एकीकृत न्याय-व्यवस्था, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय, न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक समीक्षा, मूल ढाँचा सिद्धांत, अधिकरण तथा वैकल्पिक विवाद समाधान
2025 के मूल प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था एवं शासन से लगभग 19–20 प्रश्न आए, और न्यायपालिका
इस विषय का वह हिस्सा है जो अनुच्छेद-संख्या के रूप में सबसे सीधे पूछा जाता है। यहाँ प्रश्न
चार रूपों में बनता है — (क) सूची सुमेलन : अनुच्छेद ↔ विषय, उच्च न्यायालय ↔ अधिकार-क्षेत्र,
वाद ↔ सिद्धांत, अधिकरण ↔ स्थापना-वर्ष; (ख) कालक्रम : न्यायाधीश-नियुक्ति वादों तथा
मूल ढाँचा वादों का क्रम; (ग) दो-कथन, जिसमें एक शब्द (“उपस्थित एवं मतदान करने वाले” बनाम
“कुल सदस्य”, “केवल”, “परामर्श” बनाम “सहमति”) उत्तर पलट देता है;
(घ) “कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है”। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में सुमेलन-तालिका है और
अध्याय के अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची तथा तिथि-सूची अलग से दी गई है।
इस अध्याय की सीमा
पाँच रिटों का विस्तृत विवेचन — उनका शाब्दिक अर्थ, किसके विरुद्ध जारी होती हैं, कब नहीं होतीं —
अध्याय 4.2 में है; यहाँ रिट केवल अधिकारिता के संदर्भ में आती हैं, दोहराई नहीं गईं।
संसद, राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद तथा राज्य कार्यपालिका अध्याय 4.4 में हैं; निर्वाचन आयोग, CAG,
UPSC, वित्त आयोग जैसे संवैधानिक निकाय अध्याय 4.6 में; आपातकाल के अधीन अनुच्छेद 359 का प्रभाव
अध्याय 4.3 में।
1. एकीकृत न्याय व्यवस्था एवं न्यायिक स्वतंत्रता के उपबंध
1.1 “एकीकृत” का अर्थ — और यह अमेरिका से क्यों भिन्न है
भारत का शासन-ढाँचा संघीय है, पर न्यायपालिका एकीकृत (integrated / single unified judiciary) है।
इसका अर्थ है — पूरे देश के लिए एक ही न्यायालय-पिरामिड, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय है,
उसके नीचे उच्च न्यायालय, और उनके नीचे जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय। यही एक शृंखला
केंद्रीय विधियों और राज्य विधियों — दोनों को लागू करती है।
अमेरिका में इसके विपरीत दोहरी न्याय व्यवस्था (dual judiciary) है — संघीय विधियों के लिए
अलग संघीय न्यायालय, और राज्य विधियों के लिए अलग राज्य न्यायालय। भारत ने यह ढाँचा
भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया, जहाँ 1937 में फेडरल कोर्ट (Federal Court) की स्थापना हुई थी।
संविधान सभा ने जानबूझकर एकीकृत ढाँचा चुना, क्योंकि दोहरी व्यवस्था से विधि की व्याख्या में विविधता
तथा अधिकारिता के विवाद बढ़ते।
संविधान में न्यायपालिका तीन स्थानों पर है — भाग V, अध्याय IV (अनुच्छेद 124–147) : संघ की न्यायपालिका;
भाग VI, अध्याय V (अनुच्छेद 214–231) : उच्च न्यायालय; भाग VI, अध्याय VI (अनुच्छेद 233–237) : अधीनस्थ न्यायालय।
अधिकरणों के लिए भाग XIV-क (अनुच्छेद 323क एवं 323ख) — 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया।
उच्चतम न्यायालय ने 28 जनवरी 1950 को कार्य आरंभ किया (संविधान 26 जनवरी 1950 को प्रवृत्त हुआ);
पहली बैठक संसद भवन के चेंबर ऑफ प्रिंसेज (Chamber of Princes) में हुई, जहाँ 1937–1950 तक फेडरल कोर्ट बैठता था।
वर्तमान भवन में न्यायालय 1958 में आया — उद्घाटन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 4 अगस्त 1958 को किया।
प्रथम मुख्य न्यायमूर्ति — हरिलाल जे. कनिया (H.J. Kania)। भारतीय (प्रिवी काउंसिल) अधिकारिता उन्मूलन अधिनियम, 1949
द्वारा प्रिवी काउंसिल की अपीलीय अधिकारिता समाप्त हुई।
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) — अनुच्छेद 124— सीट : दिल्ली (अनु. 130) · स्वीकृत संख्या 38 (मुख्य न्यायमूर्ति + 37)
उच्च न्यायालय (High Courts) — अनुच्छेद 214— वर्तमान में 25 · प्रत्येक राज्य के लिए, या दो/अधिक राज्यों के लिए साझा (अनु. 231)
जिला एवं सत्र न्यायालय — अनुच्छेद 233— जिला न्यायाधीश : दीवानी पक्ष में “जिला न्यायाधीश”, फौजदारी पक्ष में “सत्र न्यायाधीश”
फौजदारी पक्ष— अपर सत्र न्यायाधीश → सहायक सत्र न्यायाधीश → मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट → न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम/द्वितीय वर्ग
ग्राम न्यायालय— ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 · मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर · न्यायाधिकारी को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा
समांतर मंच — न्यायालय नहीं, पर अधिकार-क्षेत्र सहित— अधिकरण (अनु. 323क/323ख) · लोक अदालत · स्थायी लोक अदालत
1.2 न्यायिक स्वतंत्रता — संविधान ने इसे किन उपबंधों से सुरक्षित किया
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है — न्यायाधीश निर्णय देते समय कार्यपालिका, विधायिका या किसी अन्य
बाहरी दबाव से मुक्त हो। संविधान ने इसे किसी एक अनुच्छेद में घोषित नहीं किया; इसे कई छोटे-छोटे
व्यावहारिक उपबंधों से गूँथा है। यही उपबंध सुमेलन-प्रश्न का सबसे प्रिय विषय हैं।
सुमेलन-तालिका 1 : न्यायिक स्वतंत्रता का उपबंध ↔ संबंधित अनुच्छेद
उपबंध
उच्चतम न्यायालय
उच्च न्यायालय
टिप्पणी
नियुक्ति में न्यायपालिका की भागीदारी
अनु. 124(2)
अनु. 217(1)
राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं, पर मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य — 1993 के बाद यह “सहमति” में बदल गया
पद की सुरक्षा — केवल सिद्ध कदाचार/असमर्थता पर हटाना
अनु. 124(4), (5)
अनु. 217(1)(ख) तथा 218
अनु. 218 उच्चतम न्यायालय वाली प्रक्रिया (124(4) एवं (5)) उच्च न्यायालय पर भी लागू करता है
वेतन/भत्ते नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से नहीं बदले जा सकते
अनु. 125
अनु. 221
एकमात्र अपवाद — वित्तीय आपातकाल (अनु. 360)
व्यय संचित निधि पर भारित — मतदेय नहीं
अनु. 146(3) — भारत की संचित निधि
अनु. 229(3) — राज्य की संचित निधि
न्यायाधीशों की पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित होती है — दोनों के लिए
आचरण पर विधानमंडल में चर्चा नहीं
अनु. 121 (संसद) एवं अनु. 211 (राज्य विधानमंडल)
अपवाद — हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो तब। अनु. 211 में तो यह अपवाद भी नहीं दिया गया
अभिलेख न्यायालय एवं अवमान की शक्ति
अनु. 129
अनु. 215
न्यायालय अपनी गरिमा की रक्षा स्वयं कर सके
अधिकारिता बढ़ाई जा सकती है, घटाई नहीं
अनु. 138 (संसद बढ़ा सकती है)
अनु. 225 (विद्यमान अधिकारिता बनी रहती है)
संसद उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संकुचित नहीं कर सकती
सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर रोक
अनु. 124(7) — भारत में किसी भी न्यायालय/प्राधिकारी के समक्ष नहीं
अनु. 220 — उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर कहीं नहीं
यह भेद सर्वाधिक पूछा जाता है — 124(7) पूर्ण रोक, 220 आंशिक
कर्मचारियों की नियुक्ति न्यायालय स्वयं करे
अनु. 146 — मुख्य न्यायमूर्ति
अनु. 229 — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति
प्रशासनिक स्वायत्तता
कार्यपालिका से पृथक्करण
अनु. 50 — राज्य के नीति-निदेशक तत्व
यह वाद-योग्य नहीं है, पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 ने इसे व्यवहार में उतारा
सावधानी — अनुच्छेद 121 बनाम 211
अनुच्छेद 121 संसद में किसी उच्चतम/उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा निषिद्ध करता है —
सिवाय उस स्थिति के जब हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो।
अनुच्छेद 211 राज्य विधानमंडल के लिए वही रोक लगाता है, पर वहाँ कोई अपवाद नहीं दिया गया —
क्योंकि न्यायाधीश को हटाने की शक्ति राज्य विधानमंडल के पास है ही नहीं। विकल्प में
“अनुच्छेद 211 में भी हटाने के प्रस्ताव का अपवाद है” एक आकर्षक पर गलत कथन है।
अनुच्छेद 50 न्यायपालिका के अध्याय में नहीं, भाग IV (नीति-निदेशक तत्व) में है।
इसे भाग V या VI में बताने वाला विकल्प गलत होगा।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (संविधान का भाग/अध्याय) सूची-II (अनुच्छेद) A. संघ की न्यायपालिका 1. 233–237 B. उच्च न्यायालय 2. 323क एवं 323ख C. अधीनस्थ न्यायालय 3. 124–147 D. अधिकरण 4. 214–231 कूट:
उत्तर: (C)संघ की न्यायपालिका — भाग V, अध्याय IV, अनुच्छेद 124–147; उच्च न्यायालय — भाग VI, अध्याय V, अनुच्छेद 214–231; अधीनस्थ न्यायालय — भाग VI, अध्याय VI, अनुच्छेद 233–237; अधिकरण — भाग XIV-क, अनुच्छेद 323क एवं 323ख। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।
प्र.2न्यायाधीशों पर सेवानिवृत्ति के बाद वकालत की रोक के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत में किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन नहीं कर सकता। 2. उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त स्थायी न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन कर सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 124(7) उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पर पूर्ण रोक लगाता है, जबकि अनुच्छेद 220 उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों में अभिवचन की छूट देता है। दोनों कथन सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारत में एकीकृत न्याय व्यवस्था है। कारण (R): भारत में केंद्रीय विधियों तथा राज्य विधियों के लिए अलग-अलग न्यायालय-शृंखलाएँ हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)भारत में एकीकृत न्यायपालिका है — अतः (A) सही है। किंतु अलग-अलग शृंखलाएँ होना दोहरी न्याय व्यवस्था (अमेरिका) का लक्षण है; भारत में एक ही शृंखला दोनों प्रकार की विधियाँ लागू करती है। अतः (R) गलत है।
2. उच्चतम न्यायालय — गठन, अर्हता, नियुक्ति, कार्यकाल एवं हटाने की प्रक्रिया
2.1 अनुच्छेद 124(1) — गठन एवं न्यायाधीशों की संख्या
अनुच्छेद 124(1) कहता है: “भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से तथा,
जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है तब तक, सात से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से
मिलकर बनेगा।” अर्थात् संविधान ने मूल संख्या 8 (मुख्य न्यायमूर्ति + 7) रखी और
उसे बढ़ाने का अधिकार संसद को दिया — इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं, साधारण विधि
पर्याप्त है। यही कारण है कि आज तक अनुच्छेद 124(1) का पाठ नहीं बदला, केवल
उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन होते रहे।
सावधानी — संविधान में “सात”, अधिनियम में “सैंतीस”
प्रश्न प्रायः यह होता है: “संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त
कितने न्यायाधीश हो सकते हैं?” — संवैधानिक पाठ के अनुसार उत्तर सात है, वर्तमान स्वीकृत संख्या
नहीं। दूसरी ओर, यदि प्रश्न “वर्तमान स्वीकृत संख्या” पूछे तो उत्तर 38 (मुख्य न्यायमूर्ति सहित) है।
दोनों को अलग-अलग याद रखें।
सुमेलन-तालिका 2 : उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश-संख्या का विकास (कालक्रम-योग्य)
वर्ष / विधि
मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त
कुल संख्या
1950 — संविधान, अनुच्छेद 124(1)
7
8
1956 — उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम
10
11
1960 — संशोधन अधिनियम
13
14
1977 — संशोधन अधिनियम
17
18
1986 — संशोधन अधिनियम
25
26
2009 — संशोधन अधिनियम
30
31
2019 — संशोधन अधिनियम
33
34
2026 — संशोधन अधिनियम (पहले मई 2026 में अध्यादेश, फिर अगस्त 2026 में अधिनियम)
37
38 — वर्तमान
2026 की वृद्धि का तात्कालिक कारण लंबित वादों का दबाव था — 31 दिसंबर 2025 की स्थिति में उच्चतम न्यायालय में
लगभग 92,000 वाद लंबित थे। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति के अनुरोध पर सरकार ने पहले
अध्यादेश (अनुच्छेद 123) जारी किया और फिर संसद ने उसे प्रतिस्थापित करने वाला अधिनियम पारित किया।
यह ध्यान रखें कि यह वृद्धि संविधान संशोधन नहीं, साधारण विधि द्वारा हुई।
2.2 अनुच्छेद 124(3) — अर्हताएँ
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना अनिवार्य है, और
उसे निम्न में से कोई एक शर्त पूरी करनी होगी —
124(3)(क) — किसी उच्च न्यायालय का, या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों का,
कम-से-कम पाँच वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो; अथवा
124(3)(ख) — किसी उच्च न्यायालय का, या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों का,
कम-से-कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो; अथवा
124(3)(ग) — राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता (distinguished jurist) हो।
न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं है; न ही कोई निश्चित कार्यकाल — केवल 65 वर्ष की
अधिवर्षिता आयु है।
आज तक किसी को भी “पारंगत विधिवेत्ता” श्रेणी में नियुक्त नहीं किया गया — यह उपबंध कागज़ पर ही है।
अनुच्छेद 124(2क) (15वाँ संशोधन, 1963) — न्यायाधीश की आयु का अवधारण उस प्राधिकारी द्वारा
तथा उस रीति से होगा जो संसद विधि द्वारा उपबंधित करे।
सावधानी — अर्हता के तीन निकट-समान जाल
उच्च न्यायालय के लिए “पारंगत विधिवेत्ता” का विकल्प नहीं है। अनुच्छेद 217(2) में केवल दो मार्ग हैं —
10 वर्ष न्यायिक पद, या 10 वर्ष अधिवक्ता। यह भेद लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछा जाता है।
उच्चतम न्यायालय के लिए न्यायाधीश-मार्ग 5 वर्ष का है, पर अधिवक्ता-मार्ग 10 वर्ष का —
संख्याएँ आपस में न बदलें।
“अधीनस्थ न्यायालय में 10 वर्ष का अनुभव” उच्चतम न्यायालय की अर्हता नहीं है;
उच्च न्यायालय के लिए 217(2)(क) “भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद पर दस वर्ष” कहता है — जो व्यापक है।
2.3 नियुक्ति, शपथ, कार्यकाल एवं सहायक उपबंध
सुमेलन-तालिका 3 : उच्चतम न्यायालय से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेद
विषय
याद रखने योग्य बिंदु
124(2)
नियुक्ति
राष्ट्रपति द्वारा, अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित अधिपत्र (warrant) द्वारा; मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश की नियुक्ति में मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य
124(2) परंतुक
त्यागपत्र
राष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा
124(6)
शपथ
राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष — तृतीय अनुसूची के प्रारूप में
125
वेतन एवं भत्ते
संसद विधि द्वारा निर्धारित करती है; भारत की संचित निधि पर भारित; नियुक्ति के बाद अलाभकारी परिवर्तन नहीं (वित्तीय आपातकाल को छोड़कर)
126
कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति
मुख्य न्यायमूर्ति का पद रिक्त हो, या वे अनुपस्थित/असमर्थ हों — राष्ट्रपति न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश को नियुक्त करते हैं
127
तदर्थ (ad hoc) न्यायाधीश
गणपूर्ति न होने पर मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को (जो 124(3) की अर्हता रखता हो) उच्चतम न्यायालय में बैठने को कह सकते हैं
128
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति
मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्चतम न्यायालय के (या अर्हता रखने वाले उच्च न्यायालय के) किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से बैठने का अनुरोध कर सकते हैं — उस व्यक्ति की सहमति भी आवश्यक
129
अभिलेख न्यायालय
उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा तथा उसे अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति होगी
130
स्थान (seat)
दिल्ली में, या ऐसे अन्य स्थान/स्थानों पर जो मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति के अनुमोदन से, नियत करें — यह विवेक राष्ट्रपति का नहीं, मुख्य न्यायमूर्ति का है
145
नियम-निर्माण
राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय अपने नियम बनाता है; 145(3) — संविधान की व्याख्या से संबंधित सारवान विधि-प्रश्न या अनु. 143 के निर्देश के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश
146
अधिकारी एवं सेवक
मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्ति; प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित
147
निर्वचन
“इस संविधान की व्याख्या” में भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की व्याख्या भी सम्मिलित
अनुच्छेद 124 से 130 — क्रम में“गठन–वेतन–कार्यकारी–तदर्थ–सेवानिवृत्त–अभिलेख–स्थान”
124 गठन/नियुक्ति/हटाना → 125 वेतन → 126 कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति →
127 तदर्थ न्यायाधीश → 128 सेवानिवृत्त न्यायाधीश की उपस्थिति → 129 अभिलेख न्यायालय →
130 न्यायालय का स्थान। सूत्र-वाक्य — “गवाही में करुणा, तुझसे सदा अभिलेख स्थिर” जैसा कोई
कृत्रिम तुक गढ़ने की आवश्यकता नहीं; ये सात क्रमागत अनुच्छेद हैं, इन्हें क्रम में एक बार पढ़ लेना पर्याप्त है।
सावधानी — “अभिलेख न्यायालय” का वास्तविक अर्थ
अभिलेख न्यायालय (Court of Record) का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय अपने कागज़ात सँभालकर रखता है।
इसके दो निश्चित विधिक अर्थ हैं —
(1) साक्ष्य-मूल्य — उसके निर्णय, कार्यवाहियाँ एवं अभिलेख सदैव के लिए स्मरणीय एवं साक्ष्य-योग्य
माने जाते हैं। किसी भी अधीनस्थ न्यायालय में उन्हें प्रस्तुत किया जाए तो उन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता;
वे नज़ीर (precedent) के रूप में उद्धृत होते हैं।
(2) अवमान-शक्ति — न्यायालय को अपने अवमान (contempt) के लिए दंड देने की शक्ति है।
यह शक्ति संविधान से सीधे आती है, अवमान अधिनियम से नहीं — इसलिए संसद इसे छीन नहीं सकती।
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 अवमान को दो भागों में बाँटता है — सिविल अवमान
(निर्णय/आदेश का जानबूझकर उल्लंघन) तथा आपराधिक अवमान (न्यायालय की निंदा, न्याय-प्रशासन में बाधा)।
2006 के संशोधन ने “सत्य” को वैध प्रतिरक्षा बनाया, बशर्ते वह लोकहित में हो।
उच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 215 के अधीन अभिलेख न्यायालय है। भेद यह है कि उच्च न्यायालय
अपने अधीनस्थ न्यायालयों के अवमान के लिए भी दंड दे सकता है, और उच्चतम न्यायालय ने
दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य (1991) में माना कि वह पूरे देश के किसी भी न्यायालय के
अवमान पर कार्रवाई कर सकता है।
2.4 न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया — अनुच्छेद 124(4) एवं 124(5)
अनुच्छेद 124(4) का पाठ स्वयं परीक्षा का प्रश्न है: न्यायाधीश को “सिद्ध कदाचार या असमर्थता
(proved misbehaviour or incapacity)” के आधार पर ही हटाया जा सकता है, और वह भी
राष्ट्रपति के आदेश से, जो संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उसी सत्र में पारित समावेदन
(address) के बाद जारी होता है। अपेक्षित बहुमत दोहरा है —
उस सदन की कुल सदस्य-संख्या का बहुमत (majority of the total membership), तथा
उस सदन के उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई
(not less than two-thirds of the members present and voting)।
दोनों सदनों में यह एक ही सत्र में होना चाहिए।
प्रक्रिया का विवरण अनुच्छेद 124(5) के अधीन संसद द्वारा बनाई गई विधि —
न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 — में है।
1. सूचनालोक सभा में कम-से-कम 100 सदस्यों, या राज्य सभा में कम-से-कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव की सूचना अध्यक्ष/सभापति को
→
2. स्वीकार या अस्वीकारअध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार भी — यह उनका विवेक है
→
3. तीन-सदस्यीय जाँच समितिस्वीकार होने पर — (क) उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश, (ख) किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति, (ग) एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
→
4. समिति का निष्कर्षआरोप सिद्ध नहीं → प्रस्ताव समाप्त। आरोप सिद्ध → प्रस्ताव सदन में विचारार्थ आता है
→
5. दोनों सदनों में विशेष बहुमतकुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3 — उसी सत्र में
→
6. राष्ट्रपति का आदेशसमावेदन प्रस्तुत होने पर राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं
सावधानी — “महाभियोग” शब्द तथा बहुमत का पाठ
संविधान “महाभियोग (impeachment)” शब्द केवल राष्ट्रपति के लिए (अनुच्छेद 61) प्रयोग करता है।
न्यायाधीशों के लिए संविधान “हटाना (removal)” कहता है। व्यवहार में दोनों को महाभियोग कह दिया जाता है,
पर तकनीकी प्रश्न में यह भेद निर्णायक होता है।
बहुमत का पाठ ध्यान से पढ़ें — “कुल सदस्यता का बहुमत”और“उपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई”। विकल्प में प्रायः
“कुल सदस्यता का दो-तिहाई” लिखकर जाल बिछाया जाता है — वह गलत है।
आधार केवल दो हैं — सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता। “अक्षमता”, “राष्ट्रविरोधी आचरण”,
“संविधान का उल्लंघन” जैसे वाक्यांश विकल्पों में डाले जाते हैं; ये संविधान का पाठ नहीं हैं।
प्रस्ताव किसी भी सदन में आरंभ हो सकता है — यह नहीं कि केवल लोक सभा में।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की भी यही प्रक्रिया है — अनुच्छेद 217(1)(ख) तथा 218 के द्वारा।
राज्य विधानमंडल की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
व्यवहार में क्या हुआ? आज तक किसी भी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से हटाया नहीं जा सका —
यह अपने आप में एक रटने योग्य तथ्य है। कुछ उल्लेखनीय प्रयास —
जाँच समिति ने आरोप सिद्ध माने, पर लोक सभा में प्रस्ताव अपेक्षित बहुमत नहीं पा सका (बड़ी संख्या में सदस्य मतदान से अनुपस्थित रहे)। यह पहला ऐसा प्रयास था।
न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2011) — कलकत्ता उच्च न्यायालय
राज्य सभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया; लोक सभा में विचार से पूर्व ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया — इसलिए प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरन (2011) — सिक्किम उच्च न्यायालय
राज्य सभा में प्रस्ताव स्वीकार, जाँच समिति गठित; उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।
मुख्य न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा (2018)
राज्य सभा के सभापति ने सूचना अस्वीकार कर दी — यह अध्यक्ष/सभापति के विवेक का सबसे चर्चित उदाहरण है।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा (2025–26)
आवास से जली हुई मुद्रा मिलने के बाद उच्चतम न्यायालय की आंतरिक (in-house) जाँच; त्यागपत्र से इनकार; जुलाई 2025 में दोनों सदनों में सूचना; लोक सभा अध्यक्ष द्वारा तीन-सदस्यीय समिति का गठन, जिसे उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2026 में वैध ठहराया। प्रक्रिया जारी है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. समावेदन प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। 2. दोनों सदनों में यह कार्यवाही एक ही सत्र में पूरी होनी चाहिए। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 124(4) दोनों शर्तें रखता है — कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का कम-से-कम दो-तिहाई; और समावेदन उसी सत्र में प्रस्तुत होना चाहिए। दोनों कथन सही हैं।
प्र.2निम्नलिखित घटनाओं को उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या के बढ़ने के सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. संख्या 26 की गई 2. संख्या 31 की गई 3. संख्या 14 की गई 4. संख्या 18 की गई नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A3, 4, 1, 2B4, 3, 1, 2C3, 4, 2, 1D4, 3, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)1960 में 14, 1977 में 18, 1986 में 26 तथा 2009 में 31 — अतः क्रम 3, 4, 1, 2 है। (इसके बाद 2019 में 34 और 2026 में 38।)
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विषय) 1. अनुच्छेद 126 — कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति 2. अनुच्छेद 127 — उच्चतम न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश 3. अनुच्छेद 129 — उच्चतम न्यायालय का स्थान नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय बनाता है; न्यायालय का स्थान अनुच्छेद 130 का विषय है। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 2 सही हैं।
3. उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता एवं शक्तियाँ
उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ छह शीर्षकों में बँटती हैं, और सुखद बात यह है कि
अनुच्छेद-संख्याएँ लगभग आरोही क्रम में उसी कहानी को कहती हैं —
पहले मुकदमा यहीं से आरंभ होता है (131), फिर नीचे से अपील आती है (132–134),
फिर विशेष अनुमति (136), फिर अपने ही निर्णय का पुनर्विलोकन (137),
फिर उस निर्णय का सब पर बाध्यकारी होना (141), फिर पूर्ण न्याय की असाधारण शक्ति (142),
और अंत में राष्ट्रपति को परामर्श (143)।
अधिकारिता के प्रकार — 131 से 143 तक की सीढ़ी“आरंभ → अपील → अनुमति → पुनर्विलोकन → नज़ीर → पूर्ण न्याय → परामर्श”
131 = आरंभिक (संघ-राज्य विवाद) · 132–134 = अपीलीय (संवैधानिक, दीवानी, दांडिक) ·
136 = विशेष अनुमति याचिका · 137 = पुनर्विलोकन · 141 = घोषित विधि सब पर बाध्यकारी ·
142 = पूर्ण न्याय · 143 = परामर्शदात्री। इनके ठीक पहले दो और हैं —
129 अभिलेख न्यायालय तथा 130 स्थान। और अनुच्छेद 32 की रिट-अधिकारिता भी
आरंभिक ही है, पर वह भाग III में है, भाग V में नहीं — इसीलिए वह इस सीढ़ी से बाहर दिखती है।
3.1 आरंभिक अधिकारिता — अनुच्छेद 131
अनुच्छेद 131 उच्चतम न्यायालय को अनन्य (exclusive) एवं आरंभिक (original) अधिकारिता देता है —
अर्थात् ऐसे विवाद सीधे उच्चतम न्यायालय में ही आरंभ होंगे, किसी अन्य न्यायालय में नहीं।
किन विवादों में?
