भाग 4 · भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

4.5 न्यायपालिका

एकीकृत न्याय-व्यवस्था, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय, न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक समीक्षा, मूल ढाँचा सिद्धांत, अधिकरण तथा वैकल्पिक विवाद समाधान

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विषय-सूची

  1. एकीकृत न्याय व्यवस्था एवं न्यायिक स्वतंत्रता के उपबंध
  2. उच्चतम न्यायालय — गठन, अर्हता, नियुक्ति, कार्यकाल एवं हटाने की प्रक्रिया
  3. उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता एवं शक्तियाँ — 131 से 143 तथा 129, 136, 137, 141, 142
  4. न्यायाधीशों की नियुक्ति का विकास — तीन न्यायाधीश वाद, कॉलेजियम, NJAC, MoP
  5. उच्च न्यायालय — गठन, नियुक्ति, स्थानांतरण, अनुच्छेद 226, 227 एवं 224क
  6. अधीनस्थ न्यायालय एवं अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रश्न
  7. न्यायिक समीक्षा — आधार, दायरा एवं सीमाएँ
  8. न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका
  9. मूल ढाँचा सिद्धांत — केशवानंद से आगे
  10. अधिकरण — अनुच्छेद 323क एवं 323ख तथा एल. चंद्रकुमार वाद
  11. लोक अदालत, ग्राम न्यायालय, विधिक सेवा प्राधिकरण एवं वैकल्पिक विवाद समाधान
  12. समकालीन मुद्दे, सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम
इस अध्याय का परीक्षा-भार उच्च

2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था एवं शासन से लगभग 19–20 प्रश्न आए, और न्यायपालिका इस विषय का वह हिस्सा है जो अनुच्छेद-संख्या के रूप में सबसे सीधे पूछा जाता है। यहाँ प्रश्न चार रूपों में बनता है — (क) सूची सुमेलन : अनुच्छेद ↔ विषय, उच्च न्यायालय ↔ अधिकार-क्षेत्र, वाद ↔ सिद्धांत, अधिकरण ↔ स्थापना-वर्ष; (ख) कालक्रम : न्यायाधीश-नियुक्ति वादों तथा मूल ढाँचा वादों का क्रम; (ग) दो-कथन, जिसमें एक शब्द (“उपस्थित एवं मतदान करने वाले” बनाम “कुल सदस्य”, “केवल”, “परामर्श” बनाम “सहमति”) उत्तर पलट देता है; (घ) “कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है”। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में सुमेलन-तालिका है और अध्याय के अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची तथा तिथि-सूची अलग से दी गई है।

इस अध्याय की सीमा

पाँच रिटों का विस्तृत विवेचन — उनका शाब्दिक अर्थ, किसके विरुद्ध जारी होती हैं, कब नहीं होतीं — अध्याय 4.2 में है; यहाँ रिट केवल अधिकारिता के संदर्भ में आती हैं, दोहराई नहीं गईं। संसद, राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद तथा राज्य कार्यपालिका अध्याय 4.4 में हैं; निर्वाचन आयोग, CAG, UPSC, वित्त आयोग जैसे संवैधानिक निकाय अध्याय 4.6 में; आपातकाल के अधीन अनुच्छेद 359 का प्रभाव अध्याय 4.3 में।

1. एकीकृत न्याय व्यवस्था एवं न्यायिक स्वतंत्रता के उपबंध

1.1 “एकीकृत” का अर्थ — और यह अमेरिका से क्यों भिन्न है

भारत का शासन-ढाँचा संघीय है, पर न्यायपालिका एकीकृत (integrated / single unified judiciary) है। इसका अर्थ है — पूरे देश के लिए एक ही न्यायालय-पिरामिड, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय है, उसके नीचे उच्च न्यायालय, और उनके नीचे जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय। यही एक शृंखला केंद्रीय विधियों और राज्य विधियों — दोनों को लागू करती है।

अमेरिका में इसके विपरीत दोहरी न्याय व्यवस्था (dual judiciary) है — संघीय विधियों के लिए अलग संघीय न्यायालय, और राज्य विधियों के लिए अलग राज्य न्यायालय। भारत ने यह ढाँचा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया, जहाँ 1937 में फेडरल कोर्ट (Federal Court) की स्थापना हुई थी। संविधान सभा ने जानबूझकर एकीकृत ढाँचा चुना, क्योंकि दोहरी व्यवस्था से विधि की व्याख्या में विविधता तथा अधिकारिता के विवाद बढ़ते।

1.2 न्यायिक स्वतंत्रता — संविधान ने इसे किन उपबंधों से सुरक्षित किया

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है — न्यायाधीश निर्णय देते समय कार्यपालिका, विधायिका या किसी अन्य बाहरी दबाव से मुक्त हो। संविधान ने इसे किसी एक अनुच्छेद में घोषित नहीं किया; इसे कई छोटे-छोटे व्यावहारिक उपबंधों से गूँथा है। यही उपबंध सुमेलन-प्रश्न का सबसे प्रिय विषय हैं।

सुमेलन-तालिका 1 : न्यायिक स्वतंत्रता का उपबंध ↔ संबंधित अनुच्छेद
उपबंधउच्चतम न्यायालयउच्च न्यायालयटिप्पणी
नियुक्ति में न्यायपालिका की भागीदारीअनु. 124(2)अनु. 217(1)राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं, पर मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य — 1993 के बाद यह “सहमति” में बदल गया
पद की सुरक्षा — केवल सिद्ध कदाचार/असमर्थता पर हटानाअनु. 124(4), (5)अनु. 217(1)(ख) तथा 218अनु. 218 उच्चतम न्यायालय वाली प्रक्रिया (124(4) एवं (5)) उच्च न्यायालय पर भी लागू करता है
वेतन/भत्ते नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से नहीं बदले जा सकतेअनु. 125अनु. 221एकमात्र अपवाद — वित्तीय आपातकाल (अनु. 360)
व्यय संचित निधि पर भारित — मतदेय नहींअनु. 146(3) — भारत की संचित निधिअनु. 229(3) — राज्य की संचित निधिन्यायाधीशों की पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित होती है — दोनों के लिए
आचरण पर विधानमंडल में चर्चा नहींअनु. 121 (संसद) एवं अनु. 211 (राज्य विधानमंडल)अपवाद — हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो तब। अनु. 211 में तो यह अपवाद भी नहीं दिया गया
अभिलेख न्यायालय एवं अवमान की शक्तिअनु. 129अनु. 215न्यायालय अपनी गरिमा की रक्षा स्वयं कर सके
अधिकारिता बढ़ाई जा सकती है, घटाई नहींअनु. 138 (संसद बढ़ा सकती है)अनु. 225 (विद्यमान अधिकारिता बनी रहती है)संसद उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संकुचित नहीं कर सकती
सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर रोकअनु. 124(7) — भारत में किसी भी न्यायालय/प्राधिकारी के समक्ष नहींअनु. 220 — उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर कहीं नहींयह भेद सर्वाधिक पूछा जाता है — 124(7) पूर्ण रोक, 220 आंशिक
कर्मचारियों की नियुक्ति न्यायालय स्वयं करेअनु. 146 — मुख्य न्यायमूर्तिअनु. 229 — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्तिप्रशासनिक स्वायत्तता
कार्यपालिका से पृथक्करणअनु. 50 — राज्य के नीति-निदेशक तत्वयह वाद-योग्य नहीं है, पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 ने इसे व्यवहार में उतारा
सावधानी — अनुच्छेद 121 बनाम 211
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (संविधान का भाग/अध्याय)    सूची-II (अनुच्छेद)
A. संघ की न्यायपालिका   1. 233–237
B. उच्च न्यायालय   2. 323क एवं 323ख
C. अधीनस्थ न्यायालय   3. 124–147
D. अधिकरण   4. 214–231
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)संघ की न्यायपालिका — भाग V, अध्याय IV, अनुच्छेद 124–147; उच्च न्यायालय — भाग VI, अध्याय V, अनुच्छेद 214–231; अधीनस्थ न्यायालय — भाग VI, अध्याय VI, अनुच्छेद 233–237; अधिकरण — भाग XIV-क, अनुच्छेद 323क एवं 323ख। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।

प्र.2 न्यायाधीशों पर सेवानिवृत्ति के बाद वकालत की रोक के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत में किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन नहीं कर सकता।
2. उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 124(7) उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पर पूर्ण रोक लगाता है, जबकि अनुच्छेद 220 उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन की छूट देता है। दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारत में एकीकृत न्याय व्यवस्था है।
कारण (R): भारत में केंद्रीय विधियों तथा राज्य विधियों के लिए अलग-अलग न्यायालय-शृंखलाएँ हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)भारत में एकीकृत न्यायपालिका है — अतः (A) सही है। किंतु अलग-अलग शृंखलाएँ होना दोहरी न्याय व्यवस्था (अमेरिका) का लक्षण है; भारत में एक ही शृंखला दोनों प्रकार की विधियाँ लागू करती है। अतः (R) गलत है।

2. उच्चतम न्यायालय — गठन, अर्हता, नियुक्ति, कार्यकाल एवं हटाने की प्रक्रिया

2.1 अनुच्छेद 124(1) — गठन एवं न्यायाधीशों की संख्या

अनुच्छेद 124(1) कहता है: “भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से तथा, जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है तब तक, सात से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा।” अर्थात् संविधान ने मूल संख्या 8 (मुख्य न्यायमूर्ति + 7) रखी और उसे बढ़ाने का अधिकार संसद को दिया — इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं, साधारण विधि पर्याप्त है। यही कारण है कि आज तक अनुच्छेद 124(1) का पाठ नहीं बदला, केवल उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन होते रहे।

सावधानी — संविधान में “सात”, अधिनियम में “सैंतीस”

प्रश्न प्रायः यह होता है: “संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त कितने न्यायाधीश हो सकते हैं?” — संवैधानिक पाठ के अनुसार उत्तर सात है, वर्तमान स्वीकृत संख्या नहीं। दूसरी ओर, यदि प्रश्न “वर्तमान स्वीकृत संख्या” पूछे तो उत्तर 38 (मुख्य न्यायमूर्ति सहित) है। दोनों को अलग-अलग याद रखें।

सुमेलन-तालिका 2 : उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश-संख्या का विकास (कालक्रम-योग्य)
वर्ष / विधिमुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्तकुल संख्या
1950 — संविधान, अनुच्छेद 124(1)78
1956 — उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम1011
1960 — संशोधन अधिनियम1314
1977 — संशोधन अधिनियम1718
1986 — संशोधन अधिनियम2526
2009 — संशोधन अधिनियम3031
2019 — संशोधन अधिनियम3334
2026 — संशोधन अधिनियम (पहले मई 2026 में अध्यादेश, फिर अगस्त 2026 में अधिनियम)3738 — वर्तमान

2026 की वृद्धि का तात्कालिक कारण लंबित वादों का दबाव था — 31 दिसंबर 2025 की स्थिति में उच्चतम न्यायालय में लगभग 92,000 वाद लंबित थे। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति के अनुरोध पर सरकार ने पहले अध्यादेश (अनुच्छेद 123) जारी किया और फिर संसद ने उसे प्रतिस्थापित करने वाला अधिनियम पारित किया। यह ध्यान रखें कि यह वृद्धि संविधान संशोधन नहीं, साधारण विधि द्वारा हुई।

2.2 अनुच्छेद 124(3) — अर्हताएँ

उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना अनिवार्य है, और उसे निम्न में से कोई एक शर्त पूरी करनी होगी —

सावधानी — अर्हता के तीन निकट-समान जाल

2.3 नियुक्ति, शपथ, कार्यकाल एवं सहायक उपबंध

सुमेलन-तालिका 3 : उच्चतम न्यायालय से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेदविषययाद रखने योग्य बिंदु
124(2)नियुक्तिराष्ट्रपति द्वारा, अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित अधिपत्र (warrant) द्वारा; मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश की नियुक्ति में मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य
124(2) परंतुकत्यागपत्रराष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा
124(6)शपथराष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष — तृतीय अनुसूची के प्रारूप में
125वेतन एवं भत्तेसंसद विधि द्वारा निर्धारित करती है; भारत की संचित निधि पर भारित; नियुक्ति के बाद अलाभकारी परिवर्तन नहीं (वित्तीय आपातकाल को छोड़कर)
126कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्तिमुख्य न्यायमूर्ति का पद रिक्त हो, या वे अनुपस्थित/असमर्थ हों — राष्ट्रपति न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश को नियुक्त करते हैं
127तदर्थ (ad hoc) न्यायाधीशगणपूर्ति न होने पर मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को (जो 124(3) की अर्हता रखता हो) उच्चतम न्यायालय में बैठने को कह सकते हैं
128सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थितिमुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्चतम न्यायालय के (या अर्हता रखने वाले उच्च न्यायालय के) किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से बैठने का अनुरोध कर सकते हैं — उस व्यक्ति की सहमति भी आवश्यक
129अभिलेख न्यायालयउच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा तथा उसे अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति होगी
130स्थान (seat)दिल्ली में, या ऐसे अन्य स्थान/स्थानों पर जो मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति के अनुमोदन से, नियत करें — यह विवेक राष्ट्रपति का नहीं, मुख्य न्यायमूर्ति का है
145नियम-निर्माणराष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय अपने नियम बनाता है; 145(3) — संविधान की व्याख्या से संबंधित सारवान विधि-प्रश्न या अनु. 143 के निर्देश के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश
146अधिकारी एवं सेवकमुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्ति; प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित
147निर्वचन“इस संविधान की व्याख्या” में भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की व्याख्या भी सम्मिलित
अनुच्छेद 124 से 130 — क्रम में “गठन–वेतन–कार्यकारी–तदर्थ–सेवानिवृत्त–अभिलेख–स्थान”

124 गठन/नियुक्ति/हटाना → 125 वेतन → 126 कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति → 127 तदर्थ न्यायाधीश → 128 सेवानिवृत्त न्यायाधीश की उपस्थिति → 129 अभिलेख न्यायालय → 130 न्यायालय का स्थान। सूत्र-वाक्य — “गवाही में करुणा, तुझसे सदा अभिलेख स्थिर” जैसा कोई कृत्रिम तुक गढ़ने की आवश्यकता नहीं; ये सात क्रमागत अनुच्छेद हैं, इन्हें क्रम में एक बार पढ़ लेना पर्याप्त है।

सावधानी — “अभिलेख न्यायालय” का वास्तविक अर्थ

अभिलेख न्यायालय (Court of Record) का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय अपने कागज़ात सँभालकर रखता है। इसके दो निश्चित विधिक अर्थ हैं —

2.4 न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया — अनुच्छेद 124(4) एवं 124(5)

अनुच्छेद 124(4) का पाठ स्वयं परीक्षा का प्रश्न है: न्यायाधीश को “सिद्ध कदाचार या असमर्थता (proved misbehaviour or incapacity)” के आधार पर ही हटाया जा सकता है, और वह भी राष्ट्रपति के आदेश से, जो संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उसी सत्र में पारित समावेदन (address) के बाद जारी होता है। अपेक्षित बहुमत दोहरा है —

1. सूचनालोक सभा में कम-से-कम 100 सदस्यों, या राज्य सभा में कम-से-कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव की सूचना अध्यक्ष/सभापति को
2. स्वीकार या अस्वीकारअध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार भी — यह उनका विवेक है
3. तीन-सदस्यीय जाँच समितिस्वीकार होने पर — (क) उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश, (ख) किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति, (ग) एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
4. समिति का निष्कर्षआरोप सिद्ध नहीं → प्रस्ताव समाप्त। आरोप सिद्ध → प्रस्ताव सदन में विचारार्थ आता है
5. दोनों सदनों में विशेष बहुमतकुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3 — उसी सत्र में
6. राष्ट्रपति का आदेशसमावेदन प्रस्तुत होने पर राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं
सावधानी — “महाभियोग” शब्द तथा बहुमत का पाठ

