भाग 4 · भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

4.3 संघीय ढाँचा एवं आपातकालीन उपबंध

भारतीय संघवाद का स्वरूप, केंद्र-राज्य विधायी-प्रशासनिक-वित्तीय संबंध, अंतर्राज्यीय संबंध, विशेष उपबंध वाले राज्य, पाँचवीं एवं छठी अनुसूची तथा अनुच्छेद 352, 356 एवं 360 के अधीन तीन प्रकार के आपातकाल

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विषय-सूची

  1. भारतीय संघवाद का स्वरूप — संघीय, एकात्मक एवं सहकारी
  2. विधायी संबंध — सातवीं अनुसूची एवं अनुच्छेद 245 से 255
  3. प्रशासनिक संबंध — अनुच्छेद 256 से 263, अखिल भारतीय सेवाएँ एवं परिषदें
  4. वित्तीय संबंध — करों का विभाजन, वित्त आयोग एवं GST परिषद
  5. अंतर्राज्यीय संबंध — जल विवाद, व्यापार-वाणिज्य एवं पूर्ण विश्वास
  6. विशेष उपबंध वाले राज्य — अनुच्छेद 371 से 371ञ
  7. पाँचवीं एवं छठी अनुसूची — अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र
  8. राष्ट्रीय आपात — अनुच्छेद 352
  9. राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद 356 एवं एस.आर. बोम्मई
  10. वित्तीय आपात — अनुच्छेद 360 तथा तीनों आपातों की तुलना
  11. आपातकाल का मौलिक अधिकारों पर प्रभाव — अनुच्छेद 358 एवं 359
  12. संघवाद की समकालीन चुनौतियाँ — राज्यपाल, GST एवं परिसीमन
  13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम — एक दृष्टि में
इस अध्याय का परीक्षा-भार उच्च

राजव्यवस्था से 2025 के मूल प्रश्नपत्र में लगभग 19–20 प्रश्न आए थे, और उनमें अनुच्छेद-संख्या, अनुसूची-संख्या तथा संशोधन-संख्या का हिस्सा सबसे बड़ा था। यह अध्याय ठीक उसी सामग्री का भंडार है — यहाँ का हर बिंदु संख्या से बँधा है। UPPSC यहाँ से चार रूपों में पूछता है: (क) सुमेलन — अनुच्छेद ↔ विषय, 371 श्रृंखला ↔ राज्य, क्षेत्रीय परिषद ↔ मुख्यालय; (ख) दो-कथन — जिसमें “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” बनाम “कुल सदस्यता” जैसा एक वाक्यांश उत्तर पलट देता है; (ग) कालक्रम — आपात-घोषणाओं तथा संशोधनों का क्रम; (घ) “सही सुमेलित नहीं है” — जहाँ 371ज और 371झ जैसे निकट-समान युग्म फँसाते हैं। इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में एक सुमेलन-तालिका है और अध्याय के अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची।

इस अध्याय की सीमा

मौलिक अधिकारों का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.2 में है — यहाँ केवल यह देखा गया है कि आपातकाल उन पर कैसे असर डालता है (अनुच्छेद 358 एवं 359)। राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री की शक्तियाँ, राज्य कार्यपालिका की संरचना अध्याय 4.4 में हैं — यहाँ राज्यपाल केवल केंद्र-राज्य संबंध के बिंदु से आया है। वित्त आयोग की संरचना, योग्यताएँ एवं सभी आयोगों का ब्योरा अध्याय 4.6 में है — यहाँ केवल अनुच्छेद 280 का संवैधानिक ढाँचा तथा नवीनतम (16वें) आयोग की सिफारिशें दी गई हैं। संविधान का निर्माण एवं संशोधन-प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) अध्याय 4.1 में है।

1. भारतीय संघवाद का स्वरूप — संघीय, एकात्मक एवं सहकारी

1.1 “राज्यों का संघ” — शब्द-चयन ही पहला उत्तर है

संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है: “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (Union of States) होगा।” यहाँ जानबूझकर “संघ” (Union) शब्द रखा गया, “परिसंघ” (Federation) नहीं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में इसके दो कारण बताए —

  1. भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते (agreement) का परिणाम नहीं है, जैसा अमेरिकी संघ था;
  2. राज्यों को संघ से अलग होने (secession) का अधिकार नहीं है — संघ अविनाशी है, यद्यपि राज्य अविनाशी नहीं।

यही एक वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है: भारत में संघ अविनाशी है, राज्य नहीं। संसद अनुच्छेद 3 के अधीन साधारण बहुमत से किसी राज्य का नाम, सीमा या क्षेत्र बदल सकती है, दो राज्यों को मिला सकती है, नया राज्य बना सकती है। अमेरिका में यह असंभव है।

1.2 संघीय लक्षण — जो भारत को संघ बनाते हैं

1.3 एकात्मक लक्षण — जो इसे “अर्ध-संघीय” बनाते हैं

सुमेलन-तालिका 1 : एकात्मक झुकाव वाले उपबंध एवं उनका अनुच्छेद
एकात्मक लक्षणसंवैधानिक आधारपरीक्षा-बिंदु
सशक्त केंद्रसातवीं अनुसूची; अनु. 248संघ सूची सबसे लंबी; अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास (कनाडा-मॉडल; अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया में राज्यों के पास)
राज्यों के अलग संविधान नहींभाग VI सभी राज्यों परजम्मू-कश्मीर का अलग संविधान अपवाद था — 5 अगस्त 2019 के बाद वह स्थिति समाप्त
राज्यों की प्रादेशिक अखंडता की गारंटी नहींअनु. 2 एवं 3अनु. 3 के अधीन विधेयक पर राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक; राज्य विधानमंडल की राय ली जाती है पर वह बाध्यकारी नहीं; पारित साधारण बहुमत से; अनु. 4 — यह अनु. 368 के अर्थ में संशोधन नहीं
एकल नागरिकताअनु. 5–11अमेरिका में दोहरी नागरिकता
एकीकृत न्यायपालिकाअनु. 124, 214एक ही न्यायालय-शृंखला केंद्र एवं राज्य दोनों की विधियाँ लागू करती है
अखिल भारतीय सेवाएँअनु. 312IAS/IPS अधिकारी राज्य में काम करते हैं पर नियंत्रण केंद्र का भी
राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वाराअनु. 155, 156राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण
आपातकालीन उपबंधअनु. 352, 356, 360आपात में संविधान स्वतः एकात्मक हो जाता है — “अर्ध-संघीय” की सबसे बड़ी कसौटी
एकल निर्वाचन आयोगअनु. 324संसद एवं राज्य विधानमंडल दोनों के चुनाव एक ही आयोग
एकीकृत लेखा-परीक्षाअनु. 148 (CAG)राज्यों के लेखे भी संघ द्वारा नियुक्त CAG परखता है
राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्वचौथी अनुसूचीजनसंख्या के अनुपात में — अमेरिकी सीनेट में प्रत्येक राज्य को 2-2 सीट
संसद की राज्य सूची पर विधि-शक्तिअनु. 249, 250, 252, 253, 356पाँच परिस्थितियाँ — खंड 2 में विस्तार से
एकात्मक झुकाव के सात सबसे पूछे जाने वाले बिंदु “अवशेष–अखिल–आपात–एकल–राज्यपाल–अनुच्छेद 3–CAG”

अवशेष शक्तियाँ संघ के पास (अनु. 248) · अखिल भारतीय सेवाएँ (अनु. 312) · आपातकालीन उपबंध (352/356/360) · एकल नागरिकता एवं एकल निर्वाचन आयोग · राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा · अनुच्छेद 3 से राज्यों की सीमा बदलने की शक्ति · CAG द्वारा राज्यों की भी लेखा-परीक्षा।

1.4 विद्वानों के मत — यह सुमेलन प्रश्न बनता है

सुमेलन-तालिका 2 : भारतीय संघवाद पर टिप्पणियाँ
विद्वानभारतीय संविधान के लिए प्रयुक्त पद
के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare)“अर्ध-संघीय” (quasi-federal) — “संघीय सिद्धांतों वाला एकात्मक राज्य”
आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings)“प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ”
ग्रेनविल ऑस्टिन (Granville Austin)“सहकारी संघवाद” (cooperative federalism)
डब्ल्यू.एच. मॉरिस-जोन्स“सौदेबाजी का संघवाद” (bargaining federalism)
पॉल एपलबी (Paul Appleby)“अत्यंत संघीय” (extremely federal)
डी.डी. बसु“न शुद्ध संघीय, न शुद्ध एकात्मक — दोनों का मिश्रण”
सर आइवर जेनिंग्स का प्रतिपक्ष — अल्फ्रेड डायसीडायसी का पद “विधि का शासन” है, संघवाद का नहीं — विकल्पों में यह जाल के रूप में आता है

1.5 न्यायालय ने संघवाद को कैसे देखा

1.6 सहकारी संघवाद एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद

सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का अर्थ है — केंद्र और राज्य प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार। इसकी संस्थागत अभिव्यक्तियाँ हैं:

प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) इससे भिन्न है — इसमें राज्य निवेश, सुगमता-सूचकांक तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में एक-दूसरे से होड़ करते हैं। नीति आयोग की SDG सूचकांक, स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक जैसी राज्य-रैंकिंग इसी का औज़ार हैं।

1.7 राज्यों का पुनर्गठन — संघीय मानचित्र कैसे बना

1948धार आयोग (S.K. Dhar) — भाषा को आधार मानने से इनकार; प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता
1948–49JVP समिति — जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया; भाषायी आधार अस्वीकृत
1953आंध्र राज्य — पोट्टी श्रीरामुलु के 56 दिन के आमरण अनशन एवं मृत्यु के बाद पहला भाषायी राज्य (1 अक्टूबर 1953)
दिसंबर 1953राज्य पुनर्गठन आयोग गठित — फज़ल अली (अध्यक्ष), के.एम. पणिक्कर, हृदयनाथ कुंज़रू
सितंबर 1955आयोग की रिपोर्ट — भाषा को आधार स्वीकार, पर “एक भाषा, एक राज्य” के सूत्र को अस्वीकार
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 + 7वाँ संविधान संशोधन14 राज्य एवं 6 संघ राज्यक्षेत्र; राज्यों की भाग-क/ख/ग/घ श्रेणियाँ समाप्त
2000तीन नए राज्य — छत्तीसगढ़ (1 नवंबर), उत्तरांचल (9 नवंबर), झारखंड (15 नवंबर)
2014तेलंगाना (2 जून) — 29वाँ राज्य; आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014
2019जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम — जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख दो संघ राज्यक्षेत्र (31 अक्टूबर 2019 से); राज्यों की संख्या 28
उत्तर प्रदेश संदर्भ — पुनर्गठन की कहानी में UP कहाँ है
सावधानी — अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 अलग हैं
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ” कहा गया है, “परिसंघ” नहीं।
कारण (R): भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है और राज्यों को संघ से पृथक् होने का अधिकार नहीं है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में ठीक यही दो कारण दिए थे — संघ किसी समझौते का परिणाम नहीं, और राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण भी है।

प्र.2 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (विद्वान)    सूची-II (भारतीय संविधान के लिए प्रयुक्त पद)
A. के.सी. व्हीयर   1. सहकारी संघवाद
B. ग्रेनविल ऑस्टिन   2. सौदेबाजी का संघवाद
C. मॉरिस-जोन्स   3. अर्ध-संघीय
D. आइवर जेनिंग्स   4. प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ
कूट:

AA-3, B-1, C-4, D-2BA-1, B-3, C-2, D-4CA-3, B-1, C-2, D-4DA-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)व्हीयर — “अर्ध-संघीय”; ऑस्टिन — “सहकारी संघवाद”; मॉरिस-जोन्स — “सौदेबाजी का संघवाद”; जेनिंग्स — “प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ”। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

प्र.3 अनुच्छेद 3 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त की गई राय संसद पर बाध्यकारी होती है।
2. ऐसे विधेयक को संसद में पुरःस्थापित करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राज्य विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं होती — 2011 में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चार राज्यों वाला प्रस्ताव इसी कारण स्वतः प्रभावी नहीं हुआ; अतः कथन 1 गलत है। राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है और वे विधेयक को राज्य विधानमंडल को निर्दिष्ट करते हैं — कथन 2 सही है।

2. विधायी संबंध — सातवीं अनुसूची एवं अनुच्छेद 245 से 255

संविधान का भाग XI (अनुच्छेद 245–263) केंद्र-राज्य संबंधों का मुख्य अध्याय है। इसका अध्याय I (245–255) विधायी संबंध तथा अध्याय II (256–263) प्रशासनिक संबंध है। विधायी संबंध चार पहलुओं में बँटे हैं — क्षेत्रीय विस्तार, विषयों का बँटवारा, राज्य सूची पर संसद की विधि तथा राज्य विधान पर केंद्र का नियंत्रण

2.1 अनुच्छेद 245 — विधियों का क्षेत्रीय विस्तार

अनुच्छेद 245 पर अपवाद: कुछ क्षेत्रों में संसद/राज्य की विधि स्वतः लागू नहीं होती — पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में राज्यपाल अधिसूचना द्वारा किसी अधिनियम का प्रयोग रोक या संशोधित कर सकता है (पैरा 5); छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों में राज्यपाल/राष्ट्रपति ऐसा कर सकते हैं; तथा अनुच्छेद 371क एवं 371छ के अधीन नागालैंड एवं मिज़ोरम में कुछ विषयों पर संसद की विधि तब तक लागू नहीं होती जब तक राज्य विधान सभा संकल्प न करे।

2.2 अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची — तीन सूचियाँ

सुमेलन-तालिका 3 : सातवीं अनुसूची — तीनों सूचियाँ
सूचीकौन विधि बनाता हैप्रविष्टियाँ (मूल → वर्तमान)प्रमुख विषय
सूची I — संघ सूचीकेवल संसद (अनु. 246(1))97 → 98रक्षा, विदेशी मामले, परमाणु ऊर्जा, रेल, डाक-तार, बैंकिंग, बीमा, मुद्रा, जनगणना, अखिल भारतीय सेवाएँ, नागरिकता, निर्वाचन, अंतर्राज्यीय नदियों का विनियमन
सूची II — राज्य सूचीकेवल राज्य विधानमंडल (अनु. 246(3))66 → 59लोक व्यवस्था, पुलिस, जेल, स्थानीय शासन, लोक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई एवं जल, भूमि, मद्य, मेले एवं बाज़ार, राज्य लोक सेवाएँ, भू-राजस्व
सूची III — समवर्ती सूचीसंसद एवं राज्य दोनों (अनु. 246(2))47 → 52दांडिक विधि एवं प्रक्रिया, विवाह-तलाक, संविदा, न्यास, दिवाला, श्रम, शिक्षा, वन, वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण, जनसंख्या नियंत्रण, बिजली, आर्थिक-सामाजिक योजना

प्रधानता का क्रम — टकराव की स्थिति में संघ सूची > समवर्ती सूची > राज्य सूची। समवर्ती सूची का विचार ऑस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया है।