भारत सरकार बनाम एक या अधिक राज्य;
भारत सरकार + कोई राज्य बनाम कोई अन्य राज्य;
दो या अधिक राज्यों के बीच।
शर्त — विवाद में ऐसा प्रश्न (विधि का हो या तथ्य का) अंतर्ग्रस्त हो जिस पर
किसी विधिक अधिकार के अस्तित्व या विस्तार का निर्णय निर्भर हो।
सावधानी — अनुच्छेद 131 की आरंभिक अधिकारिता जितनी बड़ी दिखती है, उतनी है नहीं
निजी व्यक्ति, कंपनी या नागरिक अनुच्छेद 131 के अधीन पक्षकार नहीं हो सकते — न वादी, न प्रतिवादी।
यदि कोई निजी पक्ष विवाद में सम्मिलित है, तो वाद 131 के अधीन चलेगा ही नहीं।
परंतुक — संविधान के प्रारंभ से पूर्व की गई किसी संधि, करार, प्रसंविदा, इकरारनामा,
सनद या वैसे ही किसी अन्य लिखत से उत्पन्न विवाद इस अधिकारिता से बाहर हैं
(यदि वे अब भी प्रवर्तन में हैं, या उनमें ऐसा उपबंध है)।
अंतर्राज्यिक जल विवाद अनुच्छेद 262 के अंतर्गत आते हैं — संसद विधि द्वारा
उच्चतम न्यायालय सहित सभी न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित कर सकती है, और
अंतर्राज्यिक नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 ने ऐसा किया है।
वित्त आयोग (अनु. 280) को निर्दिष्ट विषय, तथा अनुच्छेद 290 के अधीन कुछ व्ययों के
समायोजन संबंधी विषय भी बाहर हैं।
साधारण वाणिज्यिक या संविदात्मक विवाद, जिनमें कोई संवैधानिक/विधिक अधिकार का प्रश्न न हो,
131 के अधीन नहीं आते।
अनुच्छेद 32 की रिट-अधिकारिता भी आरंभिक है, पर अनन्य नहीं — क्योंकि वही रिटें
उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन भी जारी कर सकता है। 131 की अधिकारिता अनन्य है;
यह भेद प्रश्न बनता है।
उल्लेखनीय वाद — पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ (1963) अनुच्छेद 131 के अधीन आया पहला बड़ा वाद था,
जिसमें राज्य ने कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन एवं विकास) अधिनियम, 1957 को चुनौती दी थी; न्यायालय ने
संघ की विधायी सक्षमता बनाए रखी। यह प्रश्न कि क्या कोई राज्य अनुच्छेद 131 के अधीन किसी केंद्रीय विधि की
संवैधानिकता को चुनौती दे सकता है, अभी भी बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है — इसलिए इस पर
निश्चित कथन वाले विकल्प से सावधान रहें।
ध्यान दें कि अनुच्छेद 131क (केंद्रीय विधियों की संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की
अनन्य अधिकारिता) 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया था और 43वें संशोधन, 1977 द्वारा हटा दिया गया।
इसी प्रकार 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए 32क, 144क, 226क एवं 228क भी 43वें संशोधन ने हटा दिए —
ये सब न्यायिक समीक्षा को संकुचित करने वाले उपबंध थे।
3.2 रिट अधिकारिता — अनुच्छेद 32 (यहाँ केवल अधिकारिता के रूप में)
अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु निदेश, आदेश या रिट
जारी करने की शक्ति देता है। पाँच रिटों का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.2 में है; यहाँ केवल
तीन अधिकारिता-संबंधी बिंदु याद रखें —
यह आरंभिक अधिकारिता है, पर अनन्य नहीं — उच्च न्यायालय की 226 वाली शक्ति के साथ
समवर्ती (concurrent) है।
अनुच्छेद 32(3) — संसद विधि द्वारा किसी अन्य न्यायालय को भी ये शक्तियाँ दे सकती है;
आज तक ऐसा नहीं किया गया।
अनुच्छेद 139 — संसद विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों से भिन्न प्रयोजनों
के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति दे सकती है। ध्यान दें — उच्च न्यायालय को यह शक्ति
संविधान से सीधे (“किसी अन्य प्रयोजन के लिए”, अनु. 226) मिली हुई है; उच्चतम न्यायालय को
इसके लिए संसदीय विधि चाहिए, जो अब तक नहीं बनी।
उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है। अपील चार रास्तों से आती है —
संवैधानिक, दीवानी, दांडिक तथा विशेष अनुमति। पहले तीन के लिए
उच्च न्यायालय का प्रमाणपत्र (certificate) चाहिए; चौथा पूरी तरह उच्चतम न्यायालय के विवेक पर है।
उच्च न्यायालय के किसी निर्णय/डिक्री/अंतिम आदेश से — चाहे वह दीवानी, दांडिक या अन्य कार्यवाही में हो — यदि उच्च न्यायालय अनु. 134क के अधीन प्रमाणित करे कि मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित सारवान विधि-प्रश्न अंतर्ग्रस्त है
दीवानी मामले
133
उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि — (क) मामले में साधारण महत्व का सारवान विधि-प्रश्न अंतर्ग्रस्त है, तथा (ख) उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है। (1972 के 30वें संशोधन से पहले यहाँ ₹20,000 की धन-सीमा थी, जो हटा दी गई।)
दांडिक मामले
134
तीन स्थितियाँ — (क) उच्च न्यायालय ने अपील में दोषमुक्ति उलटकर मृत्युदंड दिया हो; (ख) उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायालय से मामला अपने पास मँगाकर दोषसिद्ध कर मृत्युदंड दिया हो; (ग) उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि मामला उच्चतम न्यायालय में अपील योग्य है। पहली दो में प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं। संसद इसे बढ़ा सकती है — उच्चतम न्यायालय (दांडिक अपीलीय अधिकारिता का विस्तार) अधिनियम, 1970 ने दोषमुक्ति उलटकर आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अन्यून कारावास देने की स्थिति भी जोड़ दी
प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया
134क
44वें संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया — उच्च न्यायालय निर्णय सुनाने के तुरंत बाद, स्वप्रेरणा से या मौखिक आवेदन पर, 132/133/134 के प्रमाणपत्र का प्रश्न तय करेगा
फेडरल कोर्ट की अधिकारिता
135
जिन मामलों में अनु. 133/134 लागू नहीं होते, पर विद्यमान विधि के अधीन फेडरल कोर्ट को अधिकारिता थी — वह अधिकारिता उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है
विशेष अनुमति याचिका (SLP)
136
नीचे अलग से
3.4 अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition)
अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय की सबसे व्यापक और सबसे विवेकाधीन शक्ति है।
पाठ इस प्रकार है — न्यायालय “अपने विवेकानुसार” भारत के राज्यक्षेत्र में
किसी भी न्यायालय या अधिकरण द्वारा किसी वाद या मामले में दिए गए
किसी भी निर्णय, डिक्री, अवधारण, दंडादेश या आदेश से अपील करने की विशेष अनुमति दे सकता है।
“अधिकरण” भी सम्मिलित — इसीलिए किसी अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध भी SLP लाई जा सकती है।
136(2) का अपवाद — यह अनुच्छेद सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन
गठित किसी न्यायालय/अधिकरण पर लागू नहीं होता। यह एकमात्र संवैधानिक अपवाद है और
प्रश्न-योग्य बिंदु है।
यह वादी का अधिकार नहीं, न्यायालय का विवेक है — प्रीतम सिंह बनाम राज्य (1950) में
कहा गया कि इसका प्रयोग अत्यंत संयम से, असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाए।
इसे अवशिष्ट (residuary) शक्ति कहा जाता है — जहाँ 132, 133, 134 काम न आएँ, वहाँ 136 खुला रहता है।
136 का प्रयोग उच्च न्यायालय के प्रमाणपत्र के बिना, और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय को
दरकिनार करके भी, हो सकता है — यद्यपि सामान्यतः न्यायालय ऐसा नहीं करता।
3.5 अनुच्छेद 137 — पुनर्विलोकन, और उससे आगे “उपचारात्मक याचिका”
अनुच्छेद 137 — संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि तथा अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के
अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए किसी भी निर्णय या आदेश का
पुनर्विलोकन (review) करने की शक्ति है। यह शक्ति असाधारण है — न्यायालय स्वयं अपनी भूल सुधार सकता है।
पुनर्विलोकन याचिका सामान्यतः उसी पीठ के समक्ष, परिपत्र (circulation) द्वारा,
खुली अदालत में सुनवाई के बिना विचारित होती है — मृत्युदंड के मामलों को छोड़कर,
जहाँ 2014 के बाद खुली अदालत में सुनवाई अनिवार्य है।
पुनर्विलोकन भी खारिज हो जाए तब भी एक अंतिम मार्ग शेष रहता है —
उपचारात्मक याचिका (curative petition), जिसे रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002)
में न्यायालय ने स्वयं गढ़ा। यह संविधान में कहीं वर्णित नहीं है — विशुद्ध न्यायिक नवाचार है,
जिसका आधार अनुच्छेद 142 है।
अनुच्छेद 144 — भारत के राज्यक्षेत्र के सभी सिविल एवं न्यायिक प्राधिकारी
उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे।
3.6 अनुच्छेद 141 — घोषित विधि की बाध्यता
“उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी।”
यही नज़ीर का सिद्धांत (doctrine of precedent / stare decisis) का संवैधानिक आधार है।
सावधानी — अनुच्छेद 141 के तीन बारीक बिंदु
पाठ कहता है “सभी न्यायालयों पर” — और उच्चतम न्यायालय स्वयं उस “सभी न्यायालयों” में
नहीं गिना जाता। अर्थात् उच्चतम न्यायालय अपने ही पूर्व निर्णय से बँधा नहीं है;
यह बंगाल इम्यूनिटी कंपनी बनाम बिहार राज्य (1955) में स्पष्ट किया गया।
विकल्प में “अनुच्छेद 141 उच्चतम न्यायालय को भी बाध्य करता है” गलत है।
बाध्यकारी वह भाग होता है जो निर्णय का आधार (ratio decidendi) हो — प्रसंगवश की गई
टिप्पणियाँ (obiter dicta) बाध्यकारी नहीं, केवल प्रेरक (persuasive) होती हैं।
बड़ी पीठ का निर्णय छोटी पीठ पर बाध्यकारी होता है; इसीलिए मत-परिवर्तन के लिए मामला
बड़ी पीठ को भेजा जाता है। और अनुच्छेद 145(3) के अनुसार संविधान की व्याख्या से संबंधित
सारवान विधि-प्रश्न के लिए न्यूनतम पाँच न्यायाधीश आवश्यक हैं।
3.7 अनुच्छेद 142 — “पूर्ण न्याय” की असाधारण शक्ति
अनुच्छेद 142(1) — उच्चतम न्यायालय अपने समक्ष लंबित किसी वाद या मामले में
“पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक” ऐसी कोई डिक्री या आदेश कर सकता है, और वह
सम्पूर्ण भारत में प्रवर्तनीय होगा। अनुच्छेद 142(2) न्यायालय को व्यक्तियों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने,
दस्तावेज़ प्रकट कराने तथा अपने अवमान की जाँच एवं दंड की शक्ति देता है।
प्रयोग के चर्चित उदाहरण — भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड से समझौता (1989);
कोयला खंड आवंटन रद्द करना (2014); अयोध्या भूमि विवाद का निर्णय (2019),
जिसमें न्यायालय ने मस्जिद के लिए पाँच एकड़ वैकल्पिक भूमि का आदेश दिया;
शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023) में विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन
के आधार पर सीधे तलाक की अनुमति।
सीमा — उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998) में कहा गया कि
अनुच्छेद 142 का प्रयोग किसी सारवान विधि के स्पष्ट उपबंध को निरस्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
यह अनुच्छेद समकालीन विवाद का केंद्र भी है — अप्रैल 2025 में तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल
में न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के सहारे विधेयकों को “मानी गई अनुमति (deemed assent)” दे दी थी;
नवंबर 2025 की परामर्शदात्री राय में स्वयं उच्चतम न्यायालय ने इसे अस्वीकार किया
(नीचे 3.8 देखें)। “अनुच्छेद 142 की सीमा क्या है” — यह आज सर्वाधिक चर्चित संवैधानिक प्रश्न है।
3.8 परामर्शदात्री अधिकारिता — अनुच्छेद 143
यह उपबंध भारत शासन अधिनियम, 1935 से आया है और कनाडा के संविधान से प्रेरित माना जाता है।
इसके दो खंड हैं, और दोनों में एक शब्द का अंतर पूरा उत्तर बदल देता है —
अनुच्छेद 143(1)
किस पर — विधि या तथ्य का ऐसा प्रश्न जो उद्भूत हुआ है या उद्भूत होने की संभावना है और जो लोक महत्व का है
न्यायालय — “कर सकेगा (may)” — राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दे भी सकता है, मना भी कर सकता है
सुनवाई के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश (अनु. 145(3))
न्यायालय ने वास्तव में मना किया है — 1993 की अयोध्या-निर्देश (राम जन्मभूमि) को उसने बिना उत्तर दिए लौटा दिया
अनुच्छेद 143(2)
किस पर — संविधान-पूर्व की संधि, करार, प्रसंविदा, सनद आदि से उत्पन्न विवाद — ठीक वही जो अनु. 131 के परंतुक से बाहर हैं
न्यायालय — “करेगा (shall)” — राय देना अनिवार्य है
व्यवहार में इस खंड का प्रयोग नगण्य रहा है
यही 131 और 143 को जोड़ने वाली कड़ी है — जो दरवाज़ा 131 बंद करता है, वह 143(2) खोलता है
राय सलाहकारी होती है — राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। यह
अनुच्छेद 141 के अर्थ में “घोषित विधि” भी नहीं मानी जाती, यद्यपि उसका
अत्यधिक प्रेरक मूल्य होता है और न्यायालय स्वयं उसका अनुसरण करते हैं।
निर्देश करने की शक्ति राष्ट्रपति की है — जिसका अर्थ व्यवहार में
मंत्रिपरिषद की सलाह है (अनु. 74)।
अब तक लगभग 15–16 निर्देश किए जा चुके हैं।
सुमेलन-तालिका 6 : अनुच्छेद 143 के प्रमुख निर्देश ↔ विषय (कालक्रम-योग्य)
वर्ष
निर्देश
विषय एवं परिणाम
1951
दिल्ली विधि अधिनियम निर्देश
प्रत्यायोजित विधायन (delegated legislation) की सीमा — पहला निर्देश
1958
केरल शिक्षा विधेयक
अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं तथा अनु. 30 की व्याख्या; “सामंजस्यपूर्ण निर्वचन” का सिद्धांत
1960
बेरुबारी संघ
भारतीय राज्यक्षेत्र का अभ्यर्पण — केवल संविधान संशोधन से संभव; प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं (यह मत 1973 में बदला)
1964
केशव सिंह निर्देश (उत्तर प्रदेश विधान सभा)
विधानमंडल के विशेषाधिकार बनाम उच्च न्यायालय की अधिकारिता — उत्तर प्रदेश से उत्पन्न सबसे प्रसिद्ध संवैधानिक निर्देश
1974
राष्ट्रपति निर्वाचन निर्देश
विधान सभाओं में रिक्तियाँ रहते भी राष्ट्रपति का निर्वाचन टाला नहीं जा सकता
1978
विशेष न्यायालय विधेयक
आपातकाल के बाद विशेष न्यायालयों की वैधता
1991–92
कावेरी जल विवाद अधिकरण
अधिकरण के अंतरिम आदेश की बाध्यता
1993
राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद
न्यायालय ने निर्देश अनुत्तरित लौटा दिया — 143(1) के “कर सकेगा” का सर्वोत्तम उदाहरण
1998
तृतीय न्यायाधीश वाद
कॉलेजियम का वर्तमान स्वरूप इसी निर्देश की राय से बना
2012
2जी स्पेक्ट्रम निर्देश
प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में नीलामी ही एकमात्र विधि नहीं
2025
राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की अनुमति संबंधी निर्देश
मई 2025 में राष्ट्रपति द्वारा 14 प्रश्न निर्दिष्ट; 20 नवंबर 2025 की राय — न्यायालय राज्यपाल/राष्ट्रपति के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकते और “मानी गई अनुमति” की अवधारणा संविधान-सम्मत नहीं; अनुचित विलंब पर सीमित परमादेश संभव
उत्तर प्रदेश संदर्भ — केशव सिंह प्रकरण (1964)
1964 में उत्तर प्रदेश विधान सभा ने गोरखपुर के केशव सिंह को विशेषाधिकार हनन के लिए
कारावास का दंड दिया। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अधीन याचिका दी और
उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी। विधान सभा ने इसे अपने विशेषाधिकार का
हनन मानते हुए दोनों न्यायाधीशों तथा अधिवक्ता को सदन के समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश दे दिया;
न्यायाधीशों ने उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के समक्ष याचिका दी। यह टकराव इतना गंभीर हुआ कि
राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अधीन उच्चतम न्यायालय से राय माँगी। सात न्यायाधीशों की पीठ ने 30 सितंबर 1964 को
6:1 के बहुमत से कहा कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन ऐसी याचिका सुन सकता है, और विधानमंडल
न्यायाधीशों को अपने समक्ष तलब नहीं कर सकता। यह प्रकरण UPPSC के लिए दोहरा महत्व रखता है —
यह विधानमंडल के विशेषाधिकार का भी उदाहरण है और अनुच्छेद 143 का भी, और इसकी जड़ें
उत्तर प्रदेश में हैं।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (विषय) A. अनुच्छेद 136 1. पूर्ण न्याय करने की शक्ति B. अनुच्छेद 137 2. घोषित विधि की बाध्यता C. अनुच्छेद 141 3. विशेष अनुमति याचिका D. अनुच्छेद 142 4. निर्णय का पुनर्विलोकन कूट:
उत्तर: (C)अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका; 137 — पुनर्विलोकन; 141 — घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी; 142 — पूर्ण न्याय। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।
प्र.2अनुच्छेद 143 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. अनुच्छेद 143(1) के अधीन निर्दिष्ट प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय राय देने से इनकार कर सकता है। 2. उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)143(1) में “कर सकेगा” शब्द है, अतः न्यायालय राय देने से इनकार कर सकता है — 1993 के राम जन्मभूमि निर्देश में उसने ऐसा किया था; कथन 1 सही है। राय सलाहकारी होती है, राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य नहीं — कथन 2 गलत है। (143(2) में “करेगा” है, वहाँ राय देना अनिवार्य है।)
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): अनुच्छेद 131 के अधीन कोई निजी नागरिक उच्चतम न्यायालय में वाद नहीं ला सकता। कारण (R): अनुच्छेद 131 की अधिकारिता केवल संघ तथा राज्यों के बीच, या राज्यों के परस्पर विवादों तक सीमित है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 131 केवल संघ-राज्य तथा अंतर्राज्यिक विवादों के लिए है; इसमें निजी पक्षकार का कोई स्थान नहीं। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण है। (निजी नागरिक मौलिक अधिकार के लिए अनुच्छेद 32 के अधीन आ सकता है, 131 के अधीन नहीं।)
4. न्यायाधीशों की नियुक्ति का विकास — तीन न्यायाधीश वाद, कॉलेजियम, NJAC एवं MoP
4.1 मूल योजना — और उसमें छिपा एक शब्द
संविधान की मूल योजना सरल थी। अनुच्छेद 124(2) कहता है कि राष्ट्रपति न्यायाधीश की नियुक्ति
“उच्चतम न्यायालय तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात्”
करेंगे जिनसे परामर्श करना वे आवश्यक समझें; और मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश की नियुक्ति में
मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य होगा। पूरा विवाद इसी एक शब्द पर टिका है —
“परामर्श (consultation)” का अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ केवल राय ले लेना है, या
उस राय से सहमत होना (concurrence) भी आवश्यक है?
