैधानिक निकाय” बताकर विकल्प में रख देना। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में सुमेलन-तालिका है और
अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची, कालक्रम तथा संवैधानिक/वैधानिक की अलग सूची दी गई है।
इस अध्याय की सीमा
केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध, कर-विभाजन तथा जीएसटी परिषद अध्याय 4.3 में हैं — यहाँ वित्त आयोग का
केवल संस्थागत पक्ष (अनुच्छेद 280, संरचना, कार्य, नवीनतम स्थिति) है। संसदीय समितियों का ढाँचा, जिसमें लोक लेखा
समिति की पूरी संरचना आती है, अध्याय 4.4 में है — यहाँ केवल नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक से उसका संबंध
बताया गया है। न्यायपालिका, अधिकरण तथा न्यायिक पुनर्विलोकन अध्याय 4.5 में हैं; मौलिक अधिकार एवं
नीति-निदेशक तत्व अध्याय 4.2 में। उत्तर प्रदेश के अपने निकाय, आयोग एवं योजनाएँ भाग 8 में
विस्तार से हैं — इस अध्याय में UP केवल राष्ट्रीय ढाँचे के उदाहरण के रूप में आता है।
1. पंचायती राज का विकास — समितियों की शृंखला
1.1 संविधान में पंचायत क्यों नहीं थी
मूल संविधान (1950) में स्थानीय स्वशासन के लिए कोई विस्तृत उपबंध नहीं था। पंचायतों का उल्लेख केवल
अनुच्छेद 40 में था — एक नीति-निदेशक तत्व, जो राज्य से कहता है कि वह ग्राम पंचायतों का संगठन करे
और उन्हें ऐसी शक्तियाँ एवं प्राधिकार दे जो उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए
आवश्यक हों। साथ ही स्थानीय स्वशासन राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय है।
संविधान सभा में इस पर गहरा मतभेद था। महात्मा गांधी के “ग्राम स्वराज” के विचार के विपरीत
डॉ. भीमराव अंबेडकर (B.R. Ambedkar) ने गाँव को “संकीर्णता की खोह, अज्ञान, संकुचित मानसिकता एवं
सांप्रदायिकता का अड्डा” कहा था। परिणाम एक समझौता हुआ — पंचायत संविधान में आई, पर केवल एक अप्रवर्तनीय
निदेश के रूप में। इसी कमज़ोर आधार ने आगे चार दशक तक की वह यात्रा तय की जो 1992 के 73वें संशोधन पर जाकर पूरी हुई।
स्वतंत्रता के बाद पहला बड़ा प्रयास सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Community Development Programme) था,
जो 2 अक्टूबर 1952 को आरंभ हुआ, और उसका विस्तार राष्ट्रीय प्रसार सेवा (National Extension
Service), 2 अक्टूबर 1953। दोनों असफल रहे, क्योंकि इनमें जन-सहभागिता नहीं थी — ये अधिकारी-संचालित
कार्यक्रम बनकर रह गए। इसी विफलता की जाँच से पंचायती राज की पूरी कहानी शुरू होती है।
1.2 बलवंत राय मेहता समिति (1957) — “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण”
भारत सरकार ने जनवरी 1957 में बलवंत राय जी. मेहता (Balwant Rai G. Mehta) की
अध्यक्षता में समिति नियुक्त की, जिसका काम सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय प्रसार सेवा के कार्य की जाँच करना
तथा उन्हें अधिक प्रभावी बनाने के उपाय सुझाना था। समिति ने नवंबर 1957 में प्रतिवेदन दिया और
“लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic Decentralisation)” की योजना रखी — यही आगे
पंचायती राज कहलाई।
त्रिस्तरीय ढाँचा — ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खंड स्तर पर
पंचायत समिति, जिला स्तर पर जिला परिषद; तीनों जैविक रूप से जुड़े हों।
ग्राम पंचायत — प्रत्यक्ष निर्वाचन; पंचायत समिति एवं जिला परिषद — अप्रत्यक्ष निर्वाचन।
पंचायत समिति कार्यपालक निकाय, जबकि जिला परिषद परामर्शदात्री, पर्यवेक्षी एवं समन्वयकारी निकाय।
जिलाधिकारी (Collector) जिला परिषद का अध्यक्ष हो।
विकास कार्यक्रम इन निकायों को सौंपे जाएँ; इन्हें पर्याप्त संसाधन एवं वास्तविक सत्ता का हस्तांतरण हो।
राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने इन सिफ़ारिशों को जनवरी 1958 में स्वीकार किया, पर कोई एक ढाँचा
थोपा नहीं — राज्यों को अपनी परिस्थिति के अनुसार रूप चुनने की छूट दी गई। यही कारण है कि आगे चलकर राज्यों में ढाँचे
भिन्न-भिन्न रहे (राजस्थान — त्रिस्तरीय, तमिलनाडु — द्विस्तरीय, पश्चिम बंगाल — चतुःस्तरीय)।
परीक्षा-दृष्टि — पहला राज्य कौन
पंचायती राज सर्वप्रथम राजस्थान में लागू हुआ — 2 अक्टूबर 1959 को
नागौर (Nagaur) जिले में, उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू ने किया। दूसरा राज्य
आंध्र प्रदेश था — 1 नवंबर 1959। यह युग्म (राजस्थान–नागौर–1959) UPPSC में
बहु-पूछित है; ध्यान रहे कि आंध्र प्रदेश को “पहला” बताना सबसे आम फंदा है।
1.3 अशोक मेहता समिति (1977–78) — द्विस्तरीय प्रतिमान
1960 के दशक के मध्य से पंचायती राज क्षीण होने लगा — निर्वाचन टलते रहे, वित्त सूखता रहा, अधिकारी हावी होते गए।
जनता सरकार ने दिसंबर 1977 में अशोक मेहता (Ashok Mehta) की अध्यक्षता में समिति बनाई,
जिसने अगस्त 1978 में 132 सिफ़ारिशों वाला प्रतिवेदन दिया।
द्विस्तरीय ढाँचा — जिला परिषद (जिला स्तर) तथा मंडल पंचायत
(15,000–20,000 जनसंख्या के गाँवों का समूह)। त्रिस्तरीय के स्थान पर यही मूल बदलाव है।
जिला विकेंद्रीकरण की प्रथम इकाई हो; जिला परिषद कार्यपालक निकाय बने और
जिला स्तर पर योजना-निर्माण का उत्तरदायित्व उसी का हो।
पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों की खुली भागीदारी हो।
पंचायती राज संस्थाओं को अनिवार्य कराधान की शक्ति मिले।
अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए जनसंख्या के आधार पर स्थानों का आरक्षण।
न्याय पंचायतें विकास पंचायतों से अलग रखी जाएँ और उनकी अध्यक्षता एक
अर्हता-प्राप्त न्यायाधीश करे।
राज्य मंत्रिपरिषद में पंचायती राज मंत्री हो; संस्थाओं की सामाजिक संपरीक्षा हो;
पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी जाए।
केंद्र में जनता सरकार गिर जाने के कारण इन सिफ़ारिशों पर केंद्रीय स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, पर
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल ने इनके आधार पर अपने कानून बनाए — पश्चिम बंगाल में 1978 से
नियमित पंचायत चुनाव इसी दौर की देन हैं।
1.4 जी.वी.के. राव समिति (1985) — “जड़ों के बिना घास”
योजना आयोग ने 1985 में जी.वी.के. राव (G.V.K. Rao) की अध्यक्षता में
“ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए विद्यमान प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा समिति” बनाई।
समिति का सबसे उद्धृत वाक्य यही है कि नौकरशाही के बढ़ते वर्चस्व से पंचायती राज संस्थाएँ कमज़ोर होकर
“जड़ों के बिना घास (grass without roots)” बन गई हैं।
जिला परिषद को विकेंद्रीकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई माना जाए —
“जिला ही विकास प्रबंधन का धुरी-बिंदु है”।
ब्लॉक विकास अधिकारी को वास्तविक शक्ति मिले; जिला विकास आयुक्त (District Development Commissioner)
का नया पद सृजित हो।
पंचायती राज संस्थाओं के नियमित निर्वाचन हों।
कुछ नियोजन-कार्य राज्य स्तर से हटाकर जिला स्तर पर लाए जाएँ।
1.5 एल.एम. सिंघवी समिति (1986) — संवैधानिक मान्यता का प्रस्ताव
राजीव गांधी सरकार ने 1986 में लक्ष्मी मल्ल सिंघवी (L.M. Singhvi) की अध्यक्षता में
“लोकतंत्र एवं विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुज्जीवन संबंधी समिति” बनाई। यही वह समिति है जिसने
पहली बार स्पष्ट रूप से कहा कि पंचायती राज को संविधान में ही मान्यता दी जाए — इसके लिए संविधान में
एक नया अध्याय जोड़ा जाए।
पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता एवं संरक्षण; नियमित, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष
निर्वाचन सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक उपबंध।
ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र का मूर्त रूप माना गया — यही समिति की
सबसे प्रभावशाली संकल्पना है।
गाँवों का पुनर्गठन कर ग्राम पंचायतों को अधिक व्यवहार्य (viable) बनाया जाए;
जहाँ आवश्यक हो, गाँवों के समूह पर एक पंचायत हो।
न्याय पंचायतें गाँवों के समूह के लिए गठित हों।
पंचायतों को अधिक वित्तीय संसाधन मिलें तथा चुनावी विवादों के निपटारे के लिए
न्यायिक अधिकरण बने।
1.6 थुंगन एवं गाडगिल समितियाँ (1988) तथा 64वाँ–65वाँ विधेयक
पी.के. थुंगन समिति (P.K. Thungon, 1988) — संसदीय परामर्शदात्री समिति की उप-समिति — ने कहा कि
पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में मान्यता मिले, त्रिस्तरीय ढाँचा हो,
5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल हो, जिला परिषद योजना एवं विकास की धुरी बने, तथा
अनुसूचित जाति/जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण हो।
वी.एन. गाडगिल समिति (V.N. Gadgil, 1988) ने और आगे जाकर उन प्रश्नों के उत्तर दिए जो वास्तव में
73वें संशोधन का ढाँचा बने — पंचायतों को संवैधानिक दर्जा, त्रिस्तरीय व्यवस्था,
5 वर्ष का कार्यकाल, प्रत्यक्ष निर्वाचन, अनुसूचित जाति/जनजाति एवं महिलाओं के लिए
आरक्षण, तथा वित्त के लिए राज्य वित्त आयोग।
गाडगिल समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर राजीव गांधी सरकार जुलाई 1989 में
64वाँ संविधान संशोधन विधेयक (पंचायती राज) लोक सभा में लाई। लोक सभा ने उसे पारित कर दिया, किंतु
राज्य सभा ने अक्टूबर 1989 में उसे गिरा दिया — विपक्ष का तर्क था कि यह संघीय ढाँचे में
केंद्रीकरण बढ़ाएगा। इसी के साथ नगरीय निकायों के लिए लाया गया 65वाँ संविधान संशोधन विधेयक
(नगरपालिका विधेयक) भी राज्य सभा में गिर गया।
वी.पी. सिंह सरकार ने 1990 में संयुक्त विधेयक लाने का प्रयास किया, पर सरकार गिर गई। अंततः
पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने सितंबर 1991 में संशोधित रूप में दो विधेयक प्रस्तुत किए —
72वाँ विधेयक (पंचायत) एवं 73वाँ विधेयक (नगरपालिका) — जो दिसंबर 1992 में पारित होकर
क्रमशः 73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 बने।
सावधानी — विधेयक-संख्या और अधिनियम-संख्या अलग हैं
1989 का 64वाँ विधेयक = पंचायत; 1989 का 65वाँ विधेयक = नगरपालिका। दोनों
लोक सभा में पारित, राज्य सभा में असफल।
1991 का 72वाँ विधेयक बना 73वाँ अधिनियम (पंचायत); 1991 का
73वाँ विधेयक बना 74वाँ अधिनियम (नगरपालिका)। विधेयक-क्रमांक और
अधिनियम-क्रमांक का यह एक अंक का अंतर ही प्रश्न बनता है।
“64वाँ संविधान संशोधन अधिनियम” वास्तव में 1990 का है और उसका विषय
पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाना है — पंचायत नहीं। विकल्प में यह भ्रम अक्सर रखा जाता है।
1952 · 1953सामुदायिक विकास कार्यक्रम (2 अक्टूबर 1952) एवं राष्ट्रीय प्रसार सेवा (2 अक्टूबर 1953) — जन-सहभागिता के अभाव में असफल
1957बलवंत राय मेहता समिति — “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण”; त्रिस्तरीय; पंचायत समिति कार्यपालक, जिला परिषद परामर्शदात्री; कलेक्टर अध्यक्ष
1959राजस्थान (नागौर, 2 अक्टूबर) पंचायती राज लागू करने वाला पहला राज्य; आंध्र प्रदेश दूसरा (1 नवंबर)
1985जी.वी.के. राव समिति — “जड़ों के बिना घास”; जिला परिषद केंद्रीय इकाई; जिला विकास आयुक्त का पद
1986एल.एम. सिंघवी समिति — संवैधानिक मान्यता का प्रस्ताव; ग्राम सभा = प्रत्यक्ष लोकतंत्र; न्याय पंचायत
1988थुंगन समिति एवं गाडगिल समिति — संवैधानिक दर्जा, त्रिस्तरीय, 5 वर्ष, आरक्षण, राज्य वित्त आयोग
198964वाँ (पंचायत) एवं 65वाँ (नगरपालिका) विधेयक — लोक सभा में पारित, राज्य सभा में असफल
1992 · 199373वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन पारित (दिसंबर 1992) → प्रवृत्त 24 अप्रैल 1993 एवं 1 जून 1993
चार प्रमुख समितियाँ — कालक्रम में“बलवान अशोक, राव सिंघवी”
बलवान = बलवंत राय मेहता (1957) → अशोक = अशोक मेहता (1977–78) →
राव = जी.वी.के. राव (1985) → सिंघवी = एल.एम. सिंघवी (1986)। इसके बाद 1988 की जोड़ी
थुंगन + गाडगिल याद रखें — “ठग” (थुंगन–गाडगिल) ने ही 73वें संशोधन का खाका खींचा।
सुमेलन-तालिका 1 : समिति ↔ वर्ष ↔ निर्णायक सिफ़ारिश
समिति
वर्ष
जिस एक बात से पहचानी जाती है
बलवंत राय मेहता
1957
त्रिस्तरीय पंचायती राज; “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण”; कलेक्टर जिला परिषद का अध्यक्ष
अशोक मेहता
1977 (गठन) · 1978 (प्रतिवेदन)
द्विस्तरीय — जिला परिषद + मंडल पंचायत; राजनीतिक दलों की भागीदारी
जी.वी.के. राव
1985
“जड़ों के बिना घास”; जिला विकास आयुक्त का पद
एल.एम. सिंघवी
1986
संवैधानिक मान्यता; ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र का आधार
पी.के. थुंगन
1988
संवैधानिक दर्जा + जिला परिषद को नियोजन की धुरी
वी.एन. गाडगिल
1988
राज्य वित्त आयोग एवं 5-वर्षीय कार्यकाल का सुझाव — 73वें संशोधन का सीधा पूर्वज
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (मोरारजी देसाई, फिर के. हनुमंतैया)
1966–70
केंद्र में लोकपाल एवं राज्यों में लोकायुक्त की सिफ़ारिश; प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का समर्थन
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (समिति) सूची-II (प्रमुख सिफ़ारिश) A. बलवंत राय मेहता 1. पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता B. अशोक मेहता 2. त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण C. जी.वी.के. राव 3. द्विस्तरीय ढाँचा — जिला परिषद एवं मंडल पंचायत D. एल.एम. सिंघवी 4. जिला विकास आयुक्त का पद कूट:
उत्तर: (C)बलवंत राय मेहता (1957) — त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण; अशोक मेहता (1978) — द्विस्तरीय जिला परिषद एवं मंडल पंचायत; जी.वी.के. राव (1985) — जिला विकास आयुक्त का पद; एल.एम. सिंघवी (1986) — संवैधानिक मान्यता। अतः A-2, B-3, C-4, D-1 सही है।
प्र.2निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. राजस्थान में पंचायती राज का उद्घाटन 2. अशोक मेहता समिति का प्रतिवेदन 3. 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक का राज्य सभा में गिरना 4. एल.एम. सिंघवी समिति का गठन नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1, 2, 4, 3B2, 1, 3, 4C2, 1, 4, 3D1, 2, 3, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राजस्थान में उद्घाटन 2 अक्टूबर 1959; अशोक मेहता समिति का प्रतिवेदन अगस्त 1978; एल.एम. सिंघवी समिति 1986; 64वाँ संशोधन विधेयक अक्टूबर 1989 में राज्य सभा में गिरा। अतः क्रम 1, 2, 4, 3 है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): मूल संविधान में पंचायतों के लिए कोई विस्तृत उपबंध नहीं था। कारण (R): मूल संविधान में स्थानीय स्वशासन को सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में रखा गया था। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)मूल संविधान में पंचायतों का केवल एक अप्रवर्तनीय निदेश (अनुच्छेद 40) था — (A) सही है। किंतु स्थानीय स्वशासन राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय है, समवर्ती सूची का नहीं — अतः (R) गलत है।
2. 73वाँ संविधान संशोधन — भाग IX एवं ग्यारहवीं अनुसूची
2.1 संशोधन का ढाँचा — एक वाक्य में
73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने संविधान में एक नया भाग IX — “पंचायतें”
जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 243 से 243ण तक (अंग्रेज़ी क्रम में 243 से 243-O) कुल
16 अनुच्छेद हैं, तथा एक नई ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी जिसमें पंचायतों के
29 विषय हैं। इसे राष्ट्रपति की अनुमति 20 अप्रैल 1993 को मिली और यह
24 अप्रैल 1993 से प्रवृत्त हुआ — इसी कारण 24 अप्रैल को
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। इस संशोधन ने अनुच्छेद 40 के अप्रवर्तनीय निदेश को
प्रवर्तनीय संवैधानिक ढाँचे में बदल दिया।
भाग IX — पंचायतें (अनुच्छेद 243 से 243ण)
ग्राम स्तर — ग्राम पंचायत— आधार निकाय; इसके ऊपर ग्राम सभा (अनु. 243क); अध्यक्ष = प्रधान/सरपंच
ग्राम सभा— पंचायत क्षेत्र के भीतर आने वाले गाँव की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत सभी व्यक्तियों का निकाय; यह निर्वाचित निकाय नहीं है
मध्यवर्ती स्तर — क्षेत्र/खंड पंचायत— जिसे पंचायत समिति, क्षेत्र पंचायत, मंडल परिषद आदि नामों से जाना जाता है; 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्य में यह स्तर छोड़ा जा सकता है
जिला स्तर — जिला पंचायत / जिला परिषद— शीर्ष निकाय; जिला योजना समिति (अनु. 243यघ) से जुड़ा
सहायक संवैधानिक तंत्र— राज्य निर्वाचन आयोग (243ट) · राज्य वित्त आयोग (243झ) · लेखा-संपरीक्षा (243ञ)
2.2 अनुच्छेदवार विवरण — 243 से 243ण
UPPSC में इस भाग से सर्वाधिक प्रश्न अनुच्छेद ↔ विषय के सुमेलन में आते हैं। इसीलिए पूरी सूची एक साथ दी जा रही है।
सुमेलन-तालिका 2 : भाग IX के अनुच्छेद ↔ विषय (हिंदी एवं अंग्रेज़ी दोनों क्रम में)
ग्राम स्तर पर ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगी जो राज्य विधानमंडल विधि द्वारा उपबंधित करे — शक्तियाँ संविधान ने नहीं गिनाईं
243ख
243B
पंचायतों का गठन
त्रिस्तरीय अनिवार्य; किंतु 20 लाख से अनधिक जनसंख्या वाले राज्य में मध्यवर्ती स्तर न बनाना अनुज्ञेय
243ग
243C
संरचना
सभी स्थान प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे जाएँगे; मध्यवर्ती एवं जिला स्तर के अध्यक्ष निर्वाचित सदस्यों द्वारा उन्हीं में से चुने जाएँगे; ग्राम स्तर के अध्यक्ष की रीति राज्य तय करेगा
243घ
243D
स्थानों का आरक्षण
अजा/अजजा — जनसंख्या के अनुपात में; महिलाओं के लिए कुल स्थानों का कम-से-कम 1/3 (अजा/अजजा के आरक्षित स्थानों के भीतर भी 1/3); अध्यक्ष-पदों पर भी यही; पिछड़े वर्गों का आरक्षण राज्य के विवेक पर
243ङ
243E
अवधि
5 वर्ष; पूर्व-विघटन पर 6 माह के भीतर निर्वाचन; पुनर्गठित पंचायत केवल शेष अवधि के लिए; यदि शेष अवधि 6 माह से कम है तो निर्वाचन आवश्यक नहीं
243च
243F
निरर्हताएँ
राज्य विधानमंडल के लिए लागू निरर्हताएँ; किंतु आयु 21 वर्ष — 25 से कम होने के आधार पर निरर्हित नहीं
243छ
243G
शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व
ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषय; “स्वशासन की संस्था” बनने के लिए आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाएँ
243ज
243H
कर अधिरोपित करने की शक्ति एवं निधियाँ
राज्य विधानमंडल प्राधिकृत कर सकता है — पंचायत को कर-शक्ति संविधान से सीधे नहीं मिलती
243झ
243I
राज्य वित्त आयोग
राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5वें वर्ष गठित; पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा; प्रतिवेदन राज्य विधानमंडल के समक्ष कृत-कार्रवाई ज्ञापन सहित
243ञ
243J
लेखाओं की संपरीक्षा
राज्य विधानमंडल विधि द्वारा उपबंध करेगा
243ट
243K
राज्य निर्वाचन आयोग
राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा; हटाया केवल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रीति एवं आधार पर; सेवा-शर्तें नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से नहीं बदली जा सकतीं
243ठ
243L
संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना
राष्ट्रपति निदेश द्वारा अपवाद/उपांतरण कर सकते हैं
243ड
243M
कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
नागालैंड, मेघालय, मिज़ोरम; मणिपुर के जिला परिषद वाले पहाड़ी क्षेत्र; पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्र एवं छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्र; दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद क्षेत्र (जिला पंचायत के संबंध में)
243ढ
243N
विद्यमान विधियों का बना रहना
असंगत विधियाँ 1 वर्ष (अर्थात् 24 अप्रैल 1994) तक प्रवृत्त रहीं
243ण
243-O
न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन
परिसीमन/स्थान-आवंटन विधि की वैधता न्यायालय में प्रश्नगत नहीं; निर्वाचन को केवल निर्वाचन याचिका से चुनौती
भाग IX के दो सबसे पूछे जाने वाले अनुच्छेद“झ = झोली (वित्त), ट = टिकट (चुनाव)”
243झ — राज्य वित्त आयोग (झोली = धन); 243ट — राज्य निर्वाचन आयोग
(टिकट = चुनाव)। नगरपालिकाओं में यही जोड़ी 243म (वित्त आयोग) एवं 243यक (निर्वाचन) बन जाती है।
और याद रखें — 243घ = आरक्षण (घ से “घर में एक-तिहाई महिलाएँ”)।
2.3 ग्यारहवीं अनुसूची — 29 विषय
ग्यारहवीं अनुसूची अनुच्छेद 243छ से संबंधित है और इसमें वे विषय हैं जो राज्य विधानमंडल पंचायतों को
सौंप सकता है। ध्यान दें — यह सौंपना स्वैच्छिक है; संविधान ने ये विषय स्वतः पंचायतों को नहीं दिए।
1. कृषि, कृषि प्रसार सहित · 2. भूमि विकास, भूमि सुधारों का कार्यान्वयन, चकबंदी एवं मृदा संरक्षण
· 3. लघु सिंचाई, जल प्रबंधन एवं जलसंभर विकास · 4. पशुपालन, दुग्ध उद्योग एवं कुक्कुट पालन