अनुच्छेद 246क (101वाँ संशोधन, 2016) एक अपवाद है — यह वस्तु एवं सेवा कर पर संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों को समवर्ती शक्ति देता है, पर अंतर्राज्यीय आपूर्ति पर विधि बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है (अनु. 246क(2))।

अनुच्छेद 247 — संसद संघ सूची के विषयों की विधियों के बेहतर प्रशासन के लिए अतिरिक्त न्यायालय स्थापित कर सकती है।
अनुच्छेद 248अवशिष्ट शक्तियाँ (residuary powers) संसद के पास; इसमें तीनों सूचियों में न आने वाला कोई भी कर लगाने की शक्ति भी है। इसी के अनुरूप संघ सूची की प्रविष्टि 97 है। साइबर विधि, इलेक्ट्रॉनिक संचार, विदेशी अभिकरण जैसे विषय इसी शक्ति से आते हैं।

सावधानी — सूचियों की “वर्तमान” संख्या पर पुस्तकें अलग-अलग हैं
तीनों सूचियों की मूल संख्या “सत्तानवे–छियासठ–सैंतालीस”

संघ 97 → राज्य 66 → समवर्ती 47। घटते क्रम में याद रखें — और ध्यान दें कि केवल राज्य सूची घटी है (66 → 59), संघ एवं समवर्ती दोनों बढ़ी हैं। इसी में पूरा केंद्रीकरण छिपा है।

2.3 42वें संशोधन ने क्या खींचा — पाँच विषय राज्य से समवर्ती में

42वें संशोधन (1976) से समवर्ती सूची में गए पाँच विषय “शिक्षा वन नापतौल वन्यजीव न्याय”

शिक्षा (प्रविष्टि 11 हटी → समवर्ती 25) · वन (19 हटी → समवर्ती 17क) · नाप-तौल — बाट एवं माप (29 हटी → समवर्ती 33क) · वन्यजीव एवं पक्षियों का संरक्षण (20 हटी → समवर्ती 17ख) · न्याय-प्रशासन (राज्य सूची की प्रविष्टि 3 से कुछ शब्द हटे → समवर्ती 11क)। साथ ही 42वें ने समवर्ती सूची में जनसंख्या नियंत्रण एवं परिवार नियोजन (20क) भी जोड़ा — यह किसी सूची से खींचा नहीं गया, नया था। यही अंतर प्रश्न बनता है।

2.4 अनुच्छेद 249, 250, 252, 253 — राज्य सूची पर संसद की विधि

सामान्य नियम यह है कि राज्य सूची पर संसद विधि नहीं बना सकती। किंतु पाँच परिस्थितियाँ अपवाद हैं, और इन्हीं के बीच का अंतर UPPSC का सबसे प्रिय जाल है।

सुमेलन-तालिका 4 : राज्य सूची पर संसद की विधायी शक्ति — पाँच स्थितियाँ
अनुच्छेदशर्तकौन-सा सदन / कौन-सा बहुमतविधि कब तक प्रभावी
249
राष्ट्रीय हित
राज्यसभा यह संकल्प करे कि राष्ट्रीय हित में संसद का विधि बनाना आवश्यक/समीचीन हैकेवल राज्यसभा; उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम 2/3संकल्प अधिकतम 1 वर्ष के लिए (जितनी बार चाहें 1-1 वर्ष का नवीकरण); विधि संकल्प समाप्त होने के 6 माह बाद निष्प्रभावी
250
राष्ट्रीय आपात
अनुच्छेद 352 की उद्घोषणा प्रवर्तन में होकोई अलग संकल्प नहीं — आपात स्वतः यह शक्ति देता हैविधि आपात समाप्त होने के 6 माह बाद निष्प्रभावी
252
राज्यों का अनुरोध
दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों के सभी सदन संकल्प पारित करेंसंबंधित राज्यों के विधानमंडल; संसद में साधारण बहुमतकोई समय-सीमा नहीं; विधि उन्हीं राज्यों पर लागू, अन्य राज्य बाद में संकल्प से अंगीकार कर सकते हैं
253
अंतर्राष्ट्रीय करार
किसी संधि, करार, अभिसमय अथवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय को कार्यान्वित करनाकेवल संसद; कोई राज्य-सहमति आवश्यक नहींकोई समय-सीमा नहीं — स्थायी विधि
356 (+357)
राष्ट्रपति शासन
राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलतासंसद, साधारण बहुमतविधि राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद भी प्रवृत्त रहती है जब तक राज्य विधानमंडल उसे न बदले
सावधानी — 249 बनाम 250 बनाम 252, तीनों का भेद

2.5 अनुच्छेद 251 एवं 254 — प्रतिकूलता (Repugnancy)

अनुच्छेद 251 · 249/250 वाली प्रतिकूलता

  • अनुच्छेद 249 या 250 के अधीन बनी संसदीय विधि और राज्य विधि में टकराव।
  • राज्य विधानमंडल की शक्ति छिनती नहीं — वह विधि बना सकता है।
  • टकराव पर संसदीय विधि प्रभावी, राज्य विधि निष्क्रिय (inoperative)
  • संसदीय विधि समाप्त होते ही राज्य विधि पुनः जीवित हो जाती है — वह शून्य नहीं थी।

अनुच्छेद 254 · समवर्ती सूची वाली प्रतिकूलता

  • समवर्ती सूची के विषय पर संसद एवं राज्य की विधियों में टकराव।
  • 254(1) — संसदीय विधि प्रभावी; राज्य विधि प्रतिकूलता की मात्रा तक शून्य (void)
  • 254(2) — यदि राज्य विधि राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित हुई और उन्होंने अनुमति दे दी, तो वह उस राज्य में प्रभावी होगी।
  • 254(2) का परंतुक — फिर भी संसद बाद में उसी विषय पर विधि बनाकर राज्य विधि को जोड़, संशोधित, परिवर्तित या निरसित कर सकती है। अंतिम शब्द सदैव संसद का।

अनुच्छेद 255 — यदि किसी अधिनियम के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की सिफारिश या पूर्व मंजूरी अपेक्षित थी और वह नहीं ली गई, तो केवल इस कारण अधिनियम अविधिमान्य नहीं होगा, बशर्ते अनुमति (assent) उपयुक्त प्राधिकारी ने दी हो। अर्थात् यह अपेक्षा केवल प्रक्रियागत है, सारभूत नहीं।

2.6 शक्ति-विभाजन के न्यायिक सिद्धांत

सुमेलन-तालिका 5 : विधायी अधिकारिता के पाँच सिद्धांत
सिद्धांतआशय
तत्व एवं सार (Pith and Substance)विधि का वास्तविक विषय देखा जाता है। यदि वह अपनी सूची में है तो दूसरी सूची पर आनुषंगिक अतिक्रमण से विधि अवैध नहीं होती।
आनुषंगिक अतिक्रमण (Incidental Encroachment)उपर्युक्त का पूरक — थोड़ा-सा अतिक्रमण क्षम्य है, यदि विधि का मूल स्वरूप वैध है।
छद्म विधान (Colourable Legislation)“जो प्रत्यक्षतः नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्षतः भी नहीं किया जा सकता।” विधानमंडल अपनी शक्ति की सीमा को दिखावटी रूप देकर पार नहीं कर सकता।
प्रादेशिक संबंध (Territorial Nexus)राज्य विधानमंडल राज्य-बाह्य विषय पर तभी विधि बना सकता है जब विषय और राज्य के बीच वास्तविक एवं पर्याप्त संबंध हो।
सामंजस्यपूर्ण निर्वचन (Harmonious Construction)दो प्रविष्टियों में स्पष्ट टकराव दिखे तो पहले उनमें सामंजस्य बिठाने का प्रयास; असफल होने पर संघीय प्रधानता (federal supremacy) — संघ सूची जीतती है।
परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: अनु. 249 में “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3”; अनु. 252 की विधि केवल संसद बदल सकती है; अवशिष्ट शक्ति संसद के पास (विकल्प में “राज्य” या “राष्ट्रपति” रखा जाता है); 42वें संशोधन के पाँच स्थानांतरित विषय; तथा समवर्ती सूची का स्रोत — ऑस्ट्रेलिया। अनुच्छेद-संख्या का जाल प्रायः “253 को 251 बताना” अथवा “249 को 250 बताना” होता है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 249 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. संकल्प राज्यसभा द्वारा उसकी कुल सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
2. ऐसा संकल्प एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक प्रवृत्त रह सकता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 249(1) में बहुमत “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई से अन्यून” है, कुल सदस्यता का नहीं — अतः कथन 1 गलत है। 249(2) के अनुसार संकल्प अधिकतम एक वर्ष के लिए प्रवृत्त रहता है और उसी रीति से नवीकृत हो सकता है — कथन 2 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (विषय)
1. अनुच्छेद 248 — अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ
2. अनुच्छेद 252 — अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने हेतु विधान
3. अनुच्छेद 254 — संसद एवं राज्य विधानमंडल की विधियों में प्रतिकूलता
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने हेतु विधान अनुच्छेद 253 का विषय है; अनुच्छेद 252 दो या अधिक राज्यों की सहमति से विधि बनाने का उपबंध है। अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 3 सही हैं।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): समवर्ती सूची के किसी विषय पर बनी राज्य की विधि, राष्ट्रपति की अनुमति मिल जाने पर भी संसद द्वारा बाद में निरसित की जा सकती है।
कारण (R): अनुच्छेद 255 के अनुसार किसी अधिनियम के लिए अपेक्षित सिफारिश अथवा पूर्व मंजूरी केवल प्रक्रिया का विषय मानी जाती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)(A) सही है — अनुच्छेद 254(2) राज्य विधि को उस राज्य में प्रधानता देता है, किंतु उसका परंतुक संसद की अधिभावी शक्ति सुरक्षित रखता है। (R) भी अपने आप में सही है, किंतु अनुच्छेद 255 सिफारिश/पूर्व मंजूरी की प्रक्रियागत प्रकृति से संबंधित है और (A) की व्याख्या नहीं करता। अतः दोनों सही, पर (R) व्याख्या नहीं।

3. प्रशासनिक संबंध — अनुच्छेद 256 से 263, अखिल भारतीय सेवाएँ एवं परिषदें

विधायी संबंध यह तय करते हैं कि कौन विधि बनाएगा; प्रशासनिक संबंध यह कि कौन उसे लागू कराएगा। भाग XI का अध्याय II (अनुच्छेद 256–263) यही निर्धारित करता है, और यहीं केंद्र का निर्देश देने का अधिकार तथा उसकी अवज्ञा का परिणाम (अनुच्छेद 365) छिपा है।

3.1 अनुच्छेद 256 से 261 — अनुच्छेदवार

सुमेलन-तालिका 6 : प्रशासनिक संबंध के अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंधपरीक्षा-बिंदु
256राज्यों एवं संघ की बाध्यता — राज्य की कार्यपालिका शक्ति इस प्रकार प्रयुक्त हो कि संसद की विधियों का अनुपालन सुनिश्चित हो; संघ राज्य को इस हेतु निर्देश दे सकता हैकेंद्र की “निर्देश-शक्ति” का मूल स्रोत
257(1)राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार न करे कि संघ की कार्यपालिका शक्ति में बाधा पड़े
257(2)संघ, राज्य को राष्ट्रीय या सैनिक महत्व के संचार-साधनों के निर्माण एवं अनुरक्षण के निर्देश दे सकता हैराष्ट्रीय राजमार्ग एवं राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करने की संसदीय शक्ति अक्षुण्ण
257(3)राज्य के भीतर रेलों के संरक्षण के लिए निर्देश257 के चार खंडों में यह तीसरा — बहु-पूछित
257(4)257(2)/(3) के निर्देशों के पालन में हुए अतिरिक्त व्यय का भुगतान केंद्र करेगा; असहमति पर राशि भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्त मध्यस्थ तय करेगा“मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्त मध्यस्थ” — यही 258(3) में भी है
257कराज्यों में संघ के सशस्त्र बलों की तैनाती — 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया और 44वें संशोधन, 1978 द्वारा हटा दिया गयाUPPSC का पसंदीदा “हटाया गया अनुच्छेद” — विकल्प में इसे जीवित बताकर फँसाया जाता है
258संघ → राज्य : राष्ट्रपति, राज्य सरकार की सहमति से, संघ की कार्यपालिका शक्ति के विषयों के कृत्य राज्य को सौंप सकते हैं258(2) — संसद की विधि राज्य पर शक्तियाँ/कर्तव्य बिना सहमति भी डाल सकती है
258कराज्य → संघ : राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से, राज्य के कृत्य संघ को सौंप सकते हैं7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा जोड़ा गया — मूल संविधान में नहीं था
259पहली अनुसूची के भाग ख के राज्यों में सशस्त्र बल — 7वें संशोधन, 1956 द्वारा हटाया गया
260भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता — करार द्वारा कार्यपालिका, विधायी या न्यायिक कृत्य ग्रहण
261पूर्ण विश्वास एवं विश्वास (Full Faith and Credit) — खंड 5 में विस्तार से261(3) — सिविल न्यायालयों की अंतिम डिक्री देश में कहीं भी निष्पादित
365(भाग XIX) संघ के निर्देशों का अनुपालन न करने पर राष्ट्रपति यह मान सकते हैं कि राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाई जा सकतीयही अनुच्छेद 256/257 को अनुच्छेद 356 से जोड़ता है — निर्देश-शक्ति को “दाँत” यहीं मिलते हैं
केंद्र की निर्देश-शक्ति के चार विषय “विधि–बाधा–संचार–रेल”

विधि का अनुपालन (256) → संघ की शक्ति में बाधा न डालना (257(1)) → राष्ट्रीय/सैनिक महत्व के संचार-साधन (257(2)) → रेलों का संरक्षण (257(3))। इन चार में कोई निर्देश न माने तो अनुच्छेद 365 लगता है।

3.2 अखिल भारतीय सेवाएँ — अनुच्छेद 312

अखिल भारतीय सेवा वह है जो संघ एवं राज्यों दोनों के लिए सामान्य हो — भर्ती केंद्र करता है, नियंत्रण केंद्र एवं राज्य दोनों का, और सदस्य राज्य के संवर्ग (cadre) में काम करते हैं। यह भारतीय संघवाद का सबसे विशिष्ट एकात्मक तत्व है और इसका कोई समानांतर अमेरिकी या ऑस्ट्रेलियाई संघ में नहीं है।

सावधानी — दो जगह “दो-तिहाई” है, पर दोनों जगह वही भाषा

अनुच्छेद 249 (राज्य सूची पर विधि) तथा अनुच्छेद 312 (अखिल भारतीय सेवा) — दोनों में राज्यसभा का संकल्प “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से अन्यून” चाहिए। विकल्प में प्रायः “कुल सदस्यता का दो-तिहाई” या “संसद के दोनों सदनों का” रखा जाता है — दोनों गलत हैं। साथ ही ध्यान दें: संकल्प राज्यसभा पारित करती है, विधि संसद बनाती है — यह दो अलग चरण हैं।