व्यवहार में क्या हुआ? आज तक किसी भी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से हटाया नहीं जा सका — यह अपने आप में एक रटने योग्य तथ्य है। कुछ उल्लेखनीय प्रयास —

सुमेलन-तालिका 4 : हटाने के प्रयास ↔ परिणाम
न्यायाधीश एवं वर्षक्या हुआ
न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (1993) — उच्चतम न्यायालयजाँच समिति ने आरोप सिद्ध माने, पर लोक सभा में प्रस्ताव अपेक्षित बहुमत नहीं पा सका (बड़ी संख्या में सदस्य मतदान से अनुपस्थित रहे)। यह पहला ऐसा प्रयास था।
न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2011) — कलकत्ता उच्च न्यायालयराज्य सभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया; लोक सभा में विचार से पूर्व ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया — इसलिए प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरन (2011) — सिक्किम उच्च न्यायालयराज्य सभा में प्रस्ताव स्वीकार, जाँच समिति गठित; उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।
मुख्य न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा (2018)राज्य सभा के सभापति ने सूचना अस्वीकार कर दी — यह अध्यक्ष/सभापति के विवेक का सबसे चर्चित उदाहरण है।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा (2025–26)आवास से जली हुई मुद्रा मिलने के बाद उच्चतम न्यायालय की आंतरिक (in-house) जाँच; त्यागपत्र से इनकार; जुलाई 2025 में दोनों सदनों में सूचना; लोक सभा अध्यक्ष द्वारा तीन-सदस्यीय समिति का गठन, जिसे उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2026 में वैध ठहराया। प्रक्रिया जारी है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. समावेदन प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
2. दोनों सदनों में यह कार्यवाही एक ही सत्र में पूरी होनी चाहिए।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 124(4) दोनों शर्तें रखता है — कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का कम-से-कम दो-तिहाई; और समावेदन उसी सत्र में प्रस्तुत होना चाहिए। दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 निम्नलिखित घटनाओं को उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या के बढ़ने के सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।
1. संख्या 26 की गई
2. संख्या 31 की गई
3. संख्या 14 की गई
4. संख्या 18 की गई
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 4, 1, 2B4, 3, 1, 2C3, 4, 2, 1D4, 3, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)1960 में 14, 1977 में 18, 1986 में 26 तथा 2009 में 31 — अतः क्रम 3, 4, 1, 2 है। (इसके बाद 2019 में 34 और 2026 में 38।)

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (विषय)
1. अनुच्छेद 126 — कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति
2. अनुच्छेद 127 — उच्चतम न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश
3. अनुच्छेद 129 — उच्चतम न्यायालय का स्थान
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय बनाता है; न्यायालय का स्थान अनुच्छेद 130 का विषय है। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 2 सही हैं।

3. उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता एवं शक्तियाँ

उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ छह शीर्षकों में बँटती हैं, और सुखद बात यह है कि अनुच्छेद-संख्याएँ लगभग आरोही क्रम में उसी कहानी को कहती हैं — पहले मुकदमा यहीं से आरंभ होता है (131), फिर नीचे से अपील आती है (132–134), फिर विशेष अनुमति (136), फिर अपने ही निर्णय का पुनर्विलोकन (137), फिर उस निर्णय का सब पर बाध्यकारी होना (141), फिर पूर्ण न्याय की असाधारण शक्ति (142), और अंत में राष्ट्रपति को परामर्श (143)।

अधिकारिता के प्रकार — 131 से 143 तक की सीढ़ी “आरंभ → अपील → अनुमति → पुनर्विलोकन → नज़ीर → पूर्ण न्याय → परामर्श”

131 = आरंभिक (संघ-राज्य विवाद) · 132–134 = अपीलीय (संवैधानिक, दीवानी, दांडिक) · 136 = विशेष अनुमति याचिका · 137 = पुनर्विलोकन · 141 = घोषित विधि सब पर बाध्यकारी · 142 = पूर्ण न्याय · 143 = परामर्शदात्री। इनके ठीक पहले दो और हैं — 129 अभिलेख न्यायालय तथा 130 स्थान। और अनुच्छेद 32 की रिट-अधिकारिता भी आरंभिक ही है, पर वह भाग III में है, भाग V में नहीं — इसीलिए वह इस सीढ़ी से बाहर दिखती है।

3.1 आरंभिक अधिकारिता — अनुच्छेद 131

अनुच्छेद 131 उच्चतम न्यायालय को अनन्य (exclusive) एवं आरंभिक (original) अधिकारिता देता है — अर्थात् ऐसे विवाद सीधे उच्चतम न्यायालय में ही आरंभ होंगे, किसी अन्य न्यायालय में नहीं। किन विवादों में?

सावधानी — अनुच्छेद 131 की आरंभिक अधिकारिता जितनी बड़ी दिखती है, उतनी है नहीं

उल्लेखनीय वाद — पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ (1963) अनुच्छेद 131 के अधीन आया पहला बड़ा वाद था, जिसमें राज्य ने कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन एवं विकास) अधिनियम, 1957 को चुनौती दी थी; न्यायालय ने संघ की विधायी सक्षमता बनाए रखी। यह प्रश्न कि क्या कोई राज्य अनुच्छेद 131 के अधीन किसी केंद्रीय विधि की संवैधानिकता को चुनौती दे सकता है, अभी भी बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है — इसलिए इस पर निश्चित कथन वाले विकल्प से सावधान रहें।

ध्यान दें कि अनुच्छेद 131क (केंद्रीय विधियों की संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की अनन्य अधिकारिता) 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया था और 43वें संशोधन, 1977 द्वारा हटा दिया गया। इसी प्रकार 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए 32क, 144क, 226क एवं 228क भी 43वें संशोधन ने हटा दिए — ये सब न्यायिक समीक्षा को संकुचित करने वाले उपबंध थे।

3.2 रिट अधिकारिता — अनुच्छेद 32 (यहाँ केवल अधिकारिता के रूप में)

अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु निदेश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति देता है। पाँच रिटों का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.2 में है; यहाँ केवल तीन अधिकारिता-संबंधी बिंदु याद रखें —

3.3 अपीलीय अधिकारिता — अनुच्छेद 132, 133, 134, 134क, 135

उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है। अपील चार रास्तों से आती है — संवैधानिक, दीवानी, दांडिक तथा विशेष अनुमति। पहले तीन के लिए उच्च न्यायालय का प्रमाणपत्र (certificate) चाहिए; चौथा पूरी तरह उच्चतम न्यायालय के विवेक पर है।

सुमेलन-तालिका 5 : अपीलीय अधिकारिता ↔ अनुच्छेद ↔ शर्त
प्रकारअनुच्छेदकब अपील होगी
संवैधानिक मामले132 उच्च न्यायालय के किसी निर्णय/डिक्री/अंतिम आदेश से — चाहे वह दीवानी, दांडिक या अन्य कार्यवाही में हो — यदि उच्च न्यायालय अनु. 134क के अधीन प्रमाणित करे कि मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित सारवान विधि-प्रश्न अंतर्ग्रस्त है
दीवानी मामले133 उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि — (क) मामले में साधारण महत्व का सारवान विधि-प्रश्न अंतर्ग्रस्त है, तथा (ख) उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है। (1972 के 30वें संशोधन से पहले यहाँ ₹20,000 की धन-सीमा थी, जो हटा दी गई।)
दांडिक मामले134 तीन स्थितियाँ — (क) उच्च न्यायालय ने अपील में दोषमुक्ति उलटकर मृत्युदंड दिया हो; (ख) उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायालय से मामला अपने पास मँगाकर दोषसिद्ध कर मृत्युदंड दिया हो; (ग) उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि मामला उच्चतम न्यायालय में अपील योग्य है। पहली दो में प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं। संसद इसे बढ़ा सकती है — उच्चतम न्यायालय (दांडिक अपीलीय अधिकारिता का विस्तार) अधिनियम, 1970 ने दोषमुक्ति उलटकर आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अन्यून कारावास देने की स्थिति भी जोड़ दी
प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया134क 44वें संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया — उच्च न्यायालय निर्णय सुनाने के तुरंत बाद, स्वप्रेरणा से या मौखिक आवेदन पर, 132/133/134 के प्रमाणपत्र का प्रश्न तय करेगा
फेडरल कोर्ट की अधिकारिता135 जिन मामलों में अनु. 133/134 लागू नहीं होते, पर विद्यमान विधि के अधीन फेडरल कोर्ट को अधिकारिता थी — वह अधिकारिता उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है
विशेष अनुमति याचिका (SLP)136 नीचे अलग से

3.4 अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition)

अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय की सबसे व्यापक और सबसे विवेकाधीन शक्ति है। पाठ इस प्रकार है — न्यायालय “अपने विवेकानुसार” भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी न्यायालय या अधिकरण द्वारा किसी वाद या मामले में दिए गए किसी भी निर्णय, डिक्री, अवधारण, दंडादेश या आदेश से अपील करने की विशेष अनुमति दे सकता है।

3.5 अनुच्छेद 137 — पुनर्विलोकन, और उससे आगे “उपचारात्मक याचिका”

अनुच्छेद 137 — संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि तथा अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए किसी भी निर्णय या आदेश का पुनर्विलोकन (review) करने की शक्ति है। यह शक्ति असाधारण है — न्यायालय स्वयं अपनी भूल सुधार सकता है।

3.6 अनुच्छेद 141 — घोषित विधि की बाध्यता

“उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी।” यही नज़ीर का सिद्धांत (doctrine of precedent / stare decisis) का संवैधानिक आधार है।

सावधानी — अनुच्छेद 141 के तीन बारीक बिंदु

3.7 अनुच्छेद 142 — “पूर्ण न्याय” की असाधारण शक्ति

अनुच्छेद 142(1) — उच्चतम न्यायालय अपने समक्ष लंबित किसी वाद या मामले में “पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक” ऐसी कोई डिक्री या आदेश कर सकता है, और वह सम्पूर्ण भारत में प्रवर्तनीय होगा। अनुच्छेद 142(2) न्यायालय को व्यक्तियों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने, दस्तावेज़ प्रकट कराने तथा अपने अवमान की जाँच एवं दंड की शक्ति देता है।

3.8 परामर्शदात्री अधिकारिता — अनुच्छेद 143

यह उपबंध भारत शासन अधिनियम, 1935 से आया है और कनाडा के संविधान से प्रेरित माना जाता है। इसके दो खंड हैं, और दोनों में एक शब्द का अंतर पूरा उत्तर बदल देता है —

अनुच्छेद 143(1)

  • किस पर — विधि या तथ्य का ऐसा प्रश्न जो उद्भूत हुआ है या उद्भूत होने की संभावना है और जो लोक महत्व का है
  • न्यायालय“कर सकेगा (may)” — राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दे भी सकता है, मना भी कर सकता है
  • सुनवाई के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश (अनु. 145(3))
  • न्यायालय ने वास्तव में मना किया है — 1993 की अयोध्या-निर्देश (राम जन्मभूमि) को उसने बिना उत्तर दिए लौटा दिया

अनुच्छेद 143(2)

  • किस पर — संविधान-पूर्व की संधि, करार, प्रसंविदा, सनद आदि से उत्पन्न विवाद — ठीक वही जो अनु. 131 के परंतुक से बाहर हैं
  • न्यायालय“करेगा (shall)” — राय देना अनिवार्य है
  • व्यवहार में इस खंड का प्रयोग नगण्य रहा है
  • यही 131 और 143 को जोड़ने वाली कड़ी है — जो दरवाज़ा 131 बंद करता है, वह 143(2) खोलता है
सुमेलन-तालिका 6 : अनुच्छेद 143 के प्रमुख निर्देश ↔ विषय (कालक्रम-योग्य)
वर्षनिर्देशविषय एवं परिणाम
1951दिल्ली विधि अधिनियम निर्देशप्रत्यायोजित विधायन (delegated legislation) की सीमा — पहला निर्देश
1958केरल शिक्षा विधेयकअल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं तथा अनु. 30 की व्याख्या; “सामंजस्यपूर्ण निर्वचन” का सिद्धांत
1960बेरुबारी संघभारतीय राज्यक्षेत्र का अभ्यर्पण — केवल संविधान संशोधन से संभव; प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं (यह मत 1973 में बदला)
1964केशव सिंह निर्देश (उत्तर प्रदेश विधान सभा)विधानमंडल के विशेषाधिकार बनाम उच्च न्यायालय की अधिकारिता — उत्तर प्रदेश से उत्पन्न सबसे प्रसिद्ध संवैधानिक निर्देश
1974राष्ट्रपति निर्वाचन निर्देशविधान सभाओं में रिक्तियाँ रहते भी राष्ट्रपति का निर्वाचन टाला नहीं जा सकता
1978विशेष न्यायालय विधेयकआपातकाल के बाद विशेष न्यायालयों की वैधता
1991–92कावेरी जल विवाद अधिकरणअधिकरण के अंतरिम आदेश की बाध्यता
1993राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिदन्यायालय ने निर्देश अनुत्तरित लौटा दिया — 143(1) के “कर सकेगा” का सर्वोत्तम उदाहरण
1998तृतीय न्यायाधीश वादकॉलेजियम का वर्तमान स्वरूप इसी निर्देश की राय से बना
20122जी स्पेक्ट्रम निर्देशप्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में नीलामी ही एकमात्र विधि नहीं
2025राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की अनुमति संबंधी निर्देशमई 2025 में राष्ट्रपति द्वारा 14 प्रश्न निर्दिष्ट; 20 नवंबर 2025 की राय — न्यायालय राज्यपाल/राष्ट्रपति के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकते और “मानी गई अनुमति” की अवधारणा संविधान-सम्मत नहीं; अनुचित विलंब पर सीमित परमादेश संभव
उत्तर प्रदेश संदर्भ — केशव सिंह प्रकरण (1964)

1964 में उत्तर प्रदेश विधान सभा ने गोरखपुर के केशव सिंह को विशेषाधिकार हनन के लिए कारावास का दंड दिया। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अधीन याचिका दी और उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी। विधान सभा ने इसे अपने विशेषाधिकार का हनन मानते हुए दोनों न्यायाधीशों तथा अधिवक्ता को सदन के समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश दे दिया; न्यायाधीशों ने उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के समक्ष याचिका दी। यह टकराव इतना गंभीर हुआ कि राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अधीन उच्चतम न्यायालय से राय माँगी। सात न्यायाधीशों की पीठ ने 30 सितंबर 1964 को 6:1 के बहुमत से कहा कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन ऐसी याचिका सुन सकता है, और विधानमंडल न्यायाधीशों को अपने समक्ष तलब नहीं कर सकता। यह प्रकरण UPPSC के लिए दोहरा महत्व रखता है — यह विधानमंडल के विशेषाधिकार का भी उदाहरण है और अनुच्छेद 143 का भी, और इसकी जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (अनुच्छेद)    सूची-II (विषय)
A. अनुच्छेद 136   1. पूर्ण न्याय करने की शक्ति
B. अनुच्छेद 137   2. घोषित विधि की बाध्यता
C. अनुच्छेद 141   3. विशेष अनुमति याचिका
D. अनुच्छेद 142   4. निर्णय का पुनर्विलोकन
कूट:

AA-4, B-3, C-2, D-1BA-3, B-4, C-1, D-2CA-3, B-4, C-2, D-1DA-4, B-3, C-1, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका; 137 — पुनर्विलोकन; 141 — घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी; 142 — पूर्ण न्याय। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।

प्र.2 अनुच्छेद 143 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 143(1) के अधीन निर्दिष्ट प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय राय देने से इनकार कर सकता है।
2. उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)143(1) में “कर सकेगा” शब्द है, अतः न्यायालय राय देने से इनकार कर सकता है — 1993 के राम जन्मभूमि निर्देश में उसने ऐसा किया था; कथन 1 सही है। राय सलाहकारी होती है, राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य नहीं — कथन 2 गलत है। (143(2) में “करेगा” है, वहाँ राय देना अनिवार्य है।)

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अनुच्छेद 131 के अधीन कोई निजी नागरिक उच्चतम न्यायालय में वाद नहीं ला सकता।
कारण (R): अनुच्छेद 131 की अधिकारिता केवल संघ तथा राज्यों के बीच, या राज्यों के परस्पर विवादों तक सीमित है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 131 केवल संघ-राज्य तथा अंतर्राज्यिक विवादों के लिए है; इसमें निजी पक्षकार का कोई स्थान नहीं। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है। (निजी नागरिक मौलिक अधिकार के लिए अनुच्छेद 32 के अधीन आ सकता है, 131 के अधीन नहीं।)

4. न्यायाधीशों की नियुक्ति का विकास — तीन न्यायाधीश वाद, कॉलेजियम, NJAC एवं MoP

4.1 मूल योजना — और उसमें छिपा एक शब्द

संविधान की मूल योजना सरल थी। अनुच्छेद 124(2) कहता है कि राष्ट्रपति न्यायाधीश की नियुक्ति “उच्चतम न्यायालय तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात्” करेंगे जिनसे परामर्श करना वे आवश्यक समझें; और मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश की नियुक्ति में मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य होगा। पूरा विवाद इसी एक शब्द पर टिका है — “परामर्श (consultation)” का अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ केवल राय ले लेना है, या उस राय से सहमत होना (concurrence) भी आवश्यक है?