· 5. मत्स्य पालन · 6. सामाजिक वानिकी एवं फार्म वानिकी · 7. लघु वन उपज
8. लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित · 9. खादी, ग्राम एवं कुटीर उद्योग · 10. ग्रामीण आवासन
· 11. पेयजल · 12. ईंधन एवं चारा · 13. सड़कें, पुलिया, पुल, फ़ेरी, जलमार्ग एवं संचार के अन्य साधन
· 14. ग्रामीण विद्युतीकरण, विद्युत वितरण सहित · 15. गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत
16. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम · 17. शिक्षा, प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय सहित · 18. तकनीकी
प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा · 19. प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा · 20. पुस्तकालय · 21. सांस्कृतिक
क्रियाकलाप · 22. बाज़ार एवं मेले
23. स्वास्थ्य एवं स्वच्छता — अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं औषधालय सहित · 24. परिवार कल्याण
· 25. महिला एवं बाल विकास · 26. समाज कल्याण, विकलांग एवं मानसिक रूप से अविकसित व्यक्तियों का कल्याण सहित
· 27. कमज़ोर वर्गों का कल्याण, विशेषतः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति · 28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली
· 29. सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण
परीक्षा-दृष्टि — सूची के दोनों सिरे याद रखें
ग्यारहवीं अनुसूची का प्रश्न प्रायः सूची के पहले और अंतिम विषय पर आता है —
पहला: कृषि (कृषि प्रसार सहित), अंतिम (29वाँ): सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।
इसी प्रकार बारहवीं अनुसूची का पहला: नगरीय योजना (नगर योजना सहित) और
अंतिम (18वाँ): वधशालाओं एवं चर्मशोधनशालाओं का विनियमन। दूसरा पसंदीदा फंदा यह है कि
अग्निशमन सेवाएँ (Fire Services) या झुग्गी-झोपड़ी सुधार को ग्यारहवीं अनुसूची में बता दिया जाए —
ये दोनों बारहवीं अनुसूची के विषय हैं।
2.4 अनिवार्य बनाम स्वैच्छिक उपबंध — यह तालिका अलग से याद करें
73वाँ संशोधन सब कुछ बाध्यकारी नहीं करता। कुछ उपबंध राज्य पर बाध्यकारी (compulsory) हैं, कुछ केवल
विवेकाधीन/स्वैच्छिक (voluntary)। यही भेद UPPSC का प्रिय दो-कथन प्रश्न है।
अनिवार्य उपबंध · Compulsory
ग्राम स्तर पर ग्राम सभा का गठन
ग्राम, मध्यवर्ती एवं जिला — तीनों स्तरों पर पंचायतों का गठन (20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्य में मध्यवर्ती स्तर छूट सकता है)
तीनों स्तरों पर सभी स्थानों का प्रत्यक्ष निर्वाचन
मध्यवर्ती एवं जिला स्तर के अध्यक्षों का अप्रत्यक्ष निर्वाचन
चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष
अजा/अजजा का जनसंख्यानुपाती आरक्षण तथा महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण — स्थानों एवं अध्यक्ष-पदों दोनों पर
5 वर्ष का कार्यकाल; विघटन पर 6 माह में चुनाव
राज्य निर्वाचन आयोग (243ट) की स्थापना
राज्य वित्त आयोग (243झ) का प्रत्येक 5वें वर्ष गठन
निर्वाचन मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप का वर्जन
स्वैच्छिक उपबंध · Voluntary
पंचायतों में सांसदों एवं विधायकों को प्रतिनिधित्व देना
पिछड़े वर्गों के लिए स्थानों एवं अध्यक्ष-पदों का आरक्षण
पंचायतों को स्वशासन की संस्था के रूप में कार्य करने योग्य शक्तियाँ एवं प्राधिकार देना
ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों में योजना-निर्माण एवं क्रियान्वयन सौंपना
पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर एवं फ़ीस उद्ग्रहीत करने का प्राधिकार देना
राज्य की संचित निधि से पंचायतों को सहायता अनुदान देना
ग्राम पंचायत के अध्यक्ष के निर्वाचन की रीति तय करना
ग्राम सभा को कौन-सी शक्तियाँ मिलेंगी — यह भी राज्य तय करता है
सावधानी — 73वें संशोधन के चार सूक्ष्म बिंदु
महिला आरक्षण “कम-से-कम एक-तिहाई” है, आधा नहीं। अनेक राज्यों (उत्तर प्रदेश सहित कई) ने
अपने विधानों से इसे 50% किया है — पर संविधान केवल 1/3 कहता है। प्रश्न प्रायः “संविधान के अनुसार” पूछता है।
ग्राम सभा निर्वाचित निकाय नहीं है — वह उस पंचायत क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में दर्ज
सभी व्यक्तियों का निकाय है। “ग्राम सभा के सदस्य चुने जाते हैं” — यह कथन सदैव गलत है।
पंचायत को कर लगाने की शक्ति संविधान से सीधे नहीं मिलती (अनु. 243ज) — राज्य विधानमंडल
उसे प्राधिकृत करता है। यही नगरपालिकाओं के लिए अनु. 243भ में है।
विघटित पंचायत का पुनर्गठन केवल शेष अवधि के लिए होता है, नए 5 वर्ष के लिए नहीं — और यदि
शेष अवधि 6 माह से कम है तो चुनाव कराना आवश्यक ही नहीं।
सावधानी — राज्य निर्वाचन आयोग बनाम भारत निर्वाचन आयोग
आधार
भारत निर्वाचन आयोग
राज्य निर्वाचन आयोग
अनुच्छेद
324
243ट (पंचायत) एवं 243यक (नगरपालिका)
कार्यक्षेत्र
संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन
पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के निर्वाचन
नियुक्ति
राष्ट्रपति (2023 के अधिनियम के अधीन चयन समिति की सिफ़ारिश पर)
राज्यपाल
हटाया जाना
मुख्य निर्वाचन आयुक्त — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से
राज्य निर्वाचन आयुक्त — उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रीति एवं आधार पर
संरचना
बहु-सदस्यीय (वर्तमान में मु.नि.आ. + 2 निर्वाचन आयुक्त)
सामान्यतः एक-सदस्यीय — “राज्य निर्वाचन आयुक्त”
निर्वाचक नामावली
स्वयं तैयार कराता है
प्रायः भारत निर्वाचन आयोग की नामावली को आधार बनाकर अपनी नामावली बनाता है
यह वही भेद है जिस पर UPPSC बार-बार लौटता है। “ग्राम प्रधान का चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है” —
यह कथन सदैव गलत है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश की सर्वाधिक ग्राम पंचायतें
उत्तर प्रदेश में लगभग 58 हज़ार ग्राम पंचायतें हैं (2021 के सामान्य पंचायत निर्वाचन में
58,000 से अधिक ग्राम पंचायतों के लिए मतदान हुआ) — यह संख्या देश में सबसे अधिक है।
साथ में लगभग 826 क्षेत्र पंचायतें (विकास खंड) तथा 75 जिला पंचायतें हैं।
UP की त्रिस्तरीय शब्दावली अलग है — ग्राम पंचायत → क्षेत्र पंचायत → जिला पंचायत;
अध्यक्ष क्रमशः प्रधान → ब्लॉक प्रमुख → जिला पंचायत अध्यक्ष।
विधिक आधार — संयुक्त प्रांत पंचायत राज अधिनियम, 1947 (देश के आरंभिक पंचायत कानूनों में से एक,
गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्रित्व काल में) तथा उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम,
1961। 73वें संशोधन के बाद इन्हें 1994 में संशोधित कर संवैधानिक ढाँचे के अनुरूप किया गया।
उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना 23 अप्रैल 1994 को हुई;
मुख्यालय लखनऊ। यह पंचायत एवं नगरीय निकाय — दोनों के चुनाव कराता है।
UP उन राज्यों में है जिन्होंने महिलाओं के लिए एक-तिहाई से अधिक तथा पिछड़े वर्गों के लिए
आरक्षण की व्यवस्था अपने विधान से की; पंचायत आरक्षण का चक्रानुक्रम (rotation) UP में हर आम
चुनाव से पूर्व अधिसूचित होता है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विषय) 1. अनुच्छेद 243क — ग्राम सभा 2. अनुच्छेद 243झ — राज्य निर्वाचन आयोग 3. अनुच्छेद 243घ — स्थानों का आरक्षण नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 243झ राज्य वित्त आयोग से संबंधित है, राज्य निर्वाचन आयोग से नहीं — राज्य निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 243ट में है। अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। 243क (ग्राम सभा) एवं 243घ (स्थानों का आरक्षण) सही हैं।
प्र.273वें संविधान संशोधन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. पंचायतों में पिछड़े वर्गों के लिए स्थानों का आरक्षण संविधान द्वारा अनिवार्य किया गया है। 2. किसी राज्य में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन तब आवश्यक नहीं है जब उस राज्य की जनसंख्या 20 लाख से अधिक न हो। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)पिछड़े वर्गों का आरक्षण अनुच्छेद 243घ(6) के अधीन राज्य विधानमंडल के विवेक पर है, अनिवार्य नहीं — कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 243ख के परंतुक के अनुसार 20 लाख से अनधिक जनसंख्या वाले राज्य में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन आवश्यक नहीं — कथन 2 सही है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): ग्राम पंचायत का चुनाव भारत निर्वाचन आयोग नहीं कराता। कारण (R): अनुच्छेद 324 के अधीन भारत निर्वाचन आयोग केवल राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के पद के निर्वाचन कराता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)पंचायत निर्वाचन अनुच्छेद 243ट के अधीन राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकार में है — (A) सही है। किंतु (R) गलत है: अनुच्छेद 324 में संसद तथा राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन भी सम्मिलित हैं, केवल राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के नहीं।
3. पेसा अधिनियम, 1996 — अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज
3.1 पेसा क्यों आवश्यक हुआ
अनुच्छेद 243ड के अनुसार भाग IX पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों तथा
छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होता। किंतु उसी अनुच्छेद के खंड (4)(ख)
में कहा गया कि संसद विधि द्वारा भाग IX के उपबंधों को इन क्षेत्रों तक अपवादों एवं उपांतरणों
सहित विस्तारित कर सकती है। इसी शक्ति के अधीन बना
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 — संक्षेप में
पेसा (PESA — Panchayats Extension to Scheduled Areas Act), जो
24 दिसंबर 1996 को अधिनियमित हुआ।
इसका आधार दिलीप सिंह भूरिया समिति (Dilip Singh Bhuria Committee, 1994–95) का प्रतिवेदन था, जिसे
विशेष रूप से यह देखने के लिए बनाया गया था कि जनजातीय क्षेत्रों में पंचायती राज को परंपरागत स्वशासन के साथ
कैसे जोड़ा जाए।
पेसा वर्तमान में 10 राज्यों के पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों पर लागू है — आंध्र प्रदेश,
तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा एवं राजस्थान।
यह छठी अनुसूची के क्षेत्रों (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम की स्वायत्त जिला परिषदें) पर
लागू नहीं होता — वहाँ स्वायत्त जिला परिषदों की अपनी व्यवस्था है।
उत्तर प्रदेश में कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं है, अतः पेसा UP पर लागू नहीं होता — यह
UPPSC का एक सूक्ष्म किंतु निर्णायक बिंदु है।
3.2 ग्राम सभा की विशेष शक्तियाँ — पेसा का हृदय
सामान्य भाग IX में ग्राम सभा की शक्तियाँ राज्य विधानमंडल तय करता है। पेसा इसे उलट देता है — यहाँ
ग्राम सभा को स्वयं अधिनियम से कुछ शक्तियाँ मिलती हैं, और राज्य विधान इनके विरुद्ध नहीं जा सकता।
अनुसूचित क्षेत्रों के लिए बनने वाली राज्य-विधि प्रथागत विधि, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं तथा
सामुदायिक संसाधनों की परंपरागत प्रबंध-पद्धतियों के अनुरूप होनी चाहिए।
प्रत्येक गाँव में एक ग्राम सभा होगी — “गाँव” वह बसाहट है जिसकी अपनी परंपरा हो।
ग्राम सभा लोगों की परंपराओं, रीतियों, सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों तथा विवाद-निपटारे की
प्रथागत रीति की रक्षा करने में सक्षम होगी।
योजनाओं एवं कार्यक्रमों का अनुमोदन तथा गरीबी-उन्मूलन कार्यक्रमों के
लाभार्थियों का चयन ग्राम सभा करेगी।
पंचायत को धन जारी करने से पहले उसे ग्राम सभा से उपयोगिता प्रमाणपत्र लेना होगा।
भूमि अर्जन एवं पुनर्वास से पूर्व ग्राम सभा या उपयुक्त स्तर की पंचायत से
परामर्श अनिवार्य।
गौण खनिजों के लिए पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा, तथा नीलामी द्वारा
गौण खनिजों के दोहन की रियायत — दोनों के लिए ग्राम सभा/पंचायत की पूर्व-सिफ़ारिश अनिवार्य।
ग्राम सभा/पंचायत को शक्ति — मादक द्रव्यों के विक्रय पर निषेध/नियंत्रण; गौण वन उपज का स्वामित्व;
भूमि के अन्यसंक्रमण की रोकथाम एवं अवैध रूप से हस्तांतरित भूमि की पुनर्वापसी; ग्राम बाज़ारों का
प्रबंध; अनुसूचित जनजातियों को साहूकारी पर नियंत्रण; सामाजिक क्षेत्रों की संस्थाओं एवं
कर्मचारियों पर नियंत्रण; स्थानीय योजनाओं एवं संसाधनों पर नियंत्रण, जिसमें जनजातीय उप-योजना भी है।
आरक्षण — अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के सभी स्तरों पर अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान
जनसंख्यानुपात में, किंतु कुल स्थानों के आधे (1/2) से कम नहीं; तथा
सभी स्तरों के अध्यक्ष-पद अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित।
यदि कोई अनुसूचित जनजाति अप्रतिनिधित्व रह जाए तो राज्य सरकार उसके व्यक्तियों को नामनिर्देशित कर सकती है,
किंतु ऐसा नामनिर्देशन निर्वाचित सदस्यों के दसवें भाग (1/10) से अधिक नहीं होगा।
सावधानी — पेसा के तीन आँकड़े
पेसा में अजजा आरक्षण “आधे से कम नहीं” है — सामान्य पंचायतों वाला
“जनसंख्या के अनुपात में” नियम यहाँ नहीं चलता।
नामनिर्देशन की सीमा 1/10 है, 1/6 या 1/3 नहीं।
गौण खनिज पर ग्राम सभा की “सिफ़ारिश” अनिवार्य है; किंतु भूमि अर्जन में शब्द
“परामर्श (consultation)” है — सहमति (consent) नहीं। यह एक-शब्द का अंतर प्रश्न बनता है।
क्रियान्वयन की दृष्टि से पेसा का इतिहास मिला-जुला रहा है — नियम बनाने में राज्यों ने बहुत देर की।
मध्य प्रदेश ने 15 नवंबर 2022 (जनजातीय गौरव दिवस) को अपने पेसा नियम अधिसूचित किए,
जो इस दिशा में सबसे चर्चित कदम रहा। अनेक राज्यों में खनन एवं भूमि-अर्जन से जुड़े विवादों में न्यायालयों ने ग्राम सभा
की सहमति की उपेक्षा को अवैध ठहराया है — इसी शृंखला का एक प्रसिद्ध उदाहरण
ओडिशा के नियमगिरि (वेदांता) मामले में 2013 का उच्चतम न्यायालय का निर्णय है, जिसमें ग्राम सभाओं को
धार्मिक एवं सांस्कृतिक दावों पर निर्णय करने का अधिकार दिया गया।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1पेसा अधिनियम, 1996 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. यह संविधान की छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर भी लागू होता है। 2. अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के सभी स्तरों पर अध्यक्ष के पद अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)पेसा केवल पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होता है, छठी अनुसूची के क्षेत्रों पर नहीं — कथन 1 गलत। पेसा के अधीन सभी स्तरों के अध्यक्ष-पद अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
Aपेसा का आधार — भूरिया समितिBपेसा का अधिनियमन वर्ष — 1996Cपेसा का संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 243डDपेसा में अजजा आरक्षण — जनसंख्या के ठीक अनुपात में
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पेसा में अनुसूचित जनजातियों का आरक्षण जनसंख्या के अनुपात में तो होता है, पर वह कुल स्थानों के आधे से कम नहीं हो सकता — अतः “ठीक अनुपात में” कहना गलत है। शेष तीनों युग्म सही हैं।
प्र.3पेसा के अधीन ग्राम सभा की शक्तियों पर विचार कीजिए: 1. गौण खनिजों के खनन पट्टे के लिए पूर्व-सिफ़ारिश 2. गौण वन उपज का स्वामित्व 3. अनुसूचित जनजातियों को साहूकारी पर नियंत्रण इनमें से कौन-से सही हैं? नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C1, 2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)पेसा की धारा 4 में तीनों शक्तियाँ स्पष्ट रूप से दी गई हैं — गौण खनिजों के लिए पूर्व-सिफ़ारिश, गौण वन उपज का स्वामित्व तथा अनुसूचित जनजातियों को दिए जाने वाले ऋण/साहूकारी पर नियंत्रण।
4. 74वाँ संविधान संशोधन — भाग IXक एवं बारहवीं अनुसूची
4.1 ढाँचा एवं तिथियाँ
74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने संविधान में भाग IXक — “नगरपालिकाएँ” जोड़ा,
जिसमें अनुच्छेद 243त से 243यछ (अंग्रेज़ी में 243P से 243ZG) तक कुल
18 अनुच्छेद हैं, तथा बारहवीं अनुसूची जोड़ी जिसमें नगरपालिकाओं के
18 विषय हैं। यह 1 जून 1993 से प्रवृत्त हुआ। इसे
नगरपालिका अधिनियम (Nagarpalika Act) भी कहा जाता है।
सावधानी — भाग IXक का अंतिम अनुच्छेद
भाग IXक 243त से 243यछ तक है — 243यग तक नहीं। कोष्ठक में मिलान इस प्रकार है:
243त = 243P, 243थ = Q, 243द = R, 243ध = S, 243न = T, 243प = U, 243फ = V, 243ब = W,
243भ = X, 243म = Y, 243य = Z, 243यक = ZA, 243यख = ZB, 243यग = ZC, 243यघ = ZD,
243यङ = ZE, 243यच = ZF, 243यछ = ZG। परीक्षा में “भाग IXक 243त से 243यग तक है” —
यह एक बहुत आम, और गलत, विकल्प है।
4.2 नगरीय निकायों के तीन संवैधानिक प्रकार — अनुच्छेद 243थ
अनुच्छेद 243थ (243Q) प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का गठन अनिवार्य करता है।
किस क्षेत्र में कौन-सी बनेगी, यह राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा तय करते हैं — और आधार होते हैं:
जनसंख्या, जनसंख्या-घनत्व, स्थानीय प्रशासन के लिए उत्पन्न राजस्व, गैर-कृषि क्रियाकलापों में नियोजन का प्रतिशत,
आर्थिक महत्व तथा अन्य निर्धारित कारक।
नगरीय स्थानीय निकाय
संवैधानिक तीन प्रकार — अनुच्छेद 243थ
नगर पंचायत— संक्रमणशील क्षेत्र (transitional area) के लिए, अर्थात् वह क्षेत्र जो ग्रामीण से नगरीय में बदल रहा है
नगर पालिका परिषद— छोटे नगरीय क्षेत्र (smaller urban area) के लिए
नगर निगम— बड़े नगरीय क्षेत्र (larger urban area) के लिए
अपवाद — औद्योगिक नगरी— जहाँ कोई औद्योगिक प्रतिष्ठान नगरीय सेवाएँ स्वयं दे रहा हो, वहाँ राज्यपाल उसे औद्योगिक नगरी (industrial township) घोषित कर नगरपालिका न बनाने का निर्देश दे सकते हैं
अन्य नगरीय निकाय — संविधान में वर्णित नहीं
अधिसूचित क्षेत्र समिति— विकासशील कस्बा/औद्योगिक कस्बा; पूर्णतः नामनिर्देशित, इसलिए न निर्वाचित, न वास्तविक नगरपालिका
नगर क्षेत्र समिति— छोटे कस्बे; सीमित कार्य (जल-निकासी, सड़क, प्रकाश, सफ़ाई)
छावनी परिषद— छावनी अधिनियम, 2006 के अधीन; केंद्र सरकार (रक्षा मंत्रालय) के अधीन — राज्य के नहीं
पत्तन न्यास · टाउनशिप · विशेष प्रयोजन अभिकरण— बंदरगाह क्षेत्र, कंपनी-नगर तथा एकल-कार्य वाले प्राधिकरण (जल बोर्ड, विकास प्राधिकरण)
सावधानी — छावनी परिषद संवैधानिक नगरपालिका नहीं है
छावनी परिषद (Cantonment Board) भाग IXक से नहीं, छावनी अधिनियम, 2006 से चलती है
और रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में है। इसका पदेन अध्यक्ष स्टेशन कमांडर
होता है और मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। इसी प्रकार
अधिसूचित क्षेत्र समिति पूर्णतः नामनिर्देशित होती है — इसे “निर्वाचित नगरीय निकाय” बताना गलत है।
उत्तर प्रदेश में मेरठ, आगरा, कानपुर, झाँसी, इलाहाबाद (प्रयागराज), लखनऊ, वाराणसी, बरेली, फ़तेहगढ़, फ़ैज़ाबाद,
मथुरा, शाहजहाँपुर एवं बबीना जैसी छावनियाँ हैं — देश में सर्वाधिक छावनी परिषदें UP में ही हैं।
4.3 अनुच्छेदवार विवरण — 243त से 243यछ
सुमेलन-तालिका 3 : भाग IXक के अनुच्छेद ↔ विषय
हिंदी
अंग्रेज़ी
विषय
निर्णायक बिंदु
243त
243P
परिभाषाएँ
“महानगर क्षेत्र” = 10 लाख या अधिक जनसंख्या; “नगरपालिका क्षेत्र”; “जिला”; “समिति”
243थ
243Q
नगरपालिकाओं का गठन
तीन प्रकार; औद्योगिक नगरी का अपवाद राज्यपाल दे सकते हैं
243द
243R
संरचना
सभी स्थान प्रत्यक्ष निर्वाचन से; राज्य विधानमंडल विशेष ज्ञान रखने वालों को प्रतिनिधित्व दे सकता है — किंतु उन्हें मत देने का अधिकार नहीं; सांसद/विधायक तथा वार्ड समितियों के अध्यक्ष भी प्रतिनिधित्व पा सकते हैं
243ध
243S
वार्ड समितियाँ
3 लाख या अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका में एक या अधिक वार्डों के लिए वार्ड समिति अनिवार्य
243न
243T
स्थानों का आरक्षण
अजा/अजजा जनसंख्यानुपात में; महिलाओं के लिए 1/3; पिछड़े वर्ग राज्य के विवेक पर; अध्यक्ष-पदों पर आरक्षण राज्य विधि से
243प
243U
अवधि
5 वर्ष; विघटन पर 6 माह में चुनाव; शेष अवधि वाला नियम पंचायत जैसा
243फ
243V
निरर्हताएँ
आयु 21 वर्ष
243ब
243W
शक्तियाँ एवं उत्तरदायित्व
बारहवीं अनुसूची के 18 विषय
243भ
243X
कर-शक्ति एवं निधियाँ
राज्य विधानमंडल प्राधिकृत करे
243म
243Y
वित्त आयोग
वही राज्य वित्त आयोग जो अनु. 243झ के अधीन गठित है, नगरपालिकाओं की भी समीक्षा करेगा — अलग आयोग नहीं
243य
243Z
लेखाओं की संपरीक्षा
राज्य विधानमंडल विधि द्वारा
243यक
243ZA
निर्वाचन
वही राज्य निर्वाचन आयोग (243ट)
243यख
243ZB
संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना
राष्ट्रपति निदेश द्वारा
243यग
243ZC
कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र; दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद
243यघ
243ZD
जिला योजना समिति
प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर; पंचायतों एवं नगरपालिकाओं की योजनाओं का समेकन; सदस्यों का कम-से-कम 4/5 भाग जिला पंचायत एवं नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा उन्हीं में से चुना जाए, ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या के अनुपात में
243यङ
243ZE
महानगर योजना समिति
10 लाख या अधिक जनसंख्या वाले महानगर क्षेत्र में; सदस्यों का कम-से-कम 2/3 भाग नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों एवं पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा उन्हीं में से, जनसंख्यानुपात में
243यच
243ZF
विद्यमान विधियों का बना रहना
1 वर्ष (1 जून 1994) तक
243यछ
243ZG
न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन
पंचायत वाले 243ण के समान
4.4 बारहवीं अनुसूची — 18 विषय
1. नगरीय योजना, नगर योजना सहित · 2. भूमि-उपयोग का विनियमन एवं भवनों का निर्माण · 3. आर्थिक एवं
सामाजिक विकास की योजना · 4. सड़कें एवं पुल · 5. घरेलू, औद्योगिक एवं वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए जलापूर्ति
· 6. लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफ़ाई एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंध
7. अग्निशमन सेवाएँ · 8. नगरीय वानिकी, पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिक पक्षों का संवर्धन
· 9. समाज के कमज़ोर वर्गों (विकलांग एवं मानसिक रूप से अविकसित सहित) के हितों का संरक्षण ·
10. झुग्गी-झोपड़ी बस्ती सुधार एवं उन्नयन · 11. नगरीय गरीबी उन्मूलन · 12. नगरीय सुख-सुविधाओं
का प्रावधान — पार्क, उद्यान, खेल-मैदान
13. सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं सौंदर्यपरक पक्षों का संवर्धन · 14. शवगाड़ना एवं कब्रिस्तान, शवदाह एवं
श्मशान तथा विद्युत शवदाह गृह · 15. काँजी हाउस (मवेशी बाड़े), पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण ·
16. जन्म-मृत्यु पंजीकरण सहित जन्म-मृत्यु सांख्यिकी · 17. सार्वजनिक सुविधाएँ — पथ-प्रकाश,
पार्किंग स्थल, बस स्टॉप एवं जन-सुविधाएँ · 18. वधशालाओं एवं चर्मशोधनशालाओं का विनियमन
4.5 73वाँ बनाम 74वाँ संशोधन — हस्ताक्षर-तुलना
73वाँ संशोधन, 1992 · पंचायतें
नया भाग — भाग IX, शीर्षक “पंचायतें”
अनुच्छेद — 243 से 243ण (243 – 243-O), कुल 16
अनुसूची — ग्यारहवीं, 29 विषय, अनुच्छेद 243छ से संबद्ध
प्रवृत्त — 24 अप्रैल 1993 (राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस)
ढाँचा — तीन स्तर: ग्राम, मध्यवर्ती, जिला
जन-निकाय — ग्राम सभा (अनु. 243क)
वित्त आयोग — 243झ; निर्वाचन आयोग — 243ट
छूट — 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्य में मध्यवर्ती स्तर नहीं
न्यायालय-वर्जन — 243ण
विस्तार-विधि — पेसा, 1996 (अनुसूचित क्षेत्रों हेतु)
74वाँ संशोधन, 1992 · नगरपालिकाएँ
नया भाग — भाग IXक, शीर्षक “नगरपालिकाएँ”
अनुच्छेद — 243त से 243यछ (243P – 243ZG), कुल 18
अनुसूची — बारहवीं, 18 विषय, अनुच्छेद 243ब से संबद्ध
प्रवृत्त — 1 जून 1993
ढाँचा — तीन प्रकार: नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद, नगर निगम
जन-निकाय — वार्ड समिति (अनु. 243ध), 3 लाख+ जनसंख्या पर अनिवार्य
वित्त आयोग — 243म (वही राज्य वित्त आयोग); निर्वाचन — 243यक (वही राज्य निर्वाचन आयोग)
छूट — औद्योगिक नगरी में नगरपालिका न बनाना
न्यायालय-वर्जन — 243यछ
विशेष निकाय — जिला योजना समिति (243यघ) एवं महानगर योजना समिति (243यङ)
29 बनाम 18 — कौन-सी अनुसूची किसकी“ग्यारह गाँव उनतीस, बारह शहर अठारह”
ग्यारहवीं अनुसूची = गाँव (पंचायत) = 29 विषय = 73वाँ संशोधन = भाग IX।
बारहवीं अनुसूची = शहर (नगरपालिका) = 18 विषय = 74वाँ संशोधन = भाग IXक।
जोड़कर देखें — 29 + 18 = 47, और दोनों भागों के अनुच्छेद 16 + 18 = 34।
सरल सूत्र: “गिनती बड़ी, संख्या छोटी” — अनुसूची जितनी बड़ी (12वीं), विषय उतने कम (18)।
4.6 जिला एवं महानगर योजना समिति — दोनों का भेद
सुमेलन-तालिका 4 : जिला योजना समिति (243यघ) बनाम महानगर योजना समिति (243यङ)
आधार
जिला योजना समिति
महानगर योजना समिति
अनुच्छेद
243यघ (243ZD)
243यङ (243ZE)
कहाँ
प्रत्येक राज्य के प्रत्येक जिले में
10 लाख या अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक महानगर क्षेत्र में
निर्वाचित अंश
कम-से-कम 4/5
कम-से-कम 2/3
कौन चुनता है
जिला पंचायत एवं जिले की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्य, अपने में से — ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के अनुपात में
महानगर क्षेत्र की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्य एवं पंचायतों के अध्यक्ष, अपने में से — जनसंख्या के अनुपात में
कार्य
पंचायतों एवं नगरपालिकाओं की योजनाओं का समेकन कर जिले के लिए प्रारूप विकास योजना बनाना
महानगर क्षेत्र के लिए प्रारूप विकास योजना तैयार करना
योजना कहाँ जाती है
समिति का अध्यक्ष उसे राज्य सरकार को अग्रेषित करता है
वही — अध्यक्ष द्वारा राज्य सरकार को
उत्तर प्रदेश संदर्भ — देश के सर्वाधिक नगरीय निकाय
उत्तर प्रदेश में 762 नगरीय स्थानीय निकाय हैं — 17 नगर निगम, 200 नगर पालिका परिषद
एवं 545 नगर पंचायत। यह देश में नगरीय निकायों की सर्वाधिक संख्या है; राज्य की लगभग
22% से अधिक जनसंख्या इन्हीं में रहती है।
विधिक आधार — उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 तथा
उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916; 74वें संशोधन के अनुरूप दोनों 1994 में संशोधित हुए।
प्रदेश के 17 नगर निगम हैं — लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, प्रयागराज, आगरा, मेरठ,
गाज़ियाबाद, बरेली, गोरखपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, झाँसी, सहारनपुर, फ़िरोज़ाबाद, मथुरा-वृंदावन, अयोध्या एवं शाहजहाँपुर
नगर निगम हैं।
लखनऊ एवं कानपुर 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले महानगर क्षेत्र हैं — अर्थात् यहाँ
अनुच्छेद 243यङ के अधीन महानगर योजना समिति का प्रश्न उठता है; जिला योजना समिति
(243यघ) प्रदेश के सभी 75 जिलों में गठित है और उसकी अध्यक्षता सामान्यतः प्रभारी मंत्री करते हैं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (विषय) सूची-II (अनुच्छेद) A. वार्ड समितियों का गठन 1. 243यङ B. जिला योजना समिति 2. 243ध C. महानगर योजना समिति 3. 243थ D. नगरपालिकाओं का गठन 4. 243यघ कूट:
उत्तर: (B)वार्ड समिति — 243ध; जिला योजना समिति — 243यघ; महानगर योजना समिति — 243यङ; नगरपालिकाओं का गठन — 243थ। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।
प्र.274वें संविधान संशोधन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. वार्ड समिति का गठन तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका में अनिवार्य है। 2. महानगर योजना समिति के कम-से-कम चार-पाँचवें सदस्य निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 243ध के अधीन 3 लाख या अधिक जनसंख्या पर वार्ड समिति अनिवार्य है — कथन 1 सही। महानगर योजना समिति में यह अनुपात दो-तिहाई है; चार-पाँचवाँ अनुपात जिला योजना समिति (243यघ) का है — कथन 2 गलत।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): छावनी परिषद 74वें संविधान संशोधन के अंतर्गत गठित नगरपालिका नहीं है। कारण (R): छावनी परिषद छावनी अधिनियम के अधीन गठित होती है और केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में रहती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 243थ केवल नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद एवं नगर निगम की बात करता है। छावनी परिषद छावनी अधिनियम, 2006 के अधीन रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में कार्य करती है — यही कारण है कि वह भाग IXक की नगरपालिका नहीं है।
5. भारत निर्वाचन आयोग — अनुच्छेद 324
5.1 अनुच्छेद 324 — शक्ति का स्रोत
अनुच्छेद 324(1) कहता है कि संसद तथा प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के लिए सभी निर्वाचनों के
तथा राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के पद के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावलियाँ तैयार कराने का तथा उन सभी निर्वाचनों
के संचालन का अधीक्षण, निदेशन एवं नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित होगा। यही एक वाक्य आयोग की सारी शक्ति का
स्रोत है — और इसी में उसकी सीमा भी है।
सावधानी — निर्वाचन आयोग क्या नहीं कराता
अनुच्छेद 324 में पंचायत एवं नगरपालिका के निर्वाचन शामिल नहीं हैं — वे
राज्य निर्वाचन आयोग (अनु. 243ट/243यक) के अधिकार में हैं। इसी प्रकार भारत निर्वाचन आयोग
राज्य सभा एवं विधान परिषद के निर्वाचन कराता है (ये “संसद” एवं “राज्य के विधानमंडल” में आते हैं),
किंतु राजनीतिक दलों के आंतरिक चुनाव या सहकारी समितियों/विश्वविद्यालयों के चुनाव नहीं।
“राष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद” का निपटारा भी आयोग नहीं, बल्कि उच्चतम न्यायालय
(अनुच्छेद 71) करता है।
5.2 संरचना — एक से तीन तक का सफ़र
अनुच्छेद 324(2) के अनुसार आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा उतने अन्य निर्वाचन
आयुक्त होंगे जितने राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करें — अर्थात् संख्या संविधान में निश्चित नहीं है।
व्यवहार में यह इस प्रकार बदली:
25 जनवरी 1950निर्वाचन आयोग की स्थापना — इसी कारण 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस (2011 से) मनाया जाता है। प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त — सुकुमार सेन
1950 – अक्टूबर 1989एकल-सदस्यीय आयोग
16 अक्टूबर 1989मतदान आयु 21 से 18 होने पर बढ़े कार्यभार के कारण दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त — आयोग तीन-सदस्यीय
1 जनवरी 1990दोनों पद समाप्त — आयोग फिर एकल-सदस्यीय
1 अक्टूबर 1993पुनः दो निर्वाचन आयुक्त — तब से आयोग बहु-सदस्यीय है और निर्णय बहुमत से होते हैं
1995टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ — उच्चतम न्यायालय ने बहु-सदस्यीय आयोग को वैध ठहराया; मु.नि.आ. को अन्य आयुक्तों पर “श्रेष्ठ” नहीं, समकक्षों में प्रथम माना
आयोग की सहायता के लिए राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग से परामर्श कर प्रादेशिक आयुक्त (Regional Commissioners)
भी नियुक्त कर सकते हैं (अनु. 324(4))। राज्य स्तर पर आयोग का प्रतिनिधि मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO)
होता है, जिसकी नियुक्ति आयोग राज्य सरकार से परामर्श कर करता है; जिला स्तर पर
जिला निर्वाचन अधिकारी (प्रायः जिलाधिकारी) तथा निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी
(ERO) एवं रिटर्निंग अधिकारी कार्य करते हैं — ये सब जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950/1951 के पद हैं।
5.3 नियुक्ति — 2023 के अधिनियम के बाद की स्थिति
मूल संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होनी थी,
“संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए” — किंतु सात दशक तक ऐसी कोई विधि बनी ही नहीं और नियुक्ति
व्यवहार में मंत्रिपरिषद की सलाह पर होती रही।
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2 मार्च 2023) में उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों
की संविधान पीठ ने एकमत से कहा कि जब तक संसद विधि न बनाए, नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता
तथा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की समिति की सलाह पर होगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल
विधायी रिक्तता भरने के लिए है।
संसद ने उसी वर्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि)
अधिनियम, 2023 बनाया — राष्ट्रपति की अनुमति 28 दिसंबर 2023, प्रवृत्त 2 जनवरी
2024। इसने 1991 के पुराने अधिनियम का स्थान लिया और मुख्य न्यायमूर्ति के स्थान पर एक केंद्रीय
कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में रखा।
1. खोज समितिअध्यक्ष — विधि एवं न्याय मंत्री; दो अन्य सदस्य भारत सरकार के सचिव से अनिम्न रैंक के। यह पाँच नामों का पैनल तैयार करती है
→
2. चयन समितिप्रधानमंत्री (अध्यक्ष) · प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री · लोक सभा में विपक्ष का नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता)। समिति पैनल से बाहर का नाम भी विचार में ले सकती है
→
3. नियुक्तिराष्ट्रपति द्वारा। अर्हता — वे व्यक्ति जो भारत सरकार में सचिव के समकक्ष पद पर हैं या रह चुके हैं, तथा सत्यनिष्ठा एवं निर्वाचन-प्रबंधन का अनुभव रखते हों
पदावधि — 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति नहीं।
निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनाया जा सकता है, किंतु कुल सेवा 6 वर्ष से अधिक नहीं।
वेतन एवं सेवा-शर्तें — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान।
(विधेयक में मूलतः कैबिनेट सचिव के समकक्ष प्रस्तावित था; दिसंबर 2023 में संशोधन द्वारा इसे बदलकर
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष किया गया — यह एक उत्कृष्ट परिशुद्धता-फंदा है।)
वर्तमान स्थिति (2026) — 2023 के अधिनियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है;
न्यायालय ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया और मामला अभी विचाराधीन है। अर्थात्
2023 का अधिनियम ही वर्तमान में प्रवर्तनीय विधि है। इसी विधि के अधीन नियुक्त होने वाले पहले
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं (19 फ़रवरी 2025 से) — देश के 26वें मु.नि.आ.।
5.4 हटाया जाना एवं स्वतंत्रता के उपबंध
सुमेलन-तालिका 5 : निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के संवैधानिक सुरक्षा-कवच
उपबंध
मुख्य निर्वाचन आयुक्त
अन्य निर्वाचन आयुक्त एवं प्रादेशिक आयुक्त
हटाया जाना
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति एवं आधार पर — अर्थात् संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित समावेदन पर, सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर, राष्ट्रपति द्वारा
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति द्वारा — यही उन्हें मु.नि.आ. से कम सुरक्षित बनाता है
सेवा-शर्तें
नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से परिवर्तित नहीं की जा सकतीं
वही संरक्षण
पदत्याग
राष्ट्रपति को
राष्ट्रपति को
सावधानी — तीन बार-दोहराए जाने वाले भ्रम
मु.नि.आ. को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से हटाया जाता है — किंतु
“उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा” नहीं। प्रक्रिया संसदीय है, न्यायिक नहीं।
संविधान में मु.नि.आ. के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति का निषेध नहीं है —
यह निषेध 2023 के अधिनियम से आया है, संविधान से नहीं। इसी प्रकार संविधान में
पदावधि निश्चित नहीं है; 6 वर्ष/65 वर्ष की सीमा विधि से आती है।
अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग के व्यय को संचित निधि पर भारित नहीं किया गया —
यह उसकी स्वतंत्रता की एक चर्चित कमी मानी जाती है (इसके विपरीत लोक सेवा आयोग एवं नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के
व्यय भारित हैं)।
5.5 शक्तियाँ एवं कार्य — तीन वर्गों में
प्रशासनिक — परिसीमन आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ लागू कराना;
निर्वाचक नामावली तैयार एवं आवधिक रूप से पुनरीक्षित कराना; निर्वाचन की तिथियाँ एवं कार्यक्रम अधिसूचित करना;
नामनिर्देशन-पत्रों की जाँच कराना; राजनीतिक दलों को मान्यता देना एवं चुनाव-चिह्न
आवंटित करना (निर्वाचन चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968); दलों के टूटने/विलय पर विवाद तय करना;
आदर्श आचार संहिता लागू करना; चुनाव के लिए कर्मचारियों की माँग करना; रेडियो-टीवी पर
प्रचार-समय का आवंटन।
परामर्शी — संसद-सदस्यों की निरर्हता के प्रश्न पर राष्ट्रपति (अनुच्छेद 103)
को तथा विधानमंडल-सदस्यों की निरर्हता पर राज्यपाल (अनुच्छेद 192) को सलाह देना।
यह सलाह बाध्यकारी है — राष्ट्रपति/राज्यपाल उससे भिन्न निर्णय नहीं कर सकते।
भ्रष्ट आचरण के दोषी व्यक्तियों की निरर्हता-अवधि पर भी आयोग की सलाह ली जाती है।
अर्ध-न्यायिक — दलों के मान्यता-विवाद, चिह्न-विवाद तथा निरर्हता-संदर्भों में साक्ष्य लेकर
निर्णय करना।
जो शक्ति आयोग के पास नहीं है — किसी पंजीकृत राजनीतिक दल का
पंजीकरण रद्द (de-register) करना। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनाम इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल
वेलफ़ेयर (2002) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में ऐसी कोई शक्ति नहीं दी गई
(कुछ अपवाद छोड़कर, जैसे पंजीकरण कपट से प्राप्त किया गया हो)।
5.6 आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct)
आदर्श आचार संहिता किसी विधि में नहीं है — यह राजनीतिक दलों की सहमति से विकसित एक
गैर-सांविधिक दस्तावेज़ है, जिसका पालन आयोग अनुच्छेद 324 की व्यापक शक्ति के बल पर कराता है।
इसकी शुरुआत केरल में 1960 के विधानसभा चुनाव के समय बनी एक स्थानीय आचार-संहिता से मानी जाती है;
आयोग ने इसे 1968 से देशव्यापी रूप दिया और 1991 में वर्तमान सुदृढ़ रूप मिला।
कब लागू — निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा के दिन से, न कि अधिसूचना जारी होने से;
परिणाम घोषित होने तक प्रभावी रहती है।
आठ भाग — सामान्य आचरण; सभाएँ; जुलूस; मतदान दिवस; मतदान केंद्र; प्रेक्षक;
सत्तारूढ़ दल; तथा निर्वाचन घोषणापत्र (2014 में जोड़ा गया भाग)।
सत्तारूढ़ दल पर विशेष रोक — सरकारी वाहन/विमान/भवन का प्रचार में उपयोग नहीं; नई योजनाओं,
परियोजनाओं या वित्तीय अनुदानों की घोषणा नहीं; सरकारी विज्ञापनों से उपलब्धि-प्रचार नहीं;
विवेकाधीन निधियों से अनुदान नहीं; स्थानांतरण-पदस्थापन पर रोक।
प्रवर्तन — इसके कई उल्लंघन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 या भारतीय दंड विधि के अधीन
स्वतंत्र रूप से भी अपराध हैं (जैसे धर्म/जाति के आधार पर मत माँगना, रिश्वत, मतदान से 48 घंटे पूर्व
सार्वजनिक प्रचार)। शुद्ध रूप से संहिता-भंग पर आयोग फटकार, चेतावनी, प्रचार पर अस्थायी रोक या
प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — सबसे बड़ा निर्वाचन-क्षेत्र
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा निर्वाचन-मैदान है — 80 लोक सभा सीटें,
403 विधान सभा सीटें (+ 1 आंग्ल-भारतीय नामनिर्देशित सीट 2020 में समाप्त),
31 राज्य सभा सीटें तथा 100 सदस्यीय विधान परिषद — देश की सबसे बड़ी विधान परिषद।
इसीलिए राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), उत्तर प्रदेश का कार्यालय (लखनऊ) आयोग की
सबसे बड़ी क्षेत्रीय इकाई है, और प्रदेश में चुनाव प्रायः सर्वाधिक चरणों में कराए जाते हैं।
1952 के प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश ही सबसे बड़ी चुनौती था — प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त
सुकुमार सेन को यहीं सर्वाधिक मतदान-केंद्र बनाने पड़े। परीक्षा की दृष्टि से दूसरा याद रखने योग्य
नाम टी.एन. शेषन (1990–96) है, जिनके कार्यकाल में
आदर्श आचार संहिता का कठोर प्रवर्तन एवं मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) की शुरुआत हुई।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारत निर्वाचन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संविधान में निर्वाचन आयुक्तों की संख्या निश्चित की गई है। 2. निर्वाचन आयुक्त को राष्ट्रपति, मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही हटा सकते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 324(2) के अनुसार अन्य निर्वाचन आयुक्तों की संख्या राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करते हैं — संविधान में निश्चित नहीं — कथन 1 गलत। अनुच्छेद 324(5) के परंतुक के अनुसार निर्वाचन आयुक्त एवं प्रादेशिक आयुक्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर ही हटाए जा सकते हैं — कथन 2 सही।
प्र.2मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023 के अनुसार चयन समिति में निम्नलिखित में से कौन सम्मिलित नहीं है?