3.3 अंतर्राज्यीय परिषद — अनुच्छेद 263

अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वे आदेश द्वारा एक परिषद स्थापित करें, जो — (क) राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच कर सलाह दे; (ख) ऐसे विषयों की जाँच एवं चर्चा करे जिनमें कुछ या सभी राज्यों का, अथवा संघ और एक-या-अधिक राज्यों का साझा हित हो; (ग) नीति एवं कार्रवाई के बेहतर समन्वय के लिए सिफ़ारिश करे।

3.4 क्षेत्रीय परिषदें — सांविधिक, संवैधानिक नहीं

क्षेत्रीय परिषदें संविधान में नहीं, बल्कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (धारा 15–22) के अधीन बनी हैं — इसलिए ये सांविधिक (statutory) निकाय हैं। इनका उद्देश्य 1956 के भाषायी पुनर्गठन के बाद उभरे क्षेत्रीय तनावों को संवाद से सुलझाना था; प्रस्ताव पं. जवाहरलाल नेहरू का था।

सुमेलन-तालिका 7 : पाँच क्षेत्रीय परिषदें — सदस्य एवं मुख्यालय
क्षेत्रीय परिषदसदस्य राज्य / संघ राज्यक्षेत्रमुख्यालय
उत्तरीहरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, लद्दाखनई दिल्ली
मध्यउत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़प्रयागराज
पूर्वीबिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगालकोलकाता
पश्चिमीगोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीवमुंबई
दक्षिणीआंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पुदुच्चेरीचेन्नई
पूर्वोत्तर परिषद (पृथक्)असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा तथा सिक्किम (2002 में जोड़ा गया)शिलांग
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज

मध्य क्षेत्रीय परिषद (Central Zonal Council) का मुख्यालय प्रयागराज (पूर्व नाम इलाहाबाद) में है और उसके चार सदस्य राज्य हैं — उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़। यह उत्तर प्रदेश से जुड़ा सबसे सीधा “केंद्र-राज्य संस्था” वाला तथ्य है और UPPSC में सुमेलन-प्रश्न के रूप में आता है — विकल्प में प्रायः लखनऊ या भोपाल रखा जाता है। ध्यान रखें कि 1956 में यह परिषद बनी तब इसके सदस्य केवल उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश थे; 2000 के पुनर्गठन के बाद उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ जुड़े। सभी परिषदों का साझा सचिवालय 1963 से नई दिल्ली में कार्य करता है — “मुख्यालय” और “सचिवालय” को गड्डमड्ड न करें।

3.5 केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने वाली समितियाँ

1969राजमन्नार समिति — तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित (अध्यक्ष — न्यायमूर्ति पी.वी. राजमन्नार); 1971 में रिपोर्ट। माँगें — अंतर्राज्यीय परिषद तुरंत बने, वित्त आयोग स्थायी हो, अनुच्छेद 356/357/365 हटाए जाएँ, अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त हों
1973आनंदपुर साहिब प्रस्ताव — शिरोमणि अकाली दल (16–17 अक्टूबर 1973); केंद्र केवल रक्षा, विदेश, संचार, मुद्रा एवं रेल तक सीमित रहे, शेष सब राज्यों के पास
1977पश्चिम बंगाल ज्ञापन — “संघ” शब्द के स्थान पर “परिसंघ”, संसद की शक्ति रक्षा-विदेश-मुद्रा-संचार तक सीमित, राज्यसभा को लोकसभा के बराबर शक्ति
1983–88सरकारिया आयोग — जून 1983 में गठित (न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया, शिवरामन, एस.आर. सेन); 1988 में रिपोर्ट, 247 सिफारिशें। निष्कर्ष — संघीय ढाँचा बदलने की नहीं, ढंग बदलने की आवश्यकता है। प्रमुख सुझाव — अनुच्छेद 356 “अत्यंत विरल परिस्थितियों” में; अंतर्राज्यीय परिषद का गठन; राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री से परामर्श; अवशिष्ट कर-शक्ति संसद के पास रहे
2007–10पुंछी आयोग — अप्रैल 2007 में गठित (पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी); 30 मार्च 2010 को सात खंडों की रिपोर्ट। प्रमुख सुझाव — राज्यपाल की पदावधि सुरक्षित हो एवं हटाने के लिए विधान सभा का महाभियोग-सदृश तंत्र; “स्थानिक आपात” (localised emergency) की अवधारणा, ताकि पूरे राज्य पर 356 न लगाना पड़े; समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों से परामर्श; अनुच्छेद 19 एवं 355 पर स्पष्टता
परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज; क्षेत्रीय परिषदें सांविधिक हैं, संवैधानिक नहीं; अंतर्राज्यीय परिषद अनुच्छेद 263 से, 1990 में सरकारिया की सिफारिश पर; अखिल भारतीय सेवाएँ तीन (IAS, IPS, IFoS — 1966); अनुच्छेद 257क को 42वें ने जोड़ा और 44वें ने हटाया; तथा सरकारिया (1983) बनाम पुंछी (2007) का कालक्रम।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (क्षेत्रीय परिषद)    सूची-II (मुख्यालय)
A. उत्तरी क्षेत्रीय परिषद   1. प्रयागराज
B. मध्य क्षेत्रीय परिषद   2. कोलकाता
C. पूर्वी क्षेत्रीय परिषद   3. नई दिल्ली
D. पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद   4. मुंबई
कूट:

AA-3, B-1, C-4, D-2BA-1, B-3, C-2, D-4CA-1, B-3, C-4, D-2DA-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)उत्तरी — नई दिल्ली; मध्य — प्रयागराज; पूर्वी — कोलकाता; पश्चिमी — मुंबई (दक्षिणी — चेन्नई)। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।

प्र.2 अखिल भारतीय सेवाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. नई अखिल भारतीय सेवा के सृजन हेतु राज्यसभा का संकल्प उसके कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
2. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख अनुच्छेद 312 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 312(1) में बहुमत “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई” है, कुल सदस्यता का नहीं — कथन 1 गलत। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख 42वें संशोधन (1976) ने जोड़ा और 312(3) के अनुसार उसमें ज़िला न्यायाधीश से नीचे कोई पद नहीं होगा — कथन 2 सही।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (आयोग/समिति)    (गठन वर्ष)
1. राजमन्नार समिति — 1979
2. सरकारिया आयोग — 1983
3. पुंछी आयोग — 2007
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)राजमन्नार समिति 1969 में तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित हुई थी (रिपोर्ट 1971), 1979 में नहीं — अतः युग्म 1 सुमेलित नहीं है। सरकारिया आयोग जून 1983 में तथा पुंछी आयोग अप्रैल 2007 में गठित हुए (पुंछी की रिपोर्ट 30 मार्च 2010) — ये दोनों युग्म सही हैं।

4. वित्तीय संबंध — करों का विभाजन, वित्त आयोग एवं GST परिषद

संविधान का भाग XII (अनुच्छेद 264–300क) वित्त, संपत्ति, संविदा एवं वाद से संबंधित है; इसका अध्याय I (264–293) वित्तीय संबंधों का है। संघीय व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि राजस्व की शक्तियाँ ऊपर केंद्रित होती हैं और व्यय के दायित्व नीचे — इसी ऊर्ध्वाधर असंतुलन (vertical imbalance) को पाटने के लिए वित्त आयोग की व्यवस्था है।

4.1 कराधान शक्तियों का विभाजन — तीन मूल नियम

4.2 अनुच्छेद 268 से 281 — यह तालिका अलग से याद करें

सुमेलन-तालिका 8 : राजस्व के वितरण से संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंधनिर्णायक बिंदु
268संघ द्वारा उद्ग्रहीत किंतु राज्यों द्वारा संगृहीत एवं विनियोजित शुल्कअब इसमें केवल संघ सूची में उल्लिखित स्टांप शुल्क आते हैं; “औषधीय एवं प्रसाधन निर्मितियों पर उत्पाद शुल्क” वाले शब्द 101वें संशोधन, 2016 ने हटा दिए। यह आय भारत की संचित निधि का भाग नहीं बनती
268कसेवा कर — 88वें संशोधन, 2003 द्वारा जोड़ा गयाकभी प्रवृत्त ही नहीं हुआ और 101वें संशोधन, 2016 द्वारा हटा दिया गया — प्रश्न में इसे जीवित बताकर फँसाया जाता है
269संघ द्वारा उद्ग्रहीत एवं संगृहीत, किंतु राज्यों को सौंपे गए कर — अंतर्राज्यीय व्यापार में माल की बिक्री/क्रय तथा परेषण पर कर80वें संशोधन, 2000 द्वारा वर्तमान रूप; 269क के अधीन GST इससे बाहर
269कअंतर्राज्यीय व्यापार में GST (IGST) — संघ सरकार उद्ग्रहीत एवं संगृहीत करेगी तथा संघ एवं राज्यों के बीच बँटवारा होगा101वाँ संशोधन, 2016आयात को भी अंतर्राज्यीय आपूर्ति माना गया है। बँटवारा GST परिषद की सिफारिश पर संसद की विधि से
270संघ एवं राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर — यही “विभाज्य पूल (divisible pool)” है268, 269 एवं 269क के कर तथा अनु. 271 का अधिभार और कोई भी उपकर इसमें नहीं आते — यही आज की सबसे बड़ी संघीय शिकायत है। 270(1क) एवं (1ख) GST को भी विभाज्य पूल में लाते हैं
271संघ के प्रयोजनों के लिए कुछ शुल्कों एवं करों पर अधिभार (surcharge)अधिभार की पूरी आय भारत की संचित निधि में; राज्यों को हिस्सा नहीं। 101वें संशोधन ने अनु. 246क के GST को इससे बाहर कर दिया
272संघ द्वारा उद्ग्रहीत एवं संगृहीत कर जो संघ एवं राज्यों में बाँटे जा सकते थे80वें संशोधन, 2000 द्वारा हटाया गया
273जूट एवं जूट-उत्पादों के निर्यात शुल्क के बदले अनुदानकेवल असम, बिहार, ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल — चार राज्य; भारत की संचित निधि पर भारित
274जिन करों में राज्यों का हित है, उन्हें प्रभावित करने वाले विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश
275संघ से कुछ राज्यों को सांविधिक अनुदान (statutory grants)भारत की संचित निधि पर भारित। पहला परंतुक — अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष अनुदान; दूसरा परंतुक — असम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष उपबंध
276वृत्ति, व्यापार, आजीविका एवं नियोजन पर करअधिकतम ₹2,500 प्रति वर्ष (60वाँ संशोधन, 1988)
279“शुद्ध आगम (net proceeds)” की गणनाप्रमाणन भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा, और उसका प्रमाणपत्र अंतिम
279कवस्तु एवं सेवा कर परिषदनीचे 4.3 में विस्तार से
280वित्त आयोगनीचे 4.4 में विस्तार से
281वित्त आयोग की सिफारिशें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएँगी, साथ में की गई कार्रवाई का व्याख्यात्मक ज्ञापन
282विवेकाधीन अनुदान (discretionary grants) — संघ या राज्य किसी भी लोक प्रयोजन के लिए अनुदान दे सकते हैं, भले ही वह विषय उनकी विधायी शक्ति में न होकेंद्र प्रायोजित योजनाओं का संवैधानिक आधार; राज्यों की शिकायत यही है कि इससे राज्य-सूची के विषयों में केंद्र प्रवेश कर लेता है
293राज्यों द्वारा उधार लेनायदि राज्य पर केंद्र का कोई ऋण बकाया है तो वह केंद्र की सहमति के बिना उधार नहीं ले सकता
करों के चार वर्ग — किसका उद्ग्रहण, किसका संग्रहण, किसकी आय “268 सौंपा · 269 दिया · 270 बाँटा · 271 रखा”

268 — संघ लगाता है, राज्य वसूलते हैं और रख लेते हैं (स्टांप शुल्क)। 269 — संघ लगाता भी है, वसूलता भी है, पर पूरी आय राज्यों को दे देता है। 270 — संघ लगाता एवं वसूलता है, फिर वित्त आयोग के सूत्र से बाँटता है। 271 — अधिभार, जिसकी पूरी आय संघ अपने पास रखता है। यही अनुक्रम याद रहे तो “कौन-सा कर किसका” वाला हर प्रश्न हल हो जाता है।

4.3 वस्तु एवं सेवा कर एवं GST परिषद — अनुच्छेद 279क

101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 (राष्ट्रपति की अनुमति 8 सितंबर 2016) भारतीय वित्तीय संघवाद का सबसे बड़ा पुनर्गठन है। इसने —

GST 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ। यह गंतव्य-आधारित (destination-based) उपभोग कर है — इसका सीधा अर्थ यह है कि उपभोक्ता राज्य लाभ में रहते हैं और विनिर्माता राज्य प्रारंभ में हानि में। उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल जैसे बड़े उपभोक्ता राज्य इस बदलाव से लाभान्वित हुए, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात एवं तमिलनाडु ने आपत्ति की थी।

सुमेलन-तालिका 9 : GST परिषद — अनुच्छेद 279क का ढाँचा
बिंदुउपबंध
गठन101वें संशोधन के प्रारंभ से 60 दिन के भीतर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा
अध्यक्षकेंद्रीय वित्त मंत्री
सदस्यराजस्व या वित्त का प्रभार रखने वाले केंद्रीय राज्य मंत्री; तथा प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित वित्त/कराधान मंत्री या कोई अन्य मंत्री
उपाध्यक्षराज्यों के सदस्य स्वयं अपने में से चुनते हैं — केंद्र नियुक्त नहीं करता
गणपूर्ति (quorum)कुल सदस्यों का आधा (1/2)
निर्णयउपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों के तीन-चौथाई (3/4) से अन्यून बहुमत
मत-भारकेंद्र सरकार — कुल डाले गए मतों का 1/3; सभी राज्य मिलकर — 2/3। अर्थात् केंद्र अकेले प्रस्ताव पारित नहीं करा सकता, पर वीटो कर सकता है (क्योंकि 3/4 के लिए केंद्र का समर्थन अनिवार्य है)
विशेष उल्लेख279क(4)(छ) में अरुणाचल प्रदेश, असम, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए विशेष उपबंध की सिफारिश का अधिकार
पाँच वस्तुएँ अब भी बाहर279क(5) — कच्चा पेट्रोलियम, हाई-स्पीड डीज़ल, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस तथा विमानन टरबाइन ईंधन; इन पर GST की तिथि परिषद सिफारिश करेगी। (शराब संविधान से ही बाहर है)
विवाद-निवारण279क(11) — परिषद स्वयं ऐसा तंत्र स्थापित करेगी जो केंद्र-राज्य तथा राज्य-राज्य विवाद निपटाए

4.4 वित्त आयोग — अनुच्छेद 280

वित्त आयोग वह संवैधानिक तंत्र है जो केंद्र-राज्य वित्तीय असंतुलन को हर पाँच वर्ष पर पुनः संतुलित करता है। डॉ. अंबेडकर ने इसे “संतुलनकारी चक्र (balancing wheel)” कहा था।