प्रारंभिक दशकों में परंपरा यह बनी कि मुख्य न्यायमूर्ति के पद पर वरिष्ठतम न्यायाधीश की नियुक्ति होगी। यह परंपरा दो बार तोड़ी गई — 1973 में न्यायमूर्ति ए.एन. राय को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों (शेलत, हेगड़े एवं ग्रोवर) के ऊपर, तथा 1977 में न्यायमूर्ति एम.एच. बेग को न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना के ऊपर मुख्य न्यायमूर्ति बनाया गया। इन “अधिक्रमणों (supersessions)” ने न्यायपालिका को यह सोचने पर विवश किया कि नियुक्ति में कार्यपालिका की प्रधानता खतरनाक है।

4.2 तीन न्यायाधीश वाद — तीन तिथियाँ, तीन निष्कर्ष

सुमेलन-तालिका 7 : तीन न्यायाधीश वाद ↔ वर्ष ↔ पीठ ↔ निष्कर्ष
वादवर्ष एवं पीठनिर्णायक निष्कर्ष
प्रथम न्यायाधीश वाद
एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ
(“न्यायाधीश स्थानांतरण वाद”)
1981
7 न्यायाधीश
“परामर्श” का अर्थ “सहमति” नहीं — राष्ट्रपति मुख्य न्यायमूर्ति की राय मानने के लिए बाध्य नहीं। कार्यपालिका की प्रधानता। (इसी वाद में लोकस स्टैंडाई शिथिल कर जनहित याचिका का सैद्धांतिक आधार भी रखा गया — यही इसका दूसरा महत्व है।)
द्वितीय न्यायाधीश वाद
उच्चतम न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ
6 अक्टूबर 1993
9 न्यायाधीश, 7:2
प्रथम वाद पलटा“परामर्श” का अर्थ “सहमति” — मुख्य न्यायमूर्ति की राय की प्रधानता (primacy)। पर वह राय अकेले की नहीं, दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ मिलकर बनी संस्थागत राय होगी। कॉलेजियम का जन्म यहीं हुआ।
तृतीय न्यायाधीश वाद
1998 का विशेष निर्देश सं. 1 (अनुच्छेद 143 के अधीन)
28 अक्टूबर 1998
9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत
यह वाद नहीं, राय है। कॉलेजियम का विस्तार — उच्चतम न्यायालय की नियुक्तियों के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश; उच्च न्यायालय की नियुक्तियों के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + दो वरिष्ठतम; स्थानांतरण के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + चार। बहुलता (plurality) मनमानेपन के विरुद्ध अंतर्निर्मित रोक है।
चतुर्थ न्यायाधीश वाद
उच्चतम न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (NJAC वाद)
16 अक्टूबर 2015
5 न्यायाधीश, 4:1
99वाँ संविधान संशोधन एवं NJAC अधिनियम, 2014 असंवैधानिक घोषित — ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता को क्षति पहुँचाते हैं, जो मूल ढाँचा है। कॉलेजियम पुनर्जीवित। एकमात्र असहमति — न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर
तीन न्यायाधीश वाद — वर्ष एवं निष्कर्ष एक पंक्ति में “81 — परामर्श · 93 — सहमति · 98 — कॉलेजियम”

1981 ने कहा “परामर्श ही तो है” (कार्यपालिका जीती) → 1993 ने कहा “परामर्श = सहमति” (न्यायपालिका जीती, कॉलेजियम बना) → 1998 ने कहा “सहमति किसकी — अकेले की नहीं, चार साथियों के साथ” (कॉलेजियम का विस्तार) → और 2015 ने NJAC गिराकर इसी व्यवस्था पर मुहर लगा दी। पीठों की संख्या भी क्रम में याद रखें — 7 → 9 → 9 → 5

1950अनुच्छेद 124(2) एवं 217(1) — नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, मुख्य न्यायमूर्ति से “परामर्श” के बाद; वरिष्ठता की परंपरा
1973 · 1977दो अधिक्रमण — ए.एन. राय (शेलत, हेगड़े, ग्रोवर के ऊपर) तथा एम.एच. बेग (एच.आर. खन्ना के ऊपर)
1981प्रथम न्यायाधीश वाद — एस.पी. गुप्ता · परामर्श ≠ सहमति · कार्यपालिका की प्रधानता · साथ ही जनहित याचिका का आधार
6 अक्टूबर 1993द्वितीय न्यायाधीश वाद · 9 न्यायाधीश, 7:2 · परामर्श = सहमति · कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2)
28 अक्टूबर 1998तृतीय न्यायाधीश वाद · अनु. 143 के अधीन राय · 9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत · कॉलेजियम = मुख्य न्यायमूर्ति + 4
1998–99प्रक्रिया ज्ञापन (Memorandum of Procedure — MoP) तैयार · आज भी यही प्रभावी है
201499वाँ संविधान संशोधन — अनुच्छेद 124क, 124ख, 124ग जोड़े गए · साथ में NJAC अधिनियम, 2014
13 अप्रैल 201599वाँ संशोधन एवं NJAC अधिनियम प्रवृत्त हुए
16 अक्टूबर 2015चतुर्थ न्यायाधीश वाद · 5 न्यायाधीश, 4:1 · NJAC निरस्त · कॉलेजियम पुनर्जीवित
दिसंबर 2015न्यायालय ने कॉलेजियम में पारदर्शिता हेतु सुझाव माँगे और सरकार को संशोधित MoP बनाने को कहा — जो आज तक अंतिम रूप नहीं ले सका
2017 सेकॉलेजियम के प्रस्ताव (resolutions) सार्वजनिक रूप से वेबसाइट पर प्रकाशित होने लगे

4.3 NJAC — जो बना भी और गिरा भी

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointments Commission) को 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 ने संवैधानिक दर्जा दिया। इसने अनुच्छेद 124क (गठन), 124ख (कृत्य) तथा 124ग (संसद की विधि बनाने की शक्ति) जोड़े, और अनुच्छेद 124(2), 127, 128, 217, 222, 224, 224क तथा 231 में तदनुरूप संशोधन किया।

4.4 कॉलेजियम — कौन-सी नियुक्ति के लिए कौन-सा कॉलेजियम

सुमेलन-तालिका 8 : नियुक्ति/स्थानांतरण ↔ कॉलेजियम की संरचना
किसकी नियुक्तिकॉलेजियमटिप्पणी
भारत के मुख्य न्यायमूर्तिनिवर्तमान मुख्य न्यायमूर्ति अपने उत्तराधिकारी की सिफ़ारिश करते हैंप्रक्रिया ज्ञापन के अनुसार सामान्यतः वरिष्ठतम न्यायाधीश, यदि वे पद के योग्य समझे जाएँ; विधि मंत्री सिफ़ारिश माँगते हैं
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशमुख्य न्यायमूर्ति + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशकुल 5 सदस्य
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्तिमुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम न्यायाधीशकुल 3 सदस्य
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशप्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम) से आरंभ होता है; अनुमोदन उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2) द्वाराबीच में राज्यपाल/राज्य सरकार तथा केंद्रीय विधि मंत्रालय की टिप्पणियाँ
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण (अनु. 222)मुख्य न्यायमूर्ति + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश, तथा दोनों संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों से परामर्शस्थानांतरण के लिए न्यायाधीश की सहमति आवश्यक नहीं
1. प्रस्तावउच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु — उच्च न्यायालय का कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम) नाम भेजता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हेतु — भारत के मुख्य न्यायमूर्ति प्रस्ताव आरंभ करते हैं
2. राज्य स्तर(केवल उच्च न्यायालय के लिए) नाम राज्यपाल/मुख्यमंत्री के पास जाता है; उनकी टिप्पणी सहित केंद्रीय विधि मंत्रालय को
3. केंद्र की जाँचविधि मंत्रालय आसूचना ब्यूरो (IB) से पृष्ठभूमि-रिपोर्ट लेकर पूरी फ़ाइल भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को भेजता है
4. उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियमसिफ़ारिश करता है — सिफ़ारिश लिखित होती है और (2017 के बाद) सामान्यतः वेबसाइट पर प्रकाशित
5. सरकार का विकल्पसरकार नाम लौटा सकती है और पुनर्विचार माँग सकती है — एक बार
6. पुनरावृत्ति (reiteration)यदि कॉलेजियम वही नाम दोहरा दे, तो परिपाटी के अनुसार सरकार नियुक्ति के लिए आबद्ध है — यद्यपि कोई समय-सीमा नहीं, और यही विलंब का मुख्य कारण है
7. राष्ट्रपति का अधिपत्रराष्ट्रपति अधिपत्र (warrant) जारी करते हैं; नियुक्ति अधिसूचित होती है और न्यायाधीश शपथ लेते हैं

4.5 प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) एवं आज का गतिरोध

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।
1. तृतीय न्यायाधीश वाद
2. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग निरस्त
3. प्रथम न्यायाधीश वाद
4. द्वितीय न्यायाधीश वाद
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 4, 2, 1B4, 3, 1, 2C3, 4, 1, 2D4, 3, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रथम न्यायाधीश वाद 1981, द्वितीय 1993, तृतीय 1998 तथा NJAC का निरस्त होना 2015 — अतः क्रम 3, 4, 1, 2 है।

प्र.2 राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसे 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 द्वारा अनुच्छेद 124क के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया था।
2. आयोग में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति सहित कुल छह सदस्य थे, जिनमें दो प्रतिष्ठित व्यक्ति सम्मिलित थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)99वें संशोधन ने अनुच्छेद 124क, 124ख तथा 124ग जोड़े; आयोग में मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष), दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, विधि मंत्री तथा दो प्रतिष्ठित व्यक्ति — कुल छह सदस्य थे। दोनों कथन सही हैं।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (नियुक्ति)    (कॉलेजियम)
1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश
2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश
3. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम मुख्य न्यायमूर्ति + दो वरिष्ठतम न्यायाधीश होता है, चार नहीं — अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। उच्चतम न्यायालय की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + चार वाला कॉलेजियम सही है।

5. उच्च न्यायालय — गठन, नियुक्ति, स्थानांतरण तथा अनुच्छेद 226, 227 एवं 224क

5.1 अनुच्छेद 214 से 217 — गठन एवं नियुक्ति

अनुच्छेद 214 कहता है — “प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।” पर व्यवहार में राज्यों की संख्या (28) और उच्च न्यायालयों की संख्या (25) बराबर नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद 231 संसद को दो या अधिक राज्यों (तथा संघ राज्यक्षेत्रों) के लिए एक साझा उच्च न्यायालय बनाने की शक्ति देता है, और अनुच्छेद 230 संसद को किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता किसी संघ राज्यक्षेत्र तक बढ़ाने या उससे हटाने की शक्ति देता है।

अनुच्छेद 216 गठन का उपबंध है और यहीं एक निर्णायक भेद छिपा है — “प्रत्येक उच्च न्यायालय एक मुख्य न्यायमूर्ति तथा ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।” अर्थात् उच्च न्यायालय के लिए संविधान में न्यायाधीशों की कोई संख्या नहीं दी गई — न न्यूनतम, न अधिकतम। यह उच्चतम न्यायालय से भिन्न है, जहाँ अनुच्छेद 124(1) में “सात से अनधिक” लिखा है।

सुमेलन-तालिका 9 : उच्च न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेदविषययाद रखने योग्य बिंदु
214प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालयसंघ राज्यक्षेत्रों का उल्लेख नहीं — उनके लिए 230/231
215अभिलेख न्यायालयअवमान के लिए दंड की शक्ति; अपने अधीनस्थ न्यायालयों के अवमान पर भी
216गठनमुख्य न्यायमूर्ति + अन्य न्यायाधीश; संख्या संविधान में नहीं — राष्ट्रपति समय-समय पर तय करते हैं
217(1)नियुक्ति एवं पदावधिराष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति, राज्य के राज्यपाल तथा (मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश के लिए) उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद; पदावधि 62 वर्ष तक
217(2)अर्हताभारत का नागरिक तथा — (क) भारत के राज्यक्षेत्र में 10 वर्ष न्यायिक पद धारण किया हो, अथवा (ख) किसी उच्च न्यायालय का (या लगातार दो/अधिक का) 10 वर्ष अधिवक्ता रहा हो। “पारंगत विधिवेत्ता” का विकल्प नहीं
217(3)आयु का प्रश्नराष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद तय करेंगे; निर्णय अंतिम (15वाँ संशोधन, 1963)
218हटाने की प्रक्रियाअनुच्छेद 124(4) एवं (5) यहाँ भी लागू — अर्थात् उच्चतम न्यायालय वाली ही प्रक्रिया
219शपथराज्य के राज्यपाल या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष
220सेवानिवृत्ति के बाद वकालतउच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर कहीं नहीं — उसी उच्च न्यायालय में भी नहीं
221वेतन एवं भत्तेवेतन राज्य की संचित निधि पर भारित; किंतु पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित
222स्थानांतरणराष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद; स्थानांतरित न्यायाधीश को प्रतिकरात्मक भत्ता; न्यायाधीश की सहमति आवश्यक नहीं
223कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्तिराष्ट्रपति उसी न्यायालय के किसी न्यायाधीश को नियुक्त करते हैं
224अपर एवं कार्यकारी न्यायाधीशअपर (additional) — कार्य की अस्थायी वृद्धि/बकाया के लिए, अधिकतम दो वर्ष के लिए; कार्यकारी (acting) — किसी स्थायी न्यायाधीश की अस्थायी अनुपस्थिति में। दोनों 62 वर्ष तक
224कसेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठकनीचे 5.4 में अलग से
225विद्यमान अधिकारितासंविधान-पूर्व उच्च न्यायालयों की अधिकारिता एवं विधि-प्रक्रिया यथावत बनी रहती है
226रिट अधिकारितानीचे 5.3 में
227अधीक्षण (superintendence)नीचे 5.3 में
228कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरणयदि अधीनस्थ न्यायालय में लंबित मामले में संविधान की व्याख्या का सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त हो
229अधिकारी एवं सेवकमुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्ति; व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित
230संघ राज्यक्षेत्रों तक अधिकारिता का विस्तारसंसद विधि द्वारा
231दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालयसंसद विधि द्वारा — उदाहरण : पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
सावधानी — उच्च न्यायालय बनाम उच्चतम न्यायालय के पाँच निकट-समान बिंदु

