भारतीय संघवाद का स्वरूप, केंद्र-राज्य विधायी-प्रशासनिक-वित्तीय संबंध, अंतर्राज्यीय संबंध, विशेष उपबंध वाले राज्य, पाँचवीं एवं छठी अनुसूची तथा अनुच्छेद 352, 356 एवं 360 के अधीन तीन प्रकार के आपातकाल
राजव्यवस्था से 2025 के मूल प्रश्नपत्र में लगभग 19–20 प्रश्न आए थे, और उनमें
अनुच्छेद-संख्या, अनुसूची-संख्या तथा संशोधन-संख्या का हिस्सा सबसे बड़ा था। यह अध्याय
ठीक उसी सामग्री का भंडार है — यहाँ का हर बिंदु संख्या से बँधा है। UPPSC यहाँ से चार रूपों में पूछता है:
(क) सुमेलन — अनुच्छेद ↔ विषय, 371 श्रृंखला ↔ राज्य, क्षेत्रीय परिषद ↔ मुख्यालय;
(ख) दो-कथन — जिसमें “उपस्थित एवं मतदान करने वाले” बनाम “कुल सदस्यता” जैसा
एक वाक्यांश उत्तर पलट देता है; (ग) कालक्रम — आपात-घोषणाओं तथा संशोधनों का क्रम;
(घ) “सही सुमेलित नहीं है” — जहाँ 371ज और 371झ जैसे निकट-समान युग्म फँसाते हैं।
इसीलिए यहाँ हर खंड के अंत में एक सुमेलन-तालिका है और अध्याय के अंत में पूरी अनुच्छेद-सूची।
इस अध्याय की सीमा
मौलिक अधिकारों का विस्तृत विवेचन अध्याय 4.2 में है — यहाँ केवल यह देखा गया है कि
आपातकाल उन पर कैसे असर डालता है (अनुच्छेद 358 एवं 359)। राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री की शक्तियाँ,
राज्य कार्यपालिका की संरचना अध्याय 4.4 में हैं — यहाँ राज्यपाल केवल
केंद्र-राज्य संबंध के बिंदु से आया है। वित्त आयोग की संरचना, योग्यताएँ एवं सभी आयोगों का ब्योरा
अध्याय 4.6 में है — यहाँ केवल अनुच्छेद 280 का संवैधानिक ढाँचा तथा नवीनतम (16वें) आयोग की
सिफारिशें दी गई हैं। संविधान का निर्माण एवं संशोधन-प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) अध्याय 4.1 में है।
1. भारतीय संघवाद का स्वरूप — संघीय, एकात्मक एवं सहकारी
1.1 “राज्यों का संघ” — शब्द-चयन ही पहला उत्तर है
संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है: “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (Union of States) होगा।”
यहाँ जानबूझकर “संघ” (Union) शब्द रखा गया, “परिसंघ” (Federation) नहीं।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में इसके दो कारण बताए —
भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते (agreement) का परिणाम नहीं है, जैसा अमेरिकी संघ था;
राज्यों को संघ से अलग होने (secession) का अधिकार नहीं है — संघ अविनाशी है, यद्यपि राज्य अविनाशी नहीं।
यही एक वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है: भारत में संघ अविनाशी है, राज्य नहीं। संसद
अनुच्छेद 3 के अधीन साधारण बहुमत से किसी राज्य का नाम, सीमा या क्षेत्र बदल सकती है, दो राज्यों को
मिला सकती है, नया राज्य बना सकती है। अमेरिका में यह असंभव है।
1.2 संघीय लक्षण — जो भारत को संघ बनाते हैं
द्वैध राजव्यवस्था (Dual Polity) — केंद्र तथा राज्य, दोनों की अपनी सरकारें, अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च।
लिखित संविधान — दोनों स्तरों की शक्तियाँ एक ही दस्तावेज़ में लिखित।
शक्तियों का विभाजन — सातवीं अनुसूची की तीन सूचियाँ।
संविधान की सर्वोच्चता — कोई भी विधि, चाहे केंद्र की हो या राज्य की, संविधान के विरुद्ध नहीं।
कठोर संविधान (आंशिक) — संघीय ढाँचे को छूने वाले उपबंध बदलने के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी चाहिए (अनुच्छेद 368(2) परंतुक)।
स्वतंत्र न्यायपालिका — उच्चतम न्यायालय केंद्र-राज्य विवादों का निपटारा करता है (अनुच्छेद 131 — आरंभिक अनन्य अधिकारिता)।
द्विसदनीय संसद — राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
1.3 एकात्मक लक्षण — जो इसे “अर्ध-संघीय” बनाते हैं
सुमेलन-तालिका 1 : एकात्मक झुकाव वाले उपबंध एवं उनका अनुच्छेद
एकात्मक लक्षण
संवैधानिक आधार
परीक्षा-बिंदु
सशक्त केंद्र
सातवीं अनुसूची; अनु. 248
संघ सूची सबसे लंबी; अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास (कनाडा-मॉडल; अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया में राज्यों के पास)
राज्यों के अलग संविधान नहीं
भाग VI सभी राज्यों पर
जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान अपवाद था — 5 अगस्त 2019 के बाद वह स्थिति समाप्त
राज्यों की प्रादेशिक अखंडता की गारंटी नहीं
अनु. 2 एवं 3
अनु. 3 के अधीन विधेयक पर राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक; राज्य विधानमंडल की राय ली जाती है पर वह बाध्यकारी नहीं; पारित साधारण बहुमत से; अनु. 4 — यह अनु. 368 के अर्थ में संशोधन नहीं
एकल नागरिकता
अनु. 5–11
अमेरिका में दोहरी नागरिकता
एकीकृत न्यायपालिका
अनु. 124, 214
एक ही न्यायालय-शृंखला केंद्र एवं राज्य दोनों की विधियाँ लागू करती है
अखिल भारतीय सेवाएँ
अनु. 312
IAS/IPS अधिकारी राज्य में काम करते हैं पर नियंत्रण केंद्र का भी
राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा
अनु. 155, 156
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण
आपातकालीन उपबंध
अनु. 352, 356, 360
आपात में संविधान स्वतः एकात्मक हो जाता है — “अर्ध-संघीय” की सबसे बड़ी कसौटी
एकल निर्वाचन आयोग
अनु. 324
संसद एवं राज्य विधानमंडल दोनों के चुनाव एक ही आयोग
एकीकृत लेखा-परीक्षा
अनु. 148 (CAG)
राज्यों के लेखे भी संघ द्वारा नियुक्त CAG परखता है
राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व
चौथी अनुसूची
जनसंख्या के अनुपात में — अमेरिकी सीनेट में प्रत्येक राज्य को 2-2 सीट
संसद की राज्य सूची पर विधि-शक्ति
अनु. 249, 250, 252, 253, 356
पाँच परिस्थितियाँ — खंड 2 में विस्तार से
एकात्मक झुकाव के सात सबसे पूछे जाने वाले बिंदु“अवशेष–अखिल–आपात–एकल–राज्यपाल–अनुच्छेद 3–CAG”
अवशेष शक्तियाँ संघ के पास (अनु. 248) · अखिल भारतीय सेवाएँ (अनु. 312) ·
आपातकालीन उपबंध (352/356/360) · एकल नागरिकता एवं एकल निर्वाचन आयोग ·
राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा · अनुच्छेद 3 से राज्यों की सीमा बदलने की शक्ति ·
CAG द्वारा राज्यों की भी लेखा-परीक्षा।
1.4 विद्वानों के मत — यह सुमेलन प्रश्न बनता है
सुमेलन-तालिका 2 : भारतीय संघवाद पर टिप्पणियाँ
विद्वान
भारतीय संविधान के लिए प्रयुक्त पद
के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare)
“अर्ध-संघीय” (quasi-federal) — “संघीय सिद्धांतों वाला एकात्मक राज्य”
आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings)
“प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ”
ग्रेनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
“सहकारी संघवाद” (cooperative federalism)
डब्ल्यू.एच. मॉरिस-जोन्स
“सौदेबाजी का संघवाद” (bargaining federalism)
पॉल एपलबी (Paul Appleby)
“अत्यंत संघीय” (extremely federal)
डी.डी. बसु
“न शुद्ध संघीय, न शुद्ध एकात्मक — दोनों का मिश्रण”
सर आइवर जेनिंग्स का प्रतिपक्ष — अल्फ्रेड डायसी
डायसी का पद “विधि का शासन” है, संघवाद का नहीं — विकल्पों में यह जाल के रूप में आता है
1.5 न्यायालय ने संघवाद को कैसे देखा
पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ (1963) — उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान
पूर्णतः संघीय नहीं है; राज्यों को संप्रभुता प्राप्त नहीं। संसद अनुच्छेद 3 के अधीन राज्यों की
भूमि अर्जित करने वाली विधि बना सकती है।
राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ (1977) — अनुच्छेद 356 पर सीमित न्यायिक पुनर्विलोकन स्वीकार,
पर सामान्यतः राजनीतिक प्रश्न मानकर हस्तक्षेप से बचा गया।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) — संघवाद को संविधान के मूल ढाँचे का
अंग घोषित किया गया; साथ ही पंथनिरपेक्षता भी।
कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) — संघवाद मूल ढाँचा है, किंतु राज्यसभा के लिए
निवास की शर्त हटाना संघवाद को नष्ट नहीं करता — अतः संशोधन वैध।
भारत संघ बनाम राजेंद्रन (GST से संबंधित मोहित मिनरल्स, 2022) — GST परिषद की
सिफारिशें केवल अनुशंसात्मक हैं, बाध्यकारी नहीं; केंद्र एवं राज्य दोनों के पास GST पर
समवर्ती विधायी शक्ति है। यह निर्णय “सहकारी संघवाद” की सीमा भी बताता है।
1.6 सहकारी संघवाद एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का अर्थ है — केंद्र और राज्य प्रतिद्वंद्वी नहीं,
साझेदार। इसकी संस्थागत अभिव्यक्तियाँ हैं:
संवैधानिक निकाय
अंतर्राज्यीय परिषद— अनु. 263 · 28 मई 1990 के राष्ट्रपति आदेश से गठित
GST परिषद— अनु. 279क · 101वाँ संशोधन, 2016
वित्त आयोग— अनु. 280 · प्रत्येक पाँचवें वर्ष
सांविधिक निकाय
पाँच क्षेत्रीय परिषदें— राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956
पूर्वोत्तर परिषद— पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम, 1971
कार्यपालिका-निर्मित निकाय
नीति आयोग— 1 जनवरी 2015 · योजना आयोग (1950) का स्थान · “प्रतिस्पर्धी एवं सहकारी संघवाद” इसका घोषित ध्येय
राष्ट्रीय विकास परिषद— 1952 · न संवैधानिक, न सांविधिक
प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) इससे भिन्न है — इसमें राज्य निवेश,
सुगमता-सूचकांक तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में एक-दूसरे से होड़ करते हैं। नीति आयोग की
SDG सूचकांक, स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक जैसी राज्य-रैंकिंग इसी का औज़ार हैं।
1.7 राज्यों का पुनर्गठन — संघीय मानचित्र कैसे बना
1948धार आयोग (S.K. Dhar) — भाषा को आधार मानने से इनकार; प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता
1948–49JVP समिति — जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया; भाषायी आधार अस्वीकृत
1953आंध्र राज्य — पोट्टी श्रीरामुलु के 56 दिन के आमरण अनशन एवं मृत्यु के बाद पहला भाषायी राज्य (1 अक्टूबर 1953)
सितंबर 1955आयोग की रिपोर्ट — भाषा को आधार स्वीकार, पर “एक भाषा, एक राज्य” के सूत्र को अस्वीकार
1956राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 + 7वाँ संविधान संशोधन → 14 राज्य एवं 6 संघ राज्यक्षेत्र; राज्यों की भाग-क/ख/ग/घ श्रेणियाँ समाप्त
2000तीन नए राज्य — छत्तीसगढ़ (1 नवंबर), उत्तरांचल (9 नवंबर), झारखंड (15 नवंबर)
2014तेलंगाना (2 जून) — 29वाँ राज्य; आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014
2019जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम — जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख दो संघ राज्यक्षेत्र (31 अक्टूबर 2019 से); राज्यों की संख्या 28
उत्तर प्रदेश संदर्भ — पुनर्गठन की कहानी में UP कहाँ है
हृदयनाथ कुंज़रू (H.N. Kunzru) राज्य पुनर्गठन आयोग के तीन सदस्यों में थे — वे
इलाहाबाद (प्रयागराज) से थे और सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़े रहे। आयोग के
तीनों नाम (फज़ल अली–पणिक्कर–कुंज़रू) बहु-पूछित हैं।
उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 से 9 नवंबर 2000 को
उत्तरांचल बना, जिसका नाम 2007 में बदलकर उत्तराखंड हुआ।
यह 27वाँ राज्य था।
21 नवंबर 2011 को उत्तर प्रदेश विधान सभा ने राज्य को चार भागों —
पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश तथा पश्चिम प्रदेश — में बाँटने का प्रस्ताव
ध्वनिमत से पारित किया। किंतु अनुच्छेद 3 के अनुसार अंतिम शक्ति संसद की है, राज्य
विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं — इसलिए प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा। यह उदाहरण अनुच्छेद 3 की प्रकृति
समझाने के लिए आदर्श है।
उत्तर प्रदेश आज 80 लोकसभा, 31 राज्यसभा, 403 विधान सभा
तथा 100 विधान परिषद सीटों के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य-इकाई है — इसीलिए
परिसीमन, वित्त आयोग एवं राज्यसभा-प्रतिनिधित्व की हर बहस में वह केंद्र में रहता है (खंड 12 देखें)।
सावधानी — अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 अलग हैं
अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना; यह संघ के बाहर
के क्षेत्रों से संबंधित है (जैसे सिक्किम 1975)।
अनुच्छेद 3 — नए राज्यों का निर्माण तथा वर्तमान राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में
परिवर्तन; यह संघ के भीतर की पुनर्व्यवस्था है।
अनुच्छेद 3 के विधेयक के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश चाहिए और राष्ट्रपति उसे
संबंधित राज्य विधानमंडल को निर्दिष्ट करेंगे — पर विधानमंडल की राय
बाध्यकारी नहीं, और वह समय-सीमा में राय न भी दे तो विधेयक आगे बढ़ सकता है।
अनुच्छेद 4 स्पष्ट करता है कि पहली एवं चौथी अनुसूची में हुए ऐसे परिवर्तन
अनुच्छेद 368 के अर्थ में “संविधान संशोधन” नहीं माने जाएँगे — अतः साधारण बहुमत पर्याप्त है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ” कहा गया है, “परिसंघ” नहीं। कारण (R): भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है और राज्यों को संघ से पृथक् होने का अधिकार नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में ठीक यही दो कारण दिए थे — संघ किसी समझौते का परिणाम नहीं, और राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं। अतः (A) सही है और (R) उसका ठीक कारण भी है।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (विद्वान) सूची-II (भारतीय संविधान के लिए प्रयुक्त पद) A. के.सी. व्हीयर 1. सहकारी संघवाद B. ग्रेनविल ऑस्टिन 2. सौदेबाजी का संघवाद C. मॉरिस-जोन्स 3. अर्ध-संघीय D. आइवर जेनिंग्स 4. प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ कूट:
उत्तर: (C)व्हीयर — “अर्ध-संघीय”; ऑस्टिन — “सहकारी संघवाद”; मॉरिस-जोन्स — “सौदेबाजी का संघवाद”; जेनिंग्स — “प्रबल केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ”। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।
प्र.3अनुच्छेद 3 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त की गई राय संसद पर बाध्यकारी होती है। 2. ऐसे विधेयक को संसद में पुरःस्थापित करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)राज्य विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं होती — 2011 में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चार राज्यों वाला प्रस्ताव इसी कारण स्वतः प्रभावी नहीं हुआ; अतः कथन 1 गलत है। राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है और वे विधेयक को राज्य विधानमंडल को निर्दिष्ट करते हैं — कथन 2 सही है।
2. विधायी संबंध — सातवीं अनुसूची एवं अनुच्छेद 245 से 255
संविधान का भाग XI (अनुच्छेद 245–263) केंद्र-राज्य संबंधों का मुख्य अध्याय है।
इसका अध्याय I (245–255) विधायी संबंध तथा अध्याय II (256–263) प्रशासनिक संबंध
है। विधायी संबंध चार पहलुओं में बँटे हैं — क्षेत्रीय विस्तार, विषयों का बँटवारा,
राज्य सूची पर संसद की विधि तथा राज्य विधान पर केंद्र का नियंत्रण।
2.1 अनुच्छेद 245 — विधियों का क्षेत्रीय विस्तार
245(1) — संसद भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या किसी भाग के लिए विधि बना सकती है;
राज्य विधानमंडल सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए।
245(2) — संसद द्वारा बनाई गई विधि इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि उसका
राज्यक्षेत्र-बाह्य प्रवर्तन (extra-territorial operation) होगा। अर्थात् संसद
राज्यक्षेत्र-बाह्य विधि बना सकती है; राज्य विधानमंडल नहीं।
राज्य विधानमंडल की राज्य-बाह्य विधि तभी वैध है जब प्रादेशिक संबंध का सिद्धांत
(Doctrine of Territorial Nexus) पूरा हो — अर्थात् विषय और राज्य के बीच वास्तविक एवं
काल्पनिक नहीं, बल्कि पर्याप्त संबंध हो।
अनुच्छेद 245 पर अपवाद: कुछ क्षेत्रों में संसद/राज्य की विधि स्वतः लागू नहीं होती —
पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में राज्यपाल अधिसूचना द्वारा किसी अधिनियम का
प्रयोग रोक या संशोधित कर सकता है (पैरा 5); छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों में
राज्यपाल/राष्ट्रपति ऐसा कर सकते हैं; तथा अनुच्छेद 371क एवं 371छ के अधीन नागालैंड एवं
मिज़ोरम में कुछ विषयों पर संसद की विधि तब तक लागू नहीं होती जब तक राज्य विधान सभा संकल्प न करे।
2.2 अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची — तीन सूचियाँ
सुमेलन-तालिका 3 : सातवीं अनुसूची — तीनों सूचियाँ
सूची
कौन विधि बनाता है
प्रविष्टियाँ (मूल → वर्तमान)
प्रमुख विषय
सूची I — संघ सूची
केवल संसद (अनु. 246(1))
97 → 98
रक्षा, विदेशी मामले, परमाणु ऊर्जा, रेल, डाक-तार, बैंकिंग, बीमा, मुद्रा, जनगणना, अखिल भारतीय सेवाएँ, नागरिकता, निर्वाचन, अंतर्राज्यीय नदियों का विनियमन
सूची II — राज्य सूची
केवल राज्य विधानमंडल (अनु. 246(3))
66 → 59
लोक व्यवस्था, पुलिस, जेल, स्थानीय शासन, लोक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई एवं जल, भूमि, मद्य, मेले एवं बाज़ार, राज्य लोक सेवाएँ, भू-राजस्व
सूची III — समवर्ती सूची
संसद एवं राज्य दोनों (अनु. 246(2))
47 → 52
दांडिक विधि एवं प्रक्रिया, विवाह-तलाक, संविदा, न्यास, दिवाला, श्रम, शिक्षा, वन, वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण, जनसंख्या नियंत्रण, बिजली, आर्थिक-सामाजिक योजना
प्रधानता का क्रम — टकराव की स्थिति में संघ सूची > समवर्ती सूची > राज्य सूची।
समवर्ती सूची का विचार ऑस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया है।
अनुच्छेद 246क (101वाँ संशोधन, 2016) एक अपवाद है — यह वस्तु एवं सेवा कर पर
संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों को समवर्ती शक्ति देता है, पर अंतर्राज्यीय आपूर्ति
पर विधि बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है (अनु. 246क(2))।
अनुच्छेद 247 — संसद संघ सूची के विषयों की विधियों के बेहतर प्रशासन के लिए
अतिरिक्त न्यायालय स्थापित कर सकती है। अनुच्छेद 248 — अवशिष्ट शक्तियाँ (residuary powers) संसद के पास; इसमें
तीनों सूचियों में न आने वाला कोई भी कर लगाने की शक्ति भी है। इसी के अनुरूप संघ सूची की
प्रविष्टि 97 है। साइबर विधि, इलेक्ट्रॉनिक संचार, विदेशी अभिकरण जैसे विषय इसी शक्ति से आते हैं।
सावधानी — सूचियों की “वर्तमान” संख्या पर पुस्तकें अलग-अलग हैं
UPPSC में सर्वाधिक बार मूल संख्या पूछी जाती है — संघ 97, राज्य 66, समवर्ती 47।
यह कभी नहीं बदलती, इसलिए इसे पहले याद करें।
वर्तमान संख्या का सही गणित यह है — संघ सूची: प्रविष्टि 33 (7वाँ संशोधन) एवं 92
(101वाँ संशोधन) हटीं, 2क · 92क · 92ख जुड़ीं ⇒ 98।
राज्य सूची: प्रविष्टि 36 (7वाँ संशोधन), 11 · 19 · 20 · 29 (42वाँ संशोधन),
52 एवं 55 (101वाँ संशोधन) हटीं ⇒ 59। समवर्ती सूची: 42वें संशोधन ने
11क · 17क · 17ख · 20क · 33क जोड़ीं ⇒ 52।
कई पुरानी पुस्तकों में “100 / 61 / 52” मिलता है — वह 101वें संशोधन (2016) से पहले की
स्थिति है। यदि प्रश्न में GST के बाद की स्थिति पूछी जाए तो 98 / 59 / 52 ही सही है।
तीनों सूचियों की मूल संख्या“सत्तानवे–छियासठ–सैंतालीस”
संघ 97 → राज्य 66 → समवर्ती 47। घटते क्रम में याद रखें — और ध्यान दें कि
केवल राज्य सूची घटी है (66 → 59), संघ एवं समवर्ती दोनों बढ़ी हैं। इसी में पूरा केंद्रीकरण छिपा है।
2.3 42वें संशोधन ने क्या खींचा — पाँच विषय राज्य से समवर्ती में
42वें संशोधन (1976) से समवर्ती सूची में गए पाँच विषय“शिक्षा वन नापतौल वन्यजीव न्याय”