16वाँवर्तमान वित्त आयोग
2023गठन — 31 दिसंबर
41%राज्यों का ऊर्ध्वाधर हिस्सा
2026–31अवधि (1 अप्रैल 2026 से)
17.62%उत्तर प्रदेश का हिस्सा — सर्वाधिक
उत्तर प्रदेश संदर्भ — वित्तीय संघवाद में UP की जगह
परीक्षा-दृष्टि

UPPSC में बहु-पूछित: अनु. 280 — अध्यक्ष + चार सदस्य; अनु. 275 भारित, अनु. 282 विवेकाधीन (यही युग्म उलटकर पूछा जाता है); GST परिषद में केंद्र का मत-भार 1/3 एवं निर्णय 3/4 भारित मतों से; 101वें संशोधन ने 268क एवं 272 हटाए; वृत्ति कर की सीमा ₹2,500 — 60वाँ संशोधन; तथा 16वें वित्त आयोग की 41% ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी एवं छह क्षैतिज मानदंड

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 GST परिषद (अनुच्छेद 279क) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. परिषद का प्रत्येक निर्णय उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों के दो-तिहाई बहुमत से लिया जाता है।
2. केंद्र सरकार के मत का भार कुल डाले गए मतों का दो-तिहाई होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 279क(9) के अनुसार निर्णय तीन-चौथाई भारित मतों से होता है, दो-तिहाई से नहीं — कथन 1 गलत। और केंद्र का मत-भार 1/3 है, सभी राज्यों का मिलाकर 2/3 — कथन 2 भी गलत। दोनों जगह “दो-तिहाई” रखकर ही जाल बनाया जाता है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (विषय)
1. अनुच्छेद 275 — संघ से कुछ राज्यों को सांविधिक अनुदान
2. अनुच्छेद 280 — वित्त आयोग का गठन
3. अनुच्छेद 271 — राज्यों को सौंपे जाने वाले कर
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 271 संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार से संबंधित है, जिसकी पूरी आय भारत की संचित निधि में जाती है — राज्यों को हिस्सा नहीं मिलता। “राज्यों को सौंपे जाने वाले कर” अनुच्छेद 269 हैं। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

प्र.3 16वें वित्त आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसकी सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से आरंभ होने वाले पाँच वर्षों के लिए हैं और इसने विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41% रखा है।
2. इसने क्षैतिज वितरण में “सकल घरेलू उत्पाद में योगदान” को पहली बार एक मानदंड बनाया है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग की अवधि 2026-27 से 2030-31 है, ऊर्ध्वाधर हिस्सा 41% (15वें के बराबर), और “GDP में योगदान” (10% भार) पहली बार जोड़ा गया मानदंड है। अतः दोनों कथन सही हैं।

5. अंतर्राज्यीय संबंध — जल विवाद, व्यापार-वाणिज्य एवं पूर्ण विश्वास

संघीय व्यवस्था केवल “केंद्र बनाम राज्य” नहीं है; “राज्य बनाम राज्य” भी उतना ही बड़ा प्रश्न है। संविधान इसके लिए चार तंत्र देता है — पूर्ण विश्वास एवं विश्वास (261), जल विवाद न्यायाधिकरण (262), अंतर्राज्यीय परिषद (263, खंड 3 में देख चुके हैं) तथा व्यापार-वाणिज्य की स्वतंत्रता (301–307)।

5.1 अनुच्छेद 261 — पूर्ण विश्वास एवं विश्वास

5.2 अनुच्छेद 262 — अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद

सुमेलन-तालिका 10 : जल विवाद न्यायाधिकरण — गठन वर्ष एवं संबंधित राज्य
न्यायाधिकरणगठनसंबंधित राज्य
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण – I1969महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश
गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण1969महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण1969 (अक्टूबर)गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान
रावी एवं ब्यास जल न्यायाधिकरण1986पंजाब, हरियाणा, राजस्थान
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण1990कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुदुच्चेरी
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण – II2004महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश (बाद में तेलंगाना)
वंशधारा जल विवाद न्यायाधिकरण2010 (फरवरी)ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश
महादायी जल विवाद न्यायाधिकरण2010 (नवंबर)गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र
महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण2018 (मार्च)ओडिशा एवं छत्तीसगढ़
जल न्यायाधिकरणों का कालक्रम “कृष्णा-गोदावरी-नर्मदा (69) · रावी-ब्यास (86) · कावेरी (90) · वंशधारा-महादायी (2010) · महानदी (2018)”

1969 में तीन एक साथ बने — कृष्णा, गोदावरी एवं नर्मदा। फिर बड़ा अंतराल, और 1986 में रावी-ब्यास, 1990 में कावेरी। इक्कीसवीं सदी में — 2004 (कृष्णा-II), 2010 में दो (वंशधारा फरवरी, महादायी नवंबर), 2018 में महानदी। कुल नौ

उत्तर प्रदेश संदर्भ — जल-साझेदारी में UP

5.3 अनुच्छेद 301 से 307 — व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता

संविधान का भाग XIII यह सुनिश्चित करता है कि भारत एक आर्थिक इकाई बना रहे — राज्य-सीमाएँ व्यापार की दीवार न बनें। यह विचार ऑस्ट्रेलियाई संविधान की धारा 92 से लिया गया है।

सुमेलन-तालिका 11 : भाग XIII के सात अनुच्छेद
अनुच्छेदउपबंधनिर्णायक बिंदु
301भारत के राज्यक्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य एवं समागम स्वतंत्र होगा — “इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए”“स्वतंत्र” का अर्थ “करमुक्त” नहीं — जिंदल स्टेनलेस (2016)
302संसद लोक-हित में व्यापार पर निर्बंधन लगा सकती है
303(1)न संसद, न राज्य विधानमंडल — कोई भी एक राज्य को दूसरे पर अधिमान नहीं दे सकतायह 302 पर भी सीमा है
303(2)अपवाद — संसद ऐसा कर सकती है यदि विधि में यह घोषित हो कि देश के किसी भाग में माल की कमी से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए यह आवश्यक हैयह छूट केवल संसद को है, राज्य को नहीं — बहु-पूछित
304(क)राज्य अन्य राज्यों से आयातित माल पर वही कर लगा सकता है जो उसी राज्य में बने माल पर लगता है — किंतु विभेद नहीं कर सकताविभेदकारी कर 304(ख) की प्रक्रिया से भी नहीं बच सकता
304(ख)राज्य लोक-हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है — किंतु ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुरःस्थापित नहीं होगा“पूर्व मंजूरी” (previous sanction) — यह शब्द याद रखें
305विद्यमान विधियों तथा राज्य के एकाधिकार संबंधी विधियों की व्यावृत्तिचौथे संविधान संशोधन, 1955 द्वारा वर्तमान रूप — राज्य-एकाधिकार को संरक्षण
306पहली अनुसूची के भाग ख के राज्यों की शक्ति7वें संशोधन, 1956 द्वारा हटाया गया
307अनुच्छेद 301–304 के प्रयोजनों के लिए संसद प्राधिकारी नियुक्त कर सकती हैआज तक ऐसा कोई प्राधिकारी नियुक्त नहीं हुआ — यह प्रश्न बार-बार आता है
सावधानी — 302, 303 एवं 304 का क्रम उलटकर पूछा जाता है
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 निम्नलिखित जल विवाद न्यायाधिकरणों को उनके गठन के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण
2. नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण
3. महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण
4. रावी एवं ब्यास जल न्यायाधिकरण
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A2, 4, 1, 3B4, 2, 3, 1C4, 2, 1, 3D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)नर्मदा (1969) → रावी-ब्यास (1986) → कावेरी (1990) → महानदी (2018)। अतः 2, 4, 1, 3 सही क्रम है।

प्र.2 भाग XIII के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 307 के अधीन संसद ने व्यापार एवं वाणिज्य संबंधी एक प्राधिकारी नियुक्त कर दिया है।
2. अनुच्छेद 304(ख) के अधीन कोई विधेयक राज्य विधानमंडल में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 307 के अधीन आज तक कोई प्राधिकारी नियुक्त नहीं हुआ — कथन 1 गलत। अनुच्छेद 304(ख) के परंतुक में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अनिवार्य है — कथन 2 सही।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (2016) में उच्चतम न्यायालय ने “प्रतिकरात्मक कर” के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए राज्यों द्वारा लगाए गए प्रवेश कर को अवैध ठहराया।
कारण (R): न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 301 में प्रयुक्त “स्वतंत्र” शब्द का अर्थ “करों से मुक्त” नहीं है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 7:2 से प्रतिकरात्मक कर का सिद्धांत अस्वीकृत किया और प्रवेश कर को वैध ठहराया — अतः (A) गलत है। (R) सही है: न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 301 का “स्वतंत्र” शब्द करमुक्ति नहीं दर्शाता, और केवल विभेदकारी कर ही अनुच्छेद 304(क) से वर्जित हैं।

6. विशेष उपबंध वाले राज्य — अनुच्छेद 371 से 371ञ

संविधान का भाग XXI (अनुच्छेद 369–392) “अस्थायी, संक्रमणकालीन एवं विशेष उपबंध” का है। इसी में अनुच्छेद 371 से 371ञ तक बारह राज्यों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ हैं। यह भारतीय संघवाद की सबसे विशिष्ट प्रवृत्ति है — असमानुपाती या विषम संघवाद (asymmetric federalism), अर्थात् सभी राज्यों के साथ एक-सा व्यवहार नहीं, बल्कि उनकी ऐतिहासिक एवं सामाजिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग।

इन उपबंधों का उद्देश्य दो में से एक होता है — या तो क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना (विकास बोर्ड, स्थानीय नियोजन), या जनजातीय पहचान एवं रूढ़िजन्य विधि की रक्षा करना।

371 महाराष्ट्र 371 गुजरात 371क नागालैंड 371ख असम 371ग मणिपुर 371घ आंध्र प्रदेश 371ङ तेलंगाना 371च सिक्किम 371छ मिज़ोरम 371ज अरुणाचल 371झ गोवा 371ञ कर्नाटक
रूढ़िजन्य विधि, भूमि एवं सामाजिक प्रथाओं का संरक्षणक्षेत्रीय असंतुलन — विकास बोर्ड / परिषदविधान सभा की क्षेत्रीय समितिराज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व / विधान सभा का न्यूनतम आकारस्थानीय संवर्ग — नियोजन एवं शिक्षा में स्थानीय अधिमान
अनुच्छेद 371 श्रृंखला — कौन-सा अनुच्छेद किस राज्य के लिए। बारह राज्य, जिनमें छह पूर्वोत्तर के हैं। ध्यान दीजिए कि रूढ़िजन्य विधि का संरक्षण (लाल) केवल नागालैंड (371क) एवं मिज़ोरम (371छ) को मिला है; विकास बोर्ड (नीला) महाराष्ट्र-गुजरात (371) तथा कर्नाटक (371ञ) को; विधान सभा की क्षेत्रीय समिति (हरा) असम (371ख) एवं मणिपुर (371ग) को; राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व अथवा विधान सभा का न्यूनतम आकार (बैंगनी) सिक्किम (371च), अरुणाचल (371ज) एवं गोवा (371झ) को; तथा स्थानीय संवर्ग एवं शिक्षा-नियोजन में अधिमान (सुनहरा) आंध्र प्रदेश (371घ, 371ङ) एवं तेलंगाना (371घ) को। उत्तर प्रदेश इस सूची में नहीं है। बिंदु राज्य के भीतर उस क्षेत्र के पास रखे गए हैं जिससे उपबंध जुड़ा है (जैसे कर्नाटक में कल्याण कर्नाटक, महाराष्ट्र में मराठवाड़ा-विदर्भ की दिशा)।
सुमेलन-तालिका 12 : अनुच्छेद 371 श्रृंखला — राज्य, संशोधन एवं उपबंध
अनुच्छेदराज्यकब जोड़ा गयाक्या देता है
371महाराष्ट्र एवं गुजरात7वाँ संशोधन, 1956राष्ट्रपति राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व दे सकते हैं — विदर्भ, मराठवाड़ा एवं शेष महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र, कच्छ एवं शेष गुजरात के लिए पृथक् विकास बोर्ड; विकास-व्यय का समन्यायी आवंटन; तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा राज्य-सेवाओं में समान अवसर। 7वें संशोधन वाले पाठ में इस अनुच्छेद के अंतर्गत आंध्र प्रदेश भी सम्मिलित था; उसका नाम 32वें संशोधन (1973) ने हटा दिया, क्योंकि तब आंध्र के लिए अलग अनुच्छेद 371घ एवं 371ङ जोड़े गए।
371कनागालैंड13वाँ संशोधन, 1962संसद की विधि नागालैंड में तब तक लागू नहीं जब तक विधान सभा संकल्प न करे — चार विषयों में: (i) नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ, (ii) नागा रूढ़िजन्य विधि एवं प्रक्रिया, (iii) रूढ़िजन्य विधि के अनुसार सिविल एवं दांडिक न्याय, (iv) भूमि एवं उसके संसाधनों का स्वामित्व एवं अंतरण। राज्यपाल का विधि-व्यवस्था पर विशेष उत्तरदायित्व; तुएनसांग ज़िले के लिए 35 सदस्यीय क्षेत्रीय परिषद
371खअसम22वाँ संशोधन, 1969राष्ट्रपति आदेश द्वारा विधान सभा की एक समिति बना सकते हैं, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्य हों (छठी अनुसूची के पैरा 20 की तालिका के भाग I वाले क्षेत्र)
371गमणिपुर27वाँ संशोधन, 1971विधान सभा की पर्वतीय क्षेत्र समिति (Hill Areas Committee); राज्यपाल का उसके समुचित कार्यकरण हेतु विशेष उत्तरदायित्व; राज्यपाल प्रतिवर्ष पर्वतीय क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देंगे
371घआंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना32वाँ संशोधन, 1973 (तेलंगाना 2014 में जोड़ा गया)लोक नियोजन एवं शिक्षा में राज्य के विभिन्न भागों के लोगों के लिए समन्यायी अवसर; स्थानीय संवर्ग (local cadre) का गठन; राष्ट्रपति प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunal) गठित कर सकते हैं
371ङआंध्र प्रदेश32वाँ संशोधन, 1973संसद विधि द्वारा आंध्र प्रदेश में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना कर सकती है। यह पूरी श्रृंखला का सबसे छोटा एवं सबसे कम याद रहने वाला अनुच्छेद है — इसीलिए पूछा जाता है।
371चसिक्किम36वाँ संशोधन, 1975विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य; जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के अधिकारों की रक्षा हेतु सीटों का आरक्षण; सिक्किम की भूमि एवं संपत्ति संबंधी पुरानी विधियों को संरक्षण; सिक्किम संबंधी विवादों पर उच्चतम/उच्च न्यायालय की अधिकारिता पर सीमा
371छमिज़ोरम53वाँ संशोधन, 1986371क जैसा ही — मिज़ो धार्मिक/सामाजिक प्रथाएँ, रूढ़िजन्य विधि, न्याय-प्रशासन तथा भूमि का स्वामित्व एवं अंतरण पर संसद की विधि तभी लागू जब विधान सभा संकल्प करे; विधान सभा में कम-से-कम 40 सदस्य
371जअरुणाचल प्रदेश55वाँ संशोधन, 1986राज्यपाल का विधि-व्यवस्था पर विशेष उत्तरदायित्व, जिसमें वे मंत्रिपरिषद से परामर्श के बाद व्यक्तिगत निर्णय से कार्य करेंगे; विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य
371झगोवा56वाँ संशोधन, 1987केवल एक पंक्ति — गोवा की विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य होंगे। इससे अधिक कुछ नहीं। यह पूरी श्रृंखला का सबसे संक्षिप्त अनुच्छेद है।
371ञकर्नाटक98वाँ संशोधन, 2012 (प्रवृत्त 1 अक्टूबर 2013)हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र (अब कल्याण कर्नाटक) के लिए पृथक् विकास बोर्ड; विकास-व्यय का समन्यायी आवंटन; तथा उस क्षेत्र के लोगों के लिए शिक्षा-संस्थाओं में सीटों एवं राज्य-सेवाओं में पदों का आरक्षण, जो जन्म या अधिवास के आधार पर होगा
अनुच्छेद 371 श्रृंखला — राज्यों का क्रम “महागुज · नागा · असम · मणि · आंध्र-आंध्र · सिक्किम · मिज़ो · अरुण · गोवा · कर्नाट”