प्रारंभिक दशकों में परंपरा यह बनी कि मुख्य न्यायमूर्ति के पद पर वरिष्ठतम न्यायाधीश की नियुक्ति होगी।
यह परंपरा दो बार तोड़ी गई — 1973 में न्यायमूर्ति ए.एन. राय को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों
(शेलत, हेगड़े एवं ग्रोवर) के ऊपर, तथा 1977 में न्यायमूर्ति एम.एच. बेग को
न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना के ऊपर मुख्य न्यायमूर्ति बनाया गया। इन “अधिक्रमणों (supersessions)” ने
न्यायपालिका को यह सोचने पर विवश किया कि नियुक्ति में कार्यपालिका की प्रधानता खतरनाक है।
4.2 तीन न्यायाधीश वाद — तीन तिथियाँ, तीन निष्कर्ष
सुमेलन-तालिका 7 : तीन न्यायाधीश वाद ↔ वर्ष ↔ पीठ ↔ निष्कर्ष
वाद
वर्ष एवं पीठ
निर्णायक निष्कर्ष
प्रथम न्यायाधीश वाद एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (“न्यायाधीश स्थानांतरण वाद”)
1981 7 न्यायाधीश
“परामर्श” का अर्थ “सहमति” नहीं — राष्ट्रपति मुख्य न्यायमूर्ति की राय मानने के लिए बाध्य नहीं।
कार्यपालिका की प्रधानता। (इसी वाद में लोकस स्टैंडाई शिथिल कर जनहित याचिका का
सैद्धांतिक आधार भी रखा गया — यही इसका दूसरा महत्व है।)
द्वितीय न्यायाधीश वाद उच्चतम न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ
6 अक्टूबर 1993 9 न्यायाधीश, 7:2
प्रथम वाद पलटा। “परामर्श” का अर्थ “सहमति” — मुख्य न्यायमूर्ति की राय की
प्रधानता (primacy)। पर वह राय अकेले की नहीं, दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ
मिलकर बनी संस्थागत राय होगी। कॉलेजियम का जन्म यहीं हुआ।
तृतीय न्यायाधीश वाद 1998 का विशेष निर्देश सं. 1 (अनुच्छेद 143 के अधीन)
28 अक्टूबर 1998 9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत
यह वाद नहीं, राय है। कॉलेजियम का विस्तार — उच्चतम न्यायालय की नियुक्तियों के लिए
मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश; उच्च न्यायालय की नियुक्तियों के लिए
मुख्य न्यायमूर्ति + दो वरिष्ठतम; स्थानांतरण के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + चार।
बहुलता (plurality) मनमानेपन के विरुद्ध अंतर्निर्मित रोक है।
चतुर्थ न्यायाधीश वाद उच्चतम न्यायालय एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (NJAC वाद)
16 अक्टूबर 2015 5 न्यायाधीश, 4:1
99वाँ संविधान संशोधन एवं NJAC अधिनियम, 2014 असंवैधानिक घोषित — ये
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को क्षति पहुँचाते हैं, जो मूल ढाँचा है।
कॉलेजियम पुनर्जीवित। एकमात्र असहमति — न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर।
तीन न्यायाधीश वाद — वर्ष एवं निष्कर्ष एक पंक्ति में“81 — परामर्श · 93 — सहमति · 98 — कॉलेजियम”
1981 ने कहा “परामर्श ही तो है” (कार्यपालिका जीती) → 1993 ने कहा “परामर्श = सहमति”
(न्यायपालिका जीती, कॉलेजियम बना) → 1998 ने कहा “सहमति किसकी — अकेले की नहीं, चार साथियों के साथ”
(कॉलेजियम का विस्तार) → और 2015 ने NJAC गिराकर इसी व्यवस्था पर मुहर लगा दी।
पीठों की संख्या भी क्रम में याद रखें — 7 → 9 → 9 → 5।
1950अनुच्छेद 124(2) एवं 217(1) — नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, मुख्य न्यायमूर्ति से “परामर्श” के बाद; वरिष्ठता की परंपरा
1973 · 1977दो अधिक्रमण — ए.एन. राय (शेलत, हेगड़े, ग्रोवर के ऊपर) तथा एम.एच. बेग (एच.आर. खन्ना के ऊपर)
1981प्रथम न्यायाधीश वाद — एस.पी. गुप्ता · परामर्श ≠ सहमति · कार्यपालिका की प्रधानता · साथ ही जनहित याचिका का आधार
दिसंबर 2015न्यायालय ने कॉलेजियम में पारदर्शिता हेतु सुझाव माँगे और सरकार को संशोधित MoP बनाने को कहा — जो आज तक अंतिम रूप नहीं ले सका
2017 सेकॉलेजियम के प्रस्ताव (resolutions) सार्वजनिक रूप से वेबसाइट पर प्रकाशित होने लगे
4.3 NJAC — जो बना भी और गिरा भी
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointments Commission) को
99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 ने संवैधानिक दर्जा दिया। इसने अनुच्छेद
124क (गठन), 124ख (कृत्य) तथा 124ग (संसद की विधि बनाने की शक्ति) जोड़े,
और अनुच्छेद 124(2), 127, 128, 217, 222, 224, 224क तथा 231 में तदनुरूप संशोधन किया।
गठन (छह सदस्य) — (1) भारत के मुख्य न्यायमूर्ति — पदेन अध्यक्ष;
(2)–(3) उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश; (4) केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री;
(5)–(6) दो प्रतिष्ठित व्यक्ति (eminent persons)।
प्रतिष्ठित व्यक्तियों का चयन प्रधानमंत्री + भारत के मुख्य न्यायमूर्ति + लोक सभा में विपक्ष का नेता
(या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) वाली समिति करती; उनमें से एक अनुसूचित जाति/जनजाति/
अन्य पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यक/महिला में से होता; कार्यकाल तीन वर्ष, पुनर्नामांकन नहीं।
निषेधाधिकार — यदि कोई भी दो सदस्य असहमत हों तो आयोग सिफ़ारिश नहीं कर सकता था।
यही उपबंध न्यायालय की दृष्टि में सबसे घातक था, क्योंकि इससे दो गैर-न्यायिक सदस्य मिलकर
न्यायपालिका की राय रोक सकते थे।
निरस्त होने का आधार — न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधानता
न्यायिक स्वतंत्रता का अंग है, और न्यायिक स्वतंत्रता मूल ढाँचा है; अतः
संविधान संशोधन द्वारा भी उसे नष्ट नहीं किया जा सकता।
4.4 कॉलेजियम — कौन-सी नियुक्ति के लिए कौन-सा कॉलेजियम
सुमेलन-तालिका 8 : नियुक्ति/स्थानांतरण ↔ कॉलेजियम की संरचना
किसकी नियुक्ति
कॉलेजियम
टिप्पणी
भारत के मुख्य न्यायमूर्ति
निवर्तमान मुख्य न्यायमूर्ति अपने उत्तराधिकारी की सिफ़ारिश करते हैं
प्रक्रिया ज्ञापन के अनुसार सामान्यतः वरिष्ठतम न्यायाधीश, यदि वे पद के योग्य समझे जाएँ; विधि मंत्री सिफ़ारिश माँगते हैं
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश
मुख्य न्यायमूर्ति + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश
कुल 5 सदस्य
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति
मुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश
कुल 3 सदस्य
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
प्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम) से आरंभ होता है; अनुमोदन उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2) द्वारा
बीच में राज्यपाल/राज्य सरकार तथा केंद्रीय विधि मंत्रालय की टिप्पणियाँ
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण (अनु. 222)
मुख्य न्यायमूर्ति + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश, तथा दोनों संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों से परामर्श
स्थानांतरण के लिए न्यायाधीश की सहमति आवश्यक नहीं
1. प्रस्तावउच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु — उच्च न्यायालय का कॉलेजियम (मुख्य न्यायमूर्ति + 2 वरिष्ठतम) नाम भेजता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हेतु — भारत के मुख्य न्यायमूर्ति प्रस्ताव आरंभ करते हैं
→
2. राज्य स्तर(केवल उच्च न्यायालय के लिए) नाम राज्यपाल/मुख्यमंत्री के पास जाता है; उनकी टिप्पणी सहित केंद्रीय विधि मंत्रालय को
→
3. केंद्र की जाँचविधि मंत्रालय आसूचना ब्यूरो (IB) से पृष्ठभूमि-रिपोर्ट लेकर पूरी फ़ाइल भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को भेजता है
→
4. उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियमसिफ़ारिश करता है — सिफ़ारिश लिखित होती है और (2017 के बाद) सामान्यतः वेबसाइट पर प्रकाशित
→
5. सरकार का विकल्पसरकार नाम लौटा सकती है और पुनर्विचार माँग सकती है — एक बार
→
6. पुनरावृत्ति (reiteration)यदि कॉलेजियम वही नाम दोहरा दे, तो परिपाटी के अनुसार सरकार नियुक्ति के लिए आबद्ध है — यद्यपि कोई समय-सीमा नहीं, और यही विलंब का मुख्य कारण है
→
7. राष्ट्रपति का अधिपत्रराष्ट्रपति अधिपत्र (warrant) जारी करते हैं; नियुक्ति अधिसूचित होती है और न्यायाधीश शपथ लेते हैं
4.5 प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) एवं आज का गतिरोध
MoP संविधान का भाग नहीं, कोई विधि भी नहीं — यह सरकार और न्यायपालिका के बीच
सहमत लिखित प्रक्रिया है, जो द्वितीय एवं तृतीय न्यायाधीश वादों के बाद 1998–99 में बनी।
2015 में NJAC गिराने के बाद न्यायालय ने सरकार से संशोधित MoP बनाने को कहा था —
पात्रता मानदंड, सचिवालय, पारदर्शिता एवं शिकायत-तंत्र के बिंदुओं पर। एक दशक बाद भी
वह अंतिम रूप नहीं ले सका; “राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकहित” के आधार पर नाम अस्वीकार करने का
खंड विवाद का केंद्र रहा।
आलोचना — कॉलेजियम की प्रक्रिया अपारदर्शी, कोई सचिवालय नहीं, कोई निर्धारित मानदंड नहीं,
“अपने ही लोगों की नियुक्ति (uncle judges syndrome)” का आरोप, सामाजिक विविधता की कमी;
दूसरी ओर सरकार पर आरोप — नाम अनिश्चितकाल तक दबाए रखना, चुनिंदा नियुक्ति, और
पुनरावृत्त नामों की उपेक्षा।
समर्थन में तर्क — नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधानता ही उसे कार्यपालिका के दबाव से बचाती है,
और भारत में सरकार सबसे बड़ी वादी (largest litigant) है, अतः उसे नियुक्ति में निर्णायक भूमिका देना
हितों का टकराव होगा।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. तृतीय न्यायाधीश वाद 2. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग निरस्त 3. प्रथम न्यायाधीश वाद 4. द्वितीय न्यायाधीश वाद नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A3, 4, 2, 1B4, 3, 1, 2C3, 4, 1, 2D4, 3, 2, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)प्रथम न्यायाधीश वाद 1981, द्वितीय 1993, तृतीय 1998 तथा NJAC का निरस्त होना 2015 — अतः क्रम 3, 4, 1, 2 है।
प्र.2राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसे 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 द्वारा अनुच्छेद 124क के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया था। 2. आयोग में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति सहित कुल छह सदस्य थे, जिनमें दो प्रतिष्ठित व्यक्ति सम्मिलित थे। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2 दोनोंBन तो 1 और न ही 2Cकेवल 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)99वें संशोधन ने अनुच्छेद 124क, 124ख तथा 124ग जोड़े; आयोग में मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष), दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, विधि मंत्री तथा दो प्रतिष्ठित व्यक्ति — कुल छह सदस्य थे। दोनों कथन सही हैं।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (नियुक्ति) (कॉलेजियम) 1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश 2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश 3. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण — मुख्य न्यायमूर्ति + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम मुख्य न्यायमूर्ति + दो वरिष्ठतम न्यायाधीश होता है, चार नहीं — अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। उच्चतम न्यायालय की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण के लिए मुख्य न्यायमूर्ति + चार वाला कॉलेजियम सही है।
5. उच्च न्यायालय — गठन, नियुक्ति, स्थानांतरण तथा अनुच्छेद 226, 227 एवं 224क
5.1 अनुच्छेद 214 से 217 — गठन एवं नियुक्ति
अनुच्छेद 214 कहता है — “प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।”
पर व्यवहार में राज्यों की संख्या (28) और उच्च न्यायालयों की संख्या (25) बराबर नहीं है,
क्योंकि अनुच्छेद 231 संसद को दो या अधिक राज्यों (तथा संघ राज्यक्षेत्रों) के लिए
एक साझा उच्च न्यायालय बनाने की शक्ति देता है, और अनुच्छेद 230 संसद को
किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता किसी संघ राज्यक्षेत्र तक बढ़ाने या उससे हटाने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 216 गठन का उपबंध है और यहीं एक निर्णायक भेद छिपा है —
“प्रत्येक उच्च न्यायालय एक मुख्य न्यायमूर्ति तथा ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा जिन्हें
राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।” अर्थात् उच्च न्यायालय के लिए संविधान में
न्यायाधीशों की कोई संख्या नहीं दी गई — न न्यूनतम, न अधिकतम। यह उच्चतम न्यायालय से भिन्न है,
जहाँ अनुच्छेद 124(1) में “सात से अनधिक” लिखा है।
सुमेलन-तालिका 9 : उच्च न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेद
विषय
याद रखने योग्य बिंदु
214
प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय
संघ राज्यक्षेत्रों का उल्लेख नहीं — उनके लिए 230/231
215
अभिलेख न्यायालय
अवमान के लिए दंड की शक्ति; अपने अधीनस्थ न्यायालयों के अवमान पर भी
216
गठन
मुख्य न्यायमूर्ति + अन्य न्यायाधीश; संख्या संविधान में नहीं — राष्ट्रपति समय-समय पर तय करते हैं
217(1)
नियुक्ति एवं पदावधि
राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति, राज्य के राज्यपाल तथा (मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न न्यायाधीश के लिए) उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद; पदावधि 62 वर्ष तक
217(2)
अर्हता
भारत का नागरिक तथा — (क) भारत के राज्यक्षेत्र में 10 वर्ष न्यायिक पद धारण किया हो, अथवा (ख) किसी उच्च न्यायालय का (या लगातार दो/अधिक का) 10 वर्ष अधिवक्ता रहा हो। “पारंगत विधिवेत्ता” का विकल्प नहीं
217(3)
आयु का प्रश्न
राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद तय करेंगे; निर्णय अंतिम (15वाँ संशोधन, 1963)
218
हटाने की प्रक्रिया
अनुच्छेद 124(4) एवं (5) यहाँ भी लागू — अर्थात् उच्चतम न्यायालय वाली ही प्रक्रिया
219
शपथ
राज्य के राज्यपाल या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष
220
सेवानिवृत्ति के बाद वकालत
उच्चतम न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर कहीं नहीं — उसी उच्च न्यायालय में भी नहीं
221
वेतन एवं भत्ते
वेतन राज्य की संचित निधि पर भारित; किंतु पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित
222
स्थानांतरण
राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद; स्थानांतरित न्यायाधीश को प्रतिकरात्मक भत्ता; न्यायाधीश की सहमति आवश्यक नहीं
223
कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति
राष्ट्रपति उसी न्यायालय के किसी न्यायाधीश को नियुक्त करते हैं
224
अपर एवं कार्यकारी न्यायाधीश
अपर (additional) — कार्य की अस्थायी वृद्धि/बकाया के लिए, अधिकतम दो वर्ष के लिए; कार्यकारी (acting) — किसी स्थायी न्यायाधीश की अस्थायी अनुपस्थिति में। दोनों 62 वर्ष तक
224क
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठक
नीचे 5.4 में अलग से
225
विद्यमान अधिकारिता
संविधान-पूर्व उच्च न्यायालयों की अधिकारिता एवं विधि-प्रक्रिया यथावत बनी रहती है
226
रिट अधिकारिता
नीचे 5.3 में
227
अधीक्षण (superintendence)
नीचे 5.3 में
228
कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण
यदि अधीनस्थ न्यायालय में लंबित मामले में संविधान की व्याख्या का सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त हो
229
अधिकारी एवं सेवक
मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्ति; व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित
230
संघ राज्यक्षेत्रों तक अधिकारिता का विस्तार
संसद विधि द्वारा
231
दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालय
संसद विधि द्वारा — उदाहरण : पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
सावधानी — उच्च न्यायालय बनाम उच्चतम न्यायालय के पाँच निकट-समान बिंदु
अर्हता — उच्चतम न्यायालय : 5 वर्ष न्यायाधीश / 10 वर्ष अधिवक्ता / पारंगत विधिवेत्ता।
उच्च न्यायालय : 10 वर्ष न्यायिक पद / 10 वर्ष अधिवक्ता — पारंगत विधिवेत्ता नहीं।
शपथ — उच्चतम न्यायालय : राष्ट्रपति के समक्ष (अनु. 124(6))।
उच्च न्यायालय : राज्यपाल के समक्ष (अनु. 219)।
त्यागपत्र — दोनों राष्ट्रपति को; राज्यपाल को नहीं।
आयु — उच्चतम न्यायालय 65, उच्च न्यायालय 62।
आयु-विवाद का निर्णय दोनों में राष्ट्रपति करते हैं (124(2क) संसद की विधि के अधीन; 217(3) मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद)।
वेतन एवं पेंशन — उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वेतन राज्य की संचित निधि पर,
पर पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित होती है। यह विभाजन बार-बार पूछा जाता है।
5.2 पच्चीस उच्च न्यायालय — स्थापना, पीठ एवं अधिकार-क्षेत्र
देश के तीन सबसे पुराने उच्च न्यायालय भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 (Indian High Courts Act, 1861)
के अधीन 1862 में स्थापित हुए — कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास; इनमें
कलकत्ता उच्च न्यायालय देश का सबसे पुराना है। इसके बाद 1866 में आगरा में
उत्तर-पश्चिमी प्रांत का उच्च न्यायालय स्थापित हुआ, जो आगे चलकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय बना।
सबसे नए उच्च न्यायालय 1 जनवरी 2019 को अस्तित्व में आए, जब हैदराबाद उच्च न्यायालय का विभाजन कर
तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश के अलग-अलग उच्च न्यायालय बनाए गए।
एक से अधिक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर अधिकारिता — 7केवल एक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर अधिकारिता — 18
भारत के 25 उच्च न्यायालय — मुख्य पीठ (principal seat) के नगर के अनुसार। गहरे लाल बिंदु वे सात न्यायालय हैं जिनकी अधिकारिता एक से अधिक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर फैली है — मुंबई (महाराष्ट्र, गोवा, दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव), कोलकाता (प. बंगाल, अंडमान-निकोबार), गुवाहाटी (असम, नागालैंड, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश), कोच्चि (केरल, लक्षद्वीप), चेन्नई (तमिलनाडु, पुदुचेरी), चंडीगढ़ (पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़) तथा जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय (दोनों संघ राज्यक्षेत्र), जिसकी पीठ श्रीनगर एवं जम्मू में बदलती रहती है। ध्यान दें — दिल्ली एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय है; तथा गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम एवं नागालैंड ऐसे राज्य हैं जिनका अपना उच्च न्यायालय नहीं है। कई न्यायालयों का नाम नगर से भिन्न है — जैसे उड़ीसा उच्च न्यायालय की पीठ कटक में, मध्य प्रदेश की जबलपुर में, राजस्थान की जोधपुर में, छत्तीसगढ़ की बिलासपुर में तथा उत्तराखंड की नैनीताल में है।