5.2 पच्चीस उच्च न्यायालय — स्थापना, पीठ एवं अधिकार-क्षेत्र

देश के तीन सबसे पुराने उच्च न्यायालय भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 (Indian High Courts Act, 1861) के अधीन 1862 में स्थापित हुए — कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास; इनमें कलकत्ता उच्च न्यायालय देश का सबसे पुराना है। इसके बाद 1866 में आगरा में उत्तर-पश्चिमी प्रांत का उच्च न्यायालय स्थापित हुआ, जो आगे चलकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय बना। सबसे नए उच्च न्यायालय 1 जनवरी 2019 को अस्तित्व में आए, जब हैदराबाद उच्च न्यायालय का विभाजन कर तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश के अलग-अलग उच्च न्यायालय बनाए गए।

प्रयागराज अमरावती मुंबई कोलकाता बिलासपुर दिल्ली गुवाहाटी अहमदाबाद शिमला श्रीनगर राँची बेंगलुरु कोच्चि जबलपुर चेन्नई इंफाल शिलांग कटक पटना चंडीगढ़ जोधपुर गंगटोक हैदराबाद अगरतला नैनीताल
एक से अधिक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर अधिकारिता — 7केवल एक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर अधिकारिता — 18
भारत के 25 उच्च न्यायालय — मुख्य पीठ (principal seat) के नगर के अनुसार। गहरे लाल बिंदु वे सात न्यायालय हैं जिनकी अधिकारिता एक से अधिक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर फैली है — मुंबई (महाराष्ट्र, गोवा, दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव), कोलकाता (प. बंगाल, अंडमान-निकोबार), गुवाहाटी (असम, नागालैंड, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश), कोच्चि (केरल, लक्षद्वीप), चेन्नई (तमिलनाडु, पुदुचेरी), चंडीगढ़ (पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़) तथा जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय (दोनों संघ राज्यक्षेत्र), जिसकी पीठ श्रीनगर एवं जम्मू में बदलती रहती है। ध्यान दें — दिल्ली एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय है; तथा गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम एवं नागालैंड ऐसे राज्य हैं जिनका अपना उच्च न्यायालय नहीं है। कई न्यायालयों का नाम नगर से भिन्न है — जैसे उड़ीसा उच्च न्यायालय की पीठ कटक में, मध्य प्रदेश की जबलपुर में, राजस्थान की जोधपुर में, छत्तीसगढ़ की बिलासपुर में तथा उत्तराखंड की नैनीताल में है।
सुमेलन-तालिका 10 : पच्चीस उच्च न्यायालय ↔ स्थापना ↔ मुख्य पीठ ↔ अन्य पीठें ↔ अधिकार-क्षेत्र
उच्च न्यायालयस्थापनामुख्य पीठअन्य पीठअधिकार-क्षेत्र
कलकत्ता1862 — देश का सबसे पुरानाकोलकातापोर्ट ब्लेयर (परिपथ), जलपाईगुड़ीपश्चिम बंगाल + अंडमान एवं निकोबार
बंबई1862मुंबईनागपुर, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), पणजीमहाराष्ट्र + गोवा + दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव
मद्रास1862चेन्नईमदुरैतमिलनाडु + पुदुचेरी
इलाहाबाद17 मार्च 1866 (आगरा में; 1869 में इलाहाबाद)प्रयागराजलखनऊउत्तर प्रदेश
कर्नाटक1884 (मैसूर चीफ़ कोर्ट के रूप में); 1973 में वर्तमान नामबेंगलुरुधारवाड़, कलबुर्गीकर्नाटक
पटना1916पटनाबिहार
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख1928श्रीनगर एवं जम्मू (बदलती रहती है)लद्दाखजम्मू-कश्मीर + लद्दाख (दोनों संघ राज्यक्षेत्र)
गुवाहाटी1948 (असम उच्च न्यायालय के रूप में); 1971 में वर्तमान नामगुवाहाटीकोहिमा, आइज़ोल, ईटानगरअसम + नागालैंड + मिज़ोरम + अरुणाचल प्रदेश
उड़ीसा1948कटकओडिशा
राजस्थान1949जोधपुरजयपुरराजस्थान
पंजाब एवं हरियाणा1947 (पंजाब उच्च न्यायालय के रूप में); 1966 में वर्तमान नामचंडीगढ़पंजाब + हरियाणा + चंडीगढ़अनुच्छेद 231 का उदाहरण
मध्य प्रदेश1936 (नागपुर में); 1956 से जबलपुर में वर्तमान स्वरूपजबलपुरग्वालियर, इंदौरमध्य प्रदेश
केरल1956कोच्चि (एर्नाकुलम)केरल + लक्षद्वीप
गुजरात1960अहमदाबादगुजरात
दिल्ली1966नई दिल्लीदिल्ली — एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र जिसका अपना उच्च न्यायालय है
हिमाचल प्रदेश1971शिमलाहिमाचल प्रदेश
सिक्किम1975गंगटोकसिक्किम — सबसे छोटा उच्च न्यायालय (स्वीकृत संख्या 3)
छत्तीसगढ़2000बिलासपुरछत्तीसगढ़
उत्तराखंड2000नैनीतालउत्तराखंड
झारखंड2000राँचीझारखंड
मणिपुरमार्च 2013इंफालमणिपुर
मेघालयमार्च 2013शिलांगमेघालय
त्रिपुरामार्च 2013अगरतलात्रिपुरा
तेलंगाना1 जनवरी 2019हैदराबादतेलंगाना
आंध्र प्रदेश1 जनवरी 2019नवीनतमअमरावतीआंध्र प्रदेश
सात बहु-क्षेत्रीय उच्च न्यायालय — “तीनों पुराने, और चार बाद के” “कलकत्ता–बंबई–मद्रास + गुवाहाटी–केरल–पंजाब–जम्मू”

सबसे सुविधाजनक कुंजी यह है कि देश के तीनों सबसे पुराने उच्च न्यायालय (1862 वाले) बहु-क्षेत्रीय हैं — कलकत्ता (+अंडमान), बंबई (+गोवा, दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव), मद्रास (+पुदुचेरी)। इनमें चार और जोड़ दीजिए — गुवाहाटी (चार पूर्वोत्तर राज्य), केरल (+लक्षद्वीप), पंजाब एवं हरियाणा (+चंडीगढ़) तथा जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख (दो संघ राज्यक्षेत्र)। कुल सात। शेष 18 का क्षेत्र एक ही राज्य/संघ राज्यक्षेत्र है। साथ में यह भी याद रखें — दिल्ली एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय है, और गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा नागालैंड ऐसे राज्य हैं जिनका अपना उच्च न्यायालय नहीं है।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — इलाहाबाद उच्च न्यायालय : देश का सबसे बड़ा
उत्तर प्रदेश संदर्भ — 12 जून 1975 का निर्णय तथा अनुच्छेद 329क

भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे परिणामकारी उच्च न्यायालयी निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय से आया। 1971 के लोक सभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी की जीत को समाजवादी प्रत्याशी राज नारायण ने निर्वाचन याचिका द्वारा चुनौती दी थी। 12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण में निर्णय दिया कि चुनाव में भ्रष्ट आचरण हुआ — निर्वाचन अभिकर्ता यशपाल कपूर का सरकारी सेवा में रहते हुए कार्य करना तथा चुनावी मंचों/ध्वनि-विस्तारकों के लिए सरकारी तंत्र का प्रयोग। न्यायालय ने उनका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्ष के लिए निरर्हित कर दिया।

इस निर्णय की सीधी प्रतिक्रिया में 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित हुआ, और 39वें संविधान संशोधन (1975) द्वारा अनुच्छेद 329क जोड़कर यह उपबंध किया गया कि प्रधानमंत्री तथा लोक सभा अध्यक्ष के निर्वाचन को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। 7 नवंबर 1975 को इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 329क(4) को मूल ढाँचे के विरुद्ध मानकर अपास्त कर दिया — क्योंकि वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन, विधि का शासन तथा न्यायिक समीक्षा को नष्ट करता था। यह केशवानंद के बाद मूल ढाँचा सिद्धांत का पहला व्यावहारिक प्रयोग था। (इसी नाम का एक और वाद — “उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण, 1975” — “जानने के अधिकार” के लिए प्रसिद्ध है; दोनों को भ्रमित न करें।)

5.3 अनुच्छेद 226 एवं 227 — दो अलग शक्तियाँ, जिन्हें छात्र एक मान बैठते हैं

अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को शक्ति देता है कि वह अपनी अधिकारिता के भीतर किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को — जिसके अंतर्गत उचित मामलों में कोई सरकार भी है — निदेश, आदेश या रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा एवं उत्प्रेषण सहित) जारी करे, मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा “किसी अन्य प्रयोजन के लिए” भी

अनुच्छेद 227 बिल्कुल भिन्न शक्ति है — अधीक्षण (superintendence)। प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों एवं अधिकरणों पर अधीक्षण रखेगा (सैन्य न्यायालयों/अधिकरणों को छोड़कर)। इसमें न्यायिक अधीक्षण भी है और प्रशासनिक भी — विवरणी माँगना, नियम एवं प्ररूप बनाना, अधिकारियों की फीस तय करना।

इतिहास का एक निर्णायक मोड़ यहाँ भी है — 42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 227 को संकुचित कर अधीक्षण केवल “अपनी अपीलीय अधिकारिता के अधीन न्यायालयों” तक सीमित कर दिया था और अधिकरणों को बाहर कर दिया था; 44वें संशोधन, 1978 ने यह संकुचन हटाकर अधिकरणों सहित पूर्ण अधीक्षण बहाल कर दिया। यही बहाली आगे चलकर एल. चंद्रकुमार (1997) की नींव बनी।

अनुच्छेद 226 · रिट अधिकारिता

  • प्रकृतिआरंभिक (original) अधिकारिता
  • कैसे चलती है — केवल याचिका पर; न्यायालय स्वप्रेरणा से नहीं चला सकता
  • किसके विरुद्धकिसी भी व्यक्ति, प्राधिकारी या सरकार के विरुद्ध
  • क्या कर सकता है — निदेश, आदेश एवं पाँचों रिट
  • प्रयोजन — मौलिक अधिकार तथा “किसी अन्य प्रयोजन”
  • क्षेत्र — 226(2) के अधीन वाद-हेतुक के आधार पर बाहर तक

अनुच्छेद 227 · अधीक्षण की शक्ति

  • प्रकृतिपर्यवेक्षी (supervisory), अपीलीय नहीं
  • कैसे चलती है — याचिका पर भी, और स्वप्रेरणा (suo motu) से भी
  • किसके विरुद्ध — केवल अपने क्षेत्र के न्यायालयों एवं अधिकरणों के विरुद्ध — सैन्य न्यायालय अपवाद
  • क्या कर सकता है — रिट नहीं; उपयुक्त निदेश, नियम, प्ररूप, विवरणी; अधीनस्थ को अपनी सीमा में रखना
  • प्रयोजन — अधीनस्थ न्यायालय/अधिकरण अपनी अधिकारिता से बाहर न जाए; तथ्य की साधारण भूल सुधारना इसका काम नहीं
  • इतिहास — 42वें संशोधन ने संकुचित किया, 44वें ने बहाल किया

5.4 अनुच्छेद 224क — सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठक (“तदर्थ न्यायाधीश”)

यह उपबंध 15वें संविधान संशोधन, 1963 द्वारा जोड़ा गया और दशकों तक लगभग निष्क्रिय पड़ा रहा। पाठ यह है — किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस न्यायालय के या किसी अन्य उच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से अनुरोध कर सकता है कि वह उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठे और कार्य करे।

उत्तर प्रदेश संदर्भ — फ़रवरी 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 224क का प्रयोग

3 फ़रवरी 2026 की बैठक में उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने अनुच्छेद 224क का प्रयोग करते हुए पाँच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दो वर्ष के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त करने का अनुमोदन किया — मुख्यतः दांडिक अपीलों के विशाल बकाया को निपटाने के लिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्वीकृत 160 पदों के विरुद्ध कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या प्रायः 110 से कम ही रही है, और अकेले दांडिक अपीलें लगभग 2.7 लाख लंबित बताई जाती हैं। दशकों से निष्क्रिय पड़े अनुच्छेद 224क के सर्वाधिक चर्चित प्रयोग का केंद्र उत्तर प्रदेश है — यह UPPSC के लिए स्वाभाविक प्रश्न-बिंदु है। (उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने इस कदम का विरोध भी किया, यह तर्क देते हुए कि समाधान नियमित रिक्तियाँ भरना है।)

5.5 अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 — सर्वाधिक पूछा जाने वाला भेद

अनुच्छेद 32 · उच्चतम न्यायालय

  • स्वरूप — स्वयं एक मौलिक अधिकार (भाग III)
  • प्रयोजनकेवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु
  • दायरासंकुचित
  • विवेक — न्यायालय उपचार देने से इनकार नहीं कर सकता
  • क्षेत्र — सम्पूर्ण भारत
  • निलंबन — अनु. 359 के अधीन राष्ट्रपति के आदेश से प्रभावित हो सकता है (अनु. 20 एवं 21 सदा सुरक्षित)
  • अन्य प्रयोजन — केवल तब, जब संसद अनु. 139 के अधीन विधि बनाए — अब तक नहीं बनी

अनुच्छेद 226 · उच्च न्यायालय

  • स्वरूपसंवैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं (भाग VI)
  • प्रयोजन — मौलिक अधिकार तथा “किसी अन्य प्रयोजन” — साधारण विधिक अधिकार भी
  • दायराव्यापक
  • विवेकविवेकाधीन; उच्च न्यायालय इनकार कर सकता है (जैसे वैकल्पिक उपचार उपलब्ध हो)
  • क्षेत्र — अपनी अधिकारिता, तथा 226(2) के अधीन वाद-हेतुक के आधार पर उससे बाहर भी
  • निलंबन — “अन्य प्रयोजन” वाली शक्ति आपातकाल में भी बनी रहती है
  • मूल ढाँचाएल. चंद्रकुमार (1997) — 32 एवं 226/227 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति मूल ढाँचा है
सावधानी — 32 और 226 पर तीन जाल
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (उच्च न्यायालय)    सूची-II (मुख्य पीठ)
A. उड़ीसा   1. जोधपुर
B. मध्य प्रदेश   2. कटक
C. राजस्थान   3. नैनीताल
D. उत्तराखंड   4. जबलपुर
कूट:

AA-4, B-2, C-1, D-3BA-2, B-4, C-3, D-1CA-2, B-4, C-1, D-3DA-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)उड़ीसा उच्च न्यायालय — कटक; मध्य प्रदेश — जबलपुर; राजस्थान — जोधपुर (जयपुर में पीठ); उत्तराखंड — नैनीताल। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (उच्च न्यायालय)    (अधिकार-क्षेत्र)
1. केरल उच्च न्यायालय — केरल एवं लक्षद्वीप
2. कलकत्ता उच्च न्यायालय — पश्चिम बंगाल एवं सिक्किम
3. गुवाहाटी उच्च न्यायालय — असम, नागालैंड, मिज़ोरम एवं अरुणाचल प्रदेश
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)कलकत्ता उच्च न्यायालय का क्षेत्र पश्चिम बंगाल तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह है; सिक्किम का अपना अलग उच्च न्यायालय (गंगटोक, 1975) है — अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 3 सही हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग स्वप्रेरणा से भी कर सकता है।
कारण (R): अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों एवं अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति देता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 227 पर्यवेक्षी शक्ति है, जो अधीनस्थ न्यायालयों एवं अधिकरणों (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) पर लागू होती है; पर्यवेक्षी होने के कारण ही इसका प्रयोग स्वप्रेरणा से किया जा सकता है, जबकि अनुच्छेद 226 केवल याचिका पर चलता है। अतः दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।