371 = महाराष्ट्र + गुजरात · 371क = नागालैंड · 371ख = असम · 371ग = मणिपुर · 371घ एवं 371ङ = आंध्र प्रदेश (घ में तेलंगाना भी) · 371च = सिक्किम · 371छ = मिज़ोरम · 371ज = अरुणाचल प्रदेश · 371झ = गोवा · 371ञ = कर्नाटक।
सूत्र-वाक्य के रूप में — “नागा असम मणि, आंध्र दो; सिक्किम मिज़ो अरुण, गोवा-कर्नाट भी हो।” ध्यान दें — आंध्र प्रदेश अकेला राज्य है जिसे दो अनुच्छेद (घ एवं ङ) मिले, और 371 अकेला है जो दो राज्यों पर लागू है

बारह राज्य — छह पूर्वोत्तर से “छह पूरब, छह शेष”

कुल 12 राज्य: पूर्वोत्तर से छह — नागालैंड, असम, मणिपुर, सिक्किम, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश। शेष छह — महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक। मानचित्र देखते ही यह आधा-आधा बँटवारा याद रह जाता है।

सावधानी — 371 श्रृंखला के चार सबसे बड़े जाल
उत्तर प्रदेश संदर्भ — “विशेष उपबंध” और UP

उत्तर प्रदेश के लिए अनुच्छेद 371 श्रृंखला में कोई उपबंध नहीं है — यह स्वयं एक परीक्षा-योग्य तथ्य है, क्योंकि विकल्पों में UP या बिहार डालकर प्रश्न बनाया जाता है। UP के क्षेत्रीय असंतुलन (विशेषतः बुंदेलखंड एवं पूर्वांचल) का समाधान संविधान ने नहीं, बल्कि राज्य की अपनी नीति तथा केंद्रीय पैकेजों के रास्ते खोजा गया है — जैसे बुंदेलखंड पैकेज। तुलना कीजिए: महाराष्ट्र के विदर्भ-मराठवाड़ा तथा कर्नाटक के कल्याण कर्नाटक को संविधान से ही विकास बोर्ड मिले, जबकि UP के बुंदेलखंड को नहीं। यही कारण है कि UP में समय-समय पर पृथक् बुंदेलखंड राज्य या अनुच्छेद 371 जैसे उपबंध की माँग उठती रही है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (अनुच्छेद)    सूची-II (राज्य)
A. 371ख   1. गोवा
B. 371छ   2. असम
C. 371झ   3. कर्नाटक
D. 371ञ   4. मिज़ोरम
कूट:

AA-2, B-4, C-3, D-1BA-4, B-2, C-1, D-3CA-2, B-4, C-1, D-3DA-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)371ख — असम; 371छ — मिज़ोरम; 371झ — गोवा; 371ञ — कर्नाटक। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।

प्र.2 अनुच्छेद 371 श्रृंखला के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. मिज़ोरम की विधान सभा में कम-से-कम चालीस सदस्य होने का उपबंध अनुच्छेद 371छ में है।
2. आंध्र प्रदेश एकमात्र राज्य है जिसके लिए इस श्रृंखला में दो पृथक् अनुच्छेद हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)371छ(ख) में मिज़ोरम विधान सभा के लिए न्यूनतम 40 सदस्य निर्धारित हैं (सिक्किम, अरुणाचल एवं गोवा के लिए 30) — कथन 1 सही। 371घ (लोक नियोजन एवं स्थानीय संवर्ग) तथा 371ङ (केंद्रीय विश्वविद्यालय) दोनों आंध्र प्रदेश के लिए हैं — कथन 2 भी सही।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (जोड़ने वाला संविधान संशोधन)
1. अनुच्छेद 371क — 13वाँ संशोधन, 1962
2. अनुच्छेद 371च — 36वाँ संशोधन, 1975
3. अनुच्छेद 371ञ — 86वाँ संशोधन, 2002
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 371ञ (कर्नाटक — हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र) 98वें संविधान संशोधन, 2012 द्वारा जोड़ा गया, जो 1 अक्टूबर 2013 से प्रवृत्त हुआ। 86वाँ संशोधन (2002) तो शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21क) से संबंधित है। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

7. पाँचवीं एवं छठी अनुसूची — अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र

अनुच्छेद 244 जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए दो अलग-अलग व्यवस्थाएँ देता है — 244(1) से पाँचवीं अनुसूची (असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम को छोड़कर किसी भी राज्य के अनुसूचित क्षेत्र) तथा 244(2) से छठी अनुसूची (इन्हीं चार राज्यों के जनजातीय क्षेत्र)। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 244क (22वाँ संशोधन, 1969) असम के जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर एक स्वायत्त राज्य बनाने की अनुमति देता है — यह उपबंध आज तक प्रयोग में नहीं आया।

हिमाचल प्रदेश राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ झारखंड ओडिशा तेलंगाना आंध्र प्रदेश असम मेघालय त्रिपुरा मिज़ोरम
पाँचवीं अनुसूची — अनुसूचित क्षेत्र (10 राज्य)छठी अनुसूची — जनजातीय क्षेत्र (4 राज्य)
पाँचवीं बनाम छठी अनुसूची — दो अलग नक़्शे। पाँचवीं अनुसूची (लाल) के अनुसूचित क्षेत्र आज दस राज्यों में हैं और वे मध्य भारत की जनजातीय पट्टी तथा गुजरात-राजस्थान-हिमाचल तक फैले हैं; वहाँ जनजाति सलाहकार परिषद केवल सलाह देती है और असली शक्ति राज्यपाल के पास है। छठी अनुसूची (नीला) केवल चार पूर्वोत्तर राज्यों — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम — पर लागू है, जहाँ दस स्वायत्त ज़िला परिषदें स्वयं विधि बनाती एवं न्यायालय चलाती हैं। नक़्शे से तीन बातें सीधे याद रहती हैं — (1) नागालैंड एवं अरुणाचल किसी अनुसूची में नहीं (उन्हें 371क एवं 371ज से संरक्षण मिलता है), (2) उत्तर प्रदेश में कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं, (3) दक्षिण के तमिलनाडु, कर्नाटक एवं केरल भी पाँचवीं अनुसूची से बाहर हैं। बिंदु प्रत्येक राज्य के भीतर उसके प्रमुख जनजातीय क्षेत्र के निकट रखे गए हैं।

पाँचवीं अनुसूची · अनुसूचित क्षेत्र

  • आधार — अनुच्छेद 244(1)
  • राज्य — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम को छोड़कर किसी भी राज्य में। वर्तमान में दस राज्य — आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान
  • घोषणा — “अनुसूचित क्षेत्र” राष्ट्रपति आदेश द्वारा घोषित करते हैं (पैरा 6)
  • मुख्य निकायजनजाति सलाहकार परिषद (TAC): अधिकतम 20 सदस्य, जिनमें लगभग तीन-चौथाई राज्य विधान सभा के अनुसूचित जनजाति सदस्य होंगे; यह केवल सलाहकारी है, विधायी नहीं
  • राज्यपाल की शक्ति — (क) अधिसूचना द्वारा संसद/राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम को अनुसूचित क्षेत्र में लागू न करना या संशोधित रूप में लागू करना (पैरा 5(1)); (ख) शांति एवं सुशासन के लिए विनियम बनाना — विशेषतः भूमि-अंतरण पर रोक, भूमि-आवंटन का विनियमन तथा साहूकारी का नियंत्रण (पैरा 5(2))। ऐसे विनियम राष्ट्रपति की सहमति से प्रभावी होते हैं
  • रिपोर्ट — राज्यपाल प्रतिवर्ष या राष्ट्रपति के कहने पर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देंगे; संघ की कार्यपालिका शक्ति इन क्षेत्रों के प्रशासन पर निदेश देने तक विस्तृत है (पैरा 3)
  • संशोधन — संसद साधारण विधि से संशोधन कर सकती है; वह अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा (पैरा 7)

छठी अनुसूची · जनजातीय क्षेत्र

  • आधार — अनुच्छेद 244(2) एवं 275(1)
  • राज्य — केवल चार: असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम
  • क्षेत्र — पैरा 20 की तालिका में दस जनजातीय क्षेत्र — असम 3 (दीमा हसाओ/उत्तरी कछार पहाड़ी, कार्बी आंगलोंग, बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र), मेघालय 3 (खासी, जयंतिया, गारो पहाड़ी), त्रिपुरा 1 (त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र), मिज़ोरम 3 (चकमा, मारा, लाई)
  • मुख्य निकायस्वायत्त ज़िला परिषद (ADC): अधिकतम 30 सदस्य4 राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित, शेष 26 वयस्क मताधिकार से निर्वाचित; निर्वाचित सदस्यों की अवधि पाँच वर्ष, नामनिर्देशित राज्यपाल के प्रसादपर्यंत। अपवाद — बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद में अधिकतम 46 सदस्य (40 निर्वाचित + 6 नामनिर्देशित)
  • शक्तियाँ — ये परिषदें विधि बना सकती हैं (भूमि, वन, जल-मार्ग, कृषि, ग्राम-प्रशासन, संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह-विच्छेद, सामाजिक रीति); ग्राम एवं ज़िला न्यायालय गठित कर सकती हैं; भू-राजस्व एवं कुछ कर उद्ग्रहीत कर सकती हैं; खनिज-पट्टों पर रॉयल्टी का हिस्सा पा सकती हैं
  • राज्यपाल/राष्ट्रपति — राज्यपाल किसी संसदीय या राज्य-विधि को इन क्षेत्रों में लागू न करने या संशोधित रूप में लागू करने का निदेश दे सकते हैं; परिषदों की विधियों को राज्यपाल की अनुमति चाहिए
  • संशोधन — संसद साधारण विधि से (पैरा 21) — अनुच्छेद 368 का संशोधन नहीं
छठी अनुसूची के चार राज्य “अ–मे–त्रि–मि”

सम · मेघालय · त्रिपुरा · मिज़ोरम। और इनकी परिषद-संख्या 3–3–1–3 = 10। ध्यान रहे, नागालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश छठी अनुसूची में नहीं हैं — उन्हें अनुच्छेद 371क एवं 371ज से संरक्षण मिलता है। यही सबसे बड़ा जाल है।

सावधानी — पाँचवीं और छठी अनुसूची के बीच चार भेद
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP में कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजातियाँ हैं, पर पाँचवीं अनुसूची के अधीन कोई “अनुसूचित क्षेत्र” अधिसूचित नहीं है — इसलिए UP उन दस राज्यों की सूची में नहीं आता, और न ही पेसा अधिनियम, 1996 UP पर लागू होता है। यह सीधा सुमेलन-प्रश्न बनता है: “निम्नलिखित में से किस राज्य में पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्र हैं?” — उत्तर में UP कभी नहीं।

ध्यान दें कि पाँचवीं अनुसूची का पैरा 4 यह भी कहता है कि यदि राष्ट्रपति निदेश दें तो ऐसे राज्य में भी जनजाति सलाहकार परिषद बनाई जा सकती है जहाँ अनुसूचित जनजातियाँ तो हैं पर अनुसूचित क्षेत्र नहीं — यह उपबंध UP जैसे राज्यों के लिए ही प्रासंगिक है। उत्तर प्रदेश में जनजातीय जनसंख्या मुख्यतः सोनभद्र, ललितपुर, बलरामपुर, लखीमपुर खीरी एवं बहराइच जैसे ज़िलों में है (गोंड, खरवार, चेरो, थारू, बुक्सा आदि); UP के जनजातीय बहुल पर्वतीय क्षेत्र 2000 में उत्तराखंड के साथ अलग हो गए।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 छठी अनुसूची के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. सामान्यतः प्रत्येक स्वायत्त ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, जिनमें से चार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित होते हैं।
2. यह असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा नागालैंड के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पैरा 2(1) के अनुसार ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, जिनमें 4 से अधिक नामनिर्देशित नहीं — कथन 1 सही। किंतु छठी अनुसूची के चार राज्य हैं — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम; नागालैंड इसमें नहीं है (उसे अनुच्छेद 371क से संरक्षण मिलता है) — कथन 2 गलत।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर भी लागू होता है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 243ड के अनुसार भाग IX के उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजातीय क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होते।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)पेसा केवल पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होता है, छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर नहीं — अतः (A) गलत है। (R) सही है: अनुच्छेद 243ड(घ) भाग IX को अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों से बाहर रखता है, और इसी कमी को भरने के लिए 24 दिसंबर 1996 से पेसा प्रवृत्त हुआ।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (निकाय)    (विशेषता)
1. जनजाति सलाहकार परिषद — अधिकतम 20 सदस्य, लगभग तीन-चौथाई विधान सभा के अ.ज.जा. सदस्य
2. स्वायत्त ज़िला परिषद — अधिकतम 20 सदस्य, जिनमें चार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित
3. जनजाति सलाहकार परिषद — अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की शक्ति
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)स्वायत्त ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं (4 से अनधिक नामनिर्देशित + शेष निर्वाचित), 20 नहीं — युग्म 2 गलत। अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की शक्ति राज्यपाल के पास है (पाँचवीं अनुसूची, पैरा 5(2)); जनजाति सलाहकार परिषद केवल सलाह देती है — युग्म 3 भी गलत। युग्म 1 सही है।

8. राष्ट्रीय आपात — अनुच्छेद 352

संविधान का भाग XVIII (अनुच्छेद 352–360) आपातकालीन उपबंधों का है। यह विचार भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा वाइमर संविधान (जर्मनी) से प्रेरित है। इसकी मूल कल्पना यह है कि संकट के समय संविधान स्वयं को निलंबित किए बिना एकात्मक रूप धारण कर ले। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इन उपबंधों के कारण भारत “सामान्य समय में संघीय और आपात में एकात्मक” हो जाता है।