सुमेलन-तालिका 10 : पच्चीस उच्च न्यायालय ↔ स्थापना ↔ मुख्य पीठ ↔ अन्य पीठें ↔ अधिकार-क्षेत्र
उच्च न्यायालय
स्थापना
मुख्य पीठ
अन्य पीठ
अधिकार-क्षेत्र
कलकत्ता
1862 — देश का सबसे पुराना
कोलकाता
पोर्ट ब्लेयर (परिपथ), जलपाईगुड़ी
पश्चिम बंगाल + अंडमान एवं निकोबार
बंबई
1862
मुंबई
नागपुर, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), पणजी
महाराष्ट्र + गोवा + दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव
मद्रास
1862
चेन्नई
मदुरै
तमिलनाडु + पुदुचेरी
इलाहाबाद
17 मार्च 1866 (आगरा में; 1869 में इलाहाबाद)
प्रयागराज
लखनऊ
उत्तर प्रदेश
कर्नाटक
1884 (मैसूर चीफ़ कोर्ट के रूप में); 1973 में वर्तमान नाम
बेंगलुरु
धारवाड़, कलबुर्गी
कर्नाटक
पटना
1916
पटना
—
बिहार
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख
1928
श्रीनगर एवं जम्मू (बदलती रहती है)
लद्दाख
जम्मू-कश्मीर + लद्दाख (दोनों संघ राज्यक्षेत्र)
गुवाहाटी
1948 (असम उच्च न्यायालय के रूप में); 1971 में वर्तमान नाम
गुवाहाटी
कोहिमा, आइज़ोल, ईटानगर
असम + नागालैंड + मिज़ोरम + अरुणाचल प्रदेश
उड़ीसा
1948
कटक
—
ओडिशा
राजस्थान
1949
जोधपुर
जयपुर
राजस्थान
पंजाब एवं हरियाणा
1947 (पंजाब उच्च न्यायालय के रूप में); 1966 में वर्तमान नाम
चंडीगढ़
—
पंजाब + हरियाणा + चंडीगढ़ — अनुच्छेद 231 का उदाहरण
मध्य प्रदेश
1936 (नागपुर में); 1956 से जबलपुर में वर्तमान स्वरूप
जबलपुर
ग्वालियर, इंदौर
मध्य प्रदेश
केरल
1956
कोच्चि (एर्नाकुलम)
—
केरल + लक्षद्वीप
गुजरात
1960
अहमदाबाद
—
गुजरात
दिल्ली
1966
नई दिल्ली
—
दिल्ली — एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र जिसका अपना उच्च न्यायालय है
हिमाचल प्रदेश
1971
शिमला
—
हिमाचल प्रदेश
सिक्किम
1975
गंगटोक
—
सिक्किम — सबसे छोटा उच्च न्यायालय (स्वीकृत संख्या 3)
छत्तीसगढ़
2000
बिलासपुर
—
छत्तीसगढ़
उत्तराखंड
2000
नैनीताल
—
उत्तराखंड
झारखंड
2000
राँची
—
झारखंड
मणिपुर
मार्च 2013
इंफाल
—
मणिपुर
मेघालय
मार्च 2013
शिलांग
—
मेघालय
त्रिपुरा
मार्च 2013
अगरतला
—
त्रिपुरा
तेलंगाना
1 जनवरी 2019
हैदराबाद
—
तेलंगाना
आंध्र प्रदेश
1 जनवरी 2019 — नवीनतम
अमरावती
—
आंध्र प्रदेश
सात बहु-क्षेत्रीय उच्च न्यायालय — “तीनों पुराने, और चार बाद के”“कलकत्ता–बंबई–मद्रास + गुवाहाटी–केरल–पंजाब–जम्मू”
सबसे सुविधाजनक कुंजी यह है कि देश के तीनों सबसे पुराने उच्च न्यायालय (1862 वाले) बहु-क्षेत्रीय हैं —
कलकत्ता (+अंडमान), बंबई (+गोवा, दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव), मद्रास (+पुदुचेरी)। इनमें चार और जोड़ दीजिए —
गुवाहाटी (चार पूर्वोत्तर राज्य), केरल (+लक्षद्वीप), पंजाब एवं हरियाणा (+चंडीगढ़) तथा
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख (दो संघ राज्यक्षेत्र)। कुल सात। शेष 18 का क्षेत्र एक ही राज्य/संघ राज्यक्षेत्र है।
साथ में यह भी याद रखें — दिल्ली एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय है, और
गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा नागालैंड ऐसे राज्य हैं जिनका अपना उच्च न्यायालय नहीं है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — इलाहाबाद उच्च न्यायालय : देश का सबसे बड़ा
स्थापना — 17 मार्च 1866 के लेटर्स पेटेंट द्वारा आगरा में,
“उत्तर-पश्चिमी प्रांत के लिए न्यायिक उच्च न्यायालय” के रूप में; इसने पुरानी
सदर दीवानी अदालत का स्थान लिया। 1869 में मुख्यालय आगरा से
इलाहाबाद लाया गया, और 11 मार्च 1919 के पूरक लेटर्स पेटेंट द्वारा
नाम “इलाहाबाद में न्यायिक उच्च न्यायालय (High Court of Judicature at Allahabad)” हो गया —
यह आज भी इसका औपचारिक नाम है, भले नगर का नाम प्रयागराज हो गया हो।
लखनऊ पीठ — अवध क्षेत्र के लिए 2 नवंबर 1925 को
अवध चीफ़ कोर्ट (Oudh Chief Court) लखनऊ में स्थापित हुआ था। 1948 के
उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय (समामेलन) आदेश द्वारा उसका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में
विलय कर दिया गया — तभी से लखनऊ पीठ इसकी स्थायी पीठ है।
यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकमात्र पीठ है।
सबसे बड़ा — स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या 160, जो देश के किसी भी उच्च न्यायालय से अधिक है
(सबसे कम — सिक्किम, केवल 3)। लंबित वादों में भी यह देश में प्रथम है —
31 दिसंबर 2025 की स्थिति में लगभग 12 लाख वाद, जो सभी 25 उच्च न्यायालयों के कुल लंबित
वादों का लगभग पाँचवाँ भाग है।
2000 का पुनर्गठन — उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 से उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) बनने पर
13 जिले इसकी अधिकारिता से निकलकर नए उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल) में चले गए।
हिंदी — अनुच्छेद 348(2) के अधीन राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से,
उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिंदी के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश ने यह
1969 में किया (राजस्थान 1950, मध्य प्रदेश 1971 तथा बिहार 1972 के साथ — ये चार ही राज्य हैं)।
किंतु ध्यान रखें — निर्णय, डिक्री एवं आदेश आज भी अंग्रेज़ी में ही दिए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — 12 जून 1975 का निर्णय तथा अनुच्छेद 329क
भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे परिणामकारी उच्च न्यायालयी निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय से आया।
1971 के लोक सभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी की जीत को समाजवादी प्रत्याशी
राज नारायण ने निर्वाचन याचिका द्वारा चुनौती दी थी। 12 जून 1975 को
न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण में निर्णय दिया कि
चुनाव में भ्रष्ट आचरण हुआ — निर्वाचन अभिकर्ता यशपाल कपूर का सरकारी सेवा में रहते हुए कार्य करना
तथा चुनावी मंचों/ध्वनि-विस्तारकों के लिए सरकारी तंत्र का प्रयोग। न्यायालय ने उनका
निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्ष के लिए निरर्हित कर दिया।
इस निर्णय की सीधी प्रतिक्रिया में 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित हुआ, और
39वें संविधान संशोधन (1975) द्वारा अनुच्छेद 329क जोड़कर यह उपबंध किया गया कि
प्रधानमंत्री तथा लोक सभा अध्यक्ष के निर्वाचन को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
7 नवंबर 1975 को इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में उच्चतम न्यायालय ने
अनुच्छेद 329क(4) को मूल ढाँचे के विरुद्ध मानकर अपास्त कर दिया —
क्योंकि वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन, विधि का शासन तथा न्यायिक समीक्षा को नष्ट करता था।
यह केशवानंद के बाद मूल ढाँचा सिद्धांत का पहला व्यावहारिक प्रयोग था।
(इसी नाम का एक और वाद — “उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण, 1975” — “जानने के अधिकार” के लिए
प्रसिद्ध है; दोनों को भ्रमित न करें।)
5.3 अनुच्छेद 226 एवं 227 — दो अलग शक्तियाँ, जिन्हें छात्र एक मान बैठते हैं
अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को शक्ति देता है कि वह अपनी अधिकारिता के भीतर
किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को — जिसके अंतर्गत उचित मामलों में कोई सरकार भी है —
निदेश, आदेश या रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा एवं उत्प्रेषण सहित) जारी करे,
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा “किसी अन्य प्रयोजन के लिए” भी।
226(2) — रिट उस क्षेत्र के बाहर के प्राधिकारी/सरकार के विरुद्ध भी जारी हो सकती है,
यदि वाद-हेतुक (cause of action) पूर्णतः या अंशतः उस उच्च न्यायालय की अधिकारिता में उत्पन्न हुआ हो।
226(3) — (44वाँ संशोधन, 1978) यदि पक्षकार को सुने बिना अंतरिम आदेश दिया गया हो, तो
प्रभावित पक्ष के आवेदन पर उच्च न्यायालय को दो सप्ताह में उसका निपटारा करना होगा,
अन्यथा आदेश स्वतः रिक्त (vacated) हो जाएगा।
226(4) — यह शक्ति अनुच्छेद 32 की शक्ति का अल्पीकरण नहीं करती।
अनुच्छेद 227 बिल्कुल भिन्न शक्ति है — अधीक्षण (superintendence)।
प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों एवं अधिकरणों पर अधीक्षण रखेगा
(सैन्य न्यायालयों/अधिकरणों को छोड़कर)। इसमें न्यायिक अधीक्षण भी है और प्रशासनिक भी —
विवरणी माँगना, नियम एवं प्ररूप बनाना, अधिकारियों की फीस तय करना।
इतिहास का एक निर्णायक मोड़ यहाँ भी है — 42वें संशोधन, 1976 ने अनुच्छेद 227 को संकुचित कर
अधीक्षण केवल “अपनी अपीलीय अधिकारिता के अधीन न्यायालयों” तक सीमित कर दिया था और
अधिकरणों को बाहर कर दिया था; 44वें संशोधन, 1978 ने यह संकुचन हटाकर
अधिकरणों सहित पूर्ण अधीक्षण बहाल कर दिया। यही बहाली आगे चलकर
एल. चंद्रकुमार (1997) की नींव बनी।
अनुच्छेद 226 · रिट अधिकारिता
प्रकृति — आरंभिक (original) अधिकारिता
कैसे चलती है — केवल याचिका पर; न्यायालय स्वप्रेरणा से नहीं चला सकता
किसके विरुद्ध — किसी भी व्यक्ति, प्राधिकारी या सरकार के विरुद्ध
क्या कर सकता है — निदेश, आदेश एवं पाँचों रिट
प्रयोजन — मौलिक अधिकार तथा “किसी अन्य प्रयोजन”
क्षेत्र — 226(2) के अधीन वाद-हेतुक के आधार पर बाहर तक
अनुच्छेद 227 · अधीक्षण की शक्ति
प्रकृति — पर्यवेक्षी (supervisory), अपीलीय नहीं
कैसे चलती है — याचिका पर भी, और स्वप्रेरणा (suo motu) से भी
किसके विरुद्ध — केवल अपने क्षेत्र के न्यायालयों एवं अधिकरणों के विरुद्ध — सैन्य न्यायालय अपवाद
क्या कर सकता है — रिट नहीं; उपयुक्त निदेश, नियम, प्ररूप, विवरणी; अधीनस्थ को अपनी सीमा में रखना
प्रयोजन — अधीनस्थ न्यायालय/अधिकरण अपनी अधिकारिता से बाहर न जाए; तथ्य की साधारण भूल सुधारना इसका काम नहीं
इतिहास — 42वें संशोधन ने संकुचित किया, 44वें ने बहाल किया
5.4 अनुच्छेद 224क — सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठक (“तदर्थ न्यायाधीश”)
यह उपबंध 15वें संविधान संशोधन, 1963 द्वारा जोड़ा गया और दशकों तक लगभग
निष्क्रिय पड़ा रहा। पाठ यह है — किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति,
राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस न्यायालय के या किसी अन्य उच्च न्यायालय के
किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से अनुरोध कर सकता है कि वह उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में
बैठे और कार्य करे।
उस व्यक्ति की सहमति आवश्यक है; उसे राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते मिलते हैं।
उसे उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सभी अधिकारिताएँ, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार प्राप्त होंगे,
किंतु अन्यथा वह उस न्यायालय का न्यायाधीश नहीं समझा जाएगा — यह पाठ का निर्णायक वाक्यांश है।
लोक प्रहरी बनाम भारत संघ (2021) में उच्चतम न्यायालय ने इस “सुप्त” उपबंध को
सक्रिय किया और दिशा-निर्देश दिए — रिक्तियाँ स्वीकृत संख्या की 20% से अधिक हों
अथवा किसी श्रेणी के वाद पाँच वर्ष से अधिक लंबित हों, तब यह मार्ग अपनाया जाए।
30 जनवरी 2025 को न्यायालय ने ये शर्तें शिथिल कर दीं, ताकि भारी बकाया वाले
उच्च न्यायालय रिक्ति-सीमा की प्रतीक्षा किए बिना भी तदर्थ न्यायाधीश ले सकें।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — फ़रवरी 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 224क का प्रयोग
3 फ़रवरी 2026 की बैठक में उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने अनुच्छेद 224क का
प्रयोग करते हुए पाँच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दो वर्ष के लिए
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त करने का अनुमोदन किया —
मुख्यतः दांडिक अपीलों के विशाल बकाया को निपटाने के लिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में
स्वीकृत 160 पदों के विरुद्ध कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या प्रायः 110 से कम ही रही है, और
अकेले दांडिक अपीलें लगभग 2.7 लाख लंबित बताई जाती हैं। दशकों से निष्क्रिय पड़े अनुच्छेद 224क के
सर्वाधिक चर्चित प्रयोग का केंद्र उत्तर प्रदेश है — यह UPPSC के लिए स्वाभाविक प्रश्न-बिंदु है।
(उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने इस कदम का विरोध भी किया, यह तर्क देते हुए कि समाधान
नियमित रिक्तियाँ भरना है।)
5.5 अनुच्छेद 32 बनाम अनुच्छेद 226 — सर्वाधिक पूछा जाने वाला भेद
अनुच्छेद 32 · उच्चतम न्यायालय
स्वरूप — स्वयं एक मौलिक अधिकार (भाग III)
प्रयोजन — केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु
दायरा — संकुचित
विवेक — न्यायालय उपचार देने से इनकार नहीं कर सकता
क्षेत्र — सम्पूर्ण भारत
निलंबन — अनु. 359 के अधीन राष्ट्रपति के आदेश से प्रभावित हो सकता है (अनु. 20 एवं 21 सदा सुरक्षित)
अन्य प्रयोजन — केवल तब, जब संसद अनु. 139 के अधीन विधि बनाए — अब तक नहीं बनी
अनुच्छेद 226 · उच्च न्यायालय
स्वरूप — संवैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं (भाग VI)
प्रयोजन — मौलिक अधिकार तथा “किसी अन्य प्रयोजन” — साधारण विधिक अधिकार भी
दायरा — व्यापक
विवेक — विवेकाधीन; उच्च न्यायालय इनकार कर सकता है (जैसे वैकल्पिक उपचार उपलब्ध हो)
क्षेत्र — अपनी अधिकारिता, तथा 226(2) के अधीन वाद-हेतुक के आधार पर उससे बाहर भी
निलंबन — “अन्य प्रयोजन” वाली शक्ति आपातकाल में भी बनी रहती है
मूल ढाँचा — एल. चंद्रकुमार (1997) — 32 एवं 226/227 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति मूल ढाँचा है
सावधानी — 32 और 226 पर तीन जाल
दायरे का उलटफेर — यद्यपि उच्चतम न्यायालय पदानुक्रम में ऊपर है, रिट-अधिकारिता का
दायरा अनुच्छेद 226 का व्यापक है, 32 का नहीं। यह उलटी-सी लगने वाली बात लगभग हर वर्ष प्रश्न बनती है।
“किसी अन्य प्रयोजन” वाक्यांश केवल अनुच्छेद 226 में है।
विकल्प में इसे अनुच्छेद 32 के साथ जोड़ देना सबसे आम जाल है।
अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकार नहीं है — इसलिए इसे “संविधान की आत्मा” नहीं कहा जाता;
वह विशेषण डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को दिया था। और
अनुच्छेद 226 का उल्लेख भाग III में नहीं, भाग VI में है।
यह भी ध्यान रखें कि उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकार से भिन्न प्रयोजनों के लिए रिट तभी
जारी कर सकता है जब संसद अनुच्छेद 139 के अधीन विधि बनाए — और ऐसी विधि आज तक नहीं बनी।
उच्च न्यायालय को यह शक्ति संविधान से सीधे मिली है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (उच्च न्यायालय) सूची-II (मुख्य पीठ) A. उड़ीसा 1. जोधपुर B. मध्य प्रदेश 2. कटक C. राजस्थान 3. नैनीताल D. उत्तराखंड 4. जबलपुर कूट:
उत्तर: (C)उड़ीसा उच्च न्यायालय — कटक; मध्य प्रदेश — जबलपुर; राजस्थान — जोधपुर (जयपुर में पीठ); उत्तराखंड — नैनीताल। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (उच्च न्यायालय) (अधिकार-क्षेत्र) 1. केरल उच्च न्यायालय — केरल एवं लक्षद्वीप 2. कलकत्ता उच्च न्यायालय — पश्चिम बंगाल एवं सिक्किम 3. गुवाहाटी उच्च न्यायालय — असम, नागालैंड, मिज़ोरम एवं अरुणाचल प्रदेश नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)कलकत्ता उच्च न्यायालय का क्षेत्र पश्चिम बंगाल तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह है; सिक्किम का अपना अलग उच्च न्यायालय (गंगटोक, 1975) है — अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 3 सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग स्वप्रेरणा से भी कर सकता है। कारण (R): अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों एवं अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति देता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 227 पर्यवेक्षी शक्ति है, जो अधीनस्थ न्यायालयों एवं अधिकरणों (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) पर लागू होती है; पर्यवेक्षी होने के कारण ही इसका प्रयोग स्वप्रेरणा से किया जा सकता है, जबकि अनुच्छेद 226 केवल याचिका पर चलता है। अतः दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
6. अधीनस्थ न्यायालय एवं अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रश्न
पिरामिड का सबसे चौड़ा और सबसे व्यस्त हिस्सा यही है — देश में लंबित 99% से अधिक वाद
इन्हीं न्यायालयों में हैं। संविधान इन्हें भाग VI, अध्याय VI (अनुच्छेद 233 से 237) में
केवल पाँच अनुच्छेदों में निपटाता है, पर उन पाँच में जो शक्ति-विभाजन है, वही प्रश्न बनता है।
6.1 अनुच्छेद 233 से 237 — शक्ति किसके पास है
सुमेलन-तालिका 11 : अनुच्छेद 233–237 ↔ विषय ↔ शक्ति किसके पास
अनुच्छेद
विषय
शक्ति एवं शर्तें
233(1)
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन एवं प्रोन्नति
राज्यपाल द्वारा, उस राज्य के संबंध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके।
ध्यान दें — नियुक्ति उच्च न्यायालय नहीं, राज्यपाल करते हैं।
233(2)
सीधी भर्ती की अर्हता
जो व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, वह जिला न्यायाधीश तभी नियुक्त हो सकता है
जब वह कम-से-कम सात वर्ष से अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो औरउच्च न्यायालय ने उसकी सिफ़ारिश की हो। दोनों शर्तें एक साथ आवश्यक हैं।
233क
कुछ नियुक्तियों का विधिमान्यकरण
20वें संविधान संशोधन, 1966 द्वारा जोड़ा गया — उत्तर प्रदेश से जुड़े एक वाद की प्रतिक्रिया में (नीचे देखें)
234
जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की न्यायिक सेवा में भर्ती
राज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार — और वे नियम
राज्य लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय — दोनों से परामर्श के बाद बनते हैं
235
नियंत्रण
जिला न्यायालयों तथा उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण —
जिसके अंतर्गत जिला न्यायाधीश से निम्न पद धारण करने वाले न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की
पदस्थापना, प्रोन्नति एवं छुट्टी है — उच्च न्यायालय में निहित है
236
परिभाषाएँ
“जिला न्यायाधीश” के अंतर्गत — नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश,
संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट,
अपर मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश, अपर सत्र न्यायाधीश तथा सहायक सत्र न्यायाधीश आते हैं।