6. अधीनस्थ न्यायालय एवं अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रश्न

पिरामिड का सबसे चौड़ा और सबसे व्यस्त हिस्सा यही है — देश में लंबित 99% से अधिक वाद इन्हीं न्यायालयों में हैं। संविधान इन्हें भाग VI, अध्याय VI (अनुच्छेद 233 से 237) में केवल पाँच अनुच्छेदों में निपटाता है, पर उन पाँच में जो शक्ति-विभाजन है, वही प्रश्न बनता है।

6.1 अनुच्छेद 233 से 237 — शक्ति किसके पास है

सुमेलन-तालिका 11 : अनुच्छेद 233–237 ↔ विषय ↔ शक्ति किसके पास
अनुच्छेदविषयशक्ति एवं शर्तें
233(1)जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन एवं प्रोन्नति राज्यपाल द्वारा, उस राज्य के संबंध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके। ध्यान दें — नियुक्ति उच्च न्यायालय नहीं, राज्यपाल करते हैं।
233(2)सीधी भर्ती की अर्हता जो व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, वह जिला न्यायाधीश तभी नियुक्त हो सकता है जब वह कम-से-कम सात वर्ष से अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो और उच्च न्यायालय ने उसकी सिफ़ारिश की हो। दोनों शर्तें एक साथ आवश्यक हैं।
233ककुछ नियुक्तियों का विधिमान्यकरण 20वें संविधान संशोधन, 1966 द्वारा जोड़ा गया — उत्तर प्रदेश से जुड़े एक वाद की प्रतिक्रिया में (नीचे देखें)
234जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की न्यायिक सेवा में भर्ती राज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार — और वे नियम राज्य लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय — दोनों से परामर्श के बाद बनते हैं
235नियंत्रण जिला न्यायालयों तथा उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण — जिसके अंतर्गत जिला न्यायाधीश से निम्न पद धारण करने वाले न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की पदस्थापना, प्रोन्नति एवं छुट्टी है — उच्च न्यायालय में निहित है
236परिभाषाएँ “जिला न्यायाधीश” के अंतर्गत — नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश, अपर सत्र न्यायाधीश तथा सहायक सत्र न्यायाधीश आते हैं। “न्यायिक सेवा” = ऐसी सेवा जो अनन्य रूप से जिला न्यायाधीश तथा उससे निम्न सिविल न्यायिक पदों को भरने के लिए आशयित व्यक्तियों से बनी हो
237मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय का विस्तार राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा मजिस्ट्रेटों के किसी वर्ग पर इन उपबंधों को लागू कर सकते हैं
सावधानी — 233 बनाम 234 बनाम 235 का विभाजन
उत्तर प्रदेश संदर्भ — चंद्र मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1966) एवं अनुच्छेद 233क

उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा नियम, 1953 के अधीन राज्य ने जिला न्यायाधीशों की भर्ती न्यायिक सेवा तथा बार के अतिरिक्त कार्यपालिका विभागों के “न्यायिक अधिकारियों” में से भी करनी शुरू कर दी थी, और चयन में उच्च न्यायालय के स्थान पर एक अलग चयन समिति की भूमिका थी। 8 अगस्त 1966 को उच्चतम न्यायालय ने चंद्र मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में इन नियमों को अनुच्छेद 233 के विरुद्ध ठहराकर अपास्त कर दिया — क्योंकि 233 केवल दो स्रोत जानता है : न्यायिक सेवा तथा सात वर्ष का अधिवक्ता, और परामर्श उच्च न्यायालय से ही होना चाहिए।

इससे पहले की गई अनेक नियुक्तियाँ संकट में आ गईं। इसीलिए संसद ने 20वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1966 लाकर अनुच्छेद 233क जोड़ा, जिसने पूर्व की नियुक्तियों तथा उन न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णयों को विधिमान्य कर दिया। इस प्रकार संविधान का एक अनुच्छेद सीधे उत्तर प्रदेश के एक वाद से जन्मा — यह UPPSC के लिए सर्वोत्तम कोटि का तथ्य है।

6.2 अधीनस्थ न्यायालयों का ढाँचा

सुमेलन-तालिका 12 : अधीनस्थ न्यायालयों का दोहरा पदानुक्रम
स्तरदीवानी (civil) पक्षफौजदारी (criminal) पक्ष
जिले का शीर्षजिला न्यायाधीश — जिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय; प्रशासनिक रूप से सभी अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रकसत्र न्यायाधीश — वही व्यक्ति; मृत्युदंड दे सकता है, पर उसकी पुष्टि उच्च न्यायालय से आवश्यक है
द्वितीय स्तरअपर जिला न्यायाधीशअपर सत्र न्यायाधीश
तृतीय स्तरसिविल जज (सीनियर डिवीजन) / सब-जजसहायक सत्र न्यायाधीश; मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
आधार स्तरसिविल जज (जूनियर डिवीजन) / मुंसिफन्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग; न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग
ग्राम स्तरग्राम न्यायालय (ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008) — दीवानी एवं फौजदारी दोनों; न्यायाधिकारी को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा। कुछ राज्यों में न्याय पंचायत भी

6.3 अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) — अनुच्छेद 312 एवं 236 का जोड़

अखिल भारतीय सेवाओं का उपबंध अनुच्छेद 312 में है। मूल संविधान में इसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा का उल्लेख था; 42वें संविधान संशोधन, 1976 ने 312(1) में “जिसके अंतर्गत अखिल भारतीय न्यायिक सेवा भी है” शब्द जोड़े और 312(3) नया खंड जोड़ा।

AIJS के पक्ष में तर्क

  • अधीनस्थ न्यायपालिका में भारी रिक्तियाँ — एकीकृत, समयबद्ध भर्ती संभव
  • प्रतिभा का राष्ट्रीय पूल; समान एवं ऊँचा वेतनमान
  • अनुसूचित जाति/जनजाति एवं महिलाओं का प्रतिनिधित्व संरचित रूप से सुधरेगा
  • उच्च न्यायालयों को बेहतर पदोन्नति-आधार मिलेगा
  • राज्य-स्तरीय भर्ती की अनियमितता एवं विलंब समाप्त होगा

AIJS के विरुद्ध तर्क

  • संघवाद — अनुच्छेद 233, 234 एवं 235 की राज्यपाल/उच्च न्यायालय की शक्ति कमज़ोर होगी
  • भाषा — अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाही राज्य की भाषा में होती है; बाहरी अधिकारी के लिए बाधा
  • स्थानीय विधियों (भू-राजस्व, किरायेदारी, रीति-रिवाज) की समझ का अभाव
  • राज्य न्यायिक सेवा के अधिकारियों की प्रोन्नति-संभावना घटेगी
  • अनेक उच्च न्यायालयों तथा अधिवक्ता-संगठनों का विरोध
सावधानी — अनुच्छेद 312 का शब्द-जाल
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है।
2. जो व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, उसे कम-से-कम सात वर्ष तक अधिवक्ता रहना तथा उच्च न्यायालय द्वारा सिफ़ारिश किया जाना आवश्यक है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2B1 और 2 दोनोंCन तो 1 और न ही 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 233(1) के अनुसार नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद; 233(2) बाहरी व्यक्ति के लिए सात वर्ष का अधिवक्ता-अनुभव तथा उच्च न्यायालय की सिफ़ारिश — दोनों शर्तें रखता है। दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसके सृजन के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है।
2. इसमें अनुच्छेद 236 में यथापरिभाषित जिला न्यायाधीश के पद से निम्नतर कोई पद सम्मिलित नहीं होगा।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)संवैधानिक आधार 42वें संशोधन (1976) से पहले ही मौजूद है; अब केवल राज्य सभा का संकल्प (उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3) तथा संसदीय विधि चाहिए — अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 312(3) के अनुसार सेवा का न्यूनतम स्तर जिला न्यायाधीश है — कथन 2 सही है।

प्र.3 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (अनुच्छेद)    सूची-II (विषय)
A. अनुच्छेद 233   1. अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण
B. अनुच्छेद 234   2. “जिला न्यायाधीश” की परिभाषा
C. अनुच्छेद 235   3. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
D. अनुच्छेद 236   4. जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)233 — जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति; 234 — निचली न्यायिक सेवा में भर्ती; 235 — अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण; 236 — परिभाषाएँ। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।

7. न्यायिक समीक्षा — आधार, दायरा एवं सीमाएँ

7.1 अर्थ, और वह शब्द जो संविधान में है ही नहीं

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) वह शक्ति है जिससे न्यायालय विधानमंडल की विधियों तथा कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करता है, और असंवैधानिक पाए जाने पर उन्हें शून्य (void) घोषित करता है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “न्यायिक समीक्षा” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता — यह शक्ति अनेक अनुच्छेदों के संयुक्त पाठ से निकलती है। यह अमेरिकी संविधान से ली गई अवधारणा है, जहाँ भी यह शब्द संविधान में नहीं, बल्कि मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) के निर्णय से आई थी।

न्यायिक समीक्षा को केशवानंद भारती (1973), इंदिरा नेहरू गांधी (1975), मिनर्वा मिल्स (1980) तथा विशेष रूप से एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997) में संविधान का मूल ढाँचा माना गया — इसलिए इसे संविधान संशोधन द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता।

7.2 अनुच्छेद 13 — न्यायिक समीक्षा का सबसे सीधा उपबंध

सुमेलन-तालिका 13 : अनुच्छेद 13 के चार खंड
खंडउपबंधपरिणाम
13(1)संविधान के प्रारंभ से पूर्व की विधियाँ, जहाँ तक वे भाग III से असंगत हैंअसंगति की सीमा तक शून्य — यहीं से आच्छादन (eclipse) का सिद्धांत तथा पृथक्करणीयता (severability) निकले
13(2)राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनती या न्यून करती होउल्लंघन करने वाली विधि उसी सीमा तक शून्य
13(3)“विधि” की परिभाषाइसके अंतर्गत अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि एवं प्रथा — सब आते हैं। इसीलिए प्रशासनिक अधिसूचना भी चुनौती-योग्य है
13(4)24वें संशोधन, 1971 द्वारा जोड़ा गया — अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संविधान संशोधन पर यह अनुच्छेद लागू नहींयही वह उपबंध था जिसने गोलकनाथ (1967) को पलटा; पर केशवानंद (1973) ने कहा कि संशोधन फिर भी मूल ढाँचे की कसौटी पर परखा जाएगा

7.3 समीक्षा के तीन क्षेत्र एवं उनके आधार

सुमेलन-तालिका 14 : किस चीज़ की समीक्षा, किस आधार पर
क्या परखा जाता हैकसौटीउदाहरण
संविधान संशोधन मूल ढाँचा सिद्धांत 39वें संशोधन का अनु. 329क(4) अपास्त (1975); 42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त (मिनर्वा मिल्स, 1980); 99वाँ संशोधन अपास्त (2015)
साधारण विधि (संसद/राज्य विधानमंडल) (क) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन; (ख) विधायी सक्षमता का अभाव (सातवीं अनुसूची); (ग) संविधान के किसी अन्य उपबंध का उल्लंघन रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; शायरा बानो (2017) — तत्काल तीन तलाक
प्रशासनिक कार्रवाई अवैधता (illegality), अयुक्तियुक्तता (irrationality) तथा प्रक्रियागत अनौचित्य (procedural impropriety); आज इनके साथ आनुपातिकता (proportionality) तथा वैध प्रत्याशा (legitimate expectation) भी प्रशासनिक आदेश, नियुक्ति, निविदा, अनुज्ञप्ति-रद्दीकरण संबंधी वाद
सावधानी — मूल ढाँचा किस पर लागू है और किस पर नहीं

मूल ढाँचा सिद्धांत केवल संविधान संशोधनों पर लागू होता है, साधारण विधियों पर नहीं। कोई साधारण अधिनियम केवल इस आधार पर अपास्त नहीं किया जा सकता कि वह “मूल ढाँचे का उल्लंघन” करता है; उसे भाग III, विधायी सक्षमता या संविधान के किसी विशिष्ट उपबंध की कसौटी पर ही परखा जाएगा। इंदिरा नेहरू गांधी (1975) तथा कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में यह स्पष्ट किया गया। विकल्प में “उच्चतम न्यायालय किसी भी विधि को मूल ढाँचे के आधार पर अपास्त कर सकता है” एक आकर्षक पर गलत कथन है।

7.4 सहायक सिद्धांत — जो निर्णयों में बार-बार आते हैं

सुमेलन-तालिका 15 : सिद्धांत ↔ अर्थ ↔ प्रमुख वाद
सिद्धांतअर्थवाद
पृथक्करणीयता (Severability)विधि का केवल असंवैधानिक भाग हटेगा, शेष जीवित रहेगा — यदि दोनों अलग किए जा सकेंआर.एम.डी. चमारबागवाला बनाम भारत संघ (1957); ए.के. गोपालन (1950)
आच्छादन (Eclipse)संविधान-पूर्व विधि मरती नहीं, केवल ग्रहण-ग्रस्त हो जाती है; बाधा हटते ही (जैसे संशोधन से) पुनः प्रवर्तनीयभीकाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955)
मौलिक अधिकार का अधित्यजन नहीं (Non-waiver)कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकार का स्वेच्छा से भी परित्याग नहीं कर सकताबशेषर नाथ बनाम आयकर आयुक्त (1959)
भविष्यलक्षी अभिखंडन (Prospective Overruling)निर्णय का प्रभाव केवल भविष्य पर; पूर्व की कार्रवाइयाँ अप्रभावितआई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) — मुख्य न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने इसे भारत में पहली बार लागू किया
छद्म विधायन (Colourable Legislation)“जो सीधे नहीं किया जा सकता, वह घुमाकर भी नहीं” — विधानमंडल अपनी सक्षमता से बाहर जाकर विधि नहीं बना सकताके.सी. गजपति नारायण देव बनाम उड़ीसा राज्य (1953)
सारतत्व एवं स्वरूप (Pith and Substance)विधि का वास्तविक विषय देखा जाएगा; आनुषंगिक अतिक्रमण से वह अमान्य नहीं होतीसंघीय विधायी विवादों में — विस्तार अध्याय 4.3 में

7.5 न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ

अमेरिकी न्यायिक समीक्षा

  • आधार — “विधि की सम्यक् प्रक्रिया (due process of law)”
  • न्यायालय विधि की युक्तियुक्तता एवं औचित्य दोनों परखता है
  • दायरा अधिक व्यापक; न्यायपालिका की सर्वोच्चता की ओर झुकाव
  • संविधान में शब्द नहीं — मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) से विकसित

भारतीय न्यायिक समीक्षा

  • आधार — “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (procedure established by law)”
  • मूलतः न्यायालय केवल यह देखता कि विधि सक्षम विधानमंडल ने विधिवत बनाई है या नहीं
  • मेनका गांधी (1978) के बाद व्याख्या से इसका प्रभाव अमेरिकी कसौटी के निकट आ गया
  • भारत में संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का संतुलन — न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता मानता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. “न्यायिक समीक्षा” शब्द भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।
2. एल. चंद्रकुमार वाद (1997) में न्यायिक समीक्षा को संविधान के मूल ढाँचे का अंग माना गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)“न्यायिक समीक्षा” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता; यह शक्ति अनुच्छेद 13, 32, 131–136, 226, 227, 245, 246 आदि के संयुक्त पाठ से निकलती है — कथन 1 गलत है। एल. चंद्रकुमार (1997) में अनुच्छेद 32 एवं 226/227 की समीक्षा-शक्ति को मूल ढाँचा माना गया — कथन 2 सही है।