8.1 घोषणा के आधार

सावधानी — “आंतरिक अशांति” अब संविधान में नहीं है

8.2 प्रक्रिया, अनुमोदन एवं अवधि

1. मंत्रिमंडल का लिखित निर्णयराष्ट्रपति उद्घोषणा तभी करेंगे जब संघ मंत्रिमंडल — अर्थात् प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट-स्तर के मंत्रियों की परिषद — का निर्णय उन्हें लिखित रूप में संसूचित हो (अनु. 352(3), 44वाँ संशोधन)
2. उद्घोषणासम्पूर्ण भारत के लिए या राज्यक्षेत्र के किसी भाग के लिए (भाग वाली शक्ति 42वें संशोधन, 1976 ने जोड़ी)
3. संसदीय अनुमोदन — 1 माहदोनों सदनों के समक्ष; एक माह के भीतर विशेष बहुमत से अनुमोदन आवश्यक, अन्यथा समाप्त (मूलतः दो माह था; 44वें ने घटाया)
4. छह-छह माह की अवधिअनुमोदन के बाद छह माह; प्रत्येक छह माह पर पुनः विशेष बहुमत से अनुमोदन; बाहरी सीमा कोई नहीं
5. समाप्तिराष्ट्रपति कभी भी बाद की उद्घोषणा से रद्द कर सकते हैं (संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं); अथवा लोकसभा साधारण बहुमत से अननुमोदन-संकल्प पारित कर दे — तब राष्ट्रपति को रद्द करना अनिवार्य है

8.3 राष्ट्रीय आपात के प्रभाव

सुमेलन-तालिका 13 : राष्ट्रीय आपात के चार प्रकार के प्रभाव
क्षेत्रअनुच्छेदप्रभाव
कार्यपालिका353(क)संघ की कार्यपालिका शक्ति राज्य को यह निदेश देने तक विस्तृत हो जाती है कि वह अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करे। राज्य सरकार निलंबित नहीं होती — वह केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती है
विधायी353(ख), 250संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है; विधि आपात समाप्ति के 6 माह बाद निष्प्रभावी। राज्य विधानमंडल की शक्ति छिनती नहीं, केवल संसद की शक्ति जुड़ जाती है। 42वें संशोधन ने यह भी जोड़ा कि यदि आपात केवल एक भाग में हो तो भी निदेश एवं विधि अन्य राज्यों तक विस्तारित हो सकती है, यदि सुरक्षा को खतरा हो
वित्तीय354राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुच्छेद 268 से 279 के करों-विभाजन संबंधी उपबंधों को परिवर्तित या निलंबित कर सकते हैं — अधिक-से-अधिक उस वित्तीय वर्ष के अंत तक जिसमें आपात समाप्त हो। ऐसा प्रत्येक आदेश संसद के समक्ष रखा जाएगा
सदनों की अवधि83(2) परंतुक; 172(1) परंतुकलोकसभा की अवधि संसद विधि द्वारा एक बार में एक वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है — पर आपात समाप्त होने के बाद छह माह से अधिक नहीं। यही उपबंध राज्य विधान सभा के लिए भी है
मौलिक अधिकार358, 359अनुच्छेद 19 का स्वतः निलंबन (केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण में) तथा राष्ट्रपति के आदेश से अन्य अधिकारों के प्रवर्तन का निलंबन — विस्तार खंड 11 में

8.4 अब तक की तीन घोषणाएँ

26 अक्टूबर 1962पहली उद्घोषणा — बाह्य आक्रमण। चीन का नेफा (NEFA) क्षेत्र में आक्रमण। यह उद्घोषणा 10 जनवरी 1968 तक चली — अर्थात् 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी यही उद्घोषणा प्रवर्तन में थी, नई नहीं की गई
3 दिसंबर 1971दूसरी उद्घोषणा — बाह्य आक्रमण। भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश मुक्ति संग्राम
12 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा) ने राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी में रायबरेली से प्रधानमंत्री का निर्वाचन भ्रष्ट आचरण के आधार पर अवैध घोषित किया — यही 1975 के आपात की तात्कालिक पृष्ठभूमि बना
25 जून 1975तीसरी उद्घोषणा — “आंतरिक अशांति”। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा। दूसरी उद्घोषणा (1971) अब भी प्रवर्तन में थी — अतः जून 1975 से मार्च 1977 तक दो आपात एक साथ चले। यह 352(9) का व्यावहारिक उदाहरण है
197538वाँ संशोधन — उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से परे किया गया; 39वाँ संशोधन — प्रधानमंत्री एवं अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायालय के दायरे से बाहर (इसे इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, 1975 में मूल ढाँचे के विरुद्ध मानकर निरस्त किया गया)
197642वाँ संशोधन — “लघु संविधान”; लोकसभा एवं विधान सभाओं की अवधि 5 से 6 वर्ष; अनुच्छेद 352 में “भाग” वाली शक्ति; 257क जोड़ा; 356 की अधिकतम अवधि एक वर्ष तक बढ़ाई
21 मार्च 1977दोनों उद्घोषणाएँ (1971 एवं 1975) रद्द। छठी लोकसभा के चुनाव में जनता पार्टी की जीत
1977शाह आयोग — न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच; तीन अंतरिम एवं एक अंतिम रिपोर्ट (1978)
197844वाँ संविधान संशोधन — आपात-उपबंधों का पूरा पुनर्लेखन (नीचे तालिका देखें); लोकसभा/विधान सभा की अवधि पुनः 5 वर्ष; संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300क
सुमेलन-तालिका 14 : 44वें संविधान संशोधन, 1978 ने आपात-उपबंधों में क्या बदला
बिंदु44वें संशोधन से पहले44वें संशोधन के बाद
तीसरा आधारआंतरिक अशांतिसशस्त्र विद्रोह
मंत्रिमंडल की सलाहकोई स्पष्ट अपेक्षा नहीं (प्रधानमंत्री की सलाह पर्याप्त मानी गई)संघ मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय अनिवार्य
अनुमोदन की अवधिदो माहएक माह
अनुमोदन का बहुमतसाधारण बहुमतविशेष बहुमत — कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3
अनुमोदन के बाद अवधिअनिश्चित काल तक (पुनरनुमोदन की आवश्यकता नहीं)प्रत्येक छह माह पर पुनः अनुमोदन
लोकसभा द्वारा समाप्तिकोई उपबंध नहीं352(7) — लोकसभा के अननुमोदन-संकल्प पर रद्द करना अनिवार्य; 352(8) — 1/10 सदस्यों के नोटिस पर 14 दिन में विशेष बैठक
अनुच्छेद 358किसी भी आधार पर घोषित आपात में अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबितकेवल युद्ध या बाह्य आक्रमण वाले आपात में; और केवल उन विधियों/कार्रवाइयों को संरक्षण जिनमें आपात से संबंध का अवधारणा-कथन (recital) हो
अनुच्छेद 359भाग III के किसी भी अधिकार का प्रवर्तन निलंबित किया जा सकता थाअनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर — ये कभी निलंबित नहीं हो सकते
न्यायिक समीक्षा38वें संशोधन ने वर्जित की थीपुनर्स्थापित
अनुच्छेद 356 की अवधि42वें संशोधन ने एक बार में एक वर्ष कर दिया थाछह माह पर लौटाया; एक वर्ष से आगे के लिए दो कठोर शर्तें (खंड 9 देखें)
अनुच्छेद 36038वें संशोधन ने राष्ट्रपति के समाधान को अंतिम एवं निर्णायक बनाया थावह उपबंध हटाया गया
अनुच्छेद 257क42वें संशोधन ने जोड़ा थाहटाया गया
अनुच्छेद 352 के तीन आधार “युद्ध–आक्रमण–विद्रोह”

युद्ध (war) · बाह्य आक्रमण (external aggression) · सशस्त्र विद्रोह (armed rebellion)। और तीन घोषणाओं का सूत्र — “बासठ–इकहत्तर–पचहत्तर” : 1962 (चीन), 1971 (पाकिस्तान), 1975 (आंतरिक)। पहले दो बाह्य, तीसरा आंतरिक

3अब तक राष्ट्रीय आपात
1 माहसंसदीय अनुमोदन की सीमा
6 माहप्रत्येक नवीकरण की अवधि
1/10लोकसभा सदस्य → विशेष बैठक
14 दिनविशेष बैठक की समय-सीमा
उत्तर प्रदेश संदर्भ — 1975 का आपातकाल इलाहाबाद से शुरू हुआ
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 352 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 44वें संविधान संशोधन ने “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द रखा, जिससे “आंतरिक अशांति” शब्द संविधान से पूर्णतः हट गया।
2. उद्घोषणा के अनुमोदन का संकल्प प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)“आंतरिक अशांति” केवल अनुच्छेद 352 से हटा; अनुच्छेद 355 में वह शब्द आज भी विद्यमान है — अतः कथन 1 गलत। अनुच्छेद 352(6) में ठीक वही दोहरा बहुमत वर्णित है जो कथन 2 में है — वह सही है।

प्र.2 निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. 44वाँ संविधान संशोधन
2. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रायबरेली निर्वाचन अवैध घोषित
3. चीनी आक्रमण के कारण पहली आपात-उद्घोषणा
4. 42वाँ संविधान संशोधन
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A3, 2, 1, 4B2, 3, 4, 1C2, 3, 1, 4D3, 2, 4, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)26 अक्टूबर 1962 (पहली उद्घोषणा) → 12 जून 1975 (इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय) → 1976 (42वाँ संशोधन) → 1978 (44वाँ संशोधन)। अतः 3, 2, 4, 1 सही क्रम है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत में एक साथ दो आपात-उद्घोषणाएँ प्रवर्तन में थीं।
कारण (R): अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति भिन्न-भिन्न आधारों पर भिन्न-भिन्न उद्घोषणाएँ कर सकते हैं, चाहे पहले की उद्घोषणा प्रवर्तन में ही क्यों न हो।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)3 दिसंबर 1971 की बाह्य-आक्रमण वाली उद्घोषणा 21 मार्च 1977 तक चली, और 25 जून 1975 को “आंतरिक अशांति” के आधार पर दूसरी उद्घोषणा हुई — दोनों साथ-साथ प्रवर्तन में रहीं। अनुच्छेद 352(9) ठीक यही अनुमति देता है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।

9. राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद 356 एवं एस.आर. बोम्मई

अनुच्छेद 356 का शीर्षक है — “राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध”। लोकप्रिय भाषा में इसे राष्ट्रपति शासन या राज्य आपात कहा जाता है, यद्यपि संविधान में “राष्ट्रपति शासन” शब्द कहीं नहीं आता। इसका स्रोत भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 93 है।

9.1 आधार — दो रास्ते

9.2 प्रक्रिया एवं अवधि

1. राज्यपाल का प्रतिवेदनअथवा “अन्यथा” प्राप्त सामग्री पर राष्ट्रपति का समाधान (अनु. 356(1)); अथवा अनु. 365 के अधीन निदेश का अनुपालन न होना
2. उद्घोषणाराष्ट्रपति राज्य सरकार के कृत्य स्वयं ग्रहण करते हैं तथा विधान सभा की शक्तियाँ संसद को सौंप देते हैं। उच्च न्यायालय की शक्तियाँ नहीं ली जा सकतीं (परंतुक)
3. संसदीय अनुमोदन — 2 माहदोनों सदनों में साधारण बहुमत से, दो माह के भीतर
4. छह माहअनुमोदन के बाद उद्घोषणा जारी होने की तिथि से छह माह तक प्रवृत्त; हर छह माह पर पुनः अनुमोदन
5. एक वर्ष के बाद दो शर्तेंएक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए — (क) राष्ट्रीय आपात पूरे भारत में या उस राज्य के पूरे/किसी भाग में प्रवर्तन में हो, और (ख) निर्वाचन आयोग प्रमाणित करे कि चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण उद्घोषणा जारी रखना आवश्यक है
6. अधिकतम तीन वर्ष“किसी भी दशा में तीन वर्ष से अधिक नहीं”। समाप्ति — राष्ट्रपति किसी भी समय बाद की उद्घोषणा से रद्द कर सकते हैं; संसदीय अनुमोदन आवश्यक नहीं
सावधानी — अनुच्छेद 356 की अवधि एवं शर्तें (सबसे अधिक गलती यहीं होती है)

9.3 राष्ट्रपति शासन के प्रभाव

9.4 एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) — निर्णायक मोड़

11 मार्च 1994 को नौ न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 356 पर वह ढाँचा खड़ा किया जो आज भी चलता है। वाद कर्नाटक में एस.आर. बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी (1989) से उपजा, किंतु निर्णय में 1992 के बाद बर्खास्त कई सरकारों के मामले साथ सुने गए।

9.5 अनुच्छेद 356 का व्यावहारिक इतिहास

उत्तर प्रदेश संदर्भ — दस बार राष्ट्रपति शासन

उत्तर प्रदेश में अब तक दस बार राष्ट्रपति शासन लगा — यह मणिपुर के बाद देश में दूसरे स्थान पर है। अवधियाँ:

क्रमअवधिटिप्पणी
125 फरवरी 1968 – 26 फरवरी 1969सबसे लंबी — एक वर्ष से कुछ अधिक
21 अक्टूबर 1970 – 18 अक्टूबर 1970सबसे छोटी — मात्र 18 दिन
313 जून 1973 – 8 नवंबर 1973पी.ए.सी. विद्रोह के बाद
430 नवंबर 1975 – 21 जनवरी 1976राष्ट्रीय आपात के दौरान
530 अप्रैल 1977 – 23 जून 19771977 के लोकसभा चुनाव के बाद
617 फरवरी 1980 – 9 जून 19801980 के लोकसभा चुनाव के बाद
76 दिसंबर 1992 – 4 दिसंबर 1993बाबरी विध्वंस के बाद
818 अक्टूबर 1995 – 17 अक्टूबर 1996त्रिशंकु विधान सभा
917 अक्टूबर 1996 – 21 मार्च 1997सरकार-गठन में गतिरोध
108 मार्च 2002 – 3 मई 2002अब तक का अंतिम

1992 वाला प्रकरण विशेष है — 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के तुरंत बाद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने नैतिक उत्तरदायित्व लेते हुए स्वयं त्यागपत्र दे दिया था; उसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा। इसलिए एस.आर. बोम्मई (1994) में जिन तीन सरकारों की बर्खास्तगी वैध ठहराई गई वे मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश की थीं — उत्तर प्रदेश उस सूची में नहीं, क्योंकि वहाँ सरकार बर्खास्त नहीं, त्यागपत्रित हुई थी। यह बारीकी सीधा “सही सुमेलित नहीं है” वाला प्रश्न बनाती है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 356 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा दो माह के भीतर साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना आवश्यक है।
2. एक वर्ष से आगे उद्घोषणा जारी रखने के लिए यह पर्याप्त है कि निर्वाचन आयोग चुनाव कराने में कठिनाई प्रमाणित कर दे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)356(3) में दो माह एवं साधारण बहुमत — कथन 1 सही। किंतु 356(5) के अनुसार एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए दोनों शर्तें चाहिए — राष्ट्रीय आपात का प्रवर्तन में होना तथा निर्वाचन आयोग का प्रमाणन। केवल एक पर्याप्त नहीं — कथन 2 गलत।