शिक्षा (प्रविष्टि 11 हटी → समवर्ती 25) · वन (19 हटी → समवर्ती 17क) ·
नाप-तौल — बाट एवं माप (29 हटी → समवर्ती 33क) · वन्यजीव एवं पक्षियों का संरक्षण
(20 हटी → समवर्ती 17ख) · न्याय-प्रशासन (राज्य सूची की प्रविष्टि 3 से कुछ शब्द हटे → समवर्ती 11क)।
साथ ही 42वें ने समवर्ती सूची में जनसंख्या नियंत्रण एवं परिवार नियोजन (20क) भी जोड़ा — यह
किसी सूची से खींचा नहीं गया, नया था। यही अंतर प्रश्न बनता है।
2.4 अनुच्छेद 249, 250, 252, 253 — राज्य सूची पर संसद की विधि
सामान्य नियम यह है कि राज्य सूची पर संसद विधि नहीं बना सकती। किंतु पाँच परिस्थितियाँ
अपवाद हैं, और इन्हीं के बीच का अंतर UPPSC का सबसे प्रिय जाल है।
सुमेलन-तालिका 4 : राज्य सूची पर संसद की विधायी शक्ति — पाँच स्थितियाँ
अनुच्छेद
शर्त
कौन-सा सदन / कौन-सा बहुमत
विधि कब तक प्रभावी
249 राष्ट्रीय हित
राज्यसभा यह संकल्प करे कि राष्ट्रीय हित में संसद का विधि बनाना आवश्यक/समीचीन है
केवल राज्यसभा; उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम 2/3
संकल्प अधिकतम 1 वर्ष के लिए (जितनी बार चाहें 1-1 वर्ष का नवीकरण); विधि संकल्प समाप्त होने के 6 माह बाद निष्प्रभावी
250 राष्ट्रीय आपात
अनुच्छेद 352 की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो
कोई अलग संकल्प नहीं — आपात स्वतः यह शक्ति देता है
विधि आपात समाप्त होने के 6 माह बाद निष्प्रभावी
252 राज्यों का अनुरोध
दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों के सभी सदन संकल्प पारित करें
संबंधित राज्यों के विधानमंडल; संसद में साधारण बहुमत
कोई समय-सीमा नहीं; विधि उन्हीं राज्यों पर लागू, अन्य राज्य बाद में संकल्प से अंगीकार कर सकते हैं
253 अंतर्राष्ट्रीय करार
किसी संधि, करार, अभिसमय अथवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय को कार्यान्वित करना
केवल संसद; कोई राज्य-सहमति आवश्यक नहीं
कोई समय-सीमा नहीं — स्थायी विधि
356 (+357) राष्ट्रपति शासन
राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता
संसद, साधारण बहुमत
विधि राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद भी प्रवृत्त रहती है जब तक राज्य विधानमंडल उसे न बदले
सावधानी — 249 बनाम 250 बनाम 252, तीनों का भेद
249 केवल राज्यसभा का काम है — लोकसभा की कोई भूमिका नहीं। बहुमत
“उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3” है, “कुल सदस्यता का 2/3” नहीं।
यह एक वाक्यांश ही उत्तर तय करता है।
249 के संकल्प की अवधि अधिकतम 1 वर्ष है — 6 माह नहीं। 6 माह वह अवधि है जिसके बाद
विधि निष्प्रभावी होती है।
250 में कोई संकल्प नहीं चाहिए — राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा स्वयं पर्याप्त है।
ध्यान दें कि अनुच्छेद 250 राष्ट्रपति शासन पर लागू नहीं होता — वहाँ अनुच्छेद 356/357 काम करते हैं।
252 के अधीन बनी विधि को केवल संसद संशोधित या निरसित कर सकती है — जिस राज्य ने
अंगीकार किया, उसका विधानमंडल नहीं। यह 252(2) का स्पष्ट उपबंध है।
253 सबसे शक्तिशाली है — यह राज्य सूची की किसी भी प्रविष्टि पर, बिना किसी राज्य की
सहमति के, स्थायी विधि बनाने देता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972 के
अनुसरण में) इसी का उदाहरण है।
प्रविष्टि-याद रखने का सूत्र — 249 = राज्यसभा · 250 = आपात · 252 = राज्यों का अनुरोध ·
253 = संधि। बढ़ते क्रम में “राज्यसभा → आपात → राज्य → संधि”।
अनुच्छेद 252 के अधीन बनी प्रसिद्ध विधियाँ — वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972;
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974; नगरीय भूमि (अधिकतम सीमा एवं विनियमन) अधिनियम, 1976;
मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994।
अनुच्छेद 253 के अधीन बनी विधियाँ — पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986;
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981; रासायनिक आयुध अभिसमय अधिनियम, 2000।
अनुच्छेद 249 का प्रयोग बहुत कम हुआ है — यह केवल कुछ ही बार, थोड़े समय के लिए
प्रयोग किया गया; इसीलिए परीक्षा में इसका उपयोग नहीं, प्रक्रिया पूछी जाती है।
2.5 अनुच्छेद 251 एवं 254 — प्रतिकूलता (Repugnancy)
अनुच्छेद 251 · 249/250 वाली प्रतिकूलता
अनुच्छेद 249 या 250 के अधीन बनी संसदीय विधि और राज्य विधि में टकराव।
राज्य विधानमंडल की शक्ति छिनती नहीं — वह विधि बना सकता है।
टकराव पर संसदीय विधि प्रभावी, राज्य विधि निष्क्रिय (inoperative)।
संसदीय विधि समाप्त होते ही राज्य विधि पुनः जीवित हो जाती है — वह शून्य नहीं थी।
अनुच्छेद 254 · समवर्ती सूची वाली प्रतिकूलता
समवर्ती सूची के विषय पर संसद एवं राज्य की विधियों में टकराव।
254(1) — संसदीय विधि प्रभावी; राज्य विधि प्रतिकूलता की मात्रा तक शून्य (void)।
254(2) — यदि राज्य विधि राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित हुई और उन्होंने अनुमति दे दी,
तो वह उस राज्य में प्रभावी होगी।
254(2) का परंतुक — फिर भी संसद बाद में उसी विषय पर विधि बनाकर राज्य विधि को
जोड़, संशोधित, परिवर्तित या निरसित कर सकती है। अंतिम शब्द सदैव संसद का।
अनुच्छेद 255 — यदि किसी अधिनियम के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की
सिफारिश या पूर्व मंजूरी अपेक्षित थी और वह नहीं ली गई, तो केवल इस कारण अधिनियम अविधिमान्य नहीं होगा,
बशर्ते अनुमति (assent) उपयुक्त प्राधिकारी ने दी हो। अर्थात् यह अपेक्षा
केवल प्रक्रियागत है, सारभूत नहीं।
2.6 शक्ति-विभाजन के न्यायिक सिद्धांत
सुमेलन-तालिका 5 : विधायी अधिकारिता के पाँच सिद्धांत
सिद्धांत
आशय
तत्व एवं सार (Pith and Substance)
विधि का वास्तविक विषय देखा जाता है। यदि वह अपनी सूची में है तो दूसरी सूची पर आनुषंगिक अतिक्रमण से विधि अवैध नहीं होती।
आनुषंगिक अतिक्रमण (Incidental Encroachment)
उपर्युक्त का पूरक — थोड़ा-सा अतिक्रमण क्षम्य है, यदि विधि का मूल स्वरूप वैध है।
छद्म विधान (Colourable Legislation)
“जो प्रत्यक्षतः नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्षतः भी नहीं किया जा सकता।” विधानमंडल अपनी शक्ति की सीमा को दिखावटी रूप देकर पार नहीं कर सकता।
प्रादेशिक संबंध (Territorial Nexus)
राज्य विधानमंडल राज्य-बाह्य विषय पर तभी विधि बना सकता है जब विषय और राज्य के बीच वास्तविक एवं पर्याप्त संबंध हो।
सामंजस्यपूर्ण निर्वचन (Harmonious Construction)
दो प्रविष्टियों में स्पष्ट टकराव दिखे तो पहले उनमें सामंजस्य बिठाने का प्रयास; असफल होने पर संघीय प्रधानता (federal supremacy) — संघ सूची जीतती है।
परीक्षा-दृष्टि
UPPSC में बहु-पूछित: अनु. 249 में “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3”;
अनु. 252 की विधि केवल संसद बदल सकती है; अवशिष्ट शक्ति संसद के पास
(विकल्प में “राज्य” या “राष्ट्रपति” रखा जाता है); 42वें संशोधन के पाँच स्थानांतरित विषय;
तथा समवर्ती सूची का स्रोत — ऑस्ट्रेलिया। अनुच्छेद-संख्या का जाल प्रायः
“253 को 251 बताना” अथवा “249 को 250 बताना” होता है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 249 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. संकल्प राज्यसभा द्वारा उसकी कुल सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। 2. ऐसा संकल्प एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक प्रवृत्त रह सकता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 249(1) में बहुमत “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई से अन्यून” है, कुल सदस्यता का नहीं — अतः कथन 1 गलत है। 249(2) के अनुसार संकल्प अधिकतम एक वर्ष के लिए प्रवृत्त रहता है और उसी रीति से नवीकृत हो सकता है — कथन 2 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विषय) 1. अनुच्छेद 248 — अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ 2. अनुच्छेद 252 — अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने हेतु विधान 3. अनुच्छेद 254 — संसद एवं राज्य विधानमंडल की विधियों में प्रतिकूलता नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने हेतु विधान अनुच्छेद 253 का विषय है; अनुच्छेद 252 दो या अधिक राज्यों की सहमति से विधि बनाने का उपबंध है। अतः युग्म 2 सुमेलित नहीं है। युग्म 1 एवं 3 सही हैं।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): समवर्ती सूची के किसी विषय पर बनी राज्य की विधि, राष्ट्रपति की अनुमति मिल जाने पर भी संसद द्वारा बाद में निरसित की जा सकती है। कारण (R): अनुच्छेद 255 के अनुसार किसी अधिनियम के लिए अपेक्षित सिफारिश अथवा पूर्व मंजूरी केवल प्रक्रिया का विषय मानी जाती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)(A) सही है — अनुच्छेद 254(2) राज्य विधि को उस राज्य में प्रधानता देता है, किंतु उसका परंतुक संसद की अधिभावी शक्ति सुरक्षित रखता है। (R) भी अपने आप में सही है, किंतु अनुच्छेद 255 सिफारिश/पूर्व मंजूरी की प्रक्रियागत प्रकृति से संबंधित है और (A) की व्याख्या नहीं करता। अतः दोनों सही, पर (R) व्याख्या नहीं।
3. प्रशासनिक संबंध — अनुच्छेद 256 से 263, अखिल भारतीय सेवाएँ एवं परिषदें
विधायी संबंध यह तय करते हैं कि कौन विधि बनाएगा; प्रशासनिक संबंध यह कि कौन उसे लागू कराएगा।
भाग XI का अध्याय II (अनुच्छेद 256–263) यही निर्धारित करता है, और यहीं केंद्र का
निर्देश देने का अधिकार तथा उसकी अवज्ञा का परिणाम (अनुच्छेद 365) छिपा है।
3.1 अनुच्छेद 256 से 261 — अनुच्छेदवार
सुमेलन-तालिका 6 : प्रशासनिक संबंध के अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
परीक्षा-बिंदु
256
राज्यों एवं संघ की बाध्यता — राज्य की कार्यपालिका शक्ति इस प्रकार प्रयुक्त हो कि संसद की विधियों का अनुपालन सुनिश्चित हो; संघ राज्य को इस हेतु निर्देश दे सकता है
केंद्र की “निर्देश-शक्ति” का मूल स्रोत
257(1)
राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार न करे कि संघ की कार्यपालिका शक्ति में बाधा पड़े
—
257(2)
संघ, राज्य को राष्ट्रीय या सैनिक महत्व के संचार-साधनों के निर्माण एवं अनुरक्षण के निर्देश दे सकता है
राष्ट्रीय राजमार्ग एवं राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करने की संसदीय शक्ति अक्षुण्ण
257(3)
राज्य के भीतर रेलों के संरक्षण के लिए निर्देश
257 के चार खंडों में यह तीसरा — बहु-पूछित
257(4)
257(2)/(3) के निर्देशों के पालन में हुए अतिरिक्त व्यय का भुगतान केंद्र करेगा; असहमति पर राशि भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्त मध्यस्थ तय करेगा
“मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्त मध्यस्थ” — यही 258(3) में भी है
257क
राज्यों में संघ के सशस्त्र बलों की तैनाती — 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया और 44वें संशोधन, 1978 द्वारा हटा दिया गया
UPPSC का पसंदीदा “हटाया गया अनुच्छेद” — विकल्प में इसे जीवित बताकर फँसाया जाता है
258
संघ → राज्य : राष्ट्रपति, राज्य सरकार की सहमति से, संघ की कार्यपालिका शक्ति के विषयों के कृत्य राज्य को सौंप सकते हैं
258(2) — संसद की विधि राज्य पर शक्तियाँ/कर्तव्य बिना सहमति भी डाल सकती है
258क
राज्य → संघ : राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से, राज्य के कृत्य संघ को सौंप सकते हैं
7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा जोड़ा गया — मूल संविधान में नहीं था
259
पहली अनुसूची के भाग ख के राज्यों में सशस्त्र बल — 7वें संशोधन, 1956 द्वारा हटाया गया
—
260
भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता — करार द्वारा कार्यपालिका, विधायी या न्यायिक कृत्य ग्रहण
—
261
पूर्ण विश्वास एवं विश्वास (Full Faith and Credit) — खंड 5 में विस्तार से
261(3) — सिविल न्यायालयों की अंतिम डिक्री देश में कहीं भी निष्पादित
365
(भाग XIX) संघ के निर्देशों का अनुपालन न करने पर राष्ट्रपति यह मान सकते हैं कि राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती
यही अनुच्छेद 256/257 को अनुच्छेद 356 से जोड़ता है — निर्देश-शक्ति को “दाँत” यहीं मिलते हैं
केंद्र की निर्देश-शक्ति के चार विषय“विधि–बाधा–संचार–रेल”
विधि का अनुपालन (256) → संघ की शक्ति में बाधा न डालना (257(1)) →
राष्ट्रीय/सैनिक महत्व के संचार-साधन (257(2)) → रेलों का संरक्षण (257(3))।
इन चार में कोई निर्देश न माने तो अनुच्छेद 365 लगता है।
3.2 अखिल भारतीय सेवाएँ — अनुच्छेद 312
अखिल भारतीय सेवा वह है जो संघ एवं राज्यों दोनों के लिए सामान्य हो — भर्ती केंद्र करता है,
नियंत्रण केंद्र एवं राज्य दोनों का, और सदस्य राज्य के संवर्ग (cadre) में काम करते हैं। यह भारतीय संघवाद का
सबसे विशिष्ट एकात्मक तत्व है और इसका कोई समानांतर अमेरिकी या ऑस्ट्रेलियाई संघ में नहीं है।
प्रक्रिया — राज्यसभा“उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के
कम-से-कम दो-तिहाई” से यह घोषित करे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है; तब
संसद विधि द्वारा नई अखिल भारतीय सेवा सृजित कर सकती है।
312(2) — संविधान के प्रारंभ के समय विद्यमान भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS)
तथा भारतीय पुलिस सेवा (IPS) इसी अनुच्छेद के अधीन सृजित मानी जाएँगी।
तीसरी अखिल भारतीय सेवा — भारतीय वन सेवा (IFoS), 1966 में
अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 के अधीन सृजित। आज कुल तीन अखिल भारतीय सेवाएँ हैं।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service) का उल्लेख
42वें संशोधन, 1976 द्वारा अनुच्छेद 312(1) में जोड़ा गया; 312(3) कहता है
कि इसमें ज़िला न्यायाधीश से नीचे का कोई पद नहीं होगा। यह सेवा आज तक गठित नहीं हुई।
312(4) — ऐसी सेवा बनाने वाली विधि भाग VI के अध्याय VI में संशोधन कर सकती है और
वह अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं मानी जाएगी।
अनुच्छेद 312क (28वाँ संशोधन, 1972) — भारत-सचिव द्वारा नियुक्त पुराने अधिकारियों की
सेवा-शर्तों में परिवर्तन की संसदीय शक्ति।
सावधानी — दो जगह “दो-तिहाई” है, पर दोनों जगह वही भाषा
अनुच्छेद 249 (राज्य सूची पर विधि) तथा अनुच्छेद 312 (अखिल भारतीय सेवा) —
दोनों में राज्यसभा का संकल्प “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से अन्यून”
चाहिए। विकल्प में प्रायः “कुल सदस्यता का दो-तिहाई” या “संसद के दोनों सदनों का” रखा जाता है —
दोनों गलत हैं। साथ ही ध्यान दें: संकल्प राज्यसभा पारित करती है, विधि संसद बनाती है —
यह दो अलग चरण हैं।
3.3 अंतर्राज्यीय परिषद — अनुच्छेद 263
अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वे आदेश द्वारा एक परिषद स्थापित करें, जो —
(क) राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच कर सलाह दे; (ख) ऐसे विषयों की
जाँच एवं चर्चा करे जिनमें कुछ या सभी राज्यों का, अथवा संघ और एक-या-अधिक राज्यों का साझा हित हो;
(ग) नीति एवं कार्रवाई के बेहतर समन्वय के लिए सिफ़ारिश करे।
गठन — सरकारिया आयोग की सिफारिश पर 28 मई 1990 के
राष्ट्रपति-आदेश द्वारा अंतर्राज्यीय परिषद स्थापित। ध्यान रहे — यह
संवैधानिक निकाय है, पर स्थायी नहीं; राष्ट्रपति चाहें तो पुनर्गठित कर सकते हैं।
संरचना — प्रधानमंत्री (अध्यक्ष); सभी राज्यों के मुख्यमंत्री;
विधान सभा वाले संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्यमंत्री; विधान सभा रहित संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासक;
तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देशित छह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
स्थायी समिति (1996) — केंद्रीय गृह मंत्री इसके अध्यक्ष; पाँच केंद्रीय
कैबिनेट मंत्री तथा नौ मुख्यमंत्री सदस्य। परिषद का सचिवालय अंतर्राज्यीय परिषद सचिवालय है,
जो गृह मंत्रालय के अधीन है।
परिषद की सिफारिशें अनुशंसात्मक हैं, बाध्यकारी नहीं।
अनुच्छेद 263 का दायरा 262 से अलग है — जल विवाद अनुच्छेद 262 के अधीन
न्यायाधिकरण के पास जाते हैं, अंतर्राज्यीय परिषद के पास नहीं।
3.4 क्षेत्रीय परिषदें — सांविधिक, संवैधानिक नहीं
क्षेत्रीय परिषदें संविधान में नहीं, बल्कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (धारा 15–22) के
अधीन बनी हैं — इसलिए ये सांविधिक (statutory) निकाय हैं। इनका उद्देश्य 1956 के भाषायी
पुनर्गठन के बाद उभरे क्षेत्रीय तनावों को संवाद से सुलझाना था; प्रस्ताव पं. जवाहरलाल नेहरू
का था।
सुमेलन-तालिका 7 : पाँच क्षेत्रीय परिषदें — सदस्य एवं मुख्यालय
क्षेत्रीय परिषद
सदस्य राज्य / संघ राज्यक्षेत्र
मुख्यालय
उत्तरी
हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख
नई दिल्ली
मध्य
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
प्रयागराज
पूर्वी
बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल
कोलकाता
पश्चिमी
गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव
मुंबई
दक्षिणी
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पुदुच्चेरी
चेन्नई
पूर्वोत्तर परिषद(पृथक्)
असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा तथा सिक्किम (2002 में जोड़ा गया)
शिलांग
अध्यक्ष — पाँचों क्षेत्रीय परिषदों का अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होता है।
उपाध्यक्ष — सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री, बारी-बारी से एक-एक वर्ष के लिए।
प्रत्येक राज्य से मुख्यमंत्री तथा दो अन्य मंत्री सदस्य होते हैं; संघ राज्यक्षेत्रों से दो सदस्य।
नीति आयोग का एक नामनिर्देशित सदस्य तथा राज्यों के मुख्य सचिव सलाहकार होते हैं (मत का अधिकार नहीं)।
पूर्वोत्तर परिषद क्षेत्रीय परिषदों में नहीं गिनी जाती — वह
पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम, 1971 से बनी अलग संस्था है। सिक्किम को
2002 के संशोधन द्वारा इसमें जोड़ा गया। ध्यान दें — सिक्किम किसी क्षेत्रीय परिषद का सदस्य नहीं है।
क्षेत्रीय परिषदों की प्रकृति विचार-विमर्शकारी एवं परामर्शदात्री है।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज
मध्य क्षेत्रीय परिषद (Central Zonal Council) का मुख्यालय प्रयागराज
(पूर्व नाम इलाहाबाद) में है और उसके चार सदस्य राज्य हैं — उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड,
मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़। यह उत्तर प्रदेश से जुड़ा सबसे सीधा “केंद्र-राज्य संस्था” वाला तथ्य है
और UPPSC में सुमेलन-प्रश्न के रूप में आता है — विकल्प में प्रायः लखनऊ या भोपाल रखा जाता है।
ध्यान रखें कि 1956 में यह परिषद बनी तब इसके सदस्य केवल उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश थे;
2000 के पुनर्गठन के बाद उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ जुड़े। सभी परिषदों का
साझा सचिवालय 1963 से नई दिल्ली में कार्य करता है — “मुख्यालय” और “सचिवालय” को गड्डमड्ड न करें।
3.5 केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने वाली समितियाँ
1969राजमन्नार समिति — तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित (अध्यक्ष — न्यायमूर्ति पी.वी. राजमन्नार); 1971 में रिपोर्ट। माँगें — अंतर्राज्यीय परिषद तुरंत बने, वित्त आयोग स्थायी हो, अनुच्छेद 356/357/365 हटाए जाएँ, अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त हों