“न्यायिक सेवा” = ऐसी सेवा जो अनन्य रूप से जिला न्यायाधीश तथा उससे निम्न सिविल न्यायिक पदों को
भरने के लिए आशयित व्यक्तियों से बनी हो
237
मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय का विस्तार
राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा मजिस्ट्रेटों के किसी वर्ग पर इन उपबंधों को लागू कर सकते हैं
सावधानी — 233 बनाम 234 बनाम 235 का विभाजन
नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, नियंत्रण उच्च न्यायालय रखता है। यह दो-पंक्ति का सूत्र
तीनों अनुच्छेदों को सँभाल लेता है — 233 एवं 234 नियुक्ति/भर्ती के हैं (राज्यपाल),
235 नियंत्रण का है (उच्च न्यायालय)।
234 में राज्य लोक सेवा आयोग आता है, 233 में नहीं। जिला न्यायाधीश की नियुक्ति में
राज्यपाल केवल उच्च न्यायालय से परामर्श करते हैं; निचली न्यायिक सेवा के नियम बनाते समय
राज्य लोक सेवा आयोग + उच्च न्यायालय दोनों से।
233(2) केवल बाहरी व्यक्ति पर लागू है। जो पहले से न्यायिक/सरकारी सेवा में है, उसके लिए
यह सात-वर्षीय अधिवक्ता वाली शर्त नहीं — उसके लिए प्रोन्नति का मार्ग है।
उच्चतम न्यायालय ने धीरज मोर बनाम दिल्ली उच्च न्यायालय (2020) में स्पष्ट किया कि
सेवारत न्यायिक अधिकारी बार-कोटे की सीधी भर्ती में भाग नहीं ले सकता।
अनुच्छेद 236 की परिभाषा में “सत्र न्यायाधीश” भी जिला न्यायाधीश है — यही परिभाषा
अनुच्छेद 312(3) में भी काम आती है (नीचे देखें)।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — चंद्र मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1966) एवं अनुच्छेद 233क
उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा नियम, 1953 के अधीन राज्य ने जिला न्यायाधीशों की भर्ती
न्यायिक सेवा तथा बार के अतिरिक्त कार्यपालिका विभागों के “न्यायिक अधिकारियों” में से भी
करनी शुरू कर दी थी, और चयन में उच्च न्यायालय के स्थान पर एक अलग चयन समिति की भूमिका थी।
8 अगस्त 1966 को उच्चतम न्यायालय ने चंद्र मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में इन नियमों को
अनुच्छेद 233 के विरुद्ध ठहराकर अपास्त कर दिया — क्योंकि 233 केवल दो स्रोत जानता है :
न्यायिक सेवा तथा सात वर्ष का अधिवक्ता, और परामर्श उच्च न्यायालय से ही होना चाहिए।
इससे पहले की गई अनेक नियुक्तियाँ संकट में आ गईं। इसीलिए संसद ने 20वाँ संविधान संशोधन
अधिनियम, 1966 लाकर अनुच्छेद 233क जोड़ा, जिसने पूर्व की नियुक्तियों तथा
उन न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णयों को विधिमान्य कर दिया। इस प्रकार
संविधान का एक अनुच्छेद सीधे उत्तर प्रदेश के एक वाद से जन्मा — यह UPPSC के लिए
सर्वोत्तम कोटि का तथ्य है।
6.2 अधीनस्थ न्यायालयों का ढाँचा
सुमेलन-तालिका 12 : अधीनस्थ न्यायालयों का दोहरा पदानुक्रम
स्तर
दीवानी (civil) पक्ष
फौजदारी (criminal) पक्ष
जिले का शीर्ष
जिला न्यायाधीश — जिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय; प्रशासनिक रूप से सभी अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रक
सत्र न्यायाधीश — वही व्यक्ति; मृत्युदंड दे सकता है, पर उसकी पुष्टि उच्च न्यायालय से आवश्यक है
द्वितीय स्तर
अपर जिला न्यायाधीश
अपर सत्र न्यायाधीश
तृतीय स्तर
सिविल जज (सीनियर डिवीजन) / सब-जज
सहायक सत्र न्यायाधीश; मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
आधार स्तर
सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / मुंसिफ
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग; न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग
ग्राम स्तर
ग्राम न्यायालय (ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008) — दीवानी एवं फौजदारी दोनों; न्यायाधिकारी को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा। कुछ राज्यों में न्याय पंचायत भी
महानगरों में नगर सिविल न्यायालय तथा महानगर मजिस्ट्रेट होते हैं; अनुच्छेद 236 की
परिभाषा में नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश भी “जिला न्यायाधीश” है।
लघुवाद न्यायालय (Court of Small Causes) — छोटे धन-संबंधी दीवानी वादों का शीघ्र निपटारा।
राजस्व न्यायालय — भू-राजस्व से जुड़े मामलों के लिए समांतर शृंखला; उत्तर प्रदेश में
तहसीलदार → उप-जिलाधिकारी → अपर जिलाधिकारी → आयुक्त → राजस्व परिषद।
सभी अधीनस्थ न्यायालयों के लिए विधि का स्रोत — दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा
(1 जुलाई 2024 से) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया।
6.3 अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) — अनुच्छेद 312 एवं 236 का जोड़
अखिल भारतीय सेवाओं का उपबंध अनुच्छेद 312 में है। मूल संविधान में इसमें
भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा का उल्लेख था; 42वें संविधान संशोधन, 1976 ने
312(1) में “जिसके अंतर्गत अखिल भारतीय न्यायिक सेवा भी है” शब्द जोड़े और
312(3) नया खंड जोड़ा।
प्रक्रिया — राज्य सभा ऐसा संकल्प पारित करे कि राष्ट्रीय हित में ऐसी सेवा
बनाना आवश्यक/समीचीन है, और वह संकल्प उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के
कम-से-कम दो-तिहाई से समर्थित हो; तब संसद विधि द्वारा सेवा बना सकती है।
संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं।
312(3) की सीमा — अखिल भारतीय न्यायिक सेवा में अनुच्छेद 236 में यथापरिभाषित
जिला न्यायाधीश के पद से निम्नतर कोई पद सम्मिलित नहीं होगा। अर्थात् यह सेवा
केवल जिला न्यायाधीश स्तर के लिए होगी, मुंसिफ/सिविल जज स्तर के लिए नहीं।
इतिहास — विधि आयोग की 14वीं रिपोर्ट (1958) में पहली बार प्रस्ताव;
1960 के दशक के मुख्यमंत्री-सम्मेलनों में चर्चा; 42वाँ संशोधन (1976) से संवैधानिक आधार;
विधि आयोग की 116वीं रिपोर्ट (1986) ने राष्ट्रीय न्यायिक सेवा आयोग द्वारा भर्ती का सुझाव दिया;
अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ बनाम भारत संघ (1992 एवं बाद के आदेश) में उच्चतम न्यायालय ने
केंद्र को इस दिशा में कदम उठाने को कहा।
वर्तमान स्थिति — सेवा आज तक गठित नहीं हुई। राष्ट्रपति एवं सरकार समय-समय पर
इसका समर्थन करते रहे हैं, पर राज्यों तथा अनेक उच्च न्यायालयों की सहमति नहीं बन सकी।
AIJS के पक्ष में तर्क
अधीनस्थ न्यायपालिका में भारी रिक्तियाँ — एकीकृत, समयबद्ध भर्ती संभव
प्रतिभा का राष्ट्रीय पूल; समान एवं ऊँचा वेतनमान
अनुसूचित जाति/जनजाति एवं महिलाओं का प्रतिनिधित्व संरचित रूप से सुधरेगा
उच्च न्यायालयों को बेहतर पदोन्नति-आधार मिलेगा
राज्य-स्तरीय भर्ती की अनियमितता एवं विलंब समाप्त होगा
AIJS के विरुद्ध तर्क
संघवाद — अनुच्छेद 233, 234 एवं 235 की राज्यपाल/उच्च न्यायालय की शक्ति कमज़ोर होगी
भाषा — अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाही राज्य की भाषा में होती है; बाहरी अधिकारी के लिए बाधा
स्थानीय विधियों (भू-राजस्व, किरायेदारी, रीति-रिवाज) की समझ का अभाव
राज्य न्यायिक सेवा के अधिकारियों की प्रोन्नति-संभावना घटेगी
अनेक उच्च न्यायालयों तथा अधिवक्ता-संगठनों का विरोध
सावधानी — अनुच्छेद 312 का शब्द-जाल
संकल्प राज्य सभा पारित करती है — लोक सभा नहीं, दोनों सदन नहीं।
बहुमत “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई” है —
“कुल सदस्य-संख्या का दो-तिहाई” नहीं। यह ठीक वही जाल है जो अनुच्छेद 249 एवं 124(4) में भी
बिछाया जाता है, और 2025 के मूल प्रश्नपत्र में भी इसी प्रकार का प्रश्न आया था।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के लिए संविधान संशोधन आवश्यक नहीं — संवैधानिक आधार
1976 में ही बन चुका है; अब केवल राज्य सभा का संकल्प तथा संसदीय विधि चाहिए।
सेवा का न्यूनतम स्तर जिला न्यायाधीश है — “मुंसिफ स्तर से भर्ती” वाला विकल्प गलत है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है। 2. जो व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, उसे कम-से-कम सात वर्ष तक अधिवक्ता रहना तथा उच्च न्यायालय द्वारा सिफ़ारिश किया जाना आवश्यक है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2B1 और 2 दोनोंCन तो 1 और न ही 2Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 233(1) के अनुसार नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद; 233(2) बाहरी व्यक्ति के लिए सात वर्ष का अधिवक्ता-अनुभव तथा उच्च न्यायालय की सिफ़ारिश — दोनों शर्तें रखता है। दोनों कथन सही हैं।
प्र.2अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसके सृजन के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है। 2. इसमें अनुच्छेद 236 में यथापरिभाषित जिला न्यायाधीश के पद से निम्नतर कोई पद सम्मिलित नहीं होगा। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)संवैधानिक आधार 42वें संशोधन (1976) से पहले ही मौजूद है; अब केवल राज्य सभा का संकल्प (उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3) तथा संसदीय विधि चाहिए — अतः कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 312(3) के अनुसार सेवा का न्यूनतम स्तर जिला न्यायाधीश है — कथन 2 सही है।
प्र.3सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (विषय) A. अनुच्छेद 233 1. अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण B. अनुच्छेद 234 2. “जिला न्यायाधीश” की परिभाषा C. अनुच्छेद 235 3. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति D. अनुच्छेद 236 4. जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती कूट:
उत्तर: (C)233 — जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति; 234 — निचली न्यायिक सेवा में भर्ती; 235 — अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण; 236 — परिभाषाएँ। अतः A-3, B-4, C-1, D-2 सही है।
7. न्यायिक समीक्षा — आधार, दायरा एवं सीमाएँ
7.1 अर्थ, और वह शब्द जो संविधान में है ही नहीं
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) वह शक्ति है जिससे न्यायालय विधानमंडल की विधियों तथा
कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करता है, और असंवैधानिक पाए जाने पर उन्हें
शून्य (void) घोषित करता है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि
“न्यायिक समीक्षा” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता — यह शक्ति अनेक अनुच्छेदों के
संयुक्त पाठ से निकलती है। यह अमेरिकी संविधान से ली गई अवधारणा है, जहाँ भी यह
शब्द संविधान में नहीं, बल्कि मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) के निर्णय से आई थी।
अनुच्छेद 13 — मौलिक अधिकारों से असंगत विधियाँ शून्य (न्यायिक समीक्षा का सबसे स्पष्ट आधार)
अनुच्छेद 32 एवं 226 — प्रवर्तन का साधन
अनुच्छेद 131 से 136 — उच्चतम न्यायालय की आरंभिक एवं अपीलीय अधिकारिता
अनुच्छेद 143 — परामर्शदात्री अधिकारिता
अनुच्छेद 227 — अधीक्षण
अनुच्छेद 245, 246 एवं सातवीं अनुसूची — विधायी सक्षमता की कसौटी
अनुच्छेद 251 एवं 254 — संघ एवं राज्य विधियों में असंगति
अनुच्छेद 372 — संविधान-पूर्व विधियों का बना रहना
अनुच्छेद 246क, 372 आदि के साथ पढ़ने पर यह शक्ति सम्पूर्ण विधि-व्यवस्था पर फैल जाती है
न्यायिक समीक्षा को केशवानंद भारती (1973), इंदिरा नेहरू गांधी (1975),
मिनर्वा मिल्स (1980) तथा विशेष रूप से एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997) में
संविधान का मूल ढाँचा माना गया — इसलिए इसे संविधान संशोधन द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता।
7.2 अनुच्छेद 13 — न्यायिक समीक्षा का सबसे सीधा उपबंध
सुमेलन-तालिका 13 : अनुच्छेद 13 के चार खंड
खंड
उपबंध
परिणाम
13(1)
संविधान के प्रारंभ से पूर्व की विधियाँ, जहाँ तक वे भाग III से असंगत हैं
असंगति की सीमा तक शून्य — यहीं से आच्छादन (eclipse) का सिद्धांत तथा पृथक्करणीयता (severability) निकले
13(2)
राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनती या न्यून करती हो
उल्लंघन करने वाली विधि उसी सीमा तक शून्य
13(3)
“विधि” की परिभाषा
इसके अंतर्गत अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि एवं प्रथा — सब आते हैं। इसीलिए प्रशासनिक अधिसूचना भी चुनौती-योग्य है
13(4)
24वें संशोधन, 1971 द्वारा जोड़ा गया — अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संविधान संशोधन पर यह अनुच्छेद लागू नहीं
यही वह उपबंध था जिसने गोलकनाथ (1967) को पलटा; पर केशवानंद (1973) ने कहा कि संशोधन फिर भी मूल ढाँचे की कसौटी पर परखा जाएगा
7.3 समीक्षा के तीन क्षेत्र एवं उनके आधार
सुमेलन-तालिका 14 : किस चीज़ की समीक्षा, किस आधार पर
क्या परखा जाता है
कसौटी
उदाहरण
संविधान संशोधन
मूल ढाँचा सिद्धांत
39वें संशोधन का अनु. 329क(4) अपास्त (1975); 42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त (मिनर्वा मिल्स, 1980); 99वाँ संशोधन अपास्त (2015)
साधारण विधि (संसद/राज्य विधानमंडल)
(क) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन; (ख) विधायी सक्षमता का अभाव (सातवीं अनुसूची); (ग) संविधान के किसी अन्य उपबंध का उल्लंघन
रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; शायरा बानो (2017) — तत्काल तीन तलाक
प्रशासनिक कार्रवाई
अवैधता (illegality), अयुक्तियुक्तता (irrationality) तथा प्रक्रियागत अनौचित्य (procedural impropriety); आज इनके साथ आनुपातिकता (proportionality) तथा वैध प्रत्याशा (legitimate expectation) भी
प्रशासनिक आदेश, नियुक्ति, निविदा, अनुज्ञप्ति-रद्दीकरण संबंधी वाद
सावधानी — मूल ढाँचा किस पर लागू है और किस पर नहीं
मूल ढाँचा सिद्धांत केवल संविधान संशोधनों पर लागू होता है, साधारण विधियों पर नहीं।
कोई साधारण अधिनियम केवल इस आधार पर अपास्त नहीं किया जा सकता कि वह “मूल ढाँचे का उल्लंघन” करता है;
उसे भाग III, विधायी सक्षमता या संविधान के किसी विशिष्ट उपबंध की कसौटी पर ही परखा जाएगा।
इंदिरा नेहरू गांधी (1975) तथा कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में यह स्पष्ट किया गया।
विकल्प में “उच्चतम न्यायालय किसी भी विधि को मूल ढाँचे के आधार पर अपास्त कर सकता है”
एक आकर्षक पर गलत कथन है।
7.4 सहायक सिद्धांत — जो निर्णयों में बार-बार आते हैं
सुमेलन-तालिका 15 : सिद्धांत ↔ अर्थ ↔ प्रमुख वाद
सिद्धांत
अर्थ
वाद
पृथक्करणीयता (Severability)
विधि का केवल असंवैधानिक भाग हटेगा, शेष जीवित रहेगा — यदि दोनों अलग किए जा सकें
आर.एम.डी. चमारबागवाला बनाम भारत संघ (1957); ए.के. गोपालन (1950)
आच्छादन (Eclipse)
संविधान-पूर्व विधि मरती नहीं, केवल ग्रहण-ग्रस्त हो जाती है; बाधा हटते ही (जैसे संशोधन से) पुनः प्रवर्तनीय
भीकाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1955)
मौलिक अधिकार का अधित्यजन नहीं (Non-waiver)
कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकार का स्वेच्छा से भी परित्याग नहीं कर सकता
बशेषर नाथ बनाम आयकर आयुक्त (1959)
भविष्यलक्षी अभिखंडन (Prospective Overruling)
निर्णय का प्रभाव केवल भविष्य पर; पूर्व की कार्रवाइयाँ अप्रभावित
आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) — मुख्य न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने इसे भारत में पहली बार लागू किया
छद्म विधायन (Colourable Legislation)
“जो सीधे नहीं किया जा सकता, वह घुमाकर भी नहीं” — विधानमंडल अपनी सक्षमता से बाहर जाकर विधि नहीं बना सकता
के.सी. गजपति नारायण देव बनाम उड़ीसा राज्य (1953)
सारतत्व एवं स्वरूप (Pith and Substance)
विधि का वास्तविक विषय देखा जाएगा; आनुषंगिक अतिक्रमण से वह अमान्य नहीं होती
संघीय विधायी विवादों में — विस्तार अध्याय 4.3 में
7.5 न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ
अनुच्छेद 122 एवं 212 — संसद/राज्य विधानमंडल की कार्यवाही की प्रक्रियागत अनियमितता
के आधार पर उसकी वैधता पर प्रश्न नहीं किया जा सकता। (किंतु अधिकारिता-रहित या
असंवैधानिक कार्रवाई की समीक्षा हो सकती है।)
अनुच्छेद 74(2) — मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी, इसकी किसी न्यायालय में
जाँच नहीं की जा सकती।
अनुच्छेद 31ख एवं नौवीं अनुसूची — इसमें रखी विधियाँ संरक्षित हैं; किंतु
आई.आर. कोएलो (2007) के बाद 24 अप्रैल 1973 के पश्चात् जोड़ी गई विधियाँ
मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं (विस्तार अध्याय 4.2 में)।
अनुच्छेद 262 — अंतर्राज्यिक जल विवादों में संसद न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित कर सकती है।
नीतिगत प्रश्न — आर्थिक नीति, रक्षा, विदेश नीति जैसे क्षेत्रों में न्यायालय
न्यायिक संयम (judicial restraint) बरतता है; वह नीति की बुद्धिमत्ता नहीं,
केवल उसकी वैधता परखता है।
अनुच्छेद 363 — देशी रियासतों की संधियों/करारों से उत्पन्न विवाद।
अनुच्छेद 329 — निर्वाचन संबंधी मामलों में हस्तक्षेप की सीमा।
अमेरिकी न्यायिक समीक्षा
आधार — “विधि की सम्यक् प्रक्रिया (due process of law)”
न्यायालय विधि की युक्तियुक्तता एवं औचित्य दोनों परखता है
दायरा अधिक व्यापक; न्यायपालिका की सर्वोच्चता की ओर झुकाव
संविधान में शब्द नहीं — मार्बरी बनाम मैडिसन (1803) से विकसित
भारतीय न्यायिक समीक्षा
आधार — “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (procedure established by law)”
मूलतः न्यायालय केवल यह देखता कि विधि सक्षम विधानमंडल ने विधिवत बनाई है या नहीं
मेनका गांधी (1978) के बाद व्याख्या से इसका प्रभाव अमेरिकी कसौटी के निकट आ गया
भारत में संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का संतुलन — न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता मानता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. “न्यायिक समीक्षा” शब्द भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। 2. एल. चंद्रकुमार वाद (1997) में न्यायिक समीक्षा को संविधान के मूल ढाँचे का अंग माना गया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)“न्यायिक समीक्षा” शब्द संविधान में कहीं नहीं आता; यह शक्ति अनुच्छेद 13, 32, 131–136, 226, 227, 245, 246 आदि के संयुक्त पाठ से निकलती है — कथन 1 गलत है। एल. चंद्रकुमार (1997) में अनुच्छेद 32 एवं 226/227 की समीक्षा-शक्ति को मूल ढाँचा माना गया — कथन 2 सही है।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (सिद्धांत) सूची-II (वाद) A. आच्छादन का सिद्धांत 1. गोलकनाथ B. भविष्यलक्षी अभिखंडन 2. बशेषर नाथ C. मौलिक अधिकार का अधित्यजन नहीं 3. भीकाजी नारायण धाकरस D. पृथक्करणीयता 4. आर.एम.डी. चमारबागवाला कूट:
उत्तर: (A)आच्छादन — भीकाजी नारायण धाकरस (1955); भविष्यलक्षी अभिखंडन — गोलकनाथ (1967); अधित्यजन नहीं — बशेषर नाथ (1959); पृथक्करणीयता — आर.एम.डी. चमारबागवाला (1957)। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): किसी साधारण अधिनियम को केवल इस आधार पर अपास्त नहीं किया जा सकता कि वह संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करता है। कारण (R): मूल ढाँचा सिद्धांत की कसौटी संविधान संशोधनों पर लागू होती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)साधारण विधि की कसौटी भाग III, विधायी सक्षमता तथा संविधान के विशिष्ट उपबंध हैं; मूल ढाँचा की कसौटी संविधान संशोधनों के लिए है। अतः दोनों कथन सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
8. न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका
8.1 उद्भव — आपातकाल के बाद न्यायपालिका की आत्म-सुधार यात्रा
1975–77 के आपातकाल में, विशेषकर ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) के बाद,
उच्चतम न्यायालय की छवि को गहरी चोट पहुँची थी। उसके बाद के वर्षों में न्यायपालिका ने
जनता के पक्ष में सक्रिय भूमिका अपनाकर अपनी विश्वसनीयता पुनः अर्जित की — यही
न्यायिक सक्रियता (judicial activism) की पृष्ठभूमि है। इसके दो प्रमुख वास्तुकार
न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती तथा न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर थे।
परंपरागत विधि में केवल व्यथित पक्षकार (aggrieved party) ही न्यायालय जा सकता था — इसे
लोकस स्टैंडाई (locus standi) का नियम कहते हैं। जनहित याचिका का पूरा विचार इसी नियम को
शिथिल करने पर टिका है : यदि कोई व्यक्ति या वर्ग निर्धनता, निरक्षरता, असमर्थता या
सामाजिक/आर्थिक दुर्बलता के कारण स्वयं न्यायालय नहीं आ सकता, तो कोई भी
लोक-हितैषी व्यक्ति या संगठन उसकी ओर से आ सकता है।
जनहित याचिका संविधान में कहीं वर्णित नहीं है — यह पूर्णतः न्यायिक नवाचार है।
यह अनुच्छेद 32 तथा 226 — दोनों के अधीन लाई जा सकती है।
एपिस्टोलरी अधिकारिता (epistolary jurisdiction) — साधारण डाक से भेजे गए पत्र, यहाँ तक कि
समाचार-पत्र की रिपोर्ट को भी याचिका मान लिया गया।
अनुच्छेद 39क (42वाँ संशोधन, 1976) — समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता —
जनहित याचिका को नीति-निदेशक समर्थन देता है।
पहली महत्वपूर्ण जनहित याचिका — हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979),
विचाराधीन बंदियों की दशा पर।
सैद्धांतिक आधार — एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981), जिसमें लोकस स्टैंडाई को
औपचारिक रूप से शिथिल किया गया। (यही प्रथम न्यायाधीश वाद भी है — इसका दोहरा महत्व याद रखें।)
1. परंपरागत नियमकेवल व्यथित पक्षकार न्यायालय जा सकता है — अंग्रेज़ी विधि से आया नियम
→
2. शिथिलीकरण (1979–81)हुसैनारा खातून, एस.पी. गुप्ता — कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति दुर्बल वर्ग की ओर से आ सकता है
→
3. एपिस्टोलरी अधिकारितापत्र भी याचिका — सुनील बत्रा (द्वितीय), 1980; बाद में पोस्टकार्ड, तार, समाचार-रिपोर्ट तक
→
4. जाँच का नया औज़ारन्यायालय आयुक्त (commissioner), न्यायमित्र (amicus curiae) तथा विशेषज्ञ समितियाँ नियुक्त करने लगा — यह प्रतिकूल (adversarial) नहीं, अन्वेषी (inquisitorial) पद्धति है
→
5. सतत परमादेशविनीत नारायण (1997–98) — “continuing mandamus”: न्यायालय मामला बंद नहीं करता, समय-समय पर अनुपालन-रिपोर्ट माँगता रहता है
→
6. संयम की वापसीबलवंत सिंह चौफाल (2010) — दुरुपयोग रोकने हेतु दिशा-निर्देश; तुच्छ याचिकाओं पर खर्चा (costs)
8.2 प्रमुख जनहित याचिकाएँ एवं उनके परिणाम
सुमेलन-तालिका 16 : जनहित याचिका ↔ वर्ष ↔ परिणाम
वाद
वर्ष
परिणाम / स्थापित सिद्धांत
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य
1979
विचाराधीन बंदियों की रिहाई; शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 का अंग; पहली बड़ी जनहित याचिका
सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (द्वितीय)
1980
एक बंदी का पत्र याचिका माना गया — एपिस्टोलरी अधिकारिता
एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ
1981
लोकस स्टैंडाई का औपचारिक शिथिलीकरण
बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ
1984
बंधुआ मज़दूरी की पहचान एवं पुनर्वास; जाँच-आयुक्त की नियुक्ति
ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम
1985
जीविका का अधिकार अनुच्छेद 21 का अंग
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (ओलियम गैस रिसाव)
1986
पूर्ण दायित्व (absolute liability) का सिद्धांत
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (गंगा प्रदूषण — कानपुर के चर्म-शोधनालय)
1987–88
कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र के चर्म-शोधनालयों को बहिःस्राव-शोधन संयंत्र लगाने या बंद होने का आदेश; नगर निगम के दायित्व तय — पर्यावरणीय जनहित याचिका का आदर्श उदाहरण
सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य
1991
प्रदूषणमुक्त जल एवं वायु अनुच्छेद 21 में; साथ ही चेतावनी कि जनहित याचिका व्यक्तिगत द्वेष का साधन न बने
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य
1997
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध दिशा-निर्देश, जो 2013 के अधिनियम तक विधि का स्थान लेते रहे
विनीत नारायण बनाम भारत संघ (जैन हवाला)
1997–98
सतत परमादेश; केंद्रीय सतर्कता आयोग को सांविधिक दर्जा देने का निर्देश; CBI निदेशक का दो वर्ष का कार्यकाल
पीयूसीएल बनाम भारत संघ (भोजन का अधिकार)
2001 से
मध्याह्न भोजन योजना सहित खाद्य-सुरक्षा के आदेश; आगे चलकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की पृष्ठभूमि
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ
22 सितंबर 2006
पुलिस सुधार के सात निदेश — राज्य सुरक्षा आयोग, पुलिस महानिदेशक का न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल, अन्वेषण एवं विधि-व्यवस्था का पृथक्करण, पुलिस स्थापना बोर्ड, पुलिस शिकायत प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग। याचिकाकर्ता प्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके थे
उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल
2010
जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने हेतु उच्च न्यायालयों को दिशा-निर्देश बनाने का आदेश
नाल्सा बनाम भारत संघ
2014
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग की मान्यता
उत्तर प्रदेश संदर्भ — जनहित याचिका के मानचित्र पर UP
गंगा प्रदूषण वाद (एम.सी. मेहता, 1987–88) का केंद्र कानपुर का जाजमऊ क्षेत्र था —
देश की पहली बड़ी पर्यावरणीय जनहित याचिका का भूगोल उत्तर प्रदेश है। इसी शृंखला में आगे
ताजमहल पर प्रदूषण के प्रभाव वाला ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन वाद (1996) आया, जिसमें
आगरा के आसपास के उद्योगों को कोयला छोड़कर CNG/स्वच्छ ईंधन अपनाने का आदेश दिया गया।
प्रकाश सिंह वाद (2006) के याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक थे;
यह वाद पुलिस सुधार पर आज भी संदर्भ-बिंदु है।
खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962) ने उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमों के अधीन
“रात्रिकालीन घर-आगमन (domiciliary visits at night)” को अनुच्छेद 21 के विरुद्ध ठहराया।
इसी वाद में न्यायमूर्ति सुब्बाराव के ऐतिहासिक अल्पमत ने पहली बार कहा कि
निजता अनुच्छेद 21 का अंग है — 2017 में पुट्टस्वामी ने उसी अल्पमत को बहुमत बना दिया।
यहाँ सावधानी — खड़क सिंह ने स्वयं निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना था;
वह बहुमत का नहीं, अल्पमत का मत था। (विस्तार अध्याय 4.2 में)
8.3 न्यायिक सक्रियता की आलोचना — “अतिक्रमण” कहाँ से शुरू होता है
शक्तियों का पृथक्करण — जब न्यायालय नीति बनाने लगे या प्रशासनिक विवरण तय करने लगे,
तो वह विधायिका एवं कार्यपालिका के क्षेत्र में प्रवेश करता है। इसे
न्यायिक अतिरेक (judicial overreach) या “न्यायिक दुस्साहस (judicial adventurism)” कहा जाता है।
जवाबदेही का अभाव — विधायिका जनता के प्रति उत्तरदायी है; न्यायपालिका नहीं। अतः
नीतिगत निर्णय अनिर्वाचित निकाय द्वारा किया जाना लोकतांत्रिक दृष्टि से प्रश्न खड़ा करता है।
क्षमता की सीमा — न्यायालय के पास तकनीकी/आर्थिक विशेषज्ञता एवं आँकड़े नहीं होते,
न ही आदेश लागू कराने का प्रशासनिक तंत्र।
जनहित याचिका का दुरुपयोग — “लोकहित” के नाम पर प्रचार-हित (publicity interest),
निजी-हित (private interest) तथा राजनीतिक-हित की याचिकाएँ; इनसे न्यायालय का बहुमूल्य समय नष्ट होता है
और वास्तविक वादों में विलंब बढ़ता है।
अनुच्छेद 142 का विस्तारित प्रयोग — “पूर्ण न्याय” की शक्ति कहाँ रुके, यह प्रश्न 2025 में
राज्यपाल की अनुमति वाले विवाद के बाद केंद्र में आ गया।
संतुलन का सूत्र — अरावली गोल्फ क्लब बनाम चंदर हास (2007) में न्यायालय ने स्वयं कहा कि
न्यायाधीशों को अपनी सीमा जाननी चाहिए और शासन चलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए —
यह न्यायिक संयम (judicial restraint) का शास्त्रीय कथन है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित वादों को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य 2. एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ 3. प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ 4. हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A4, 2, 3, 1B2, 4, 1, 3C2, 4, 3, 1D4, 2, 1, 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)हुसैनारा खातून 1979, एस.पी. गुप्ता 1981, विशाखा 1997 तथा प्रकाश सिंह 2006 — अतः क्रम 4, 2, 1, 3 है।
प्र.2जनहित याचिका के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. जनहित याचिका का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 32 में स्पष्ट रूप से किया गया है। 2. जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय — दोनों के समक्ष लाई जा सकती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)जनहित याचिका संविधान में कहीं वर्णित नहीं — यह न्यायिक नवाचार है, अतः कथन 1 गलत है। यह अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) तथा अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) — दोनों के अधीन लाई जा सकती है, अतः कथन 2 सही है।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (वाद) (स्थापित सिद्धांत/परिणाम) 1. विनीत नारायण — सतत परमादेश 2. एम.सी. मेहता (ओलियम गैस) — पूर्ण दायित्व 3. बलवंत सिंह चौफाल — एपिस्टोलरी अधिकारिता का आरंभ नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने के दिशा-निर्देशों के लिए जाना जाता है; एपिस्टोलरी अधिकारिता 1980 के दशक की देन है (सुनील बत्रा द्वितीय आदि)। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
9. मूल ढाँचा सिद्धांत — केशवानंद से आगे
9.1 टकराव की कहानी — संसद बनाम न्यायपालिका
प्रश्न सरल था और उत्तर कठिन : क्या संसद अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के किसी भी भाग को
संशोधित कर सकती है — मौलिक अधिकारों को भी? इस एक प्रश्न पर दो दशक तक न्यायालय का मत
तीन बार बदला, और अंततः वह सिद्धांत निकला जिसे भारतीय संवैधानिक विधि का सबसे बड़ा योगदान माना जाता है।
1951शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ — पहला संविधान संशोधन वैध; अनु. 13 के “विधि” में संविधान संशोधन सम्मिलित नहीं; संसद मौलिक अधिकार भी संशोधित कर सकती है
1965सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य — 17वाँ संशोधन वैध; शंकरी प्रसाद की पुष्टि, किंतु दो न्यायाधीशों (हिदायतुल्ला एवं मुधोलकर) की असहमति में पहली बार यह संदेह कि क्या मौलिक अधिकार “संशोधन का खिलौना” हो सकते हैं
1967आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य — 11 न्यायाधीश, 6:5 · संसद मौलिक अधिकारों में कोई कटौती नहीं कर सकती; भविष्यलक्षी अभिखंडन लागू
197124वाँ संविधान संशोधन — गोलकनाथ को पलटने के लिए; अनु. 13(4) तथा 368(3) जोड़े; संसद को मौलिक अधिकार संशोधित करने की स्पष्ट शक्ति
24 अप्रैल 1973केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य — 13 न्यायाधीश, 7:6 · संसद संशोधन कर सकती है, पर मूल ढाँचा नष्ट नहीं कर सकती · गोलकनाथ पलटा, 24वाँ संशोधन वैध, 25वें संशोधन का अनु. 31ग का दूसरा भाग अपास्त
7 नवंबर 1975इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण — अनुच्छेद 329क(4) अपास्त · मूल ढाँचा सिद्धांत का पहला व्यावहारिक प्रयोग · स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन, विधि का शासन, न्यायिक समीक्षा — मूल ढाँचा
197642वाँ संविधान संशोधन — अनु. 368(4) एवं (5) जोड़कर घोषित किया गया कि संशोधन की शक्ति असीमित है और उस पर न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता
31 जुलाई 1980मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ — 42वें संशोधन की धारा 4 एवं 55 अपास्त · 368(4) एवं (5) असंवैधानिक · सीमित संशोधन-शक्ति तथा मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन — मूल ढाँचा
1981वामन राव बनाम भारत संघ — नौवीं अनुसूची के लिए 24 अप्रैल 1973 की निर्णायक तिथि तय
1992किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू — दसवीं अनुसूची; स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन तथा लोकतंत्र मूल ढाँचा · इंद्रा साहनी — विधि का शासन
11 मार्च 1994एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ — धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, लोकतंत्र तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता मूल ढाँचा; अनु. 356 पर न्यायिक समीक्षा
18 मार्च 1997एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ — 7 न्यायाधीश · अनु. 32 तथा 226/227 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति मूल ढाँचा; अधिकरण उच्च न्यायालय का विकल्प नहीं, पूरक
11 जनवरी 2007आई.आर. कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य — 9 न्यायाधीश, सर्वसम्मत · 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाली गई विधियाँ भी मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं
16 अक्टूबर 2015NJAC वाद — न्यायपालिका की स्वतंत्रता मूल ढाँचा; 99वाँ संशोधन अपास्त
7 नवंबर 2022जनहित अभियान बनाम भारत संघ — 103वाँ संशोधन (EWS आरक्षण) 3:2 से वैध; बहुमत ने माना कि यह मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं करता
9.2 केशवानंद भारती — तथ्य जो ठीक-ठीक याद रहने चाहिए
याचिकाकर्ता — स्वामी केशवानंद भारती, केरल के एडनीर मठ के प्रमुख;
उन्होंने केरल भूमि सुधार अधिनियम को अनुच्छेद 25, 26 तथा (तत्कालीन) 31 के आधार पर चुनौती दी थी।
निर्णय-तिथि — 24 अप्रैल 1973। पीठ — 13 न्यायाधीश
(भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी पीठ), अध्यक्ष मुख्य न्यायमूर्ति एस.एम. सीकरी।
बहुमत 7:6।
निर्णय के तीन अंग — (1) गोलकनाथ पलटा : संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है;
(2) 24वाँ संशोधन वैध; (3) पर संशोधन की शक्ति असीमित नहीं — वह संविधान के
मूल ढाँचे (basic structure) को नष्ट या क्षति नहीं पहुँचा सकती।
25वें संशोधन के अनुच्छेद 31ग का पहला भाग वैध ठहराया गया, पर दूसरा भाग —
जो ऐसी विधि को न्यायालय में चुनौती से परे कर देता था — अपास्त कर दिया गया,
क्योंकि वह न्यायिक समीक्षा समाप्त करता था।
मूल ढाँचे की कोई निश्चित सूची नहीं दी गई — न्यायालय ने इसे जानबूझकर
खुला (open-ended) रखा, ताकि प्रत्येक मामले में उसका निर्धारण हो सके।
यही इस सिद्धांत की शक्ति भी है और आलोचना का आधार भी।
यह वाद “संविधान बचाओ” वाद कहा जाता है; इसकी सुनवाई 68 दिन चली —
भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे लंबी संवैधानिक सुनवाइयों में से एक।
सावधानी — केशवानंद के बारे में तीन आम भ्रांतियाँ
केशवानंद ने 24वाँ संशोधन अपास्त नहीं किया — उसे वैध ठहराया।
अपास्त हुआ था 25वें संशोधन के अनुच्छेद 31ग का दूसरा भाग। विकल्प में “24वाँ संशोधन अपास्त”
एक सामान्य जाल है।
“मूल ढाँचा” शब्द संविधान में नहीं है — यह न्यायिक निर्मिति है।
संविधान की प्रस्तावना से इसे सहारा अवश्य मिलता है, पर उसमें भी यह शब्द नहीं है।
सुमेलन-तालिका 17 : मूल ढाँचे का तत्व ↔ जिस वाद में मान्यता मिली
तत्व
प्रमुख वाद
संविधान की सर्वोच्चता
केशवानंद भारती (1973)
संप्रभु, लोकतांत्रिक एवं गणराज्यात्मक स्वरूप
केशवानंद भारती (1973)
शक्तियों का पृथक्करण
केशवानंद भारती (1973); NJAC वाद (2015)
संघीय ढाँचा
केशवानंद भारती (1973); एस.आर. बोम्मई (1994)
धर्मनिरपेक्ष स्वरूप
एस.आर. बोम्मई (1994)
राष्ट्र की एकता एवं अखंडता
एस.आर. बोम्मई (1994)
विधि का शासन
इंदिरा नेहरू गांधी (1975); इंद्रा साहनी (1992)
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन
इंदिरा नेहरू गांधी (1975); किहोतो होलोहन (1992)
न्यायिक समीक्षा
केशवानंद (1973); इंदिरा नेहरू गांधी (1975); मिनर्वा मिल्स (1980); एल. चंद्रकुमार (1997)
संसद की संशोधन-शक्ति का सीमित होना
मिनर्वा मिल्स (1980)
मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य एवं संतुलन
मिनर्वा मिल्स (1980)
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
एस.पी. संपत कुमार (1987); NJAC वाद (2015)
अनुच्छेद 32 तथा 226/227 की शक्तियाँ; न्याय तक प्रभावी पहुँच
एल. चंद्रकुमार (1997)
अनुच्छेद 136, 141 एवं 142 के अधीन उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ
दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य (1991)
समता का सिद्धांत (उसका सार-तत्व)
एम. नागराज (2006); इंद्रा साहनी (1992)
व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा; अनुच्छेद 21
आई.आर. कोएलो (2007) — “अधिकारों की कसौटी”
संसदीय शासन-प्रणाली एवं कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य
केशवानंद भारती (1973) के मतों में
मूल ढाँचे के प्रमुख तत्व — छह गुच्छों में“संविधान–संप्रभुता–धर्मनिरपेक्षता–संघवाद–समीक्षा–संतुलन”
सभी प्रमुख तत्व “स” से शुरू होने वाले छह शब्दों में सिमट जाते हैं —
संविधान की सर्वोच्चता · संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्यात्मक स्वरूप (+ विधि का शासन, स्वतंत्र निर्वाचन) ·
धर्मनिरपेक्षता (बोम्मई) · संघवाद तथा राष्ट्र की एकता (बोम्मई) ·