प्र.2 एस.आर. बोम्मई वाद (1994) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संसद के अनुमोदन से पूर्व राज्य विधान सभा को विघटित नहीं किया जा सकता।
2. इस निर्णय में कर्नाटक, मेघालय तथा नागालैंड की उद्घोषणाएँ असंवैधानिक ठहराई गईं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 11 मार्च 1994 को दोनों बातें अभिनिर्धारित कीं — अनुमोदन से पूर्व विधान सभा केवल निलंबित रखी जा सकती है, विघटित नहीं; और कर्नाटक, मेघालय तथा नागालैंड की उद्घोषणाएँ अवैध पाई गईं (जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश की वैध)।

प्र.3 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (विषय)    (उपबंध)
1. अनुच्छेद 356 के अधीन अधिकतम अवधि — पाँच वर्ष
2. राष्ट्रपति शासन में उच्च न्यायालय की शक्तियाँ राष्ट्रपति ग्रहण कर सकते हैं
3. अनुच्छेद 365 — संघ के निदेशों का अनुपालन न करने का प्रभाव
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 356(4) के अनुसार अधिकतम अवधि तीन वर्ष है — पाँच वर्ष का उल्लेख केवल पंजाब की 11 मई 1987 वाली उद्घोषणा के लिए था; अतः युग्म 1 गलत। 356(1) का परंतुक राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय की शक्तियाँ ग्रहण करने से स्पष्टतः रोकता है — युग्म 2 भी गलत। युग्म 3 सही है।

10. वित्तीय आपात — अनुच्छेद 360 तथा तीनों आपातों की तुलना

10.1 अनुच्छेद 360 — अब तक कभी नहीं लगा

10.2 तीनों आपातों की आमने-सामने तुलना

राष्ट्रीय आपात · अनुच्छेद 352

  • आधार — युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह
  • किसकी सलाह — संघ मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय
  • अनुमोदन1 माह में, विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3)
  • अवधि — प्रत्येक 6 माह पर पुनरनुमोदन; कोई अधिकतम सीमा नहीं
  • समाप्ति — राष्ट्रपति कभी भी; अथवा लोकसभा का साधारण-बहुमत वाला अननुमोदन-संकल्प (अनिवार्य प्रभाव)
  • केंद्र-राज्य पर प्रभाव — संघ राज्य को कार्यपालिका निदेश दे सकता है; संसद राज्य सूची पर विधि बना सकती है; कर-विभाजन बदला जा सकता है
  • मौलिक अधिकार — अनु. 358 एवं 359 लागू
  • प्रयोगतीन बार — 1962, 1971, 1975

राष्ट्रपति शासन · अनुच्छेद 356

  • आधार — राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता; अथवा अनु. 365
  • किसकी सलाह — राज्यपाल का प्रतिवेदन अथवा “अन्यथा”
  • अनुमोदन2 माह में, साधारण बहुमत
  • अवधि — प्रत्येक 6 माह; अधिकतम 3 वर्ष; 1 वर्ष के बाद दो शर्तें
  • समाप्ति — राष्ट्रपति कभी भी; संसद की अनुमति आवश्यक नहीं
  • केंद्र-राज्य पर प्रभाव — राज्य कार्यपालिका राष्ट्रपति के हाथ में; विधान सभा निलंबित या विघटित; संसद राज्य के लिए विधि बनाती है (अनु. 357)
  • मौलिक अधिकारकोई प्रभाव नहीं
  • प्रयोग130 से अधिक बार; नवीनतम मणिपुर (2025–26)

वित्तीय आपात · अनुच्छेद 360

  • आधार — भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा
  • किसकी सलाह — मंत्रिपरिषद की सामान्य सलाह
  • अनुमोदन2 माह में, साधारण बहुमत
  • अवधिअनिश्चित; पुनरनुमोदन की आवश्यकता नहीं
  • समाप्ति — राष्ट्रपति बाद की उद्घोषणा से
  • केंद्र-राज्य पर प्रभाव — वित्तीय औचित्य के निदेश; वेतन-कटौती; राज्य के धन विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित
  • मौलिक अधिकारकोई प्रभाव नहीं
  • प्रयोगअब तक एक बार भी नहीं
तीनों आपातों का बहुमत एवं समय “352 = एक माह, विशेष · 356 और 360 = दो माह, साधारण”

केवल राष्ट्रीय आपात में एक माह तथा विशेष बहुमत है; शेष दोनों में दो माह एवं साधारण बहुमत। और अवधि का सूत्र — “352 अनंत, 356 तीन वर्ष, 360 अनंत”: केवल राष्ट्रपति शासन की बाहरी सीमा है।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 360 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. एक बार संसद द्वारा अनुमोदित हो जाने पर वित्तीय आपात की उद्घोषणा अनिश्चित काल तक प्रवृत्त रह सकती है।
2. इसके प्रवर्तन में रहते हुए राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन में कटौती का निदेश दे सकते हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 360 में पुनरनुमोदन या अधिकतम अवधि का कोई उपबंध नहीं — कथन 1 सही। 360(4)(ख) स्पष्ट रूप से उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में कटौती की अनुमति देता है — कथन 2 भी सही।

प्र.2 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (अनुच्छेद)    सूची-II (विषय)
A. 352   1. संघ का राज्यों की बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अशांति से रक्षा का कर्तव्य
B. 355   2. वित्तीय आपात
C. 356   3. आपात की उद्घोषणा
D. 360   4. राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता
कूट:

AA-3, B-1, C-2, D-4BA-1, B-3, C-4, D-2CA-1, B-3, C-2, D-4DA-3, B-1, C-4, D-2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)352 — आपात की उद्घोषणा; 355 — संघ का रक्षा-कर्तव्य; 356 — संवैधानिक तंत्र की विफलता; 360 — वित्तीय आपात। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): राष्ट्रपति शासन के प्रवर्तन में रहते हुए राज्य के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन स्वतः निलंबित हो जाता है।
कारण (R): अनुच्छेद 358 तथा 359 केवल अनुच्छेद 352 के अधीन की गई उद्घोषणा से जुड़े हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)राष्ट्रपति शासन से मौलिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता — अतः (A) गलत है। (R) सही है: अनुच्छेद 358 तथा 359 दोनों में “आपात की उद्घोषणा” का तात्पर्य केवल अनुच्छेद 352 वाली उद्घोषणा से है।

11. आपातकाल का मौलिक अधिकारों पर प्रभाव — अनुच्छेद 358 एवं 359

मौलिक अधिकारों का सम्पूर्ण विवेचन अध्याय 4.2 में है। यहाँ केवल वह प्रश्न है जो इस अध्याय का है — राष्ट्रीय आपात में उन अधिकारों का क्या होता है? उत्तर दो अनुच्छेदों में है, और इन दोनों का भेद UPPSC का सबसे भरोसेमंद प्रश्न-स्रोत है।

अनुच्छेद 358 · केवल अनुच्छेद 19

  • किस अधिकार परकेवल अनुच्छेद 19 (छह स्वतंत्रताएँ)
  • कैसे लागू होता हैस्वतः (automatically); किसी राष्ट्रपति-आदेश की आवश्यकता नहीं
  • किस आधार वाले आपात मेंकेवल युद्ध या बाह्य आक्रमण; सशस्त्र विद्रोह में नहीं (44वाँ संशोधन, 1978)
  • क्या होता है — राज्य को अनुच्छेद 19 के विरुद्ध विधि बनाने एवं कार्यपालिका कार्रवाई करने की छूट
  • विस्तार — जहाँ उद्घोषणा प्रवर्तन में है, वहाँ; तथा 42वें संशोधन के बाद, सुरक्षा को खतरा हो तो अन्य क्षेत्रों में भी
  • समाप्ति पर — आपात समाप्त होते ही ऐसी विधि तुरंत निष्प्रभावी; पर उस दौरान किए गए कार्य वैध बने रहते हैं
  • 44वें का संरक्षण — केवल उन विधियों को छूट जिनमें यह अवधारणा-कथन (recital) हो कि वे आपात से संबंधित हैं

अनुच्छेद 359 · राष्ट्रपति के आदेश से

  • किस अधिकार पर — भाग III के उन अधिकारों पर जो आदेश में उल्लिखित होंअनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर
  • कैसे लागू होता हैराष्ट्रपति के आदेश (order) से; आदेश संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा
  • किस आधार वाले आपात मेंतीनों आधारों में — युद्ध, बाह्य आक्रमण तथा सशस्त्र विद्रोह
  • क्या होता है — अधिकार स्वयं निलंबित नहीं होते; केवल उनके प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने का अधिकार निलंबित होता है
  • विस्तार — आदेश सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर; अवधि आपात की अवधि तक या आदेश में उल्लिखित उससे कम अवधि तक
  • समाप्ति पर — आदेश समाप्त होते ही उस दौरान बनी असंगत विधि निष्प्रभावी
  • 44वें का संरक्षणअनुच्छेद 20 (दोषसिद्धि से संरक्षण) एवं 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) कभी निलंबित नहीं; तथा recital वाली शर्त यहाँ भी
सावधानी — 358 और 359 के बीच पाँच निर्णायक भेद
  1. दायरा — 358 केवल अनुच्छेद 19 पर; 359 अनुच्छेद 19 सहित भाग III के किसी भी अधिकार पर (20 एवं 21 को छोड़कर)। अतः “359 केवल अनुच्छेद 19 पर लागू होता है” — गलत कथन है।
  2. तंत्र — 358 स्वतः; 359 राष्ट्रपति के आदेश से। यही सबसे अधिक पूछा जाने वाला भेद है।
  3. आधार — 358 केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण वाले आपात में; 359 तीनों आधारों में।
  4. प्रकृति — 358 अधिकार को ही निलंबित करता है; 359 केवल उपचार (remedy) — अर्थात् न्यायालय जाने का अधिकार — निलंबित करता है। अधिकार जीवित रहता है, केवल दरवाज़ा बंद होता है।
  5. अवधि — 358 सम्पूर्ण आपात-अवधि तक; 359 आदेश में उल्लिखित उससे कम अवधि तक भी हो सकता है।
358 बनाम 359 “तीन-पाँच-आठ = अठारह-उन्नीस · तीन-पाँच-नौ = आदेश”

358 में अंतिम अंक 8 है और उसका संबंध अनुच्छेद 19 से — “8 के बाद 9”, अर्थात् 358 → 19; यह स्वतः होता है। 359 में अंतिम अंक 9 है — इसमें आदेश चाहिए और इसमें से 20 एवं 21 हमेशा बाहर रहते हैं। एक और पकड़ — “358 = युद्ध ही युद्ध” (केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण), “359 = सब कुछ” (तीनों आधार)।

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 अनुच्छेद 358 एवं 359 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 358 सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित आपात में भी अनुच्छेद 19 को स्वतः निलंबित कर देता है।
2. अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 एवं 21 के प्रवर्तन को निलंबित नहीं कर सकते।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 358 केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण वाले आपात में लागू होता है, सशस्त्र विद्रोह वाले में नहीं — कथन 1 गलत। उसी संशोधन ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को 359 से बाहर कर दिया — कथन 2 सही।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुच्छेद)    (विशेषता)
1. अनुच्छेद 358 — केवल अनुच्छेद 19 से संबंधित, स्वतः प्रभावी
2. अनुच्छेद 359 — राष्ट्रपति के आदेश द्वारा प्रवर्तन का निलंबन
3. अनुच्छेद 358 — आदेश सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर लागू किया जा सकता है, और वह संसद के समक्ष रखा जाता है
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)“आदेश” तथा उसे संसद के समक्ष रखने की अपेक्षा अनुच्छेद 359(3) की है, अनुच्छेद 358 की नहीं — 358 तो स्वतः प्रभावी होता है, उसमें कोई आदेश ही नहीं होता। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।

प्र.3 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को अनुच्छेद 359 के दायरे से बाहर कर दिया।
कारण (R): एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) में उच्चतम न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह अभिनिर्धारित किया था कि आपात के दौरान भी अवैध निरोध के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय रहती है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)(A) सही है। किंतु (R) गलत है — एडीएम जबलपुर का निर्णय सर्वसम्मत नहीं, 4:1 का बहुमत था, और बहुमत ने कहा था कि ऐसी याचिका पोषणीय नहीं; न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना अकेले असहमत रहे। उसी निर्णय की प्रतिक्रिया में 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को सुरक्षित किया, और पुट्टस्वामी (2017) ने उस बहुमत-निर्णय को अपास्त कर दिया।

12. संघवाद की समकालीन चुनौतियाँ — राज्यपाल, GST एवं परिसीमन

संघीय ढाँचे का पाठ केवल इतिहास नहीं है; 2024–26 के वर्षों में इसके तीन बिंदु सीधे परीक्षा-योग्य समाचार बने — राज्यपाल की अनुमति-शक्ति, GST की वित्तीय स्वायत्तता तथा परिसीमन एवं प्रतिनिधित्व

12.1 राज्यपाल की भूमिका — विधेयकों पर अनुमति का प्रश्न

राज्यपाल की शक्तियों का विस्तार अध्याय 4.4 में है; यहाँ केवल उनका केंद्र-राज्य आयाम है। राज्यपाल अनुच्छेद 155 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं और अनुच्छेद 156 के अधीन उनके प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं — यही उन्हें “केंद्र का प्रतिनिधि” बनाता है और यहीं से विवाद उपजता है।

2023पंजाब, तमिलनाडु, केरल एवं तेलंगाना की सरकारें विधेयकों पर राज्यपाल की निष्क्रियता के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय पहुँचीं। पंजाब राज्य बनाम पंजाब के राज्यपाल (नवंबर 2023) — न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते; अनुच्छेद 200 का परंतुक “यथाशीघ्र” लौटाने की अपेक्षा करता है
8 अप्रैल 2025तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल — दो न्यायाधीशों की पीठ ने राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के लिए समय-सीमाएँ निर्धारित कीं और अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए दस विधेयकों को “मानित अनुमति” (deemed assent) प्राप्त घोषित कर दिया
मई 2025राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143 के अधीन उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति-निर्देश (Presidential Reference) भेजा — अनुच्छेद 200 एवं 201 से जुड़े 14 प्रश्न
20 नवंबर 2025पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की राय — न्यायालय राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के लिए समय-सीमा नहीं निर्धारित कर सकता, और “मानित अनुमति” संविधान के लिए अजनबी अवधारणा है। साथ ही यह भी कहा गया कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोक भी नहीं सकते — ऐसी निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक उपचार उपलब्ध है