1973आनंदपुर साहिब प्रस्ताव — शिरोमणि अकाली दल (16–17 अक्टूबर 1973); केंद्र केवल रक्षा, विदेश, संचार, मुद्रा एवं रेल तक सीमित रहे, शेष सब राज्यों के पास
1977पश्चिम बंगाल ज्ञापन — “संघ” शब्द के स्थान पर “परिसंघ”, संसद की शक्ति रक्षा-विदेश-मुद्रा-संचार तक सीमित, राज्यसभा को लोकसभा के बराबर शक्ति
1983–88सरकारिया आयोग — जून 1983 में गठित (न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया, शिवरामन, एस.आर. सेन); 1988 में रिपोर्ट, 247 सिफारिशें। निष्कर्ष — संघीय ढाँचा बदलने की नहीं, ढंग बदलने की आवश्यकता है। प्रमुख सुझाव — अनुच्छेद 356 “अत्यंत विरल परिस्थितियों” में; अंतर्राज्यीय परिषद का गठन; राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री से परामर्श; अवशिष्ट कर-शक्ति संसद के पास रहे
2007–10पुंछी आयोग — अप्रैल 2007 में गठित (पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी); 30 मार्च 2010 को सात खंडों की रिपोर्ट। प्रमुख सुझाव — राज्यपाल की पदावधि सुरक्षित हो एवं हटाने के लिए विधान सभा का महाभियोग-सदृश तंत्र; “स्थानिक आपात” (localised emergency) की अवधारणा, ताकि पूरे राज्य पर 356 न लगाना पड़े; समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों से परामर्श; अनुच्छेद 19 एवं 355 पर स्पष्टता
परीक्षा-दृष्टि
UPPSC में बहु-पूछित: मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज;
क्षेत्रीय परिषदें सांविधिक हैं, संवैधानिक नहीं; अंतर्राज्यीय परिषद अनुच्छेद 263 से,
1990 में सरकारिया की सिफारिश पर; अखिल भारतीय सेवाएँ तीन (IAS, IPS, IFoS — 1966);
अनुच्छेद 257क को 42वें ने जोड़ा और 44वें ने हटाया; तथा
सरकारिया (1983) बनाम पुंछी (2007) का कालक्रम।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (क्षेत्रीय परिषद) सूची-II (मुख्यालय) A. उत्तरी क्षेत्रीय परिषद 1. प्रयागराज B. मध्य क्षेत्रीय परिषद 2. कोलकाता C. पूर्वी क्षेत्रीय परिषद 3. नई दिल्ली D. पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद 4. मुंबई कूट:
उत्तर: (D)उत्तरी — नई दिल्ली; मध्य — प्रयागराज; पूर्वी — कोलकाता; पश्चिमी — मुंबई (दक्षिणी — चेन्नई)। अतः A-3, B-1, C-2, D-4 सही है।
प्र.2अखिल भारतीय सेवाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. नई अखिल भारतीय सेवा के सृजन हेतु राज्यसभा का संकल्प उसके कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है। 2. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख अनुच्छेद 312 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 312(1) में बहुमत “उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई” है, कुल सदस्यता का नहीं — कथन 1 गलत। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख 42वें संशोधन (1976) ने जोड़ा और 312(3) के अनुसार उसमें ज़िला न्यायाधीश से नीचे कोई पद नहीं होगा — कथन 2 सही।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (आयोग/समिति) (गठन वर्ष) 1. राजमन्नार समिति — 1979 2. सरकारिया आयोग — 1983 3. पुंछी आयोग — 2007 नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)राजमन्नार समिति 1969 में तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित हुई थी (रिपोर्ट 1971), 1979 में नहीं — अतः युग्म 1 सुमेलित नहीं है। सरकारिया आयोग जून 1983 में तथा पुंछी आयोग अप्रैल 2007 में गठित हुए (पुंछी की रिपोर्ट 30 मार्च 2010) — ये दोनों युग्म सही हैं।
4. वित्तीय संबंध — करों का विभाजन, वित्त आयोग एवं GST परिषद
संविधान का भाग XII (अनुच्छेद 264–300क) वित्त, संपत्ति, संविदा एवं वाद से संबंधित है;
इसका अध्याय I (264–293) वित्तीय संबंधों का है। संघीय व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह होती है
कि राजस्व की शक्तियाँ ऊपर केंद्रित होती हैं और व्यय के दायित्व नीचे — इसी
ऊर्ध्वाधर असंतुलन (vertical imbalance) को पाटने के लिए वित्त आयोग की व्यवस्था है।
4.1 कराधान शक्तियों का विभाजन — तीन मूल नियम
अनुच्छेद 265 — “विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर न तो लगाया जाएगा, न वसूला जाएगा।”
केवल कार्यपालिका के आदेश से कर नहीं लग सकता।
संघ सूची में कर-प्रविष्टियाँ अलग हैं और राज्य सूची में अलग। समवर्ती सूची में
सामान्यतः कर लगाने की शक्ति नहीं है — एकमात्र उल्लेखनीय अपवाद प्रविष्टि 44 (न्यायिक स्टांप से
भिन्न स्टांप शुल्क) है। GST के आने से यह चित्र बदला — अनुच्छेद 246क ने समवर्ती कर-शक्ति बनाई।
अवशिष्ट कर-शक्ति संसद के पास — अनुच्छेद 248(2) तथा संघ सूची की प्रविष्टि 97।
उपहार कर तथा प्रतिभूति संव्यवहार कर इसी शक्ति से आए।
संविधान राज्यों की कर-शक्ति पर कुछ सीमाएँ भी लगाता है — अनु. 276(2) : वृत्ति कर
(professions tax) अधिकतम ₹2,500 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष (60वें संविधान संशोधन,
1988 द्वारा ₹250 से बढ़ाया गया); अनु. 286 : राज्य-बाह्य बिक्री एवं आयात-निर्यात पर
राज्य कर नहीं लगा सकते; अनु. 287, 288, 289 : विद्युत, जल-संग्रहण एवं संघ की संपत्ति पर
राज्य-कर की सीमाएँ।
4.2 अनुच्छेद 268 से 281 — यह तालिका अलग से याद करें
सुमेलन-तालिका 8 : राजस्व के वितरण से संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
निर्णायक बिंदु
268
संघ द्वारा उद्ग्रहीत किंतु राज्यों द्वारा संगृहीत एवं विनियोजित शुल्क
अब इसमें केवल संघ सूची में उल्लिखित स्टांप शुल्क आते हैं; “औषधीय एवं प्रसाधन निर्मितियों पर उत्पाद शुल्क” वाले शब्द 101वें संशोधन, 2016 ने हटा दिए। यह आय भारत की संचित निधि का भाग नहीं बनती
268क
सेवा कर — 88वें संशोधन, 2003 द्वारा जोड़ा गया
कभी प्रवृत्त ही नहीं हुआ और 101वें संशोधन, 2016 द्वारा हटा दिया गया — प्रश्न में इसे जीवित बताकर फँसाया जाता है
269
संघ द्वारा उद्ग्रहीत एवं संगृहीत, किंतु राज्यों को सौंपे गए कर — अंतर्राज्यीय व्यापार में माल की बिक्री/क्रय तथा परेषण पर कर
80वें संशोधन, 2000 द्वारा वर्तमान रूप; 269क के अधीन GST इससे बाहर
269क
अंतर्राज्यीय व्यापार में GST (IGST) — संघ सरकार उद्ग्रहीत एवं संगृहीत करेगी तथा संघ एवं राज्यों के बीच बँटवारा होगा
101वाँ संशोधन, 2016। आयात को भी अंतर्राज्यीय आपूर्ति माना गया है। बँटवारा GST परिषद की सिफारिश पर संसद की विधि से
270
संघ एवं राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर — यही “विभाज्य पूल (divisible pool)” है
268, 269 एवं 269क के कर तथा अनु. 271 का अधिभार और कोई भी उपकर इसमें नहीं आते — यही आज की सबसे बड़ी संघीय शिकायत है। 270(1क) एवं (1ख) GST को भी विभाज्य पूल में लाते हैं
271
संघ के प्रयोजनों के लिए कुछ शुल्कों एवं करों पर अधिभार (surcharge)
अधिभार की पूरी आय भारत की संचित निधि में; राज्यों को हिस्सा नहीं। 101वें संशोधन ने अनु. 246क के GST को इससे बाहर कर दिया
272
संघ द्वारा उद्ग्रहीत एवं संगृहीत कर जो संघ एवं राज्यों में बाँटे जा सकते थे
80वें संशोधन, 2000 द्वारा हटाया गया
273
जूट एवं जूट-उत्पादों के निर्यात शुल्क के बदले अनुदान
केवल असम, बिहार, ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल — चार राज्य; भारत की संचित निधि पर भारित
274
जिन करों में राज्यों का हित है, उन्हें प्रभावित करने वाले विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश
—
275
संघ से कुछ राज्यों को सांविधिक अनुदान (statutory grants)
भारत की संचित निधि पर भारित। पहला परंतुक — अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष अनुदान; दूसरा परंतुक — असम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष उपबंध
276
वृत्ति, व्यापार, आजीविका एवं नियोजन पर कर
अधिकतम ₹2,500 प्रति वर्ष (60वाँ संशोधन, 1988)
279
“शुद्ध आगम (net proceeds)” की गणना
प्रमाणन भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा, और उसका प्रमाणपत्र अंतिम
279क
वस्तु एवं सेवा कर परिषद
नीचे 4.3 में विस्तार से
280
वित्त आयोग
नीचे 4.4 में विस्तार से
281
वित्त आयोग की सिफारिशें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएँगी, साथ में की गई कार्रवाई का व्याख्यात्मक ज्ञापन
—
282
विवेकाधीन अनुदान (discretionary grants) — संघ या राज्य किसी भी लोक प्रयोजन के लिए अनुदान दे सकते हैं, भले ही वह विषय उनकी विधायी शक्ति में न हो
केंद्र प्रायोजित योजनाओं का संवैधानिक आधार; राज्यों की शिकायत यही है कि इससे राज्य-सूची के विषयों में केंद्र प्रवेश कर लेता है
293
राज्यों द्वारा उधार लेना
यदि राज्य पर केंद्र का कोई ऋण बकाया है तो वह केंद्र की सहमति के बिना उधार नहीं ले सकता
करों के चार वर्ग — किसका उद्ग्रहण, किसका संग्रहण, किसकी आय“268 सौंपा · 269 दिया · 270 बाँटा · 271 रखा”
268 — संघ लगाता है, राज्य वसूलते हैं और रख लेते हैं (स्टांप शुल्क)।
269 — संघ लगाता भी है, वसूलता भी है, पर पूरी आय राज्यों को दे देता है।
270 — संघ लगाता एवं वसूलता है, फिर वित्त आयोग के सूत्र से बाँटता है।
271 — अधिभार, जिसकी पूरी आय संघ अपने पास रखता है। यही अनुक्रम याद रहे तो
“कौन-सा कर किसका” वाला हर प्रश्न हल हो जाता है।
4.3 वस्तु एवं सेवा कर एवं GST परिषद — अनुच्छेद 279क
101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 (राष्ट्रपति की अनुमति 8 सितंबर 2016)
भारतीय वित्तीय संघवाद का सबसे बड़ा पुनर्गठन है। इसने —
अनुच्छेद 246क जोड़ा — संघ एवं राज्य दोनों को GST पर विधि बनाने की समवर्ती शक्ति;
अंतर्राज्यीय आपूर्ति पर केवल संसद।
अनुच्छेद 269क जोड़ा — IGST तथा उसका बँटवारा।
अनुच्छेद 279क जोड़ा — GST परिषद।
अनुच्छेद 268क तथा 272 हटाए; 268, 269, 270, 271 में संशोधन; संघ सूची की प्रविष्टि 92 एवं
92ग तथा राज्य सूची की प्रविष्टि 52 एवं 55 हटाईं।
राज्यों को होने वाली राजस्व-हानि के लिए पाँच वर्ष तक प्रतिकर (compensation) का उपबंध किया
(संशोधन की धारा 18) — यह अवधि जून 2022 में समाप्त हुई; उसके बाद प्रतिकर उपकर केवल
पूर्व में लिए गए ऋण की अदायगी के लिए जारी रहा।
GST 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ। यह गंतव्य-आधारित (destination-based)
उपभोग कर है — इसका सीधा अर्थ यह है कि उपभोक्ता राज्य लाभ में रहते हैं और
विनिर्माता राज्य प्रारंभ में हानि में। उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल जैसे बड़े उपभोक्ता राज्य
इस बदलाव से लाभान्वित हुए, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात एवं तमिलनाडु ने आपत्ति की थी।
सुमेलन-तालिका 9 : GST परिषद — अनुच्छेद 279क का ढाँचा
बिंदु
उपबंध
गठन
101वें संशोधन के प्रारंभ से 60 दिन के भीतर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा
अध्यक्ष
केंद्रीय वित्त मंत्री
सदस्य
राजस्व या वित्त का प्रभार रखने वाले केंद्रीय राज्य मंत्री; तथा प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित वित्त/कराधान मंत्री या कोई अन्य मंत्री
उपाध्यक्ष
राज्यों के सदस्य स्वयं अपने में से चुनते हैं — केंद्र नियुक्त नहीं करता
गणपूर्ति (quorum)
कुल सदस्यों का आधा (1/2)
निर्णय
उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों के तीन-चौथाई (3/4) से अन्यून बहुमत
मत-भार
केंद्र सरकार — कुल डाले गए मतों का 1/3; सभी राज्य मिलकर — 2/3। अर्थात् केंद्र अकेले प्रस्ताव पारित नहीं करा सकता, पर वीटो कर सकता है (क्योंकि 3/4 के लिए केंद्र का समर्थन अनिवार्य है)
विशेष उल्लेख
279क(4)(छ) में अरुणाचल प्रदेश, असम, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए विशेष उपबंध की सिफारिश का अधिकार
पाँच वस्तुएँ अब भी बाहर
279क(5) — कच्चा पेट्रोलियम, हाई-स्पीड डीज़ल, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस तथा विमानन टरबाइन ईंधन; इन पर GST की तिथि परिषद सिफारिश करेगी। (शराब संविधान से ही बाहर है)
विवाद-निवारण
279क(11) — परिषद स्वयं ऐसा तंत्र स्थापित करेगी जो केंद्र-राज्य तथा राज्य-राज्य विवाद निपटाए
मोहित मिनरल्स बनाम भारत संघ (2022) — उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि
GST परिषद की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं, केवल प्रेरक (persuasive) हैं; संसद एवं राज्य
विधानमंडल दोनों के पास GST पर समान विधायी शक्ति है। यह निर्णय “सहकारी संघवाद” की संवैधानिक सीमा बताता है।
नवीनतम स्थिति (2025–26) — GST परिषद की 56वीं बैठक (3 सितंबर 2025, नई दिल्ली)
में “अगली पीढ़ी के GST सुधार” स्वीकृत हुए: 12% एवं 28% के स्लैब समाप्त, अधिकांश वस्तुएँ
5% या 18% में; तम्बाकू, पान मसाला जैसी अवगुण वस्तुओं के लिए 40% की
पृथक् दर। अधिकांश परिवर्तन 22 सितंबर 2025 से प्रभावी हुए।
4.4 वित्त आयोग — अनुच्छेद 280
वित्त आयोग वह संवैधानिक तंत्र है जो केंद्र-राज्य वित्तीय असंतुलन को हर पाँच वर्ष पर पुनः संतुलित करता है।
डॉ. अंबेडकर ने इसे “संतुलनकारी चक्र (balancing wheel)” कहा था।
गठन — राष्ट्रपति द्वारा, संविधान के प्रारंभ से दो वर्ष के भीतर तथा
उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष या उससे पहले, जब वे आवश्यक समझें।
संरचना — एक अध्यक्ष एवं चार अन्य सदस्य। (योग्यताएँ एवं सभी आयोगों का
ब्योरा अध्याय 4.6 में।)
कार्य (280(3)) — (क) संघ एवं राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगम का वितरण तथा राज्यों
के बीच उनका आवंटन; (ख) सहायता-अनुदान के सिद्धांत; (खख) राज्य की संचित निधि को बढ़ाने
के उपाय ताकि पंचायतों के संसाधन बढ़ें — 73वाँ संशोधन, 1992;
(ग) वही नगरपालिकाओं के लिए — 74वाँ संशोधन, 1992;
(घ) राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट कोई अन्य विषय।
प्रकृति — सिफारिशें अनुशंसात्मक हैं; सरकार पर बाध्यकारी नहीं।
अनुच्छेद 281 के अधीन उन्हें कृत-कार्रवाई ज्ञापन सहित संसद में रखा जाता है।
16वाँवर्तमान वित्त आयोग
2023गठन — 31 दिसंबर
41%राज्यों का ऊर्ध्वाधर हिस्सा
2026–31अवधि (1 अप्रैल 2026 से)
17.62%उत्तर प्रदेश का हिस्सा — सर्वाधिक
16वाँ वित्त आयोग — अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया (नीति आयोग के
पूर्व उपाध्यक्ष); 31 दिसंबर 2023 को गठित। रिपोर्ट 17 नवंबर 2025 को
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी गई और 1 फरवरी 2026 को संसद के समक्ष रखी गई।
अवधि — 2026-27 से 2030-31।
ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण — विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41%
(15वें आयोग के बराबर)।
क्षैतिज मानदंड एवं भार — आय-दूरी 42.5%, जनसंख्या (2011)
17.5%, जनसांख्यिकीय निष्पादन 10%, क्षेत्रफल 10%,
वन एवं पारिस्थितिकी 10%, तथा नया मानदंड सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 10%।
यह अंतिम मानदंड पहली बार जोड़ा गया और उसने पुराने “कर एवं राजकोषीय प्रयास” का स्थान लिया।
राज्यवार हिस्सा — उत्तर प्रदेश 17.62% (सर्वाधिक), बिहार 9.95%,
मध्य प्रदेश 7.35%, महाराष्ट्र 6.44%।
15वाँ वित्त आयोग — अध्यक्ष एन.के. सिंह; अवधि 2021–26; राज्यों का
हिस्सा 41% (जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के संघ राज्यक्षेत्र बनने के बाद 14वें आयोग के 42% से 1% घटाकर)।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — वित्तीय संघवाद में UP की जगह
16वें वित्त आयोग की सिफारिश में उत्तर प्रदेश को केंद्रीय करों के विभाज्य पूल का
17.62% मिलेगा — यह सभी राज्यों में सर्वाधिक है। कारण दो हैं:
आय-दूरी मानदंड (42.5% भार) में UP की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है, और
जनसंख्या मानदंड में वह सबसे बड़ा राज्य है।
यही तथ्य 16वें आयोग के नए मानदंड “सकल घरेलू उत्पाद में योगदान” (10%) को
महत्वपूर्ण बनाता है — यह मानदंड बड़े उत्पादक राज्यों के पक्ष में झुकता है, अतः इससे UP का शुद्ध लाभ
कुछ घटता है।
GST के गंतव्य-आधारित होने से उत्तर प्रदेश को संरचनात्मक लाभ हुआ है, क्योंकि वह
देश का सबसे बड़ा उपभोक्ता राज्य है — कर वहाँ मिलता है जहाँ वस्तु की खपत होती है,
न कि जहाँ वह बनी।
राज्यों की साझा शिकायत — उपकर एवं अधिभार (अनु. 271) विभाज्य पूल से बाहर रहते हैं,
इसलिए 41% “कागज़ पर” जितना दिखता है, वास्तविक हस्तांतरण उससे कम बैठता है। जून 2025 में
16वें वित्त आयोग के साथ बैठक में उत्तर प्रदेश ने भी अधिक संसाधनों की माँग रखी थी।
परीक्षा-दृष्टि
UPPSC में बहु-पूछित: अनु. 280 — अध्यक्ष + चार सदस्य; अनु. 275 भारित, अनु. 282 विवेकाधीन
(यही युग्म उलटकर पूछा जाता है); GST परिषद में केंद्र का मत-भार 1/3 एवं निर्णय 3/4 भारित मतों से;
101वें संशोधन ने 268क एवं 272 हटाए; वृत्ति कर की सीमा ₹2,500 — 60वाँ संशोधन;
तथा 16वें वित्त आयोग की 41% ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी एवं छह क्षैतिज मानदंड।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1GST परिषद (अनुच्छेद 279क) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. परिषद का प्रत्येक निर्णय उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों के दो-तिहाई बहुमत से लिया जाता है। 2. केंद्र सरकार के मत का भार कुल डाले गए मतों का दो-तिहाई होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 279क(9) के अनुसार निर्णय तीन-चौथाई भारित मतों से होता है, दो-तिहाई से नहीं — कथन 1 गलत। और केंद्र का मत-भार 1/3 है, सभी राज्यों का मिलाकर 2/3 — कथन 2 भी गलत। दोनों जगह “दो-तिहाई” रखकर ही जाल बनाया जाता है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विषय) 1. अनुच्छेद 275 — संघ से कुछ राज्यों को सांविधिक अनुदान 2. अनुच्छेद 280 — वित्त आयोग का गठन 3. अनुच्छेद 271 — राज्यों को सौंपे जाने वाले कर नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 271 संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार से संबंधित है, जिसकी पूरी आय भारत की संचित निधि में जाती है — राज्यों को हिस्सा नहीं मिलता। “राज्यों को सौंपे जाने वाले कर” अनुच्छेद 269 हैं। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
प्र.316वें वित्त आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसकी सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से आरंभ होने वाले पाँच वर्षों के लिए हैं और इसने विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41% रखा है। 2. इसने क्षैतिज वितरण में “सकल घरेलू उत्पाद में योगदान” को पहली बार एक मानदंड बनाया है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग की अवधि 2026-27 से 2030-31 है, ऊर्ध्वाधर हिस्सा 41% (15वें के बराबर), और “GDP में योगदान” (10% भार) पहली बार जोड़ा गया मानदंड है। अतः दोनों कथन सही हैं।
5. अंतर्राज्यीय संबंध — जल विवाद, व्यापार-वाणिज्य एवं पूर्ण विश्वास
संघीय व्यवस्था केवल “केंद्र बनाम राज्य” नहीं है; “राज्य बनाम राज्य” भी उतना ही बड़ा प्रश्न है।
संविधान इसके लिए चार तंत्र देता है — पूर्ण विश्वास एवं विश्वास (261), जल विवाद न्यायाधिकरण (262),
अंतर्राज्यीय परिषद (263, खंड 3 में देख चुके हैं) तथा व्यापार-वाणिज्य की स्वतंत्रता (301–307)।
5.1 अनुच्छेद 261 — पूर्ण विश्वास एवं विश्वास
261(1) — संघ तथा प्रत्येक राज्य के लोक अधिनियमों, अभिलेखों एवं न्यायिक