Aप्रधानमंत्रीBभारत के मुख्य न्यायमूर्तिCलोक सभा में विपक्ष का नेताDप्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)2023 के अधिनियम ने अनूप बरनवाल (2023) की अंतरिम व्यवस्था में सम्मिलित मुख्य न्यायमूर्ति के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा। शेष तीनों चयन समिति के सदस्य हैं।
प्र.3आदर्श आचार संहिता के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में सम्मिलित एक सांविधिक संहिता है। 2. यह निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा के दिन से प्रभावी हो जाती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)आदर्श आचार संहिता किसी विधि में नहीं है — यह दलों की सहमति से विकसित गैर-सांविधिक दस्तावेज़ है जिसे आयोग अनुच्छेद 324 की शक्ति से लागू कराता है; कथन 1 गलत। यह निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा के दिन से लागू होकर परिणाम घोषित होने तक चलती है; कथन 2 सही।
6. निर्वाचन सुधार — जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, निरर्हताएँ, NOTA, VVPAT
6.1 संविधान के निर्वाचन-संबंधी अनुच्छेद
सुमेलन-तालिका 6 : भाग XV — निर्वाचन (अनुच्छेद 324 से 329क)
अनुच्छेद
विषय
निर्णायक बिंदु
324
निर्वाचन आयोग में निर्वाचनों का निहित होना
अधीक्षण, निदेशन एवं नियंत्रण
325
एक ही सामान्य निर्वाचक नामावली
धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी को नामावली से बाहर नहीं किया जाएगा — पृथक निर्वाचक-मंडल का अंत
326
वयस्क मताधिकार
मूलतः 21 वर्ष; 61वें संविधान संशोधन, 1988 द्वारा 18 वर्ष
327
संसद की विधि-निर्माण शक्ति
संसद एवं विधानमंडल दोनों के निर्वाचनों के संबंध में — इसी से जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 एवं 1951 बने
328
राज्य विधानमंडल की विधि-निर्माण शक्ति
केवल उस राज्य के विधानमंडल के निर्वाचन के संबंध में, और केवल वहाँ जहाँ संसद ने उपबंध न किया हो
329
न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन
परिसीमन विधि प्रश्नगत नहीं; निर्वाचन को केवल निर्वाचन याचिका से चुनौती
103 एवं 192
सदस्यों की निरर्हता का विनिश्चय
क्रमशः राष्ट्रपति एवं राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी सलाह पर
102 एवं 191
निरर्हता के आधार
लाभ का पद; विकृतचित्त; अनुन्मोचित दिवालिया; अनागरिक; संसद द्वारा बनाई विधि के अधीन निरर्हता; तथा दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल
6.2 जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 बनाम 1951 — यह भेद अनिवार्य है
दोनों अधिनियम डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विधि मंत्री रहते हुए अंतरिम संसद द्वारा पारित हुए, और दोनों का
क्षेत्र स्पष्ट रूप से बँटा हुआ है। सूत्र यह है — 1950 = चुनाव से “पहले” का ढाँचा; 1951 = चुनाव के “दौरान एवं
बाद” की प्रक्रिया।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950
लोक सभा एवं विधानमंडलों में स्थानों का आवंटन
निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (मूल ढाँचा)
मतदाता की अर्हताएँ — कौन मतदाता बन सकता है
निर्वाचक नामावली की तैयारी एवं पुनरीक्षण
निर्वाचन मशीनरी के पद — मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी
राज्य सभा/विधान परिषद के स्थानों को भरने की रीति
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
निर्वाचनों का वास्तविक संचालन — अधिसूचना, नामनिर्देशन, संवीक्षा, मतदान, मतगणना
सदस्यता की अर्हताएँ एवं निरर्हताएँ (धारा 8 आदि)
भ्रष्ट आचरण (corrupt practices) एवं निर्वाचन अपराध
निर्वाचन विवाद — निर्वाचन याचिका उच्च न्यायालय में
राजनीतिक दलों का पंजीकरण — धारा 29क (1989 में जोड़ी गई)
व्यय-लेखा — धारा 77; तथा उप-निर्वाचन एवं रिक्तियाँ
सावधानी — 1950/1951 के तीन मानक फंदे
“राजनीतिक दलों का पंजीकरण” 1951 के अधिनियम (धारा 29क) में है, 1950 में नहीं।
“मतदाता की अर्हता” 1950 में है, पर “उम्मीदवार की निरर्हता” 1951 में —
यह जोड़ी अक्सर उलट दी जाती है।
परिसीमन का मूल उपबंध 1950 में है, किंतु वास्तविक परिसीमन
परिसीमन आयोग अधिनियम के अधीन गठित परिसीमन आयोग करता है — जिसके आदेश
किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किए जा सकते।
6.3 निरर्हताएँ — संवैधानिक एवं सांविधिक
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 — कुछ विशिष्ट अपराधों में दोषसिद्धि पर तत्काल
निरर्हता; धारा 8(3) के अनुसार किसी भी अपराध में दो वर्ष या अधिक के कारावास की
सज़ा पर व्यक्ति कारावास की अवधि + रिहाई से 6 वर्ष तक निरर्हित रहता है।
लिली थॉमस बनाम भारत संघ (10 जुलाई 2013) — धारा 8(4) असंवैधानिक घोषित,
जो वर्तमान सदस्यों को अपील लंबित रहने तक तीन माह की छूट देती थी। अब दोषसिद्धि के साथ ही
तत्काल निरर्हता होती है और सीट रिक्त हो जाती है।
अन्य आधार — भ्रष्ट आचरण, सरकारी अनुबंध, कंपनी में लाभ का पद, निर्वाचन-व्यय का लेखा न देना,
अस्पृश्यता/दहेज/सती संबंधी कानूनों के अधीन दंड।
संघ लोक सेवा आयोग जैसे संवैधानिक पदधारी तथा शासकीय सेवक भी निरर्हित हैं।
दसवीं अनुसूची (दल-बदल) से संबंध — यह निरर्हता अनुच्छेद 102(2)/191(2) के अधीन आती है,
किंतु उसका विनिश्चय निर्वाचन आयोग नहीं करता; वह सदन के पीठासीन अधिकारी
(अध्यक्ष/सभापति) के पास है, और उनका निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है
(किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू, 1992)। यही दोनों निरर्हता-मार्गों का निर्णायक अंतर है — विस्तार
अध्याय 4.4 में।
प्रकटीकरण — भारत संघ बनाम एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (2002) एवं
पीयूसीएल (2003) के बाद प्रत्येक अभ्यर्थी को आपराधिक पूर्ववृत्त, आस्तियाँ-देयताएँ एवं शैक्षिक
योग्यता शपथ-पत्र में बतानी होती है (धारा 33क); झूठा शपथ-पत्र धारा
125क के अधीन अपराध है।
6.4 NOTA, EVM एवं VVPAT
NOTA (None Of The Above — “इनमें से कोई नहीं”) —
पीयूसीएल बनाम भारत संघ, 27 सितंबर 2013 के निर्णय के बाद मतपत्र/EVM पर अंतिम विकल्प के रूप में जोड़ा गया।
पहली बार प्रयोग — नवंबर 2013 के विधान सभा चुनावों (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिज़ोरम, राजस्थान एवं
दिल्ली) में।
NOTA का प्रभाव सीमित है — यह “अस्वीकार करने का अधिकार” नहीं है। यदि NOTA को
सर्वाधिक मत मिल जाएँ, तब भी शेष अभ्यर्थियों में जिसे सर्वाधिक मत मिले वही निर्वाचित घोषित होता है।
उच्चतम न्यायालय ने शैलेष मनुभाई परमार बनाम निर्वाचन आयोग (2018) में कहा कि
राज्य सभा (अप्रत्यक्ष) निर्वाचनों में NOTA लागू नहीं होगा।
EVM — जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 61क (1989) जोड़कर विधिक आधार
दिया गया; व्यापक प्रयोग 1999 के बाद तथा 2004 के आम चुनाव में पहली बार पूरे देश में।
VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail — मतदाता सत्यापनीय पेपर ऑडिट ट्रेल) —
सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निर्वाचन आयोग (2013) में उच्चतम न्यायालय ने चरणबद्ध शुरुआत का निर्देश दिया;
निर्वाचन संचालन नियम, 1961 में 2013 में संशोधन हुआ। पहला प्रयोग — सितंबर 2013, नागालैंड की
नोकसेन विधान सभा सीट के उप-चुनाव में। 2019 के आम चुनाव से सभी मतदान केंद्रों पर।
गणना का नियम — प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र/खंड में यादृच्छिक रूप से चुने गए
5 मतदान केंद्रों की VVPAT पर्चियों का EVM परिणाम से मिलान अनिवार्य है
(एन. चंद्रबाबू नायडू बनाम भारत संघ, 2019)। अप्रैल 2024 में उच्चतम न्यायालय ने
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स मामले में 100% VVPAT मिलान की माँग अस्वीकार कर दी
और मतपत्र पर लौटने से भी इनकार किया।
6.5 निर्वाचन व्यय की सीमा
अभ्यर्थी को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के अधीन अपने निर्वाचन-व्यय का पृथक एवं
सही लेखा रखना होता है; सीमा निर्वाचन संचालन नियम, 1961 के नियम 90 में दी जाती है और निर्वाचन आयोग
समय-समय पर उसे संशोधित करता है। जनवरी 2022 में की गई अंतिम बड़ी वृद्धि के बाद वर्तमान सीमाएँ:
सुमेलन-तालिका 7 : अभ्यर्थी की व्यय-सीमा (जनवरी 2022 से)
निर्वाचन
बड़े राज्य
छोटे राज्य एवं संघ राज्यक्षेत्र
लोक सभा
₹95 लाख
₹75 लाख
विधान सभा
₹40 लाख
₹28 लाख
सावधानी — सीमा केवल अभ्यर्थी पर है
राजनीतिक दल के व्यय पर कोई सीमा नहीं है।कंवर लाल गुप्ता बनाम अमरनाथ चावला (1975) में
उच्चतम न्यायालय ने दल के व्यय को अभ्यर्थी के खाते में जोड़ा था, किंतु संसद ने उसी वर्ष धारा 77(1) में
स्पष्टीकरण 1 जोड़कर उस निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया — दल तथा अन्य समर्थकों का व्यय अभ्यर्थी के
खाते में नहीं जुड़ता। दल को चुनाव के 75 दिन (लोक सभा) / 45 दिन (विधान सभा) के
भीतर आयोग को व्यय-विवरण देना होता है, पर वह सीमा नहीं है। दूसरा फंदा — व्यय-लेखा प्रस्तुत न करने पर
निरर्हता 3 वर्ष तक की होती है (धारा 10क)।
6.6 प्रमुख निर्वाचन सुधार एवं समितियाँ
सुमेलन-तालिका 8 : सुधार ↔ वर्ष ↔ प्रभाव
वर्ष
सुधार/समिति
प्रभाव
1975
तारकुंडे समिति (जयप्रकाश नारायण की पहल पर)
मतदान आयु 18; निर्वाचन आयोग की नियुक्ति के लिए समिति; दलों के लिए आचार-संहिता
1988
61वाँ संविधान संशोधन
मतदान आयु 21 → 18
1989
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन
EVM को विधिक मान्यता (धारा 61क); दलों का पंजीकरण (धारा 29क)
1990
दिनेश गोस्वामी समिति
निर्वाचन सुधारों पर सर्वाधिक उद्धृत प्रतिवेदन — राज्य द्वारा आंशिक वित्त-पोषण, अपराधीकरण पर रोक, आयोग की स्वतंत्रता
1993
वोहरा समिति
राजनीति–अपराध–नौकरशाही के गठजोड़ (criminal-politician nexus) पर
1996
व्यापक संशोधन
एक व्यक्ति दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से नहीं लड़ सकता; मतदान से 48 घंटे पूर्व सार्वजनिक प्रचार पर रोक; प्रस्तावकों की संख्या बढ़ी; मतदान के दिन शराब-बिक्री पर रोक
1998
इंद्रजीत गुप्ता समिति
चुनावों के राज्य वित्त-पोषण (state funding) की सिफ़ारिश — वस्तु-रूप में एवं मान्यताप्राप्त दलों तक सीमित
1999
विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट
दलों के भीतर लोकतंत्र, व्यय-लेखा-परीक्षा, दल-बदल पर कठोरता
2003
संशोधन
राज्य सभा चुनाव में खुला मतपत्र (open ballot) तथा अधिवास (domicile) की शर्त समाप्त — कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में वैध ठहराया गया
2010
धारा 20क
प्रवासी भारतीय मतदाता (overseas electors) का पंजीकरण
2013
NOTA · लिली थॉमस · VVPAT
तीनों एक ही वर्ष — इसी वर्ष कारागार में बंद व्यक्ति के चुनाव लड़ने के अधिकार को संशोधन द्वारा बहाल किया गया
2021
निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021
निर्वाचक नामावली से आधार का स्वैच्छिक जोड़ना; पंजीकरण के लिए चार अर्हक तिथियाँ (1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई, 1 अक्टूबर); सेवा-मतदाता के लिए “पत्नी” के स्थान पर लिंग-निरपेक्ष “पति/पत्नी”
2023
106वाँ संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम)
लोक सभा, राज्य विधान सभाओं तथा दिल्ली विधान सभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान — नए अनुच्छेद 330क, 332क, 334क तथा 239कक में संशोधन; जनगणना एवं परिसीमन के बाद प्रभावी; 15 वर्ष की अवधि
2024
निर्वाचन बॉण्ड योजना
15 फ़रवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय की पाँच-सदस्यीय संविधान पीठ ने योजना को असंवैधानिक घोषित किया — अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन मतदाता के जानने के अधिकार का उल्लंघन
परीक्षा-दृष्टि — “एक राष्ट्र, एक चुनाव”
लोक सभा एवं राज्य विधान सभाओं के एक साथ चुनाव के प्रश्न पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की
अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने मार्च 2024 में प्रतिवेदन दिया, और इसके आधार पर
दिसंबर 2024 में संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक तथा संघ राज्यक्षेत्र विधियों का
संशोधन विधेयक लोक सभा में प्रस्तुत कर संयुक्त संसदीय समिति को भेजे गए। परीक्षा के लिए याद रखें —
यह अभी विधेयक है, अधिनियम नहीं; और 1951–1967 तक भारत में चुनाव वस्तुतः एक साथ ही होते थे।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (विषय) सूची-II (उपबंध) A. राजनीतिक दलों का पंजीकरण 1. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 B. निर्वाचक नामावली की तैयारी 2. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29क C. वयस्क मताधिकार 3. अनुच्छेद 324 D. निर्वाचनों का अधीक्षण एवं नियंत्रण 4. अनुच्छेद 326 कूट:
उत्तर: (C)दलों का पंजीकरण — 1951 की धारा 29क; निर्वाचक नामावली की तैयारी — 1950 का अधिनियम; वयस्क मताधिकार — अनुच्छेद 326; निर्वाचनों का अधीक्षण — अनुच्छेद 324। अतः A-2, B-1, C-4, D-3 सही है।
प्र.2निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. मतदान आयु घटाकर 18 वर्ष करना 2. VVPAT का प्रथम प्रयोग 3. राज्य सभा निर्वाचन में खुले मतपत्र की व्यवस्था 4. निर्वाचन बॉण्ड योजना का असंवैधानिक घोषित होना नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1, 3, 4, 2B1, 3, 2, 4C3, 1, 4, 2D3, 1, 2, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)61वाँ संशोधन 1988 (मतदान आयु 18); राज्य सभा में खुला मतपत्र 2003; VVPAT का प्रथम प्रयोग सितंबर 2013 (नोकसेन, नागालैंड); निर्वाचन बॉण्ड 15 फ़रवरी 2024 को असंवैधानिक। अतः क्रम 1, 3, 2, 4 है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): NOTA को किसी निर्वाचन क्षेत्र में सर्वाधिक मत मिल जाने पर भी वह निर्वाचन रद्द नहीं होता। कारण (R): NOTA मतदाता को अस्वीकृति व्यक्त करने का विकल्प देता है, किंतु उसे “अस्वीकार करने का अधिकार” नहीं देता; शेष अभ्यर्थियों में सर्वाधिक मत पाने वाला ही निर्वाचित होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)वर्तमान विधिक स्थिति में NOTA का प्रभाव केवल असंतोष दर्ज कराने तक है; निर्वाचन परिणाम शेष अभ्यर्थियों के मतों से तय होता है। अतः दोनों कथन सही हैं और (R) ही (A) की सही व्याख्या है।
7. संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग — अनुच्छेद 315 से 323
7.1 पृष्ठभूमि एवं अनुच्छेद 315
लोक सेवा आयोग की जड़ें औपनिवेशिक काल में हैं। ली आयोग (Lee Commission, 1924) की सिफ़ारिश पर
1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) स्थापित हुआ, जिसके
प्रथम अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। भारत शासन अधिनियम, 1935 ने इसे
संघीय लोक सेवा आयोग (Federal Public Service Commission) बनाया और प्रांतीय लोक सेवा
आयोगों की भी व्यवस्था की। 26 जनवरी 1950 को यही संघीय आयोग संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) बन गया।
अनुच्छेद 315 कहता है — संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग तथा
प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग होगा। इसके तीन विशेष उपबंध भी हैं:
संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (JSPSC) — दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों द्वारा प्रस्ताव
पारित किए जाने पर संसद विधि द्वारा गठित कर सकती है। यह सांविधिक निकाय है,
संवैधानिक नहीं — जबकि UPSC एवं SPSC संवैधानिक हैं। यह एक उत्कृष्ट सूक्ष्म-भेद है।
UPSC राज्य की सेवा भी कर सकता है — यदि उस राज्य का राज्यपाल अनुरोध करे और
राष्ट्रपति अनुमोदन दें (अनु. 315(4))।
JSPSC के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
7.2 संरचना, पदावधि एवं हटाया जाना
सुमेलन-तालिका 9 : UPSC बनाम राज्य लोक सेवा आयोग — बिंदुवार
आधार
संघ लोक सेवा आयोग
राज्य लोक सेवा आयोग
सदस्य-संख्या
संविधान में निर्धारित नहीं — राष्ट्रपति/राज्यपाल तय करते हैं। किंतु लगभग आधे सदस्य ऐसे हों जिन्होंने भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम-से-कम 10 वर्ष पद धारण किया हो (अनु. 316)
नियुक्ति
राष्ट्रपति
राज्यपाल
पदावधि
6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो
6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु, जो पहले हो
पदत्याग
राष्ट्रपति को
राज्यपाल को
हटाया जाना (अनु. 317)
दोनों ही स्थितियों में केवल राष्ट्रपति हटा सकते हैं। कदाचार के आधार पर हटाने से पूर्व मामला उच्चतम न्यायालय को निर्देशित करना अनिवार्य है और न्यायालय की सलाह बाध्यकारी है। जाँच के दौरान राष्ट्रपति निलंबित कर सकते हैं
अन्य आधार
दिवालिया घोषित होना; पद के कर्तव्यों के बाहर सवेतन नियोजन करना; शारीरिक/मानसिक अक्षमता — इन आधारों पर उच्चतम न्यायालय की जाँच आवश्यक नहीं
सेवा-शर्तें (318)
नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से परिवर्तित नहीं
व्यय (322)
भारत की संचित निधि पर भारित
राज्य की संचित निधि पर भारित
वार्षिक प्रतिवेदन (323)
राष्ट्रपति को → संसद के दोनों सदनों के समक्ष, अस्वीकृत सलाह के कारण बताते हुए ज्ञापन सहित
राज्यपाल को → राज्य विधानमंडल के समक्ष, वैसा ही ज्ञापन सहित
7.3 अनुच्छेद 319 — सेवानिवृत्ति के बाद क्या कर सकते हैं
यह उपबंध UPPSC में बार-बार पूछा गया है, क्योंकि इसमें चार अलग-अलग स्थितियाँ हैं और उन्हें आपस में बदल देना बहुत आसान है।
सुमेलन-तालिका 10 : अनुच्छेद 319 — पद छोड़ने के बाद पात्रता
कौन
किसके लिए पात्र
किसके लिए अपात्र
UPSC का अध्यक्ष
किसी भी पद के लिए नहीं
भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई भी आगे का नियोजन
UPSC का सदस्य
UPSC का अध्यक्ष अथवा किसी राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष
इसके अतिरिक्त कोई भी सरकारी नियोजन
SPSC का अध्यक्ष
UPSC का अध्यक्ष या सदस्य अथवा किसी अन्य राज्य के SPSC का अध्यक्ष
इसके अतिरिक्त कोई भी सरकारी नियोजन
SPSC का सदस्य
UPSC का अध्यक्ष या सदस्य; उसी या किसी अन्य राज्य के SPSC का अध्यक्ष
इसके अतिरिक्त कोई भी सरकारी नियोजन
अनुच्छेद 319 — एक वाक्य में“ऊपर चढ़ो, नीचे नहीं — और UPSC का अध्यक्ष कहीं नहीं”
राज्य से संघ की ओर या सदस्य से अध्यक्ष की ओर जाना अनुज्ञेय है (ऊपर चढ़ना);
संघ से राज्य के सदस्य बनने जैसा नीचे जाना अनुज्ञेय नहीं। और शीर्ष पर बैठा
UPSC का अध्यक्ष सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी पद के लिए अपात्र है — यही सबसे कठोर नियम है।
7.4 कार्य — अनुच्छेद 320 एवं 321
परीक्षाओं का संचालन — संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए (UPSC), राज्य की सेवाओं के लिए (SPSC)।