12.2 GST एवं वित्तीय स्वायत्तता

12.3 परिसीमन एवं प्रतिनिधित्व — 2026 की बहस

यह आज का सबसे बड़ा संघीय प्रश्न है, और उत्तर प्रदेश इसके ठीक केंद्र में है।

सुमेलन-तालिका 15 : परिसीमन का संवैधानिक इतिहास
वर्ष / संशोधनक्या किया
अनुच्छेद 81, 82, 170लोकसभा एवं विधान सभा की सीटों का राज्यों में आवंटन तथा प्रत्येक जनगणना के बाद पुनःसमायोजन का उपबंध
42वाँ संशोधन, 1976सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर स्थिर कर दिया — 2000 तक। उद्देश्य: जनसंख्या-नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित न करना
84वाँ संशोधन, 2001यह रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ा दी
87वाँ संशोधन, 2003राज्यों के भीतर निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 की जनगणना के आधार पर पुनर्निर्धारित करने की अनुमति — पर सीटों की संख्या नहीं बदली। इसी के अंतर्गत परिसीमन आयोग (2002–2008) ने काम किया
106वाँ संशोधन, 2023नारी शक्ति वंदन अधिनियम — लोकसभा एवं राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण; किंतु यह 2023 के अधिनियम के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़ों पर आधारित परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा
जनगणना 2027आगामी जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 निर्धारित है (हिम-आच्छादित क्षेत्रों के लिए पूर्ववर्ती तिथि) — अर्थात् “2026 के बाद की पहली जनगणना” यही होगी
अप्रैल 2026 के तीन विधेयकसंविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 (लोकसभा की अधिकतम सदस्य-संख्या 550 से बढ़ाकर 850 — राज्यों से 815, संघ राज्यक्षेत्रों से 35; परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना; महिला आरक्षण उसी परिसीमन से जोड़ना), परिसीमन विधेयक, 2026 तथा संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 — तीनों 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पुरःस्थापित
17 अप्रैल 2026संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक लोकसभा में अस्वीकृत — 528 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में से 298 पक्ष में, 230 विपक्ष में; अनुच्छेद 368 के लिए अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। इसके बाद शेष दो विधेयक वापस ले लिए गए
उत्तर प्रदेश संदर्भ — परिसीमन की बहस में UP का दाँव

12.4 अन्य दबाव-बिंदु — संक्षेप में

स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न

प्र.1 परिसीमन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. 84वें संविधान संशोधन ने लोकसभा सीटों के आवंटन पर लगी रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी।
2. 87वें संविधान संशोधन ने राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या 2001 की जनगणना के आधार पर बदल दी।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)84वाँ संशोधन (2001) ने रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाई — कथन 1 सही। 87वें संशोधन (2003) ने केवल राज्यों के भीतर निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 की जनगणना पर पुनर्निर्धारित करने की अनुमति दी; राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या नहीं बदली — कथन 2 गलत।

प्र.2 नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पारित नहीं हो सका।
कारण (R): संविधान संशोधन विधेयक के लिए प्रत्येक सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का तीन-चौथाई बहुमत आवश्यक होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)(A) सही है — 17 अप्रैल 2026 को विधेयक के पक्ष में 528 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में से केवल 298 मत पड़े (लगभग 56%)। किंतु अनुच्छेद 368 की अपेक्षा दो-तिहाई की है, तीन-चौथाई की नहीं — अतः (R) गलत है।

प्र.3 राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के लिए विधेयक पर निर्णय करने हेतु तीन माह की समय-सीमा निर्धारित है।
2. नवंबर 2025 में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति-निर्देश पर अपनी राय में “मानित अनुमति” की अवधारणा को स्वीकार किया।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 200 केवल “यथाशीघ्र” कहता है; उसमें तीन माह या कोई अन्य निश्चित अवधि नहीं है — कथन 1 गलत। 20 नवंबर 2025 की संविधान-पीठ की राय में कहा गया कि न्यायालय समय-सीमा नहीं बाँध सकता और “मानित अनुमति” संविधान के लिए अजनबी अवधारणा है — कथन 2 भी गलत।

13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम — एक दृष्टि में

13.1 अनुच्छेदवार सूची — भाग XI, XII, XIII, XVIII एवं XXI

सुमेलन-तालिका 16 : इस अध्याय के सभी अनुच्छेद — एक साथ
अनुच्छेदविषय
1संघ का नाम एवं राज्यक्षेत्र — “राज्यों का संघ”
2 · 3 · 4नए राज्यों का प्रवेश/स्थापना · नाम-सीमा-क्षेत्र में परिवर्तन · परिणामी उपबंध (368 के अर्थ में संशोधन नहीं)
245विधियों का क्षेत्रीय विस्तार; राज्यक्षेत्र-बाह्य प्रवर्तन
246 · 246कसातवीं अनुसूची के अनुसार विषयों का बँटवारा · वस्तु एवं सेवा कर पर समवर्ती शक्ति
247 · 248अतिरिक्त न्यायालय · अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ
249राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद की विधि (राज्यसभा का 2/3 उपस्थित एवं मतदान वाला संकल्प, 1 वर्ष)
250 · 251आपात में राज्य सूची पर संसद की विधि · 249/250 वाली प्रतिकूलता
252 · 253दो या अधिक राज्यों की सहमति से विधि · अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने वाली विधि
254 · 255समवर्ती सूची की प्रतिकूलता · सिफारिश/पूर्व मंजूरी केवल प्रक्रियागत
256 · 257 · 257कराज्यों की बाध्यता · संघ का नियंत्रण · सशस्त्र बलों की तैनाती (42वें ने जोड़ा, 44वें ने हटाया)
258 · 258कसंघ → राज्य कृत्यों का सौंपना · राज्य → संघ कृत्यों का सौंपना (7वाँ संशोधन)
261 · 262 · 263पूर्ण विश्वास एवं विश्वास · अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद · अंतर्राज्यीय परिषद
265 · 266 · 267विधि के प्राधिकार के बिना कर नहीं · संचित निधि एवं लोक लेखा · आकस्मिकता निधि
268 · 268क · 269 · 269कसंघ उद्ग्रहीत–राज्य संगृहीत · सेवा कर (हटाया) · राज्यों को सौंपे गए कर · अंतर्राज्यीय GST
270 · 271 · 272विभाज्य पूल · अधिभार · हटाया गया (80वाँ संशोधन)
273 · 274 · 275 · 276जूट अनुदान · राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश · सांविधिक अनुदान · वृत्ति कर (₹2,500)
279 · 279क · 280 · 281 · 282शुद्ध आगम (CAG का प्रमाणपत्र अंतिम) · GST परिषद · वित्त आयोग · सिफारिशें संसद में · विवेकाधीन अनुदान
293राज्यों द्वारा उधार
301 · 302 · 303 · 304 · 305 · 306 · 307व्यापार की स्वतंत्रता · संसद के निर्बंधन · अधिमान का निषेध · राज्य के निर्बंधन · विद्यमान विधियाँ एवं राज्य एकाधिकार · हटाया गया · प्राधिकारी की नियुक्ति
312 · 312कअखिल भारतीय सेवाएँ · पुराने अधिकारियों की सेवा-शर्तें (28वाँ संशोधन)
352 · 353 · 354 · 355आपात की उद्घोषणा · उसका प्रभाव · राजस्व-वितरण में परिवर्तन · संघ का रक्षा-कर्तव्य
356 · 357 · 365राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता · 356 के अधीन विधायी शक्तियों का प्रयोग · निदेशों के अनुपालन में विफलता का प्रभाव
358 · 359 · 360अनुच्छेद 19 का निलंबन · अधिकारों के प्रवर्तन का निलंबन · वित्तीय आपात
244 · 244कअनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन (पाँचवीं एवं छठी अनुसूची) · असम में स्वायत्त राज्य (22वाँ संशोधन)
371 से 371ञबारह राज्यों के लिए विशेष उपबंध (तालिका 12 देखें)

13.2 कालक्रम — संघवाद एवं आपातकाल की निर्णायक तिथियाँ

सुमेलन-तालिका 17 : वर्ष ↔ घटना
वर्षघटना
1951अनुच्छेद 356 का पहला प्रयोग — पंजाब (20 जून)
1953आंध्र राज्य का गठन (1 अक्टूबर); दिसंबर में राज्य पुनर्गठन आयोग
1955फज़ल अली आयोग की रिपोर्ट (सितंबर); चौथा संशोधन — अनुच्छेद 305
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम + 7वाँ संशोधन; क्षेत्रीय परिषदें; अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम एवं नदी बोर्ड अधिनियम; अनुच्छेद 258क जोड़ा
1962पहला राष्ट्रीय आपात (26 अक्टूबर); 13वाँ संशोधन — अनुच्छेद 371क (नागालैंड)
1963पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ — “संविधान पूर्णतः संघीय नहीं”
1966भारतीय वन सेवा — तीसरी अखिल भारतीय सेवा
1968पहला आपात समाप्त (10 जनवरी)
196922वाँ संशोधन — 371ख (असम) एवं 244क; कृष्णा, गोदावरी एवं नर्मदा न्यायाधिकरण; राजमन्नार समिति
1971दूसरा राष्ट्रीय आपात (3 दिसंबर); 27वाँ संशोधन — 371ग (मणिपुर); पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम
197332वाँ संशोधन — 371घ एवं 371ङ (आंध्र प्रदेश); आनंदपुर साहिब प्रस्ताव
1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (12 जून); तीसरा आपात (25 जून); 36वाँ संशोधन — 371च (सिक्किम); 38वाँ एवं 39वाँ संशोधन
197642वाँ संशोधन — पाँच विषय समवर्ती सूची में; 257क; 352 में “भाग”; 356 की अवधि एक वर्ष; अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख; एडीएम जबलपुर
1977दोनों आपात रद्द (21 मार्च); शाह आयोग; राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ
197844वाँ संशोधन — आपात-उपबंधों का पुनर्लेखन (तालिका 14)
1983–88सरकारिया आयोग — गठन जून 1983, रिपोर्ट 1988, 247 सिफारिशें
1986–8753वाँ संशोधन — 371छ (मिज़ोरम); 55वाँ — 371ज (अरुणाचल); 56वाँ — 371झ (गोवा); रावी-ब्यास न्यायाधिकरण (1986); पंजाब की 356-उद्घोषणा (11 मई 1987)
198860वाँ संशोधन — वृत्ति कर की सीमा ₹250 से ₹2,500
1990अंतर्राज्यीय परिषद का गठन (28 मई); कावेरी न्यायाधिकरण; 64वाँ संशोधन (पंजाब)
199273वाँ एवं 74वाँ संशोधन — अनुच्छेद 280(3) में (खख) एवं (ग)
1994एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (11 मार्च) — 9 न्यायाधीश
1996पेसा अधिनियम (24 दिसंबर); अंतर्राज्यीय परिषद की स्थायी समिति
200080वाँ संशोधन — अनुच्छेद 270 का पुनर्लेखन, 272 हटाया; छत्तीसगढ़, उत्तरांचल एवं झारखंड
2001 · 200384वाँ — परिसीमन-रोक 2026 के बाद तक; 87वाँ — 2001 की जनगणना पर सीमा-पुनर्निर्धारण
2007–10पुंछी आयोग — गठन अप्रैल 2007, रिपोर्ट 30 मार्च 2010 (सात खंड)
2012–1398वाँ संशोधन — 371ञ (कर्नाटक), प्रवृत्त 1 अक्टूबर 2013
2014तेलंगाना (2 जून); अनुच्छेद 371घ का विस्तार तेलंगाना तक
2015नीति आयोग (1 जनवरी) — योजना आयोग का स्थान
2016101वाँ संशोधन (8 सितंबर) — 246क, 269क, 279क; जिंदल स्टेनलेस (11 नवंबर, 9 न्यायाधीश)
2017GST लागू (1 जुलाई); पुट्टस्वामी — एडीएम जबलपुर अपास्त
2019अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी (5 अगस्त); जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (31 अक्टूबर); जल विवाद संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित (31 जुलाई)
2022GST प्रतिकर की पाँच-वर्षीय अवधि समाप्त (जून); मोहित मिनरल्स — परिषद की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं
2023106वाँ संशोधन — महिला आरक्षण; इन रे अनुच्छेद 370 (11 दिसंबर); 16वाँ वित्त आयोग गठित (31 दिसंबर)
2025मणिपुर में राष्ट्रपति शासन (13 फरवरी); तमिलनाडु राज्यपाल वाद (8 अप्रैल); GST परिषद की 56वीं बैठक (3 सितंबर) — दो-स्लैब व्यवस्था; राष्ट्रपति-निर्देश पर संविधान पीठ की राय (20 नवंबर); 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट (17 नवंबर)
202616वें वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में (1 फरवरी); मणिपुर में राष्ट्रपति शासन समाप्त (4 फरवरी); संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक अस्वीकृत (17 अप्रैल)

13.3 रटने योग्य निर्णायक तथ्य

स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न

प्र.1 सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
   सूची-I (संविधान संशोधन)    सूची-II (प्रभाव)
A. 42वाँ संशोधन   1. अनुच्छेद 352 में “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह”
B. 44वाँ संशोधन   2. पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में
C. 80वाँ संशोधन   3. अनुच्छेद 279क — GST परिषद
D. 101वाँ संशोधन   4. अनुच्छेद 272 का लोप
कूट:

AA-2, B-1, C-3, D-4BA-1, B-2, C-4, D-3CA-2, B-1, C-4, D-3DA-1, B-2, C-3, D-4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)42वाँ (1976) — शिक्षा, वन, नाप-तौल, वन्यजीव-संरक्षण एवं न्याय-प्रशासन समवर्ती सूची में; 44वाँ (1978) — “सशस्त्र विद्रोह”; 80वाँ (2000) — अनुच्छेद 272 हटाया एवं 270 पुनर्लिखित; 101वाँ (2016) — GST परिषद। अतः A-2, B-1, C-4, D-3 सही है।

प्र.2 निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?
   (अनुसूची/अनुच्छेद)    (विवरण)
1. छठी अनुसूची — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्र
2. पाँचवीं अनुसूची — वर्तमान में दस राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र
3. अनुच्छेद 244क — असम के जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर स्वायत्त राज्य, जिसका गठन 1971 में हुआ
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 244क को 22वें संविधान संशोधन (1969) द्वारा जोड़ा गया था, किंतु इसके अधीन कोई स्वायत्त राज्य आज तक गठित नहीं हुआ। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है; युग्म 1 एवं 2 सही हैं।

प्र.3 निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
1. अंतर्राज्यीय परिषद का गठन
2. एस.आर. बोम्मई वाद का निर्णय
3. 101वाँ संविधान संशोधन
4. पुंछी आयोग की रिपोर्ट
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A1, 2, 4, 3B2, 1, 3, 4C2, 1, 4, 3D1, 2, 3, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अंतर्राज्यीय परिषद — 28 मई 1990; एस.आर. बोम्मई — 11 मार्च 1994; पुंछी आयोग की रिपोर्ट — 30 मार्च 2010; 101वाँ संशोधन — 2016। अतः 1, 2, 4, 3 सही क्रम है।