कार्यवाहियों को सम्पूर्ण भारत में पूर्ण विश्वास एवं विश्वास दिया जाएगा।
261(2) — इन्हें साबित करने की रीति एवं शर्तें संसद विधि द्वारा तय करेगी।
261(3) — भारत के किसी भी भाग के सिविल न्यायालयों द्वारा दी गई
अंतिम डिक्री या आदेश भारत में कहीं भी निष्पादित किए जा सकेंगे।
सावधानी — 261(3) में “सिविल न्यायालय” लिखा है; दांडिक (criminal)
निर्णय इसमें नहीं आते। यह वाक्यांश ही प्रश्न बनता है।
5.2 अनुच्छेद 262 — अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद
262(1) — संसद विधि द्वारा अंतर्राज्यीय नदी या नदी-घाटी के जल के
उपयोग, वितरण या नियंत्रण संबंधी विवादों के न्यायनिर्णयन का उपबंध कर सकती है।
262(2) — संसद विधि द्वारा यह उपबंध कर सकती है कि ऐसे विवाद में
न तो उच्चतम न्यायालय और न ही कोई अन्य न्यायालय अधिकारिता का प्रयोग करेगा।
यह संविधान में न्यायालय की अधिकारिता को स्पष्ट रूप से वर्जित करने वाला दुर्लभ उपबंध है।
इस शक्ति से संसद ने दो विधियाँ बनाईं — नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (सलाहकार बोर्ड के लिए;
आज तक एक भी बोर्ड नहीं बना) तथा अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956
(न्यायाधिकरण के लिए)।
महत्वपूर्ण भेद — अनुच्छेद 262(2) उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 131 वाली
अधिकारिता हटाता है, किंतु अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका) तथा
अनुच्छेद 32/226 के अधीन न्यायालय पूर्णतः बाहर नहीं होता — न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय
पर SLP सुनी जाती रही है।
1956 के अधिनियम में 2002 का संशोधन महत्वपूर्ण है — इसने
एक वर्ष के भीतर न्यायाधिकरण गठित करने तथा तीन वर्ष (अधिकतम दो वर्ष और)
में अधिनिर्णय देने की समय-सीमा जोड़ी, और अधिनिर्णय को उच्चतम न्यायालय की डिक्री के समान बल दिया।
अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 — इसमें सभी न्यायाधिकरणों के स्थान पर
एक स्थायी न्यायाधिकरण तथा विवाद-समाधान समिति (DRC) का प्रस्ताव था। यह
लोकसभा में 31 जुलाई 2019 को पारित हुआ, पर राज्यसभा में लंबित रह गया और
17वीं लोकसभा के विघटन (जून 2024) के साथ व्यपगत हो गया। अतः आज भी
1956 का मूल अधिनियम ही प्रवृत्त है।
सुमेलन-तालिका 10 : जल विवाद न्यायाधिकरण — गठन वर्ष एवं संबंधित राज्य
न्यायाधिकरण
गठन
संबंधित राज्य
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण – I
1969
महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश
गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण
1969
महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण
1969 (अक्टूबर)
गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान
रावी एवं ब्यास जल न्यायाधिकरण
1986
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण
1990
कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुदुच्चेरी
कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण – II
2004
महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश (बाद में तेलंगाना)
वंशधारा जल विवाद न्यायाधिकरण
2010 (फरवरी)
ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश
महादायी जल विवाद न्यायाधिकरण
2010 (नवंबर)
गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र
महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण
2018 (मार्च)
ओडिशा एवं छत्तीसगढ़
जल न्यायाधिकरणों का कालक्रम“कृष्णा-गोदावरी-नर्मदा (69) · रावी-ब्यास (86) · कावेरी (90) · वंशधारा-महादायी (2010) · महानदी (2018)”
1969 में तीन एक साथ बने — कृष्णा, गोदावरी एवं नर्मदा। फिर बड़ा अंतराल, और
1986 में रावी-ब्यास, 1990 में कावेरी। इक्कीसवीं सदी में — 2004 (कृष्णा-II), 2010 में दो
(वंशधारा फरवरी, महादायी नवंबर), 2018 में महानदी। कुल नौ।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — जल-साझेदारी में UP
उत्तर प्रदेश किसी औपचारिक जल विवाद न्यायाधिकरण का पक्षकार नहीं रहा — उसके जल-प्रश्न
मुख्यतः समझौता-ज्ञापन एवं नदी बोर्डों से सुलझे हैं। यही तथ्य प्रश्न बनता है:
“निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य कावेरी/कृष्णा न्यायाधिकरण का पक्षकार है?” — UP कभी नहीं।
ऊपरी यमुना नदी बोर्ड (Upper Yamuna River Board) — 1994 के अंतर्राज्यीय समझौते के
आधार पर 1995 में गठित; सदस्य — उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान
तथा दिल्ली। यह यमुना के जल-बँटवारे की निगरानी करता है और
जल शक्ति मंत्रालय के अधीन है।
केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना — देश की पहली नदी-जोड़ परियोजना; केंद्र,
मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के बीच 22 मार्च 2021 (विश्व जल दिवस) को
समझौता-ज्ञापन हुआ। इससे बुंदेलखंड के UP के ज़िलों — बाँदा, महोबा, झाँसी, ललितपुर —
को सिंचाई जल मिलेगा। यह अनुच्छेद 262 की न्यायिक राह के बजाय सहकारी राह का उदाहरण है।
उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के बीच उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के अधीन
सिंचाई-परिसंपत्तियों के बँटवारे के प्रश्न लंबे समय तक चले — यह “राज्य पुनर्गठन के बाद के
अंतर्राज्यीय समायोजन” का अच्छा उदाहरण है।
5.3 अनुच्छेद 301 से 307 — व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता
संविधान का भाग XIII यह सुनिश्चित करता है कि भारत एक आर्थिक इकाई बना रहे —
राज्य-सीमाएँ व्यापार की दीवार न बनें। यह विचार ऑस्ट्रेलियाई संविधान की धारा 92 से लिया गया है।
सुमेलन-तालिका 11 : भाग XIII के सात अनुच्छेद
अनुच्छेद
उपबंध
निर्णायक बिंदु
301
भारत के राज्यक्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य एवं समागम स्वतंत्र होगा — “इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए”
“स्वतंत्र” का अर्थ “करमुक्त” नहीं — जिंदल स्टेनलेस (2016)
302
संसद लोक-हित में व्यापार पर निर्बंधन लगा सकती है
—
303(1)
न संसद, न राज्य विधानमंडल — कोई भी एक राज्य को दूसरे पर अधिमान नहीं दे सकता
यह 302 पर भी सीमा है
303(2)
अपवाद — संसद ऐसा कर सकती है यदि विधि में यह घोषित हो कि देश के किसी भाग में माल की कमी से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए यह आवश्यक है
यह छूट केवल संसद को है, राज्य को नहीं — बहु-पूछित
304(क)
राज्य अन्य राज्यों से आयातित माल पर वही कर लगा सकता है जो उसी राज्य में बने माल पर लगता है — किंतु विभेद नहीं कर सकता
विभेदकारी कर 304(ख) की प्रक्रिया से भी नहीं बच सकता
304(ख)
राज्य लोक-हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है — किंतु ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुरःस्थापित नहीं होगा
“पूर्व मंजूरी” (previous sanction) — यह शब्द याद रखें
305
विद्यमान विधियों तथा राज्य के एकाधिकार संबंधी विधियों की व्यावृत्ति
चौथे संविधान संशोधन, 1955 द्वारा वर्तमान रूप — राज्य-एकाधिकार को संरक्षण
306
पहली अनुसूची के भाग ख के राज्यों की शक्ति
7वें संशोधन, 1956 द्वारा हटाया गया
307
अनुच्छेद 301–304 के प्रयोजनों के लिए संसद प्राधिकारी नियुक्त कर सकती है
आज तक ऐसा कोई प्राधिकारी नियुक्त नहीं हुआ — यह प्रश्न बार-बार आता है
अतिआबारी टी कंपनी बनाम असम राज्य (1961) — अनुच्छेद 301 केवल
आवागमन-कर (movement tax) तक सीमित नहीं; व्यापार में प्रत्यक्ष एवं तात्कालिक बाधा डालने वाला
कर भी 301 के दायरे में है।
ऑटोमोबाइल ट्रांसपोर्ट (राजस्थान) बनाम राजस्थान राज्य (1962) — इसने
“प्रतिकरात्मक कर (compensatory tax)” का सिद्धांत गढ़ा: यदि कर के बदले सुविधा
(जैसे सड़क) दी जा रही है तो वह 301 का उल्लंघन नहीं।
जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (11 नवंबर 2016) —
नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 7:2 से प्रतिकरात्मक कर के सिद्धांत को
पूर्णतः अस्वीकृत कर दिया। निष्कर्ष — अनुच्छेद 301 का “स्वतंत्र” शब्द “करमुक्त” नहीं;
केवल विभेदकारी कर 304(क) से वर्जित हैं; तथा 304(क) एवं 304(ख) को
अलग-अलग (disjunctively) पढ़ा जाएगा — 304(क) का उल्लंघन 304(ख) की प्रक्रिया से नहीं बचाया जा सकता।
इसी निर्णय ने प्रवेश कर (entry tax) को वैध ठहराया।
GST का प्रभाव — प्रवेश कर, चुंगी, केंद्रीय बिक्री कर आदि GST में समा जाने से
भाग XIII के विवाद व्यावहारिक रूप से बहुत घट गए हैं; “एक राष्ट्र, एक कर” वस्तुतः अनुच्छेद 301 के
लक्ष्य की ही पूर्ति है।
सावधानी — 302, 303 एवं 304 का क्रम उलटकर पूछा जाता है
302 संसद को निर्बंधन की शक्ति देता है; 304 राज्य को।
303 दोनों पर अधिमान/विभेद का निषेध लगाता है, और उसका अपवाद केवल संसद के
लिए है (माल की कमी की स्थिति में)।
304(ख) में “राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी” चाहिए — “राष्ट्रपति की अनुमति (assent)” नहीं।
अनुमति विधेयक पारित होने के बाद मिलती है, मंजूरी पुरःस्थापन से पहले।
अनुच्छेद 307 का प्राधिकारी आज तक नहीं बना — इसे “गठित हो चुका है” बताने वाला विकल्प जाल है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1निम्नलिखित जल विवाद न्यायाधिकरणों को उनके गठन के सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए। 1. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण 2. नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण 3. महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण 4. रावी एवं ब्यास जल न्यायाधिकरण नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A2, 4, 1, 3B4, 2, 3, 1C4, 2, 1, 3D2, 4, 3, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)नर्मदा (1969) → रावी-ब्यास (1986) → कावेरी (1990) → महानदी (2018)। अतः 2, 4, 1, 3 सही क्रम है।
प्र.2भाग XIII के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. अनुच्छेद 307 के अधीन संसद ने व्यापार एवं वाणिज्य संबंधी एक प्राधिकारी नियुक्त कर दिया है। 2. अनुच्छेद 304(ख) के अधीन कोई विधेयक राज्य विधानमंडल में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 307 के अधीन आज तक कोई प्राधिकारी नियुक्त नहीं हुआ — कथन 1 गलत। अनुच्छेद 304(ख) के परंतुक में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अनिवार्य है — कथन 2 सही।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (2016) में उच्चतम न्यायालय ने “प्रतिकरात्मक कर” के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए राज्यों द्वारा लगाए गए प्रवेश कर को अवैध ठहराया। कारण (R): न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 301 में प्रयुक्त “स्वतंत्र” शब्द का अर्थ “करों से मुक्त” नहीं है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 7:2 से प्रतिकरात्मक कर का सिद्धांत अस्वीकृत किया और प्रवेश कर को वैध ठहराया — अतः (A) गलत है। (R) सही है: न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 301 का “स्वतंत्र” शब्द करमुक्ति नहीं दर्शाता, और केवल विभेदकारी कर ही अनुच्छेद 304(क) से वर्जित हैं।
6. विशेष उपबंध वाले राज्य — अनुच्छेद 371 से 371ञ
संविधान का भाग XXI (अनुच्छेद 369–392) “अस्थायी, संक्रमणकालीन एवं विशेष उपबंध” का है।
इसी में अनुच्छेद 371 से 371ञ तक बारह राज्यों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ हैं।
यह भारतीय संघवाद की सबसे विशिष्ट प्रवृत्ति है — असमानुपाती या विषम संघवाद
(asymmetric federalism), अर्थात् सभी राज्यों के साथ एक-सा व्यवहार नहीं, बल्कि उनकी
ऐतिहासिक एवं सामाजिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग।
इन उपबंधों का उद्देश्य दो में से एक होता है — या तो क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना
(विकास बोर्ड, स्थानीय नियोजन), या जनजातीय पहचान एवं रूढ़िजन्य विधि की रक्षा करना।
रूढ़िजन्य विधि, भूमि एवं सामाजिक प्रथाओं का संरक्षणक्षेत्रीय असंतुलन — विकास बोर्ड / परिषदविधान सभा की क्षेत्रीय समितिराज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व / विधान सभा का न्यूनतम आकारस्थानीय संवर्ग — नियोजन एवं शिक्षा में स्थानीय अधिमान
अनुच्छेद 371 श्रृंखला — कौन-सा अनुच्छेद किस राज्य के लिए। बारह राज्य, जिनमें छह पूर्वोत्तर के हैं। ध्यान दीजिए कि रूढ़िजन्य विधि का संरक्षण (लाल) केवल नागालैंड (371क) एवं मिज़ोरम (371छ) को मिला है; विकास बोर्ड (नीला) महाराष्ट्र-गुजरात (371) तथा कर्नाटक (371ञ) को; विधान सभा की क्षेत्रीय समिति (हरा) असम (371ख) एवं मणिपुर (371ग) को; राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व अथवा विधान सभा का न्यूनतम आकार (बैंगनी) सिक्किम (371च), अरुणाचल (371ज) एवं गोवा (371झ) को; तथा स्थानीय संवर्ग एवं शिक्षा-नियोजन में अधिमान (सुनहरा) आंध्र प्रदेश (371घ, 371ङ) एवं तेलंगाना (371घ) को। उत्तर प्रदेश इस सूची में नहीं है। बिंदु राज्य के भीतर उस क्षेत्र के पास रखे गए हैं जिससे उपबंध जुड़ा है (जैसे कर्नाटक में कल्याण कर्नाटक, महाराष्ट्र में मराठवाड़ा-विदर्भ की दिशा)।
सुमेलन-तालिका 12 : अनुच्छेद 371 श्रृंखला — राज्य, संशोधन एवं उपबंध
अनुच्छेद
राज्य
कब जोड़ा गया
क्या देता है
371
महाराष्ट्र एवं गुजरात
7वाँ संशोधन, 1956
राष्ट्रपति राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व दे सकते हैं — विदर्भ, मराठवाड़ा एवं शेष महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र, कच्छ एवं शेष गुजरात के लिए पृथक् विकास बोर्ड; विकास-व्यय का समन्यायी आवंटन; तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा राज्य-सेवाओं में समान अवसर। 7वें संशोधन वाले पाठ में इस अनुच्छेद के अंतर्गत आंध्र प्रदेश भी सम्मिलित था; उसका नाम 32वें संशोधन (1973) ने हटा दिया, क्योंकि तब आंध्र के लिए अलग अनुच्छेद 371घ एवं 371ङ जोड़े गए।
371क
नागालैंड
13वाँ संशोधन, 1962
संसद की विधि नागालैंड में तब तक लागू नहीं जब तक विधान सभा संकल्प न करे — चार विषयों में: (i) नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ, (ii) नागा रूढ़िजन्य विधि एवं प्रक्रिया, (iii) रूढ़िजन्य विधि के अनुसार सिविल एवं दांडिक न्याय, (iv) भूमि एवं उसके संसाधनों का स्वामित्व एवं अंतरण। राज्यपाल का विधि-व्यवस्था पर विशेष उत्तरदायित्व; तुएनसांग ज़िले के लिए 35 सदस्यीय क्षेत्रीय परिषद
371ख
असम
22वाँ संशोधन, 1969
राष्ट्रपति आदेश द्वारा विधान सभा की एक समिति बना सकते हैं, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्य हों (छठी अनुसूची के पैरा 20 की तालिका के भाग I वाले क्षेत्र)
371ग
मणिपुर
27वाँ संशोधन, 1971
विधान सभा की पर्वतीय क्षेत्र समिति (Hill Areas Committee); राज्यपाल का उसके समुचित कार्यकरण हेतु विशेष उत्तरदायित्व; राज्यपाल प्रतिवर्ष पर्वतीय क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देंगे
371घ
आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना
32वाँ संशोधन, 1973 (तेलंगाना 2014 में जोड़ा गया)
लोक नियोजन एवं शिक्षा में राज्य के विभिन्न भागों के लोगों के लिए समन्यायी अवसर; स्थानीय संवर्ग (local cadre) का गठन; राष्ट्रपति प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunal) गठित कर सकते हैं
371ङ
आंध्र प्रदेश
32वाँ संशोधन, 1973
संसद विधि द्वारा आंध्र प्रदेश में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना कर सकती है। यह पूरी श्रृंखला का सबसे छोटा एवं सबसे कम याद रहने वाला अनुच्छेद है — इसीलिए पूछा जाता है।
371च
सिक्किम
36वाँ संशोधन, 1975
विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य; जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के अधिकारों की रक्षा हेतु सीटों का आरक्षण; सिक्किम की भूमि एवं संपत्ति संबंधी पुरानी विधियों को संरक्षण; सिक्किम संबंधी विवादों पर उच्चतम/उच्च न्यायालय की अधिकारिता पर सीमा
371छ
मिज़ोरम
53वाँ संशोधन, 1986
371क जैसा ही — मिज़ो धार्मिक/सामाजिक प्रथाएँ, रूढ़िजन्य विधि, न्याय-प्रशासन तथा भूमि का स्वामित्व एवं अंतरण पर संसद की विधि तभी लागू जब विधान सभा संकल्प करे; विधान सभा में कम-से-कम 40 सदस्य
371ज
अरुणाचल प्रदेश
55वाँ संशोधन, 1986
राज्यपाल का विधि-व्यवस्था पर विशेष उत्तरदायित्व, जिसमें वे मंत्रिपरिषद से परामर्श के बाद व्यक्तिगत निर्णय से कार्य करेंगे; विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य
371झ
गोवा
56वाँ संशोधन, 1987
केवल एक पंक्ति — गोवा की विधान सभा में कम-से-कम 30 सदस्य होंगे। इससे अधिक कुछ नहीं। यह पूरी श्रृंखला का सबसे संक्षिप्त अनुच्छेद है।
371ञ
कर्नाटक
98वाँ संशोधन, 2012 (प्रवृत्त 1 अक्टूबर 2013)
हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र (अब कल्याण कर्नाटक) के लिए पृथक् विकास बोर्ड; विकास-व्यय का समन्यायी आवंटन; तथा उस क्षेत्र के लोगों के लिए शिक्षा-संस्थाओं में सीटों एवं राज्य-सेवाओं में पदों का आरक्षण, जो जन्म या अधिवास के आधार पर होगा
अनुच्छेद 371 श्रृंखला — राज्यों का क्रम“महागुज · नागा · असम · मणि · आंध्र-आंध्र · सिक्किम · मिज़ो · अरुण · गोवा · कर्नाट”
371 = महाराष्ट्र + गुजरात · 371क = नागालैंड · 371ख = असम ·
371ग = मणिपुर · 371घ एवं 371ङ = आंध्र प्रदेश (घ में तेलंगाना भी) ·
371च = सिक्किम · 371छ = मिज़ोरम · 371ज = अरुणाचल प्रदेश · 371झ = गोवा ·
371ञ = कर्नाटक।
सूत्र-वाक्य के रूप में — “नागा असम मणि, आंध्र दो; सिक्किम मिज़ो अरुण, गोवा-कर्नाट भी हो।”
ध्यान दें — आंध्र प्रदेश अकेला राज्य है जिसे दो अनुच्छेद (घ एवं ङ) मिले, और
371 अकेला है जो दो राज्यों पर लागू है।
बारह राज्य — छह पूर्वोत्तर से“छह पूरब, छह शेष”
कुल 12 राज्य: पूर्वोत्तर से छह — नागालैंड, असम, मणिपुर, सिक्किम, मिज़ोरम,
अरुणाचल प्रदेश। शेष छह — महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक।
मानचित्र देखते ही यह आधा-आधा बँटवारा याद रह जाता है।
सावधानी — 371 श्रृंखला के चार सबसे बड़े जाल
अनुच्छेद 370 और 371 अलग हैं। 370 जम्मू-कश्मीर के लिए था —
5 अगस्त 2019 के राष्ट्रपति-आदेशों (C.O. 272 एवं 273) तथा संसदीय संकल्प से निष्प्रभावी
किया गया, और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से दो संघ राज्यक्षेत्र बने (प्रभावी
31 अक्टूबर 2019)। इन रे अनुच्छेद 370 (11 दिसंबर 2023) में पाँच
न्यायाधीशों की पीठ ने इसे सर्वसम्मति से वैध ठहराया और जम्मू-कश्मीर को शीघ्र राज्य का
दर्जा लौटाने तथा 30 सितंबर 2024 तक चुनाव कराने का निदेश दिया। 371 श्रृंखला
इससे पूर्णतः अप्रभावित है और आज भी जीवित है।
371ज (अरुणाचल) बनाम 371झ (गोवा) — दोनों में विधान सभा के कम-से-कम 30 सदस्य
हैं, इसलिए ये आपस में उलटकर पूछे जाते हैं। भेद यह है कि अरुणाचल में राज्यपाल का विधि-व्यवस्था पर
विशेष उत्तरदायित्व भी है; गोवा वाले अनुच्छेद में केवल सदस्य-संख्या है।
न्यूनतम सदस्य-संख्या — सिक्किम 30, मिज़ोरम 40,
अरुणाचल 30, गोवा 30। केवल मिज़ोरम में 40 है — यही अपवाद पूछा जाता है।
रूढ़िजन्य विधि का संरक्षण केवल दो राज्यों को — नागालैंड (371क) एवं
मिज़ोरम (371छ)। मेघालय, त्रिपुरा आदि को यह संरक्षण अनुच्छेद 371 से नहीं,
छठी अनुसूची से मिलता है। मेघालय, त्रिपुरा एवं नागालैंड के लिए 371 श्रृंखला में कोई