संयुक्त भर्ती — दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर उन सेवाओं के लिए संयुक्त भर्ती योजना बनाने में
सहायता, जिनके लिए विशेष अर्हता वाले अभ्यर्थी चाहिए।
परामर्श अनिवार्य — (क) भर्ती की पद्धतियाँ; (ख) नियुक्ति, पदोन्नति एवं एक सेवा से दूसरी सेवा में
स्थानांतरण के सिद्धांत तथा ऐसे मामलों में अभ्यर्थियों की उपयुक्तता; (ग) अनुशासनिक मामले;
(घ) सरकारी कर्तव्य निर्वहन में किए गए कार्य से उत्पन्न विधिक व्यय की प्रतिपूर्ति के दावे;
(ङ) अनुतोष-पेंशन के दावे।
सलाह बाध्यकारी नहीं — आयोग की भूमिका परामर्शी है। सरकार उसे अस्वीकार कर सकती है,
किंतु कारण वार्षिक प्रतिवेदन के ज्ञापन में विधानमंडल के समक्ष रखने होंगे — यही एकमात्र
नियंत्रण है।
परामर्श से छूट — पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण तथा अनुसूचित जाति/जनजाति के दावों पर विचार करते
समय आयोग से परामर्श आवश्यक नहीं (अनु. 320(4))। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति/राज्यपाल
विनियम बनाकर कुछ पदों को परामर्श से बाहर रख सकते हैं — ऐसे विनियम कम-से-कम 14 दिन के लिए
विधानमंडल के समक्ष रखे जाते हैं और सदन उन्हें उपांतरित कर सकता है।
अनुच्छेद 321 — संसद/राज्य विधानमंडल विधि द्वारा आयोग के कार्यों का विस्तार
कर सकते हैं, जिसमें स्थानीय प्राधिकारियों, निगमित निकायों या लोक संस्थाओं की सेवाओं के मामले भी दिए जा सकते हैं।
सावधानी — UPSC क्या नहीं करता
UPSC सेवाओं का वर्गीकरण, वेतन-निर्धारण, संवर्ग-प्रबंधन एवं प्रशिक्षण नहीं देखता — ये
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के काम हैं।
UPSC अखिल भारतीय सेवाओं की भर्ती करता है, किंतु अनुच्छेद 312 के अधीन
नई अखिल भारतीय सेवा का सृजन राज्य सभा के विशेष प्रस्ताव (उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के
दो-तिहाई) पर संसद करती है — “कुल सदस्यों का दो-तिहाई” कहना गलत है।
अधीनस्थ सेवाओं की भर्ती के लिए राज्यों में अलग अधीनस्थ सेवा चयन आयोग होते हैं — वे
सांविधिक निकाय हैं, संवैधानिक नहीं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UPPSC की स्थापना 1937
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की स्थापना 1 अप्रैल 1937 को
भारत शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों के अधीन संयुक्त प्रांत लोक सेवा आयोग के रूप में हुई।
यह देश के सबसे पुराने प्रांतीय लोक सेवा आयोगों में से एक है। मुख्यालय प्रयागराज है।
आयोग का कार्य उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (कार्य-संचालन की प्रक्रिया तथा अन्य विषयों का विनियमन)
अधिनियम, 1985 तथा संबंधित नियमों से संचालित होता है; अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति
राज्यपाल करते हैं, पर हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति को है — अनुच्छेद 317 का
यही उपबंध राज्य आयोग की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी गारंटी है।
UPPSC द्वारा आयोजित संयुक्त राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा (PCS) परीक्षा से उप-जिलाधिकारी,
पुलिस उपाधीक्षक आदि पदों पर चयन होता है। इससे अलग
उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) तथा
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोगसांविधिक निकाय हैं — संवैधानिक नहीं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1लोक सेवा आयोगों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है। 2. राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, किंतु उन्हें केवल राष्ट्रपति हटा सकते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग संसद की विधि से गठित होता है, अतः वह सांविधिक निकाय है, संवैधानिक नहीं — कथन 1 गलत। अनुच्छेद 316/317 के अनुसार नियुक्ति राज्यपाल करते हैं पर हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
AUPSC सदस्य की आयु-सीमा — 65 वर्षBSPSC सदस्य की आयु-सीमा — 62 वर्षCUPSC के अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति के बाद पात्रता — किसी राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्षDUPSC का व्यय — भारत की संचित निधि पर भारित
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 319 के अनुसार UPSC का अध्यक्ष सेवानिवृत्ति के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी पद के लिए अपात्र है — वह राज्य आयोग का अध्यक्ष भी नहीं बन सकता। यह छूट UPSC के सदस्य को प्राप्त है। शेष तीनों युग्म सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): संघ लोक सेवा आयोग की सलाह सरकार पर बाध्यकारी नहीं होती। कारण (R): अनुच्छेद 323 के अधीन आयोग का वार्षिक प्रतिवेदन संसद के समक्ष उस ज्ञापन सहित रखा जाता है जिसमें सलाह स्वीकार न करने के कारण बताए जाते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)दोनों कथन तथ्यतः सही हैं, किंतु (R) उसका कारण नहीं है — बल्कि (R) उस स्थिति का परिणाम/उपचार है। सलाह इसलिए बाध्यकारी नहीं है क्योंकि संविधान ने आयोग को केवल परामर्शी भूमिका दी है; ज्ञापन की व्यवस्था इस अबाध्यता के दुरुपयोग को रोकने का उपाय है।
8. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक — अनुच्छेद 148 से 151
8.1 पद का स्वरूप
नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General — CAG) भारतीय लेखा एवं लेखा-परीक्षा
विभाग का प्रमुख है और लोक धन का संरक्षक कहलाता है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में
कहा था कि यह “संविधान के अधीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी” होगा — उनके अनुसार इसके कर्तव्य न्यायपालिका से भी
अधिक महत्वपूर्ण हैं।
नियुक्ति — राष्ट्रपति द्वारा, अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित
अधिपत्र (warrant) द्वारा। शपथ राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष
(तीसरी अनुसूची)।
पदावधि — 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो। यह अवधि संविधान में
नहीं, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971 में है।
पदत्याग — राष्ट्रपति को।
हटाया जाना — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति एवं आधार पर, अर्थात्
संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित समावेदन पर, सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर।
वेतन — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान; वेतन एवं प्रशासनिक व्यय
भारत की संचित निधि पर भारित — संसद में मतदेय नहीं।
सेवानिवृत्ति के बाद — भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी पद के लिए
अपात्र (यह नियम UPSC के अध्यक्ष जैसा है)।
कोई भी मंत्री संसद में CAG का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और न उसके किसी कार्य का उत्तरदायित्व ले सकता है।
8.2 अनुच्छेद 149 से 151 — कर्तव्य एवं प्रतिवेदन
सुमेलन-तालिका 11 : CAG से संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेद
विषय
निर्णायक बिंदु
148
पद, नियुक्ति, शपथ एवं सेवा-शर्तें
स्वतंत्रता के सारे कवच इसी अनुच्छेद में
149
कर्तव्य एवं शक्तियाँ
संसद विधि द्वारा निर्धारित करेगी → CAG (कर्तव्य, शक्तियाँ एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971; 1976 के संशोधन ने केंद्र में लेखांकन को लेखा-परीक्षा से अलग किया
150
संघ एवं राज्यों के लेखाओं का प्रारूप
राष्ट्रपति द्वारा, CAG की सलाह पर विहित
151
संपरीक्षा प्रतिवेदन
संघ के प्रतिवेदन राष्ट्रपति को → संसद के दोनों सदनों के समक्ष; राज्य के प्रतिवेदन राज्यपाल को → राज्य विधानमंडल के समक्ष
279
“शुद्ध आगम (net proceeds)” का प्रमाणन
किसी कर/शुल्क के शुद्ध आगम का CAG का प्रमाणपत्र अंतिम होता है
8.3 CAG क्या-क्या संपरीक्षा करता है
भारत की संचित निधि, प्रत्येक राज्य की संचित निधि तथा विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्र की
संचित निधि से होने वाला समस्त व्यय।
आकस्मिकता निधि एवं लोक लेखा से किए गए व्यय।
किसी भी सरकारी विभाग में रखे जाने वाले व्यापार, विनिर्माण, लाभ-हानि लेखे एवं तुलन-पत्र।
सरकारी कंपनियों (कंपनी अधिनियम के उपबंधों के अनुसार) एवं निगमों
(उनके अधिनियमों के अनुसार) की संपरीक्षा।
वे निकाय एवं प्राधिकरण जो सरकारी राजस्व से सारभूत रूप से वित्तपोषित हैं;
तथा वे जिन्हें विशिष्ट प्रयोजन के लिए अनुदान/ऋण दिया गया है।
राष्ट्रपति/राज्यपाल के अनुरोध पर किसी अन्य प्राधिकारी के लेखे।
तीन प्रकार की संपरीक्षा — विधिक/नियामक (regularity) संपरीक्षा,
औचित्य (propriety) संपरीक्षा तथा निष्पादन (performance) संपरीक्षा —
अंतिम में मितव्ययिता, दक्षता एवं प्रभावशीलता (3 E) देखी जाती है।
सावधानी — “नियंत्रक” नाम भ्रामक है
भारत का CAG वास्तव में केवल महालेखापरीक्षक है, नियंत्रक नहीं। ब्रिटेन में CAG की अनुमति के
बिना संचित निधि से धन नहीं निकाला जा सकता; भारत में धन निकालने का प्राधिकार कार्यपालिका
के पास है और CAG केवल व्यय हो जाने के बाद उसकी संपरीक्षा करता है। दूसरा बिंदु — CAG
“गोपनीय” व्यय (secret service expenditure) का विस्तृत ब्यौरा नहीं माँग सकता; वहाँ सक्षम
प्राधिकारी का प्रमाणपत्र स्वीकार करना होता है। तीसरा — राज्यों के लिए अलग CAG नहीं होता;
वही एक CAG संघ एवं सभी राज्यों की संपरीक्षा करता है (अनुच्छेद 149 एवं 151(2))।
8.4 प्रतिवेदन से लोक लेखा समिति तक — पूरी शृंखला
CAG के प्रतिवेदन का असली प्रभाव संसद/विधानमंडल में होता है — और वहाँ उसका वाहक है लोक लेखा समिति
(Public Accounts Committee — PAC)। इसी कारण CAG को PAC का “मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक”
कहा जाता है।
1. संपरीक्षाCAG संघ/राज्य के लेखाओं की संपरीक्षा कर तीन प्रतिवेदन तैयार करता है — विनियोग लेखे, वित्त लेखे तथा सार्वजनिक उपक्रमों पर प्रतिवेदन
→
2. राष्ट्रपति कोअनुच्छेद 151(1) — संघ के प्रतिवेदन राष्ट्रपति को; राज्यों के प्रतिवेदन 151(2) के अधीन राज्यपाल को
→
3. सदन के समक्षराष्ट्रपति/राज्यपाल उन्हें संसद के दोनों सदनों/राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं — प्रायः वित्त मंत्री के माध्यम से
→
4. PAC को स्वतः निर्देशसदन में रखे जाते ही प्रतिवेदन लोक लेखा समिति को निर्दिष्ट हो जाते हैं — सार्वजनिक उपक्रमों वाला प्रतिवेदन सार्वजनिक उपक्रम समिति को
→
5. जाँच एवं प्रतिवेदनPAC विभागीय सचिवों को बुलाकर साक्ष्य लेती है; CAG मार्गदर्शक की भूमिका में रहता है। समिति का प्रतिवेदन सदन में प्रस्तुत होता है और सरकार कृत-कार्रवाई टिप्पणी देती है
लोक लेखा समिति — गठन 1921 में (भारत शासन अधिनियम, 1919 के अधीन);
वर्तमान में 22 सदस्य — 15 लोक सभा + 7 राज्य सभा; कार्यकाल 1 वर्ष;
मंत्री सदस्य नहीं हो सकता; अध्यक्ष की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं और
1967 से परंपरा है कि अध्यक्ष विपक्ष से हो। समितियों का पूरा ढाँचा अध्याय
4.4 में है।
तीन प्रतिवेदन — विनियोग लेखे (स्वीकृत अनुदान बनाम वास्तविक व्यय),
वित्त लेखे (प्राप्ति एवं व्यय का समेकित चित्र), तथा सार्वजनिक उपक्रम।
PAC का काम “लेखा-परीक्षा के बाद” का है — वह नीति के औचित्य पर नहीं, धन के
विधिसम्मत एवं मितव्ययी उपयोग पर प्रश्न करती है। समिति की सिफ़ारिशें
परामर्शी होती हैं।
परीक्षा-दृष्टि — वर्तमान स्थिति
भारत के वर्तमान नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के. संजय मूर्ति हैं, जिन्होंने
21 नवंबर 2024 को शपथ ली (15वें CAG); उनके पूर्ववर्ती गिरीश चंद्र मुर्मू थे।
प्रथम CAG वी. नरहरि राव थे। भारत का CAG कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं — जैसे संयुक्त राष्ट्र के
कुछ निकायों — का बाह्य लेखा-परीक्षक भी रहा है, और INTOSAI (सर्वोच्च लेखा-परीक्षा
संस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय संगठन) में सक्रिय रहता है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उसकी पदावधि संविधान में छह वर्ष निर्धारित की गई है। 2. उसका वेतन एवं प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)संविधान में पदावधि नहीं दी गई; 6 वर्ष या 65 वर्ष की सीमा CAG (कर्तव्य, शक्तियाँ एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971 से आती है — कथन 1 गलत। वेतन एवं प्रशासनिक व्यय संचित निधि पर भारित हैं — कथन 2 सही।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (विषय) A. 148 1. लेखाओं का प्रारूप राष्ट्रपति द्वारा, CAG की सलाह पर B. 149 2. संपरीक्षा प्रतिवेदन राष्ट्रपति/राज्यपाल को C. 150 3. CAG की नियुक्ति एवं सेवा-शर्तें D. 151 4. कर्तव्य एवं शक्तियाँ संसद विधि द्वारा कूट:
उत्तर: (C)148 — नियुक्ति एवं सेवा-शर्तें; 149 — कर्तव्य एवं शक्तियाँ संसद विधि द्वारा; 150 — लेखाओं का प्रारूप; 151 — संपरीक्षा प्रतिवेदन। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारत का नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक वस्तुतः “नियंत्रक” की भूमिका नहीं निभाता। कारण (R): भारत में संचित निधि से धन निकालने का प्राधिकार कार्यपालिका के पास है और CAG व्यय होने के बाद ही उसकी संपरीक्षा करता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)ब्रिटेन के विपरीत भारत में CAG की पूर्व-अनुमति के बिना भी संचित निधि से धन निकाला जा सकता है; उसकी भूमिका उत्तर-व्ययी संपरीक्षा तक सीमित है। अतः दोनों सही हैं और (R) ही (A) का कारण है।
9. महान्यायवादी (अनुच्छेद 76) एवं महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165)
9.1 भारत का महान्यायवादी — अनुच्छेद 76
महान्यायवादी (Attorney General of India) देश का प्रथम विधि अधिकारी है।
यह पद संविधान के भाग V (संघ) में रखा गया है — अर्थात् वह कार्यपालिका का ही अंग है, न्यायपालिका का नहीं।
नियुक्ति — राष्ट्रपति द्वारा। अर्हता — वह व्यक्ति जो
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य हो, अर्थात् भारत का नागरिक हो और
किसी उच्च न्यायालय में 5 वर्ष न्यायाधीश रहा हो या 10 वर्ष अधिवक्ता रहा हो,
अथवा राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो।
पदावधि — संविधान में निश्चित नहीं; वह
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। इसीलिए सरकार बदलने पर परंपरा से त्यागपत्र दिया जाता है।
पारिश्रमिक — संविधान में निर्धारित नहीं; राष्ट्रपति जो अवधारित करें।
कर्तव्य — (क) राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट विधिक विषयों पर भारत सरकार को सलाह देना;
(ख) विधिक स्वरूप के अन्य कर्तव्यों का पालन; (ग) संविधान या किसी विधि द्वारा प्रदत्त कृत्यों का निर्वहन।
अधिकार — भारत के समस्त न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार;
अनुच्छेद 88 के अधीन संसद के दोनों सदनों, संयुक्त बैठक तथा किसी भी समिति की
कार्यवाही में बोलने एवं भाग लेने का अधिकार — किंतु मत देने का अधिकार नहीं।
उसे संसद-सदस्य के समान विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं (अनु. 105)।
सीमाएँ (परंपरा एवं सरकारी अनुदेशों से) — भारत सरकार के विरुद्ध सलाह या पैरवी नहीं;
सरकार की अनुमति के बिना आपराधिक अभियोजन में अभियुक्त की पैरवी नहीं; अनुमति के बिना किसी कंपनी में
निदेशक नहीं। किंतु वह पूर्णकालिक सरकारी सेवक नहीं है और
निजी वकालत कर सकता है — यही उसे महाधिवक्ता जैसे पदों से और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों से
अलग करता है।
सहायक — भारत का महा-सॉलिसिटर (Solicitor General) तथा
अपर महा-सॉलिसिटर उसकी सहायता करते हैं, किंतु ये संविधान में वर्णित नहीं हैं —
ये विशुद्ध रूप से सरकारी पद हैं। महान्यायवादी इनका प्रशासनिक वरिष्ठ भी नहीं है।
सावधानी — महान्यायवादी के चार भ्रम
वह केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं है — यद्यपि उसे सदन में बोलने का अधिकार है।
महा-सॉलिसिटर (Solicitor General) संवैधानिक पद नहीं है; केवल महान्यायवादी है।
महान्यायवादी को हटाने की कोई प्रक्रिया संविधान में नहीं दी गई — “प्रसादपर्यंत” का अर्थ ही
यह है कि राष्ट्रपति (अर्थात् मंत्रिपरिषद) कभी भी हटा सकते हैं।
वर्तमान महान्यायवादी आर. वेंकटरमणि हैं (1 अक्टूबर 2022 से; 16वें महान्यायवादी)।
प्रथम महान्यायवादी एम.सी. सीतलवाड़ थे, जो सबसे लंबे समय (1950–1963) तक इस पद पर रहे।
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के योग्य — 10 वर्ष न्यायिक पद या 10 वर्ष उच्च न्यायालय में अधिवक्ता
पदावधि
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत
राज्यपाल के प्रसादपर्यंत
पारिश्रमिक
राष्ट्रपति अवधारित करें
राज्यपाल अवधारित करें
सदन में अधिकार
अनुच्छेद 88 — दोनों सदनों एवं समितियों में बोलने का अधिकार, मत का नहीं
अनुच्छेद 177 — राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों एवं समितियों में बोलने का अधिकार, मत का नहीं
सुनवाई का क्षेत्र
भारत के समस्त न्यायालयों में
उस राज्य के समस्त न्यायालयों में
सहायक
महा-सॉलिसिटर, अपर महा-सॉलिसिटर (असंवैधानिक पद)
अपर महाधिवक्ता, शासकीय अधिवक्ता (असंवैधानिक पद)
उत्तर प्रदेश संदर्भ
उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता का कार्यालय प्रयागराज में है, क्योंकि इलाहाबाद
उच्च न्यायालय का मुख्य पीठ वहीं है; लखनऊ पीठ के लिए अपर महाधिवक्ता कार्यरत रहते हैं। यह ध्यान रखें कि
महाधिवक्ता राज्य विधान सभा एवं विधान परिषद — दोनों में बोल सकता है (अनु. 177), क्योंकि UP
द्विसदनीय विधानमंडल वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश उन कुछ राज्यों में है जहाँ विधान परिषद है — इसलिए UPPSC में
अनुच्छेद 177 का प्रश्न बनने की संभावना अधिक रहती है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1भारत के महान्यायवादी के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उसे संसद की कार्यवाही में बोलने तथा मत देने का अधिकार है। 2. वह निजी विधि-व्यवसाय कर सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 88 के अधीन महान्यायवादी को बोलने एवं भाग लेने का अधिकार है, मत देने का नहीं — कथन 1 गलत। वह पूर्णकालिक सरकारी सेवक नहीं है, अतः निजी वकालत कर सकता है (सरकार के विरुद्ध नहीं) — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (पद) (अनुच्छेद) 1. महाधिवक्ता — अनुच्छेद 165 2. महान्यायवादी का सदनों में बोलने का अधिकार — अनुच्छेद 88 3. महा-सॉलिसिटर — अनुच्छेद 76क नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)संविधान में महा-सॉलिसिटर (Solicitor General) का कोई उल्लेख नहीं है और “अनुच्छेद 76क” जैसा कोई अनुच्छेद ही नहीं है — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 2 सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): महान्यायवादी की पदावधि संविधान में निश्चित नहीं की गई है। कारण (R): वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और उसे हटाने की कोई प्रक्रिया संविधान में नहीं दी गई है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)“प्रसादपर्यंत” पदधारण का ही परिणाम है कि न कोई निश्चित अवधि है और न हटाने की कोई विहित प्रक्रिया। अतः दोनों सही हैं और (R) ही (A) की सही व्याख्या है।