प्र.2 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (सिद्धांत)    सूची-II (वाद)
A. आच्छादन का सिद्धांत   1. गोलकनाथ
B. भविष्यलक्षी अभिखंडन   2. बशेषर नाथ
C. मौलिक अधिकार का अधित्यजन नहीं   3. भीकाजी नारायण धाकरस
D. पृथक्करणीयता   4. आर.एम.डी. चमारबागवाला
कूट:

AA-3, B-1, C-2, D-4BA-3, B-1, C-4, D-2CA-1, B-3, C-2, D-4DA-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)आच्छादन — भीकाजी नारायण धाकरस (1955); भविष्यलक्षी अभिखंडन — गोलकनाथ (1967); अधित्यजन नहीं — बशेषर नाथ (1959); पृथक्करणीयता — आर.एम.डी. चमारबागवाला (1957)। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): किसी साधारण अधिनियम को केवल इस आधार पर अपास्त नहीं किया जा सकता कि वह संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करता है।
कारण (R): मूल ढाँचा सिद्धांत की कसौटी संविधान संशोधनों पर लागू होती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)साधारण विधि की कसौटी भाग III, विधायी सक्षमता तथा संविधान के विशिष्ट उपबंध हैं; मूल ढाँचा की कसौटी संविधान संशोधनों के लिए है। अतः दोनों कथन सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

8. न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका

8.1 उद्भव — आपातकाल के बाद न्यायपालिका की आत्म-सुधार यात्रा

1975–77 के आपातकाल में, विशेषकर ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) के बाद, उच्चतम न्यायालय की छवि को गहरी चोट पहुँची थी। उसके बाद के वर्षों में न्यायपालिका ने जनता के पक्ष में सक्रिय भूमिका अपनाकर अपनी विश्वसनीयता पुनः अर्जित की — यही न्यायिक सक्रियता (judicial activism) की पृष्ठभूमि है। इसके दो प्रमुख वास्तुकार न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती तथा न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर थे।

परंपरागत विधि में केवल व्यथित पक्षकार (aggrieved party) ही न्यायालय जा सकता था — इसे लोकस स्टैंडाई (locus standi) का नियम कहते हैं। जनहित याचिका का पूरा विचार इसी नियम को शिथिल करने पर टिका है : यदि कोई व्यक्ति या वर्ग निर्धनता, निरक्षरता, असमर्थता या सामाजिक/आर्थिक दुर्बलता के कारण स्वयं न्यायालय नहीं आ सकता, तो कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति या संगठन उसकी ओर से आ सकता है।

1. परंपरागत नियमकेवल व्यथित पक्षकार न्यायालय जा सकता है — अंग्रेज़ी विधि से आया नियम
2. शिथिलीकरण (1979–81)हुसैनारा खातून, एस.पी. गुप्ता — कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति दुर्बल वर्ग की ओर से आ सकता है
3. एपिस्टोलरी अधिकारितापत्र भी याचिका — सुनील बत्रा (द्वितीय), 1980; बाद में पोस्टकार्ड, तार, समाचार-रिपोर्ट तक
4. जाँच का नया औज़ारन्यायालय आयुक्त (commissioner), न्यायमित्र (amicus curiae) तथा विशेषज्ञ समितियाँ नियुक्त करने लगा — यह प्रतिकूल (adversarial) नहीं, अन्वेषी (inquisitorial) पद्धति है
5. सतत परमादेशविनीत नारायण (1997–98) — “continuing mandamus”: न्यायालय मामला बंद नहीं करता, समय-समय पर अनुपालन-रिपोर्ट माँगता रहता है
6. संयम की वापसीबलवंत सिंह चौफाल (2010) — दुरुपयोग रोकने हेतु दिशा-निर्देश; तुच्छ याचिकाओं पर खर्चा (costs)

8.2 प्रमुख जनहित याचिकाएँ एवं उनके परिणाम

सुमेलन-तालिका 16 : जनहित याचिका ↔ वर्ष ↔ परिणाम
वादवर्षपरिणाम / स्थापित सिद्धांत
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य1979विचाराधीन बंदियों की रिहाई; शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 का अंग; पहली बड़ी जनहित याचिका
सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (द्वितीय)1980एक बंदी का पत्र याचिका माना गया — एपिस्टोलरी अधिकारिता
एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ1981लोकस स्टैंडाई का औपचारिक शिथिलीकरण
बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ1984बंधुआ मज़दूरी की पहचान एवं पुनर्वास; जाँच-आयुक्त की नियुक्ति
ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम1985जीविका का अधिकार अनुच्छेद 21 का अंग
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (ओलियम गैस रिसाव)1986पूर्ण दायित्व (absolute liability) का सिद्धांत
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (गंगा प्रदूषण — कानपुर के चर्म-शोधनालय)1987–88कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र के चर्म-शोधनालयों को बहिःस्राव-शोधन संयंत्र लगाने या बंद होने का आदेश; नगर निगम के दायित्व तय — पर्यावरणीय जनहित याचिका का आदर्श उदाहरण
सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य1991प्रदूषणमुक्त जल एवं वायु अनुच्छेद 21 में; साथ ही चेतावनी कि जनहित याचिका व्यक्तिगत द्वेष का साधन न बने
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य1997कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध दिशा-निर्देश, जो 2013 के अधिनियम तक विधि का स्थान लेते रहे
विनीत नारायण बनाम भारत संघ (जैन हवाला)1997–98सतत परमादेश; केंद्रीय सतर्कता आयोग को सांविधिक दर्जा देने का निर्देश; CBI निदेशक का दो वर्ष का कार्यकाल
पीयूसीएल बनाम भारत संघ (भोजन का अधिकार)2001 सेमध्याह्न भोजन योजना सहित खाद्य-सुरक्षा के आदेश; आगे चलकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की पृष्ठभूमि
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ22 सितंबर 2006पुलिस सुधार के सात निदेश — राज्य सुरक्षा आयोग, पुलिस महानिदेशक का न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल, अन्वेषण एवं विधि-व्यवस्था का पृथक्करण, पुलिस स्थापना बोर्ड, पुलिस शिकायत प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग। याचिकाकर्ता प्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके थे
उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल2010जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने हेतु उच्च न्यायालयों को दिशा-निर्देश बनाने का आदेश
नाल्सा बनाम भारत संघ2014ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग की मान्यता
उत्तर प्रदेश संदर्भ — जनहित याचिका के मानचित्र पर UP

8.3 न्यायिक सक्रियता की आलोचना — “अतिक्रमण” कहाँ से शुरू होता है

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित वादों को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।
1. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य
2. एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ
3. प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ
4. हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A4, 2, 3, 1B2, 4, 1, 3C2, 4, 3, 1D4, 2, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)हुसैनारा खातून 1979, एस.पी. गुप्ता 1981, विशाखा 1997 तथा प्रकाश सिंह 2006 — अतः क्रम 4, 2, 1, 3 है।

प्र.2 जनहित याचिका के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. जनहित याचिका का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 32 में स्पष्ट रूप से किया गया है।
2. जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय — दोनों के समक्ष लाई जा सकती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)जनहित याचिका संविधान में कहीं वर्णित नहीं — यह न्यायिक नवाचार है, अतः कथन 1 गलत है। यह अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) तथा अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) — दोनों के अधीन लाई जा सकती है, अतः कथन 2 सही है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (वाद)    (स्थापित सिद्धांत/परिणाम)
1. विनीत नारायण — सतत परमादेश
2. एम.सी. मेहता (ओलियम गैस) — पूर्ण दायित्व
3. बलवंत सिंह चौफाल — एपिस्टोलरी अधिकारिता का आरंभ
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने के दिशा-निर्देशों के लिए जाना जाता है; एपिस्टोलरी अधिकारिता 1980 के दशक की देन है (सुनील बत्रा द्वितीय आदि)। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

9. मूल ढाँचा सिद्धांत — केशवानंद से आगे

9.1 टकराव की कहानी — संसद बनाम न्यायपालिका

प्रश्न सरल था और उत्तर कठिन : क्या संसद अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है — मौलिक अधिकारों को भी? इस एक प्रश्न पर दो दशक तक न्यायालय का मत तीन बार बदला, और अंततः वह सिद्धांत निकला जिसे भारतीय संवैधानिक विधि का सबसे बड़ा योगदान माना जाता है।

1951शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ — पहला संविधान संशोधन वैध; अनु. 13 के “विधि” में संविधान संशोधन सम्मिलित नहीं; संसद मौलिक अधिकार भी संशोधित कर सकती है
1965सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य — 17वाँ संशोधन वैध; शंकरी प्रसाद की पुष्टि, किंतु दो न्यायाधीशों (हिदायतुल्ला एवं मुधोलकर) की असहमति में पहली बार यह संदेह कि क्या मौलिक अधिकार “संशोधन का खिलौना” हो सकते हैं
1967आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य — 11 न्यायाधीश, 6:5 · संसद मौलिक अधिकारों में कोई कटौती नहीं कर सकती; भविष्यलक्षी अभिखंडन लागू
197124वाँ संविधान संशोधन — गोलकनाथ को पलटने के लिए; अनु. 13(4) तथा 368(3) जोड़े; संसद को मौलिक अधिकार संशोधित करने की स्पष्ट शक्ति
24 अप्रैल 1973केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य13 न्यायाधीश, 7:6 · संसद संशोधन कर सकती है, पर मूल ढाँचा नष्ट नहीं कर सकती · गोलकनाथ पलटा, 24वाँ संशोधन वैध, 25वें संशोधन का अनु. 31ग का दूसरा भाग अपास्त
7 नवंबर 1975इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायणअनुच्छेद 329क(4) अपास्त · मूल ढाँचा सिद्धांत का पहला व्यावहारिक प्रयोग · स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन, विधि का शासन, न्यायिक समीक्षा — मूल ढाँचा
197642वाँ संविधान संशोधन — अनु. 368(4) एवं (5) जोड़कर घोषित किया गया कि संशोधन की शक्ति असीमित है और उस पर न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता
31 जुलाई 1980मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ — 42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त · 368(4) एवं (5) असंवैधानिक · सीमित संशोधन-शक्ति तथा मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन — मूल ढाँचा
1981वामन राव बनाम भारत संघ — नौवीं अनुसूची के लिए 24 अप्रैल 1973 की निर्णायक तिथि तय
1992किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू — दसवीं अनुसूची; स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन तथा लोकतंत्र मूल ढाँचा · इंद्रा साहनी — विधि का शासन
11 मार्च 1994एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघधर्मनिरपेक्षता, संघवाद, लोकतंत्र तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता मूल ढाँचा; अनु. 356 पर न्यायिक समीक्षा
18 मार्च 1997एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ — 7 न्यायाधीश · अनु. 32 तथा 226/227 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति मूल ढाँचा; अधिकरण उच्च न्यायालय का विकल्प नहीं, पूरक
11 जनवरी 2007आई.आर. कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य — 9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत · 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाली गई विधियाँ भी मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं
16 अक्टूबर 2015NJAC वादन्यायपालिका की स्वतंत्रता मूल ढाँचा; 99वाँ संशोधन अपास्त
7 नवंबर 2022जनहित अभियान बनाम भारत संघ103वाँ संशोधन (EWS आरक्षण) 3:2 से वैध; बहुमत ने माना कि यह मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं करता

9.2 केशवानंद भारती — तथ्य जो ठीक-ठीक याद रहने चाहिए

सावधानी — केशवानंद के बारे में तीन आम भ्रांतियाँ

9.3 कौन-से तत्व मूल ढाँचा माने गए

सुमेलन-तालिका 17 : मूल ढाँचे का तत्व ↔ जिस वाद में मान्यता मिली
तत्वप्रमुख वाद
संविधान की सर्वोच्चताकेशवानंद भारती (1973)
संप्रभु, लोकतांत्रिक एवं गणराज्यात्मक स्वरूपकेशवानंद भारती (1973)
शक्तियों का पृथक्करणकेशवानंद भारती (1973); NJAC वाद (2015)
संघीय ढाँचाकेशवानंद भारती (1973); एस.आर. बोम्मई (1994)
धर्मनिरपेक्ष स्वरूपएस.आर. बोम्मई (1994)
राष्ट्र की एकता एवं अखंडताएस.आर. बोम्मई (1994)
विधि का शासनइंदिरा नेहरू गांधी (1975); इंद्रा साहनी (1992)
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचनइंदिरा नेहरू गांधी (1975); किहोतो होलोहन (1992)
न्यायिक समीक्षाकेशवानंद (1973); इंदिरा नेहरू गांधी (1975); मिनर्वा मिल्स (1980); एल. चंद्रकुमार (1997)
संसद की संशोधन-शक्ति का सीमित होनामिनर्वा मिल्स (1980)
मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य एवं संतुलनमिनर्वा मिल्स (1980)
न्यायपालिका की स्वतंत्रताएस.पी. संपत कुमार (1987); NJAC वाद (2015)
अनुच्छेद 32 तथा 226/227 की शक्तियाँ; न्याय तक प्रभावी पहुँचएल. चंद्रकुमार (1997)
अनुच्छेद 136, 141 एवं 142 के अधीन उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँदिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य (1991)
समता का सिद्धांत (उसका सार-तत्व)एम. नागराज (2006); इंद्रा साहनी (1992)
व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा; अनुच्छेद 21आई.आर. कोएलो (2007) — “अधिकारों की कसौटी”
संसदीय शासन-प्रणाली एवं कल्याणकारी राज्य का लक्ष्यकेशवानंद भारती (1973) के मतों में
मूल ढाँचे के प्रमुख तत्व — छह गुच्छों में “संविधान–संप्रभुता–धर्मनिरपेक्षता–संघवाद–समीक्षा–संतुलन”

सभी प्रमुख तत्व “स” से शुरू होने वाले छह शब्दों में सिमट जाते हैं — संविधान की सर्वोच्चता · संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्यात्मक स्वरूप (+ विधि का शासन, स्वतंत्र निर्वाचन) · धर्मनिरपेक्षता (बोम्मई) · संघवाद तथा राष्ट्र की एकता (बोम्मई) · न्यायिक समीक्षा एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता (चंद्रकुमार, NJAC) · मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन तथा शक्तियों का पृथक्करण (मिनर्वा मिल्स)। जो तत्व किसी “स” में न बैठे, वह प्रायः इन्हीं का विस्तार है।

9.4 सिद्धांत की आलोचना एवं महत्व

आलोचना

  • अस्पष्टता — “मूल ढाँचा” की कोई निश्चित सूची नहीं; हर पीठ नया तत्व जोड़ सकती है
  • पाठ में आधार नहीं — अनुच्छेद 368 में ऐसी कोई सीमा लिखी नहीं है
  • लोकतांत्रिक आपत्ति — अनिर्वाचित न्यायाधीश निर्वाचित संसद की संविधान-संशोधन शक्ति सीमित करते हैं
  • सिद्धांत का प्रयोग कभी-कभी असंगत रहा है