पृथक् अनुच्छेद नहीं — मेघालय एवं त्रिपुरा का नाम इस श्रृंखला में कहीं नहीं आता।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — “विशेष उपबंध” और UP
उत्तर प्रदेश के लिए अनुच्छेद 371 श्रृंखला में कोई उपबंध नहीं है — यह स्वयं एक
परीक्षा-योग्य तथ्य है, क्योंकि विकल्पों में UP या बिहार डालकर प्रश्न बनाया जाता है। UP के क्षेत्रीय
असंतुलन (विशेषतः बुंदेलखंड एवं पूर्वांचल) का समाधान संविधान ने नहीं, बल्कि
राज्य की अपनी नीति तथा केंद्रीय पैकेजों के रास्ते खोजा गया है — जैसे बुंदेलखंड पैकेज।
तुलना कीजिए: महाराष्ट्र के विदर्भ-मराठवाड़ा तथा कर्नाटक के
कल्याण कर्नाटक को संविधान से ही विकास बोर्ड मिले, जबकि UP के बुंदेलखंड को नहीं।
यही कारण है कि UP में समय-समय पर पृथक् बुंदेलखंड राज्य या अनुच्छेद 371 जैसे उपबंध
की माँग उठती रही है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (राज्य) A. 371ख 1. गोवा B. 371छ 2. असम C. 371झ 3. कर्नाटक D. 371ञ 4. मिज़ोरम कूट:
उत्तर: (C)371ख — असम; 371छ — मिज़ोरम; 371झ — गोवा; 371ञ — कर्नाटक। अतः A-2, B-4, C-1, D-3 सही है।
प्र.2अनुच्छेद 371 श्रृंखला के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. मिज़ोरम की विधान सभा में कम-से-कम चालीस सदस्य होने का उपबंध अनुच्छेद 371छ में है। 2. आंध्र प्रदेश एकमात्र राज्य है जिसके लिए इस श्रृंखला में दो पृथक् अनुच्छेद हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)371छ(ख) में मिज़ोरम विधान सभा के लिए न्यूनतम 40 सदस्य निर्धारित हैं (सिक्किम, अरुणाचल एवं गोवा के लिए 30) — कथन 1 सही। 371घ (लोक नियोजन एवं स्थानीय संवर्ग) तथा 371ङ (केंद्रीय विश्वविद्यालय) दोनों आंध्र प्रदेश के लिए हैं — कथन 2 भी सही।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (जोड़ने वाला संविधान संशोधन) 1. अनुच्छेद 371क — 13वाँ संशोधन, 1962 2. अनुच्छेद 371च — 36वाँ संशोधन, 1975 3. अनुच्छेद 371ञ — 86वाँ संशोधन, 2002 नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 371ञ (कर्नाटक — हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र) 98वें संविधान संशोधन, 2012 द्वारा जोड़ा गया, जो 1 अक्टूबर 2013 से प्रवृत्त हुआ। 86वाँ संशोधन (2002) तो शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21क) से संबंधित है। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
7. पाँचवीं एवं छठी अनुसूची — अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र
अनुच्छेद 244 जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए दो अलग-अलग व्यवस्थाएँ देता है —
244(1) से पाँचवीं अनुसूची (असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम को छोड़कर
किसी भी राज्य के अनुसूचित क्षेत्र) तथा 244(2) से छठी अनुसूची
(इन्हीं चार राज्यों के जनजातीय क्षेत्र)। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 244क
(22वाँ संशोधन, 1969) असम के जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर एक स्वायत्त राज्य बनाने की
अनुमति देता है — यह उपबंध आज तक प्रयोग में नहीं आया।
पाँचवीं अनुसूची — अनुसूचित क्षेत्र (10 राज्य)छठी अनुसूची — जनजातीय क्षेत्र (4 राज्य)
पाँचवीं बनाम छठी अनुसूची — दो अलग नक़्शे।पाँचवीं अनुसूची (लाल) के अनुसूचित क्षेत्र आज दस राज्यों में हैं और वे मध्य भारत की जनजातीय पट्टी तथा गुजरात-राजस्थान-हिमाचल तक फैले हैं; वहाँ जनजाति सलाहकार परिषद केवल सलाह देती है और असली शक्ति राज्यपाल के पास है। छठी अनुसूची (नीला) केवल चार पूर्वोत्तर राज्यों — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम — पर लागू है, जहाँ दस स्वायत्त ज़िला परिषदें स्वयं विधि बनाती एवं न्यायालय चलाती हैं। नक़्शे से तीन बातें सीधे याद रहती हैं — (1) नागालैंड एवं अरुणाचल किसी अनुसूची में नहीं (उन्हें 371क एवं 371ज से संरक्षण मिलता है), (2) उत्तर प्रदेश में कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं, (3) दक्षिण के तमिलनाडु, कर्नाटक एवं केरल भी पाँचवीं अनुसूची से बाहर हैं। बिंदु प्रत्येक राज्य के भीतर उसके प्रमुख जनजातीय क्षेत्र के निकट रखे गए हैं।
पाँचवीं अनुसूची · अनुसूचित क्षेत्र
आधार — अनुच्छेद 244(1)
राज्य — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम को छोड़कर किसी भी राज्य में।
वर्तमान में दस राज्य — आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश,
झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान
घोषणा — “अनुसूचित क्षेत्र” राष्ट्रपति आदेश द्वारा घोषित करते हैं (पैरा 6)
मुख्य निकाय — जनजाति सलाहकार परिषद (TAC): अधिकतम 20 सदस्य, जिनमें
लगभग तीन-चौथाई राज्य विधान सभा के अनुसूचित जनजाति सदस्य होंगे; यह केवल
सलाहकारी है, विधायी नहीं
राज्यपाल की शक्ति — (क) अधिसूचना द्वारा संसद/राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम को
अनुसूचित क्षेत्र में लागू न करना या संशोधित रूप में लागू करना (पैरा 5(1));
(ख) शांति एवं सुशासन के लिए विनियम बनाना — विशेषतः भूमि-अंतरण पर रोक,
भूमि-आवंटन का विनियमन तथा साहूकारी का नियंत्रण (पैरा 5(2))। ऐसे विनियम
राष्ट्रपति की सहमति से प्रभावी होते हैं
रिपोर्ट — राज्यपाल प्रतिवर्ष या राष्ट्रपति के कहने पर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देंगे;
संघ की कार्यपालिका शक्ति इन क्षेत्रों के प्रशासन पर निदेश देने तक विस्तृत है (पैरा 3)
संशोधन — संसद साधारण विधि से संशोधन कर सकती है; वह अनुच्छेद 368 के अर्थ में
संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा (पैरा 7)
छठी अनुसूची · जनजातीय क्षेत्र
आधार — अनुच्छेद 244(2) एवं 275(1)
राज्य — केवल चार: असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम
क्षेत्र — पैरा 20 की तालिका में दस जनजातीय क्षेत्र — असम 3
(दीमा हसाओ/उत्तरी कछार पहाड़ी, कार्बी आंगलोंग, बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र),
मेघालय 3 (खासी, जयंतिया, गारो पहाड़ी), त्रिपुरा 1 (त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र),
मिज़ोरम 3 (चकमा, मारा, लाई)
मुख्य निकाय — स्वायत्त ज़िला परिषद (ADC): अधिकतम 30 सदस्य —
4 राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित, शेष 26 वयस्क मताधिकार से निर्वाचित;
निर्वाचित सदस्यों की अवधि पाँच वर्ष, नामनिर्देशित राज्यपाल के प्रसादपर्यंत।
अपवाद — बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद में अधिकतम 46 सदस्य (40 निर्वाचित + 6 नामनिर्देशित)
शक्तियाँ — ये परिषदें विधि बना सकती हैं (भूमि, वन, जल-मार्ग, कृषि, ग्राम-प्रशासन,
संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह-विच्छेद, सामाजिक रीति); ग्राम एवं ज़िला न्यायालय गठित कर सकती हैं;
भू-राजस्व एवं कुछ कर उद्ग्रहीत कर सकती हैं; खनिज-पट्टों पर रॉयल्टी का हिस्सा पा सकती हैं
राज्यपाल/राष्ट्रपति — राज्यपाल किसी संसदीय या राज्य-विधि को इन क्षेत्रों में लागू न करने या
संशोधित रूप में लागू करने का निदेश दे सकते हैं; परिषदों की विधियों को राज्यपाल की अनुमति चाहिए
संशोधन — संसद साधारण विधि से (पैरा 21) — अनुच्छेद 368 का संशोधन नहीं
“अनुसूचित क्षेत्र” घोषित करने की कसौटी (न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवहार में) —
जनजातीय जनसंख्या की प्रधानता, क्षेत्र की सघनता एवं युक्तियुक्त आकार, अविकसित प्रकृति तथा
लोगों के आर्थिक स्तर में स्पष्ट असमानता।
पेसा अधिनियम, 1996 — पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम,
24 दिसंबर 1996 से प्रवृत्त। यह भाग IX (पंचायत) के उपबंधों को पाँचवीं अनुसूची के
अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित करता है और ग्राम सभा को भूमि-अधिग्रहण, लघु जल-निकाय,
लघु खनिज, लघु वन-उपज तथा स्थानीय योजनाओं पर निर्णायक भूमिका देता है। इसकी पृष्ठभूमि में
दिलीप सिंह भूरिया समिति (1995) की सिफारिशें हैं। पेसा छठी अनुसूची के क्षेत्रों पर
लागू नहीं होता।
भाग IX एवं IX-क का अपवाद — अनुच्छेद 243ड(घ) तथा
243यछ कहते हैं कि पंचायत एवं नगरपालिका संबंधी उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों, जनजातीय क्षेत्रों
तथा कुछ अन्य क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होते — इसीलिए पेसा जैसा पृथक् अधिनियम आवश्यक हुआ।
अनुच्छेद 275(1) का पहला परंतुक — अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों
के प्रशासन का स्तर उठाने के लिए संघ से विशेष अनुदान; दूसरा परंतुक —
असम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष अनुदान। यह अनुसूचियों को वित्त से जोड़ता है।
लद्दाख को छठी अनुसूची में सम्मिलित करने की माँग लंबे समय से चल रही है, किंतु
अब तक वह छठी अनुसूची में नहीं है — यह “वर्तमान स्थिति” वाला प्रश्न बनता है।
छठी अनुसूची के चार राज्य“अ–मे–त्रि–मि”
असम · मेघालय · त्रिपुरा · मिज़ोरम। और इनकी परिषद-संख्या
3–3–1–3 = 10। ध्यान रहे, नागालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश छठी अनुसूची में नहीं हैं —
उन्हें अनुच्छेद 371क एवं 371ज से संरक्षण मिलता है। यही सबसे बड़ा जाल है।
सावधानी — पाँचवीं और छठी अनुसूची के बीच चार भेद
पाँचवीं में परिषद सलाहकारी है (TAC), छठी में विधायी (ADC)। TAC कोई विधि नहीं बना सकती;
ADC बना सकती है और न्यायालय भी चला सकती है।
पाँचवीं में “अनुसूचित क्षेत्र” राष्ट्रपति घोषित करते हैं; छठी में “जनजातीय क्षेत्र” संविधान
की अनुसूची में ही सूचीबद्ध हैं और उनमें फेरबदल राज्यपाल अधिसूचना से कर सकते हैं।
दोनों अनुसूचियों का संशोधन संसद साधारण विधि से करती है — यह दोनों में समान है और
प्रायः “विशेष बहुमत” बताकर पूछा जाता है। वही बात पहली, दूसरी एवं चौथी अनुसूची (अनुच्छेद 4) के लिए भी है।
पेसा केवल पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों पर लागू है, छठी पर नहीं।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — UP में कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजातियाँ हैं, पर पाँचवीं अनुसूची के अधीन कोई “अनुसूचित क्षेत्र”
अधिसूचित नहीं है — इसलिए UP उन दस राज्यों की सूची में नहीं आता, और न ही
पेसा अधिनियम, 1996 UP पर लागू होता है। यह सीधा सुमेलन-प्रश्न बनता है:
“निम्नलिखित में से किस राज्य में पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्र हैं?” — उत्तर में
UP कभी नहीं।
ध्यान दें कि पाँचवीं अनुसूची का पैरा 4 यह भी कहता है कि यदि राष्ट्रपति निदेश दें तो
ऐसे राज्य में भी जनजाति सलाहकार परिषद बनाई जा सकती है जहाँ अनुसूचित जनजातियाँ तो हैं पर अनुसूचित
क्षेत्र नहीं — यह उपबंध UP जैसे राज्यों के लिए ही प्रासंगिक है। उत्तर प्रदेश में जनजातीय
जनसंख्या मुख्यतः सोनभद्र, ललितपुर, बलरामपुर, लखीमपुर खीरी एवं बहराइच जैसे ज़िलों में है
(गोंड, खरवार, चेरो, थारू, बुक्सा आदि); UP के जनजातीय बहुल पर्वतीय क्षेत्र
2000 में उत्तराखंड के साथ अलग हो गए।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1छठी अनुसूची के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. सामान्यतः प्रत्येक स्वायत्त ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, जिनमें से चार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित होते हैं। 2. यह असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा नागालैंड के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)पैरा 2(1) के अनुसार ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, जिनमें 4 से अधिक नामनिर्देशित नहीं — कथन 1 सही। किंतु छठी अनुसूची के चार राज्य हैं — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम; नागालैंड इसमें नहीं है (उसे अनुच्छेद 371क से संरक्षण मिलता है) — कथन 2 गलत।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर भी लागू होता है। कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 243ड के अनुसार भाग IX के उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजातीय क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होते। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)पेसा केवल पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होता है, छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर नहीं — अतः (A) गलत है। (R) सही है: अनुच्छेद 243ड(घ) भाग IX को अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों से बाहर रखता है, और इसी कमी को भरने के लिए 24 दिसंबर 1996 से पेसा प्रवृत्त हुआ।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (निकाय) (विशेषता) 1. जनजाति सलाहकार परिषद — अधिकतम 20 सदस्य, लगभग तीन-चौथाई विधान सभा के अ.ज.जा. सदस्य 2. स्वायत्त ज़िला परिषद — अधिकतम 20 सदस्य, जिनमें चार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित 3. जनजाति सलाहकार परिषद — अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की शक्ति नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)स्वायत्त ज़िला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं (4 से अनधिक नामनिर्देशित + शेष निर्वाचित), 20 नहीं — युग्म 2 गलत। अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की शक्ति राज्यपाल के पास है (पाँचवीं अनुसूची, पैरा 5(2)); जनजाति सलाहकार परिषद केवल सलाह देती है — युग्म 3 भी गलत। युग्म 1 सही है।
8. राष्ट्रीय आपात — अनुच्छेद 352
संविधान का भाग XVIII (अनुच्छेद 352–360) आपातकालीन उपबंधों का है। यह विचार
भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा वाइमर संविधान (जर्मनी) से प्रेरित है।
इसकी मूल कल्पना यह है कि संकट के समय संविधान स्वयं को निलंबित किए बिना एकात्मक रूप धारण कर ले।
डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इन उपबंधों के कारण भारत
“सामान्य समय में संघीय और आपात में एकात्मक” हो जाता है।
8.1 घोषणा के आधार
अनुच्छेद 352(1) — यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि ऐसी गंभीर आपात विद्यमान है
जिससे भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध (war),
बाह्य आक्रमण (external aggression) या सशस्त्र विद्रोह (armed rebellion)
से खतरा है, तो वे उद्घोषणा कर सकते हैं।
युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर की गई उद्घोषणा को “बाह्य आपात” तथा सशस्त्र विद्रोह
के आधार पर की गई को “आंतरिक आपात” कहा जाता है — यह विभाजन संविधान में नहीं, व्यवहार में है।
स्पष्टीकरण (44वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया) — उद्घोषणा युद्ध/आक्रमण/विद्रोह के
वास्तविक घटित होने से पहले भी की जा सकती है, यदि राष्ट्रपति का समाधान हो कि उसका
आसन्न खतरा (imminent danger) है।
352(9) — राष्ट्रपति भिन्न-भिन्न आधारों पर भिन्न-भिन्न उद्घोषणाएँ
कर सकते हैं, चाहे पहले से कोई उद्घोषणा प्रवर्तन में हो। 1975 में यही हुआ था।
352(2) — उद्घोषणा को बाद की उद्घोषणा द्वारा परिवर्तित या रद्द किया जा सकता है।
सावधानी — “आंतरिक अशांति” अब संविधान में नहीं है
मूल अनुच्छेद 352 में तीसरा आधार “आंतरिक अशांति” (internal disturbance) था।
44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने इसे हटाकर “सशस्त्र विद्रोह”
(armed rebellion) कर दिया। कारण स्पष्ट था — 1975 की उद्घोषणा इसी अस्पष्ट शब्द के सहारे हुई थी।
किंतु ध्यान दें — अनुच्छेद 355 में “आंतरिक अशांति” शब्द
आज भी ज्यों का त्यों है: “संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक राज्य की
बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अशांति से रक्षा करे।” 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 355 को नहीं छुआ।
यही सबसे बारीक जाल है — प्रश्न यह बनता है: “44वें संशोधन ने संविधान से ‘आंतरिक अशांति’ शब्द हटा दिया —
सही/गलत?” उत्तर है गलत, वह केवल अनुच्छेद 352 से हटा।
तीनों आधार याद रखें — युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह। “आंतरिक अशांति”,
“वित्तीय अस्थिरता” या “संवैधानिक तंत्र की विफलता” अनुच्छेद 352 के आधार नहीं हैं।
8.2 प्रक्रिया, अनुमोदन एवं अवधि
1. मंत्रिमंडल का लिखित निर्णयराष्ट्रपति उद्घोषणा तभी करेंगे जब संघ मंत्रिमंडल — अर्थात् प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट-स्तर के मंत्रियों की परिषद — का निर्णय उन्हें लिखित रूप में संसूचित हो (अनु. 352(3), 44वाँ संशोधन)
→
2. उद्घोषणासम्पूर्ण भारत के लिए या राज्यक्षेत्र के किसी भाग के लिए (भाग वाली शक्ति 42वें संशोधन, 1976 ने जोड़ी)
→
3. संसदीय अनुमोदन — 1 माहदोनों सदनों के समक्ष; एक माह के भीतर विशेष बहुमत से अनुमोदन आवश्यक, अन्यथा समाप्त (मूलतः दो माह था; 44वें ने घटाया)
→
4. छह-छह माह की अवधिअनुमोदन के बाद छह माह; प्रत्येक छह माह पर पुनः विशेष बहुमत से अनुमोदन; बाहरी सीमा कोई नहीं
→
5. समाप्तिराष्ट्रपति कभी भी बाद की उद्घोषणा से रद्द कर सकते हैं (संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं); अथवा लोकसभा साधारण बहुमत से अननुमोदन-संकल्प पारित कर दे — तब राष्ट्रपति को रद्द करना अनिवार्य है
विशेष बहुमत की सटीक परिभाषा — अनुच्छेद 352(6): संकल्प उस सदन की
कुल सदस्यता के बहुमत से तथा उस सदन के उपस्थित एवं मतदान करने वाले
सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई से पारित होना चाहिए। दोनों शर्तें एक साथ पूरी हों।
यह अनुच्छेद 368 वाले संशोधन के बहुमत जैसा ही है।
लोकसभा का विघटन — यदि उद्घोषणा के एक माह के भीतर लोकसभा विघटित हो जाए और
राज्यसभा अनुमोदन कर दे, तो उद्घोषणा लोकसभा के पुनर्गठन के बाद उसकी पहली बैठक से 30 दिन
तक चलेगी; उस अवधि में लोकसभा का अनुमोदन आवश्यक।
352(7) — यदि लोकसभा अननुमोदन का संकल्प पारित कर दे तो राष्ट्रपति
उद्घोषणा को रद्द करेंगे ही। ध्यान दें — यह संकल्प केवल लोकसभा पारित करती है
और उसके लिए साधारण बहुमत पर्याप्त है।
352(8) — यदि लोकसभा के कुल सदस्यों का कम-से-कम दसवाँ भाग (1/10)
अननुमोदन-संकल्प का लिखित नोटिस दे (सत्र में हो तो अध्यक्ष को, अन्यथा राष्ट्रपति को), तो
14 दिन के भीतर सदन की विशेष बैठक बुलानी होगी। यह भी
44वें संशोधन की देन है।
न्यायिक पुनर्विलोकन — 38वें संशोधन, 1975 ने उद्घोषणा को न्यायिक
समीक्षा से परे कर दिया था; 44वें संशोधन, 1978 ने वह उपबंध हटा दिया।
मिनर्वा मिल्स (1980) में न्यायालय ने कहा कि उद्घोषणा को दुर्भावना (mala fide)
अथवा पूर्णतः असंगत एवं बाह्य आधारों पर चुनौती दी जा सकती है।
8.3 राष्ट्रीय आपात के प्रभाव
सुमेलन-तालिका 13 : राष्ट्रीय आपात के चार प्रकार के प्रभाव
क्षेत्र
अनुच्छेद
प्रभाव
कार्यपालिका
353(क)
संघ की कार्यपालिका शक्ति राज्य को यह निदेश देने तक विस्तृत हो जाती है कि वह अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करे। राज्य सरकार निलंबित नहीं होती — वह केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती है
विधायी
353(ख), 250
संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है; विधि आपात समाप्ति के 6 माह बाद निष्प्रभावी। राज्य विधानमंडल की शक्ति छिनती नहीं, केवल संसद की शक्ति जुड़ जाती है। 42वें संशोधन ने यह भी जोड़ा कि यदि आपात केवल एक भाग में हो तो भी निदेश एवं विधि अन्य राज्यों तक विस्तारित हो सकती है, यदि सुरक्षा को खतरा हो
वित्तीय
354
राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुच्छेद 268 से 279 के करों-विभाजन संबंधी उपबंधों को परिवर्तित या निलंबित कर सकते हैं — अधिक-से-अधिक उस वित्तीय वर्ष के अंत तक जिसमें आपात समाप्त हो। ऐसा प्रत्येक आदेश संसद के समक्ष रखा जाएगा
सदनों की अवधि
83(2) परंतुक; 172(1) परंतुक
लोकसभा की अवधि संसद विधि द्वारा एक बार में एक वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है — पर आपात समाप्त होने के बाद छह माह से अधिक नहीं। यही उपबंध राज्य विधान सभा के लिए भी है
मौलिक अधिकार
358, 359
अनुच्छेद 19 का स्वतः निलंबन (केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण में) तथा राष्ट्रपति के आदेश से अन्य अधिकारों के प्रवर्तन का निलंबन — विस्तार खंड 11 में
8.4 अब तक की तीन घोषणाएँ
26 अक्टूबर 1962पहली उद्घोषणा — बाह्य आक्रमण। चीन का नेफा (NEFA) क्षेत्र में आक्रमण। यह उद्घोषणा 10 जनवरी 1968 तक चली — अर्थात् 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी यही उद्घोषणा प्रवर्तन में थी, नई नहीं की गई
3 दिसंबर 1971दूसरी उद्घोषणा — बाह्य आक्रमण। भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश मुक्ति संग्राम
12 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा) ने राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी में रायबरेली से प्रधानमंत्री का निर्वाचन भ्रष्ट आचरण के आधार पर अवैध घोषित किया — यही 1975 के आपात की तात्कालिक पृष्ठभूमि बना
25 जून 1975तीसरी उद्घोषणा — “आंतरिक अशांति”। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा। दूसरी उद्घोषणा (1971) अब भी प्रवर्तन में थी — अतः जून 1975 से मार्च 1977 तक दो आपात एक साथ चले। यह 352(9) का व्यावहारिक उदाहरण है
197538वाँ संशोधन — उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से परे किया गया; 39वाँ संशोधन — प्रधानमंत्री एवं अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायालय के दायरे से बाहर (इसे इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, 1975 में मूल ढाँचे के विरुद्ध मानकर निरस्त किया गया)
197642वाँ संशोधन — “लघु संविधान”; लोकसभा एवं विधान सभाओं की अवधि 5 से 6 वर्ष; अनुच्छेद 352 में “भाग” वाली शक्ति; 257क जोड़ा; 356 की अधिकतम अवधि एक वर्ष तक बढ़ाई
21 मार्च 1977दोनों उद्घोषणाएँ (1971 एवं 1975) रद्द। छठी लोकसभा के चुनाव में जनता पार्टी की जीत
1977शाह आयोग — न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच; तीन अंतरिम एवं एक अंतिम रिपोर्ट (1978)
197844वाँ संविधान संशोधन — आपात-उपबंधों का पूरा पुनर्लेखन (नीचे तालिका देखें); लोकसभा/विधान सभा की अवधि पुनः 5 वर्ष; संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300क
सुमेलन-तालिका 14 : 44वें संविधान संशोधन, 1978 ने आपात-उपबंधों में क्या बदला
बिंदु
44वें संशोधन से पहले
44वें संशोधन के बाद
तीसरा आधार
आंतरिक अशांति
सशस्त्र विद्रोह
मंत्रिमंडल की सलाह
कोई स्पष्ट अपेक्षा नहीं (प्रधानमंत्री की सलाह पर्याप्त मानी गई)
संघ मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय अनिवार्य
अनुमोदन की अवधि
दो माह
एक माह
अनुमोदन का बहुमत
साधारण बहुमत
विशेष बहुमत — कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3
अनुमोदन के बाद अवधि
अनिश्चित काल तक (पुनरनुमोदन की आवश्यकता नहीं)
प्रत्येक छह माह पर पुनः अनुमोदन
लोकसभा द्वारा समाप्ति
कोई उपबंध नहीं
352(7) — लोकसभा के अननुमोदन-संकल्प पर रद्द करना अनिवार्य; 352(8) — 1/10 सदस्यों के नोटिस पर 14 दिन में विशेष बैठक
अनुच्छेद 358
किसी भी आधार पर घोषित आपात में अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित
केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण वाले आपात में; और केवल उन विधियों/कार्रवाइयों को संरक्षण जिनमें आपात से संबंध का अवधारणा-कथन (recital) हो
अनुच्छेद 359
भाग III के किसी भी अधिकार का प्रवर्तन निलंबित किया जा सकता था
अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर — ये कभी निलंबित नहीं हो सकते
न्यायिक समीक्षा
38वें संशोधन ने वर्जित की थी
पुनर्स्थापित
अनुच्छेद 356 की अवधि
42वें संशोधन ने एक बार में एक वर्ष कर दिया था
छह माह पर लौटाया; एक वर्ष से आगे के लिए दो कठोर शर्तें (खंड 9 देखें)
अनुच्छेद 360
38वें संशोधन ने राष्ट्रपति के समाधान को अंतिम एवं निर्णायक बनाया था
वह उपबंध हटाया गया
अनुच्छेद 257क
42वें संशोधन ने जोड़ा था
हटाया गया
अनुच्छेद 352 के तीन आधार“युद्ध–आक्रमण–विद्रोह”
युद्ध (war) · बाह्य आक्रमण (external aggression) · सशस्त्र विद्रोह
(armed rebellion)। और तीन घोषणाओं का सूत्र — “बासठ–इकहत्तर–पचहत्तर” :
1962 (चीन), 1971 (पाकिस्तान), 1975 (आंतरिक)। पहले दो बाह्य, तीसरा आंतरिक।
3अब तक राष्ट्रीय आपात
1 माहसंसदीय अनुमोदन की सीमा
6 माहप्रत्येक नवीकरण की अवधि
1/10लोकसभा सदस्य → विशेष बैठक
14 दिनविशेष बैठक की समय-सीमा
उत्तर प्रदेश संदर्भ — 1975 का आपातकाल इलाहाबाद से शुरू हुआ
राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी — 1971 के आम चुनाव में रायबरेली
(उत्तर प्रदेश) से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को उनके प्रतिद्वंद्वी राज नारायण ने
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 12 जून 1975 को न्यायमूर्ति
जगमोहन लाल सिन्हा ने निर्वाचन अवैध घोषित किया और उन्हें छह वर्ष के लिए निर्वाचन-अयोग्य
ठहराया। यह भारतीय संवैधानिक इतिहास की निर्णायक घटनाओं में है — देश का सबसे बड़ा संवैधानिक संकट
उत्तर प्रदेश की एक अदालत से आरंभ हुआ।
इसी के बाद 39वाँ संविधान संशोधन (1975) लाया गया, जिसने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,
प्रधानमंत्री एवं लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन संबंधी विवाद न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिए।
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में उच्चतम न्यायालय ने उस उपबंध को
मूल ढाँचे के विरुद्ध मानकर निरस्त किया — केशवानंद भारती के मूल-ढाँचा सिद्धांत का
पहला व्यावहारिक प्रयोग।
आपातकाल के विरुद्ध जन-आंदोलन की एक बड़ी धुरी भी उत्तर प्रदेश एवं बिहार रहे —
जयप्रकाश नारायण का “सम्पूर्ण क्रांति” आह्वान तथा 1977 के चुनाव में UP की
सभी 85 लोकसभा सीटों पर सत्तारूढ़ दल की पराजय इसी का परिणाम थी।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 352 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. 44वें संविधान संशोधन ने “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द रखा, जिससे “आंतरिक अशांति” शब्द संविधान से पूर्णतः हट गया। 2. उद्घोषणा के अनुमोदन का संकल्प प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)“आंतरिक अशांति” केवल अनुच्छेद 352 से हटा; अनुच्छेद 355 में वह शब्द आज भी विद्यमान है — अतः कथन 1 गलत। अनुच्छेद 352(6) में ठीक वही दोहरा बहुमत वर्णित है जो कथन 2 में है — वह सही है।
प्र.2निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए। 1. 44वाँ संविधान संशोधन 2. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रायबरेली निर्वाचन अवैध घोषित 3. चीनी आक्रमण के कारण पहली आपात-उद्घोषणा 4. 42वाँ संविधान संशोधन नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A3, 2, 1, 4B2, 3, 4, 1C2, 3, 1, 4D3, 2, 4, 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)26 अक्टूबर 1962 (पहली उद्घोषणा) → 12 जून 1975 (इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय) → 1976 (42वाँ संशोधन) → 1978 (44वाँ संशोधन)। अतः 3, 2, 4, 1 सही क्रम है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत में एक साथ दो आपात-उद्घोषणाएँ प्रवर्तन में थीं। कारण (R): अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति भिन्न-भिन्न आधारों पर भिन्न-भिन्न उद्घोषणाएँ कर सकते हैं, चाहे पहले की उद्घोषणा प्रवर्तन में ही क्यों न हो। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)3 दिसंबर 1971 की बाह्य-आक्रमण वाली उद्घोषणा 21 मार्च 1977 तक चली, और 25 जून 1975 को “आंतरिक अशांति” के आधार पर दूसरी उद्घोषणा हुई — दोनों साथ-साथ प्रवर्तन में रहीं। अनुच्छेद 352(9) ठीक यही अनुमति देता है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
9. राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद 356 एवं एस.आर. बोम्मई
अनुच्छेद 356 का शीर्षक है — “राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध”।
लोकप्रिय भाषा में इसे राष्ट्रपति शासन या राज्य आपात कहा जाता है, यद्यपि
संविधान में “राष्ट्रपति शासन” शब्द कहीं नहीं आता। इसका स्रोत
भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 93 है।
9.1 आधार — दो रास्ते
अनुच्छेद 356(1) — राज्यपाल के प्रतिवेदन पर अथवा अन्यथा राष्ट्रपति का
समाधान हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं
चलाया जा सकता। “अन्यथा (or otherwise)” शब्द महत्वपूर्ण है — राज्यपाल के प्रतिवेदन के बिना भी
उद्घोषणा हो सकती है।
अनुच्छेद 365 — यदि राज्य संघ के किसी निदेश का अनुपालन न करे तो
राष्ट्रपति यह मान सकते हैं कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता। यह
अनुच्छेद 356 का दूसरा द्वार है।
9.2 प्रक्रिया एवं अवधि
1. राज्यपाल का प्रतिवेदनअथवा “अन्यथा” प्राप्त सामग्री पर राष्ट्रपति का समाधान (अनु. 356(1)); अथवा अनु. 365 के अधीन निदेश का अनुपालन न होना
→
2. उद्घोषणाराष्ट्रपति राज्य सरकार के कृत्य स्वयं ग्रहण करते हैं तथा विधान सभा की शक्तियाँ संसद को सौंप देते हैं। उच्च न्यायालय की शक्तियाँ नहीं ली जा सकतीं (परंतुक)
→
3. संसदीय अनुमोदन — 2 माहदोनों सदनों में साधारण बहुमत से, दो माह के भीतर
→
4. छह माहअनुमोदन के बाद उद्घोषणा जारी होने की तिथि से छह माह तक प्रवृत्त; हर छह माह पर पुनः अनुमोदन
→
5. एक वर्ष के बाद दो शर्तेंएक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए — (क) राष्ट्रीय आपात पूरे भारत में या उस राज्य के पूरे/किसी भाग में प्रवर्तन में हो, और (ख) निर्वाचन आयोग प्रमाणित करे कि चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण उद्घोषणा जारी रखना आवश्यक है
→
6. अधिकतम तीन वर्ष“किसी भी दशा में तीन वर्ष से अधिक नहीं”। समाप्ति — राष्ट्रपति किसी भी समय बाद की उद्घोषणा से रद्द कर सकते हैं; संसदीय अनुमोदन आवश्यक नहीं
सावधानी — अनुच्छेद 356 की अवधि एवं शर्तें (सबसे अधिक गलती यहीं होती है)
अनुमोदन दो माह में, साधारण बहुमत से — अनुच्छेद 352 वाला एक माह एवं
विशेष बहुमत यहाँ नहीं लगता। यही दोनों के बीच का सबसे बड़ा भेद है।
अधिकतम अवधि तीन वर्ष — “पाँच वर्ष” या “अनिश्चित” बताने वाला विकल्प गलत है।
एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए दोनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए — “या” नहीं, “और”।
प्रश्न प्रायः इन्हें वैकल्पिक बताकर पूछा जाता है।
पहली शर्त यह नहीं कहती कि राष्ट्रीय आपात पूरे देश में हो — वह
“पूरे भारत में या उस राज्य के पूरे अथवा किसी भाग में” हो सकता है।
एक अपवाद संविधान में लिखा है — 11 मई 1987 को पंजाब
के संबंध में की गई उद्घोषणा के लिए “तीन वर्ष” को “पाँच वर्ष” पढ़ा गया, और उस पर
356(5) की दोनों शर्तें लागू नहीं हुईं। यह छूट 64वें, 67वें एवं 68वें संविधान संशोधनों
से क्रमशः बढ़ाई गई। यह संविधान में नामतः उल्लिखित एकमात्र राज्य-विशिष्ट आपात-अपवाद है।
उद्घोषणा रद्द करने के लिए संसद की अनुमति नहीं चाहिए — राष्ट्रपति स्वयं कर सकते हैं।
अनुच्छेद 352(7) जैसा “लोकसभा के अननुमोदन” वाला उपबंध अनुच्छेद 356 में नहीं है।
9.3 राष्ट्रपति शासन के प्रभाव
कार्यपालिका — राष्ट्रपति राज्य सरकार के कृत्य तथा राज्यपाल या राज्य के किसी अन्य
प्राधिकारी की शक्तियाँ स्वयं ग्रहण कर सकते हैं। व्यवहार में राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से, मुख्य सचिव
एवं सलाहकारों की सहायता से प्रशासन चलाते हैं। मंत्रिपरिषद विघटित हो जाती है।
विधायी — विधान सभा या तो निलंबित (suspended animation) रहती है या
विघटित कर दी जाती है। राज्य के लिए विधि-निर्माण संसद करती है
(अनुच्छेद 357), और संसद यह शक्ति राष्ट्रपति या उनके द्वारा निर्दिष्ट प्राधिकारी को
प्रत्यायोजित कर सकती है। जब संसद सत्र में न हो, राष्ट्रपति राज्य के लिए
अध्यादेश प्रख्यापित कर सकते हैं।
विधियों की निरंतरता — राष्ट्रपति शासन में बनी विधि उसकी समाप्ति के बाद भी
प्रवृत्त रहती है, जब तक राज्य विधानमंडल उसे न बदले, न निरसित करे।
उच्च न्यायालय अछूता — 356(1) का परंतुक स्पष्ट कहता है कि राष्ट्रपति
उच्च न्यायालय की शक्तियाँ न तो स्वयं ग्रहण कर सकते हैं, न उच्च न्यायालय से संबंधित संविधान के
उपबंध निलंबित कर सकते हैं। यह वाक्य परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
मौलिक अधिकार अप्रभावित — राष्ट्रपति शासन में अनुच्छेद 358/359 लागू नहीं
होते; नागरिकों के मौलिक अधिकार ज्यों के त्यों बने रहते हैं। यह राष्ट्रीय आपात से निर्णायक भेद है।
9.4 एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) — निर्णायक मोड़
11 मार्च 1994 को नौ न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 356 पर वह ढाँचा
खड़ा किया जो आज भी चलता है। वाद कर्नाटक में एस.आर. बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी (1989) से
उपजा, किंतु निर्णय में 1992 के बाद बर्खास्त कई सरकारों के मामले साथ सुने गए।
न्यायिक पुनर्विलोकन — 356 की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है। न्यायालय यह
देख सकता है कि सामग्री थी या नहीं, वह प्रासंगिक थी या नहीं, और निर्णय
दुर्भावनापूर्ण तो नहीं। न्यायालय “समाधान की पर्याप्तता” में नहीं जाएगा, पर
“समाधान के आधार” में जाएगा।
बहुमत का फैसला सदन के पटल पर — किसी सरकार के बहुमत का प्रश्न
राजभवन में नहीं, विधान सभा के फ़र्श पर (floor test) तय होगा।
विधान सभा का विघटन — उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों का अनुमोदन मिलने से
पहले राष्ट्रपति विधान सभा को विघटित नहीं कर सकते; अधिक-से-अधिक उसे
निलंबित रखा जा सकता है। यह बोम्मई का सर्वाधिक व्यावहारिक योगदान है।
बहाली की शक्ति — यदि उद्घोषणा अवैध पाई जाए तो न्यायालय बर्खास्त सरकार एवं
विधान सभा को पुनर्स्थापित कर सकता है।
पंथनिरपेक्षता — पंथनिरपेक्षता संविधान के मूल ढाँचे का अंग है;
पंथनिरपेक्षता के विरुद्ध कार्य करने वाली राज्य सरकार के विरुद्ध अनुच्छेद 356 का प्रयोग वैध हो सकता है।
परिणाम — न्यायालय ने कर्नाटक, मेघालय एवं नागालैंड की उद्घोषणाएँ
असंवैधानिक ठहराईं, जबकि बाबरी विध्वंस (6 दिसंबर 1992) के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं
हिमाचल प्रदेश में की गई बर्खास्तगियाँ वैध मानीं।
बाद के निर्णय — रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में
बिहार विधान सभा का विघटन असंवैधानिक ठहराया गया; नबाम रेबिया (2016) तथा उसी वर्ष के
उत्तराखंड प्रकरण में फ़्लोर टेस्ट की प्रधानता दोहराई गई।
9.5 अनुच्छेद 356 का व्यावहारिक इतिहास
पहला प्रयोग — पंजाब, 20 जून 1951।
अब तक इसका प्रयोग 130 से अधिक बार हो चुका है; मणिपुर में सर्वाधिक बार
(11 बार), उसके बाद उत्तर प्रदेश (10 बार)।
नवीनतम प्रयोग — मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को
राष्ट्रपति शासन लगाया गया (मुख्यमंत्री के त्यागपत्र एवं जातीय हिंसा के बाद); विधान सभा
निलंबित अवस्था में रखी गई; अगस्त 2025 में छह माह के लिए विस्तार हुआ; और उद्घोषणा
4 फरवरी 2026 को वापस ले ली गई, जिसके बाद नई सरकार बनी।
सरकारिया आयोग ने कहा था कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग “अत्यंत विरल परिस्थितियों”
में, अंतिम उपाय के रूप में हो; पुंछी आयोग ने “स्थानिक आपात” का सुझाव दिया —
अर्थात् गड़बड़ी किसी ज़िले या क्षेत्र तक सीमित हो तो पूरे राज्य की निर्वाचित सरकार न हटाई जाए।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — दस बार राष्ट्रपति शासन
उत्तर प्रदेश में अब तक दस बार राष्ट्रपति शासन लगा — यह मणिपुर के बाद देश में
दूसरे स्थान पर है। अवधियाँ:
क्रम
अवधि
टिप्पणी
1
25 फरवरी 1968 – 26 फरवरी 1969
सबसे लंबी — एक वर्ष से कुछ अधिक
2
1 अक्टूबर 1970 – 18 अक्टूबर 1970
सबसे छोटी — मात्र 18 दिन
3
13 जून 1973 – 8 नवंबर 1973
पी.ए.सी. विद्रोह के बाद
4
30 नवंबर 1975 – 21 जनवरी 1976
राष्ट्रीय आपात के दौरान
5
30 अप्रैल 1977 – 23 जून 1977
1977 के लोकसभा चुनाव के बाद
6
17 फरवरी 1980 – 9 जून 1980
1980 के लोकसभा चुनाव के बाद
7
6 दिसंबर 1992 – 4 दिसंबर 1993
बाबरी विध्वंस के बाद
8
18 अक्टूबर 1995 – 17 अक्टूबर 1996
त्रिशंकु विधान सभा
9
17 अक्टूबर 1996 – 21 मार्च 1997
सरकार-गठन में गतिरोध
10
8 मार्च 2002 – 3 मई 2002
अब तक का अंतिम
1992 वाला प्रकरण विशेष है — 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के तुरंत बाद
मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने नैतिक उत्तरदायित्व लेते हुए स्वयं त्यागपत्र दे दिया
था; उसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा। इसलिए एस.आर. बोम्मई (1994) में जिन तीन सरकारों की
बर्खास्तगी वैध ठहराई गई वे मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश की थीं —
उत्तर प्रदेश उस सूची में नहीं, क्योंकि वहाँ सरकार बर्खास्त नहीं, त्यागपत्रित हुई थी।
यह बारीकी सीधा “सही सुमेलित नहीं है” वाला प्रश्न बनाती है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 356 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा दो माह के भीतर साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना आवश्यक है। 2. एक वर्ष से आगे उद्घोषणा जारी रखने के लिए यह पर्याप्त है कि निर्वाचन आयोग चुनाव कराने में कठिनाई प्रमाणित कर दे। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)356(3) में दो माह एवं साधारण बहुमत — कथन 1 सही। किंतु 356(5) के अनुसार एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए दोनों शर्तें चाहिए — राष्ट्रीय आपात का प्रवर्तन में होना तथा निर्वाचन आयोग का प्रमाणन। केवल एक पर्याप्त नहीं — कथन 2 गलत।
प्र.2एस.आर. बोम्मई वाद (1994) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संसद के अनुमोदन से पूर्व राज्य विधान सभा को विघटित नहीं किया जा सकता। 2. इस निर्णय में कर्नाटक, मेघालय तथा नागालैंड की उद्घोषणाएँ असंवैधानिक ठहराई गईं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 11 मार्च 1994 को दोनों बातें अभिनिर्धारित कीं — अनुमोदन से पूर्व विधान सभा केवल निलंबित रखी जा सकती है, विघटित नहीं; और कर्नाटक, मेघालय तथा नागालैंड की उद्घोषणाएँ अवैध पाई गईं (जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश की वैध)।
प्र.3निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (विषय) (उपबंध) 1. अनुच्छेद 356 के अधीन अधिकतम अवधि — पाँच वर्ष 2. राष्ट्रपति शासन में उच्च न्यायालय की शक्तियाँ राष्ट्रपति ग्रहण कर सकते हैं 3. अनुच्छेद 365 — संघ के निदेशों का अनुपालन न करने का प्रभाव नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 2C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अनुच्छेद 356(4) के अनुसार अधिकतम अवधि तीन वर्ष है — पाँच वर्ष का उल्लेख केवल पंजाब की 11 मई 1987 वाली उद्घोषणा के लिए था; अतः युग्म 1 गलत। 356(1) का परंतुक राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय की शक्तियाँ ग्रहण करने से स्पष्टतः रोकता है — युग्म 2 भी गलत। युग्म 3 सही है।