10. वित्त आयोग — अनुच्छेद 280 एवं राज्य वित्त आयोग
10.1 अनुच्छेद 280 — गठन एवं संरचना
वित्त आयोग राजकोषीय संघवाद का संतुलन-चक्र (balancing wheel of fiscal federalism) कहलाता है।
अनुच्छेद 280(1) के अनुसार राष्ट्रपति संविधान के प्रारंभ से
दो वर्ष के भीतर तथा उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले
जब वे आवश्यक समझें, एक वित्त आयोग गठित करेंगे।
संरचना — एक अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य। अर्हताएँ एवं
चयन-रीति संसद विधि द्वारा तय करती है →
वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951।
अर्हताएँ — अध्यक्ष: लोक कार्यों का अनुभव रखने वाला व्यक्ति। चार सदस्य:
(i) उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उसके लिए अर्हित व्यक्ति; (ii) सरकार के वित्त एवं लेखाओं का
विशेष ज्ञान रखने वाला; (iii) वित्तीय विषयों एवं प्रशासन का व्यापक अनुभव रखने वाला;
(iv) अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला। सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र हैं।
प्रकृति — अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) संवैधानिक निकाय; सिफ़ारिशें
परामर्शी हैं, बाध्यकारी नहीं। किंतु परंपरा से केंद्र उन्हें स्वीकार करता आया है।
10.2 कार्य — अनुच्छेद 280(3) एवं 281
(क) संघ एवं राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगम के वितरण तथा राज्यों के बीच उसके
आवंटन की सिफ़ारिश — अर्थात् ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज हस्तांतरण।
(ख) भारत की संचित निधि से राज्यों को दिए जाने वाले सहायता अनुदान
(अनुच्छेद 275) के सिद्धांत।
(ग) राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर राज्य की संचित निधि की संपूरण हेतु वे उपाय,
जिनसे राज्य में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के संसाधन बढ़ाए जा सकें — यह खंड
73वें एवं 74वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया, इसीलिए यह विषय इसी अध्याय का अंग है।
(घ) सुदृढ़ वित्त के हित में राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट कोई अन्य विषय।
अनुच्छेद 281 — राष्ट्रपति आयोग की सिफ़ारिशों को, उन पर की गई कार्रवाई के
व्याख्यात्मक ज्ञापन सहित, संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएँगे।
10.3 नवीनतम स्थिति — सोलहवाँ वित्त आयोग
गठन — 31 दिसंबर 2023; अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया (नीति आयोग के पूर्व
उपाध्यक्ष)।
अवधि — 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 (अर्थात् 2026-27 से 2030-31 तक)।
प्रतिवेदन राष्ट्रपति को — 17 नवंबर 2025; संसद में प्रस्तुत — 1 फ़रवरी 2026
(अनुच्छेद 281 के अधीन)।
ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण — 41%, जो 15वें वित्त आयोग के समान है।
क्षैतिज वितरण की कसौटियाँ — आय-दूरी 42.5%, जनसंख्या (2011)
17.5%, जनसांख्यिकीय निष्पादन 10%, क्षेत्रफल 10%,
वन 10%, तथा एक नई कसौटी — सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 10%
(जिसने 15वें आयोग की कर एवं राजकोषीय प्रयास वाली कसौटी का स्थान लिया)।
स्थानीय निकायों को अनुदान — ₹7,91,493 करोड़, जिसमें
ग्रामीण निकाय ₹4,35,236 करोड़ तथा नगरीय निकाय ₹3,56,257 करोड़।
अनुदान का 80% आधारभूत एवं 20% निष्पादन-आधारित है; नगरीय निकायों के लिए
विशेष अवसंरचना एवं नगरीकरण प्रीमियम घटक भी हैं।
तीन प्रवेश-शर्तें स्थानीय निकाय अनुदान के लिए — (i) संविधान के अनुसार निकायों का गठन,
(ii) अनंतिम एवं संपरीक्षित लेखाओं का सार्वजनिक प्रकाशन, तथा (iii)
राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन। यह तीसरी शर्त पंचायती राज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आपदा प्रबंधन — ₹1,55,916 करोड़ का अनुदान; कोष ₹2,04,401 करोड़; लागत-भागीदारी
90:10 (पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्य) तथा 75:25 (शेष राज्य)।
16वें आयोग ने 15वें आयोग के राजस्व-घाटा अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान एवं राज्य-विशिष्ट अनुदान
बंद कर दिए — यह एक उल्लेखनीय बदलाव है।
परीक्षा-दृष्टि — वित्त आयोगों का त्वरित स्मरण
प्रथम वित्त आयोग (1951) — के.सी. नियोगी। 14वाँ — वाई.वी. रेड्डी, जिसने
हस्तांतरण 32% से बढ़ाकर 42% किया। 15वाँ — एन.के. सिंह, जिसने जम्मू-कश्मीर के
पुनर्गठन के बाद इसे 41% किया और असामान्य रूप से छह वर्ष (2020-21 से 2025-26)
की अवधि दी। 16वाँ — अरविंद पनगढ़िया, 41% बरकरार। केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों
का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.3 में है।
10.4 राज्य वित्त आयोग — अनुच्छेद 243झ एवं 243म
सावधानी — अनुच्छेद 280 बनाम अनुच्छेद 243झ
आधार
वित्त आयोग — अनुच्छेद 280
राज्य वित्त आयोग — अनुच्छेद 243झ (एवं 243म)
गठनकर्ता
राष्ट्रपति
राज्यपाल
किसके बीच बँटवारा
संघ एवं राज्यों के बीच
राज्य एवं उसके स्थानीय निकायों (पंचायत एवं नगरपालिका) के बीच
संरचना
अध्यक्ष + 4 सदस्य (संविधान में संख्या दी गई है)
संविधान में संख्या नहीं दी गई — राज्य विधानमंडल तय करता है
अवधि
प्रत्येक 5वें वर्ष या उससे पहले
प्रत्येक 5वें वर्ष (1993 के प्रारंभ से)
प्रतिवेदन कहाँ
राष्ट्रपति → संसद के दोनों सदन (अनु. 281)
राज्यपाल → राज्य विधानमंडल, कृत-कार्रवाई ज्ञापन सहित
दोनों का सेतु
अनुच्छेद 280(3)(ग) — केंद्रीय वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर यह बताता है कि राज्य की संचित निधि को कैसे संपूरित किया जाए ताकि स्थानीय निकायों के संसाधन बढ़ें
अतः यह कहना गलत है कि “राज्य वित्त आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं” अथवा “राज्य वित्त आयोग केंद्र एवं राज्य
के बीच करों का बँटवारा करता है”। यह दोनों वाक्य UPPSC के प्रिय distractor हैं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ
उत्तर प्रदेश ने अनुच्छेद 243झ के अधीन अपना प्रथम राज्य वित्त आयोग 1994 में गठित किया और तब से
क्रमशः आयोग गठित होते रहे हैं; ये आयोग राज्य के करों, शुल्कों एवं पथकर में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला
पंचायत तथा नगरीय निकायों के हिस्से की सिफ़ारिश करते हैं। 16वें वित्त आयोग की उस प्रवेश-शर्त पर विशेष ध्यान दें
जिसके अनुसार राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन न होने पर राज्य के स्थानीय निकाय केंद्रीय अनुदान से
वंचित रह सकते हैं — यह प्रावधान UP जैसे विशाल स्थानीय-निकाय तंत्र वाले राज्य के लिए सीधे व्यावहारिक महत्व का है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1वित्त आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसकी सिफ़ारिशें भारत सरकार पर बाध्यकारी होती हैं। 2. इसमें एक अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य होते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)आयोग की सिफ़ारिशें परामर्शी हैं, बाध्यकारी नहीं; उन्हें अनुच्छेद 281 के अधीन कृत-कार्रवाई ज्ञापन सहित संसद के समक्ष रखा जाता है — कथन 1 गलत। अनुच्छेद 280(1) के अनुसार आयोग में अध्यक्ष एवं चार अन्य सदस्य होते हैं — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
Aराज्य वित्त आयोग का गठन — राज्यपाल द्वाराBवित्त आयोग का गठन — राष्ट्रपति द्वाराCराज्य वित्त आयोग की सदस्य-संख्या — संविधान में चार निर्धारितDवित्त आयोग के प्रतिवेदन का संसद में रखा जाना — अनुच्छेद 281
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)राज्य वित्त आयोग की संरचना संविधान में निर्धारित नहीं है — अनुच्छेद 243झ(2) के अनुसार सदस्यों की संख्या, अर्हता एवं चयन-रीति राज्य विधानमंडल विधि द्वारा तय करता है। “अध्यक्ष + चार सदस्य” वाला नियम केवल केंद्रीय वित्त आयोग (अनु. 280) का है।
प्र.3सोलहवें वित्त आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसकी अध्यक्षता डॉ. अरविंद पनगढ़िया कर रहे हैं और इसका प्रतिवेदन 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए है। 2. इसने राज्यों के लिए ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण घटाकर 32% करने की सिफ़ारिश की है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)16वें वित्त आयोग (अध्यक्ष — डॉ. अरविंद पनगढ़िया) का प्रतिवेदन 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए है — कथन 1 सही। इसने हस्तांतरण 41% पर यथावत रखा, घटाया नहीं — कथन 2 गलत। (32% का आँकड़ा 13वें वित्त आयोग से जुड़ा है।)
11. अन्य संवैधानिक निकाय — अनुच्छेद 338, 338क, 338ख, 350ख
11.1 तीन आयोगों का विकास-क्रम
मूल संविधान के अनुच्छेद 338 में आयोग नहीं, बल्कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए
एक विशेष अधिकारी (जिसे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयुक्त कहा गया) की व्यवस्था थी।
आगे की यात्रा तीन संशोधनों में पूरी हुई:
1950अनुच्छेद 338 — अजा/अजजा के लिए विशेष अधिकारी (आयुक्त); उसका प्रतिवेदन राष्ट्रपति को
1978 · 1987सरकारी संकल्प से गैर-सांविधिक बहु-सदस्यीय आयोग गठित — पहले “अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग”, फिर उसका पुनर्गठन
1990 · 65वाँ संशोधनविशेष अधिकारी के स्थान पर बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग — पहली बार संवैधानिक दर्जा (आयोग 1992 में अस्तित्व में आया)
2003 · 89वाँ संशोधनआयोग का विभाजन — अनुच्छेद 338 = राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, नया अनुच्छेद 338क = राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग। दोनों 19 फ़रवरी 2004 से पृथक रूप में कार्यरत
2018 · 102वाँ संशोधननया अनुच्छेद 338ख — राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा (पहले यह 1993 के अधिनियम से बना सांविधिक निकाय था); साथ ही अनुच्छेद 342क जोड़ा गया
2021 · 105वाँ संशोधनअनुच्छेद 342क(3) जोड़कर राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों की अपनी सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची बनाने की शक्ति बहाल की गई
11.2 तीनों आयोगों का साझा ढाँचा
संरचना — तीनों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्य; नियुक्ति
राष्ट्रपति द्वारा अधिपत्र (warrant) के अधीन; सेवा-शर्तें एवं पदावधि
राष्ट्रपति नियम द्वारा तय करते हैं (व्यवहार में 3 वर्ष)।
कार्य — संबंधित वर्ग के लिए संवैधानिक/विधिक संरक्षोपायों का अन्वेषण एवं
अनुश्रवण; विशिष्ट शिकायतों की जाँच; सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना-प्रक्रिया में
भाग लेना एवं सलाह देना; राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देना; तथा वे अन्य कार्य जो
राष्ट्रपति नियम द्वारा सौंपें।
शक्तियाँ — जाँच करते समय दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ — समन भेजना, शपथ पर
परीक्षा, दस्तावेज़ मँगाना, साक्ष्य लेना।
प्रतिवेदन — राष्ट्रपति उसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं,
साथ में कृत-कार्रवाई ज्ञापन तथा जहाँ सिफ़ारिश स्वीकार नहीं हुई वहाँ कारण।
राज्य से संबंधित अंश राज्यपाल को भेजा जाता है, जो उसे राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं।
परामर्श — संघ एवं प्रत्येक राज्य सरकार संबंधित वर्ग को प्रभावित करने वाले
सभी बड़े नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी [अनु. 338(9), 338क(9), 338ख(9)]।
विशेष उपबंध — अनुच्छेद 338(10) के अनुसार इस अनुच्छेद में “अनुसूचित जातियों”
के प्रति निर्देशों में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रति निर्देश भी सम्मिलित समझे जाएँगे —
अर्थात् NCSC आंग्ल-भारतीय समुदाय के मामले भी देखता है। पिछड़े वर्गों से संबंधित कार्य, जो
पहले NCSC के पास थे, अब 338ख के अधीन NCBC के पास हैं।
338 की तिकड़ी — क्रम में“जाति → जनजाति → पिछड़ा”
338 = राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग · 338क = राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति
आयोग · 338ख = राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग। संशोधन भी इसी क्रम में — 65वाँ (1990) → 89वाँ (2003)
→ 102वाँ (2018)। और याद रखें — 350ख कोई आयोग नहीं, एक विशेष अधिकारी है।
11.3 अनुच्छेद 350ख — भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी
यह उपबंध 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा जोड़ा गया, और इसका आधार
राज्य पुनर्गठन आयोग (फ़ज़ल अली आयोग, 1953–55) की सिफ़ारिश थी।
नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा। कार्य — भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए संविधान द्वारा उपबंधित
संरक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण तथा राष्ट्रपति द्वारा निदेशित अंतरालों पर
उन्हें प्रतिवेदन देना। राष्ट्रपति वे प्रतिवेदन संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं और
संबंधित राज्य सरकारों को भेजते हैं।
यह पद व्यवहार में भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त (Commissioner for Linguistic Minorities)
कहलाता है और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
साथ का उपबंध अनुच्छेद 350क (भी 7वें संशोधन से) है — प्राथमिक स्तर पर
मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा देने का राज्यों पर दायित्व। तथा अनुच्छेद 350 —
व्यथा-निवारण के लिए संघ/राज्य में प्रयुक्त किसी भाषा में अभ्यावेदन देने का अधिकार।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त का प्रयागराज से रिश्ता
भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त का कार्यालय स्थापना (जुलाई 1957) के कुछ समय बाद
इलाहाबाद (प्रयागराज) स्थानांतरित हुआ और दशकों तक वहीं रहा — इसी कारण अनेक पुरानी पुस्तकों में
इसका मुख्यालय “इलाहाबाद” लिखा मिलता है। 1 जून 2015 से मुख्यालय नई दिल्ली
कर दिया गया, जबकि प्रयागराज में अब भी उसका क्षेत्रीय कार्यालय है
(अन्य क्षेत्रीय कार्यालय — बेलगावी, चेन्नई एवं कोलकाता)। परीक्षा में यदि “वर्तमान मुख्यालय” पूछा जाए तो उत्तर
नई दिल्ली है; यदि “ऐतिहासिक रूप से किस नगर से जुड़ा रहा” पूछा जाए तो
प्रयागराज (इलाहाबाद)।
सुमेलन-तालिका 13 : अनुच्छेद ↔ निकाय ↔ जोड़ने वाला संशोधन
अनुच्छेद
निकाय/पद
संशोधन एवं वर्ष
338
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
मूल रूप में विशेष अधिकारी; 65वाँ (1990) से आयोग; 89वाँ (2003) से केवल अजा
338क
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
89वाँ संशोधन, 2003 (प्रभावी 19 फ़रवरी 2004)
338ख
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
102वाँ संशोधन, 2018
342क
सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों का विनिर्दिष्टीकरण
102वाँ (2018); 105वाँ (2021) ने राज्यों की सूची-शक्ति बहाल की
350ख
भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी
7वाँ संशोधन, 1956 (राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिश पर)
324
निर्वाचन आयोग
मूल संविधान
280 · 243झ
वित्त आयोग · राज्य वित्त आयोग
मूल संविधान · 73वाँ संशोधन, 1992
279क
वस्तु एवं सेवा कर परिषद
101वाँ संशोधन, 2016 — विवरण अध्याय 4.3 में
263
अंतर-राज्य परिषद
मूल संविधान; 1990 में राष्ट्रपति के आदेश से गठित (सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश) — अध्याय 4.3
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (निकाय) सूची-II (अनुच्छेद) A. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग 1. 350ख B. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग 2. 338 C. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग 3. 338क D. भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी 4. 338ख कूट:
उत्तर: (C)अनुसूचित जनजाति आयोग — 338क; पिछड़ा वर्ग आयोग — 338ख; अनुसूचित जाति आयोग — 338; भाषाई अल्पसंख्यक विशेष अधिकारी — 350ख। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।
प्र.2निम्नलिखित संशोधनों को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी का उपबंध 2. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना 3. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा 4. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए बहु-सदस्यीय आयोग की संवैधानिक व्यवस्था नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1, 4, 3, 2B4, 1, 2, 3C4, 1, 3, 2D1, 4, 2, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)7वाँ संशोधन (350ख) — 1956; 65वाँ संशोधन (बहु-सदस्यीय अजा-अजजा आयोग) — 1990; 89वाँ संशोधन (338क, अलग अजजा आयोग) — 2003; 102वाँ संशोधन (338ख) — 2018। अतः क्रम 1, 4, 2, 3 है।
प्र.3राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्य होते हैं। 2. यह आंग्ल-भारतीय समुदाय से संबंधित मामलों को भी देखता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 338(2) के अनुसार आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य होते हैं; तथा अनुच्छेद 338(10) के अनुसार “अनुसूचित जातियों” में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रति निर्देश भी सम्मिलित हैं। दोनों कथन सही हैं।
12. प्रमुख वैधानिक एवं अर्ध-न्यायिक निकाय
12.1 वर्गीकरण पहले समझें — यही सबसे बड़ा जाल है
संवैधानिक निकाय — संविधान में सीधे वर्णित
निर्वाचन आयोग — अनु. 324
संघ लोक सेवा आयोग एवं राज्य लोक सेवा आयोग — अनु. 315–323
नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक — अनु. 148
महान्यायवादी (76) एवं महाधिवक्ता (165)
वित्त आयोग — अनु. 280; राज्य वित्त आयोग — 243झ/243म
राज्य निर्वाचन आयोग — 243ट/243यक
NCSC (338) · NCST (338क) · NCBC (338ख)
भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी — 350ख
जीएसटी परिषद (279क) · अंतर-राज्य परिषद (263)