न्यायिक समीक्षा एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता (चंद्रकुमार, NJAC) ·
मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों का संतुलन तथा शक्तियों का पृथक्करण (मिनर्वा मिल्स)।
जो तत्व किसी “स” में न बैठे, वह प्रायः इन्हीं का विस्तार है।
9.4 सिद्धांत की आलोचना एवं महत्व
आलोचना
अस्पष्टता — “मूल ढाँचा” की कोई निश्चित सूची नहीं; हर पीठ नया तत्व जोड़ सकती है
पाठ में आधार नहीं — अनुच्छेद 368 में ऐसी कोई सीमा लिखी नहीं है
लोकतांत्रिक आपत्ति — अनिर्वाचित न्यायाधीश निर्वाचित संसद की संविधान-संशोधन शक्ति सीमित करते हैं
सिद्धांत का प्रयोग कभी-कभी असंगत रहा है
महत्व
1975–77 में अनुच्छेद 329क को अपास्त कर इसने लोकतंत्र की रक्षा की
42वें संशोधन के अतिरेक को 1980 में पलटने का आधार बना
संविधान को “संशोधन द्वारा प्रतिस्थापन” से बचाता है — संसद संविधान बदल सकती है, नष्ट नहीं कर सकती
बांग्लादेश, पाकिस्तान, युगांडा, केन्या जैसे देशों के न्यायालयों ने भी इसका उल्लेख किया है
संशोधन की शक्ति और संविधान बनाने की शक्ति का भेद स्पष्ट करता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (वाद) सूची-II (मूल ढाँचे के रूप में मान्य तत्व) A. एस.आर. बोम्मई 1. संसद की सीमित संशोधन-शक्ति B. मिनर्वा मिल्स 2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता C. एल. चंद्रकुमार 3. धर्मनिरपेक्षता एवं संघवाद D. NJAC वाद 4. अनुच्छेद 32 एवं 226 की न्यायिक समीक्षा-शक्ति कूट:
उत्तर: (C)बोम्मई (1994) — धर्मनिरपेक्षता एवं संघवाद; मिनर्वा मिल्स (1980) — संसद की सीमित संशोधन-शक्ति तथा अधिकार–निदेशक तत्व संतुलन; एल. चंद्रकुमार (1997) — अनुच्छेद 32 एवं 226/227 की समीक्षा-शक्ति; NJAC वाद (2015) — न्यायपालिका की स्वतंत्रता। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।
प्र.2केशवानंद भारती वाद (1973) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसका निर्णय 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 के बहुमत से दिया। 2. इस निर्णय में 24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पीठ 13 न्यायाधीशों की थी और बहुमत 7:6 — कथन 1 सही है। 24वाँ संशोधन वैध ठहराया गया था; अपास्त हुआ था 25वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 31ग का दूसरा भाग — अतः कथन 2 गलत है।
प्र.3निम्नलिखित को सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए। 1. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 2. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 3. आई.आर. कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य 4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
10. अधिकरण — अनुच्छेद 323क एवं 323ख तथा एल. चंद्रकुमार वाद
10.1 भाग XIV-क — क्यों जोड़ा गया
अधिकरण (tribunal) न पूरी तरह न्यायालय है, न पूरी तरह प्रशासनिक निकाय — यह
अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) संस्था है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र के विवाद
शीघ्रता से, तकनीकी विशेषज्ञता के साथ और कम खर्च में निपटाने के लिए बनाई जाती है। मूल संविधान में
अधिकरणों का कोई उपबंध नहीं था। स्वर्ण सिंह समिति की सिफ़ारिश पर
42वें संविधान संशोधन, 1976 ने नया भाग XIV-क जोड़ा, जिसमें
अनुच्छेद 323क तथा 323ख — केवल दो अनुच्छेद हैं।
अनुच्छेद 323क · प्रशासनिक अधिकरण
विषय — केवल लोक सेवाओं की भर्ती तथा सेवा-शर्तों से जुड़े विवाद
कौन बना सकता है — केवल संसद
कितने — संघ के लिए एक, और प्रत्येक राज्य के लिए एक (या दो/अधिक राज्यों के लिए एक)
पदानुक्रम — अधिकरणों का कोई पदानुक्रम नहीं (कोई अपीलीय अधिकरण नहीं)
उदाहरण — केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), राज्य प्रशासनिक अधिकरण
अनुच्छेद 323ख · अन्य विषयों के अधिकरण
विषय — कर, विदेशी मुद्रा एवं आयात-निर्यात, औद्योगिक एवं श्रम विवाद, भूमि सुधार, नगरीय संपत्ति की अधिकतम सीमा, संसद/विधानमंडल के निर्वाचन, खाद्य-पदार्थों का उत्पादन-वितरण, किराया एवं किरायेदारी, तथा इनसे जुड़े अपराध
कौन बना सकता है — संसद तथा राज्य विधानमंडल — दोनों, अपनी-अपनी विधायी सक्षमता के भीतर
कितने — कोई संख्या-सीमा नहीं
पदानुक्रम — अधिकरणों का पदानुक्रम बनाया जा सकता है
उदाहरण — आयकर अपीलीय अधिकरण, किराया अधिकरण, औद्योगिक अधिकरण
10.2 एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997) — मोड़-बिंदु
दोनों अनुच्छेदों में एक-एक खंड ऐसा था जिसने पूरा विवाद खड़ा कर दिया —
323क(2)(घ) तथा 323ख(3)(घ), जो संसद/विधानमंडल को यह शक्ति देते थे कि वे
अनुच्छेद 136 के अधीन उच्चतम न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित कर दें।
इसका सीधा अर्थ यह था कि उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226/227 वाली शक्ति समाप्त हो जाती।
एस.पी. संपत कुमार बनाम भारत संघ (1987) — प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 वैध ठहराया गया,
इस आधार पर कि अधिकरण उच्च न्यायालय का “प्रभावी विकल्प (effective substitute)” है।
एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ, 18 मार्च 1997 — सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने
संपत कुमार के इसी भाग को पलट दिया और तीन बातें स्थापित कीं —
(1) अनुच्छेद 32 तथा 226/227 के अधीन न्यायिक समीक्षा की शक्ति
संविधान का मूल ढाँचा है; संशोधन द्वारा भी उसे नहीं छीना जा सकता।
(2) अतः 323क(2)(घ) तथा 323ख(3)(घ) — तथा
प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 28 — असंवैधानिक।
(3) अधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध अब सीधे उच्चतम न्यायालय नहीं, बल्कि
संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष जाना होगा —
अर्थात् अधिकरण उच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं, विकल्प नहीं।
न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिकरणों को प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा तो सौंपी जा सकती है,
किंतु विधायी कार्रवाई (विधियों की संवैधानिकता) की समीक्षा नहीं — यद्यपि वे
अपनी मूल संविधि की वैधता को छोड़कर अन्य उपबंधों की जाँच कर सकते हैं।
सावधानी — एल. चंद्रकुमार के बाद अधिकरणों पर समीक्षा का ढाँचा
1997 से पहले — केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश के विरुद्ध केवल
अनुच्छेद 136 के अधीन सीधे उच्चतम न्यायालय जाया जा सकता था; उच्च न्यायालय का रास्ता बंद था।
1997 के बाद — पहले उच्च न्यायालय की खंडपीठ, तब उच्चतम न्यायालय।
यह “पहले और बाद” वाला भेद ही प्रश्न बनता है।
अधिकरण उच्च न्यायालय का विकल्प नहीं, पूरक (supplemental) है — यह एल. चंद्रकुमार की
निर्णायक पंक्ति है, और यह संपत कुमार (1987) के “प्रभावी विकल्प” वाले दृष्टिकोण को पलटती है।
अनुच्छेद 136 पर कोई रोक नहीं थी — 323क(2)(घ) ने भी उच्चतम न्यायालय की
विशेष अनुमति वाली अधिकारिता को बचाया हुआ था; जो वर्जित की गई थी वह
उच्च न्यायालयों की अधिकारिता थी। विकल्प में इसे उलट देना आम जाल है।
यह भी याद रखें कि उच्च न्यायालय का अनुच्छेद 227 वाला अधीक्षण अधिकरणों पर
42वें संशोधन ने हटाया था और 44वें संशोधन ने बहाल किया था — वही बहाली
एल. चंद्रकुमार के तर्क की नींव बनी।
10.3 प्रमुख अधिकरण — स्थापना एवं क्षेत्र
सुमेलन-तालिका 18 : अधिकरण ↔ स्थापना ↔ क्षेत्र
अधिकरण
स्थापना / मूल विधि
क्षेत्र एवं विशेषता
आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT)
1941
भारत का सबसे पुराना अधिकरण — इसे “अधिकरणों की जननी (Mother Tribunal)” कहा जाता है; प्रत्यक्ष कर संबंधी अपीलें
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT)
1985 — प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (अनुच्छेद 323क)
केंद्र सरकार के कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा-शर्तें; मुख्य पीठ नई दिल्ली; अध्यक्ष एवं सदस्य (न्यायिक + प्रशासनिक)
ऋण वसूली अधिकरण (DRT)
1993
बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं की ऋण-वसूली; अपील — ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण
प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण (SAT)
1990 के दशक — सेबी अधिनियम, 1992 के अधीन
सेबी, IRDAI तथा PFRDA के आदेशों के विरुद्ध अपील; मुख्यालय मुंबई
दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT)
2000 — ट्राई (संशोधन) अधिनियम, 2000
दूरसंचार, प्रसारण, साइबर तथा हवाई-अड्डा प्रशुल्क संबंधी विवाद
सशस्त्र बल अधिकरण (AFT)
अधिनियम 2007, स्थापना 2009
सेना, नौसेना, वायुसेना के कर्मियों की सेवा-शर्तें तथा सैन्य न्यायालय के दंड के विरुद्ध अपील; मुख्य पीठ नई दिल्ली
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)
18 अक्टूबर 2010 — राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010
पर्यावरण संरक्षण एवं वन; ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूज़ीलैंड के बाद भारत ऐसा विशेषीकृत पर्यावरण न्यायालय बनाने वाला तीसरा देश; मुख्य पीठ नई दिल्ली, क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता एवं चेन्नई
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) एवं NCLAT
2016 — कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन
कंपनी विधि तथा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के मामले
वस्तु एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण (GSTAT)
2025 में कार्यारंभ
GST संबंधी अपीलें; मुख्य पीठ नई दिल्ली, साथ में राज्य पीठें; मुख्य पीठ ही अग्रिम विनिर्णय की राष्ट्रीय अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करती है
उत्तर प्रदेश संदर्भ — उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण
प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 के अधीन राज्य प्रशासनिक अधिकरण राज्य सरकार के अनुरोध पर
केंद्र सरकार गठित करती है। उत्तर प्रदेश ने यह मार्ग न चुनकर अपनी राज्य-विधि से काम लिया —
उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 (मूल रूप से 16 फ़रवरी 1976 के अध्यादेश से)
के अधीन गठित उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण, जिसका मुख्य पीठ लखनऊ में है,
राज्य कर्मचारियों की सेवा-सम्बन्धी शिकायतों को देखता है। ध्यान दें कि
अनुच्छेद 323क के अधीन अधिकरण केवल संसद बना सकती है; उत्तर प्रदेश का यह अधिकरण
उस अनुच्छेद के अधीन नहीं, राज्य विधि के अधीन है — यह भेद परीक्षा-योग्य है।
एल. चंद्रकुमार के बाद इसके निर्णय भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226/227 वाली
समीक्षा के अधीन हैं।
10.4 अधिकरणों का समकालीन संकट
चंद्र कुमार के बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ। रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक (2019) में
न्यायालय ने वित्त अधिनियम, 2017 के अधीन बनाए गए अधिकरण-नियमों को अपास्त किया,
क्योंकि वे कार्यपालिका को नियुक्ति एवं सेवा-शर्तों पर अत्यधिक नियंत्रण देते थे।
अप्रैल 2021 के अध्यादेश ने सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष तथा न्यूनतम आयु
50 वर्ष कर दी; जुलाई 2021 में उच्चतम न्यायालय ने इन्हें अपास्त कर दिया।
अगस्त 2021 में संसद ने अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 पारित कर वही उपबंध
पुनः अधिनियमित कर दिए — इसी से “विधायी अधिभावन (legislative override)” का प्रश्न खड़ा हुआ।
इसी अधिनियम ने नौ अपीलीय अधिकरण (जैसे बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड तथा
फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण) समाप्त कर उनका कार्य उच्च न्यायालयों/अन्य निकायों को सौंप दिया।
नवंबर 2025 — मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ में उच्चतम न्यायालय ने
अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख उपबंध असंवैधानिक घोषित कर दिए, यह कहते हुए कि
संसद पहले से अपास्त उपबंधों को दोष दूर किए बिना पुनः अधिनियमित नहीं कर सकती;
ये उपबंध शक्तियों के पृथक्करण तथा न्यायिक स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं। न्यायालय ने
केंद्र को चार माह में राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (National Tribunals Commission)
गठित करने का निदेश दिया।
स्थायी समस्याएँ — भारी रिक्तियाँ (कई अधिकरण व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय),
प्रशासनिक नियंत्रण उन्हीं मंत्रालयों के पास होना जिनके विरुद्ध वाद चलते हैं,
“न्याय का अधिकरणीकरण (tribunalisation of justice)” की आलोचना, तथा
एल. चंद्रकुमार के बाद एक और अपीलीय स्तर जुड़ जाने से विलंब —
जो अधिकरणों के मूल उद्देश्य (शीघ्रता) को ही चुनौती देता है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 323क एवं 323ख के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. अनुच्छेद 323क के अधीन अधिकरण केवल संसद द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं। 2. अनुच्छेद 323ख के अधीन अधिकरणों का पदानुक्रम बनाया जा सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)323क केवल संसद को शक्ति देता है और उसमें अधिकरणों का पदानुक्रम नहीं हो सकता; 323ख संसद तथा राज्य विधानमंडल — दोनों को शक्ति देता है और उसमें पदानुक्रम अनुमत है। दोनों कथन सही हैं।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अब उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष जाया जा सकता है। कारण (R): एल. चंद्रकुमार वाद (1997) में अनुच्छेद 323क(2)(घ) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)323क(2)(घ) उच्च न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित करता था; एल. चंद्रकुमार (1997) ने उसे अपास्त कर यह व्यवस्था दी कि अधिकरण के निर्णय पहले संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष जाएँगे। अतः दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अधिकरण) (स्थापना वर्ष) 1. केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण — 1985 2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण — 2010 3. सशस्त्र बल अधिकरण — 1985 नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)सशस्त्र बल अधिकरण का अधिनियम 2007 का है और अधिकरण 2009 में स्थापित हुआ, 1985 में नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। CAT 1985 तथा NGT 2010 सही हैं।
11. लोक अदालत, ग्राम न्यायालय, विधिक सेवा प्राधिकरण एवं वैकल्पिक विवाद समाधान
11.1 संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 39क
न्याय तक पहुँच केवल न्यायालय के दरवाज़े तक पहुँचने से नहीं बनती; उसके लिए
सामर्थ्य भी चाहिए। 42वें संविधान संशोधन, 1976 ने भाग IV में
अनुच्छेद 39क जोड़ा — “राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि
समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो, और विशिष्टतया यह सुनिश्चित करेगा कि
आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए —
इसके लिए वह उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा निःशुल्क विधिक सहायता देगा।”
यही अनुच्छेद लोक अदालत, विधिक सेवा प्राधिकरण तथा ग्राम न्यायालय — तीनों की जड़ है।
11.2 विधिक सेवा प्राधिकरण — ढाँचा
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 संसद ने 1987 में पारित किया, पर वह
9 नवंबर 1995 को प्रवृत्त हुआ — इसीलिए 9 नवंबर को
राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस मनाया जाता है। इसी अधिनियम ने लोक अदालत को
सांविधिक दर्जा दिया।
सुमेलन-तालिका 19 : विधिक सेवा प्राधिकरण ↔ संरक्षक/अध्यक्ष
स्तर
निकाय
नेतृत्व
राष्ट्रीय
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) — 1995 में गठित
मुख्य संरक्षक (Patron-in-Chief) — भारत के मुख्य न्यायमूर्ति; कार्यकारी अध्यक्ष — उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश
उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति
उच्चतम न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश (मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नामित)
राज्य
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA)
मुख्य संरक्षक — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति; कार्यकारी अध्यक्ष — उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश
उच्च न्यायालय
उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति
उच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश
जिला
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)
जिला न्यायाधीश — अध्यक्ष
तालुक/तहसील
तालुक विधिक सेवा समिति
वरिष्ठतम सिविल न्यायाधीश
निःशुल्क विधिक सेवा के पात्र (धारा 12) — अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य;
मानव-दुर्व्यापार या बेगार के शिकार; महिलाएँ एवं बालक (आय की परवाह किए बिना);
दिव्यांग व्यक्ति; सामूहिक आपदा, जातीय हिंसा, जाति-अत्याचार, बाढ़, सूखा, भूकंप या औद्योगिक आपदा के पीड़ित;
औद्योगिक कर्मकार; अभिरक्षा में रखे गए व्यक्ति; तथा विहित आय-सीमा से नीचे के व्यक्ति।
प्राधिकरण केवल वकील ही नहीं देते — वे विधिक साक्षरता शिविर, पैरा-लीगल स्वयंसेवक,
जेल विधिक सेवा क्लिनिक तथा पीड़ित प्रतिकर योजना भी चलाते हैं।
11.3 लोक अदालत — “जनता की अदालत”
पहली लोक अदालत 14 मार्च 1982 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऊना में लगी थी —
तब उसका कोई सांविधिक आधार नहीं था, वह विशुद्ध स्वैच्छिक सुलह-मंच था। 1987 के अधिनियम ने
इसे विधिक स्वरूप दिया।
सुमेलन-तालिका 20 : लोक अदालत ↔ स्थायी लोक अदालत ↔ ग्राम न्यायालय — तीनों का भेद
आधार
लोक अदालत
स्थायी लोक अदालत
ग्राम न्यायालय
विधि
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (धारा 19–21)
उसी अधिनियम की धारा 22ख — 2002 के संशोधन से जोड़ी गई
केवल लोक उपयोगिता सेवाएँ — परिवहन, डाक-तार-दूरभाष, विद्युत/जल आपूर्ति, सफ़ाई, अस्पताल/औषधालय, बीमा आदि
मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर दीवानी एवं फौजदारी दोनों — छोटे मामले
धन-सीमा
कोई निश्चित सीमा नहीं
संपत्ति का मूल्य ₹1 करोड़ से अधिक न हो
राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सीमा
यदि समझौता न हो
मामला न्यायालय को लौटा दिया जाता है
गुण-दोष पर स्वयं निर्णय कर सकती है — यही इसकी विशेषता है
यह स्वयं एक न्यायालय है; निर्णय सुनाती है
पंचाट/निर्णय
दीवानी न्यायालय की डिक्री माना जाता है; अंतिम एवं आबद्धकर; कोई अपील नहीं