महत्व

  • 1975–77 में अनुच्छेद 329क को अपास्त कर इसने लोकतंत्र की रक्षा की
  • 42वें संशोधन के अतिरेक को 1980 में पलटने का आधार बना
  • संविधान को “संशोधन द्वारा प्रतिस्थापन” से बचाता है — संसद संविधान बदल सकती है, नष्ट नहीं कर सकती
  • बांग्लादेश, पाकिस्तान, युगांडा, केन्या जैसे देशों के न्यायालयों ने भी इसका उल्लेख किया है
  • संशोधन की शक्ति और संविधान बनाने की शक्ति का भेद स्पष्ट करता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (वाद)    सूची-II (मूल ढाँचे के रूप में मान्य तत्व)
A. एस.आर. बोम्मई   1. संसद की सीमित संशोधन-शक्ति
B. मिनर्वा मिल्स   2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
C. एल. चंद्रकुमार   3. धर्मनिरपेक्षता एवं संघवाद
D. NJAC वाद   4. अनुच्छेद 32 एवं 226 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति
कूट:

AA-1, B-3, C-4, D-2BA-3, B-1, C-2, D-4CA-3, B-1, C-4, D-2DA-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)बोम्मई (1994) — धर्मनिरपेक्षता एवं संघवाद; मिनर्वा मिल्स (1980) — संसद की सीमित संशोधन-शक्ति तथा अधिकार–निदेशक तत्व संतुलन; एल. चंद्रकुमार (1997) — अनुच्छेद 32 एवं 226/227 की समीक्षा-शक्ति; NJAC वाद (2015) — न्यायपालिका की स्वतंत्रता। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।

प्र.2 केशवानंद भारती वाद (1973) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसका निर्णय 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 के बहुमत से दिया।
2. इस निर्णय में 24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पीठ 13 न्यायाधीशों की थी और बहुमत 7:6 — कथन 1 सही है। 24वाँ संशोधन वैध ठहराया गया था; अपास्त हुआ था 25वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 31ग का दूसरा भाग — अतः कथन 2 गलत है।

प्र.3 निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए।
1. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
2. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
3. आई.आर. कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य
4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 4, 1, 3B2, 4, 3, 1C4, 2, 1, 3D4, 2, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)गोलकनाथ 1967, केशवानंद भारती 1973, मिनर्वा मिल्स 1980 तथा आई.आर. कोएलो 2007 — अतः क्रम 2, 4, 1, 3 है।

10. अधिकरण — अनुच्छेद 323क एवं 323ख तथा एल. चंद्रकुमार वाद

10.1 भाग XIV-क — क्यों जोड़ा गया

अधिकरण (tribunal) न पूरी तरह न्यायालय है, न पूरी तरह प्रशासनिक निकाय — यह अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) संस्था है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र के विवाद शीघ्रता से, तकनीकी विशेषज्ञता के साथ और कम खर्च में निपटाने के लिए बनाई जाती है। मूल संविधान में अधिकरणों का कोई उपबंध नहीं था। स्वर्ण सिंह समिति की सिफ़ारिश पर 42वें संविधान संशोधन, 1976 ने नया भाग XIV-क जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 323क तथा 323ख — केवल दो अनुच्छेद हैं।

अनुच्छेद 323क · प्रशासनिक अधिकरण

  • विषय — केवल लोक सेवाओं की भर्ती तथा सेवा-शर्तों से जुड़े विवाद
  • कौन बना सकता हैकेवल संसद
  • कितने — संघ के लिए एक, और प्रत्येक राज्य के लिए एक (या दो/अधिक राज्यों के लिए एक)
  • पदानुक्रम — अधिकरणों का कोई पदानुक्रम नहीं (कोई अपीलीय अधिकरण नहीं)
  • उदाहरण — केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), राज्य प्रशासनिक अधिकरण

अनुच्छेद 323ख · अन्य विषयों के अधिकरण

  • विषय — कर, विदेशी मुद्रा एवं आयात-निर्यात, औद्योगिक एवं श्रम विवाद, भूमि सुधार, नगरीय संपत्ति की अधिकतम सीमा, संसद/विधानमंडल के निर्वाचन, खाद्य-पदार्थों का उत्पादन-वितरण, किराया एवं किरायेदारी, तथा इनसे जुड़े अपराध
  • कौन बना सकता हैसंसद तथा राज्य विधानमंडल — दोनों, अपनी-अपनी विधायी सक्षमता के भीतर
  • कितने — कोई संख्या-सीमा नहीं
  • पदानुक्रम — अधिकरणों का पदानुक्रम बनाया जा सकता है
  • उदाहरण — आयकर अपीलीय अधिकरण, किराया अधिकरण, औद्योगिक अधिकरण

10.2 एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997) — मोड़-बिंदु

दोनों अनुच्छेदों में एक-एक खंड ऐसा था जिसने पूरा विवाद खड़ा कर दिया — 323क(2)(घ) तथा 323ख(3)(घ), जो संसद/विधानमंडल को यह शक्ति देते थे कि वे अनुच्छेद 136 के अधीन उच्चतम न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित कर दें। इसका सीधा अर्थ यह था कि उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226/227 वाली शक्ति समाप्त हो जाती।

सावधानी — एल. चंद्रकुमार के बाद अधिकरणों पर समीक्षा का ढाँचा

10.3 प्रमुख अधिकरण — स्थापना एवं क्षेत्र

सुमेलन-तालिका 18 : अधिकरण ↔ स्थापना ↔ क्षेत्र
अधिकरणस्थापना / मूल विधिक्षेत्र एवं विशेषता
आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT)1941भारत का सबसे पुराना अधिकरण — इसे “अधिकरणों की जननी (Mother Tribunal)” कहा जाता है; प्रत्यक्ष कर संबंधी अपीलें
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT)1985 — प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (अनुच्छेद 323क)केंद्र सरकार के कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा-शर्तें; मुख्य पीठ नई दिल्ली; अध्यक्ष एवं सदस्य (न्यायिक + प्रशासनिक)
ऋण वसूली अधिकरण (DRT)1993बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं की ऋण-वसूली; अपील — ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण
प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण (SAT)1990 के दशक — सेबी अधिनियम, 1992 के अधीनसेबी, IRDAI तथा PFRDA के आदेशों के विरुद्ध अपील; मुख्यालय मुंबई
दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT)2000 — ट्राई (संशोधन) अधिनियम, 2000दूरसंचार, प्रसारण, साइबर तथा हवाई-अड्डा प्रशुल्क संबंधी विवाद
सशस्त्र बल अधिकरण (AFT)अधिनियम 2007, स्थापना 2009सेना, नौसेना, वायुसेना के कर्मियों की सेवा-शर्तें तथा सैन्य न्यायालय के दंड के विरुद्ध अपील; मुख्य पीठ नई दिल्ली
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)18 अक्टूबर 2010 — राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010पर्यावरण संरक्षण एवं वन; ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूज़ीलैंड के बाद भारत ऐसा विशेषीकृत पर्यावरण न्यायालय बनाने वाला तीसरा देश; मुख्य पीठ नई दिल्ली, क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता एवं चेन्नई
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) एवं NCLAT2016 — कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीनकंपनी विधि तथा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के मामले
वस्तु एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण (GSTAT)2025 में कार्यारंभGST संबंधी अपीलें; मुख्य पीठ नई दिल्ली, साथ में राज्य पीठें; मुख्य पीठ ही अग्रिम विनिर्णय की राष्ट्रीय अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करती है
उत्तर प्रदेश संदर्भ — उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण

प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 के अधीन राज्य प्रशासनिक अधिकरण राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार गठित करती है। उत्तर प्रदेश ने यह मार्ग न चुनकर अपनी राज्य-विधि से काम लिया — उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 (मूल रूप से 16 फ़रवरी 1976 के अध्यादेश से) के अधीन गठित उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण, जिसका मुख्य पीठ लखनऊ में है, राज्य कर्मचारियों की सेवा-सम्बन्धी शिकायतों को देखता है। ध्यान दें कि अनुच्छेद 323क के अधीन अधिकरण केवल संसद बना सकती है; उत्तर प्रदेश का यह अधिकरण उस अनुच्छेद के अधीन नहीं, राज्य विधि के अधीन है — यह भेद परीक्षा-योग्य है। एल. चंद्रकुमार के बाद इसके निर्णय भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226/227 वाली समीक्षा के अधीन हैं।

10.4 अधिकरणों का समकालीन संकट

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 323क एवं 323ख के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 323क के अधीन अधिकरण केवल संसद द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं।
2. अनुच्छेद 323ख के अधीन अधिकरणों का पदानुक्रम बनाया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)323क केवल संसद को शक्ति देता है और उसमें अधिकरणों का पदानुक्रम नहीं हो सकता; 323ख संसद तथा राज्य विधानमंडल — दोनों को शक्ति देता है और उसमें पदानुक्रम अनुमत है। दोनों कथन सही हैं।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अब उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष जाया जा सकता है।
कारण (R): एल. चंद्रकुमार वाद (1997) में अनुच्छेद 323क(2)(घ) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)323क(2)(घ) उच्च न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित करता था; एल. चंद्रकुमार (1997) ने उसे अपास्त कर यह व्यवस्था दी कि अधिकरण के निर्णय पहले संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष जाएँगे। अतः दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अधिकरण)    (स्थापना वर्ष)
1. केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण — 1985
2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण — 2010
3. सशस्त्र बल अधिकरण — 1985
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)सशस्त्र बल अधिकरण का अधिनियम 2007 का है और अधिकरण 2009 में स्थापित हुआ, 1985 में नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। CAT 1985 तथा NGT 2010 सही हैं।

11. लोक अदालत, ग्राम न्यायालय, विधिक सेवा प्राधिकरण एवं वैकल्पिक विवाद समाधान

11.1 संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 39क

न्याय तक पहुँच केवल न्यायालय के दरवाज़े तक पहुँचने से नहीं बनती; उसके लिए सामर्थ्य भी चाहिए। 42वें संविधान संशोधन, 1976 ने भाग IV में अनुच्छेद 39क जोड़ा — “राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो, और विशिष्टतया यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए — इसके लिए वह उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा निःशुल्क विधिक सहायता देगा।” यही अनुच्छेद लोक अदालत, विधिक सेवा प्राधिकरण तथा ग्राम न्यायालय — तीनों की जड़ है।

11.2 विधिक सेवा प्राधिकरण — ढाँचा

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 संसद ने 1987 में पारित किया, पर वह 9 नवंबर 1995 को प्रवृत्त हुआ — इसीलिए 9 नवंबर को राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस मनाया जाता है। इसी अधिनियम ने लोक अदालत को सांविधिक दर्जा दिया।

सुमेलन-तालिका 19 : विधिक सेवा प्राधिकरण ↔ संरक्षक/अध्यक्ष
स्तरनिकायनेतृत्व
राष्ट्रीयराष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) — 1995 में गठितमुख्य संरक्षक (Patron-in-Chief) — भारत के मुख्य न्यायमूर्ति; कार्यकारी अध्यक्ष — उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश
उच्चतम न्यायालयउच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समितिउच्चतम न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश (मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नामित)
राज्यराज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA)मुख्य संरक्षक — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति; कार्यकारी अध्यक्ष — उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश
उच्च न्यायालयउच्च न्यायालय विधिक सेवा समितिउच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश
जिलाजिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)जिला न्यायाधीश — अध्यक्ष
तालुक/तहसीलतालुक विधिक सेवा समितिवरिष्ठतम सिविल न्यायाधीश

11.3 लोक अदालत — “जनता की अदालत”

पहली लोक अदालत 14 मार्च 1982 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऊना में लगी थी — तब उसका कोई सांविधिक आधार नहीं था, वह विशुद्ध स्वैच्छिक सुलह-मंच था। 1987 के अधिनियम ने इसे विधिक स्वरूप दिया।

सुमेलन-तालिका 20 : लोक अदालत ↔ स्थायी लोक अदालत ↔ ग्राम न्यायालय — तीनों का भेद
आधारलोक अदालतस्थायी लोक अदालतग्राम न्यायालय
विधिविधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (धारा 19–21)उसी अधिनियम की धारा 22ख2002 के संशोधन से जोड़ी गईग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 — प्रवृत्त 2 अक्टूबर 2009
क्षेत्रलंबित वाद तथा वाद-पूर्व विवाद — दोनोंकेवल लोक उपयोगिता सेवाएँ — परिवहन, डाक-तार-दूरभाष, विद्युत/जल आपूर्ति, सफ़ाई, अस्पताल/औषधालय, बीमा आदिमध्यवर्ती पंचायत स्तर पर दीवानी एवं फौजदारी दोनों — छोटे मामले
धन-सीमाकोई निश्चित सीमा नहींसंपत्ति का मूल्य ₹1 करोड़ से अधिक न होराज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सीमा
यदि समझौता न होमामला न्यायालय को लौटा दिया जाता हैगुण-दोष पर स्वयं निर्णय कर सकती है — यही इसकी विशेषता हैयह स्वयं एक न्यायालय है; निर्णय सुनाती है
पंचाट/निर्णयदीवानी न्यायालय की डिक्री माना जाता है; अंतिम एवं आबद्धकर; कोई अपील नहींअंतिम एवं आबद्धकर; दीवानी न्यायालय की डिक्री के समानदांडिक अपील सत्र न्यायालय को, दीवानी अपील जिला न्यायालय को — दोनों छह मास में निपटाई जानी हैं
क्या नहीं सुन सकतीअशमनीय (non-compoundable) अपराधअशमनीय अपराधअनुसूचियों में निर्दिष्ट मामलों से बाहर के विषय
प्रकृतिसुलह-आधारित; न्यायालय-शुल्क वापस मिल जाता हैपहले सुलह अनिवार्य, विफल होने पर निर्णयपूर्ण न्यायालय; न्यायाधिकारी को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा

11.4 ग्राम न्यायालय — गाँव तक पहुँचती अदालत

उत्तर प्रदेश संदर्भ — ग्राम न्यायालय एवं त्वरित न्यायालय दोनों में देश में सबसे आगे

11.5 वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) — न्यायालय के बाहर का रास्ता

सुमेलन-तालिका 21 : ADR की विधियाँ ↔ स्वरूप ↔ विधिक आधार
विधिस्वरूपविधिक आधार
माध्यस्थम् (Arbitration)तटस्थ मध्यस्थ पक्षकारों को सुनकर बाध्यकारी पंचाट देता है — यह निर्णय-मूलक हैमाध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 (UNCITRAL आदर्श विधि पर आधारित); संशोधन 2015, 2019 एवं 2021
सुलह (Conciliation)सुलहकर्ता स्वयं समझौते का प्रस्ताव दे सकता है; समझौता होने पर वह पंचाट जैसा प्रवर्तनीयमाध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 का भाग III
मध्यस्थता (Mediation)मध्यस्थ केवल संवाद कराता है, निर्णय नहीं देता; समाधान पक्षकारों का अपना होता हैमध्यस्थता अधिनियम, 2023 — भारत का पहला समर्पित मध्यस्थता कानून; वाद-पूर्व मध्यस्थता का उपबंध
वार्ता (Negotiation)पक्षकार स्वयं, बिना किसी तीसरे पक्ष केकोई विशिष्ट विधि नहीं
लोक अदालतसुलह-आधारित; पंचाट दीवानी डिक्री के समानविधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 लोक अदालत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. लोक अदालत का पंचाट दीवानी न्यायालय की डिक्री माना जाता है और उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं होती।
2. लोक अदालत अशमनीय अपराधों से संबंधित मामलों का भी निपटारा कर सकती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पंचाट दीवानी डिक्री के समान, अंतिम एवं आबद्धकर होता है और उसके विरुद्ध अपील नहीं होती — कथन 1 सही है। लोक अदालत अशमनीय (non-compoundable) अपराधों का निपटारा नहीं कर सकती — कथन 2 गलत है।