संशोधन के बिना समाप्त नहीं किए जा सकते
वैधानिक (सांविधिक) एवं कार्यपालक निकाय
वैधानिक — संसद/विधानमंडल की विधि से:
NHRC एवं SHRC (1993), केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोग (RTI, 2005), लोकपाल एवं लोकायुक्त (2013),
राष्ट्रीय महिला आयोग (1990), केंद्रीय सतर्कता आयोग (2003), राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (1992),
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (2005), राष्ट्रीय हरित अधिकरण (2010), संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग
कार्यपालक/गैर-सांविधिक — सरकारी संकल्प या कार्यकारी आदेश से:
नीति आयोग (2015), पूर्ववर्ती योजना आयोग (1950), राष्ट्रीय विकास परिषद (1952),
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) (1963), प्रशासनिक सुधार आयोग
ध्यान दें — केंद्रीय सूचना आयोग, लोकपाल एवं NHRC वैधानिक हैं, कार्यपालक नहीं;
और कोई भी वैधानिक निकाय “संवैधानिक” नहीं कहलाता
विधि/संकल्प बदलकर ही समाप्त किए जा सकते हैं — संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं
सावधानी — यही वह प्रश्न है जिसमें सबसे अधिक अंक कटते हैं
नीति आयोग संवैधानिक नहीं, सांविधिक भी नहीं — वह
केंद्रीय मंत्रिमंडल के संकल्प (1 जनवरी 2015) से बना है। उसका पूर्ववर्ती
योजना आयोग (15 मार्च 1950) भी संकल्प से ही बना था।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) संवैधानिक नहीं है — वह
1 अप्रैल 1963 को गृह मंत्रालय के संकल्प से बना; उसकी जाँच-शक्ति
दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से आती है। इसीलिए उसे “सांविधिक आधार वाला
गैर-सांविधिक निकाय” कहा जाता है।
इसके विपरीत वित्त आयोग पूर्णतः संवैधानिक निकाय है (अनु. 280) — विकल्पों में प्रायः
“नीति आयोग एवं वित्त आयोग दोनों संवैधानिक हैं” जैसा कथन रखा जाता है, जो गलत है।
लोकपाल संवैधानिक नहीं — वह लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 से बना
सांविधिक निकाय है। इसी प्रकार NHRC सांविधिक है, जबकि
NCSC/NCST/NCBC संवैधानिक — यह जोड़ी सर्वाधिक भ्रामक है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग 1964 में संकल्प से बना था, किंतु
2003 के अधिनियम से उसे सांविधिक दर्जा मिल गया — “वह आज भी गैर-सांविधिक है”
कहना गलत है।
संवैधानिक निकाय — एक पंक्ति में“चुनाव, सेवा, लेखा, वित्त — और तीन सौ अड़तीस की तिकड़ी”
चुनाव = निर्वाचन आयोग (324) एवं राज्य निर्वाचन आयोग (243ट) · सेवा = संघ/राज्य लोक सेवा
आयोग (315–323) · लेखा = नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (148) · वित्त = वित्त आयोग (280) एवं राज्य वित्त आयोग
(243झ) · तिकड़ी = 338, 338क, 338ख। इनके साथ दो विधि अधिकारी (76 एवं 165) तथा एक विशेष अधिकारी (350ख)।
जो इस सूची में नहीं, वह संवैधानिक नहीं।
12.2 नीति आयोग
स्थापना — 1 जनवरी 2015, केंद्रीय मंत्रिमंडल के संकल्प द्वारा; इसने
योजना आयोग (15 मार्च 1950) का स्थान लिया। पूरा नाम —
राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान (National Institution for Transforming India)।
स्वरूप — “थिंक टैंक”; यह निधि आवंटित नहीं करता (यह योजना आयोग से सबसे बड़ा
अंतर है — अब निधि-आवंटन वित्त मंत्रालय करता है) और
“सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद” का मंच है।
संरचना — अध्यक्ष: प्रधानमंत्री; शासी परिषद (Governing
Council): सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा अन्य संघ
राज्यक्षेत्रों के उपराज्यपाल; क्षेत्रीय परिषदें; उपाध्यक्ष (प्रधानमंत्री
द्वारा नियुक्त, कैबिनेट मंत्री का दर्जा); पूर्णकालिक सदस्य; पदेन सदस्य — अधिकतम 4 केंद्रीय
मंत्री; अंशकालिक सदस्य (अधिकतम 2, विश्वविद्यालयों/शोध संस्थानों से); विशेष आमंत्रित; तथा
मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) — भारत सरकार के सचिव स्तर का, नियत कार्यकाल वाला।
वर्तमान (2026) — उपाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी (8 मई 2026 से;
उनसे पूर्व सुमन के. बेरी); CEO बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम।
प्रमुख पहलें — SDG भारत सूचकांक, बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI),
आकांक्षी जिला कार्यक्रम (2018) एवं आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम (2023),
अटल नवप्रवर्तन मिशन, विकास निगरानी एवं मूल्यांकन कार्यालय (DMEO),
स्वास्थ्य/जल/शिक्षा सूचकांक।
12.3 राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
आधार — मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (12 अक्टूबर 1993 को गठित) —
सांविधिक निकाय। अधिनियम में 2006 एवं 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन हुए।
अध्यक्ष — 2019 के संशोधन के बाद वह व्यक्ति जो
उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या न्यायाधीश रहा हो (पहले केवल पूर्व मुख्य
न्यायमूर्ति)।
सदस्य — उच्चतम न्यायालय का वर्तमान/भूतपूर्व न्यायाधीश (1); उच्च न्यायालय का
वर्तमान/भूतपूर्व मुख्य न्यायमूर्ति (1); मानवाधिकारों का ज्ञान/व्यावहारिक अनुभव रखने वाले
तीन सदस्य, जिनमें कम-से-कम एक महिला। साथ में
सात पदेन (deemed) सदस्य — राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, NCSC, NCST, NCBC, राष्ट्रीय महिला आयोग,
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग तथा दिव्यांगजन मुख्य आयुक्त के अध्यक्ष।
नियुक्ति — राष्ट्रपति द्वारा, छह सदस्यीय समिति की
सिफ़ारिश पर: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा अध्यक्ष, राज्य सभा का उपसभापति,
दोनों सदनों में विपक्ष के नेता, तथा केंद्रीय गृह मंत्री।
पदावधि — 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो (2019 के संशोधन ने इसे
5 वर्ष से घटाकर 3 किया; पुनर्नियुक्ति संभव)। हटाया जाना — राष्ट्रपति द्वारा,
सिद्ध कदाचार/असमर्थता पर उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद।
सीमाएँ — एक वर्ष से पुरानी घटना की जाँच नहीं;
सशस्त्र बलों के मामलों में केवल केंद्र सरकार से प्रतिवेदन माँग सकता है;
सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं; स्वयं दंड नहीं दे सकता। इसी कारण इसे
“दाँत-रहित बाघ” कहा जाता है।
राज्य मानवाधिकार आयोग — अध्यक्ष: उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या
न्यायाधीश रहा व्यक्ति (2019 संशोधन); नियुक्ति राज्यपाल द्वारा, किंतु हटाने की
शक्ति राष्ट्रपति के पास।
वर्तमान अध्यक्ष — न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यन।
12.4 सूचना आयोग, लोकपाल, महिला आयोग, सतर्कता आयोग एवं CBI
सुमेलन-तालिका 14 : निकाय ↔ आधार-विधि ↔ संरचना ↔ नियुक्ति-समिति
निकाय
आधार एवं वर्ष
संरचना एवं पदावधि
नियुक्ति-समिति
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 — सांविधिक
मुख्य सूचना आयुक्त + अधिकतम 10 सूचना आयुक्त। 2019 के संशोधन के बाद पदावधि एवं वेतन केंद्र सरकार तय करती है (नियमों से 3 वर्ष); आयु-सीमा 65 वर्ष
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री → नियुक्ति राष्ट्रपति
लोकपाल
लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (16 जनवरी 2014 से प्रवृत्त) — सांविधिक; लोकपाल मार्च 2019 में गठित
अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य, जिनमें कम-से-कम आधे न्यायिक; तथा कम-से-कम आधे सदस्य अजा/अजजा/पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यक/महिला वर्ग से। पदावधि 5 वर्ष या 70 वर्ष
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा अध्यक्ष, लोक सभा में विपक्ष का नेता, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उनके द्वारा नामनिर्देशित उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश, तथा एक प्रख्यात विधिवेत्ता
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)
राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990; आयोग 31 जनवरी 1992 को गठित — सांविधिक
अध्यक्ष + 5 सदस्य + 1 सदस्य-सचिव; कम-से-कम एक-एक सदस्य अजा एवं अजजा से। पदावधि 3 वर्ष
केंद्र सरकार द्वारा नामनिर्देशन (कोई संवैधानिक समिति नहीं) — प्रथम अध्यक्ष जयंती पटनायक
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)
1964 में संथानम समिति की सिफ़ारिश पर संकल्प से; विनीत नारायण वाद (1997) के बाद सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 से सांविधिक
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (अध्यक्ष) + अधिकतम 2 सतर्कता आयुक्त; पदावधि 4 वर्ष या 65 वर्ष; हटाना राष्ट्रपति द्वारा, उच्चतम न्यायालय की जाँच पर
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), केंद्रीय गृह मंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता → नियुक्ति राष्ट्रपति
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
1 अप्रैल 1963, गृह मंत्रालय के संकल्प से; शक्ति दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से — न संवैधानिक, न स्वयं सांविधिक
निदेशक की न्यूनतम पदावधि 2 वर्ष (विनीत नारायण, 1997 एवं DSPE अधिनियम की धारा 4क); बाद के संशोधनों से इसे 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है
निदेशक — प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता तथा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उनके नामनिर्देशित न्यायाधीश की समिति (लोकपाल अधिनियम, 2013 द्वारा संशोधित)
लोकपाल का क्षेत्राधिकार — प्रधानमंत्री भी आते हैं, किंतु
अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष से संबंधित आरोप
वर्जित हैं; मंत्री एवं सांसद (सदन में दिए गए भाषण/मत को छोड़कर); समूह “क” से “घ” तक के अधिकारी;
सरकार द्वारा वित्तपोषित निकायों के पदाधिकारी; तथा वे संस्थाएँ जो
₹10 लाख से अधिक विदेशी अंशदान प्राप्त करती हैं। सशस्त्र बल क्षेत्राधिकार
से बाहर हैं। लोकपाल के पास जाँच स्कंध एवं अभियोजन स्कंध होते हैं, और उसके द्वारा CBI को
निर्दिष्ट मामलों के अधिकारियों का स्थानांतरण लोकपाल की स्वीकृति के बिना नहीं हो सकता।
वर्तमान अध्यक्ष — न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर (10 मार्च 2024 से); प्रथम अध्यक्ष —
न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष।
लोकायुक्त — राज्य स्तर की संस्था, जिसकी सिफ़ारिश प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग
(1966–70) ने अपनी “नागरिकों की शिकायतों के निवारण” संबंधी अंतरिम रिपोर्ट (1966) में की थी।
ओडिशा ने सबसे पहले 1970 में विधि बनाई, किंतु उसे लागू 1983 में किया;
महाराष्ट्र पहला राज्य था जहाँ लोकायुक्त वस्तुतः स्थापित हुआ (1971 का
अधिनियम, 1972 में कार्यारंभ)। नियुक्ति राज्यपाल द्वारा, प्रायः उच्च न्यायालय के मुख्य
न्यायमूर्ति एवं विपक्ष के नेता से परामर्श के बाद; सिफ़ारिशें परामर्शी।
CBI की एक विशेष सीमा — दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के
अनुसार किसी राज्य में जाँच के लिए उस राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है। कई राज्यों ने अपनी
“सामान्य सहमति” वापस ले ली है — तब CBI को हर मामले में अलग सहमति या न्यायालय का आदेश चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने 2013 में कोयला-आवंटन मामले में CBI को “पिंजरे में बंद तोता” कहा था।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP लोकायुक्त एवं राज्य आयोग
उत्तर प्रदेश लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1975 पारित हुआ और संस्था
14 सितंबर 1977 को अस्तित्व में आई — देश के आरंभिक लोकायुक्तों में से एक।
UP में राज्य मानवाधिकार आयोग (लखनऊ), राज्य सूचना आयोग,
राज्य महिला आयोग, राज्य अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग एवं
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग कार्यरत हैं — ये सभी सांविधिक निकाय हैं,
संवैधानिक नहीं। इनका विस्तृत विवरण भाग 8 में है।
राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली
समिति (मुख्यमंत्री, विधान सभा में विपक्ष का नेता, तथा मुख्यमंत्री द्वारा नामनिर्देशित एक कैबिनेट मंत्री) की
सिफ़ारिश पर — केंद्र वाली संरचना का ठीक राज्य-रूप।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (निकाय) (प्रकृति) 1. वित्त आयोग — संवैधानिक निकाय 2. नीति आयोग — सांविधिक निकाय 3. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग — संवैधानिक निकाय नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)नीति आयोग किसी अधिनियम से नहीं, केंद्रीय मंत्रिमंडल के संकल्प (1 जनवरी 2015) से बना है — अतः वह सांविधिक भी नहीं, केवल कार्यपालक निकाय है; युग्म 2 गलत। वित्त आयोग (अनु. 280) एवं NCBC (अनु. 338ख, 102वाँ संशोधन) दोनों संवैधानिक हैं।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (निकाय) सूची-II (आधार-विधि/वर्ष) A. केंद्रीय सतर्कता आयोग 1. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 B. लोकपाल 2. सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 C. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग 3. दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 D. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 4. लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 कूट:
उत्तर: (C)CVC — सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003; लोकपाल — लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013; NHRC — मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993; CBI — दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से शक्ति। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।
प्र.3राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. 2019 के संशोधन के बाद उच्चतम न्यायालय का कोई भी भूतपूर्व न्यायाधीश आयोग का अध्यक्ष बन सकता है। 2. आयोग एक वर्ष से अधिक पुरानी घटना की जाँच नहीं कर सकता। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)2019 के संशोधन ने अध्यक्ष की पात्रता पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति से बढ़ाकर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश तक कर दी — कथन 1 सही। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के अनुसार आयोग एक वर्ष से पुरानी घटना की जाँच नहीं कर सकता — कथन 2 भी सही।
13. लोक नीति एवं अधिकार-मुद्दे — RTI, RTE, सेवा का अधिकार, नागरिक अधिकार-पत्र, ई-गवर्नेंस
13.1 सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005
सूचना का अधिकार किसी नए अनुच्छेद से नहीं आया — यह अनुच्छेद 19(1)(क) की
वाक्-स्वातंत्र्य से निकला हुआ अधिकार है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण (1975) तथा एस.पी. गुप्ता (1981) में मान्यता दी।
विधिक रूप 2005 में मिला।
पारित — 15 जून 2005; पूर्णतः प्रवृत्त 12 अक्टूबर 2005। इसने
सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 का स्थान लिया, जो कभी लागू ही नहीं हुआ।
कौन आवेदन कर सकता है — केवल भारत का नागरिक (कंपनी या संस्था नहीं)।
कारण बताना आवश्यक नहीं।
समय-सीमा — सामान्यतः 30 दिन; सहायक लोक सूचना अधिकारी के माध्यम से
आवेदन देने पर 35 दिन; और यदि सूचना का संबंध व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता
से हो तो 48 घंटे।
अपील — प्रथम अपील उसी लोक प्राधिकारी के प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास
(30 दिन के भीतर); द्वितीय अपील केंद्रीय/राज्य सूचना आयोग में (90 दिन के भीतर)।
शास्ति — सूचना देने में विलंब पर ₹250 प्रतिदिन, अधिकतम ₹25,000।
छूट (धारा 8) — प्रभुसत्ता एवं अखंडता, सुरक्षा, विदेश-संबंध, न्यायालय की अवमानना,
विशेषाधिकार-भंग, वाणिज्यिक गोपनीयता, न्यासीय संबंध, विदेशी सरकार से गोपनीय रूप में प्राप्त सूचना,
जाँच-प्रक्रिया में बाधा, मंत्रिमंडल के पत्र (निर्णय हो जाने के बाद कारण प्रकट किए जा सकते हैं), तथा
व्यक्तिगत सूचना।
धारा 24 — दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध आसूचना एवं सुरक्षा संगठन अधिनियम से
बाहर हैं; किंतु भ्रष्टाचार एवं मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित सूचना उनसे भी
माँगी जा सकती है।
RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019 — मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्तों तथा राज्य सूचना आयुक्तों
की पदावधि, वेतन एवं सेवा-शर्तें अब केंद्र सरकार नियमों द्वारा तय करती है (पहले पदावधि
5 वर्ष तथा वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समकक्ष अधिनियम में ही निर्धारित था)। इसे आयोगों की स्वायत्तता
घटाने वाला कदम माना गया।
नवीनतम परिवर्तन — डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 ने
RTI की धारा 8(1)(ञ) को संशोधित कर व्यक्तिगत सूचना की छूट को व्यापक कर दिया;
पहले वहाँ उपलब्ध “व्यापक लोकहित” वाली शर्त हटा दी गई — यह वर्तमान बहस का बड़ा विषय है।
उच्चतम न्यायालय ने CPIO, उच्चतम न्यायालय बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल (2019) में
स्वयं भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के कार्यालय को भी “लोक प्राधिकारी” माना।
13.2 शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009
संवैधानिक आधार — 86वाँ संविधान संशोधन, 2002 ने
अनुच्छेद 21क (6–14 वर्ष के बालकों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा), अनुच्छेद
45 का नया विषय (6 वर्ष से कम आयु के बालकों की देखभाल एवं शिक्षा) तथा मौलिक कर्तव्य
51क(ट) जोड़े। विस्तार अध्याय 4.2 में।
अधिनियम — बालकों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009;
अनुमति 26 अगस्त 2009; प्रवृत्त 1 अप्रैल 2010।
मुख्य उपबंध — प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा; निजी
गैर-सहायताप्राप्त विद्यालयों में कक्षा I में कम-से-कम 25% स्थान दुर्बल एवं अलाभित वर्ग के
बालकों के लिए; प्रवेश-शुल्क (capitation fee) एवं छँटनी-प्रक्रिया (screening) पर रोक;
किसी भी समय आयु-अनुरूप कक्षा में प्रवेश; निष्कासन एवं शारीरिक दंड पर रोक; शिक्षक-छात्र अनुपात एवं
अवसंरचना के मानक; विद्यालय प्रबंध समिति जिसमें 75% अभिभावक हों;
शिक्षकों की निजी ट्यूशन पर रोक तथा उन्हें जनगणना, आपदा-राहत एवं निर्वाचन के अतिरिक्त किसी
गैर-शैक्षिक कार्य में न लगाना।
अ-निरोध नीति (no-detention) — मूल अधिनियम में कक्षा 8 तक किसी बालक को रोका नहीं जा सकता था;
2019 के संशोधन ने राज्यों को अनुमति दी कि वे कक्षा 5 एवं 8 में नियमित