10. वित्तीय आपात — अनुच्छेद 360 तथा तीनों आपातों की तुलना
10.1 अनुच्छेद 360 — अब तक कभी नहीं लगा
आधार — यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे
भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की वित्तीय स्थायित्व या साख (financial stability or
credit) को खतरा है।
अनुमोदन — दोनों सदनों द्वारा दो माह के भीतर,
साधारण बहुमत से। लोकसभा के विघटन की स्थिति में वही 30-दिन वाला उपबंध लागू।
अवधि — कोई अधिकतम सीमा नहीं। एक बार अनुमोदित होने पर
पुनः अनुमोदन की आवश्यकता नहीं; यह तब तक चलती है जब तक राष्ट्रपति बाद की उद्घोषणा से
रद्द न कर दें। यही इसे 352 एवं 356 से अलग करता है।
प्रभाव (360(3) एवं (4)) —
संघ की कार्यपालिका शक्ति राज्यों को वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों (canons of financial
propriety) के पालन तथा अन्य आवश्यक निदेश देने तक विस्तृत हो जाती है;
निदेशों में यह भी हो सकता है कि राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सभी या किसी वर्ग के
व्यक्तियों के वेतन-भत्तों में कटौती की जाए;
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित सभी धन विधेयक एवं अनुच्छेद 207 वाले अन्य विधेयक
राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखे जाएँ;
राष्ट्रपति संघ के कार्यकलाप से संबंधित व्यक्तियों — जिनमें
उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी सम्मिलित हैं — के
वेतन-भत्तों में कटौती के निदेश दे सकते हैं।
न्यायाधीशों के वेतन में कटौती — यह संविधान में एकमात्र स्थिति है जहाँ न्यायाधीशों के
वेतन घटाए जा सकते हैं (सामान्यतः अनुच्छेद 125 एवं 221 इसे रोकते हैं)। यह बिंदु परीक्षा में सीधे पूछा जाता है।
38वाँ संशोधन, 1975 ने राष्ट्रपति के समाधान को अंतिम एवं निर्णायक बनाकर
न्यायिक समीक्षा से परे कर दिया था; 44वें संशोधन, 1978 ने वह खंड हटा दिया।
अब तक अनुच्छेद 360 कभी लागू नहीं हुआ — 1991 के भुगतान-संतुलन संकट में भी नहीं।
यह तथ्य स्वयं एक प्रश्न है।
10.2 तीनों आपातों की आमने-सामने तुलना
राष्ट्रीय आपात · अनुच्छेद 352
आधार — युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह
किसकी सलाह — संघ मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय
अनुमोदन — 1 माह में, विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3)
अवधि — प्रत्येक 6 माह पर पुनरनुमोदन; कोई अधिकतम सीमा नहीं
समाप्ति — राष्ट्रपति कभी भी; अथवा लोकसभा का साधारण-बहुमत वाला अननुमोदन-संकल्प (अनिवार्य प्रभाव)
केंद्र-राज्य पर प्रभाव — संघ राज्य को कार्यपालिका निदेश दे सकता है; संसद राज्य सूची पर विधि बना सकती है; कर-विभाजन बदला जा सकता है
मौलिक अधिकार — अनु. 358 एवं 359 लागू
प्रयोग — तीन बार — 1962, 1971, 1975
राष्ट्रपति शासन · अनुच्छेद 356
आधार — राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता; अथवा अनु. 365
किसकी सलाह — राज्यपाल का प्रतिवेदन अथवा “अन्यथा”
अनुमोदन — 2 माह में, साधारण बहुमत
अवधि — प्रत्येक 6 माह; अधिकतम 3 वर्ष; 1 वर्ष के बाद दो शर्तें
समाप्ति — राष्ट्रपति कभी भी; संसद की अनुमति आवश्यक नहीं
केंद्र-राज्य पर प्रभाव — राज्य कार्यपालिका राष्ट्रपति के हाथ में; विधान सभा निलंबित या विघटित; संसद राज्य के लिए विधि बनाती है (अनु. 357)
मौलिक अधिकार — कोई प्रभाव नहीं
प्रयोग — 130 से अधिक बार; नवीनतम मणिपुर (2025–26)
वित्तीय आपात · अनुच्छेद 360
आधार — भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा
किसकी सलाह — मंत्रिपरिषद की सामान्य सलाह
अनुमोदन — 2 माह में, साधारण बहुमत
अवधि — अनिश्चित; पुनरनुमोदन की आवश्यकता नहीं
समाप्ति — राष्ट्रपति बाद की उद्घोषणा से
केंद्र-राज्य पर प्रभाव — वित्तीय औचित्य के निदेश; वेतन-कटौती; राज्य के धन विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित
मौलिक अधिकार — कोई प्रभाव नहीं
प्रयोग — अब तक एक बार भी नहीं
तीनों आपातों का बहुमत एवं समय“352 = एक माह, विशेष · 356 और 360 = दो माह, साधारण”
केवल राष्ट्रीय आपात में एक माह तथा विशेष बहुमत है; शेष दोनों में
दो माह एवं साधारण बहुमत। और अवधि का सूत्र — “352 अनंत, 356 तीन वर्ष, 360 अनंत”:
केवल राष्ट्रपति शासन की बाहरी सीमा है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 360 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. एक बार संसद द्वारा अनुमोदित हो जाने पर वित्तीय आपात की उद्घोषणा अनिश्चित काल तक प्रवृत्त रह सकती है। 2. इसके प्रवर्तन में रहते हुए राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन में कटौती का निदेश दे सकते हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)अनुच्छेद 360 में पुनरनुमोदन या अधिकतम अवधि का कोई उपबंध नहीं — कथन 1 सही। 360(4)(ख) स्पष्ट रूप से उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में कटौती की अनुमति देता है — कथन 2 भी सही।
प्र.2सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (अनुच्छेद) सूची-II (विषय) A. 352 1. संघ का राज्यों की बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अशांति से रक्षा का कर्तव्य B. 355 2. वित्तीय आपात C. 356 3. आपात की उद्घोषणा D. 360 4. राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता कूट:
उत्तर: (D)352 — आपात की उद्घोषणा; 355 — संघ का रक्षा-कर्तव्य; 356 — संवैधानिक तंत्र की विफलता; 360 — वित्तीय आपात। अतः A-3, B-1, C-4, D-2 सही है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): राष्ट्रपति शासन के प्रवर्तन में रहते हुए राज्य के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन स्वतः निलंबित हो जाता है। कारण (R): अनुच्छेद 358 तथा 359 केवल अनुच्छेद 352 के अधीन की गई उद्घोषणा से जुड़े हैं। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)राष्ट्रपति शासन से मौलिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता — अतः (A) गलत है। (R) सही है: अनुच्छेद 358 तथा 359 दोनों में “आपात की उद्घोषणा” का तात्पर्य केवल अनुच्छेद 352 वाली उद्घोषणा से है।
11. आपातकाल का मौलिक अधिकारों पर प्रभाव — अनुच्छेद 358 एवं 359
मौलिक अधिकारों का सम्पूर्ण विवेचन अध्याय 4.2 में है। यहाँ केवल वह प्रश्न है जो
इस अध्याय का है — राष्ट्रीय आपात में उन अधिकारों का क्या होता है? उत्तर दो अनुच्छेदों में है,
और इन दोनों का भेद UPPSC का सबसे भरोसेमंद प्रश्न-स्रोत है।
अनुच्छेद 358 · केवल अनुच्छेद 19
किस अधिकार पर — केवल अनुच्छेद 19 (छह स्वतंत्रताएँ)
कैसे लागू होता है — स्वतः (automatically); किसी राष्ट्रपति-आदेश की आवश्यकता नहीं
किस आधार वाले आपात में — केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण; सशस्त्र विद्रोह में नहीं (44वाँ संशोधन, 1978)
क्या होता है — राज्य को अनुच्छेद 19 के विरुद्ध विधि बनाने एवं कार्यपालिका कार्रवाई करने की छूट
विस्तार — जहाँ उद्घोषणा प्रवर्तन में है, वहाँ; तथा 42वें संशोधन के बाद, सुरक्षा को खतरा हो तो अन्य क्षेत्रों में भी
समाप्ति पर — आपात समाप्त होते ही ऐसी विधि तुरंत निष्प्रभावी; पर उस दौरान किए गए कार्य वैध बने रहते हैं
44वें का संरक्षण — केवल उन विधियों को छूट जिनमें यह अवधारणा-कथन (recital) हो कि वे आपात से संबंधित हैं
अनुच्छेद 359 · राष्ट्रपति के आदेश से
किस अधिकार पर — भाग III के उन अधिकारों पर जो आदेश में उल्लिखित हों — अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर
कैसे लागू होता है — राष्ट्रपति के आदेश (order) से; आदेश संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा
किस आधार वाले आपात में — तीनों आधारों में — युद्ध, बाह्य आक्रमण तथा सशस्त्र विद्रोह
क्या होता है — अधिकार स्वयं निलंबित नहीं होते; केवल उनके प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने का अधिकार निलंबित होता है
विस्तार — आदेश सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर; अवधि आपात की अवधि तक या आदेश में उल्लिखित उससे कम अवधि तक
समाप्ति पर — आदेश समाप्त होते ही उस दौरान बनी असंगत विधि निष्प्रभावी
44वें का संरक्षण — अनुच्छेद 20 (दोषसिद्धि से संरक्षण) एवं 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) कभी निलंबित नहीं; तथा recital वाली शर्त यहाँ भी
सावधानी — 358 और 359 के बीच पाँच निर्णायक भेद
दायरा — 358 केवल अनुच्छेद 19 पर; 359 अनुच्छेद 19 सहित भाग III के किसी भी
अधिकार पर (20 एवं 21 को छोड़कर)। अतः “359 केवल अनुच्छेद 19 पर लागू होता है” — गलत कथन है।
तंत्र — 358 स्वतः; 359 राष्ट्रपति के आदेश से। यही सबसे अधिक पूछा
जाने वाला भेद है।
आधार — 358 केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण वाले आपात में; 359 तीनों आधारों में।
प्रकृति — 358 अधिकार को ही निलंबित करता है; 359 केवल
उपचार (remedy) — अर्थात् न्यायालय जाने का अधिकार — निलंबित करता है। अधिकार जीवित रहता है,
केवल दरवाज़ा बंद होता है।
अवधि — 358 सम्पूर्ण आपात-अवधि तक; 359 आदेश में उल्लिखित उससे कम अवधि तक भी हो सकता है।
1975–77 का प्रयोग — आपात के दौरान राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 359 के अधीन आदेश जारी कर
अनुच्छेद 14, 21 एवं 22 के प्रवर्तन का अधिकार निलंबित कर दिया था (उस समय 20 एवं 21 की
व्यावृत्ति नहीं थी); अनुच्छेद 19 पहले से ही अनुच्छेद 358 के कारण निलंबित था, क्योंकि 1971 की
बाह्य-आक्रमण वाली उद्घोषणा प्रवर्तन में थी।
एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) — बंदी प्रत्यक्षीकरण वाद। पाँच
न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 से कहा कि आपात के दौरान अनुच्छेद 21 के निलंबन के कारण
अवैध निरोध के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी नहीं सुनी जा सकती। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना
का असहमत मत भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे प्रसिद्ध अल्पमत निर्णय है — उन्होंने कहा कि जीवन एवं
स्वतंत्रता का अधिकार संविधान से पहले भी था, संविधान ने उसे केवल मान्यता दी है।
44वाँ संशोधन, 1978 ने ठीक इसी निर्णय की प्रतिक्रिया में अनुच्छेद 20 एवं 21
को अनुच्छेद 359 से बाहर कर दिया — अब किसी भी आपात में इन दोनों का प्रवर्तन निलंबित नहीं हो सकता।
के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) — नौ न्यायाधीशों की पीठ ने
एडीएम जबलपुर के बहुमत-निर्णय को स्पष्ट रूप से अपास्त (overruled) कर दिया।
याद रखें — 358 एवं 359 दोनों केवल अनुच्छेद 352 वाली उद्घोषणा से
जुड़े हैं; अनुच्छेद 356 या 360 से नहीं। (अनुच्छेद 33 एवं 34 के अधीन अधिकारों पर सीमाएँ इनसे भिन्न हैं —
विस्तार अध्याय 4.2 में।)
358 में अंतिम अंक 8 है और उसका संबंध अनुच्छेद 19 से — “8 के बाद 9”,
अर्थात् 358 → 19; यह स्वतः होता है। 359 में अंतिम अंक 9 है —
इसमें आदेश चाहिए और इसमें से 20 एवं 21 हमेशा बाहर रहते हैं।
एक और पकड़ — “358 = युद्ध ही युद्ध” (केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण), “359 = सब कुछ” (तीनों आधार)।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1अनुच्छेद 358 एवं 359 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. अनुच्छेद 358 सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित आपात में भी अनुच्छेद 19 को स्वतः निलंबित कर देता है। 2. अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 एवं 21 के प्रवर्तन को निलंबित नहीं कर सकते। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 358 केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण वाले आपात में लागू होता है, सशस्त्र विद्रोह वाले में नहीं — कथन 1 गलत। उसी संशोधन ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को 359 से बाहर कर दिया — कथन 2 सही।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुच्छेद) (विशेषता) 1. अनुच्छेद 358 — केवल अनुच्छेद 19 से संबंधित, स्वतः प्रभावी 2. अनुच्छेद 359 — राष्ट्रपति के आदेश द्वारा प्रवर्तन का निलंबन 3. अनुच्छेद 358 — आदेश सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर लागू किया जा सकता है, और वह संसद के समक्ष रखा जाता है नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)“आदेश” तथा उसे संसद के समक्ष रखने की अपेक्षा अनुच्छेद 359(3) की है, अनुच्छेद 358 की नहीं — 358 तो स्वतः प्रभावी होता है, उसमें कोई आदेश ही नहीं होता। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है।
प्र.3नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को अनुच्छेद 359 के दायरे से बाहर कर दिया। कारण (R): एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) में उच्चतम न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह अभिनिर्धारित किया था कि आपात के दौरान भी अवैध निरोध के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय रहती है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)(A) सही है। किंतु (R) गलत है — एडीएम जबलपुर का निर्णय सर्वसम्मत नहीं, 4:1 का बहुमत था, और बहुमत ने कहा था कि ऐसी याचिका पोषणीय नहीं; न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना अकेले असहमत रहे। उसी निर्णय की प्रतिक्रिया में 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 20 एवं 21 को सुरक्षित किया, और पुट्टस्वामी (2017) ने उस बहुमत-निर्णय को अपास्त कर दिया।
12. संघवाद की समकालीन चुनौतियाँ — राज्यपाल, GST एवं परिसीमन
संघीय ढाँचे का पाठ केवल इतिहास नहीं है; 2024–26 के वर्षों में इसके तीन बिंदु सीधे परीक्षा-योग्य
समाचार बने — राज्यपाल की अनुमति-शक्ति, GST की वित्तीय स्वायत्तता
तथा परिसीमन एवं प्रतिनिधित्व।
12.1 राज्यपाल की भूमिका — विधेयकों पर अनुमति का प्रश्न
राज्यपाल की शक्तियों का विस्तार अध्याय 4.4 में है; यहाँ केवल उनका
केंद्र-राज्य आयाम है। राज्यपाल अनुच्छेद 155 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त
होते हैं और अनुच्छेद 156 के अधीन उनके प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं — यही
उन्हें “केंद्र का प्रतिनिधि” बनाता है और यहीं से विवाद उपजता है।
अनुच्छेद 200 — राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल के पास चार विकल्प हैं:
(1) अनुमति देना, (2) अनुमति रोक लेना, (3) धन विधेयक
के सिवाय विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना (पुनः पारित होने पर अनुमति रोकी नहीं जा सकती),
(4) विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना। अनुच्छेद 200 में
“यथाशीघ्र (as soon as possible)” लिखा है, पर कोई समय-सीमा नहीं — यही पूरी समस्या की जड़ है।
अनुच्छेद 201 — आरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति अनुमति दे सकते हैं या रोक सकते हैं;
धन विधेयक के सिवाय विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं। यहाँ भी कोई समय-सीमा नहीं।
सरकारिया एवं पुंछी आयोग — दोनों ने कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री से
परामर्श हो, राज्यपाल बाहरी एवं ग़ैर-राजनीतिक व्यक्ति हो, और उसे मनमाने ढंग से न हटाया जाए।
पुंछी आयोग ने अनुच्छेद 156 में संशोधन कर हटाने की प्रक्रिया को
विधान सभा के संकल्प से जोड़ने का सुझाव दिया।
बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) — पाँच न्यायाधीशों की पीठ: राज्यपाल को
केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि केंद्र में सरकार बदल गई या वह उसकी विचारधारा से भिन्न है;
हटाने का कारण मनमाना, तर्करहित या दुर्भावनापूर्ण नहीं होना चाहिए।
2023पंजाब, तमिलनाडु, केरल एवं तेलंगाना की सरकारें विधेयकों पर राज्यपाल की निष्क्रियता के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय पहुँचीं। पंजाब राज्य बनाम पंजाब के राज्यपाल (नवंबर 2023) — न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते; अनुच्छेद 200 का परंतुक “यथाशीघ्र” लौटाने की अपेक्षा करता है
8 अप्रैल 2025तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल — दो न्यायाधीशों की पीठ ने राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के लिए समय-सीमाएँ निर्धारित कीं और अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए दस विधेयकों को “मानित अनुमति” (deemed assent) प्राप्त घोषित कर दिया
मई 2025राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143 के अधीन उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति-निर्देश (Presidential Reference) भेजा — अनुच्छेद 200 एवं 201 से जुड़े 14 प्रश्न
20 नवंबर 2025पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की राय — न्यायालय राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के लिए समय-सीमा नहीं निर्धारित कर सकता, और “मानित अनुमति” संविधान के लिए अजनबी अवधारणा है। साथ ही यह भी कहा गया कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोक भी नहीं सकते — ऐसी निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक उपचार उपलब्ध है
12.2 GST एवं वित्तीय स्वायत्तता
मूल शिकायत — GST से पहले राज्यों के पास बिक्री कर/मूल्य-वर्धित कर की
स्वतंत्र दर तय करने की शक्ति थी। 101वें संशोधन के बाद वह शक्ति GST परिषद की सामूहिक
प्रक्रिया में चली गई। अब राज्य अपनी दरें अकेले नहीं बदल सकते।
प्रतिकर की समाप्ति — पाँच वर्ष का प्रतिकर जून 2022 में समाप्त हुआ;
कई राज्यों ने उसे बढ़ाने की माँग की। प्रतिकर उपकर बाद में मुख्यतः कोविड-काल में लिए गए ऋण की
अदायगी के लिए जारी रहा।
उपकर एवं अधिभार — ये अनुच्छेद 270 के विभाज्य पूल से बाहर रहते हैं,
इसलिए केंद्र का कुल कर-संग्रह बढ़ने पर भी राज्यों का हिस्सा उसी अनुपात में नहीं बढ़ता। यह आज की
सबसे तीखी संघीय बहस है और 16वें वित्त आयोग के समक्ष राज्यों का प्रमुख ज्ञापन-बिंदु रहा।
मोहित मिनरल्स (2022) ने राज्यों को यह संवैधानिक आश्वासन दिया कि परिषद की सिफारिशें
बाध्यकारी नहीं — अर्थात् राज्य विधानमंडल की GST-विधायी शक्ति जीवित है।
56वीं बैठक (सितंबर 2025) की दो-स्लैब व्यवस्था ने दरें सरल कीं, पर राज्यों ने
राजस्व-हानि की भरपाई का प्रश्न फिर उठाया — दर-सरलीकरण बनाम राजस्व-सुरक्षा आज के
वित्तीय संघवाद का केंद्रीय द्वंद्व है।
12.3 परिसीमन एवं प्रतिनिधित्व — 2026 की बहस
यह आज का सबसे बड़ा संघीय प्रश्न है, और उत्तर प्रदेश इसके ठीक केंद्र में है।
सुमेलन-तालिका 15 : परिसीमन का संवैधानिक इतिहास
वर्ष / संशोधन
क्या किया
अनुच्छेद 81, 82, 170
लोकसभा एवं विधान सभा की सीटों का राज्यों में आवंटन तथा प्रत्येक जनगणना के बाद पुनःसमायोजन का उपबंध
42वाँ संशोधन, 1976
सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर स्थिर कर दिया — 2000 तक। उद्देश्य: जनसंख्या-नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित न करना