प्र.2 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (निकाय)    सूची-II (नेतृत्व)
A. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक   1. जिला न्यायाधीश
B. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का कार्यकारी अध्यक्ष   2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति
C. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक   3. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति
D. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष   4. उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश
कूट:

AA-4, B-3, C-1, D-2BA-3, B-4, C-2, D-1CA-3, B-4, C-1, D-2DA-4, B-3, C-2, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)NALSA के मुख्य संरक्षक भारत के मुख्य न्यायमूर्ति तथा कार्यकारी अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश होते हैं; SLSA के मुख्य संरक्षक संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति; DLSA के अध्यक्ष जिला न्यायाधीश। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।

प्र.3 ग्राम न्यायालयों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 राज्यों के लिए ग्राम न्यायालय स्थापित करना अनिवार्य बनाता है।
2. ग्राम न्यायालय के न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करके करती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अधिनियम राज्यों को ग्राम न्यायालय स्थापित करने का विकल्प देता है, बाध्य नहीं करता — इसीलिए क्रियान्वयन असमान रहा है; कथन 1 गलत है। न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद करती है और उसे प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा प्राप्त होता है — कथन 2 सही है।

12. समकालीन मुद्दे, सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम

12.1 लंबित वाद — आँकड़ों में समस्या

5.39 करोड़सभी न्यायालयों में कुल लंबित वाद
(31 दिसंबर 2025)
92,101उच्चतम न्यायालय में लंबित
63.66 लाख25 उच्च न्यायालयों में लंबित
4.76 करोड़जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित
38उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या (2026 से)
1,122सभी उच्च न्यायालयों की कुल स्वीकृत संख्या
160इलाहाबाद — देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय
12 लाखइलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित — देश में सर्वाधिक

तीन बातें इन आँकड़ों से सीधे निकलती हैं। पहली — लंबित वादों का लगभग 99% बोझ जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर है, इसलिए सुधार की असली लड़ाई वहीं है, उच्चतम न्यायालय में नहीं। दूसरी — उच्च न्यायालयों में स्वीकृत 1,122 पदों के विरुद्ध लगभग एक-तिहाई पद रिक्त रहते हैं, और अधीनस्थ न्यायपालिका में भी लगभग 20% रिक्तियाँ हैं। तीसरी — भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या लगभग 20–21 है, जबकि विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट (1987) ने इसे 50 करने की सिफ़ारिश की थी और अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ (2002) में उच्चतम न्यायालय ने भी यही लक्ष्य दोहराया था।

12.2 विलंब के कारण एवं उपाय

विलंब के प्रमुख कारण

  • रिक्तियाँ — नियुक्ति-प्रक्रिया में विलंब (कॉलेजियम–सरकार गतिरोध)
  • अवसंरचना — न्यायालय-कक्ष, स्टाफ़, अभिलेखागार की कमी
  • सरकार सबसे बड़ी वादी — लगभग आधे वादों में राज्य पक्षकार है; अनावश्यक अपीलें
  • स्थगन की संस्कृति — बार-बार तारीख; दीवानी प्रक्रिया संहिता की सीमा के बावजूद
  • पुरानी एवं जटिल विधियाँ; साक्ष्य-प्रक्रिया की लंबाई
  • विशेष विधियों द्वारा नए वर्गों के वाद लगातार जुड़ते जाना

चल रहे उपाय

  • ई-न्यायालय परियोजना, चरण-III — सितंबर 2023 में मंजूर, ₹7,210 करोड़, चार वर्ष (2023 से) — अभिलेखों का डिजिटलीकरण, ई-फाइलिंग, ई-सेवा केंद्र
  • राष्ट्रीय न्यायिक आँकड़ा ग्रिड (NJDG) — प्रत्येक न्यायालय की लंबित/निपटान स्थिति सार्वजनिक
  • लोक अदालत एवं ADR; वाणिज्यिक न्यायालय; त्वरित विशेष न्यायालय
  • अनुच्छेद 224क के अधीन तदर्थ न्यायाधीश (2021 दिशा-निर्देश, 2025 में शिथिल)
  • संविधान पीठ की सुनवाइयों का सीधा प्रसारण (2018 के स्वप्निल त्रिपाठी निर्णय के बाद, 2022 से नियमित)
  • निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद (SUVAS/SUPACE जैसे AI उपकरण); तटस्थ उद्धरण (neutral citation)

12.3 न्यायिक जवाबदेही — एक अधूरा ढाँचा

परीक्षा-दृष्टि — इस अध्याय के सर्वाधिक संभावित प्रश्न-बिंदु

12.4 सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची — एक दृष्टि में

सुमेलन-तालिका 22 : न्यायपालिका से संबंधित सभी अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेदविषय
50कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (नीति-निदेशक तत्व)
121 · 211न्यायाधीश के आचरण पर संसद/राज्य विधानमंडल में चर्चा का निषेध
124उच्चतम न्यायालय की स्थापना एवं गठन; नियुक्ति; अर्हता; हटाना
124क · 124ख · 124गNJAC — 99वें संशोधन (2014) द्वारा जोड़े गए, 2015 में अपास्त
125उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन
126 · 127 · 128कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति · तदर्थ न्यायाधीश · सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति
129 · 215अभिलेख न्यायालय — उच्चतम न्यायालय · उच्च न्यायालय
130उच्चतम न्यायालय का स्थान
131आरंभिक अधिकारिता — संघ एवं राज्यों के विवाद
131ककेंद्रीय विधियों पर अनन्य अधिकारिता — 42वें (1976) से जोड़ा, 43वें (1977) से हटाया
132 · 133 · 134 · 134क · 135अपीलीय अधिकारिता — संवैधानिक · दीवानी · दांडिक · प्रमाणपत्र · फेडरल कोर्ट की अधिकारिता
136विशेष अनुमति याचिका — सशस्त्र बल न्यायालय/अधिकरण अपवाद
137निर्णयों का पुनर्विलोकन
138 · 139 · 139कअधिकारिता का विस्तार · रिट जारी करने की शक्ति का विस्तार · कुछ मामलों का अंतरण (42वें से जोड़ा)
140 · 144 · 144कअनुपूरक शक्तियाँ · सभी प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता करेंगे · 144क — 42वें से जोड़ा, 43वें से हटाया
141घोषित विधि सभी न्यायालयों पर आबद्धकर
142पूर्ण न्याय करने की शक्ति; डिक्री का प्रवर्तन; अवमान
143परामर्शदात्री अधिकारिता
145 · 146 · 147नियम (145(3) — न्यूनतम पाँच न्यायाधीश) · अधिकारी एवं व्यय · निर्वचन
214 · 216प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय · उसका गठन
217 · 218 · 219 · 220 · 221नियुक्ति एवं अर्हता · हटाना · शपथ · वकालत पर रोक · वेतन
222 · 223 · 224 · 224कस्थानांतरण · कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति · अपर/कार्यकारी न्यायाधीश · सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठक
225 · 226 · 226क · 227 · 228 · 228कविद्यमान अधिकारिता · रिट · 226क — 42वें से जोड़ा, 43वें से हटाया · अधीक्षण · मामलों का अंतरण · 228क — 42वें से जोड़ा, 43वें से हटाया
229 · 230 · 231अधिकारी एवं व्यय · संघ राज्यक्षेत्रों तक विस्तार · दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालय
233 · 233क · 234 · 235 · 236 · 237जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति · विधिमान्यकरण · अन्य भर्ती · उच्च न्यायालय का नियंत्रण · परिभाषाएँ · मजिस्ट्रेटों पर विस्तार
312अखिल भारतीय सेवाएँ — अखिल भारतीय न्यायिक सेवा सहित (42वाँ संशोधन)
323क · 323खअधिकरण — भाग XIV-क (42वाँ संशोधन, 1976)
13 · 32 · 39क · 262 · 329कअसंगत विधियाँ · संवैधानिक उपचार · निःशुल्क विधिक सहायता · जल विवाद · 329क — 39वें से जोड़ा, 1975 में आंशिक रूप से अपास्त

12.5 कालक्रम — वाद, संशोधन एवं विधियाँ एक साथ

सुमेलन-तालिका 23 : न्यायपालिका का कालक्रम
वर्षघटनामहत्व
1861 · 1862भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम; कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास उच्च न्यायालयकलकत्ता देश का सबसे पुराना उच्च न्यायालय
1866इलाहाबाद उच्च न्यायालय (आगरा में; 1869 में इलाहाबाद)आगे चलकर देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय
1937फेडरल कोर्ट की स्थापना (भारत शासन अधिनियम, 1935)उच्चतम न्यायालय का पूर्ववर्ती
1949 · 1950प्रिवी काउंसिल की अधिकारिता समाप्त; 28 जनवरी 1950 को उच्चतम न्यायालय का कार्यारंभप्रथम मुख्य न्यायमूर्ति — एच.जे. कनिया; प्रारंभिक संख्या 8
1951 · 1965शंकरी प्रसाद · सज्जन सिंहसंसद मौलिक अधिकार भी संशोधित कर सकती है
196315वाँ संविधान संशोधनअनुच्छेद 224क, 124(2क) तथा 217(3) जोड़े गए; उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की आयु 60 से 62 की गई
1964केशव सिंह निर्देश (उत्तर प्रदेश विधान सभा बनाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय)अनुच्छेद 143 के अधीन 7 न्यायाधीशों की राय; विधायी विशेषाधिकार निरपेक्ष नहीं
1966चंद्र मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य · 20वाँ संशोधनअनुच्छेद 233 की व्याख्या; अनुच्छेद 233क जोड़ा गया
1967गोलकनाथ — 11 न्यायाधीश, 6:5मौलिक अधिकार संशोधन से परे; भविष्यलक्षी अभिखंडन
197124वाँ संशोधनअनु. 13(4) एवं 368(3); गोलकनाथ को पलटने का प्रयास
24 अप्रैल 1973केशवानंद भारती — 13 न्यायाधीश, 7:6मूल ढाँचा सिद्धांत; इसी वर्ष न्यायमूर्ति ए.एन. राय का अधिक्रमण
12 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय — इंदिरा गांधी का निर्वाचन शून्य25 जून 1975 के आपातकाल की तात्कालिक पृष्ठभूमि
7 नवंबर 1975इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायणअनुच्छेद 329क(4) अपास्त — मूल ढाँचे का पहला प्रयोग
197642वाँ संशोधनभाग XIV-क (323क, 323ख); अनु. 39क; 312 में AIJS; 131क, 144क, 226क, 228क, 32क; अनु. 227 का संकुचन
197743वाँ संशोधन131क, 144क, 226क, 228क तथा 32क हटाए गए
197844वाँ संशोधनअनुच्छेद 134क जोड़ा; अनु. 227 का अधीक्षण बहाल; 226(3) का दो-सप्ताह वाला उपबंध
1980 · 1981मिनर्वा मिल्स (31 जुलाई 1980) · एस.पी. गुप्ता (1981)368(4) एवं (5) अपास्त · प्रथम न्यायाधीश वाद तथा जनहित याचिका का आधार
1985प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम; CAT की स्थापनाअनुच्छेद 323क का पहला प्रयोग
1987 · 1995विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987; 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्तलोक अदालत को सांविधिक दर्जा; राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस
6 अक्टूबर 1993द्वितीय न्यायाधीश वाद — 9 न्यायाधीश, 7:2परामर्श = सहमति; कॉलेजियम
1994 · 1997एस.आर. बोम्मई (11 मार्च 1994) · एल. चंद्रकुमार (18 मार्च 1997)धर्मनिरपेक्षता एवं संघवाद मूल ढाँचा · अधिकरणों पर उच्च न्यायालय की समीक्षा
28 अक्टूबर 1998तृतीय न्यायाधीश वाद — अनुच्छेद 143 के अधीन रायकॉलेजियम = मुख्य न्यायमूर्ति + 4; इसके बाद MoP
2006 · 2007प्रकाश सिंह (पुलिस सुधार) · आई.आर. कोएलो (11 जनवरी 2007)नौवीं अनुसूची भी मूल ढाँचे की कसौटी पर
2008 · 2009ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008; 2 अक्टूबर 2009 से प्रवृत्तमध्यवर्ती पंचायत स्तर पर चलती-फिरती अदालत
2010राष्ट्रीय हरित अधिकरण (18 अक्टूबर)ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूज़ीलैंड के बाद तीसरा देश
2014 · 201599वाँ संशोधन एवं NJAC (13 अप्रैल 2015 से प्रवृत्त) · 16 अक्टूबर 2015 को अपास्तचतुर्थ न्यायाधीश वाद, 4:1; कॉलेजियम पुनर्जीवित
2019उच्चतम न्यायालय की संख्या 34; 1 जनवरी 2019 को तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालयउच्च न्यायालयों की संख्या 25 हुई; CPIO बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल — मुख्य न्यायमूर्ति का कार्यालय RTI के अधीन
2021 · 2025लोक प्रहरी — अनुच्छेद 224क सक्रिय (2021); 30 जनवरी 2025 को शर्तें शिथिलतदर्थ न्यायाधीशों का मार्ग खुला
2023ई-न्यायालय चरण-III (₹7,210 करोड़); मध्यस्थता अधिनियम, 2023डिजिटलीकरण एवं ADR का विस्तार
20251 अप्रैल — न्यायाधीशों की संपत्ति-घोषणा सार्वजनिक · नवंबर — अनुच्छेद 143 पर राज्यपाल-अनुमति की राय तथा मद्रास बार एसोसिएशन में अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख उपबंध अपास्तपारदर्शिता, अनुच्छेद 142 की सीमा तथा राष्ट्रीय अधिकरण आयोग का निदेश
2026उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 — संख्या 38; 3 फ़रवरी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय हेतु अनुच्छेद 224क के अधीन 5 तदर्थ न्यायाधीशवर्तमान स्थिति — यही आज का “अद्यतन तथ्य” है

12.6 रटने योग्य निर्णायक तथ्य

स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (संविधान संशोधन)    सूची-II (न्यायपालिका पर प्रभाव)
A. 15वाँ संशोधन   1. अनुच्छेद 134क जोड़ा गया तथा अनुच्छेद 227 का अधीक्षण बहाल
B. 20वाँ संशोधन   2. भाग XIV-क (अनुच्छेद 323क एवं 323ख) जोड़ा गया
C. 42वाँ संशोधन   3. अनुच्छेद 224क जोड़ा गया
D. 44वाँ संशोधन   4. अनुच्छेद 233क जोड़ा गया
कूट:

AA-3, B-4, C-2, D-1BA-3, B-4, C-1, D-2CA-4, B-3, C-2, D-1DA-4, B-3, C-1, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)15वाँ संशोधन (1963) — अनुच्छेद 224क; 20वाँ संशोधन (1966) — अनुच्छेद 233क; 42वाँ संशोधन (1976) — भाग XIV-क; 44वाँ संशोधन (1978) — अनुच्छेद 134क तथा अनुच्छेद 227 का अधीक्षण बहाल। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (वाद)    (संबंधित राज्य)
1. खड़क सिंह — उत्तर प्रदेश
2. चंद्र मोहन — उत्तर प्रदेश
3. एस.आर. बोम्मई — केरल
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) का संबंध कर्नाटक से है (एस.आर. बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे), केरल से नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। खड़क सिंह (1962) तथा चंद्र मोहन (1966) — दोनों उत्तर प्रदेश राज्य के विरुद्ध थे।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती।
कारण (R): अनुच्छेद 124(1) संसद को विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की अधिक संख्या विहित करने की शक्ति देता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 124(1) में ही “जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती” शब्द हैं; इसीलिए 1956, 1960, 1977, 1986, 2009, 2019 तथा 2026 की वृद्धियाँ साधारण अधिनियमों से हुईं, संविधान संशोधन से नहीं। दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।