परीक्षा ले सकें और असफल बालक को उपचारात्मक शिक्षा के बाद पुन: अवसर देकर, फिर भी असफल रहने पर उसी कक्षा में
रोक सकें।
न्यायिक स्थिति — सोसाइटी फ़ॉर अन-एडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ़ राजस्थान बनाम भारत संघ
(2012) में अधिनियम संवैधानिक ठहराया गया; प्रमति एजुकेशनल ट्रस्ट (2014) में यह कहा गया कि
अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं (सहायताप्राप्त एवं गैर-सहायताप्राप्त दोनों) पर 25% वाला उपबंध
लागू नहीं होगा — अनुच्छेद 30(1) के कारण।
2012 के संशोधन ने दिव्यांग बालकों को भी स्पष्ट रूप से इसके दायरे में लाया; निगरानी का
दायित्व राष्ट्रीय/राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को दिया गया।
13.3 सेवा का अधिकार
यह राज्यों का विषय है — केंद्र में नागरिकों को वस्तु एवं सेवाओं की समयबद्ध प्रदायगी
तथा उनकी शिकायतों के निवारण संबंधी विधेयक, 2011 लाया गया था, किंतु वह पारित नहीं हुआ।
मध्य प्रदेश पहला राज्य था जिसने ऐसा कानून बनाया — मध्य प्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान
की गारंटी अधिनियम, 2010 (18 अगस्त 2010 से प्रवृत्त)। इसके बाद बिहार, दिल्ली, राजस्थान,
उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों ने अपने अधिनियम बनाए।
साझा ढाँचा — अधिसूचित सेवाओं की सूची; प्रत्येक सेवा के लिए नियत समय-सीमा;
पदाभिहित अधिकारी; विलंब पर प्रथम एवं द्वितीय अपील; तथा दोषी अधिकारी पर
शास्ति, जिसकी वसूली प्रायः उसके वेतन से होती है। मूल विचार यही है कि सेवा कृपा नहीं,
अधिकार है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — जनहित गारंटी अधिनियम एवं जनसुनवाई
उत्तर प्रदेश जनहित गारंटी अधिनियम, 2011 राज्य में अधिसूचित लोक सेवाओं (जाति, आय, निवास,
जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, खतौनी की नकल आदि) की समयबद्ध प्रदायगी सुनिश्चित करता है; विलंब पर पदाभिहित अधिकारी
पर शास्ति का उपबंध है।
सेवा-प्रदायगी का व्यावहारिक मंच ई-डिस्ट्रिक्ट उत्तर प्रदेश तथा
जन सुविधा केंद्र हैं; शिकायत-निवारण के लिए
एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (IGRS) — “जनसुनवाई” पोर्टल तथा
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076, और आपात सेवाओं के लिए UP-112 हैं।
निवेश एवं व्यवसाय से जुड़ी अनुमतियों के लिए “निवेश मित्र” एकल-खिड़की पोर्टल राज्य के
ई-गवर्नेंस का सर्वाधिक उद्धृत उदाहरण है; भूमि-अभिलेखों के लिए “भूलेख” तथा
रजिस्ट्री के लिए “इग्रसरा/स्टांप एवं निबंधन” पोर्टल कार्यरत हैं। विस्तार भाग 8 में।
13.4 नागरिक अधिकार-पत्र (Citizens' Charter)
उद्गम — ब्रिटेन, 1991, प्रधानमंत्री जॉन मेजर की
सरकार द्वारा। भारत में इसे 1997 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में स्वीकृत
“प्रभावी एवं उत्तरदायी सरकार की कार्य-योजना” के अंतर्गत अपनाया गया; समन्वय
प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) करता है।
छह सिद्धांत — गुणवत्ता, विकल्प, मानक, मूल्य (value for money), जवाबदेही
एवं पारदर्शिता।
सेवोत्तम (Sevottam) मॉडल, 2005 — तीन घटक: (i) नागरिक अधिकार-पत्र एवं सेवा-प्रदायगी,
(ii) लोक शिकायत निवारण, (iii) सेवा-प्रदायगी क्षमता।
सीमा — यह विधितः प्रवर्तनीय नहीं है; इसी कारण
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी 12वीं रिपोर्ट — “नागरिक-केंद्रित प्रशासन”
(2009) में सिफ़ारिश की कि अधिकार-पत्र एक-आकार-सबके-लिए न हों, प्रत्येक संगठन अपना बनाए, उनमें
उपचार एवं क्षतिपूर्ति का उपबंध हो, और उन्हें सेवा का अधिकार जैसी विधियों से
प्रवर्तनीय बनाया जाए।
13.5 ई-गवर्नेंस
चार अंतःक्रिया-मॉडल — G2C (सरकार से नागरिक), G2B
(सरकार से व्यवसाय), G2G (सरकार से सरकार), G2E (सरकार से कर्मचारी)।
SMART शासन — Simple, Moral, Accountable, Responsive, Transparent
(सरल, नैतिक, जवाबदेह, उत्तरदायी एवं पारदर्शी)।
राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP), 2006 — 27 मिशन मोड परियोजनाएँ
(बाद में बढ़कर 31), आठ सहायक घटक; इसका उन्नत रूप ई-क्रांति (NeGP 2.0), जो
डिजिटल इंडिया (1 जुलाई 2015) का एक स्तंभ है।
डिजिटल इंडिया के तीन दृष्टि-क्षेत्र — प्रत्येक नागरिक के लिए
उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना; माँग पर शासन एवं सेवाएँ;
नागरिकों का डिजिटल सशक्तीकरण — और इसके नौ स्तंभ (ब्रॉडबैंड हाईवे,
मोबाइल कनेक्टिविटी, सार्वजनिक इंटरनेट पहुँच, ई-गवर्नेंस, ई-क्रांति, सबके लिए सूचना, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण,
रोज़गार के लिए सूचना-प्रौद्योगिकी, तथा शीघ्र-लाभ कार्यक्रम)।
प्रमुख मंच — UMANG, DigiLocker, MyGov, e-Office, e-Courts, CSC (साझा सेवा केंद्र),
राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली, GeM (सरकारी ई-बाज़ार), PRAGATI, डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र, आधार एवं UPI।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की 11वीं रिपोर्ट — “ई-गवर्नेंस को बढ़ावा:
स्मार्ट मार्ग” (2008) इस विषय की मानक सिफ़ारिश-सूची है: पहले प्रक्रिया-सरलीकरण, फिर कंप्यूटरीकरण।
चुनौतियाँ — डिजिटल विभाजन (ग्रामीण-नगरीय एवं लैंगिक), भाषा-बाधा, साइबर सुरक्षा एवं
डेटा गोपनीयता (अब डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अधीन), तथा
विभागों के बीच अंतर-प्रचालनीयता का अभाव।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. आवेदक को सूचना माँगने का कारण बताना आवश्यक है। 2. जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित सूचना 48 घंटे के भीतर देनी होती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अधिनियम की धारा 6(2) के अनुसार आवेदक को कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं — कथन 1 गलत। धारा 7(1) के परंतुक के अनुसार जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित सूचना 48 घंटे में देनी होती है — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
Aशिक्षा का अधिकार अधिनियम — 1 अप्रैल 2010 से प्रवृत्तBसेवा की गारंटी संबंधी प्रथम राज्य विधि — मध्य प्रदेश, 2010Cनागरिक अधिकार-पत्र की अवधारणा — भारत में 1991 में आरंभDसेवोत्तम मॉडल — सेवा-प्रदायगी, शिकायत-निवारण एवं क्षमता के तीन घटक
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)नागरिक अधिकार-पत्र की अवधारणा ब्रिटेन में 1991 में आरंभ हुई; भारत में इसे 1997 के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में अपनाई गई कार्य-योजना के अंतर्गत लागू किया गया। शेष तीनों युग्म सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): शिक्षा का अधिकार अधिनियम का 25% आरक्षण वाला उपबंध अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं पर लागू नहीं होता। कारण (R): उच्चतम न्यायालय ने प्रमति एजुकेशनल ट्रस्ट (2014) में कहा कि यह उपबंध अनुच्छेद 30(1) के अधीन अल्पसंख्यकों के अधिकार का अतिक्रमण करेगा। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट (2014) में संविधान पीठ ने सहायताप्राप्त एवं गैर-सहायताप्राप्त — दोनों प्रकार की अल्पसंख्यक संस्थाओं को RTE के 25% उपबंध से बाहर रखा, क्योंकि वह अनुच्छेद 30(1) के अधिकार को क्षीण करता। अतः दोनों सही हैं और (R) ही (A) का कारण है।
14. एक दृष्टि में — अनुच्छेद-सूची, कालक्रम एवं निर्णायक तथ्य
14.1 निर्णायक संख्याएँ
29ग्यारहवीं अनुसूची के विषय
18बारहवीं अनुसूची के विषय
16भाग IX के अनुच्छेद (243–243ण)
18भाग IXक के अनुच्छेद (243त–243यछ)
1/3पंचायत/नगरपालिका में महिला आरक्षण
21चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु
5 वर्षपंचायत/नगरपालिका का कार्यकाल
6 माहविघटन के बाद चुनाव की सीमा
20 लाखमध्यवर्ती स्तर की छूट-सीमा
3 लाखवार्ड समिति अनिवार्यता
10 लाखमहानगर क्षेत्र की परिभाषा
41%16वें वित्त आयोग का हस्तांतरण
14.2 सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची — इस अध्याय के सभी उपबंध
सुमेलन-तालिका 15 : अनुच्छेद ↔ विषय — एक ही स्थान पर
अनुच्छेद
विषय
40
ग्राम पंचायतों का संगठन — नीति-निदेशक तत्व
76 · 88
भारत का महान्यायवादी · सदनों में बोलने का अधिकार (मत का नहीं)
102 · 103
सांसदों की निरर्हता के आधार · निरर्हता का विनिश्चय (राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की सलाह पर)
148 · 149 · 150 · 151
नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक — नियुक्ति/सेवा-शर्तें · कर्तव्य · लेखाओं का प्रारूप · संपरीक्षा प्रतिवेदन
165 · 177
राज्य का महाधिवक्ता · राज्य विधानमंडल में बोलने का अधिकार
191 · 192
विधायकों की निरर्हता के आधार · निरर्हता का विनिश्चय (राज्यपाल, आयोग की सलाह पर)
243 – 243ण
भाग IX — पंचायतें (73वाँ संशोधन)
243क · 243घ · 243छ · 243झ · 243ट · 243ड
ग्राम सभा · आरक्षण · शक्तियाँ (11वीं अनुसूची) · राज्य वित्त आयोग · राज्य निर्वाचन आयोग · अपवर्जित क्षेत्र
243त – 243यछ
भाग IXक — नगरपालिकाएँ (74वाँ संशोधन)
243थ · 243ध · 243ब · 243म · 243यक · 243यघ · 243यङ
तीन प्रकार की नगरपालिकाएँ · वार्ड समिति · शक्तियाँ (12वीं अनुसूची) · वित्त आयोग · निर्वाचन · जिला योजना समिति · महानगर योजना समिति
263 · 279क · 280 · 281
अंतर-राज्य परिषद · जीएसटी परिषद · वित्त आयोग · आयोग की सिफ़ारिशें संसद के समक्ष
315 – 323
संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग — 316 नियुक्ति/पदावधि · 317 हटाना · 319 बाद की पात्रता · 320 कार्य · 322 व्यय भारित · 323 प्रतिवेदन
324 – 329
भाग XV — निर्वाचन: 324 आयोग · 325 एक सामान्य नामावली · 326 वयस्क मताधिकार · 327/328 विधि-निर्माण · 329 न्यायालय-वर्जन
330क · 332क · 334क
106वाँ संशोधन, 2023 — लोक सभा एवं विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान
338 · 338क · 338ख · 342क
NCSC · NCST · NCBC · सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों का विनिर्दिष्टीकरण
350 · 350क · 350ख
अभ्यावेदन की भाषा · प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा · भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी
14.3 सम्पूर्ण कालक्रम
कालक्रम : स्थानीय शासन, निर्वाचन एवं निकाय — 1926 से 2026 तक
वर्ष
घटना
1926
ली आयोग की सिफ़ारिश पर लोक सेवा आयोग की स्थापना (1 अक्टूबर); प्रथम अध्यक्ष सर रॉस बार्कर
1935 · 1937
भारत शासन अधिनियम से संघीय लोक सेवा आयोग; उत्तर प्रदेश (संयुक्त प्रांत) लोक सेवा आयोग की स्थापना — 1 अप्रैल 1937
1947 · 1950
संयुक्त प्रांत पंचायत राज अधिनियम, 1947 · निर्वाचन आयोग की स्थापना — 25 जनवरी 1950; योजना आयोग — 15 मार्च 1950
1950 · 1951
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 एवं 1951; प्रथम वित्त आयोग — के.सी. नियोगी (1951)
1952 · 1953
सामुदायिक विकास कार्यक्रम · राष्ट्रीय प्रसार सेवा · राष्ट्रीय विकास परिषद (1952)
1956
7वाँ संविधान संशोधन — अनुच्छेद 350क एवं 350ख (राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिश पर)
1957 · 1959
बलवंत राय मेहता समिति · राजस्थान के नागौर में पंचायती राज का उद्घाटन (2 अक्टूबर 1959)
1963 · 1964
CBI की स्थापना (1 अप्रैल 1963) · संथानम समिति की सिफ़ारिश पर केंद्रीय सतर्कता आयोग
1966 · 1970 · 1971
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग की लोकपाल/लोकायुक्त सिफ़ारिश · ओडिशा का पहला लोकायुक्त कानून · महाराष्ट्र में लोकायुक्त की वास्तविक स्थापना
1975 · 1977
तारकुंडे समिति · उत्तर प्रदेश लोकायुक्त अधिनियम, 1975 → संस्था 14 सितंबर 1977 से
1977–78 · 1985 · 1986 · 1988
अशोक मेहता · जी.वी.के. राव · एल.एम. सिंघवी · थुंगन एवं गाडगिल समितियाँ
1988 · 1989
61वाँ संशोधन — मतदान आयु 18 · EVM को विधिक मान्यता एवं दलों का पंजीकरण (धारा 29क) · 64वाँ एवं 65वाँ विधेयक राज्य सभा में असफल · निर्वाचन आयोग अस्थायी रूप से तीन-सदस्यीय
1990 · 1992
65वाँ संशोधन — अजा/अजजा आयोग को संवैधानिक दर्जा · राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (आयोग 31 जनवरी 1992) · दिनेश गोस्वामी समिति (1990)
1992 · 1993
73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन पारित · प्रवृत्त 24 अप्रैल 1993 एवं 1 जून 1993 · मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 · निर्वाचन आयोग स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय (1 अक्टूबर 1993) · वोहरा समिति
1994 · 1996
उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना — 23 अप्रैल 1994 · पेसा अधिनियम — 24 दिसंबर 1996
1997 · 1998
विनीत नारायण निर्णय एवं नागरिक अधिकार-पत्र की कार्य-योजना · इंद्रजीत गुप्ता समिति (चुनावों के राज्य वित्त-पोषण पर)
2002 · 2003
86वाँ संशोधन — अनुच्छेद 21क · 89वाँ संशोधन — 338क (प्रभावी 19 फ़रवरी 2004) · सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 · राज्य सभा चुनाव में खुला मतपत्र
2005 · 2009 · 2010
सूचना का अधिकार अधिनियम (12 अक्टूबर 2005 से पूर्णतः प्रवृत्त) · शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (1 अप्रैल 2010 से) · मध्य प्रदेश लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2010
2013 · 2014
लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (16 जनवरी 2014 से प्रवृत्त) · NOTA (27 सितंबर 2013) · लिली थॉमस (10 जुलाई 2013) · VVPAT का प्रथम प्रयोग (नोकसेन, नागालैंड)
2015 · 2016
नीति आयोग — 1 जनवरी 2015 · डिजिटल इंडिया (1 जुलाई 2015) · 101वाँ संशोधन — जीएसटी परिषद (अनु. 279क)
2018 · 2019
102वाँ संशोधन — 338ख (NCBC) · RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019 · मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 · लोकपाल का गठन (मार्च 2019) · सभी मतदान केंद्रों पर VVPAT
2021 · 2023
105वाँ संशोधन — राज्यों की SEBC सूची-शक्ति बहाल · निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021 · अनूप बरनवाल (2 मार्च 2023) · CEC/EC नियुक्ति अधिनियम, 2023 · 106वाँ संशोधन (महिला आरक्षण) · 16वें वित्त आयोग का गठन — 31 दिसंबर 2023
2024 · 2025 · 2026
निर्वाचन बॉण्ड असंवैधानिक (15 फ़रवरी 2024) · 100% VVPAT की माँग अस्वीकृत (अप्रैल 2024) · 129वाँ संशोधन विधेयक (“एक राष्ट्र, एक चुनाव”) संयुक्त संसदीय समिति को · 16वें वित्त आयोग का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को (17 नवंबर 2025) एवं संसद में प्रस्तुत (1 फ़रवरी 2026)
14.4 रटने योग्य निर्णायक तथ्य
73वाँ — भाग IX, अनुच्छेद 243–243ण, ग्यारहवीं
अनुसूची, 29 विषय, प्रवृत्त 24 अप्रैल 1993।
74वाँ — भाग IXक, अनुच्छेद 243त–243यछ,
बारहवीं अनुसूची, 18 विषय, प्रवृत्त 1 जून 1993।
पंचायती राज लागू करने वाला पहला राज्य — राजस्थान (नागौर, 2 अक्टूबर 1959); दूसरा —
आंध्र प्रदेश (1 नवंबर 1959)।
राज्य वित्त आयोग — 243झ (राज्यपाल); राज्य निर्वाचन आयोग — 243ट (राज्यपाल);
केंद्रीय वित्त आयोग — 280 (राष्ट्रपति, अध्यक्ष + 4 सदस्य)।
पेसा, 1996 — 10 राज्यों के पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में;
अजजा आरक्षण आधे से कम नहीं; नामनिर्देशन 1/10 तक; गौण खनिज पर ग्राम सभा की
पूर्व-सिफ़ारिश अनिवार्य।
हटाने की रीति — CAG एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से;
UPSC/SPSC के सदस्य: केवल राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय की जाँच पर;
राज्य निर्वाचन आयुक्त: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से।
संचित निधि पर भारित — CAG, UPSC एवं SPSC के व्यय; निर्वाचन आयोग के व्यय
भारित नहीं हैं।
महिला आरक्षण की दो अलग बातें — पंचायत/नगरपालिका में 1/3
(73वाँ/74वाँ, 1992); लोक सभा एवं विधान सभाओं में 1/3 (106वाँ, 2023, परंतु
जनगणना एवं परिसीमन के बाद प्रभावी)।
व्यय-सीमा — लोक सभा ₹95 लाख/₹75 लाख; विधान सभा
₹40 लाख/₹28 लाख; राजनीतिक दल पर कोई सीमा नहीं।
संवैधानिक नहीं — नीति आयोग, CBI, लोकपाल/लोकायुक्त, NHRC/SHRC, CIC/SIC, NCW, CVC,
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, NCPCR, संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग।
संवैधानिक — निर्वाचन आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग, UPSC/SPSC, CAG, महान्यायवादी,
महाधिवक्ता, वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग, NCSC, NCST, NCBC, भाषाई अल्पसंख्यक विशेष अधिकारी,
जीएसटी परिषद, अंतर-राज्य परिषद।
उत्तर प्रदेश — देश में सर्वाधिक ग्राम पंचायतें (लगभग 58 हज़ार) तथा
सर्वाधिक नगरीय निकाय (762 = 17 + 200 + 545); UPPSC की स्थापना
1 अप्रैल 1937; राज्य निर्वाचन आयोग 23 अप्रैल 1994; लोकायुक्त
14 सितंबर 1977।
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (निकाय/पद) सूची-II (पदावधि अथवा आयु-सीमा) A. संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य 1. 4 वर्ष या 65 वर्ष B. राज्य लोक सेवा आयोग का सदस्य 2. 3 वर्ष या 70 वर्ष C. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त 3. 6 वर्ष या 62 वर्ष D. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष 4. 6 वर्ष या 65 वर्ष कूट:
उत्तर: (C)UPSC सदस्य — 6 वर्ष या 65 वर्ष; SPSC सदस्य — 6 वर्ष या 62 वर्ष; केंद्रीय सतर्कता आयुक्त — 4 वर्ष या 65 वर्ष; NHRC अध्यक्ष — 3 वर्ष या 70 वर्ष (2019 संशोधन)। अतः A-4, B-3, C-1, D-2 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विषय) 1. अनुच्छेद 243ब — नगरपालिकाओं की शक्तियाँ एवं बारहवीं अनुसूची 2. अनुच्छेद 243यङ — जिला योजना समिति 3. अनुच्छेद 243ण — पंचायत-निर्वाचन में न्यायालयीय हस्तक्षेप का वर्जन नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 243यङमहानगर योजना समिति से संबंधित है; जिला योजना समिति अनुच्छेद 243यघ में है — युग्म 2 गलत। 243ब (नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, बारहवीं अनुसूची) एवं 243ण (न्यायालय-वर्जन) सही हैं।
प्र.3निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. पेसा अधिनियम का अधिनियमन 2. सूचना का अधिकार अधिनियम का पूर्णतः प्रवृत्त होना 3. 74वें संविधान संशोधन का प्रवृत्त होना 4. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A3, 1, 4, 2B3, 1, 2, 4C1, 3, 4, 2D1, 3, 2, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)74वाँ संशोधन प्रवृत्त — 1 जून 1993; पेसा — 24 दिसंबर 1996; RTI पूर्णतः प्रवृत्त — 12 अक्टूबर 2005; NCBC को संवैधानिक दर्जा (102वाँ संशोधन) — 2018। अतः क्रम 3, 1, 2, 4 है।