अंतिम एवं आबद्धकर; दीवानी न्यायालय की डिक्री के समान
दांडिक अपील सत्र न्यायालय को, दीवानी अपील जिला न्यायालय को — दोनों छह मास में निपटाई जानी हैं
क्या नहीं सुन सकती
अशमनीय (non-compoundable) अपराध
अशमनीय अपराध
अनुसूचियों में निर्दिष्ट मामलों से बाहर के विषय
प्रकृति
सुलह-आधारित; न्यायालय-शुल्क वापस मिल जाता है
पहले सुलह अनिवार्य, विफल होने पर निर्णय
पूर्ण न्यायालय; न्यायाधिकारी को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा
राष्ट्रीय लोक अदालत — 2015 से पूरे देश में एक ही दिन, वर्ष में कई बार आयोजित; इनमें
करोड़ों मामले निपटाए जाते हैं — यह लंबित वादों को घटाने का सबसे बड़ा एकल उपाय है।
ई-लोक अदालत — 2020 से आभासी माध्यम से।
लोक अदालत में पीठासीन अधिकारी सामान्यतः एक सेवारत/सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होता है,
जिसके साथ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य होते हैं।
निर्णायक बिंदु — लोक अदालत का पंचाट अंतिम है और उसके विरुद्ध
कोई अपील नहीं होती; असंतुष्ट पक्ष केवल यह कर सकता है कि यदि समझौता ही न हुआ हो तो
सामान्य न्यायालय में वाद चलाए। (पंचाट को अनुच्छेद 226/227 के अधीन असाधारण परिस्थितियों में
चुनौती अवश्य दी जा सकती है।)
11.4 ग्राम न्यायालय — गाँव तक पहुँचती अदालत
आधार — विधि आयोग की 114वीं रिपोर्ट (1986), जिसने “ग्राम न्यायालय” की संकल्पना दी।
स्थापना मध्यवर्ती पंचायत (intermediate panchayat) स्तर पर; न्यायालय चलता-फिरता
(mobile court) है — न्यायाधिकारी गाँवों में जाकर बैठता है।
न्यायाधिकारी (Nyayadhikari) की नियुक्ति राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से
परामर्श करके करती है; उसका दर्जा एवं वेतन प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समान।
यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की प्रक्रिया से आबद्ध नहीं है; संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाता है,
सुलहकर्ता (conciliator) नियुक्त कर सकता है, और दीवानी वादों में सुलह को प्राथमिकता देता है।
अधिनियम राज्यों के लिए बाध्यकारी नहीं — इसीलिए इसका क्रियान्वयन असमान रहा है।
31 अक्टूबर 2025 की स्थिति में 15 राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों ने लगभग 488 ग्राम न्यायालय अधिसूचित
किए थे, जिनमें से लगभग 333, 11 राज्यों में कार्यरत थे।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — ग्राम न्यायालय एवं त्वरित न्यायालय दोनों में देश में सबसे आगे
ग्राम न्यायालय — कार्यरत ग्राम न्यायालयों की संख्या में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम है;
31 अक्टूबर 2025 की स्थिति में राज्य में लगभग 109 ग्राम न्यायालय कार्यरत थे
(मध्य प्रदेश लगभग 89 के साथ दूसरे स्थान पर)। अर्थात् देश के लगभग एक-तिहाई कार्यरत ग्राम न्यायालय
अकेले उत्तर प्रदेश में हैं।
त्वरित विशेष न्यायालय (Fast Track Special Courts) — बलात्कार तथा
पॉक्सो अधिनियम के मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए 2019 में आरंभ इस केंद्र-प्रायोजित योजना में भी
उत्तर प्रदेश सर्वाधिक न्यायालयों वाला राज्य है — लगभग 218 कार्यरत त्वरित विशेष न्यायालय,
जिनसे लाखों मामलों का निपटारा हुआ है।
उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्यालय लखनऊ में है;
इसके मुख्य संरक्षक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति होते हैं। राज्य के प्रत्येक जनपद में
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में कार्य करता है।
11.5 वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) — न्यायालय के बाहर का रास्ता
सुमेलन-तालिका 21 : ADR की विधियाँ ↔ स्वरूप ↔ विधिक आधार
विधि
स्वरूप
विधिक आधार
माध्यस्थम् (Arbitration)
तटस्थ मध्यस्थ पक्षकारों को सुनकर बाध्यकारी पंचाट देता है — यह निर्णय-मूलक है
माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 (UNCITRAL आदर्श विधि पर आधारित); संशोधन 2015, 2019 एवं 2021
सुलह (Conciliation)
सुलहकर्ता स्वयं समझौते का प्रस्ताव दे सकता है; समझौता होने पर वह पंचाट जैसा प्रवर्तनीय
माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 का भाग III
मध्यस्थता (Mediation)
मध्यस्थ केवल संवाद कराता है, निर्णय नहीं देता; समाधान पक्षकारों का अपना होता है
मध्यस्थता अधिनियम, 2023 — भारत का पहला समर्पित मध्यस्थता कानून; वाद-पूर्व मध्यस्थता का उपबंध
वार्ता (Negotiation)
पक्षकार स्वयं, बिना किसी तीसरे पक्ष के
कोई विशिष्ट विधि नहीं
लोक अदालत
सुलह-आधारित; पंचाट दीवानी डिक्री के समान
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987
दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 — न्यायालय को शक्ति देती है कि वह वाद को
माध्यस्थम्, सुलह, न्यायिक समझौता (लोक अदालत सहित) या मध्यस्थता के लिए भेजे।
वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 12क — निर्धारित मूल्य के वाणिज्यिक वादों में
वाद-पूर्व मध्यस्थता अनिवार्य (जहाँ तत्काल अंतरिम उपाय अपेक्षित न हो); उच्चतम न्यायालय ने
पाटिल ऑटोमेशन बनाम राखेजा इंजीनियर्स (2022) में इसे बाध्यकारी ठहराया।
भारत अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र — नई दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र अधिनियम, 2019
के अधीन; भारत को अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् का केंद्र बनाने की दिशा में कदम।
ADR क्यों — कम खर्च, कम समय, गोपनीयता, संबंधों की रक्षा, और सबसे बड़ी बात —
न्यायालयों पर बोझ की कमी। भारत जैसे 5 करोड़ से अधिक लंबित वादों वाले देश में यही सबसे
व्यावहारिक राहत है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1लोक अदालत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. लोक अदालत का पंचाट दीवानी न्यायालय की डिक्री माना जाता है और उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं होती। 2. लोक अदालत अशमनीय अपराधों से संबंधित मामलों का भी निपटारा कर सकती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पंचाट दीवानी डिक्री के समान, अंतिम एवं आबद्धकर होता है और उसके विरुद्ध अपील नहीं होती — कथन 1 सही है। लोक अदालत अशमनीय (non-compoundable) अपराधों का निपटारा नहीं कर सकती — कथन 2 गलत है।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (निकाय) सूची-II (नेतृत्व) A. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक 1. जिला न्यायाधीश B. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का कार्यकारी अध्यक्ष 2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति C. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक 3. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति D. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष 4. उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश कूट:
उत्तर: (B)NALSA के मुख्य संरक्षक भारत के मुख्य न्यायमूर्ति तथा कार्यकारी अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश होते हैं; SLSA के मुख्य संरक्षक संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति; DLSA के अध्यक्ष जिला न्यायाधीश। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।
प्र.3ग्राम न्यायालयों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 राज्यों के लिए ग्राम न्यायालय स्थापित करना अनिवार्य बनाता है। 2. ग्राम न्यायालय के न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करके करती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अधिनियम राज्यों को ग्राम न्यायालय स्थापित करने का विकल्प देता है, बाध्य नहीं करता — इसीलिए क्रियान्वयन असमान रहा है; कथन 1 गलत है। न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद करती है और उसे प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट का दर्जा प्राप्त होता है — कथन 2 सही है।
12. समकालीन मुद्दे, सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम
12.1 लंबित वाद — आँकड़ों में समस्या
5.39 करोड़सभी न्यायालयों में कुल लंबित वाद (31 दिसंबर 2025)
92,101उच्चतम न्यायालय में लंबित
63.66 लाख25 उच्च न्यायालयों में लंबित
4.76 करोड़जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित
38उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या (2026 से)
1,122सभी उच्च न्यायालयों की कुल स्वीकृत संख्या
160इलाहाबाद — देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय
12 लाखइलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित — देश में सर्वाधिक
तीन बातें इन आँकड़ों से सीधे निकलती हैं। पहली — लंबित वादों का लगभग
99% बोझ जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर है, इसलिए सुधार की असली लड़ाई वहीं है,
उच्चतम न्यायालय में नहीं। दूसरी — उच्च न्यायालयों में स्वीकृत 1,122 पदों के विरुद्ध
लगभग एक-तिहाई पद रिक्त रहते हैं, और अधीनस्थ न्यायपालिका में भी लगभग 20% रिक्तियाँ हैं।
तीसरी — भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या लगभग
20–21 है, जबकि विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट (1987) ने इसे 50 करने की
सिफ़ारिश की थी और अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ (2002) में उच्चतम न्यायालय ने भी यही लक्ष्य दोहराया था।
12.2 विलंब के कारण एवं उपाय
विलंब के प्रमुख कारण
रिक्तियाँ — नियुक्ति-प्रक्रिया में विलंब (कॉलेजियम–सरकार गतिरोध)
अवसंरचना — न्यायालय-कक्ष, स्टाफ़, अभिलेखागार की कमी
सरकार सबसे बड़ी वादी — लगभग आधे वादों में राज्य पक्षकार है; अनावश्यक अपीलें
स्थगन की संस्कृति — बार-बार तारीख; दीवानी प्रक्रिया संहिता की सीमा के बावजूद
पुरानी एवं जटिल विधियाँ; साक्ष्य-प्रक्रिया की लंबाई
विशेष विधियों द्वारा नए वर्गों के वाद लगातार जुड़ते जाना
चल रहे उपाय
ई-न्यायालय परियोजना, चरण-III — सितंबर 2023 में मंजूर, ₹7,210 करोड़, चार वर्ष (2023 से) — अभिलेखों का डिजिटलीकरण, ई-फाइलिंग, ई-सेवा केंद्र
राष्ट्रीय न्यायिक आँकड़ा ग्रिड (NJDG) — प्रत्येक न्यायालय की लंबित/निपटान स्थिति सार्वजनिक
लोक अदालत एवं ADR; वाणिज्यिक न्यायालय; त्वरित विशेष न्यायालय
अनुच्छेद 224क के अधीन तदर्थ न्यायाधीश (2021 दिशा-निर्देश, 2025 में शिथिल)
संविधान पीठ की सुनवाइयों का सीधा प्रसारण (2018 के स्वप्निल त्रिपाठी निर्णय के बाद, 2022 से नियमित)
निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद (SUVAS/SUPACE जैसे AI उपकरण); तटस्थ उद्धरण (neutral citation)
12.3 न्यायिक जवाबदेही — एक अधूरा ढाँचा
संवैधानिक तंत्र केवल एक है — अनुच्छेद 124(4) की हटाने की प्रक्रिया, जो इतनी कठिन है कि
आज तक किसी न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सका।
आंतरिक तंत्र (in-house procedure) — उच्चतम न्यायालय की पूर्ण न्यायालय बैठक ने इसे 1999 में अपनाया और 2014 में परिष्कृत किया;
इसके अंतर्गत मुख्य न्यायमूर्ति शिकायत पर न्यायाधीशों की समिति से जाँच करा सकते हैं। इसका
अधिकतम परिणाम है — न्यायिक कार्य वापस ले लेना, त्यागपत्र की सलाह देना, या संसद को संदर्भ भेजना।
न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन (Restatement of Values of Judicial Life), 1997 —
न्यायाधीशों द्वारा स्वयं अपनाई गई आचार-संहिता।
न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक, 2010 — शिकायत-तंत्र तथा संपत्ति-घोषणा का प्रस्ताव;
लोक सभा से पारित होकर भी व्यपगत (lapse) हो गया।
पारदर्शिता की दो बड़ी घटनाएँ — केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, उच्चतम न्यायालय बनाम
सुभाष चंद्र अग्रवाल (2019), जिसमें पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि
भारत के मुख्य न्यायमूर्ति का कार्यालय सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन “लोक प्राधिकरण” है;
तथा 1 अप्रैल 2025 की पूर्ण न्यायालय (Full Court) की संकल्पना, जिसके बाद
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति-घोषणाएँ पहली बार न्यायालय की वेबसाइट पर
सार्वजनिक की गईं।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण (2025–26) — आंतरिक जाँच, त्यागपत्र से इनकार,
संसद में हटाने का प्रस्ताव तथा लोक सभा अध्यक्ष द्वारा गठित समिति — यह पूरा प्रकरण
जवाबदेही-ढाँचे की सीमाओं का जीवंत उदाहरण है और 2026 की परीक्षा के लिए सर्वाधिक संभावित
समकालीन विषय है।
अन्य चर्चित मुद्दे — कॉलेजियम की अपारदर्शिता एवं संशोधित MoP का गतिरोध;
सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियाँ (राज्यपाल, अधिकरण-अध्यक्ष, राज्य सभा) और
उनसे उठते हित-टकराव के प्रश्न; न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कमी;
न्यायालयों की अवकाश-प्रणाली; तथा अनुच्छेद 142 की सीमा पर बहस।
परीक्षा-दृष्टि — इस अध्याय के सर्वाधिक संभावित प्रश्न-बिंदु
शब्द-जाल — “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” बनाम “कुल सदस्य-संख्या”;
“परामर्श” बनाम “सहमति”; “अभिलेख न्यायालय”; “केवल मौलिक अधिकार” बनाम “किसी अन्य प्रयोजन”;
“महाभियोग” बनाम “हटाना”।
उत्तर प्रदेश — इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1866, 160 न्यायाधीश, लखनऊ पीठ),
12 जून 1975 का निर्णय एवं अनुच्छेद 329क, खड़क सिंह (1962), चंद्र मोहन (1966) एवं अनुच्छेद 233क,
केशव सिंह निर्देश (1964), कानपुर का गंगा प्रदूषण वाद, ग्राम न्यायालय एवं त्वरित न्यायालय में प्रथम स्थान।
12.4 सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची — एक दृष्टि में
सुमेलन-तालिका 22 : न्यायपालिका से संबंधित सभी अनुच्छेद ↔ विषय
अनुच्छेद
विषय
50
कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (नीति-निदेशक तत्व)
121 · 211
न्यायाधीश के आचरण पर संसद/राज्य विधानमंडल में चर्चा का निषेध
124
उच्चतम न्यायालय की स्थापना एवं गठन; नियुक्ति; अर्हता; हटाना
124क · 124ख · 124ग
NJAC — 99वें संशोधन (2014) द्वारा जोड़े गए, 2015 में अपास्त
125
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन
126 · 127 · 128
कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति · तदर्थ न्यायाधीश · सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति
129 · 215
अभिलेख न्यायालय — उच्चतम न्यायालय · उच्च न्यायालय
130
उच्चतम न्यायालय का स्थान
131
आरंभिक अधिकारिता — संघ एवं राज्यों के विवाद
131क
केंद्रीय विधियों पर अनन्य अधिकारिता — 42वें (1976) से जोड़ा, 43वें (1977) से हटाया
1 अप्रैल — न्यायाधीशों की संपत्ति-घोषणा सार्वजनिक · नवंबर — अनुच्छेद 143 पर राज्यपाल-अनुमति की राय तथा मद्रास बार एसोसिएशन में अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख उपबंध अपास्त
पारदर्शिता, अनुच्छेद 142 की सीमा तथा राष्ट्रीय अधिकरण आयोग का निदेश
2026
उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 — संख्या 38; 3 फ़रवरी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय हेतु अनुच्छेद 224क के अधीन 5 तदर्थ न्यायाधीश
संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति + सात; वर्तमान स्वीकृत संख्या 38।
उच्च न्यायालयों की संख्या 25; इनमें 7 की अधिकारिता एक से अधिक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र पर।
सेवानिवृत्ति आयु — उच्चतम न्यायालय 65, उच्च न्यायालय 62।
अर्हता — उच्चतम न्यायालय : 5 वर्ष न्यायाधीश / 10 वर्ष अधिवक्ता / पारंगत विधिवेत्ता;
उच्च न्यायालय : 10 वर्ष न्यायिक पद / 10 वर्ष अधिवक्ता;
जिला न्यायाधीश (सीधी भर्ती) : 7 वर्ष अधिवक्ता।
हटाने का प्रस्ताव — लोक सभा में 100, राज्य सभा में 50 सदस्यों की सूचना;
बहुमत — कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3, उसी सत्र में।
पीठ-संख्याएँ — केशवानंद 13 (7:6) · गोलकनाथ 11 (6:5) ·
द्वितीय एवं तृतीय न्यायाधीश वाद 9-9 · कोएलो 9 ·
एल. चंद्रकुमार 7 · केशव सिंह निर्देश 7 · NJAC 5 (4:1)।
संविधान की व्याख्या से संबंधित सारवान प्रश्न या अनुच्छेद 143 के निर्देश हेतु न्यूनतम पाँच न्यायाधीश (अनु. 145(3))।
प्रथम लोक अदालत — 1982, ऊना (जूनागढ़), गुजरात;
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम — 1987, प्रवृत्त 9 नवंबर 1995;
ग्राम न्यायालय अधिनियम — 2008, प्रवृत्त 2 अक्टूबर 2009।
स्थायी लोक अदालत की धन-सीमा — ₹1 करोड़; लोक अदालत के पंचाट के विरुद्ध कोई अपील नहीं।
सबसे पुराना अधिकरण — आयकर अपीलीय अधिकरण (1941);
सबसे पुराना उच्च न्यायालय — कलकत्ता (1862);
सबसे बड़ा उच्च न्यायालय — इलाहाबाद (160);
सबसे छोटा — सिक्किम (3)।
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (संविधान संशोधन) सूची-II (न्यायपालिका पर प्रभाव) A. 15वाँ संशोधन 1. अनुच्छेद 134क जोड़ा गया तथा अनुच्छेद 227 का अधीक्षण बहाल B. 20वाँ संशोधन 2. भाग XIV-क (अनुच्छेद 323क एवं 323ख) जोड़ा गया C. 42वाँ संशोधन 3. अनुच्छेद 224क जोड़ा गया D. 44वाँ संशोधन 4. अनुच्छेद 233क जोड़ा गया कूट:
उत्तर: (A)15वाँ संशोधन (1963) — अनुच्छेद 224क; 20वाँ संशोधन (1966) — अनुच्छेद 233क; 42वाँ संशोधन (1976) — भाग XIV-क; 44वाँ संशोधन (1978) — अनुच्छेद 134क तथा अनुच्छेद 227 का अधीक्षण बहाल। अतः A-3, B-4, C-2, D-1 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (वाद) (संबंधित राज्य) 1. खड़क सिंह — उत्तर प्रदेश 2. चंद्र मोहन — उत्तर प्रदेश 3. एस.आर. बोम्मई — केरल नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) का संबंध कर्नाटक से है (एस.आर. बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे), केरल से नहीं — अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है। खड़क सिंह (1962) तथा चंद्र मोहन (1966) — दोनों उत्तर प्रदेश राज्य के विरुद्ध थे।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश-संख्या बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती। कारण (R): अनुच्छेद 124(1) संसद को विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की अधिक संख्या विहित करने की शक्ति देता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)अनुच्छेद 124(1) में ही “जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती” शब्द हैं; इसीलिए 1956, 1960, 1977, 1986, 2009, 2019 तथा 2026 की वृद्धियाँ साधारण अधिनियमों से हुईं, संविधान संशोधन से नहीं। दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।