84वाँ संशोधन, 2001
यह रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ा दी
87वाँ संशोधन, 2003
राज्यों के भीतर निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 की जनगणना के आधार पर पुनर्निर्धारित करने की अनुमति — पर सीटों की संख्या नहीं बदली। इसी के अंतर्गत परिसीमन आयोग (2002–2008) ने काम किया
106वाँ संशोधन, 2023
नारी शक्ति वंदन अधिनियम — लोकसभा एवं राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण; किंतु यह 2023 के अधिनियम के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़ों पर आधारित परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा
जनगणना 2027
आगामी जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 निर्धारित है (हिम-आच्छादित क्षेत्रों के लिए पूर्ववर्ती तिथि) — अर्थात् “2026 के बाद की पहली जनगणना” यही होगी
अप्रैल 2026 के तीन विधेयक
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 (लोकसभा की अधिकतम सदस्य-संख्या 550 से बढ़ाकर 850 — राज्यों से 815, संघ राज्यक्षेत्रों से 35; परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना; महिला आरक्षण उसी परिसीमन से जोड़ना), परिसीमन विधेयक, 2026 तथा संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 — तीनों 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पुरःस्थापित
17 अप्रैल 2026
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक लोकसभा में अस्वीकृत — 528 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में से 298 पक्ष में, 230 विपक्ष में; अनुच्छेद 368 के लिए अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। इसके बाद शेष दो विधेयक वापस ले लिए गए
उत्तर-दक्षिण का प्रश्न — यदि सीटें वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में बाँटी जाएँ तो
उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या-वृद्धि वाले राज्यों का भार बढ़ेगा और दक्षिणी राज्यों का घटेगा।
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्हें जनसंख्या-नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति सफलतापूर्वक लागू करने का
दंड नहीं मिलना चाहिए।
प्रस्तावित आँकड़े — यदि वर्तमान 543 सीटों का ही 2011 की जनगणना के
आधार पर पुनर्वितरण हो, तो उत्तर प्रदेश को 80 से बढ़कर लगभग 89 सीटें मिलतीं, जबकि
तमिलनाडु 39 से 32 तथा केरल 20 से 15 पर आ जाते।
131वें संशोधन विधेयक की पराजय स्वयं एक उत्कृष्ट परीक्षा-उदाहरण है — यह दिखाती है कि
अनुच्छेद 368 का विशेष बहुमत (प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान
करने वालों का दो-तिहाई) केवल कागज़ी शर्त नहीं है। 528 में से 298 मत लगभग 56% थे —
दो-तिहाई (लगभग 352) से काफ़ी कम।
उत्तर प्रदेश संदर्भ — परिसीमन की बहस में UP का दाँव
उत्तर प्रदेश के पास आज 80 लोकसभा सीटें हैं — देश में सर्वाधिक। 1971 की जनगणना पर
आधारित यह संख्या 1977 के परिसीमन (तब 85 सीटें) के बाद केवल 2000 में उत्तराखंड के अलग होने से घटी थी।
87वें संशोधन (2003) के अंतर्गत हुए परिसीमन (2002–2008) में UP के भीतर सीमाएँ बदलीं,
किंतु सीटों की संख्या 80 ही रही।
यदि सीटें जनसंख्या के अनुपात में पुनर्वितरित हों तो UP सबसे बड़ा लाभार्थी होगा —
यही कारण है कि दक्षिणी राज्यों की आपत्ति में UP का नाम बार-बार आता है। 2011 की जनगणना पर आधारित
पुनर्वितरण से UP को लगभग नौ अतिरिक्त सीटें मिलतीं; और यदि सदन 850 तक बढ़ता तो
यह वृद्धि और बड़ी होती।
विधान सभा — अनुच्छेद 170 के अधीन UP की विधान सभा में 403 सीटें हैं;
यह संख्या भी 1971 की जनगणना पर स्थिर है। 104वें संशोधन, 2019 के बाद आंग्ल-भारतीय
समुदाय का नामनिर्देशन समाप्त हो चुका है, इसलिए अब कोई नामनिर्देशित सदस्य नहीं।
राज्यसभा — चौथी अनुसूची के अनुसार UP के पास 31 सीटें हैं, जो
किसी भी राज्य से अधिक हैं। राज्यसभा में जनसंख्या-आधारित आवंटन ही वह बिंदु है जहाँ भारतीय संघवाद
अमेरिकी मॉडल (प्रत्येक राज्य को समान सीटें) से अलग होता है — और यही असमानता परिसीमन-बहस को
और तीखा बनाती है।
12.4 अन्य दबाव-बिंदु — संक्षेप में
केंद्र प्रायोजित योजनाएँ — अनुच्छेद 282 के सहारे केंद्र राज्य-सूची
के विषयों (कृषि, स्वास्थ्य, पुलिस-आधुनिकीकरण) में योजनाएँ चलाता है, जिनमें राज्य को अपना अंश देना
पड़ता है — इससे राज्य की अपनी प्राथमिकताओं का स्थान सिकुड़ता है।
अखिल भारतीय सेवाओं के नियम — केंद्रीय प्रतिनियुक्ति संबंधी नियमों में संशोधन के
प्रस्ताव (2021–22) पर कई राज्यों ने आपत्ति की कि इससे राज्य की सहमति का तत्व कमज़ोर होगा।
शिक्षा समवर्ती सूची में — राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं तथा राष्ट्रीय शिक्षा
नीति के क्रियान्वयन पर केंद्र-राज्य मतभेद अनुच्छेद 254 वाली प्रतिकूलता के जीवंत उदाहरण हैं।
राज्य विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति — कई राज्यों ने राज्यपाल के स्थान पर
मुख्यमंत्री या किसी शिक्षाविद् को कुलाधिपति बनाने के विधेयक पारित किए; ये विधेयक अनुमति के
गतिरोध में फँसे — यह 12.1 की बहस का ही विस्तार है।
राज्यों का उधार एवं राजकोषीय अनुशासन — अनुच्छेद 293(3) के अधीन
केंद्र की सहमति तथा FRBM के अंतर्गत उधार-सीमा राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का एक और बिंदु है।
स्वयं जाँच — इस खंड से 3 प्रश्न
प्र.1परिसीमन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. 84वें संविधान संशोधन ने लोकसभा सीटों के आवंटन पर लगी रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी। 2. 87वें संविधान संशोधन ने राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या 2001 की जनगणना के आधार पर बदल दी। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (D)84वाँ संशोधन (2001) ने रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाई — कथन 1 सही। 87वें संशोधन (2003) ने केवल राज्यों के भीतर निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 की जनगणना पर पुनर्निर्धारित करने की अनुमति दी; राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या नहीं बदली — कथन 2 गलत।
प्र.2नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है। अभिकथन (A): संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पारित नहीं हो सका। कारण (R): संविधान संशोधन विधेयक के लिए प्रत्येक सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का तीन-चौथाई बहुमत आवश्यक होता है। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A(A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता हैB(A) गलत है, किन्तु (R) सही हैC(A) सही है, किन्तु (R) गलत हैD(A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (C)(A) सही है — 17 अप्रैल 2026 को विधेयक के पक्ष में 528 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में से केवल 298 मत पड़े (लगभग 56%)। किंतु अनुच्छेद 368 की अपेक्षा दो-तिहाई की है, तीन-चौथाई की नहीं — अतः (R) गलत है।
प्र.3राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के लिए विधेयक पर निर्णय करने हेतु तीन माह की समय-सीमा निर्धारित है। 2. नवंबर 2025 में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति-निर्देश पर अपनी राय में “मानित अनुमति” की अवधारणा को स्वीकार किया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
Aकेवल 2Bन तो 1 और न ही 2C1 और 2 दोनोंDकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 200 केवल “यथाशीघ्र” कहता है; उसमें तीन माह या कोई अन्य निश्चित अवधि नहीं है — कथन 1 गलत। 20 नवंबर 2025 की संविधान-पीठ की राय में कहा गया कि न्यायालय समय-सीमा नहीं बाँध सकता और “मानित अनुमति” संविधान के लिए अजनबी अवधारणा है — कथन 2 भी गलत।
13. सम्पूर्ण अनुच्छेद-सूची एवं कालक्रम — एक दृष्टि में
13.1 अनुच्छेदवार सूची — भाग XI, XII, XIII, XVIII एवं XXI
सुमेलन-तालिका 16 : इस अध्याय के सभी अनुच्छेद — एक साथ
अनुच्छेद
विषय
1
संघ का नाम एवं राज्यक्षेत्र — “राज्यों का संघ”
2 · 3 · 4
नए राज्यों का प्रवेश/स्थापना · नाम-सीमा-क्षेत्र में परिवर्तन · परिणामी उपबंध (368 के अर्थ में संशोधन नहीं)
245
विधियों का क्षेत्रीय विस्तार; राज्यक्षेत्र-बाह्य प्रवर्तन
246 · 246क
सातवीं अनुसूची के अनुसार विषयों का बँटवारा · वस्तु एवं सेवा कर पर समवर्ती शक्ति
247 · 248
अतिरिक्त न्यायालय · अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ
249
राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद की विधि (राज्यसभा का 2/3 उपस्थित एवं मतदान वाला संकल्प, 1 वर्ष)
250 · 251
आपात में राज्य सूची पर संसद की विधि · 249/250 वाली प्रतिकूलता
252 · 253
दो या अधिक राज्यों की सहमति से विधि · अंतर्राष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने वाली विधि
254 · 255
समवर्ती सूची की प्रतिकूलता · सिफारिश/पूर्व मंजूरी केवल प्रक्रियागत
256 · 257 · 257क
राज्यों की बाध्यता · संघ का नियंत्रण · सशस्त्र बलों की तैनाती (42वें ने जोड़ा, 44वें ने हटाया)
258 · 258क
संघ → राज्य कृत्यों का सौंपना · राज्य → संघ कृत्यों का सौंपना (7वाँ संशोधन)
261 · 262 · 263
पूर्ण विश्वास एवं विश्वास · अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद · अंतर्राज्यीय परिषद
265 · 266 · 267
विधि के प्राधिकार के बिना कर नहीं · संचित निधि एवं लोक लेखा · आकस्मिकता निधि
268 · 268क · 269 · 269क
संघ उद्ग्रहीत–राज्य संगृहीत · सेवा कर (हटाया) · राज्यों को सौंपे गए कर · अंतर्राज्यीय GST
270 · 271 · 272
विभाज्य पूल · अधिभार · हटाया गया (80वाँ संशोधन)
273 · 274 · 275 · 276
जूट अनुदान · राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश · सांविधिक अनुदान · वृत्ति कर (₹2,500)
279 · 279क · 280 · 281 · 282
शुद्ध आगम (CAG का प्रमाणपत्र अंतिम) · GST परिषद · वित्त आयोग · सिफारिशें संसद में · विवेकाधीन अनुदान
293
राज्यों द्वारा उधार
301 · 302 · 303 · 304 · 305 · 306 · 307
व्यापार की स्वतंत्रता · संसद के निर्बंधन · अधिमान का निषेध · राज्य के निर्बंधन · विद्यमान विधियाँ एवं राज्य एकाधिकार · हटाया गया · प्राधिकारी की नियुक्ति
312 · 312क
अखिल भारतीय सेवाएँ · पुराने अधिकारियों की सेवा-शर्तें (28वाँ संशोधन)
352 · 353 · 354 · 355
आपात की उद्घोषणा · उसका प्रभाव · राजस्व-वितरण में परिवर्तन · संघ का रक्षा-कर्तव्य
356 · 357 · 365
राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता · 356 के अधीन विधायी शक्तियों का प्रयोग · निदेशों के अनुपालन में विफलता का प्रभाव
358 · 359 · 360
अनुच्छेद 19 का निलंबन · अधिकारों के प्रवर्तन का निलंबन · वित्तीय आपात
244 · 244क
अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन (पाँचवीं एवं छठी अनुसूची) · असम में स्वायत्त राज्य (22वाँ संशोधन)
371 से 371ञ
बारह राज्यों के लिए विशेष उपबंध (तालिका 12 देखें)
13.2 कालक्रम — संघवाद एवं आपातकाल की निर्णायक तिथियाँ
सुमेलन-तालिका 17 : वर्ष ↔ घटना
वर्ष
घटना
1951
अनुच्छेद 356 का पहला प्रयोग — पंजाब (20 जून)
1953
आंध्र राज्य का गठन (1 अक्टूबर); दिसंबर में राज्य पुनर्गठन आयोग
1955
फज़ल अली आयोग की रिपोर्ट (सितंबर); चौथा संशोधन — अनुच्छेद 305
1956
राज्य पुनर्गठन अधिनियम + 7वाँ संशोधन; क्षेत्रीय परिषदें; अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम एवं नदी बोर्ड अधिनियम; अनुच्छेद 258क जोड़ा
1962
पहला राष्ट्रीय आपात (26 अक्टूबर); 13वाँ संशोधन — अनुच्छेद 371क (नागालैंड)
1963
पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ — “संविधान पूर्णतः संघीय नहीं”
1966
भारतीय वन सेवा — तीसरी अखिल भारतीय सेवा
1968
पहला आपात समाप्त (10 जनवरी)
1969
22वाँ संशोधन — 371ख (असम) एवं 244क; कृष्णा, गोदावरी एवं नर्मदा न्यायाधिकरण; राजमन्नार समिति
1971
दूसरा राष्ट्रीय आपात (3 दिसंबर); 27वाँ संशोधन — 371ग (मणिपुर); पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम
1973
32वाँ संशोधन — 371घ एवं 371ङ (आंध्र प्रदेश); आनंदपुर साहिब प्रस्ताव
1975
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (12 जून); तीसरा आपात (25 जून); 36वाँ संशोधन — 371च (सिक्किम); 38वाँ एवं 39वाँ संशोधन
1976
42वाँ संशोधन — पाँच विषय समवर्ती सूची में; 257क; 352 में “भाग”; 356 की अवधि एक वर्ष; अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का उल्लेख; एडीएम जबलपुर
1977
दोनों आपात रद्द (21 मार्च); शाह आयोग; राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ
1978
44वाँ संशोधन — आपात-उपबंधों का पुनर्लेखन (तालिका 14)
1983–88
सरकारिया आयोग — गठन जून 1983, रिपोर्ट 1988, 247 सिफारिशें
1986–87
53वाँ संशोधन — 371छ (मिज़ोरम); 55वाँ — 371ज (अरुणाचल); 56वाँ — 371झ (गोवा); रावी-ब्यास न्यायाधिकरण (1986); पंजाब की 356-उद्घोषणा (11 मई 1987)
1988
60वाँ संशोधन — वृत्ति कर की सीमा ₹250 से ₹2,500
1990
अंतर्राज्यीय परिषद का गठन (28 मई); कावेरी न्यायाधिकरण; 64वाँ संशोधन (पंजाब)
1992
73वाँ एवं 74वाँ संशोधन — अनुच्छेद 280(3) में (खख) एवं (ग)
1994
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (11 मार्च) — 9 न्यायाधीश
1996
पेसा अधिनियम (24 दिसंबर); अंतर्राज्यीय परिषद की स्थायी समिति
2000
80वाँ संशोधन — अनुच्छेद 270 का पुनर्लेखन, 272 हटाया; छत्तीसगढ़, उत्तरांचल एवं झारखंड
2001 · 2003
84वाँ — परिसीमन-रोक 2026 के बाद तक; 87वाँ — 2001 की जनगणना पर सीमा-पुनर्निर्धारण
2007–10
पुंछी आयोग — गठन अप्रैल 2007, रिपोर्ट 30 मार्च 2010 (सात खंड)
2012–13
98वाँ संशोधन — 371ञ (कर्नाटक), प्रवृत्त 1 अक्टूबर 2013
2014
तेलंगाना (2 जून); अनुच्छेद 371घ का विस्तार तेलंगाना तक
GST लागू (1 जुलाई); पुट्टस्वामी — एडीएम जबलपुर अपास्त
2019
अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी (5 अगस्त); जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (31 अक्टूबर); जल विवाद संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित (31 जुलाई)
2022
GST प्रतिकर की पाँच-वर्षीय अवधि समाप्त (जून); मोहित मिनरल्स — परिषद की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं
2023
106वाँ संशोधन — महिला आरक्षण; इन रे अनुच्छेद 370 (11 दिसंबर); 16वाँ वित्त आयोग गठित (31 दिसंबर)
2025
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन (13 फरवरी); तमिलनाडु राज्यपाल वाद (8 अप्रैल); GST परिषद की 56वीं बैठक (3 सितंबर) — दो-स्लैब व्यवस्था; राष्ट्रपति-निर्देश पर संविधान पीठ की राय (20 नवंबर); 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट (17 नवंबर)
2026
16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में (1 फरवरी); मणिपुर में राष्ट्रपति शासन समाप्त (4 फरवरी); संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक अस्वीकृत (17 अप्रैल)
13.3 रटने योग्य निर्णायक तथ्य
भाग XI — 245 से 263; भाग XII — 264 से 300क; भाग XIII — 301 से 307;
भाग XVIII — 352 से 360; भाग XXI — 369 से 392।
सातवीं अनुसूची — मूलतः 97 / 66 / 47; वर्तमान में 98 / 59 / 52।
राज्य सूची पर संसद की विधि की पाँच स्थितियाँ — 249, 250, 252, 253 तथा 356।
“उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3” — अनुच्छेद 249 एवं
312 (केवल राज्यसभा); तथा अनुच्छेद 352(6) एवं 368
(दोनों सदन, साथ में कुल सदस्यता का बहुमत भी)।
अखिल भारतीय सेवाएँ — तीन (IAS, IPS — अनु. 312(2); IFoS — 1966)।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा अब तक नहीं।
क्षेत्रीय परिषदें — पाँच, सांविधिक; मध्य की मुख्यालय प्रयागराज;
पूर्वोत्तर परिषद पृथक् (1971), मुख्यालय शिलांग।
GST — 101वाँ संशोधन, 2016; लागू 1 जुलाई 2017; परिषद का निर्णय
3/4 भारित मत, केंद्र 1/3, राज्य 2/3, कोरम 1/2।
वित्त आयोग — अध्यक्ष + 4 सदस्य; 16वाँ आयोग, पनगढ़िया, 2026–31,
41%, UP का हिस्सा 17.62%।
अनुच्छेद 371 श्रृंखला — 12 राज्य; रूढ़िजन्य विधि का संरक्षण केवल
नागालैंड (371क) एवं मिज़ोरम (371छ); न्यूनतम विधान सभा —
सिक्किम/अरुणाचल/गोवा 30, मिज़ोरम 40।
राष्ट्रीय आपात — 3 बार (1962, 1971, 1975); अनुमोदन 1 माह,
विशेष बहुमत; नवीकरण 6 माह; 1/10 सदस्य →
14 दिन में विशेष बैठक।
राष्ट्रपति शासन — अनुमोदन 2 माह, साधारण बहुमत; अधिकतम
3 वर्ष; पंजाब 1987 के लिए 5 वर्ष का अपवाद;
पहला प्रयोग पंजाब 1951; सर्वाधिक मणिपुर, फिर
उत्तर प्रदेश (10 बार)।
वित्तीय आपात — अब तक कभी नहीं; अनुमोदन 2 माह, साधारण बहुमत;
कोई अधिकतम अवधि नहीं; न्यायाधीशों तक के वेतन में कटौती संभव।
अनुच्छेद 358 = केवल 19, स्वतः, केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण;
359 = राष्ट्रपति के आदेश से, 20 एवं 21 को छोड़कर, तीनों आधारों में।
“आंतरिक अशांति” अनुच्छेद 352 से हटा, पर अनुच्छेद 355 में आज भी है।
उत्तर प्रदेश — 80 लोकसभा, 31 राज्यसभा, 403 विधान सभा,
100 विधान परिषद; मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज;
कोई अनुसूचित क्षेत्र नहीं; अनुच्छेद 371 श्रृंखला में कोई उपबंध नहीं।
स्वयं जाँच — सम्पूर्ण अध्याय से 3 प्रश्न
प्र.1सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। सूची-I (संविधान संशोधन) सूची-II (प्रभाव) A. 42वाँ संशोधन 1. अनुच्छेद 352 में “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” B. 44वाँ संशोधन 2. पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में C. 80वाँ संशोधन 3. अनुच्छेद 279क — GST परिषद D. 101वाँ संशोधन 4. अनुच्छेद 272 का लोप कूट:
उत्तर: (C)42वाँ (1976) — शिक्षा, वन, नाप-तौल, वन्यजीव-संरक्षण एवं न्याय-प्रशासन समवर्ती सूची में; 44वाँ (1978) — “सशस्त्र विद्रोह”; 80वाँ (2000) — अनुच्छेद 272 हटाया एवं 270 पुनर्लिखित; 101वाँ (2016) — GST परिषद। अतः A-2, B-1, C-4, D-3 सही है।
प्र.2निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं? (अनुसूची/अनुच्छेद) (विवरण) 1. छठी अनुसूची — असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्र 2. पाँचवीं अनुसूची — वर्तमान में दस राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र 3. अनुच्छेद 244क — असम के जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर स्वायत्त राज्य, जिसका गठन 1971 में हुआ नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1 और 2Bकेवल 3C2 और 3Dकेवल 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (B)अनुच्छेद 244क को 22वें संविधान संशोधन (1969) द्वारा जोड़ा गया था, किंतु इसके अधीन कोई स्वायत्त राज्य आज तक गठित नहीं हुआ। अतः युग्म 3 सुमेलित नहीं है; युग्म 1 एवं 2 सही हैं।
प्र.3निम्नलिखित घटनाओं को सही कालक्रमानुसार क्रम में व्यवस्थित कीजिए। 1. अंतर्राज्यीय परिषद का गठन 2. एस.आर. बोम्मई वाद का निर्णय 3. 101वाँ संविधान संशोधन 4. पुंछी आयोग की रिपोर्ट नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
A1, 2, 4, 3B2, 1, 3, 4C2, 1, 4, 3D1, 2, 3, 4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (A)अंतर्राज्यीय परिषद — 28 मई 1990; एस.आर. बोम्मई — 11 मार्च 1994; पुंछी आयोग की रिपोर्ट — 30 मार्च 2010; 101वाँ संशोधन — 2016। अतः 1, 2, 4, 3 सही क्रम है।